Wednesday, June 19, 2019

नक्सलियों नें बदल ली जिन्दगी

   
राजनांदगांव पीटीएस में तीन सैकड़ा जवानों के साथ ग्यारह ऐसे जवान भी प्रशिक्षण ले रहे हैं जो कभी नक्सली थे। आत्मसमर्पण के बाद इनकी जिन्दगी बदल गई है। देश और कानून की रक्षा के लिए अब ये माओवादियों के खिलाफ लड़ेंगे।





0 रमेश कुमार ‘‘रिपु‘‘
                      राजनांदगांव पुलिस प्रशिक्षण केन्द्र (पीटीएस) में 354 जवानों के साथ बस्तर संभाग से आए 11 ऐसे सिपाही भी हैं जो कभी नक्सली जीवन जीते थे। जिनके नाम से लोग डरते थे। अब वे नक्सली जीवन छोड़कर समाज की मुख्य धारा में शामिल हो गए हैं। लेकिन कोई भी जब सूनता है कि वे नक्सली थे,तो एक बार चैंक जाता है। इसलिए कि नक्सली अब पुलिस की वर्दी में हैं। अब वे बंदूक भी उठाएंगे तो माओवादियों के खिलाफ। जाहिर है कि उनकी जिन्दगी और सोच बदल गई है। कानून और समाज की रक्षा में उनकी भूमिका क्या है, सिपाही की वर्दी पहने के बाद महसूस करते हैं। पुलिस अफसरों को भरोसा है कि लंबे समय तक माओवादियों के साथ रहने की वजह से प्रदेश में जितने भी माओवादियों ने समर्पण कर सिपाही बनकर समाज की सेवा करना चाहते हंै, वे नक्सली अभियान में मददगार साबित हो सकते हैं। इसलिए कि उन्हें माओवादी कैसे और किस तरह की योजनाएं बनातें हैं,अपनी योजनाओं को किस तरह अंजाम देते हैं, उससे परिचित हैं। उनकी योजनाओं को मात देने इनकी मदद कारागार साबित हो सकती है।
पूर्व माओवादी अब वर्दी में                                     
प्रदेश में तीन पीटीएस केन्द्र है। सभी पीटीएस केन्द्रों में इस समय विभिन्न जिलों में आत्म समर्पण कर यहां आए माओवादी प्रशिक्षित किए जा रहे हैं। करीब आधा सैकड़ा नक्सली हैं जो माना,चंदखुरी और राजनांदगांव पीटीएस में प्रशिक्षण पा रहे है। रमन सरकार ने आत्मसमर्पण करने वाले उन सभी नक्सलियों को जो शिक्षित हैं और सिपाही बनना चाहते है,उन्हे भर्ती करने का आदेश दिया है। राजनांदगाव पुलिस प्रशिक्षण केन्द्र में जिला पुलिस बल के साथ माओवादी कानून की बारिकियों को तो समझ ही रहे हैं साथ ही, अन्य लोगों के साथ हर तरह का प्रशिक्षण भी ले रहे हैं। राजनांदगांव पुलिस प्रशिक्षण केन्द्र की ए. एस.पी मोनिका ठाकुर कहती हैं,सभी जिले से यहां पुलिस कर्मी प्रशिक्षण के लिए आए हैं। साथ में वे माओवादी भी हैं जो समाज की मुख्यधारा में शामिल होकर सरेंडर कर दिए हैं।   शिक्षित पूर्व माओवादियों कों शासन की ओर से सिपाही के पद पर भर्ती किया गया है। वे यहां अन्य सिपाहियों के साथ रहतेे हैं। प्रशिक्षण पूरा होने के बाद उन्हें उनके जिले में भेज दिया जाएगा। जिले के अधिकारी उनसे जैसी ड्यूटी चाहेंगे लेंगें‘‘।
एंबुश लगाने में माहिर
राजनांदगांव के पीटीएस ट्रेनिंग कैम्प में बस्तर के पूर्व 11 नक्सलियों को लड़ने को ट्रेनिंग दी जा रही है। ये नक्सली गोरिल्ला वार से लेकर एंबुश लगाए जाने की सभी तकनीक को अच्छी तरह जानते हैं। सभी नक्सली इनामी थे जो पुलिस के सामने सरेंडर करके भरोसा दिलाया है कि भविष्य में वे लाल गलियारा के खिलाफ बंदूक उठाएंगे। यह अलग बात है कि कभी सिपाही बने माओवादियों की अपने इलाके में दहशत थी लेकिन अब वे अपने टैंलेंट से पुलिस की मदद करेंगे। 
नक्सली इलाकों में होगी पोस्टिंग
पीटीएस में प्रशिक्षण ले रहे बस्तर के पूर्व 11 माओवादी जवानों की पोस्टिंग मार्च के बाद नक्सली इलाकों में होगी। इस ट्रेनिंग के बाद आने वाले समय में इन्हें दो महीने की जंगल में लड़ने की ट्रेंनिग भी दी जाएंगी। पीटीएस में सभी को नौ महीने की ट्रेनिंग दी जा रही है। नक्सल एक्टिवीज को बढ़ता देख अब ट्रेनिंग भी तेज हो गया है। बेसिक कोर्स के साथ ही फिटनेस और जंगल के हिसाब से रस्सा, बीम, ऑप्टिकल फ्रंट रोल के अलावा हथियारों की ट्रेनिंग दी जा रही है। इन जवानों को 10 की जगह 20 किलो मीटर की रनिंग कराई जा रही है। 50 डिप्स और पुशअप लगवाए जा रहे हैं। पीटीएस में 354 जवानों में 80 प्रतिशत बस्तर के हैं।
