Tuesday, June 16, 2020

नक्सलियों से यारी





 
सरकार विरोधी अर्बन नक्सलियों की माओवादियों से यारी पुरानी है। नक्सलियों के खौफ की दहशत से ठेकेदार और आम आदमी उनकी मदद करते आए हैं। माओवादियों को कारतूस बेचने वाले पुलिस कर्मी पहली बार पकड़े गए। ऐसी घटनाओं से साफ है कि छत्तीसगढ़ में नक्सल राज क्यों है?








0 रमेश तिवारी‘रिपु’’
                   शहरी नक्सली सरकार विरोधी हंैं या फिर देश विरोधी अथवा सरकार के खिलाफ लड़ने वाले माओवादियों के समर्थक हैं? सूबे में जब भी नक्सलियों के मददगार पकड़े गए, यह सवाल उठा है। युगवार्ता से मुख्यमंत्री भूपेश बघेल एक चर्चा में कहे थे,‘‘ प्रदेश में कारतूस और हथियार के कारखाने नहीं हैं। ऐसे में माओवादियों के पास ए. के. 47 और कारतूस कहां से आते हैं,नक्सलियों को हथियार और अन्य विस्फोटक सामग्री की सप्लाई कौन करता है। किस रास्ते से हथियार उन तक पहंुचता है। केन्द्र सरकार को पता करना चाहिए’’। मुख्यमंत्री को शायद इसका अंदाजा उस वक़्त नहीं था कि, शहरी नक्सल ही माओवादियों के मददगार हैं।
नक्सलियों का शहरी नेटवर्क 
सडक निर्माण कंपनी का ठेकेदार तापस पालिका बोलेरो में 24 मार्च की रात्रि में नक्सलियों को सामान पहुंचाने निकला। कांकेर पुलिस ने उसे सिकोड़ थानांतर्गत मरदा मार्ग पर पकड़ा। बोलेरो से दस नग मोबइल फोन,75 मीटर वर्दी कपड़ा 45 जोड़ी जूते, दो नग वाॅकी टाॅकी,दो सौ मीटर इलेक्ट्रिक वायर और अन्य रोजमर्रा के सामानों को जब्त किया। पूछताछ में नक्सली मददगारों में राजनांदगांव के ठेकेदार दयाशंकर मिश्रा का नाम सामने आया। इसके बाद राजनांदगांव निवासी अजय जैन व कोमल प्रसाद वर्मा, कोयलीबेड़ा निवासी रोहित नाग, मेरठ (यूपी) निवासी सुशील शर्मा और बालाघाट (एम.पी) निवासी सुरेश शरणागत तक पुलिस पहंुची।  
सूचना से खुला राज
बस्तर आईजी सुंदरराज पी. ने बताया की 4 जून को माओवादियों के लिए गोला बारूद एवं अन्य सामग्री के सप्लाई के सम्बंध में मुखबिर से सूचना मिलने पर धमतरी निवासी मनोज शर्मा व बालोद निवासी हरिशंकर गेडाम को सुकमा मलकानगिरी चैक से घेराबंदी कर पकड़ा गया। इनके कब्जे से 303 व एसएलआर हथियारों के 395 राउंड कारतूस मिला। दोनों के बताने पर दुर्गकोंदल के गणेश कुंजाम व आत्माराम नरेटी को गिरफ्तार किया गया। इनका संपर्क कांकेर के बड़े नक्सली लीडर दर्शन पेद्दा प्रतापपुर एरिया कमेटी सचिव से होने का खुलासा हुआ। इनके कब्जे से भी 70 राउंड आई.एन.एस.ए.एस. और 303 के मिले 303,एके 47,एस.एल.आर.,आई.एन.एस.ए.एस. के कुल 695 राउंड कारतूस बरामद हुए थे।
कैसे पकड़े गये पुलिस कर्मी
पुलिस की योजना के अनुसार मनोज शर्मा व हरीशंकर स्कॉर्पियो वाहन से सुकमा पहुंचे थे। थानेदार (एएसआई) आनंद जाटव बाइक से मलकानगिरी चैक पहुंचा। उसके पास कारतूस से भरा बैग था। मौके पर ही सबको पकड़ लिया गया। तीनों को पकड़े जाने के बाद पुलिस ने हेड कांस्टेबल सुभाष सिंह को भी इंदिरा कॉलोनी स्थित उसके घर से गिरफ्तार कर लिया। हेडकांस्टेबल की ड्यूटी शस्त्रागार में रहती थी। पकड़े गए हेड कांस्टेबल व ए.एस.आई. ने दो बार कारतूस बेचे जाने की बात कबूल की है। तीसरी बार वे पुलिस के हत्थे चढ़ गए। नक्सल ऑपरेशन में जाने वाले आरक्षक और सहायक आरक्षकों के कारतूस गायब कर नक्सलियों तक सप्लाई करते थे। ए. के. 47 के एक कारतूस नक्सलियों को पांच सौ रूपये में मिलते थे। सन् 2013 और 2018 में भी नक्सल ऑपरेशन से जुड़े आधा दर्जन से ज्यादा जवानों को नक्सलियों को कारतूस बेचने के मामले में पकड़ा गया था। अफसरों ने जवानों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई कर छोड़ दिया था।   
नक्सली मददगार गिरफ्तार
नक्सलियों के लिए सामान व रकम पहुंचाने वाले मामले में 12 आरोपी, ठेकेदार तापस पालिका 24 मार्च, मुंशी दयाशंकर मिश्रा 29 मार्च, अजय जैन कोमल प्रसाद वर्मा राजनांदगांव, रोहित नाग कोयलीबेड़ा, सुशील शर्मा उत्तर प्रदेश, सुरेश शरणागत मध्यप्रदेश 24 अप्रैल, टोनी उर्फ शीलेंद्र भदौरिया राजनांदगांव 5 मई, जनपद सदस्य राजेंद्र सलाम व मुकेश सलाम 6 मई को, अरूण ठाकुर 12 मई तथा मुख्य आरोपी निशांत जैन को 14 मई को पुलिस ने गिरफ्तार किया। पकड़े गए आरोपियों के नक्सली कमांडर सरिता राजुसलाम और नक्सली लीडर दर्शन पेद्दा जैसे कई नक्सलियों से संपर्क था।
करोड़ों का आसामी
काम की तलाश में 2001 को लैण्डमार्क इंजीनियर कंपनी बिलासपुर का मालिक निशांत जैन दिल्ली के गुडगांव से आया था। आज 6 सौ करोड़ का मालिक है। सन् 2018 से वह नक्सलियों से सांठगांठ करके संवेदनशील इलाके कोयलीबेड़ा, अंतागढ़, आमाबेड़ा, सिकसोड़, रावघाट, तोड़ोकी में प्रधान मंत्री सड़क के निर्माण का ठेका लेता था। सड़क निर्माण की आड़ में नक्सलियों की जरूरत के सामान पहंुचाते थे। इसीलिए लैंडमार्क इंजीनियरिंग कंपनी बिलासपुर तथा लैंडमार्क रायल इंजीनियर कंपनी राजनांदगांव के कामों में नक्सली न कभी बाधा उत्पन्न किए और न ही उनके वाहनों को जलाया। इन सभी कामों को दोनों भाइयों ने पेटी कांट्रेक्ट पर रूद्रांश अर्थ मूवर्स कंपनी के पार्टनर तापस पालित,अजय जैन व कोमल जैन को दिया था। इंजीनियरिंग कंपनी का मालिक बनने से निशांत जैन अपने एक रिश्तेदार की निर्माण कंपनी में मैनेजर था। नक्सली नेटवर्क की जांच कर रही एस.आइ.टी को 24 अप्रैल को राजनांदगांव निवासी अजय जैन को गिरफ्तार करने पर कुछ अहम दस्तावेज मिले थे। जांच में इस नेटवर्क का कनेक्शन लैंडमार्क इंजीनियरिंग कंपनी बिलासपुर से जुड़ा। निशांत जैन को एसआईटी की टीम ने बिलासपुर से गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में 14 मई को जेल भेज दिया। उसके दोनों मोबाइल से उसकी काॅल डिटेल पुलिस खगाल रही है। 
पूर्व सरपंच निकला मददगार
कोयलीबेड़ा इलाके में नक्सलियों के लिए ठेकेदारों से लेवी वसूलने और उनकी मदद करने वाला भाजपा मंडल का पूर्व महामंत्री अरुण ठाकुर को पुलिस ने 13 मई को गिरफ्तार किया। ठेकेदारों से मिले सामानों को अरूण नक्सलियों तक पहुंचाता था। अरूण कुमार शुरू से भाजपा व आर.एस.एस से जुड़ा था। वह इलाके के युवाओं को आरएसएस के प्रशिक्षण कैंप भेजता था,जिससे नक्सली उससे नाराज थे। बाद में वह, यह काम बंद कर दिया। 15 साल पहले कोयलीबेड़ा में वार्ड पंच के चुनाव में उपसरपंच चुना गया था। अरुण पिछले साल कोयलीबेड़ा भाजपा मंडल के महामंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था। कोयलीबड़ी इलाके में अरूण के दम पर ही नक्सलियों का शहरी नेटवर्क खड़ा हुआ। नक्सलियों के लिए ठेकेदारों से वसूली गई लेवी की रकम में से कुछ अरूण न दबा ली थी। नक्सलियों ने ऐसा करने पर उसके खिलाफ पर्चे बोंदानार इलाके फेकने लगे थे। बाद में नक्सलियों से माफी मांग कर उनका पैसा वापस करने का वायदा किया था। बाद में नक्सली उसे माफ कर अपने काम में लगा दिए थे। 2018 में अरुण कुमार ठेकेदार तापस पालित के साथ मिलकर कागबरस से गुड़ाबेड़ा सड़क के निर्माण में जुड़ गया। पुलिस को शक है कि अरुण अपने प्रिंटर, फोटो कॉपी मशीन व कम्युटर से कोयलीबेड़ा इलाके में नक्सलियों के पर्चे निकाल कर उसे फेंकवाता था। 
क्या है अर्बन नक्सलवाद
देश के सभी नक्सली संगठनों से जुड़ा यह एक ऐसा समूह है, जो शहरों में सक्रिय है। सरकार के अनुसार यह देश के लिए सबसे बड़ा आंतरिक खतरा है। नक्सलवाद अब गांवों या जंगलों तक सीमित नहीं रह गया है बल्कि, यह अब शहरों तक फैल चुका है। ये सरकारी सिस्टम में अपने लोगों को भेज कर सारा काम करते हैं,किसी को कानों कान खबर नहीं हो पाती। इनका मूल उदे्दश्य वही है जो माओवादियों के होते हैं। हिंसा के जरिए भारत के राज्यों पर कब्जा करना। ऐसे लोगों को भारत सरकार के कामों में बुराई ही बुराई दिखती है। ये हर वक्त सरकार की आलोचना करते हैं। अंडरग्रांउड काम करने वालों के लिए ये रक्षक कवच हैं। कहीं भी नक्सली कार्रवाई होती है,ये उसे दलित,किसान या आदिवासी का दमन बताकर जनमत तैयार करते हैं। इनकी बातें मीडिया,ब्यूरो क्रेसी,न्यायपालिका बड़ी प्रमुखता से सुनती है। माओवादी राष्ट्र को नहीं मानते। इसलिए उसे हमेशा खंडित करने का प्रयास करते हैं। माओवादी जानते हैं कि, लोकतंत्र के सारे सिस्टम शहरों में हैं। समाज को प्रभावित करने वाले नेता,सांसद,अफसर,प्रोफेसर और डाॅक्टर। नक्सली सिस्टम पर भरोसा नहीं करते। उसे उखाड़ फेकने के लिए अर्बन नक्सल उनके मददगार बन जाते हैं। सन् 2009 में पूर्व गृहमंत्री पी.चिंदम्बरम ने माओवादियों के खिलाफ ग्रीन हंट शुरू किया। जिससे माओवादियों को काफी नुकसान हुआ था। नक्सलियों ने अपनी रणनीति बदली और गुपचुप तरीके से शहरों में अपनी गतिविधियां बढ़ाई। समाज के असरदार लोग उनसे जुड़ गई। उनकी ंिहंसक गतिविधियों को वैध और सरकार की कार्रवाई को दमन विरोधी ठहराने की मुहिम शुरू कर दी। जो अब तक जारी है। दरअसल जब तक नक्सलियों की कोर लीडर शिप को खत्म नहीं किया जाएगा,अर्बन नक्सलियों पर नकेल लगाना मुश्किल है।

