Thursday, June 19, 2025

लाल आतंक के जंगल में विकास की नई इबारत से ग्रामीण गदगद

बालाघाट \ रमेश कुमार ‘रिपु’. लौगुर का जंगल कभी लाल आतंक का ठिकाना हुआ करता था। अब यहां समृद्धि की बयार देखकर गांव वाले फूले नहीं समाते । लौगुर जंगल का नाम लेते ही बालाघाट के हर व्यक्ति के चेहरे पर खौफ दिखने लगता था।अब वहां परिवर्तन की गाथाएं लिखी जाने लगी है। लौगुर को भी कभी विकास की आहट सुनने को मिलेगा, ग्रामीण इसकी कभी कल्पना नहीं किये थे। जिस मार्ग पर कभी बैलगाड़ी वाले चलना सबसे कठिन काम मानते थे,उस मार्ग पर अब बैलगाड़ी,घोड़ा गाड़ी,चार पहिया और तीन पहिये सहज हो गए। इस घने जंगल में 11 करोड़ 70 लाख रुपए की लागत से पांच हाई लेबल ब्रिज बन रहे हैं। जिसमें से चार पूरे हो गए हैं। विकास का नया अध्याय लाल आतंक के जंगल में लिखे जाने से ग्रामीण गदगद हैं। बारिश में भी सफर आसान हुआ मप्र ग्रामीण सडक विकास प्राधिकरण द्वारा 5 हाई लेवल ब्रिज का कार्य शुरू किया गया था जिनमें से 4 पूर्ण हो चुके है। सबसे बड़ी बात है, इसी घने जंगल में 17.42 किमी. लंबी 1255.92 लाख रुपये की सड़क निर्माण कीविभाग द्वारा पूरी तैयारी कर ली गई है। इस घने जंगल में बसें 7 वनग्रामों के लिए उस्काल नदी जल का एक बड़ास्रोत तो है, लेकिन बारिश के दौरान परिवहन में समस्या भी बन जाया करती है। अब से बारिश में भी यहां के जनजातीय नागरिक आसानी से सफर कर पायेगी। इस घने जंगल में खारा, पोलबत्तूर, कोकमा, तल्लाबोडी, लौगुर,वरूरगोटा और सल्फारीठ वनग्राम आबाद है। जो अब सीधे सड़क से जुड़कर विकास के रास्ते पर आ सकेंगे। नक्सलियों के डर के बीच मिली सफलता
मप्र ग्रामीण सड़क विकास प्राधिकरण महाप्रबंधक श्रीमती माया परते ने बताया कि यहां पुल पुलिया और ब्रिज केनिर्माण कार्य के लिये कोई कम्पनी नक्सबल डर के कारण तैयार नहीं हो पा रहीं थी। विकास द्वारा कई बार टैंडर लगाने के बाद प्रशासनिक सहयोग देने का प्रस्ताकव दिया। इसके अलावा वनों को बचाते हुए निर्माण करने कीअलग चुनौती रहीं है। यहां चार ब्रिज पुर्ण हो गए है, एक 17 किलोमीटर की एक सड़क जो खुरसुड़ होकर पोलबत्तूर से खारा को जोड़ेगी, जिससे चिखलाझोड़ी मार्ग से जोड़ेगी। कलेक्टर  मृणाल मीना ने कहा कि इस घने जंगल में बहुत ही आवश्यंक आधारभूत सरंचना तैयार हुई है। ब्रिज तैयार होने इसी बारिश में 7 वन ग्रामों को सुगमता होगी।
कई खूबियां है लौगुर में बालाघाट में लौगुर का 66.71 किमी.क्षेत्र व 412 हेक्टेयर में बसा घनघोर जंगल अपने आप मे कई खूबियों वाला है। जिसकी उत्तर में सीमा चिखलाझोडी रोड़ व दक्षिण में सामनापुर, पूर्व में बैहर-बालाघाट रोड़ से मिलता है। इसजंगल का एक बड़ा क्षेत्र मयूरबिन के लिए खास पहचान रहता है। यह जंगल अब भी आम नागरिकों की पहुँच के कारण अनछुआ है। इस जंगल मे प्रवेश तीन स्थानों से हो सकता है। एक बैहर बालाघाट रोड़ से, चिखलाझोडी रोड से और एक सामनापुर रोड़ पर आमगांव की ओर से मोटर सायकिल से सम्भव है। अभी एमपीआरआरडीसी द्वारा खुरसुड़ की ओर से खारा तक उस्काल नदी और अन्य नालों ब्रिज तैयार हुए है।
 ग्रामीणों में विकास की उम्मीद जागी 17 जून को खुरसुड़ निवासी श्री चंद ने अपनी बैलगाड़ी पहली बार पूल से निकालते हुए कहा कि मैं हमारी बैलगाड़ी बिना मुसीबत से निकल पाएगी। कई बार नदी के पानी मे बैल उतरते नही थे और पहिये पत्थरों व रेत में फंस जाते थे। फुलकन बाई का कहना है कि अब गांव की बेटियों आसानी से ब्याही जा सकेगी। कई रिश्ते सुव्यवस्थितपहुँच मार्ग नही होने से नही हो पाते थे। अब यह धारणा बदलने लगी है। वन समिति अध्यक्ष श्री प्रह्लाद को भी वन ग्राम में विकास की नई उम्मीद दिखाई देने लगी है।

