Tuesday, November 26, 2024
अब हिन्दुस्तान में मोदिस्तान,कांग्रेस का अवसान
- रमेश कुमार ‘रिपु’
महाराष्ट्र की राजनीति में उद्धव ठाकरे की राजनीति पर्दे के पीछे चली गयी। ठाकरे वाद खत्म होने के कगार पर पहुंच गया। इस चुनाव में बीजेपी केा मिली सीट बताती है कि यदि वो और सीटों पर चुनाव लड़ती तो खुद अपनी पार्टी की सरकार बना लेेती। किसी की जरूरत उसे नहीं पड़ती।
नरेन्द्र मोदी के प्रति जुनून तारी है। उनके पैतरे के आगे सारे चित होते जा रहे हैं। नरेन्द्र मोदी के रथ को रोकने की हिम्मत अब किसी में नहीं है। अटल की बीजेपी अब मोदी की बीजेपी है। जो कहते थे 2024 के परिणाम से कि अब मोदी युग खत्म होने के कगार पर है। हरियाणा,महाराष्ट्र,झारखंड चुनाव मोदी की अग्नि परीक्षा है। सच तो यह है कि हिन्दुस्तान में अब मोदिस्तान है। कांग्रेस अवसान पर है। देश के लोगों केा लगता है मोदी ही हर समस्या का हल हैं। महाराष्ट्र में कांग्रेस का पंजा गिर गया। यह होना था। क्यों कि उसे चुनाव लड़ना नहीं आता। मोदी साल भर चुनाव लड़ते हैं। और कांग्रेस चुनाव के वक्त चुनाव की तैयारी करती है। हरियाणा,झारखंड और महाराष्ट्र के चुनाव परिणाम बता रहे हैं राहुल राजनीति में अर्द्ध विराम हो गए हैं। प्रियंका गांधी वायनाड से राहुल गांधी से अधिक मतों से चुनाव जीती हैं। आगे चलकर वो राहुल के सियासी मार्ग में बाधक बन सकती हैं। जिस गति से कांगे्रस के हाथ से राज्य निकलते जा रहे हैं,आने वाले समय में कांग्रेस एक सियासी इतिहास बन कर रह जाएगी। एक थी कांग्रेस।
कटेंगे-बंटेगे नारा का भी असर रहा
छत्तीसगढ़ माॅडल हरियाणा में दिखा। हरियाणा माॅडल महाराष्ट्र में दिखा। झारखंड में चूंकि डबल इंजन की सरकार नहीं है। इसलिए वहां हरियाणा माॅडल नहीं दिखा। इन तीन राज्यों में चुनाव में एक बात कामन रही। लाड़ली बहना योजना। महाराष्ट्र में साढ़े तीन करोड़ महिलाओं को लाड़ली बहना योजना के तहत राशि दी जा रही है। महाराष्ट्र चुनाव के परिणाम से संजय राउत,पवन खेड़ा आदि नेता संतुष्ट नहंीं है। संजय राउत का यह कहना कि शिंदे के उम्ममीदवार इतनी संख्या में कैसे जीत सकते हैं। यह परिणाम जनता का हो ही नहीं सकता। यह ईवीएम और सरकार का है। हरियाणा में जनता बीजेपी के लोगों को गांवों घुसने नहीं दे रही थी। फिर भी वहां बीजेपी तीसरी बार सरकार बना ली। हरियाणा की तरह महाराष्ट्र में कई सारी ईवीएम मशीन की बैटरी 99 फीसदी चार्ज बताया। यदि वोट पड़ें हैं तो बैटरी फुल कैसे हो सकती है। जाहिर सी बात है कि कहीं न कहीं कुछ तो गड़बड़ है। महाराष्ट्र में असली शिवसेना और असली एनसीपी कौन है इस चुनाव ने बता दिया। महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के दौरान ही बंटेंगे तो कटेंगे नारा खूब चर्चा में रहा। यूपी के सीएम योगी ने इस नारे को महाराष्ट्र विधानसभा में चुनाव प्रचार के दौरान खूब इस्तेमाल किया। ऐसा माना गया कि यह नारा हिंदू समुदाय की अलग अलग जातियों को एक करने के लिए था।
तो बीजेपी अकेले सरकार बना लेती