Tuesday, June 9, 2020

आगे है और कठिन डगर

   छत्तीसगढ़ सरकार आर्थिक आपातकाल के दौर से गुजर रही है। कोरोना को बढ़ने से रोकना,आम आदमी को आत्म निर्भर बनाने के साथ आर्थिक समस्या का समाधान ढूंढना जरूरी है। डाॅक्टर,नर्स और कर्मचारियों को वेतन देने की स्थिति में नहीं है भूपेश सरकार। ऊपर से अपनी तारीफ की सर्वे रिपोर्ट पेश करने से जनता हैरान है। 









0 रमेश तिवारी ‘‘रिपु’’
                  उम्मीदें खोकर लौटे मजदूर कभी नहीं सोचे थे कि छत्तीसगढ़ में दुर्दशा और दुश्वारी के ऐसे भी दिन देखने को मिलेंगे। धान के कटोरे में सुख नहीं, परेशानी और दुख भरे हैं। आम जिन्दगी के सामने सबसे बड़ी समस्या है, कैसे आत्म निर्भर बनें। वहीं व्यापारी लाचार है कि, कैसे व्यापार खड़ा करे। मजदूरों के पास रोजी रोटी के साथ, मजदूरी की विकट समस्या है। जो मजदूर लौट आए हैं, वो बाहर जाने का मन शायद ही बनाएं। प्रदेश कैसे फिर से खड़ा हो और समृद्धी के रास्ते पर चल पड़े, सरकार को इस दिशा में सोचना चाहिए। मगर सरकार अपनी पीठ थपथपाने के लिए आंकड़े बाजी में लगी है। आईएएनएस सी वोटर की सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक गैर भाजपा शासित राज्यों में, प्रदेश की जनता को संतुष्ट करने वाले मुख्यमंत्रियों में भूपेश बघेल दूसरे नम्बर पर हैं। यह रिपोर्ट चैकाती है। वन मंत्री मोहम्मद अकबर कहते हैं,‘‘धान का 25 सौ रूपए न्यूनतम समर्थन मूल्य,किसानों की कर्ज माफी,आदिवासियों की जमीन वापसी जैसे महत्वपूर्ण फैसलों ने मुख्यमंत्री को जनता का लोकप्रिय जन नेता बनाया है’’।
प्रदेश बीजेपी प्रवक्ता संजय श्रीवास्तव कहते हैं,‘‘डेढ़ वर्षो में ही किसी भी सरकार के काम काज की रिपोर्ट आ जाए, तो हैरानी होती है। बीजेपी चाहती है कि सरकार काम करे और प्रदेश आगे बढ़े। कोरोना काल में सैकड़ों जूनियर चिकित्सकों का इस्तीफा देना, कर्मचारियों की वेतन वृद्धि की बजाए कटौती होना। बेरोजगारों को बेरोजगारी भत्ता अभी तक देना शुरू नहीं किया गया है। सवाल यह है कि क्या शराब का विरोध करने वाली महिलाएं संतुष्ट हैं?स्वसहायता समूह की महिलाएं संतुष्ट हैं, जिनके ऋण माफ करने की बात कही गई थी। सरकार को अभी से नम्बर की दौड़ में नहीं आना चाहिए’’।
ग्यारह हजार करोड़ का घाटा
बजरंग अग्रवाल सी.ए.कहते हैं,कोयला,सीमेंट और बिजली ये चार सेक्टर है जिनसे सरकार को करीब 50 फीसदी राजस्व की आय होती है। लेकिन कोरोना लाॅक डाउन की वजह से प्रदेश की अर्थव्यवस्था डगमगा गई है। लॉकडाउन में ट्रांसपोर्ट की सुविधा पूरी तरह से ठप्प होने के कारण फैक्ट्रियों में बना हुआ माल बाहर नहीं जा सका। देश का 18 फीसदी कोयला छत्तीसगढ़ उत्पादित करता है। राज्य को 26 फीसदी आय लौह अयस्क से होती है। देश का करीब 20 फीसदी लौह अयस्क भंडार यहीं है। देश का 15 फीसदी लोहे का उत्पादन छत्तीसगढ़ में होता है। लोहा उत्पादन के मामले में भी राज्य देश में दूसरे स्थान पर है। देश का करीब पांच फीसदी चूना पत्थर का भंडार छत्तीसगढ़ में हैं। राज्य में फिलहाल एक दर्जन से अधिक बड़े सीमेंट संयंत्र हैं, जो देश की करीब 20 फीसदी जरूरत पूरी करते हैं। प्रदेश को देश का पॉवर हब कहा जाता है। यहां सरकारी और निजी सेक्टर मिलाकर करीब 23 हजार मेगावॉट बिजली का उत्पादन होता है। इसके अलावा प्रदेश में ट्रेडिंग का व्यवसाय भी किया जाता है। जिसमें अनाज किराना कपड़ा इलेक्ट्रानिक के सामान शामिल हैं। पड़ोसी राज्य ओड़िशा झारखंड, महाराष्ट्र व मध्यप्रदेश में भी छत्तीसगढ़ से ही व्यापार किया जाता है। लॉकडाउन खुलने के बाद भी कम से कम 3 माह व्यापार को सुचारू रूप से चलाने में समय लगेगा। इस दौरान 10-11 हजार करोड़ के कर व आर्थिक सेवाओं का नुकसान सरकार को उठाना पड़ सकता है।
लॉकडाउन का असर
आर्थिक मंदी का यह सबसे भयावह दौर है। बेरोजगारी का प्रतिशत 40 फीसदी बढ़ गया है। मनरेगा में मिलने वाले काम से प्रदेश के बारह लाख मजदूर संतुष्ट नहीं हैं। स्टील,सीमेंट पॉवर,कोल उद्योग लगातार चलने वाले उद्योग हैं। जो एकबार बंद होते हैं, तो बगैर मेंटेनेंस के उन्हें शुरू करना मुश्किल है। इसके अलावा इन उद्योगों में काम करने वाले लेबर उत्तर प्रदेश बिहार पंजाब से आते हैं। लॉकडाउन के खत्म होने के बाद इन कर्मचारियों को वापस लौटने में भी समय लगेगा। जिसके कारण औद्योगिक क्षेत्रों को इसका भारी नुकसान उठाना पड़ेगा। प्रदेश में 24 मार्च से घरेलू उड़ानें बंद हैं। साल भर 35 फीसदी कारोबार गर्मी के सीजन में ही होता है। 3 मई तक प्रतिबंध की वजह से प्रदेश में तीन सौ करोड़ का व्यापार प्रभावित हुआ। पर्यटन से जुड़े लोग और उनका व्यवसाय भी प्रभावित हुआ। 
आर्थिक आपातकाल 
पूर्व सीएम डॉ रमन सिंह कहते हैं सी.एम रिलीफ फंड में जमा राशि पर श्वेत पत्र जारी करे सरकार।  सरकार बताए गांव के क्वारेंटाइन सेंटर को कितनी राशि दी। राज्य में आर्थिक आपातकाल की स्थिति है। कर्मचारियों की वेतनवृद्धि रोक दी गई है। अब वेतन में 30 फीसदी की कटौती की जा रही है।    सरकारी व्यय की सीमा को कम किया गया है। समस्त विभाग अब वो पूरे साल 70 प्रतिशत ही बजट खर्च कर सकेंगे। मध्यप्रदेश के सी.एम शिवराज सिंह चैहान ने गांवों के लिए 1500 करोड़ दिए हैं। यहां 9-10 करोड़ खर्च कर सरकार ने कोई बड़ा काम नहीं किया है। छत्तीसगढ़ में सरकार ने क्वारेंटाइन सेंटर को सरपंच के भरोसे छोड़ दिया है। सेंटर में गर्भवती मां,बच्चे की मौत हो रही है। लोग आत्महत्या कर रहे हैं। पीसीसी अध्यक्ष मोहन मरकाम ने कहा,डाॅ रमन सिंह बताएं मोदी सरकार के 20 लाख करोड़ के पैकेज से छत्तीसगढ़ को कितना  मिला। 
क्वारेंटाइन सेंटरों में अव्यवस्था
क्वारेंटाइन सेंटर में 3 गर्भवती माताओं और 4 बच्चों सहित एक दर्जन लोगों की 15 दिनों के भीतर मौत हो गई। इनमें तीन लोग हादसे का शिकार हुए। वहीं 2 ने आत्महत्या कर ली। पांच श्रमिक बीमारी के कारण दम तोड़ चुके हैं। सूबे के 19216 क्वारंटाइन सेंटरों में 203581 प्रवासी मजदूरों को रखा गया हैं।   सरकार का दावा है कि 7 लाख लोगों को क्वारंटाइन में रखने की उसकी क्षमता है और इसका प्रबंध भी कर लिया गया है, लेकिन 2 लाख लोगों को भी वह ठीक से नहीं रख पा रही है। कोरोना मरीजों की संख्या 500 के पार हो गई है। मुंगेली जिले की लोरमी में स्थित एक धर्मशाला को क्वारेंटाइन सेंटर बनाया गया है। आंध्र प्रदेश के 45 प्रवासी मजदूरों को अछूतों की तरह गेट के बाहर से खाने के पैकेट दिए जा रहे हैं। खाने की गुणवत्ता बहुत खराब है। मामला सामने आने पर अधिकारियों ने मजदूरों पर आरोप लगाते हुए कहा खाने में दारू,मुर्गा की मांग कर रहे हैं। नेता प्रतिपक्ष श्री कौशिक ने कहा कि क्वारेंटाइन सेंटर्स में लगातार हो रहीं मौतों के बाद भी   बदइंतजामी दूर नहीं किया जा रहा है। अब ये क्वारेंटाइन सेंटर्स कई तरह के इन्फेक्शन बीमारियों को जन्म दे रहे हैं।
वेतन नहीं मिलने से इस्तीफा
रायपुर,रायगढ़ और सिम्स बिलासपुर से करीब तीन सौ जूनियर रेसीडेंट डॉक्टरों ने 2 माह से वेतन नहीं मिलने पर इस्तीफा दे दिया है। कोरोना वार्ड में ड्यूटी और सुरक्षा के कोई इंतजाम नहीं किए गए। दाऊ कल्याण सिंह सुपर स्पेश्यालिटी अस्पताल में सेवाएं दे रहीं संविदा व दैनिक वेतनभोगी नर्सों को दो माह से वेतन नहीं मिला है। जिससे वे नाराज हैं। प्रदेशभर में 383 छात्रों को जूनियर रेसीडेंट बनाकर पोस्टिंग कर दी गई लेकिन, अब तक उनका वेतन तय नहीं किया गया है। 
कैसे बने आत्म निर्भर
कृषि विज्ञान की छात्रा पल्लवी तिवारी कहती हैं,‘‘सरकार की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए किसानों को मजबूत करना। एग्रीकल्चर मार्केटिंग कानून को लचीला करें, ताकि किसान अपने उत्पादन को दूसरे राज्य में भी बेच सकें। बिग बाजार से आटा लेने की बजाय किसान से गेहूं खरीदें। आनाज खरीदें। उससे उसकी सब्जियां खरीदें। बेरोजगार युवक एक एप के जरिये अपना एक चलता फिरता किराना दुकान,सब्जी दुकान लांच कर सकता है। जिन्हें जरूरत होगी वो उसे फोन कर अपनी जरूरत के सामान मंगा सकते हैं। इससे उपभोक्ताओं को घर बैठे सामान मिल जाएगा।  किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य सरकार ने 2022 तक किया है। यह तभी संभव है जब किसान अपनी खेत में केवल धान,गेहूं,दलहन ही पैदा न करे। क्यों कि बारिश अधिक या न होने से नुकसान किसान को ही होता है। किसान सब्जियां, फल, प्याज, लहसुन, मक्का, गन्ना, मधुमक्खी पालन,गो पालन, (मिक्सड फार्मिग) की ओर भी ध्यान दे। ताकि वो एक ही उत्पादन पर निर्भर न रहे। ग्रामीण अर्थ व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में सरकार आगे आए।


 

Tuesday, June 2, 2020

सवालों के घेरे में झीरम कांड


झीरम घाटी में कांग्रेस नेताओं की हत्या किसी के इशारे पर हुई या फिर नक्सली हत्या थी? यह अब भी राज है। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल एनआइए की रिपोर्ट से खफा हैं। ऐसे में एसआईटी का गठन और झीरम मामले पर कांग्रेस का फिर से मामला दर्ज करना हैरानी भरा सवाल है।