Wednesday, June 4, 2025

नक्सली गांवों में मोबाइल है मगर नेटवर्क नहीं

रमेश कुमार ‘रिपु’ अब बालाघाट अति नक्सल प्रभावित सूची से हट गया है। मगर नक्सली क्षेत्र में विकास की गति धीमी है। जिला मुख्यालय से 90 किलोमीटर दूर जनपद पंचायत बिरसा के ग्राम पंचायत डबरी में मोबइल नेटवर्क के लिए कर्मचारी भटकते रहते हैं। आनलाइन हाजिरी के लिए दूर पहाड़ी में जाती है आंगनबाड़ी की महिलाएं। नेटवर्क नहीं होने से सभी तरह के सरकारी काम ठप रहते हैं। आनलाइन हाजिरी मुश्किल हुआ ग्राम पंचायत के करीब पांच ग्राम की दो हजार से अधिक आबादी शासन की आनलाइन मिलने वाली योजनाओं के लिए संघर्षरत हैं। आंगनबाड़ी कार्यकर्ता आनलाइन हाजिरी के लिए ताला खोलने से पहले नेटवर्क के लिए पहाड़ी पर जाती है। स्कूल के शिक्षक, छात्रावास और स्वास्थ्य केन्द्र के अमले ने आनलाइन कार्य के लिए नेटवर्क वाले क्षेत्र में जाने की आपस में ड्यूटी बांट रखी है। पोस्ट आफिस का बैंकिग कार्य कार्यालय से दूर जंगल व पहाड़ी के पास जहां नेटवर्क मिलता है वहीं पर चलता है। नेटवर्क के लिए तरसते ग्रामीण ग्राम पंचायत के ग्राम लाटरी में बड़ी संख्या में गांव से दूर एक पेड़ के नीचे ग्रामीण नजर आए। रोजगार सहायक सुखचंद कुर्सी पर लैपटाप खोलकर बैठा था। जिसे ग्रामीणों ने घेर रखा था। कुछ ग्रामीण खड़े थे तो कुछ बैठे थे। हर कोई यही पूछता था ग्रामीण रोजगार सहायक से कि क्या नेटवर्क आया। वह ना कहता तो सब मायूस हो जाते। आनलाइन कार्य पर परेशानी ग्राम पंचायत सरपंच चुन्नीलाल उइके सचिव छतर सिंह मरावी रोजगार सहायत व ग्रामीणों ने एक साथ बताया कि समग्र केवाईसी, पेंशन आवेदन, संबल योजना, मनरेगा योजना अंतर्गत निर्माण कार्यों का जीओटेक। वर्क रजिस्ट्रेशन, डिमांड डालना, मस्टररोल जेनरेट करना। मजदूरों की आनलाइन हाजिरी, मस्टर रोल फील करने आदि कार्य के लिए एकत्र हुए हैं। उनका कहना है कि जब भी कोई आनलाइन कार्य होता है तो हमलोगों की परेशानी बढ़ जाती है। नेटवर्क ढूंढते कर्मचारी सचिव का कहना हंै कि जनपद पंचायत स्तर से आनलाइन कार्य का लक्ष्य व समय तय किया गया है। यदि समय पर कार्य नहीं किए गए तो वेतन काटने सहित अन्य कार्रवाई होगी। उधर जनपद पंचायत बिरसा का कहना है कि जहां नेटवर्क मिलता है वहीं से कार्य करना है। इनका कहना हैं ग्राम पंचायत में मोबाइल नेटवर्क एक बड़ी समस्या है। इसको लेकर कई बार कलेक्टर से मिलकर शिकायत की गई है। बीते दिवस एक बैठक में भी इस बात को मजबूती से रखा गयाए लेकिन अभी तक इस समस्या का समाधान नहीं हो पाया है। चुन्नीलाल उइके, सरपंच ग्राम पंचायत डाबरी बीएसएनएल के उच्चस्तरीय अधिकारियों से बात चल रही है। नेटवर्क लगाने का कार्य जिले में शुरू हो गया है। जल्द ही ग्राम पंचायत डाबरी में भी बीएसएनएल का नेटवर्क काम करेगा। मृणाल मीना, कलेक्टर बालाघाट

