Sunday, October 24, 2021

आदिवासियों पर नजरे इनायत

           




  
बरसों से उपक्षित आदिवासी इस समय राजनीति के केन्द्र में है। इसलिए कि विधान सभा की 47 और लोकसभा की 6 सीटें आरक्षित हैं। केन्द्र सरकार आदिवासियों को रिझाने दो सौ करोड़ रुपए से जनजातीय नायकों की स्मृतियांँ संजोने संग्राहलय बनायेगी। कांग्रेस आदिवासियों में अपना जनाधार बचाने के लिए जूझ रही है, तो भाजपा उसे झपटने के लिए जाल बुन रही है।
0 रमेश कुमार ‘रिपु’
            जबलपुर में 18 सितम्बर को केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने ऐलान किया कि केन्द्र सरकार ने आदिवासी नेताओं के सम्मान में देश भर में 200 करोड़ रुपए की लागत से नौ संग्राहलय बनवायेगी,जिनमें एक मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा में होगा। यह संग्रहालय शंकर और रघुनाथ शाह पर केन्द्रित होगा। प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष वी.डी.शर्मा कहते हंैं,हमारी सरकार आदिवासियों के उत्थान के लिए प्रतिबद्ध है। उन्हें समाज की मुख्यधारा में लाना चाहते हैं। हमारी सरकार आदिवासियों के नायकों के इतिहास से सबको परिचति कराने के लिए संग्राहलय बनाने कदम उठाया है।’’ 
केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह अपनी इस घोंषिणा के जरिए मध्यप्रदेश ही नहीं, देश भर के आदिवासियों को रिझाना चाहते हैं। क्यों कि मध्यप्रदेश में करीब दो करोड़ जनजातीय आबादी है। यानी राज्य की कुल आबादी में इनकी हिस्सेदारी करीबन 21 फीसदी है। राजनीतिक नजरिये से देखें तो प्रदेश की 230 विधान सीटों में से 47 सीटें अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए आरक्षित है। वहीं लोकसभा की 29 सीटों में छह सीट अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित है।
दरअसल 2013 के चुनाव में बीजेपी को 47 सीट में 30 सीटें मिली थीा। और उसकी सरकार बनी थी। लेकिन 2018 के चुनाव में कांग्रेस ने अनुसूचित जनजाति के लोगों को विश्वास दिलाया, कि उनका हित सिर्फ कांग्रेस सरकार में ही है। और कांग्रेस को 47 में 30 सीटें मिलने से बाजी पलट गई। कांग्रेस की सरकार बन गई। यह अलग बात है कि कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया की सियासी लड़ाई में कांग्रेस की सरकार धड़ाम हो गई। शिवराज सिंह पुनः मुख्यमंत्री बन गए। भविष्य की राजनीति को ध्यान में रखकर  राष्ट्रीय नेतृत्व ने आदिवासियों को साधने के लिए घोंषणा की,ताकि आदिवासी वोटर छिटकें नहीं,और बीजेपी को मिलने वाली सीटों का नुकसान न हो।
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान ने एस.टी वोटरों को रिझाने की दिशा में राज्य में पेसा पंचायत अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार कानून 1996  लागू करने की घोषणा की। राज्य के आदिवासी बहुल 89 विकासखंडों के करीब 24 लाख परिवार जहाँं उचित मूल्य की दुकानें नहीं हैं,उन्हें साप्ताहिक हाटों से राशन उपलब्ध कराया जायेगा। स्थानीय लोगों से गाड़ियाँं 26000 रुपये प्रति माह की दर पर किराये पर ली जाएंगी। साथ ही छिंदवाड़ा विश्वविद्यालय का नाम राजा शंकरशाह के नाम पर रखा जाएगा। बिरसा मुंडा जयंती को जनजातीय गौरव दिवस के रूप में मनाया जायेगा। यह घोंषणा पार्टी के नफे नुकसान को ध्यान मे ंरखकर किया गया है।  
प्रदेश में एस.टी की तीन सीटों पर हो रहे उपचुनाव के मद्देनजर ऐसे मुद्दे अधिक मायने रखते हैं। सरकार आदिवासियों को लुभाने ऐसी घोंषणा की है। वहीं मुख्यमंत्री शिवराज सिह चैहान ने अनुसूचित क्षेत्रों में ग्रामसभाओं को अधिक स्वायतता देने के लिए एक नई पहल की है। अब आदिवासी गैर लकड़ी वन उपज से आय का एक प्रतिशत अपने पास रख सकेंगे साथ ही छोटे मोटे विवाद का निपटारा खुद ही कर सकेंगे। अनुसूचित क्षेत्रों तक पंचायत का विस्तार सरकार करना चाहती है। गत फरवरी में राज्य सरकार ने राज्य के आदिवासी संस्थान,आदिम जाति कल्याण विभाग,पंचायत एंव ग्रामीण कल्याण विभाग और वन विभाग के सदस्यों की एक कमेटी गठित की है। ये सभी अनुसूचित क्षेत्र में रहने वालों के हितों का ध्यान रखेंगे।
पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ कहते हैं, शिवराज सिंह चैहान घोंषणा करने में माहिर हैं। अपने 16 साल के कार्यकाल में 16 हजार से भी अधिक घोंषणाएं कर चुके हैं। जमीन पर उनकी घोंषणाएं दिखती नहीं। प्रदेश की जनता को घोंषणा नहीं काम चाहिए। आदिवासियों का हित हो हम भी चाहते हैं,लेकिन मुझे नहीं लगता कि उनकी यह घोंषणा भी पूरी हो सकेगी।’’