0 रमेश  तिवारी
             बस्तर में झीरम घाटी हत्याकांड के सात साल बाद भी यह स्पष्ट नहीं हो सका कि कांग्रेस के बड़े नेताओ की हत्या में नक्सलियों का हाथ था या फिर कोई साजिश थी। इस नृशंस हत्याकांड में सरकार और उनकी जांच एजेंसियों को लेकर संदेह के सवाल और टकराव की स्थिति निर्मित होती रही है। लेकिन सच्चाई सामने नहीं आई। भूपेश बघेल सीएम बनने पर एसआईटी का गठन किया। एसआईटी ने एनआईए से जांच फाइल मांगी झीरम की लेकिन, एनआईए ने अभी तक इसमें कोई भी एक्शन नहीं लिया। क्लोजर रिपोर्ट भी नहीं दी। दरअसल एनआईए की रिपोर्ट में झीरम कांड के लिए कांग्रेस को जिम्मदार ठहराया गया था,कांग्रेस रिपोर्ट को झूठ का पुलिंदा करार दिया था। एनआईए की रिपोर्ट में कहा गया कि परिवर्तन यात्रा के दौरान कांग्रेस नेताओं पर हमला,सरकार को दहशत में डालने और सरकार को उखाड़ फेकने की साजिश का हिस्सा था।
कांग्रेस का आरोप है कि विशेष अदालत में एनआईए की रिपोर्ट में पेश गए आरोप पत्र में विवादास्पद मुद्दों को शामिल नही किया गया है। खासकर शहीद के परिजन जिस षडयंत्र की बात कर रहें हैं,जांच रिपोर्ट मंे वो बात नहीं है। लेकिन रिपोर्ट में घटना का सिलसिलेवार जिक्र विस्तार से है। घटना में शहीद हुए नेता स्व. नंदकुमार पटेल के बेटे विधायक उमेश पटेल, स्व. महेंद्र कर्मा के बेटे छविन्द्र कर्मा और स्व.योगेंद्र शर्मा के बेटे हर्षित शर्मा और स्व.उदय मुदलियार के बेटे जितेन्द्र मुदलियार आदि के परिजनों का कहना है कि एनआइए की रिपोर्ट में घटना से जुड़ी कथित राजनीतिक साजिश के बारे में कुछ भी नहीं कहा गया है। गौरतलब है कि 25 मई 2013 को झीरम घाटी में नक्सलियों ने एंबुश लगाया था। जिसमें राज्य के दिग्गज कांग्रेसी नेता प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल कद्दावर नेता वीसी शुक्ल,महेन्द्र कर्मा और उदय मुदलियार समेत 29 लोग शहीद हुए थे। 
राज्य सरकार ने गिनाई खामियां
राज्य सरकार ने एनआईए जांच में खामियां गिनाते हुए केंद्रीय गृह मंत्रालय को चिट्ठी लिखी थी।  केस की जांच एसआईटी स्पेशल इंवेस्टिगेशन टीम से कराने और केस को ट्रांसफर करने की मांग की थी। केंद्रीय गृह सचिव को लिखे पत्र में बताया गया था कि, अब तक की एनआईए जांच में बड़े षडयंत्र को नजरंदाज किया गया है। जांच एजेंसी ने किसी दूसरी थ्योरी पर काम ही नहीं किया। यहां तक कि रमन्ना, गुडसा उसेंडी, गजराला अशोक और दूसरे नक्सलियों के बारे में बाद में कई सबूत मिले। इसके बावजूद एनआईए ने किसी भी चार्जशीट में इनको शामिल नहीं किया।
शहीद आत्माओं को न्याय नहीं मिला
मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कहा है कि झीरम घाटी कांड में शहीद आत्माओं को अभी तक न्याय नही मिला है। झीरम घाटी कांड के षडयंत्र की सच्चाई को सब जानना चाहते है। एनआईए को पूर्व की राज्य सरकार ने जांच सौंपा था और उन्होंने अपनी जांच कम्पलीट कर ली। लेकिन जो झीरम घाटी कांड में षंडयंत्र हुआ है,उसके बारे में कोई जांच नहीं हुई। जो नक्सली पकड़े गये है,उनका और आत्मसमर्पित नक्सलियो का बयान एएनआई ने नहीं लिया। जो घटना स्थल पर थे, उनसे भी बयान नहीं लिया गया। फूलोदवी नेताम सहित झीरम में घटना स्थल पर उपस्थित साथियों का भी बयान एनआईए ने नहीं लिया। एनआईए जांच ही अधूरी है। इस मामले में जांच पूरी हो, सबका बयान हो, जो तथ्य हैं, सामने आने चाहिये।
साक्ष्य क्यों छिपा रहे सीएम
बीजेपी प्रदेश प्रवक्ता सच्चिदानंद उपासने ने कहा, झीरम के मामले में जेब में सबूत होने की बात भूपेश बघेल कहते थे, सालों बीत जाने के बाद भी अब तक सबूत पेश नहीं करने वाले प्रदेश के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल पर साक्ष्य छिपाने का मुकदमा चलाया जाना चाहिए। हर बात के लिए भाजपा के सिर पर अपनी नाकामियों का ठीकरा फोड़ने पर आमादा रहने वाले कांग्रेस के नेता कभी अपने मुख्यमंत्री पर भी तो यह दबाव बनाएं कि वे सबूत पेश करके झीरम की जाँच को अंजाम तक पहुँचने में सहयोग करें।   
एसआईटी कुछ नहीं की
तत्कालीन भाजपा सरकार ने हमले के बाद मामले की जांच एनआईए को सौंप दी थी। सात सालों में एनआईए ने इस मामले में सौ से ज्यादा गिरफ्तारी की लेकिन,घटना क्यों और किसलिए अंजाम दी गई, इसका खुलासा नहीं कर पाई है। 2018 में सत्ता परिवर्तन के बाद कांग्रेस सरकार ने एसआईटी का गठन किया। तत्कालीन आईजी विवेकानंद सिन्हा के नेतृत्व में 10 सदस्यों वाली टीम बनाई गई। टीम में विषय विशेषज्ञों को भी शामिल किया गया और पहली बैठक रायपुर में पीएचक्यू में हुई। बताया जाता है कि एसआईटी गठन के बाद यह इकलौती बैठक थी, इसके बाद कोई बैठक या कोई जांच ही नहीं हो पाई। कांग्रेस का आरोप है कि झीरम कांड की जांच को प्रभावित करने के लिए केन्द्र सरकार एनआईए की जांच रिपोर्ट की नकल नहीं दे रही है। उसकी रिपोर्ट के बगैर एसआईटी मामले की जांच नहीं कर पाएगी।
किसे बचाना चाहती है सरकार
प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता सुशील आनंद शुक्ला ने कहा,’’क्या कारण है झीरम की जांच नही होने दिया जा रहा। जब बिना किसी निष्कर्ष पर पहुचे एन आई ए ने झीरम की जांच बंद कर दी है,ऐसे में केंद्र सरकार मामले की फाइल क्यो वापस नही कर रही है? आखिर किसको बचाने या कौन सा तथ्य छुपाने में के लिए केन्द्र सरकार अड़ंगेबाजी लगा रही है। सवाल यह है कि भाजपा सरकार के कार्यकाल में हुए इस दुर्दान्त नर संहार की जांच भाजपा क्यो नही होने देना चाहती।
झीरम कांड में नया मोड़
शहीद उदय मुलियार के पुत्र जितेन्द्र मुदलियार ने झीाम कांड पर दरभा में रिपोर्ट दर्ज करा कर इस कांड को को एक नया मोड़ दिया दे दिया है। उन्होने कहा हम सात साल से एनआईए का इंतजार कर रहे थे। पर कोई भी पीड़ित पक्ष से बात नहीं किया। एनआईए ने किसी भी पीड़ित पक्ष से इस संबंध में  चर्चा नहीं की है। झीरम में षड़यंत्र के तहत हत्या की गई है। यह राजनीतिक हत्याकांड है। इसमें हम में से किसी को कोई शंका नहीं है। आरटीआई से मिले दस्तावेज में नक्सल मूवमेंट की जानकारी इंटेलिजेंस द्वारा अपने अधिकारों को दी गई गई थी। इंटेलिजेंस मार्च,अप्रैल से ही रेगुलर अधिकारियों को बताना शुरू कर दिया था कि, वहां नक्सली एकत्र हो रहे हैं। उनके पास 19- 20 मई का भी लेटर था कि वहां पर नक्सली ग्रुप मे एकत्र हो रहे हैं। जब वहां ग्रुप में नक्सलियों के एकत्र होने का इनपुट था, तो परिवर्तन यात्रा को सुरक्षा क्यों नहीं दी गई। इसमें षड़यंत्र वाला जो हिस्सा है उसका खुलासा नहीं हुआ तो हम कोर्ट जाएंगे। हमें न्याय चाहिए।
दरअसल झीरम से सुकमा जाने वाला रास्ता स्टेट हाईवे है। स्टेट हाइवे में दोनों तरफ भारी संख्या में नक्सली थे। संवेदनशील एरिया में परिवर्तन यात्रा जा रही थी। जिसकी सूचना सभी अधिकारियों को दी गई थी। फिर सुरक्षा व्यवस्था क्यों नहीं की गई थी? यह अपने आप में एक बड़ा सवाल है। एनआईए ने जांच में षड़यंत्र वाले बिन्दुओं पर जांच क्यों नहीं की,उसका खुलासा होना बाकी है।
सवालों में रिपोर्ट
0 यदि एनआइए की रिपोर्ट सच है तो किन-किन चश्मदीद लोगों से बातें की गई।
0 एनआइए की रिपोर्ट की 7वीं कंडिका में लिखा है कि नक्सली माड़ में क्षेत्रीय सहयोग से समानांतर सरकार चला रहे हैं,लेकिन सरकार ने इसे माओवाद प्रभावित क्षेत्र घोषित किया है। सवाल यह है कि सरकार जानते हुए भी सार्थक कार्रवाई क्यों नहीं की।
0 कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा के पहले मुख्यमंत्री डाॅ.रमन सिंह की विकास यात्रा बस्तर में निकली थी,उस पर नक्सली हमला क्यों नहीं हुआ?
0 नक्सलियों ने किसके इशारे पर इतनी बड़ी वारदात को अंजाम दिया। किसने नक्सलियों को सूचना दी परिवर्तन यात्रा में महेन्द्र कर्मा भी शामिल हैं?
0 झीरम मामले में इतनी बड़ी चूक की वजह क्या है?
0 कांग्रेस नेताओं के काफिले को तीरथगढ़ से तोंगपाल थाने तक सुरक्षा नहीं दी गई थी। लेकिन एनआइए ने इस पर कोई टिप्पणी क्यों नहीं की?
0 हमलावरों ने एक नेता का नाम पूछ कर गोलियां चलाई,इसका मतलब हमला पूर्व नियोजित था और कुछ नेताओं पर किया गया था। इस राजनीतिक साजिश पर भी रिपोर्ट में एक शब्द नहीं कहा गया है,ऐसा क्यों?