Sunday, May 25, 2025

पूरी बीजेपी ने देश की सेना का अपमान किया-पटेल

रमेश कुमार‘रिपु’ कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व मंत्री कमलेश्वर पटेल ने कहा कि डाॅ मोहन यादव सरकार के मंत्री विजय शाह ही नहीं,पूरी बीजेपी देश की सेना का अपमान की है। विजय शाह ने कर्नल सोफिया कुरैशी के लिए जिस शब्द का इस्तेमाल किया है,कायदे से पीएम मोदी को उसे तत्काल बर्खास्त कर देना चाहिए था। डिप्टी सी.एम.जगदीश देवगोड़ा ने भी सेना का अपमान किया है। हाईकोर्ट यदि विजय शाह के मामले पर संज्ञान न लिया होता तो विजय शाह को बीजेपी तो माफ करी चुकी थी। बीजेपी के मंत्री बताएं कांग्रेस नेता ने कहा कि प्रधान मंत्री और गृहमंत्री बताएं कि पहलगाम कांड के आतंकी अभी तक क्यों नहीं पकड़े गए? एक महीना होने को है। देश को बताएं वहां सुरक्षा के बंदोबस्त क्यों नहीं किये गए। सिक्योरिटी सिस्टम क्यों हटाया। देश को विदेश मंत्री यह बताएं कि पाकिस्तान पर हमला करने से पहले उसे क्यों बताया कि हम हमला करने जा रहे हैं। इससे यही लगता है कि देश के प्रधान मंत्री,गृहमंत्री और रक्षा मंत्री और विदेश मंत्री की एक सुनियोजित साजिश थी पाकिस्तान पर हमला करने की घटना। और अब आॅपरेशन सिंन्दूर के जरिये बिहार चुनाव में वोट मांगेंगे। यह उनका सियासी हथकंडा है। बालाकोट हमले को भी उन्होंने चुनाव में भुनाया। देश को गुमराह कर रहे सड़क छाप संवाद बोलकर प्रधान मंत्री देश को बरगला रहे हैं। कभी उनका 56इंच का सीना हो जाता है और कभी उनकी रगो में खून नहीं,गर्म सिन्दूर बहने लगता है। केवल बातों से देश को गुमराह करने की राजनीति मोदी ही नहीं पूरी बीजेपी करती आ रही है। जुमले बाजी से देश नहीं चलता। कुछ करना होता है। झूठ की राजनीति से जनता को आखिर कब तक अंधेरे में रखेंगे। तिरंगा का राजनीतिकरण किया एक सवाल के जवाब में पूर्व मंत्री कमलेश्वर ने कहा कांग्रेस जबलपुर से सेना के सम्मान जय हिंद यात्रा निकालने जा रही है। इस यात्रा में कांग्रेस नेत्री प्रियंका गांधी रहेंगी।बीजेपी की तरह तिरंगा यात्रा कांग्रेस नहीं निकालती। तिरंगा का हम सम्मान करते हैं। लेकिन बीजेपी तिरंगा यात्रा के जरिये सेना के शौर्य का सम्मान करने की बजाए, उसका राजनीतिकरण कर रही है। जगह- जगह बीजेपी सेना के शौर्य की तस्वीर की बजाए फौजी वेश में प्रधान मंत्री के पोस्टर लगा रही है। शहीदों के पोस्टर लगाती तो लगता वाकई में बीजेपी सेना का सम्मान कर रही है। प्रधान मंत्री चुप क्यों हैं उन्होने कहा कि कायदे से प्रधान मंत्री को अब विजय शाह को गिरफ्तार कर उन्हें जेल में डालने का आदेश देना चाहिए। प्रदेश के मुख्यमंत्री भी प्रदेश की जनता को गुमराह कर रहे हैं। अब मामला कोर्ट में है,इसलिए न्यायालय का जैसा आदेश होगा,वैसा करेंगे। कोर्ट ने विजय के खिलाफ मामला दर्ज कर कार्रवाई का आदेश दिया था। जनता को बताएं कि उन्हें क्यों गिरफ्तार नहंी किया गया। डिप्टी सीएम जगदीश देगौड़ा के खिलाफ भी कार्रवाई होनी चाहिए। उन्होंने पूरी सेना को प्रधानमंत्री चरणों में नतमस्तक है कहा। क्या यह सेना का अपमान नहीं है? प्रधान मंत्री की चुप हैं,जाहिर सी बात है सेना के अपमान में उनकी मौन स्वीकृति है।