महाराष्ट्र की राजनीति में उद्धव ठाकरे की राजनीति पर्दे के पीछे चली गयी। ठाकरे वाद खत्म होने के कगार पर पहुंच गया। इस चुनाव में बीजेपी केा मिली सीट बताती है कि यदि वो और सीटों पर चुनाव लड़ती तो खुद अपनी पार्टी की सरकार बना लेेती। किसी की जरूरत उसे नहीं पड़ती। कांग्रेस 101 सीट पर चुनाव लड़ी उसे 16 सीट मिली। उद्धव ठाकरे की शिवसेना 95 सीट पर और जीती 20 सीट। शरद पवार कल तक महाराष्ट्र की राजनीति के बहुत बड़े उलट फेर वाले नेता माने जाते थे, उनकी पार्टी दस सीट पर सिमट गयी।बीजेपी 148 सीट पर चुनाव लड़ी 132 सीट पाई। एकनाथ शिंदे की शिवसेना 81 सीट पर चुनाव लड़ी और 57 सीट पाई। अजीत पवार की एनसीपी 69 सीट पर चुनाव लड़ी और 41 सीट पाई। देवेंद्र फडणवीस ने चुनाव से पहले कहा कि वो मैं आधुनिक अभिमन्यू हॅूं हर चक्रव्यूह भेदना जानता हॅूं। जाहिर सी बात है महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री यही बनेंगे। कांग्रेस के लिए महाराष्ट्र की हार किसी बड़े झटके से कम नहीं है।क्योंकि अभी हाल ही में उसे हरियाणा विधानसभा चुनाव में शिकस्त का सामना करना पड़ा था।झारखंड में चुनाव के दौरान बीजेपी ने कथित बांग्लादेशी घुसपैठियों का मुद्दा मजबूती से उठाया। लेकिन सफलता नहीं मिली।
नायडू-नीतीश सोचेंगे
नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू के भरोसे भले केंद्र में मोदी सरकार चल रही है। लेकिन लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा को मिल रही लगातार जीत से समीकरण बदलेगा। ऐसे में नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू मोदी सरकार से अब बहुत तोलमोल करने से पहले दस बार सोचेंगे। महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में भी भाजपा ने मोदी की लोकप्रियता और नीतियों के अधार पर ही चुनाव लड़ा। ऐसे में महाराष्ट्र में बीजेपी की जीत को मोदी की जीत बताया जा रहा है। ऐसे में भाजपा के अंदर अब मोदी का रुतबा और मजबूत होगा। क्योंकि लोकसभा चुनाव के बाद मोदी की लोकप्रियता पर सवाल खड़े होने लगे थे।
उद्धव ठाकरे को भारी पड़ा
यह माना जा रहा है कि शिवसेना के मूल विचारों से कटना ही उद्धव ठाकरे को भारी पड़ा और अपने गढ़ मुंबई ठाणे और कोंकण में भी वह एकनाथ शिंदे से बुरी तरह पिछड़ गए। दूसरी ओर शरद पवार की पार्टी के नेता भी अजीत पवार पर पार्टी का नाम और चुनाव चिन्ह हथियाने का आरोप लगाते रहे। लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी को इन आरोपों का फायदा भी मिला। लेकिन विधानसभा चुनाव में उन्हें भी मुंह की खानी पड़ी है। अणुशक्ति नगर विधानसभा से स्वरा भास्कर के पति फहद अहमद चुनावी मैदान में हैं। उन्हें एनसीपी शरद पवार ने टिकट दिया था फहाद अहमद का मुकाबला एनसीपी अजित पवारद्ध की प्रत्याशी और नवाब मलिक की बेटी सना मलिक से था। नतीजों में अपने पति के हार के बाद स्वारा ने ईवीएम पर सवाल उठाते हुए चुनाव आयोग से जवाब मांगा।
EVM 99 फीसदी कैसे चार्ज
स्वरा भास्कर ने ट्वीट करके कहा है कि पूरा दिन वोट होने के बावजूद म्टड मशीन 99 फीसदी कैसे चार्ज हो सकती है।इलेक्शन कमीशन जवाब दे। अणुशक्ति नगर विधानसभा में जैसे ही 99फीसदी चार्ज मशीने खुली उसके बीजेपी समर्थित एनसीपी को वोट मिलने लगे। आखिरी कैसे? स्वरा भास्कर के इस पोस्ट के बाद विपक्ष के अन्य नेता भी ऐसे सवाल चुनाव आयोग से पूछ सकते हैं।
बहरहाल चुनाव परिणाम आ गया है आरोप प्रत्यारोप की सियासत चलती रहेगी। लेकिन लोकसभा के बाद विधान सभा चुनाव ने बता दिया कि सियासत का सिंकदर कौन है। फिर भी अच्छे दिन अभी नहीं आए हैं,और उन्हें लाना चाहिए।
भगवा छतरी झारखंड में इन वजहों से नहीं तनी