   









‘रिपु’

Saturday, May 23, 2020

पांव पांव पहुंचा कोरोना


कोरोना मुक्ति की ओर कदम बढ़ा रहे छत्तीसगढ़ में कोरोना पांव,पांव पहुंचा। अप्रैल माह तक आधा सैकड़ा भी मरीज नहीं थे। लेकिन मजदूरों की वापसी ने लाॅक डाउन की हवा निकाल दी। माना जा रहा है कि जून तक कोरोना मरीजों की संख्या पांच सैकड़ा पहुंच सकती है।











0 रमेश कुमार ‘रिपु’
           छत्तीसगढ़ कोरोना मुक्ति की ओर कदम बढ़ा रहा था। यहां मरीजों की संख्या अन्य राज्यों की तरह तेजी से नहीं बढ़ी। एम्स से 95 फीसदी मरीज स्वस्थ्य होकर अपने अपने घर चले गये। लेकिन चार मई को शराब दुकान खुलने के बाद,कोरोना मरीजों में संख्या में थोड़ा इजाफा हुआ। सबसे अधिक कोरोना मरीजों में तेजी पन्द्रह से बीस मई के बीच देखी गई। 25-25 मरीज एक दिन में मिले। जाहिर सी बात है कि अन्य राज्यों से आने वाले प्रवासी मजदूरों की वजह से कोरोना मरीजों की संख्या में इजाफा हुआ। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल कहते हैं,केन्द्र सरकार लाॅक डाउन से पहले यदि मजदूरों को उनके राज्यों में भेजने का इंतजाम कर देती, तो कोरोना मरीज जो अब बढ़ते क्रम में दिख रहे हैं,ऐसी स्थिति न आती। राहुल गांधी के कहने पर केंद्र सरकार मजदूरों के खाते में 7500 रुपए डाल देती, तो वे सड़कों पर नहीं भटकते’’।  
सवा दो लाख मजदूर आएंगे
श्रम मंत्री डॉ शिवकुमार डहरिया ने प्रथम प्रवक्ता को बताया कि अन्य राज्यों में फंसे अब तक 75 हजार मजदूरों की छत्तीसगढ़ वापसी हो चुकी है। इनमें से 16 हजार मजदूर रेलमार्ग से आए हैं। जबकि शेष सड़क मार्ग से आए हैं। अन्य राज्यों में फंसे श्रमिकों को लाने के लिए 43 विशेष ट्रेनों को मंजूरी दे दी गई है। राज्य शासन के एप में अभी तक दो लाख 27 हजार लोगों ने वापस आने के लिए रजिस्ट्रेशन कराया है। राज्य सरकार 22 ट्रेनों के लिए अब तक रेलवे को कुल 1.88 करोड़ रुपए का भुगतान कर चुकी है। श्रमिकों के रेल और बस से आने का खर्चा श्रम विभाग उठाएगा। मजदूरों को लाने में लगभग 10 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। जम्मू से श्रमिकों को लाने के साथ ही उत्तराखंड जाने वालों  के लिए भी ट्रेन की व्यवस्था की गई है।  
एक सैकड़ा के पार कोरोना
प्रदेश में संक्रमित मरीजों की संख्या बढ़कर 105 हो गई है। माना जा रहा है कि जून तक पांच सैकड़ा मरीज हो सकते हैं। कोरोना के 31341 संभावित मरीजों की जांच में 29812 लोगों की रिपोर्ट निगेटिव आई है। 1463 सैंपलों की जांच जारी है। वहीं 59 मरीज ठीक होकर घर लौट चुके हैं। वापस आए मजदूरों को क्वारंटीन सेंटर ले जाने के लिए बसों की व्यवस्था की गई हैं। 24 हजार 805 लोगों को क्वारंटीन किया गया है। आने वाले सभी श्रमिकों का स्वास्थ्य परीक्षण के लिए राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में 16 हजार 599 और शहरी क्षेत्रों में 623 क्वारंटीन सेंटर बनाए गए हैं। बालोद में 17 मई को कोरोना संक्रमण के 25 नए मामले सामने आए हैं। ये अब तक के एक दिन में सबसे ज्यादा संक्रमण का केस हैं। अब कोरोना के मरीज उन इलाकों से मिलने लगे हैं,जहां इसकी आशंका नहीं थी। राज्य में कोरोना पॉजिटिव का पहला मामला रायपुर में, मार्च के प्रथम सप्ताह में विदेश से लौटी युवती से सामने आया था। अब जिन लोगों में कोरोना संक्रमण दिख रहा है,सभी सामान्य नागरिक या श्रमिक हैं।
तो सैकड़ों की मौत नहीं होती
स्वास्थ्य मंत्री टी.एस सिंहदेव ने कहा कि अगर भारत सरकार सभी राज्यों के लिए शुरू से ट्रेन चला देती तो लाखों मजदूर सड़कों पर पैदल चलने को मजबूर नहीं होते। सैकड़ों मौतें नहीं होतीं। छत्तीसगढ़ से होकर गुजरने वाले प्रवासी मजदूरों की संख्या 12 से 15 हजार हैं। उनके भोजन की व्यवस्था और राज्यों की सीमा तक छोड़ने की व्यवस्था कर रहे हैं। मजदूर गुजरात से महाराष्ट्र होकर यहां पहुंच रहे हैं। यहां से ओडिशा, झारखंड, बिहार, यूपी,एमपी जा रहे हैं। इनमें से अधिकांश राज्यों में तो बीजेपी की सरकारें हैं। लोगों का जीवन नर्क बना दिया है। ताली बजवाने में एकजुटता का श्रेय केन्द्र सरकार लेती है,ं तो लाखों मजदूरों के सड़क पर चलने की जिम्मेदारी भी लेनी चाहिए’’।
 क्वारंटीन सेंटरों में होंगे 85 हजार टेस्ट
राज्य में में 17 हजार से ज्यादा क्वारंटीन सेंटरों की क्षमता करीब 5.5 लाख है। मई के अंत तक क्वारंटीन सेंटर में रखे प्रवासी मजदूरों के 85 हजार से ज्यादा रैपिड टेस्ट करने की रणनीति बनाई गई है। हर ब्लॉक में औसतन 50 क्वारंटीन सेंटर के हिसाब से फिलहाल 17183 सेंटर हैं। इनमें 56 हजार से ज्यादा श्रमिक रखे गए हैं। किसी भी सेंटर में अगर एक भी पॉजिटिव केस मिलता है तो वहां रह रहे सभी का कोरोना टेस्ट किया जाएगा। ये पूरी प्रक्रिया 14 दिन के क्वारैंटाइन पीरियड के दौरान की जाएगी। सैंपल अलग,अलग आयु समूह के आधार पर एकत्र होंगे, ताकि वैज्ञानिक तरीके से इसका आकलन किया जा सकेगा।     