Tuesday, November 26, 2024

अब हिन्दुस्तान में मोदिस्तान,कांग्रेस का अवसान

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रमेश कुमार ‘रिपु’ महाराष्ट्र की राजनीति में उद्धव ठाकरे की राजनीति पर्दे के पीछे चली गयी। ठाकरे वाद खत्म होने के कगार पर पहुंच गया। इस चुनाव में बीजेपी केा मिली सीट बताती है कि यदि वो और सीटों पर चुनाव लड़ती तो खुद अपनी पार्टी की सरकार बना लेेती। किसी की जरूरत उसे नहीं पड़ती। नरेन्द्र मोदी के प्रति जुनून तारी है। उनके पैतरे के आगे सारे चित होते जा रहे हैं। नरेन्द्र मोदी के रथ को रोकने की हिम्मत अब किसी में नहीं है। अटल की बीजेपी अब मोदी की बीजेपी है। जो कहते थे 2024 के परिणाम से कि अब मोदी युग खत्म होने के कगार पर है। हरियाणा,महाराष्ट्र,झारखंड चुनाव मोदी की अग्नि परीक्षा है। सच तो यह है कि हिन्दुस्तान में अब मोदिस्तान है। कांग्रेस अवसान पर है। देश के लोगों केा लगता है मोदी ही हर समस्या का हल हैं। महाराष्ट्र में कांग्रेस का पंजा गिर गया। यह होना था। क्यों कि उसे चुनाव लड़ना नहीं आता। मोदी साल भर चुनाव लड़ते हैं। और कांग्रेस चुनाव के वक्त चुनाव की तैयारी करती है। हरियाणा,झारखंड और महाराष्ट्र के चुनाव परिणाम बता रहे हैं राहुल राजनीति में अर्द्ध विराम हो गए हैं। प्रियंका गांधी वायनाड से राहुल गांधी से अधिक मतों से चुनाव जीती हैं। आगे चलकर वो राहुल के सियासी मार्ग में बाधक बन सकती हैं। जिस गति से कांगे्रस के हाथ से राज्य निकलते जा रहे हैं,आने वाले समय में कांग्रेस एक सियासी इतिहास बन कर रह जाएगी। एक थी कांग्रेस। कटेंगे-बंटेगे नारा का भी असर रहा छत्तीसगढ़ माॅडल हरियाणा में दिखा। हरियाणा माॅडल महाराष्ट्र में दिखा। झारखंड में चूंकि डबल इंजन की सरकार नहीं है। इसलिए वहां हरियाणा माॅडल नहीं दिखा। इन तीन राज्यों में चुनाव में एक बात कामन रही। लाड़ली बहना योजना। महाराष्ट्र में साढ़े तीन करोड़ महिलाओं को लाड़ली बहना योजना के तहत राशि दी जा रही है। महाराष्ट्र चुनाव के परिणाम से संजय राउत,पवन खेड़ा आदि नेता संतुष्ट नहंीं है। संजय राउत का यह कहना कि शिंदे के उम्ममीदवार इतनी संख्या में कैसे जीत सकते हैं। यह परिणाम जनता का हो ही नहीं सकता। यह ईवीएम और सरकार का है। हरियाणा में जनता बीजेपी के लोगों को गांवों घुसने नहीं दे रही थी। फिर भी वहां बीजेपी तीसरी बार सरकार बना ली। हरियाणा की तरह महाराष्ट्र में कई सारी ईवीएम मशीन की बैटरी 99 फीसदी चार्ज बताया। यदि वोट पड़ें हैं तो बैटरी फुल कैसे हो सकती है। जाहिर सी बात है कि कहीं न कहीं कुछ तो गड़बड़ है। महाराष्ट्र में असली शिवसेना और असली एनसीपी कौन है इस चुनाव ने बता दिया। महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के दौरान ही बंटेंगे तो कटेंगे नारा खूब चर्चा में रहा। यूपी के सीएम योगी ने इस नारे को महाराष्ट्र विधानसभा में चुनाव प्रचार के दौरान खूब इस्तेमाल किया। ऐसा माना गया कि यह नारा हिंदू समुदाय की अलग अलग जातियों को एक करने के लिए था। तो बीजेपी अकेले सरकार बना लेती महाराष्ट्र की राजनीति में उद्धव ठाकरे की राजनीति पर्दे के पीछे चली गयी। ठाकरे वाद खत्म होने के कगार पर पहुंच गया। इस चुनाव में बीजेपी केा मिली सीट बताती है कि यदि वो और सीटों पर चुनाव लड़ती तो खुद अपनी पार्टी की सरकार बना लेेती। किसी की जरूरत उसे नहीं पड़ती। कांग्रेस 101 सीट पर चुनाव लड़ी उसे 16 सीट मिली। उद्धव ठाकरे की शिवसेना 95 सीट पर और जीती 20 सीट। शरद पवार कल तक महाराष्ट्र की राजनीति के बहुत बड़े उलट फेर वाले नेता माने जाते थे, उनकी पार्टी दस सीट पर सिमट गयी।