 नहीं लौटा तो भाई की कर दी हत्या
यहां ट्रेनिंग ले रहे तूर सिंह कांकेर के रहने वाले हैं। सरेंडर के बाद घर वापसी के लिए बार,बार नक्सलियों ने कई दबाव बनाया। बड़ा भाई फूलसिंह भी पुलिस में है। दो दिसंबर को ही नक्सलियों ने उनके छोटे भाई ढेलूराम धु्रव को मार डाला। पीटीएस के एस.पी बी.एल मनहर ने बताया कि नक्सल मूवमेंट बढ़ने की वजह से जवानों की ट्रेनिंग हार्ड कर दी गई है। मार्च में पास आउट के बाद इनकी पोस्टिंग बस्तर क्षेत्र में की जाएगी। पहले सें जंगल में रहने का अनुभव अब पुलिस के काम आएगा। सुकमा के रहने वाले 45 साल के सुभाष कोमरे गोरिल्ला वार के साथ निशाने बाजी में माहिर हैं। इन्हांेने बताया कि 1993 से 2014 तक डीवीसी मेंबर रहे। पांचवीं क्लास में थे तभी नक्सली साथ ले गए। उनकी पत्नी समबती भी नक्सली थीं। 2014 में कोमरे दंपति ने सरेंडर किया।
बदल गई सोच
सुकमा के एतरानपार के रहने वाले 30 साल के लोकेश कर्मा वर्ष 2001 से 2009 तक नक्सलियों के साथ रहे। वे एंबुश की प्लानिंग से लेकर सूचना जोड़ना, रैकी करना,भर्ती कराने का काम करते थे। अब यहां आने के बाद इनकी सोच बदल गई है। ट्रेनिंग से ये मजबूत हो रहे हैं।
नक्सली कमांडर को मारा
कांेडागंाव के अजय बधेल सन् 2006 से 2011 तक नक्सलियों के साथ रहे। पांच साल तक माओवादियों के साथ रहने और उनके विचार धाराओं से धीरे धीरे अजय का मोह भंग होने लगा। समाज की मुख्य धारा में शामिल होने का उन्होंने एक दिन इरादा बनाया और अपने आप को सरेंडर कर दिया। वे बताते है नवंबर 2013 में एक मुठभेड़ के दौरान उनके दोनों पैरों में गोली लग गई थी। फिर भी वे गोली चालाते रहे। उन्हें लगा कि जंगल में रहकर देश की रक्षा के लिए गोली चलाना ज्यादा अच्छा है और  अपने आप को सरेंडर के लिए मजबूत किया। किसी को बताया तक नहीं। उनमें शुरू से सिपाही बनकर समाज की सेवा करने की इच्छा थी। भाई की हत्या की वजह से गलत राह पर चले गए थे। सिपाही में भर्ती होने के बाद वे 2015 में एक मुठभेड़ में एलओएस कमांडर को मार गिराया। कमकानार मंगालूर क्षेत्र के 27 वर्षीय गोपाल गुड्डू डिवीजन एक्शन कमांडर था।
65 फीसदी नक्सलियों का सफाया  बाॅक्स में
गृह सचिव वी.वी.आर सुब्रम्हण्यम ने कहा कि, साल 2017 में 300 से ज्यादा नक्सलियों को आपरेशंस के दौरान मार गिराया गया। पिछले 2 सालों में 1476 नक्सल आपरेशंस चलाए गए। इसमें 1994 नक्सलियों की गिरफ्तारी हुई। वहीं 1458 नक्सलियों को मार गिराया गया। नक्सलियों पर कुल 4 करोड़ का इनाम था। वहीं 1280 किलो की आईईडी 263 स्थानों से बरामद की गई। 100 हैंड ग्रेनेड और 2319 डेटोनेटर भी बरामद किये गये। इस दौरान 102 जवान शहीद भी हुए। जवानों के 43 हथियार लूटे गए। साल 2017 में 1017 नक्सली गिरफ्तार हुए। जिनमें 79 नक्सलियों पर इनाम था। इनामी नक्सलियों पर 1 करोड़ 41 लाख का इनाम था। 2022 तक नक्सलवाद पूरी तरह से खत्म कर दिया जायेगा। अब सिर्फ बीजापुर और सुकमा में नक्सलियों की मौजूदगी है। केंद्र और राज्य सरकार के 70 से 75 हजार जवान नक्सलियों से लड़ रहे हैं। 4 नई बटालियन में 5 हजार जवान मार्च तक तैनात किए जाएंगे। बस्तर में 60 से 65 फीसदी नक्सली का सफाया हो गया है। नक्सल आपरेशन के लिए साल 2017 को याद किया जायेगा क्योंकि ऑपरेशन प्रहार के दौरान जवान ताड़मेटला जैसे नक्सलियों के गढ़ तक पहुंचे और आपरेशन को अंजाम दिया। गोलाराम और भोपालपट्टनम, नगरकोलम, जैसी कई ऐसी जगह थी, जहां जवानों ने पहली बार अपनी मौजूदगी दिखायी। डीजीपी ए एन उपाध्याय ने बताया कि आपरेशंस के साथ-साथ डेवलपमेंट के भी काफी काम हुुुए। बस्तर में पुलिस की देखरेख में 2 साल में 700 किलोमीटर की रोड बनी, जबकि 1300 किलोमीटर रोड बनने का काम जारी है। वहीं 75 नए थाने भी खोले गये।









No comments:

Post a Comment