मजदूरों ने केयरटेकर को पीटा
मजदूरों की परेशानियां और उनका दर्द देखकर मन गुस्से से भर जाता है। वहीं देश भर में जन सेवक जगह जगह उनकी सेवा के लिए पानी,भोजन,चप्पल लेकर खड़े हैं। फिर भी कुछ मजदूर मूड़े आ गए हैं। छत्तीसगढ़ के मुंगेली जिले के एक क्वारंटाइन सेंटर में श्रमिकों ने केयरटेकर चमन साहू की जमकर धुनाई कर दी। वजह ये थी कि मजदूरों की फरमाइश पर उन्हें खाने में लस्सी नहीं दी गई। मजदूर क्वारंटीन सेंटर में आने के बाद समझते हैं, उन्हें फाइव स्टार होटल की तरह सुविधा मिलेगी। संक्रमण के डर ने पुलिस के भी हाथ पैर बांध दिए हैं। जिसका खूब फायदा प्रवासी मजदूर उठा रहे हैं। एक तो पहले ही गांव के लोग यहां क्वारंटीन सेंटर बनाए जाने से नाराज है और अब इन मजदूरों के नखरे उठा कर और उनकी फरमाइश पूरी करते,करते लोगों के सब्र का बांध अब टूटने लगा है। कोरिया के क्वारंटीन सेंटर से भागे दो मजदूरों की रिपोर्ट 7 मई को पाॅजिटिव आई। दोनों मजदूर बैकुंठपुर स्थित क्वारंटीन सेंटर में थे, और सैंपल देने के बाद झारखंड भाग निकले। जगदलपुर के स्व. बलिराम कश्यप मेडिकल कॉलेज में बने क्वारंटाइन सेंटर से तमिलनाडु के भागे दो ड्राइवर  पकड़े जाने के बाद जेल भेज दिए गए हैं। मुंगेली से चार मजदूर, और दंतेवाड़ा जिले में अरनपुर के क्वारंटीन सेंटर से 23 मजदूर फरार हो गये।
मुख्यमंत्री की मांग
मुख्यमंत्री भूपेश बघेल चाहते हैं केन्द्र सरकार धान का कोटा 24 लाख टन से बढ़ाकर 31.11 लाख टन कर दे। स्वास्थ्य कर्मियों की तरह पुलिस निगम जिला एवं अन्य विभागों के लोगों को भी पी.एम गरीब कल्याण पैकेज में शामिल करें। मनरेगा के तहत 200 दिन का रोजगार दिया जाए ताकि,लोगों को मई,जून में भी काम दिया जा सके। राज्य के कोल ब्लॉकों से कोयला मंत्रालय द्वारा जमा कराई गई 4140 करोड़ रुपए की लेवी राज्य को दी जाए। राज्य का वित्तीय घाटा भी इस वर्ष जीएसडीपी के 5 प्रतिशत के बराबर रखे जाने तथा उधार की सीमा जीएसडीपी के 6 प्रतिशत तक शिथिल किया जाए।
सी.एम कोष में 56 करोड़ आए
कोविड 19 की रोकथाम और जरूरतमंदों की मदद के लिए मुख्यमंत्री सहायता कोष में कुल 56 करोड़ 4 लाख 38 हजार 815 रुपये जमा हुए। कोरोना वायरस के संक्रमण की रोकथाम के लिये सरकार ने सभी 28 जिलों को 25.25 लाख रुपये और 11 जिलों को 20.20 लाख रुपये जारी किए थे। इस तरह जिलों को अब तक 10 करोड़ 40 लाख रुपये जारी किया जा चुका है। 45 करोड़ 79 लाख 8 हजार 815 रुपये अब भी मुख्यमंत्री सहायता कोष में बचे हैं।   
रोजगार गारंटी में काम
राज्य के श्रम सचिव सोनमणि बोरा ने बताया कि लाॅक डाउन के वक्त करीब 1 लाख 29 हजार मजदूरों ने सरकार से मदद मांगी। उन्हें राशन के साथ नगद मदद की गई। अनुमान है कि छत्तीसगढ़ के करीब तीन लाख लोग दूसरे राज्यों में जाकर मजदूरी करते हैं। इनमें से 50 हजार के आसपास दूसरे राज्यों से पैदल आ गए, जिन्हें 14 दिन के क्वारंटाइन के साथ गावों में रोजगार गारंटी के काम में लगा दिया गया है। 30 हजार के करीब सरकारी साधनों ट्रेन और बसों से आ चुके हैं। वापसी के इच्छुक प्रवासी मजदूरों को लाने के लिए राज्य सरकार 28 ट्रेनों की मांग की थी, 15 की अनुमति मिली है। कुछ प्रक्रियाधीन है। ग्राम पंचायत जनपद पंचायत में नए जाॅब कार्ड के लिए आवेदन देने पर 15 दिवस के भीतर जाॅब कार्ड बन जाएगा। आवेदक का उक्त ग्राम पंचायत का मूल निवासी होना अनिवार्य है एवं आवेदक का किसी भी जाॅब कार्ड में नाम नहीं होना चाहिए। राज्य में 1200 से अधिक लघु और माध्यम उद्योग चालू करा दिए गए हैं। लगभग 92 फीसदी लोगों को रोजगार मिल गया है। इसमें काम करने वाले 60 फीसदी से अधिक मजदूर दूसरे राज्यों के हैं। उम्मीद है कि वे अब अपने राज्य नहीं जायेंगे। 
समर्थन मूल्य की राशि दी
प्रदेश के 18 लाख से ज्यादा किसानों को राजीव गांधी किसान न्याय योजना के तहत पहली किस्त 21 मई से सीधे उनके खाते में जाएगी। इसके लिए 51 सौ करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। किसानों को धान के अंतर की राशि 665 और 685 रुपए दी जाएगी। अंतर की राशि की दूसरी किस्त जुलाई,अगस्त में दिए जाने की संभावना है। उद्योगों में काम शुरू होने से 91 हजार 997 श्रमिकों को रोजगार मिल रहा है। मनरेगा के तहत 9883 पंचायतों में 20 लाख लोगों को रोजगार मिला, जो कि पूरे देश के मनरेगा में 24 प्रतिशत भागीदारी है। वन विभाग की विभिन्न योजनाओं में कुल 6 लाख 42 हजार 949 वनवासियों को रोजगार भी प्रदान किया है।