बीजेपी 148 सीट पर चुनाव लड़ी 132 सीट पाई। एकनाथ शिंदे की शिवसेना 81 सीट पर चुनाव लड़ी और 57 सीट पाई। अजीत पवार की एनसीपी 69 सीट पर चुनाव लड़ी और 41 सीट पाई। देवेंद्र फडणवीस ने चुनाव से पहले कहा कि वो मैं आधुनिक अभिमन्यू हॅूं हर चक्रव्यूह भेदना जानता हॅूं। जाहिर सी बात है महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री यही बनेंगे। कांग्रेस के लिए महाराष्ट्र की हार किसी बड़े झटके से कम नहीं है।क्योंकि अभी हाल ही में उसे हरियाणा विधानसभा चुनाव में शिकस्त का सामना करना पड़ा था।झारखंड में चुनाव के दौरान बीजेपी ने कथित बांग्लादेशी घुसपैठियों का मुद्दा मजबूती से उठाया। लेकिन सफलता नहीं मिली। नायडू-नीतीश सोचेंगे नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू के भरोसे भले केंद्र में मोदी सरकार चल रही है। लेकिन लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा को मिल रही लगातार जीत से समीकरण बदलेगा। ऐसे में नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू मोदी सरकार से अब बहुत तोलमोल करने से पहले दस बार सोचेंगे। महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में भी भाजपा ने मोदी की लोकप्रियता और नीतियों के अधार पर ही चुनाव लड़ा। ऐसे में महाराष्ट्र में बीजेपी की जीत को मोदी की जीत बताया जा रहा है। ऐसे में भाजपा के अंदर अब मोदी का रुतबा और मजबूत होगा। क्योंकि लोकसभा चुनाव के बाद मोदी की लोकप्रियता पर सवाल खड़े होने लगे थे। उद्धव ठाकरे को भारी पड़ा यह माना जा रहा है कि शिवसेना के मूल विचारों से कटना ही उद्धव ठाकरे को भारी पड़ा और अपने गढ़ मुंबई ठाणे और कोंकण में भी वह एकनाथ शिंदे से बुरी तरह पिछड़ गए। दूसरी ओर शरद पवार की पार्टी के नेता भी अजीत पवार पर पार्टी का नाम और चुनाव चिन्ह हथियाने का आरोप लगाते रहे। लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी को इन आरोपों का फायदा भी मिला। लेकिन विधानसभा चुनाव में उन्हें भी मुंह की खानी पड़ी है। अणुशक्ति नगर विधानसभा से स्वरा भास्कर के पति फहद अहमद चुनावी मैदान में हैं। उन्हें एनसीपी शरद पवार ने टिकट दिया था फहाद अहमद का मुकाबला एनसीपी अजित पवारद्ध की प्रत्याशी और नवाब मलिक की बेटी सना मलिक से था। नतीजों में अपने पति के हार के बाद स्वारा ने ईवीएम पर सवाल उठाते हुए चुनाव आयोग से जवाब मांगा। EVM 99 फीसदी कैसे चार्ज स्वरा भास्कर ने ट्वीट करके कहा है कि पूरा दिन वोट होने के बावजूद म्टड मशीन 99 फीसदी कैसे चार्ज हो सकती है।इलेक्शन कमीशन जवाब दे। अणुशक्ति नगर विधानसभा में जैसे ही 99फीसदी चार्ज मशीने खुली उसके बीजेपी समर्थित एनसीपी को वोट मिलने लगे। आखिरी कैसे? स्वरा भास्कर के इस पोस्ट के बाद विपक्ष के अन्य नेता भी ऐसे सवाल चुनाव आयोग से पूछ सकते हैं। बहरहाल चुनाव परिणाम आ गया है आरोप प्रत्यारोप की सियासत चलती रहेगी। लेकिन लोकसभा के बाद विधान सभा चुनाव ने बता दिया कि सियासत का सिंकदर कौन है। फिर भी अच्छे दिन अभी नहीं आए हैं,और उन्हें लाना चाहिए।