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‘‘झारखड को बीजेपी हाईकमान समझ नहीं पाया। वो घुसपैठिये का मुद्दा पूरे चुनाव में उछालते रहे। जनता इस ओर ध्यान ही नहीं दी। वहीं बीजेपी का चुनावी मैनेजमेंट बहुत कमजोर रहा। टिकट वितरण में बागियों को नहीं समझा सके। आदिवासी वोटरों को लुभाने में बीजेपी पिछड़ गयी। राज्य में लाड़ली बहना योजना ने इंडिया गंठबंधन को छह लाख अधिक वोट दिलाया। हरियाणा फंडा झारखंड में काम नहीं आया।’’
रमेश कुमार ‘रिपु’
महाराष्ट्र में महायुति रिकार्ड मतों से जीती मगर झारखड में बीजेपी सारे दांव अपना कर भी नहीं जीत सकी। ऐसा कौन सी वजह रही है जिस वजह से भगवा छतरी नहीं तनी। बीजेपी का केंद्रीय नेतृत्व को हैरान है कि राज्य में आक्रामक चुनाव प्रचार अभियान के बाद भी आखिर पार्टी की इतनी करारी हार कैसे हो गयी। 81 सीटों वाले झारखंड में एनडीए को 22 जबकि इंडिया गठबंधन ने 56 सीटें मिली। जबकि अंत तक यही माना जा रहा था कि चुनावी लड़ाई में बीजेपी का पलड़ा भारी है।
जमीनी मुद्दों को समझ नहीं पाए
झारखंड में बीजेपी का सह प्रभारी बनने के बाद हिमंता बिस्वा सरमा ने झारखंड के संथाल परगना इलाके में कथित रूप से बांग्लादेशी घुसपैठ की बात को जोर शोर से उठाया। अन्य बीजेपी नेताओं ने लव और लैंड जिहाद की बात की। यह दावा किया कि झारखंड के आदिवासी इलाकों में बांग्लादेशी घुसपैठिये आ रहे हैं। यहां की आदिवासी महिलाओं से शादी कर उनकी संपत्ति हड़प रहे हैं। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी चुनावी सभाओं में घुसपैठ के मुद्दे को उठाया था। लेकिन यहां के वोटर इसे मुद्दा ही नहीं माना। और नाराज होकर इंडिया गंठबंधन को वोट कर दिया।
बीजेपी की रणनीति ध्वस्त
बीजेपी ने चुनाव प्रचार के दौरान आदिवासियों की रोटी, माटी,बेटी की हिफाजत को सबसे बड़ा मुद्दा बनाया। बाकी मुद्दों को बीजेपी ने पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। चुनाव नतीजों से पता चलता है कि संथाल परगना इलाके में बीजेपी की यह रणनीति पूरी तरह ध्वस्त हो गयी। बीजेपी खाता भी नहीं खोल पाई। हालांकि उत्तरी छोटा नागपुर इलाके में पार्टी को थोड़ा सा फायदा हुआ। यहां 25 में से 14 सीटें बीजेपी और उसके सहयोगी दलों को मिलीं।
घुसपैठिये तक सिमटी बीजेपी
इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि झारखंड के चुनाव में बीजेपी के पास कई मुद्दे थे। जिन्हें वह उठा सकती थी। जैसे बेरोजगारी, नौकरियों की कमी, हेमंत सोरेन के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप, सोरेन सरकार के मंत्री आलमगीर आलम से धन की बरामदगी, भर्ती परीक्षाओं के दौरान उम्मीदवारों की मौत। लेकिन वह जनता से जुड़े मुद्दों को हाशिये पर रख कर सारा ध्यान घुसपैठ पर ही केंद्रित किया।
जयराम ने नुकसान पहुंचाया
महतो समुदाय के उभरते हुए नेता जयराम महतो ने कई विधानसभा सीटों पर बीजेपी और एनडीए को नुकसान पहुंचाया। महतो की पार्टी झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा को कम से कम 11 सीटों सिल्ली, बोकारो, गोमिया, गिरिडीह, टुंडी, इचागढ़, तमार,चक्रधरपुर, चंदनकियारी, कांके और खरसावां पर मिले वोट पर हार जीत के अंतर ज्यादा हैं। सिर्फ एक सीट डुमरी में इसने झामुमो को नुकसान पहुंचाया। डुमरी सीट से जयराम महतो चुनाव जीते हैं।जयराम महतो के राजनीति में आने की वजह से सबसे ज्यादा नुकसान बीजेपी की सहयोगी पार्टी आल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन (आजसू) को हुआ है। आजसू को इस चुनाव में सिर्फ एक सीट पर जीत मिली। जबकि 2019 में उसने दो सीटें जीती थी। चुनाव में आजसू के प्रमुख सुदेश महतो खुद भी सिल्ली विधानसभा सीट से चुनाव हार गए।
