Saturday, May 24, 2014
जीने के लिए दर्द संभालने होंगे..
जीने के लिए दर्द संभालने होंगे..
हर आंसू पूछता है,सियासत के कितने नए सौदागर आएंगे। सत्ता के कितने सिंकदर आएंगे। कितने चुनाव के बाद दहशत की परछाइयांे का डोलना बंद होगा। कितनी सांसे सरकार के लिए कुर्बान होंगी। कितनी नक्सली गोलियां प्रदेश की रखवाली करने वाले जवानों को सीने में खानी पड़ेगी। मौत और विधान सभा के बीच कितनी दूरियां हैं,कोई बताएगा,अबकी बार,मोदी सरकार में।
कायनात की घाटी झीरम घाटी। जो अब बन चुकी है मौत की घाटी। मौत की नई कहानी का सिलसिला थमता ही नहीं। नक्सलियों के कब्जे में यह घाटी आए दिन दर्द के बही खाते खोल देती है। झीरम घाटी में नक्सलियों ने कइयों को मौत की नींदें दी और दे भी रहे हैं। लेकिन चैकाने वाली बात यह है कि सरकार नक्सलियों के आगे अब भी बेबस है। सरकार के लिए कितनी जानें कुर्बानी देंगी और शहीदों की पट्टिका में नाम लिखे जाने का सिलसिला चलेगा, इसका जवाब सरकार के नुमाइदों के पास नहीं है। हमेशा की तरह एक ही जवाब, हम नक्सलियों को मुंह तोड़ जवाब देंगे। सरकार ने अपनी तरफ से कभी नक्सलियों की गोली का शिकार हुए लोगों की याद में शहीद दिवस मनाने का निर्णय नहीं लिया। अलबत्ता मौत का मुआवजा बांटने में अपने हाथ सिकोड़े नहीं,यही वजह है कि भीड़ से कभी उसके खिलाफ आवाज नहीं उठी। लेकिन मौत का मुआवजा बांट देना ही सरकार की जवाब देही है,ऐसा कहकर सरकार को कटघरे में खड़े करने से नहीं रोका जा सकता। इसलिए कि सरकार की जवाबदेही है कि वो आम आदमी की जिन्दगी की सुरक्षा करे। मगर चैकाने वाली बात यह है कि छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद से जिस गति से इस नये राज्य का विकास हुआ,उसी गति से नक्सलियों की ताकतों में इजाफा हुआ। जाहिर है कि अदावत और शहादत के खेल में सियासत का बहुत बड़ा योगदान रहा है। अभी तक केवल आम आदमी और पुलिस के जवान ही नक्सली गोली के शिकार होते रहे हैं। लेकिन 25 मई 2013 की शाम ने छग के माथे पर दर्द की जो रेखा खींच दिया वो दर्द आज भी कइयों के आॅखों से महुए के रस की तरह आंसू बनकर टपक रहा है। यह एक ऐसा दर्द है जो सदियों तक आत्मा की शिराओं में रिसता रहेगा। हर आंसू सरकार से पूछता है कि जीने के लिए क्या दर्द को सम्हालने होंगे।
दर्द को श्रद्धाजलि देने के कई सियासी उपक्रम हैं। इसी बहाने शहीद हुए लोगों को नमन करने और याद करने की इच्छाएं आकार लेती है दिल के किसी कोने में। यह हर साल होगा। कांग्रेस के मंच पर। कांग्रेस ने झीरम घाटी में बहुत कुछ खोया। जिनके दम पर कांग्रेस छग में सांसे लेती थी,अब वो न तो कांग्रेस के बीच हैं और न ही जनता के बीच। सरकार ने झीरम घाटी की पहली बरसी के तीन दिन पहले जस्टिस प्रशांत मिश्रा आयोग को 18 पेज का शपथ पत्र और 200 पेज का दस्तावेज सौप कर बता दिया कि झीरम घाटी में क्या हुआ। झीरम घाटी 25 मई को मौत की घाटी कैसे बनी,इसे बताने में सरकार को एक बरस लग गए। किसी को जिन्दगी देने में कई बरस लग जाते हैं, मगर मौत देने में पल दो पल। कांग्रेस अपने नेताओं की याद में 25 मई को शहीद दिवस मनाने जा रही है। शहादत पर सियासत अच्छी बात नहीं है। लेकिन नक्सलियों की गोली का शिकार कोई बड़ा नेता हो और उसकी मौत पर भी सियासत ना हो, ऐसा कभी हुआ नहीं। 25 मई 2013 की घटना के बाद से लेकर आज तक भाजपाई और कांगे्रसी तंबू में मौत पर सियासत हो रही है। इतने बड़े हमले के पीछे कौन सी आॅखें गड़ी थी, जांच में सामने नहीं आया है। लेकिन अंदेशा और शक की सुई जिस नेता पर घूम रही है,वो घूमती रहेगी,उन सबके दिलों में जो अपनों को खोए हैं।
घटना दर घटना हो रही है। घाटी खून से रंग रही है। ना नक्सली बदले और न ही नक्सल आॅपरेशन का तरीका बदला। ना सरकार बदली और न ही उसका सिस्टम। बदलाव इतना ही हुआ,पहले गृहमंत्री थे ननकी राम कंवर,अब अब रामसेवक पैकरा हैं। जिनके पास सिर्फ सियासी जवाब हैं। चुनाव की चलते नक्सलियों पर नकेल लगाने और झीरम घाटी में हुए हादसों पर कोई ठोस निर्णय नहीं ले सके। लेकिन इस बात को स्वीकारते हैं दमदारी के साथ, इस दिशा में काम होना चाहिए था। केन्द्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद से लाल गलियारे के फैलाव पर रोक लगने का भरोसा जताते हैं। सरकारी लापरवाही के चलते अब तक डेढ़ सौ से अधिक लोगों की जानें जा चुकी है। यह सिलसिला यहीं थम जाएगा,इसका दावा न तो सरकार कर सकती और ना ही नक्सलियों की मांद में जाकर मुंह तोड़ जवाब देने का दावा करने वाली पुलिस। पुलिस और नक्सलियों के बीच 2013 से अप्रैल 2014 तक सवा दौ सौ बार मुठभेड़ हो चुकी है। 662 नक्सलियों को गिरफ्तार करके पुलिस अपनी पीठ थपथपा सकती है। लेकिन सच्चाई तो यही है कि जो दर्द नक्सलियों की गोली से मिले हैं,सरकार की लापरवाही के चलते, वो संभाले नहीं संभलते। लोग टूट गए है। हर आंसू पूछता है,सियासत के कितने नए सौदागर आएंगे। सत्ता के कितने सिंकदर आएंगे। कितने चुनाव के बाद दहशत की परछाइयों का डोलना बंद होगा। कितनी सांसे सरकार के लिए कुर्बान होंगी। कितनी नक्सली गोलियां प्रदेश की रखवाली करने वाले जवानों को सीने में खानी पड़ेगी। मौत और विधान सभा के बीच कितनी दूरियां हैं,कोई बताएगा,अबकी बार,मोदी सरकार में।
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