भगवा छतरी झारखंड में इन वजहों से नहीं तनी

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‘‘झारखड को बीजेपी हाईकमान समझ नहीं पाया। वो घुसपैठिये का मुद्दा पूरे चुनाव में उछालते रहे। जनता इस ओर ध्यान ही नहीं दी। वहीं बीजेपी का चुनावी मैनेजमेंट बहुत कमजोर रहा। टिकट वितरण में बागियों को नहीं समझा सके। आदिवासी वोटरों को लुभाने में बीजेपी पिछड़ गयी। राज्य में लाड़ली बहना योजना ने इंडिया गंठबंधन को छह लाख अधिक वोट दिलाया। हरियाणा फंडा झारखंड में काम नहीं आया।’’ रमेश कुमार ‘रिपु’ महाराष्ट्र में महायुति रिकार्ड मतों से जीती मगर झारखड में बीजेपी सारे दांव अपना कर भी नहीं जीत सकी। ऐसा कौन सी वजह रही है जिस वजह से भगवा छतरी नहीं तनी। बीजेपी का केंद्रीय नेतृत्व को हैरान है कि राज्य में आक्रामक चुनाव प्रचार अभियान के बाद भी आखिर पार्टी की इतनी करारी हार कैसे हो गयी। 81 सीटों वाले झारखंड में एनडीए को 22 जबकि इंडिया गठबंधन ने 56 सीटें मिली। जबकि अंत तक यही माना जा रहा था कि चुनावी लड़ाई में बीजेपी का पलड़ा भारी है। जमीनी मुद्दों को समझ नहीं पाए झारखंड में बीजेपी का सह प्रभारी बनने के बाद हिमंता बिस्वा सरमा ने झारखंड के संथाल परगना इलाके में कथित रूप से बांग्लादेशी घुसपैठ की बात को जोर शोर से उठाया। अन्य बीजेपी नेताओं ने लव और लैंड जिहाद की बात की। यह दावा किया कि झारखंड के आदिवासी इलाकों में बांग्लादेशी घुसपैठिये आ रहे हैं। यहां की आदिवासी महिलाओं से शादी कर उनकी संपत्ति हड़प रहे हैं। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी चुनावी सभाओं में घुसपैठ के मुद्दे को उठाया था। लेकिन यहां के वोटर इसे मुद्दा ही नहीं माना। और नाराज होकर इंडिया गंठबंधन को वोट कर दिया। बीजेपी की रणनीति ध्वस्त बीजेपी ने चुनाव प्रचार के दौरान आदिवासियों की रोटी, माटी,बेटी की हिफाजत को सबसे बड़ा मुद्दा बनाया। बाकी मुद्दों को बीजेपी ने पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। चुनाव नतीजों से पता चलता है कि संथाल परगना इलाके में बीजेपी की यह रणनीति पूरी तरह ध्वस्त हो गयी। बीजेपी खाता भी नहीं खोल पाई। हालांकि उत्तरी छोटा नागपुर इलाके में पार्टी को थोड़ा सा फायदा हुआ। यहां 25 में से 14 सीटें बीजेपी और उसके सहयोगी दलों को मिलीं। घुसपैठिये तक सिमटी बीजेपी इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि झारखंड के चुनाव में बीजेपी के पास कई मुद्दे थे। जिन्हें वह उठा सकती थी। जैसे बेरोजगारी, नौकरियों की कमी, हेमंत सोरेन के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप, सोरेन सरकार के मंत्री आलमगीर आलम से धन की बरामदगी, भर्ती परीक्षाओं के दौरान उम्मीदवारों की मौत। लेकिन वह जनता से जुड़े मुद्दों को हाशिये पर रख कर सारा ध्यान घुसपैठ पर ही केंद्रित किया। जयराम ने नुकसान पहुंचाया महतो समुदाय के उभरते हुए नेता जयराम महतो ने कई विधानसभा सीटों पर बीजेपी और एनडीए को नुकसान पहुंचाया। महतो की पार्टी झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा को कम से कम 11 सीटों सिल्ली, बोकारो, गोमिया, गिरिडीह, टुंडी, इचागढ़, तमार,चक्रधरपुर, चंदनकियारी, कांके और खरसावां पर मिले वोट पर हार जीत के अंतर ज्यादा हैं। सिर्फ एक सीट डुमरी में इसने झामुमो को नुकसान पहुंचाया। डुमरी सीट से जयराम महतो चुनाव जीते हैं।जयराम महतो के राजनीति में आने की वजह से सबसे ज्यादा नुकसान बीजेपी की सहयोगी पार्टी आल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन (आजसू) को हुआ है। आजसू को इस चुनाव में सिर्फ एक सीट पर जीत मिली। जबकि 2019 में उसने दो सीटें जीती थी। चुनाव में आजसू के प्रमुख सुदेश महतो खुद भी सिल्ली विधानसभा सीट से चुनाव हार गए। मैय्या सम्मान योजना झारखंड में मैय्या सम्मान योजना बीजेपी के हार की सबसे बड़ी वजह थी। छह लाख वोट महिलाओं के ज्यादा पड़े पुरुषों की तुलना में। चुनाव में 91.16 लाख महिलाओं ने जबकि 85.64 पुरुषों ने वोट डाला। इस लिहाज से महिलाओं ने करीब 6 लाख वोट ज्यादा डाले। इस योजना के तहत 21 से 49 साल की महिलाओं को हर महीने 1000 रुपए दिए जाते हैं। झामुमो ने मैय्या सम्मान योजना का चेहरा हेमंत सोरेन की पत्नी कल्पना मुर्मू सोरेन को बनाया। कल्पना ने इस योजना को झारखंड की महिलाओं के बीच में पहुंचाने के लिए पूरे राज्य में लगातार बैठकें और सभाएं की। आरक्षित सीटों पर बीजेपी हारी वैसे बीजेपी आदिवासियों के हक की बातें करती है। लेकिन झारखंड चुनाव में परिणाम बताते हैं कि आदिवासी उससे छिटक गया। झारखंड की विधानसभा में 28 सीटें जबकि लोकसभा की 5 सीटें आरक्षित हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी लोकसभा में आरक्षित पांच सीटों में एक भी नहीं जीती थी। 28 आरक्षित विधानसभा सीटों में से बीजेपी सिर्फ एक सीट पर जीत पाई है। इससे ऐसा लगता है कि आरक्षित सीटों पर बीजेपी को बहुत काम करना है। आदिवासी बीजेपी से दूर झारखंड में फिर से हेमंत सोरेन की सरकार बनने से एक बात साफ है कि आदिवासी समुदाय बीजेपी के साथ नहीं जुड़ पाया। जबकि लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद बीजेपी ने बड़े पैमाने पर आदिवासियों तक पहुंचने की कोशिश की थी। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी भी आदिवासी समुदाय से ही आते हैं। बीजेपी ने आदिवासियों के भगवान कहे जाने वाले बिरसा मुंडा की जयंती को जनजातीय गौरव दिवस के रूप में मनाने का ऐलान किया। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बिरसा मुंडा के जन्म स्थान खूंटी में स्थित उलिहातू पहुंचे थे। झारखंड के आदिवासी वोटर केा अपनी तरफ बीजेपी को करना चाहती है तो यहां उसे और काम करना पड़ेगा। विधानसभा चुनाव में बीजेपी के कई बड़े आदिवासी नेताओं की पत्नियों को चुनाव में हार का सामना करना पड़ा। पूर्व मुख्यमंत्री तथा पूर्व केंद्रीय मंत्री अर्जुन मुंडा की पत्नी मीरा मुंडा, पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा की पत्नी गीता कोड़ा भी चुनाव हार गईं। पूर्व मुख्यमंत्री चंपई सोरेन के बेटे बाबूलाल सोरेन बीजेपी के टिकट पर चुनाव हार गए। इलेक्शन मैनेजमेंट ठीक नहीं हरियाणा चुनाव और महाराष्ट्र चुनाव की तरह बीजेपी का इलेक्शन मैनेजमेंट झारखंड में वैसा नहीं था। इस वजह से बीजेपी वोटरों तक अपना पैठ नहीं बना पाई। इसके अलावा टिकट वितरण को लेकर भी नाराजगी रही। सात विधानसभा सीटों पर पार्टी ने गलत टिकट बांटे। कुछ सीटों पर बीजेपी बागियों से निपटने में भी फेल रही। योगी आदित्यनाथ का कटेंगे तो बंटेगे नारे की खूब चर्चा हुई, लेकिन हिन्दू वोटों को झारखंड में नहीं जोड़ पाई। जिससे बीजेपी यहां हरियाणा और महाराष्ट्र जैसा कामयाब नहीं हो सकी।