मैय्या सम्मान योजना
झारखंड में मैय्या सम्मान योजना बीजेपी के हार की सबसे बड़ी वजह थी। छह लाख वोट महिलाओं के ज्यादा पड़े पुरुषों की तुलना में। चुनाव में 91.16 लाख महिलाओं ने जबकि 85.64 पुरुषों ने वोट डाला। इस लिहाज से महिलाओं ने करीब 6 लाख वोट ज्यादा डाले। इस योजना के तहत 21 से 49 साल की महिलाओं को हर महीने 1000 रुपए दिए जाते हैं। झामुमो ने मैय्या सम्मान योजना का चेहरा हेमंत सोरेन की पत्नी कल्पना मुर्मू सोरेन को बनाया। कल्पना ने इस योजना को झारखंड की महिलाओं के बीच में पहुंचाने के लिए पूरे राज्य में लगातार बैठकें और सभाएं की।
आरक्षित सीटों पर बीजेपी हारी
वैसे बीजेपी आदिवासियों के हक की बातें करती है। लेकिन झारखंड चुनाव में परिणाम बताते हैं कि आदिवासी उससे छिटक गया। झारखंड की विधानसभा में 28 सीटें जबकि लोकसभा की 5 सीटें आरक्षित हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी लोकसभा में आरक्षित पांच सीटों में एक भी नहीं जीती थी। 28 आरक्षित विधानसभा सीटों में से बीजेपी सिर्फ एक सीट पर जीत पाई है। इससे ऐसा लगता है कि आरक्षित सीटों पर बीजेपी को बहुत काम करना है।
आदिवासी बीजेपी से दूर
झारखंड में फिर से हेमंत सोरेन की सरकार बनने से एक बात साफ है कि आदिवासी समुदाय बीजेपी के साथ नहीं जुड़ पाया। जबकि लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद बीजेपी ने बड़े पैमाने पर आदिवासियों तक पहुंचने की कोशिश की थी। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी भी आदिवासी समुदाय से ही आते हैं। बीजेपी ने आदिवासियों के भगवान कहे जाने वाले बिरसा मुंडा की जयंती को जनजातीय गौरव दिवस के रूप में मनाने का ऐलान किया। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बिरसा मुंडा के जन्म स्थान खूंटी में स्थित उलिहातू पहुंचे थे। झारखंड के आदिवासी वोटर केा अपनी तरफ बीजेपी को करना चाहती है तो यहां उसे और काम करना पड़ेगा। विधानसभा चुनाव में बीजेपी के कई बड़े आदिवासी नेताओं की पत्नियों को चुनाव में हार का सामना करना पड़ा। पूर्व मुख्यमंत्री तथा पूर्व केंद्रीय मंत्री अर्जुन मुंडा की पत्नी मीरा मुंडा, पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा की पत्नी गीता कोड़ा भी चुनाव हार गईं। पूर्व मुख्यमंत्री चंपई सोरेन के बेटे बाबूलाल सोरेन बीजेपी के टिकट पर चुनाव हार गए।
इलेक्शन मैनेजमेंट ठीक नहीं
हरियाणा चुनाव और महाराष्ट्र चुनाव की तरह बीजेपी का इलेक्शन मैनेजमेंट झारखंड में वैसा नहीं था। इस वजह से बीजेपी वोटरों तक अपना पैठ नहीं बना पाई। इसके अलावा टिकट वितरण को लेकर भी नाराजगी रही। सात विधानसभा सीटों पर पार्टी ने गलत टिकट बांटे। कुछ सीटों पर बीजेपी बागियों से निपटने में भी फेल रही। योगी आदित्यनाथ का कटेंगे तो बंटेगे नारे की खूब चर्चा हुई, लेकिन हिन्दू वोटों को झारखंड में नहीं जोड़ पाई। जिससे बीजेपी यहां हरियाणा और महाराष्ट्र जैसा कामयाब नहीं हो सकी।
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