सूत्रों का कहना है,राज्य की नौकरशाही मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान की इस घोंषणा के पक्ष में नहीं है। क्यों कि राज्य के खजाने पर सीधे बोझ पड़ेगा। राज्य मंें करीब 12000- 15000 करोड़ रुपए की गैर लकड़ी वनोपज होती है। गैर लकड़ी वनोपज में तेंदूपत्ता भी शामिल है। यदि इसे ग्राम सभा के हवाले कर दिया जायेगा तो सरकार को सीधे भारी राजस्व घाटा होगा। फिर सियासी सरंक्षण देना भी कठिन हो जाएगा। हर बरस सरकार वेतन और बोनस देती है,वो कहां से लाएगी। इस दिशा में कुछ भी नहीं सोचा गया है।   
गौरतलब है कि मध्यप्रदेश में पेसा कानून का पालन पूरी तरह नहीं किया जाता है। भूमि अधिग्रहण,जल निकायों से संबंधित प्रबंधन लागू हैं। लेकिन वन विभाग के कानून की वजह से टकराव होने पर पेसा कानून कमजोर पड़ जाता है। यानी मध्यप्रदेश में पेसा कानून को अधिक मजबूत बनाने के नियम बनाने हैं। ताकि पेसा कानून की खिलाफत करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जा सके। पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिह राहुल कहते हैं,‘‘प्रदेश में बीजेपी की सरकार 15 सालों तक रही फिर भी पेसा कानून लागू क्यों नहीं हुआ,जनता को बताना चाहिए। केवल घोंषणाओं से कुछ नहीं होता।’’
दरअसल 2018 के विधान सभा चुनाव में आदिवासी क्षेत्रों में बीजेपी का जनाधार खिसक गया था। आदिवासी क्षेत्रों में जनाधार वापस पाने के लिए बीजेपी का आदिवासियों के प्रति मोह जाग गया है। जय आदिवासी युवा शक्ति (जेएवाइएस) और पुनरूत्थान वादी गोंडवाना गणतंत्र पार्टी(जीजीपी) जैसी आदिवासी इकाइयांें की वजह से बीजेपी को डर है कि वह अपनी राजनीतिक जमीन खो देगी। क्यों कि जेएवाइएस पश्चिमी मध्यप्रदेश में एक शक्तिशाली राजनीतिक पार्टी के रूप में अपनी जमीन तैयार की है। बीजेपी की नजर पूर्वी मध्यप्रदेश और महाकौशल में अपनी आदिवासी राजनीतिक जमीन को वापस पाना चाहती है। बीजेपी की नजर में जेएवाइएस कांग्रेस की टीम है। जेएवाइएस के सदस्य डाॅ हीरालाल अलावा ने कांग्रेस की टिकट पर 2018 के चुनाव में धार जिले के मनावर सीट जीते थे। वहीं कांग्रेस जीजीपी को बीजेपी की बी टीम मानती है।
जय आदिवासी युवा शक्ति संगठन के नेता हीरालाल अलावा ने कहा,वोटों का खिसकना 15 साल के बीजेपी के लंबे शासन के खिलाफ आदिवासी मतदाताओं के गुस्से को दिखाता है। जिसने आदिवासियों को सिर्फ वोटों के लिए दबाया और शोषण किया। इस सरकार ने व्यापारियों को उनकी वन भूमि बेच दी।  
गौरतलब है कि 15-20 साल पहले की तुलना में आदिवासी मतदाता अब अपने अधिकारों को लेकर अधिक जागरूक हैं। गोंडवाना गणतंत्र पार्टी का गठन 16 साल पहले आदिवासियों को उनकी पहचान दिलाने किया गया था। ये पार्टी गोंड मतदाताओं के बीच काफी प्रभावशाली है। पिछले विधानसभा चुनावों में मालवा क्षेत्र में भील आदिवासी नेतृत्व का उदय हुआ। जय आदिवासी युवा शक्ति जेएवाईएस का गठन हुआ। जीजीपी और जेएवाईएस के अस्तित्व में आने से पहले पारंपरिक पार्टियाँ मौजूद थीं। हाल के वर्षों में आदिवासी लोगों ने नीतिगत मतदान के विपरीत सामान्य तौर पर सामूहिक रूप से मतदान किया।
मध्य प्रदेश की कुल 29 संसदीय सीटों में से आदिवासी समूह शहडोल,मंडला, धार,रतलाम, खरगोन और बेतूल सहित कम से कम छह सीटों पर बेहद प्रभाव डालते हैं, जो अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित हैं। इन सीटों के अलावा वे कई अन्य सीटों जैसे, बालाघाट, छिंदवाड़ा और खंडवा जैसी सीटों पर भी परिणामों को प्रभावित कर सकते हैं। जीजीपी के अमन सिंह पोर्ते कहते हैं,लोग दिन प्रति दिन जागरुक होते जा रहे हैं। यह महत्वपूर्ण है कि हमारा आंदोलन रंग ला रहा है।’’
बहरहाल पिछले कुछ माह से कांग्रेस प्रदेश में आदिवासियों पर हो रहे हमलों का मुद्दा उठाती रही है। नीमच में एक आदिवासी को आठ लोगों ने मिलकर मारा, फिर गाड़ी में बांधकर उसे खींचा। जिससे उसकी मौत हो गई। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के मुताबिक आदिवासियों के खिलाफ अत्याचारों में 25 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। 2020 में 2401 मामले दर्ज हुए, जबकि 2019 में 1922 मामले दर्ज हुए। सच यह है कि राजनीतिक दलों को आदिवासियों के कल्याण और हितों की चिंता है,तो चुनावी नफा-नुकसान को नजर अंदाज करके आगे आना चाहिए।
 

 

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