Friday, October 18, 2024

जमीन वक्फ की,कब्जा कांग्रेसियों का

रमेश कुमार ‘रिपु’ यूपीए सरकार ने वक्फ बोर्ड को हड़प बोर्ड बना दिया। इसका फायदा कांग्रेसियों ने खूब उठाया। वक्फ की जमीनों पर कब्जा कर घर बना लिए। बाद में पार्टी बदल कर बीजेपी में चले गए। मोदी सरकार ने वक्फ संशोधन बिल संसद में पेश किया तो पता चला कि वक्फ के पास रेल्वे से भी ज्यादा जमीन है। वक्फ संशोधन बिल संसद में पेश करने के बाद पता चला कि वक्फ के पास रेल्वे से भी ज्यादा जमीन है। अल्पसंख्यक कल्याण मंत्रालय ने सन् 2022 में बताया था वक्फ बोर्ड के पास 865644 अचल संपत्तियां हैं। लगभग 9.4 लाख एकड़ वक्फ की जमीनों की अनुमानित कीमत 1.2 लाख करोड़ है। लेकिन देखा जाए तो वक्फ की ज्यादातर जमीनों पर कांग्रेसियों का कब्जा है। इसके अलावा बीजेपी के विधायक और मंत्री भी अपना घर बना रखे हैं। वक्फ की जमीन में अस्पताल और स्कूल बनने चाहिए लेकिन काम्पलेक्स और दुकानें बनी हुई है। हर जिले के वक्फ के अध्यक्ष वक्फ की जमीन पर बने दुकानों से कमाई कर रहे हैं। पूर्व विधान सभा अध्यक्ष का घर वक्फ की जमीनों का मामला हमेशा विवादित रहा है। इस समय 58 हजार से ज्यादा वक्फ की जमीनों के मालिकाना हक से जुड़ी याचिकाएं लंबित हैं। करीब साढे बाहर हजार मामले अलग अलग प्रदेशों में लंबित हैं। वहीं 18 हजार से ज्यादा मामले ट्रिव्यूनल में पेंडिग है। और करीब 165 मामले सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में लबित है। संभागीय मुख्यालय रीवा में अमहिया की जमीन का भी मामला लंबित है। इस मोहल्ले के 131 लोगों को नोटिस दी गयी थी। कई लोग जमानत पर हैं। मध्यप्रदेश के पूर्व विधान सभा अध्यक्ष श्रीनिवास तिवारी का घर भी वक्फ की जमीन पर है। यहां के कई विधायक और नेताओं के भी घर बने हुए हैं।रीवा में 70 एकड़ जमीन वक्फ की है। लेकिन 60 एकड़ जमीन पर राजनीतिक और ओहदेदारों का कब्जा है। भोपाल के आरिफ अकील ने वक्फ की जमीन पर आरिफ नगर बसाया। सिद्धार्थ फंस गए पूर्व विधान सभा अध्यक्ष श्रीनिवास तिवारी के पोते सिद्धार्थ तिवारी जो कि त्योंथर से बीजेपी के विधायक हैं। उन्होंने अमहिया मार्ग के किनारे हाजी बाबा सैय्यद जहूर अली की मजार को सरकारी जमीन पर होने की बात कहकर मुस्लिम समाज को स्वास्थ्य मंत्री राजेन्द्र शुक्ला के खिलाफ करने बयान दिया। इसे उन्होंने लैंड जेहाद कहा। लेकिन दरगाह के लोगों ने जिला प्रशासन के समक्ष कागजात पेश कर दिया कि यह पट्टे की जमीन पर मजार बना है। जो रास्ता छोड़ा गया है वो भी पट्टे की जमीन है। सिद्धार्थ का सांसद जनार्दन मिश्रा से 36 का सियासी रिश्ता होने के चलते उन्होंने डिप्टी सीएम को घेरने की कोशिश की। लेकिन मामला उल्टा पड़ गया है। अब जिला वक्फ कह रहा है, सिद्धार्थ जिसमें रह रहे हैं वो जमीन वक्फ की है। खाली करें। क्यों नये बिल की जरूरत नए बिल की जरूरत इसलिए पढ़ गयी है कि 1954 में सरकार ने जो जमीन वक्फ को दी थी वही उसकी जमीन है। लेकिन देखा गया है कि आज की तारीख में वक्फ ने जबरिया सरकारी जमीनों पर कब्जा कर उसे अपना बना लिया है। यही वजह है कि उसके पास रेल्वे से भी ज्यादा जमीनें हैं। जिन जमीनों पर दावा वो कर रहा है उसके कागजात उसके पास होना चाहिए,लेकिन हैं नहीं। यह बात मोदी सरकार जानती है। यही वजह है कि वो कांग्रेस के शासन में वक्फ को मिले अधिकार को संकुचित करने नया बिल संसद में पेश किया है।यह जरूरी भी है। वक्फ किसी की भी जमीन पर अपना दावा ठोक कर उसे अपना बताता आया है। वक्फ के मामले की सुनवाई भी इतनी आसान नहीं है। वक्फ पर सरकार चाहती है नियंत्रण मोदी सरकार वक्फ बोर्ड के काननू में चालीस तरह के बदलाव करना चाहती है। यदि कानून पास हो गया तो वक्फ बोर्ड में दो अन्य जाति के लोग भी रहेंगे। और यही मुस्लिम समुदाय नहीं चाहता। सेक्शन 9 और 14 में बदलाव कर महिलाओं को महिलाओं को भी जगह दी जाएगी। सरकार वक्फ बोर्ड की संपत्तियों पर अपना नियंत्रण चाहती है। भविष्य में वक्फ की संपत्तियों का आडिट कैग के जरिये होगा। राज्य और केंद्र सरकार वक्फ संपत्तियों में दखल नहीं दे सकती हैं, लेकिन कानून में बदलाव के बाद वक्फ बोर्ड को अपनी संपत्ति जिला मजिस्ट्रेट के दफ्तर में रजिस्टर्ड करानी होगी। ताकि संपत्ति के मालिकाना हक की जांच हो सके।नए बिल के पास होने पर वक्फ की संपत्तियों और उसके राजस्व की जांच जिला मजिस्ट्रेट कर सकेंगे। नए बिल से फायदा यह होगा कि वक्फ ट्रिव्यूनल के फैसले को हाई कोर्ट मे चुनौती दिया जा सकेगा। जब तक कोई जमीन दान में नहीं देगा तब तक वह संपत्ती वक्फ की नहीं होगी भले उस पर मस्जिद ही क्यों न हो। नये बिल का विरोध क्यों मुस्लिम सम्प्रदाय वक्फ के नए बिल का विरोध कर रहे हैं। उसकी वजह यह बताते हैं कि वक्फ की संपत्ति अल्लाह के नाम की संपत्ति है। ऐसे में मोदी सरकार वक्फ के कानून में बदलाव करके वक्फ बोर्ड की स्वतंत्रता और स्वायत्ता छीनना चाहती है। जो कि उचित नहीं है। लेकिन ज्यादातर लोगों का कहना है कि वक्फ के कानून में बदलाव होना चाहिए। इसलिए कि मुस्लिम बाहर से आए हैं। ऐसे में मंदिर से ज्यादा जमीनें उनके पास गलत तरीके से हो गयी है। देखा जाए तो देश में सन् 2009 के बाद वक्फ की संपत्तियों में भारी इजाफा हुआ है। वक्फ बोर्ड के पास 865644 अचल संपत्तियां हैं। लगभग 9.4 लाख एकड़ वक्फ की जमीनों की अनुमानित कीमत 1.2 लाख करोड़ है। छत्तीसगढ़ में अवैध कब्जा छत्तीसगढ़ में वक्फ बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष सलमान रिजवी कहते हैं वक्फ की 90 फीसदी जमीनों पर अवैध तरीके से लोग कब्जा कर रखे हैं। इनकी संपत्तियों पर अवैध कब्जे की विस्तृत जांच होनी चाहिए। ज्यादातर संपत्तियों पर कांग्रेस नेताओं का कब्जा है। छत्तीसगढ़ में वक्फ बोर्ड अवैध तरीके से जमीनों पर कब्जा करके 5000 करोड़ रुपए संपत्ति जुटा ली है। उसके पास दस हजार करोड़ से ज्यादा की संपत्ती है। कांग्रेस की यूपीए सरकार ने वक्फ के मूल अधिनियम में संशोधन लाकर वक्फ बोर्डों को अधिक व्यापक अधिकार प्रदान किए गए थे। इसी वजह से वक्फ बोर्ड बहुत अधिक शक्तिशाली हो गया। उसके अधिकारों पर अंकुश जरूरी है। बहरहाल वक्फ बोर्ड हड़प बोर्ड बन गया है।