Monday, May 18, 2020

मजदूरों में वापसी की होड़

 
मजदूर अपने घर वापसी का उत्सव मना रहे हैं। वहीं सरकार को कोरोना का संक्रमण बढ़ने का अंदेशा भी है। वैसे छत्तीसगढ़ में कोरोना के कुल 59 मरीजों में सिर्फ छह ही स्वस्थ्य होने को बचे हैं। सबसे बड़ा सवाल अब यह है कि मजदूरों की वापसी के बाद सरकार इनके रोजगार के लिए क्या करेगी।  










0 रमेश तिवारी ‘‘रिपु’’
              छत्तीसगढ़ के मजदूर बड़ी उम्मीदें लेकर निकले थे निवाले के लिए। लेकिन छाले लेकर लौटे। भरोसा था कि हाथों को इतना काम मिलेगा कि पैसे से हाथ भर जाएंगे। घर के लिए सपने खरीदेंगे। मगर उनके सपनों को कोरोना वायरस ने कुतर दिया। न केवल उनकी उम्मीदे ध्वस्त हुई बल्कि, देश में हाहाकार मच गया। क्यों कि कोरोना एक ऐसा कातिल निकला, जिसके हाथ किसी के खून से सने भी नहीं लेकिन,उसके कहर से सनाका खिंच गया। लाॅक डाउन के बावजूद कई मौतों का गवाह बना अप्रैल और मई महीना। दर्द की कहानियों का इतिहास भी। कई आंखें आंसुओं की पनाहगाह बनी। लोग घरों में लाॅक डाउन थे, पर सरकारें चल रही थीं। सड़कें थीं,पर मंजिल का पता नहीं। रेल के पहिये थमे,मगर पटरियों पर पांव चल रहे थे। मजदूर,मजबूर हो गये। घर से दूर हो गए। लाॅक डाउन का नतीजा है कि भारत,इटली और अमेरिका नहीं बना। सरकारों की राय शुमारी से हिम्मत बंधी। अब मजदूर अपने घर वापसी का उत्सव मना रहे हैं। वहीं,सरकार की चिंता है कैसे राज्य की अर्थव्यवस्था जी उठे। मजदूरों की वापसी के बाद उनके रोजगार,उद्योग धंधे और अर्थ व्यवस्था को फिर से जिंदा करने के यक्ष प्रश्न हैं। वैसे राज्य सरकार ने व्यय में तीस फीसदी की कटौती कर दी है। वित्त विभाग द्वारा जारी आदेश के तहत वित्तीय वर्ष की प्रथम तिमाही में व्यय सीमा कुल बजट प्रावधान के 20 प्रतिशत से अधिक नहीं होगी। विशेषज्ञ यह मानते हैं कि बजट मे कटौती से कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा। इसलिए कि कई विभाग अपना बजट खर्च नहीं कर पाते हैं।
सीएम की नहीं सुनते
छत्तीसगढ़ से देश के 21 राज्यों और चार केंद्र शासित प्रदेशों में करीब तीन लाख प्रवासी मजदूर काम करते हैं। संभावना है कि इनमें से दो लाख मजदूर वापस आ सकते हैं। राज्य सरकार का दावा है कि मजदूरों को लाने और भेजने की व्यवस्था की जा रही है। वहीं यह शिकायत भी है कि मुख्यमंत्री की बातें अधिकारी नहीं सुन रहे हैं। जैसा कि माकपा राज्य सचिव संजय पराते का आरोप है कि माकपा ने तेलंगाना में फंसे 1300 मजदूरों को उनके नाम पते और मोबाइल नंबर भी दिया है। इनमें 89 बच्चे और 128 महिलाएं हैं। ये मजदूर हैदराबाद, सिकंदराबाद, अनंतपुर, रंगारेड्डी, हिमायत नगर, गौलीडोडी, नागल रोड, तुर्कपल्ली, शिवराम पल्ली, सिद्धिपेट, निजमपेट, कोकापेट व अन्य जगहों में फंसे हुए हैं। लेकिन अभी तक कोई पहल सरकार ने नहीं की। 
दस करोड़ होंगे खर्च
श्रम मंत्री डॉ शिवकुमार डहरिया ने युगवार्ता को बताया,‘‘छत्तीसगढ़ में अब तक 108351 मजदूरों ने राज्य में वापसी के लिए पंजीयन कराया है। श्रमिकों के रेल और बस से आने का खर्चा श्रम विभाग उठाएगा। मजदूरों को लाने में लगभग 10 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। दूसरे राज्यों के करीब 27 हजार श्रमिक यहां से जा चुके हैं और 32 हजार लोगों ने जाने के लिए पंजीयन कराया है। प्रवासी मजदूरों के लिए जिलों में हेल्प लाइन के साथ राज्य स्तर पर कंट्रोल रूम बनाया गया है। छत्तीसगढ़ में अन्य राज्यों के मजदूरों की संख्या लगभग 35 हजार है’’।
रोजगार गारंटी में काम
राज्य के श्रम सचिव सोनमणि बोरा ने बताया कि लाॅक डाउन के वक्त करीब 1 लाख 29 हजार मजदूरों ने सरकार से मदद मांगी। उन्हें राशन के साथ नगद मदद की गई। अनुमान है कि छत्तीसगढ़ के करीब तीन लाख लोग दूसरे राज्यों में जाकर मजदूरी करते हैं। इनमें से 50 हजार के आसपास दूसरे राज्यों से पैदल आ गए, जिन्हें 14 दिन के क्वारंटाइन के साथ गावों में रोजगार गारंटी के काम में लगा दिया गया है। 30 हजार के करीब सरकारी साधनों ट्रेन और बसों से आ चुके हैं। वापसी के इच्छुक प्रवासी मजदूरों को लाने के लिए राज्य सरकार 28 ट्रेनों की मांग की थी, 15 की अनुमति मिली है। कुछ प्रक्रियाधीन है। ग्राम पंचायत जनपद पंचायत में नए जाॅब कार्ड के लिए आवेदन देने पर 15 दिवस के भीतर जाॅब कार्ड बन जाएगा। आवेदक का उक्त ग्राम पंचायत का मूल निवासी होना अनिवार्य है एवं आवेदक का किसी भी जाॅब कार्ड में नाम नहीं होना चाहिए। राज्य में 1200 से अधिक लघु और माध्यम उद्योग चालू करा दिए गए हैं। लगभग 92 फीसदी लोगों को रोजगार मिल गया है। इसमें काम करने वाले 60 फीसदी से अधिक मजदूर दूसरे राज्यों के हैं। उम्मीद है कि वे अब अपने राज्य नहीं जायेंगे। 
समर्थन मूल्य की राशि दी
प्रदेश के 18 लाख से ज्यादा किसानों को राजीव गांधी किसान न्याय योजना के तहत पहली किस्त 21 मई से सीधे उनके खाते में जाएगी। इसके लिए 51 सौ करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। किसानों को धान के अंतर की राशि 665 और 685 रुपए दी जाएगी। अंतर की राशि की दूसरी किस्त जुलाई,अगस्त में दिए जाने की संभावना है। उद्योगों में काम शुरू होने से 91 हजार 997 श्रमिकों को रोजगार मिल रहा है। मनरेगा के तहत 9883 पंचायतों में 20 लाख लोगों को रोजगार मिला, जो कि पूरे देश के मनरेगा में 24 प्रतिशत भागीदारी है। वन विभाग की विभिन्न योजनाओं में कुल 6 लाख 42 हजार 949 वनवासियों को रोजगार भी प्रदान किया है।
संक्रमित प्रदेश से आए प्रवासी
राज्य में कुल 59 मरीज थे, जिनमें से 53 मरीज ठीक हो चुके हैं। 6 मरीजों को उपचार चल रहा है। छत्तीसगढ़ में रिकवरी रेट 90 प्रतिशत से अधिक है। अब तक 25 हजार 282 कोरोना वायरस टेस्ट किए जा चुके हैं। 24 हजार 605 लोगों को क्वारंटीन किया गया है। राज्य के श्रमिकों को वापस लाने के लिए पहली ट्रेन गुजरात से आई। आने वाले सभी श्रमिकों का स्वास्थ्य परीक्षण किया गया। इसके लिए राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में 16 हजार 499 और शहरी क्षेत्रों में 623 क्वारंटीन सेंटर बनाए गए हैं। लॉकडाउन के बाद 850 से ज्यादा प्रवासी मजदूर पैदल या लिफ्ट लेकर रायपुर पहुंच चुके हैं। इनमें से 80 फीसदी प्रवासी उन राज्यों से आए हैं जहां कोरोना संक्रमित मरीजों की संख्या टॉप पर है। ज्यादातर मजदूर राजस्थान, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश से आए हैं।  
मुख्यमंत्री की मांग
मुख्यमंत्री भूपेश बघेल चाहते हैं केन्द्र सरकार धान का कोटा 24 लाख टन से बढ़ाकर 31.11 लाख टन कर दे। स्वास्थ्य कर्मियों की तरह पुलिस निगम जिला एवं अन्य विभागों के लोगों को भी पी.एम गरीब कल्याण पैकेज में शामिल करें। मनरेगा के तहत 200 दिन का रोजगार दिया जाए ताकि,लोगों को मई,जून में भी काम दिया जा सके। राज्य के कोल ब्लॉकों से कोयला मंत्रालय द्वारा जमा कराई गई 4140 करोड़ रुपए की लेवी राज्य को दी जाए। राज्य का वित्तीय घाटा भी इस वर्ष जीएसडीपी के 5 प्रतिशत के बराबर रखे जाने तथा उधार की सीमा जीएसडीपी के 6 प्रतिशत तक शिथिल किया जाए।
सी.एम कोष में 56 करोड़ आए
कोविड 19 की रोकथाम और जरूरतमंदों की मदद के लिए मुख्यमंत्री सहायता कोष में कुल 56 करोड़ 4 लाख 38 हजार 815 रुपये जमा हुए। कोरोना वायरस के संक्रमण की रोकथाम के लिये सरकार ने सभी 28 जिलों को 25.25 लाख रुपये और 11 जिलों को 20.20 लाख रुपये जारी किए थे। इस तरह जिलों को अब तक 10 करोड़ 40 लाख रुपये जारी किया जा चुका है। 45 करोड़ 79 लाख 8 हजार 815 रुपये अब भी मुख्यमंत्री सहायता कोष में बचे हैं।   
क्वारंटीन सेंटर से भागे
प्रदेश में कोरिया के क्वारंटीन सेंटर से भागे दो मजदूरों की रिपोर्ट 7 मई को पाॅजिटिव आई। दोनों मजदूर बैकुंठपुर स्थित क्वारंटीन सेंटर में थे और सैंपल देने के बाद झारखंड भाग निकले। जगदलपुर के स्व. बलिराम कश्यप मेडिकल कॉलेज में बने क्वारंटाइन सेंटर से तमिलनाडु के भागे दो ड्राइवर   पकड़े जाने के बाद जेल भेज दिए गए हैं। मुंगेली से चार मजदूर, और दंतेवाड़ा जिले में अरनपुर के क्वारंटीन सेंटर से 23 मजदूर फरार हो गये। तेलंगाना से आये इन मजदूरों की प्रारंभिक जांच में किसी में भी सर्दी खांसी या बुखार जैसे लक्षण नहीं थे। स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव कहते हैं, मई और जून में कोरोना के मरीज बढ़ने की आशंका है।

