सवाल यह है कि क्या बीजेपी आदिवासियों की शुभ चिंतक हैं या फिर शिवराज आदिवासियों को सिर्फ खुश करने वाली भाषा का इस्तेमाल करते हैं। क्यों कि उनके राज्य में आदिवासियों और दलितों पर होने वाले अपराध कम होने की बजाय बढ़ते जा रहे हैं। आज प्रदेश का आदिवासी सियासी हेंगर में टंगा हुआ है।
0 रमेश कुमार ‘‘रिपु’’
मध्यप्रदेश में रैगावं विधान सभा चुनाव हारने के बाद बीजेपी को यह बात समझ में आ गई कि पंचायत चुनाव जीतना है तो आदिवासी और दलित वोट बैंक पर ध्यान देना जरूरी है। आदिवासियों को लुभाने वह बीरसा मुडा जंयती को प्रदेश में अवकाश घोंषित कर दिया। सवाल यह है कि क्या बीजेपी आदिवासियों की शुभ चिंतक हैं या फिर शिवराज आदिवासियों को सिर्फ खुश करने वाली भाषा का इस्तेमाल करते हैं। क्यों कि उनके राज्य में आदिवासियों और दलितों पर होने वाले अपराध कम होने की बजाय बढ़ते जा रहे हैं। आज प्रदेश का आदिवासी सियासी हेंगर में टंगा हुआ है।
पिछले कुछ माह से कांग्रेस प्रदेश में आदिवासियों पर हो रहे हमलों का मुद्दा उठाती रही है। नीमच में एक आदिवासी को आठ लोगों ने मिलकर मारा, फिर गाड़ी में बांधकर उसे खींचा। जिससे उसकी मौत हो गई। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के मुताबिक आदिवासियों के खिलाफ अत्याचारों में 25 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। 2020 में 2401 मामले दर्ज हुए, जबकि 2019 में 1922 मामले दर्ज हुए।
अमितशाह का ट्रंप कार्ड
केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने आदिवासियों को रिझाने जबलपुर में 18 सितम्बर को ऐलान किया कि केन्द्र सरकार ने आदिवासी नेताओं के सम्मान में देश भर में 200 करोड़ रुपए की लागत से नौ संग्राहलय बनवायेगी,जिनमें एक मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा में होगा। यह संग्रहालय शंकर और रघुनाथ शाह पर केन्द्रित होगा। प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष वी.डी.शर्मा कहते हंैं,हमारी सरकार आदिवासियों के उत्थान के लिए प्रतिबद्ध है। उन्हें समाज की मुख्यधारा में लाना चाहते हैं। हमारी सरकार आदिवासियों के नायकों के इतिहास से सबको परिचति कराने के लिए संग्राहलय बनाने कदम उठाया है।’’
प्रदेश में दो करोड़ जनजातीय
केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह अपनी इस घोंषिणा के जरिए मध्यप्रदेश ही नहीं, देश भर के आदिवासियों को रिझाना चाहते हैं। क्यों कि मध्यप्रदेश में करीब दो करोड़ जनजातीय आबादी है। यानी राज्य की कुल आबादी में इनकी हिस्सेदारी करीबन 21 फीसदी है। राजनीतिक नजरिये से देखें तो प्रदेश की 230 विधान सीटों में से 47 सीटें अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए आरक्षित है। वहीं लोकसभा की 29 सीटों में छह सीट अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित है।
सीटों का गणित समझें
दरअसल 2013 के चुनाव में बीजेपी को 47 सीट में 30 सीटें मिली थीा। और उसकी सरकार बनी थी। लेकिन 2018 के चुनाव में कांग्रेस ने अनुसूचित जनजाति के लोगों को विश्वास दिलाया, कि उनका हित सिर्फ कांग्रेस सरकार में ही है। और कांग्रेस को 47 में 30 सीटें मिलने से बाजी पलट गई। कांग्रेस की सरकार बन गई। यह अलग बात है कि कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया की सियासी लड़ाई में कांग्रेस की सरकार धड़ाम हो गई। शिवराज सिंह पुनः मुख्यमंत्री बन गए।
शिवराज सिंह ने अब तक 16 हजार घोंषणा कर चुके हैं। जमीन पर सब नदारद हैं। उन्हों ने कहा,आदिवासी गैर लकड़ी वन उपज से आय का एक प्रतिशत अपने पास रख सकेंगे साथ ही छोटे मोटे विवाद का निपटारा खुद ही कर सकेंगे। अनुसूचित क्षेत्रों तक पंचायत का विस्तार सरकार करना चाहती है।
नौकरशाही नाराज
राज्य की नौकरशाही मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान की इस घोंषणा के पक्ष में नहीं है। क्यों कि राज्य के खजाने पर सीधे बोझ पड़ेगा। राज्य मंें करीब 12000- 15000 करोड़ रुपए की गैर लकड़ी वनोपज होती है। गैर लकड़ी वनोपज में तेंदूपत्ता भी शामिल है। यदि इसे ग्राम सभा के हवाले कर दिया जायेगा तो सरकार को सीधे भारी राजस्व घाटा होगा। फिर सियासी सरंक्षण देना भी कठिन हो जाएगा। हर बरस सरकार वेतन और बोनस देती है,वो कहां से लाएगी। इस दिशा में कुछ भी नहीं सोचा गया है।
बहरहाल राजनीतिक दलों को आदिवासियों के कल्याण और हितों की चिंता नहीं है,वो केवल चुनावी नफा-नुकसान को देखकर बाते करते हैं। जैसा विधायक संजय पाठक कहते हैं घोषणाओं और योजनाओ से वोट नहीं मिलते। आदिवासी अब समझदार हो गये हैं।
Thursday, November 25, 2021
सियासी हेंगर में टंगे आदिवासी
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