लारेंस का आर्डर,कर दिया मर्डर... खतरा टला नहीं

एनसीपी नेता बाबा सिद्दीकी की हत्या ने पूरी मुंबई पुलिस को हिला दी है। लारेंस का आर्डर केवल बाबा सिद्दीकी की हत्या का ही नहीं था बल्कि उनके बेटे जीशान की भी हत्या करने का था। पुलिस इस हत्याकांड के बाद सलमान की सुरक्षा बढ़ा दी है लेकिन यह माना जा रहा है कि मुबई में डी कंपनी के बाद नया डाॅन लारेंस विश्वनोई बन गया है। जो जेल के अंदर से अपने गुर्गो के जरिए लोगों का मरवा रहा है। एक फोन आ जाने की वजह से बाबा सिद्दीकी का बेटा जीशान की जान बच गयी। लेकिन खतरा टल गया है,ऐसा नहीं कहा जा सकता है। जीशान बांद्रा से ही कांग्रेस विधायक हैं। उनके विधानसभा क्षेत्र में री डेवलपमेंट को लेकर विवाद चल रहा था। इस री डेवलपमेंट के तहत झुग्गियों को तोड़कर वहां रह रहे लोगों को हटाया जाना था। इसके विरोध में जीशान ने अनशन भी किया था। इस हत्या को लेकर पुलिस ने अभी तक कोई खुलासा नहीं कर पाई है। लेकिन सोशल मीडिया की पेास्ट से यह अनुमान लगाया जा रहा है कि री डेवलपमेंट के विरोध को लेकर बाबा सिद्दीकी को धमकी दी गई थी। चूंकि बाबा सिद्दीकी हमेशा से ही सलमान के मददगार रहे हैं। ऐसे में हो सकता है कि लारेंस ने अपने गैंग को बाबा सिद्दीकी और जीशान दोनों के मर्डर की जिम्मेदारी दी गई हो। सलमान से दोस्ती तो खैर नहीं लारेंस गैंग का दावा है कि वे सलमान खान से कोई युद्ध नहीं चाहते थे लेकिन बाबा सिद्दिकी की हत्या की वजह उनके दाऊद इब्राहीम और अनुज थापन के साथ संबंध था। बाबा सिद्दीकी का कथित शराफत का चोला पहन कर लोगों को गुमराह करते आए हैं। उनका बीते समय में दाऊद इब्रहिम के साथ मकोका एक्ट में शामिल होने का भी गवाह है। बिश्नोई गैंग का दावा है कि जो कोई भी सलमान खान और दाऊद के गिरोह की मदद करेगा उसे इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी। गैंग की ओर से चेतावनी दी गई है कि अगर कोई उनके भाई को नुकसान पहुंचाएगा तो उसकी खैर नहीं है। बाबा से मांगा बीस करोड़ शिवकुमार गौतम जो कि बहराइच का रहने वाला है।धर्मराज कश्यप भी यही का है। और गुरमैल सिंह. हरियाणा के कौथल का रहने वाला है।तीनों आरोपियों की पहचान हो गयी है। धर्मराज और गुरमैल की गिरफ्तारी हो चुकी है। वहीं शिवा फरार है। बाबा सिद्दीकी मर्डर केस को पुलिस अन्य एंगल से भी तहकीकात कर रही है। कहीं लारेंस मुंबई मंे डी कंपनी की तरह अपना दबदबा कायम करने के लिए तीनों लड़कों को सामने तो नहीं किया। और इस मर्डर में क्या वाकय में लारेंस विश्वनोई के गुर्गो का हाथ है या फिर डी कंपनी का हाथ है। सूत्रों का कहना है कि कुछ दिनों पहले बाबा सिद्दकी को फोन आया था उनसे बीस करोड़ रुपए मांग गए थे। मांगने वाला अपने आप को डी कंपनी का आदमी बता रहा था। सबसे बड़ा डाॅन लारेंस सबसे बड़ा डाॅन बनने की फिराक में है। पुलिस की मानें तो लारेंस विश्नोई अपने जुर्म का साम्राज्य भारत के 11 राज्य और 6 देशों तक फैला लिया है। हर राज्य की जिम्मेदारी अलग-अलग लोग संभालते हैं। कनाडा, पंजाब दिल्ली की कमान गोल्डी बराड़ के पास है। राजस्थान मध्यप्रदेश की कमान रोहित गोदारा के पास है। वहीं पुर्तगाल अमेरिका दिल्लीएनसीआर महाराष्ट्र बिहार पश्विम बंगाल की कमान अनमोल विश्नोई के पास है। हरियाणा उत्तराखंड की कमान काला जठेड़ी के पास है। पूरे गैंग की रिपोर्ट सीधे साबरमती जेल में बंद लारेंस विश्नोई को दी जाती है। बिश्नोई के गैंग में सात सौ शूटर पुलिस की अपनी कहानी है। उसका दावा है कि बिश्नोई गैंग में 700 से ज्यादा शूटर हैं। जिसमें 300 पंजाब के युवा हैं। गौरतलब है कि एक समय लारेंस बिश्नोई का गैंग सिर्फ पंजाब तक सीमित था। धीरे धीरे उसके साथ अपराधिक और बेरेाजगार युवा उससे जुड़ते गए। उसके अपराध का तंत्र फैलने के बाद उसके सम्मोहन में खुद बखुद युवा जुड़ते गए।