Wednesday, May 6, 2020

शर्मिली बन गई खूंरेजी

 
        
बस्तर की शर्मिली महिलाएं लाल गलियारे में रहकर खूंरेजी महिलाएं बन गई हैं.उनके हाथ में न केवल नक्सली नेटवर्क की कमान है बल्कि, किसी बड़े हमले की अगुआई भी करती हैं.अपनी जान और इज्जत को जोखिम में डालने वाली माओवादी महिलाओं पर लाखों के इनाम है.जल,जमीन और जंगल की लड़ाई के लिए नक्सली नेताओं ने माकपा के सिद्धांत की घुट्टी पिलाकर इन्हें बंदूक उठाने के लिए विवश कर दिया है.वहीं,राजनीतिक पैरामीटर में ये गरीब हैं,बेरोजगार हैं,कुपोषित हैं.महिला नक्सली अपने हक़ की आखि़री लड़ाई लड़ रही हैं.









0 रमेश तिवारी ‘‘रिपु‘‘
                               छत्तीसगढ़ के अबूझमाढ़ की दुर्गम पहाड़ी और जंगल में माओवादियों का मुख्य गढ़ है.वामपंथी उग्रवाद का संचालन इन्हीं जंगलों से हो रहा है.इन्हीं घने जंगलों में माओवादी अपनी समानांतर सरकार चलाते हैं.जिसे वे जनताना सरकार कहते हंै.नक्सली जिला सुकमा की सरहद  आंन्ध्र प्रदेश और ओड़िसा से मिलती है.जिसे पुलिस माओवादियों की राजधानी कहती है.माओवादियों के नेटवर्क का संचालन यहीं से होता है. सन् 2005 तक नक्सली लीडरों ने महिलाओं की सेना तैयार नहीं किये थे. 2006 में नक्सली लीडरों ने निर्णय लिया महिला सेना तैयार करने का.उसके बाद हर घर से एक बेटी और बेटा यह कहकर नक्सलियों ने मांगा कि तुम्हारे हक की लड़ाई हम सरकार से लड़ रहे हैं,इसलिए अपना एक बेटा या फिर बेटी दें.धीरे धीरे नक्सलियों के एक बड़े नेटवर्क का संचालन महिला नक्सली करने लगी.नक्सली संगठन में जो आदिवासी महिलायें हंैं, वे सभी युवा है.कभी आदिवासी महिलाओं को शर्मिली कहा जाता था,लेकिन अब इनके चेहरे पर लज्जा नहीं दिखती.बर्बरता और कू्ररता की एक मिसाल बन गई हैं.नक्सली नेता अपने संगठन में खूंरेजी महिलाओं को उन्हें कैडर के हिसाब से पद देते हैं.पद,प्रतिष्ठा और अच्छे वेतन के लिए आदिवासी लड़कियां चूल्हा चैका और पढ़ाई छोड़कर माओवादी बन रही हैं.
माओवादियों की धारण है कि राजनैतिक सत्ता बंदूक की नली से निकलती है.पीएलजीए (पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी) पुरूषों की तरह महिलाओं को भी नियुक्त करता है.उन्हें सैन्य प्रशिक्षण दिया जाता है.छापामार दस्तों की अगुआई की जिम्मेदारी भी प्रशिक्षित महिलाओं को दी जाती है.बस्तर में नक्सलियों के एक बड़े नेटवर्क की कमान युवा महिलाओं के हाथों में है.बस्तर की आदिवासी महिलाएं बड़ी मेहनती हैं.हाड़तोड़ मेहनत करना और पुरूषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खेती किसानी से लेकर वनोपज एकत्र करना, हाट बाजारों में बेचने के अलावा घर गृहस्थी और बाल बच्चे संभालना उनका यह स्थायी गुण है.विषम परिस्थितियों में नहीं घबराना आदिवासी महिलाओं की विशेषता है.आदिवासी महिलाओं की यही विशेषता लालगलियारे की जरूरत बन गया.आदिवासी औरतों में अनुशासन और किसी भी काम को मन लगाकर करने की इच्छा शक्ति बहुत तेज होती है.उनकी इस खूबी का इस्तेेमाल माओवादी नेताओं ने किया और उन्हें खूंखार छापामार बना दिए.पैसा और टेर्रर की वजह से भी आदिवासी महिलायें अब नक्सली मूवमेंट को अंजाम दे रही हैं.जंगल में रहते हुए इनका आचरण जंगली हो गया है.दया और ममता से इनका कोई सरोकार नहीं रहा.पुलिस के शारीरिक और मानसिक शोषण की वजह से पुलिस की ये सख्त दुश्मन हैं.जाहिर सी बात है कि पुलिस की छवि आदिवासियों के बीच अच्छी नहीं है.हिड़मा का पुलिस ने सामूहिक बलात्कार करने के बाद उसे महिला नक्सली का ड्रेस पहनाकर गोली मार दी थी.मीडिया को बाद में बताया  कि इनामी नक्सली थी.मीना खलको कांड में भी यही हुआ था.यह अलग बात है कि मानवाधिकार आयोग की जांच में खुलासा होने पर पुलिस कर्मियों के खिलाफ कार्रवाई हुई थी.वहीं ऐसे सैकड़ांे मामले हैं,जिसमें पुलिस के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई.वर्दी के खिलाफ नक्सली महिलायें हिंसा की नई परिभाषा गढ़ रही हैं.इनकी बर्बरता और हिंसक वारदात की वजह से पुलिस ने कई महिला नक्सलियों पर इनाम घोषित किया है.जिसमें कुमारी वनोजा पर 8 लाख,कुमारी सोढ़ी लिंगे पर 5 लाख एवं माड़वी मंगली की गिरफ्तारी पर 3 लाख रूपए का इनाम है.
नक्सली वारदात में महिलाएं
पुलिस भी मानती है कि इन 14 सालों में बड़ी संख्या में महिलाएं नक्सली दलम मेें शामिल होकर नक्सली संगठन को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई हैं.बस्तर संभाग के दरभा, भेज्जी, फरसगढ़, कुटरू, छोटेडोंगर, झारा घाटी, आवापल्ली, आमाबेड़ा, ओरछा सहित आधा दर्जन इलाकों में महिलाओं को एरिया कमांडर के पद पर तैनात कर नक्सली मूवमेंट को बढ़ाने और हिंसा फैलाने का काम सौंपा गया है. इस समय बस्तर की जेलों में लगभग 50 खूंखार महिला नक्सली कैद हैं.इनमें आधा दर्जन हार्डकोर महिला नक्सली हैं.जो नक्सलियों के बड़े मूवमेेंट को आपरेट करती थीं.छत्तीसगढ़ की ज्यादातर नक्सली वारदातांे में महिलाओं की भूमिका रही है.दरभा के झीरम घाटी पर हुए कांग्रेसियों की परिवर्तन यात्रा हमले को भी नक्सली महिला लीडरों ने अंजाम दिया था.बस्तर में नक्सलियों के खिलाफ आंदोलन छेड़ने वाले कांग्रेस नेता महेंद्र कर्मा को झीरम घाटी में बेरहमी से महिला नक्सलियों ने मारा था. महिला नक्सली कर्मा को पीटते हुए सड़क से लगभग आधा किलोमीटर अन्दर ले गई थीं और इस दौरान उनके चेहरे पर चाकुओं से वार भी करती रहीं.