केन्द्र
की राजनीति में 2014 के बाद से गठबंधन का दौर खत्म हो गया। मगर राज्यों
में यह सिलसिला कायम है। भाजपा प्रदेश में जिस पार्टी से गठबंधन किया आगे
चलकर उसे गटक गई। यही वजह है कि कई राज्यों में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बन
गई है।
देश
में भाजपा ने साल 2014 से केन्द्र में गठबंधन की सरकार का दौर खत्म कर
दिया। जबकि राज्यों में गठबंधन की सरकारें अब भी हैं। जिस पार्टी से भाजपा
ने गठबंधन किया आगे चलकर उसे गटक गई। दीगर पार्टियांँ गठबंधन सरकार बनाने
के लिए करती आई हैं,लेकिन बीजेपी ने अपनी सियासी जमीन के विस्तार के लिए
सियासी दोस्त बनाये। वो चाहे उत्तर प्रदेश में मायावती हों या फिर
महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे। दोनों जगह आज बीजेपी बड़ी पार्टी है।
सियासी
इतिहास के मुताबिक गठबंधन की पहली सरकार केन्द्र में (1977-79) जनता
पार्टी थी। इसमें कई घटक दल थे। आगे चलकर इनका विलय हो गया और एक नई
पार्टी बनी। 1989 में कई पार्टियों को मिलाकर जनता दल बना। सीटों को लेकर
बीजेपी और लेफ्ट से समझौता हुआ। सरकार बनने पर वी.पी सिंह प्रधान मंत्री
बने। यानी गठबंधन वाली सरकार का चलन 1989 से शुरू हुआ। सन् 1989 से 1999 के
बीच आठ सरकारें बनीं। यह वह समय था, जब कांग्रेस की कमजोरी का फायदा छोटी
पार्टियों ने उठाया सरकार बनाने में। नब्बे के दशक से गठबंधन वाली सरकारें
बनती रही। 1989, 1990, 1996, 1997, 1998, 1999 और 2004 से 2009 के बीच कई
पार्टियों ने गठबंधन सरकारें बनाईं।
साल
2014 में एक नई राजनीति का उदय हुआ। मोदी के नेतृत्व में बीजेपी को 282
सीटें मिली। भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) ने 336 सीटें
पाई। नरेंद्र मोदी ने 26 मई 2014 को प्रधान मंत्री की शपथ ली,तब बीजेपी और
उसके गठबंधन दल की केवल सात प्रदेशों में ही सत्ता थी। आज परिस्थियां बदल
गई है। अनके राज्यों में बीजेपी की सरकार है। देखा जाये तो बीजेपी ने जिन
पार्टियों से सरकार बनाने के लिए गठबंधन किया,आगे चलकर उन्ही पार्टियों को
लील गई। राज्य में ऐसी पार्टियांँ हाशिये पर पहुंँच गई । गठबंधन के महत्व
को बीजेपी ने समझा और उसे पार्टी के विस्तार में सीढ़ी की तरह इस्तेमाल
किया।
सत्ता में आने के
बाद भाजपा अपने लिए दो काल्पनिक सियासी दुश्मन गढ़ा। एक था वामपंथ,जो अब
ढूंढो तो जानें की स्थिति में है। दूसरा कांग्रेस मुक्त भारत। 2014 के बाद
बीजेपी को जो कांग्रेस मिली,वो ठीक से विपक्ष भी नहीं है। आम चुनाव के बाद
से 2014 तक में कांग्रेस 60 चुनाव हारी। यह सिलसिला थम नहीं रहा है। बात
करते हैं बीजेपी ने गठबंधन करके किन पार्टियों को गर्त में पहुंँचाया।
उत्तर
प्रदेश में बीजेपी ने बीएसपी सुप्रीमो मायावती को तीन बार मुख्यमंत्री
बनाया। 1995 की सरकार में बीजेपी शामिल नहीं हुई। बाद में दो बार शामिल
हुई। तब बीजेपी को काफी सुनने को मिला था। बीजेपी की ओर से मैसेज गया कि
हमने दलित को मुख्यमंत्री बनाया। इससे बीजेपी को लाभ हुआ। उसने बीएसपी के
वोट बैंक में जगह बनाई। आज बीएसपी यूपी में हाशिये पर है।और बीजेपी लगातार
दो बार से सरकार में है।
राजस्थान
में जनता पार्टी के नेता नाथुराम मिर्घा थे। बाद में सीटों का समझौता जद
से हुआ। बीजेपी को राजपूत और अन्य जातियों का वोट मिलता था। बाद में
भैरोसिंह शेखावत ने प्रत्येक जाट परिवार से एक सदस्य बीजेपी के लिए मांगा।
धीरे-धीरे बीजेपी को राजस्थान में खड़ा कियां। उन्ही की वजह से आज राजस्थान
मे बीजेपी दमखम से खड़ी है। कई बार सरकार भी बनी। यहांँ वैसे कभी भी एक
पार्टी की सरकार दोबारा नहीं बनती।
बीजेपी
हर हाल में दक्षिण भारत की राजनीति में अपना दखल चाहती थी। इसलिए कर्नाटक
में जेडीएस से गठबंधन करके 2008 में सरकार बनाई। उस समय तक जेडीएस बीजेपी
से बड़ी पार्टी हुआ करती थी। साल 2018 के चुनाव में 224 सीटों वाली कर्नाटक
विधान सभा में बीजेपी को 104 सीटें मिली। लेकिन जेडीएस-कांग्रेस ने गठबंधन
करके 120 सीटों के साथ सरकार बना ली। मगर 2019 में खेला हो गया।
जेडीएस-कांग्रेस गठबंधन वाली सरकार के 16 विधायक बीजेपी के संपर्क में आ
गये। चौदह माह पुरानी जेडीएस-कांग्रेस सरकार गिर गई। आज बीजेपी की सरकार
है। मध्यप्रदेश में भी यही हुआ। साल 2022 में कांग्रेस नेता ज्योतिरादित्य
सिंधिया ने कांग्रेस छोड़ दी और 22 विधायकों ने विधानसभा से इस्तीफा दे
दिया। जिससे कमलनाथ सरकार गिर गई। अब यहांँ बीजेपी की सरकार है।
गोवा
में बीजेपी खड़ी होने के लिए महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी के साथ गठबंधन
किया। बीजेपी व्यवस्थित तरीके से अपने पंख फैलाये। जिससे साल 2017 के चुनाव
में बीजेपी को 13 सीटें मिली,एमजीपी,जीएफपी और दो निर्दलीय विधायकों के
सहारे सरकार बना ली थी। साल 2022 के चुनाव में बीजेपी की सीट बढ़कर 20 हो
गई। बहुमत से एक सीट दूर रहने पर वह 3 निर्दलीय और महाराष्ट्रवादी
गोमांतक(एमजीपी) के 2 विधायकों के समर्थन से सरकार बना ली। यहां अब गोमांतक
जूनियर पार्टी है।
हरियाणा
में बीजेपी कभी तीसरे नम्बर की पार्टी थी। यहाँ राजनीति जाट और गैर.जाट के
बीच बंटी हुई है। कांग्रेस से अलग होकर हरियाणा विकास पार्टी के सुप्रीमों
चैधरी बंसी लाल से बीजेपी ने हाथ मिला कर सरकार बनाई। फिर धीरे-धीरे उसने
बंसी लाल के अलावा इंडियन लोक दल,गैर जाट, गैर पंजाबी पार्टी,हरियाणा जनहित
पार्टी में सुनियोजित तरीके से अपनी पकड़ मजबूत की। बीजेपी ने 2014 में भजन
लाल के बेटे कुलदीप बिश्नोई को मुख्यमंत्री बनाने के अपने वादे से मुकर
गई। बिश्नोई ने हड़बड़ी में बीजेपी से गठबंधन तोड़ दिया। साल 2019 के चुनाव
में 90 सदस्यीय विधान सभा में बीजेपी के 40 और जननायक जनता पार्टी(जजपा) के
10 और अन्य सहयोगियों के दम पर बीजेपी सरकार में है और 31 सदस्यों वाली
कांग्रेस विपक्षी पार्टी है।
2014
के आम चुनाव में बीजेपी ने जब नरेंद्र मोदी को चुनाव प्रचार कमेटी का
प्रमुख बनाया तो जेडीयू ने भाजपा के साथ 17 साल पुराने गठबंधन को खत्म कर
लिया। 2014 के लोकसभा में मिली असफलता के बाद जेडीयू और आरजेडी ने कांग्रेस
के साथ मिलकर 2015 में बिहार विधानसभा चुनाव लड़ा। सरकार भी बना ली। लेकिन
26 जुलाई 2017 को नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा दे कर बीस
महीने पुराने महागठबंधन से पार्टी को अलग कर लिया। अगले ही दिन उन्होंने
बीजेपी के सहयोग से बिहार में सरकार बना ली। बिहार में लालू यादव और नीतीश
कुमार के बीच टूटी दोस्ती का फायदा बीजेपी ने उठाया। साल 2020 के विधानसभा
चुनाव में जेडीयू से 30 सीटें अधिक जीतने के बावजूद बीजेपी ने नीतीश कुमार
को मुख्यमंत्री बने रहने दिया।
असम
में भगवा राजनीति के फैलाव के लिए बीजेपी ने असमगढ़ परिषद पार्टी (एजीपी)
से गठबंधन किया। यहां दो बार सरकार बनाई। आज बीजेपी पर निर्भर है एजीपी।
जम्मू कश्मीर में पीडीपी के साथ मिलकर बीजेपी ने सरकार बनाई तो उसकी बड़ी
किरकिरी हुई। इसलिए कि महबूबा मुफ्ती अलगाववाद की राजनीति करती हैं। लेकिन
बीजेपी ने अपना जनाधार बढ़ाने समझौता किया। पीडीपी के प्रभावशाली नेता
पार्टी को छोड़ कर चले गये। कांग्रेस का जनाधार खिसक गया है। पीडीपी का
प्रभाव भी सीमित हो गया है।
महाराष्ट्र
में बीजेपी से शिवसेना का 1989 से समझौता है। मगर 2014 में बात नहीं बनी।
बीजेपी 282 सीटों पर चुनाव लड़ कर 122 सीट जीती। 2019 में शिवसेना को 56 और
बीजेपी को 106 सीट मिली। यानी ठाकरे परिवार की पार्टी को बीजेपी निगल गई।
देर सबरे झारखंड में भी बदलाव हो सकता है। ओड़िसा,पश्चिम बंगाल,पंजाब और
तमिलनाडु में स्थानीय नेतृत्व में कमी के चलते गेरूआई राजनीति की पताका
नहीं फहरी। मगर सियासी प्रयास जारी है।




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