ये क्रोध का चरम था.कई घटनाओं में महिला नक्सलियों के नाम सामने आने के बाद पुलिस ने भी अति संवेदनशील क्षेत्रों में संदिग्ध महिलाओं पर नजर रखना प्रारम्भ कर दिया है.नक्सल प्रभावित जिला सुकमा के बुरकापाल में 24 अप्रैल 2017 को माओवादी और सुरक्षा बल के जवानों के बीच हुई मुठभेड़ में तीन सैकड़ा से अधिक माओवादी थे. जिसमें से आधे से अधिक वर्दी में महिला नक्सलीं थी. जो सुरक्षा बल के जवानों पर गोलियां चला रही थीं.अविभाजित दंतेवाड़ा में 2010 में हुई नक्सली वारदात, जिसमें 76 सैनिक मारे गये थे.महिला नक्सलियों ने रैकी करके ही घटना को अंजाम दिया था.फोर्स के कैंप और हाट बजार में बड़ी असानी से महिलाएं चली जाती हैं,इसलिए भी माओवादियों ने महिलाओं की फौज तैयार की है.
बसंती का कहर
कांकेर जिले के लोहारी गांव की आठ लाख की इनामी नक्सली कमांडर संध्या उर्फ बसंती उर्फ जुरी गावड़े  2001 में नक्सलियों के बाल संगठन में शामिल हुई थी.इसके बाद संगठन में अलग-अलग जगहों पर महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाने के बाद अपने गांव में जन मिलिशिया कमांडर के तौर पर काम कर रही थी.नक्सल नेताओं के शोषण से तंग आ कर बसंती ने आत्मसमर्पण कर दिया.उसका प्रमुख काम पुलिस पार्टी पर हमला कर हथियार लूटना, सीनियर नक्सली नेताओं की सुरक्षा करना.उसने जो गंभीर वारदात को अंजाम दिया,उसमें से दुर्गूकोन्दल, आमाबेड़ा, कोयलीबेड़ा और पखांजूर थाना क्षेत्र में कई जगह विस्फोट, आगजनी और एम्बुश लगाने की घटनाओं में शामिल.13 सितंबर 2003 दंतेवाड़ा जिले के गीदम थाने में हमला और लूट. 2007 में बीजापुर जिले के रानीबोदली कैंप पर हमला. 2010 में चिंतलनार में हमला,जिसमें 76 सैनिक मारे गये थे. 
छत्तीसगढ़ के डीजीपी दुर्गेश माधव अवस्थी कहते हैं,‘‘ बहुत सारी नक्सली वारदातों में महिला माओवादियों के हाथ होने की जानकारी मिली है.गुप्त सूचना के आधार पर आॅपरेशन चलाए हैं.2019 से अब तक हर महीने माओवादियों के कैंप पर हमले किये हैं.हमारे एक भी कैंप पर वे अब तक हमला नहीं कर पाए हैं.नक्सलियों में दहशत है.भारी संख्या में महिलाएं सरेंडर कर मुख्य धारा शामिल हुई हैं.जाहिर है कि नक्सलवाद से महिलाओं को मोहभंग होने लगा है’’.
27 जवानों की जान ली सुकाय
नक्सल प्रभावित दंतेवाड़ा जिले के गीदम थाना क्षेत्र से आठ लाख की इनामी नक्सली सुकाय वेट्टी सन् 2011 में एलजीएस सदस्य के रूप में नक्सली संगठन से जुड़ी.पूर्वी बस्तर डिविजन के कुआनार में एल.जी.एस. की सक्रिय सदस्य थी.सन् 2010 में मुडपाल के जंगल में पुलिस पर एम्बुश लगाकर हमला,नारायणपुर के धौड़ाई इलाके में सीआरपीएफ के जवानों पर हमला, इसमें 27 जवान शहीद हुए थे.2013 में कोंडागांव के केशकाल थाना क्षेत्र में पुलिस नक्सली मुठभेड़ में शामिल थी.
नाबालिग युवतियांे की मांग
आन्ध्र प्रदेश और छत्तीसगढ़ में हुई कई बड़ी नक्सली वारदातों को अंजाम देने वाली तीन लाख की इनामी नक्सली रमोली नेताम अपने पति गोंविद नेताम के साथ सरेंडर की, कहती है,’’बड़े नेता नाबालिग युवतियों को संगठन में शामिल करने का दबाव बनाते हैं.पहले युवतियों में जोश भरा जाता है कि, यह अपने लोगों के लिए हमारी लड़ाई है,लेकिन शामिल होने के बाद दोयम दर्जे का व्यवहार किया जाता है.जुगरी निवासी छिनारी नारायणपुर मर्दापाल एलओएस सदस्य के रूप में वर्ष 2008 में भर्ती हुई थी.उसे भानपुरी एरिया कमेटी सदस्य की जिम्मेदारी दी गई थी.दोनों महिला नक्सलियों पर 50-50 हजार का इनाम था.माओवादियों को प्रेम और संतान पैदा करने की इजाजत नहीं होती.आठ लाख रूपए की इनामी नक्सली 20 वर्षीया आसमती को 10 लाख रूपए के इनामी नक्सली संपत से प्यार हो गया.इन दोनों की मुहब्बत परवान चढ ही रही थी,इसकी भनक कमेटी के सचिव राजू उर्फ रामचन्द्र रेड्डी को लग गई.दोनों को अलग कर दिया.आसमती को यह अच्छा नहंी लगा और वह घर बसाने के लिए लाल गलियारे से नाता तोड़ने के लिए संपत को विवश किया और दोनों ने हथियार डाल दिए.
भेदभाव नहीं
आदिवासी समाज में महिलाओं के साथ भेदभाव की स्थिति नहीं है.समता का दर्जा दिया गया है.बस्तर में बेरोजगारी मुद्दा नहीं है.शहरी लोग और सरकारी तंत्र जब उन तक पहुंचा, तो उन्होंने बताया गया कि पिछड़े हो.रहन सहन ठीक नहीं है.कच्चे मकान में रहते हो. कपड़ा ठीक से पहनो.सरकारी पैरामीटर में वे गरीब कहे गये.आदिवासी कभी कुपोषित नहीं थे.अपनी जिन्दगी में आदिवासी महिलायें खुश थीं.इसलिए भी कि जातिगत भेदभाव उनके साथ कभी नहीं था.इसलिए भी कि सभी एक ही जाति के हैं.सवाल यह है कि फिर आदिवासी महिलाएं नक्सलवाद को आत्मसात क्यों की?देखा जाये तो बस्तर अंचल में आदिवासी संसाधन पर कब्जे की लड़ाई है.जल, जंगल,और जमीन की लड़ाई है.सरकार जल, जंगल, और जमीन पर कब्जा उद्योगपतियों को दे रही है.जबकि सदियों से इन पर आदिवासियों का कब्जा था.जंगलों को काट कर उद्योग धंधे स्थापित करने के लिए सड़कंे बनाने की सरकार की नीतियों की वजह से आज हर आदिवासी को दिग्भ्रमित करने की खेल खेला जा रहा है.आन्ध्र के नक्सली नेताओं ने आकर छत्तीसगढ़ के आदिवासी समाज में माकपा के सिद्धांत का बीज बोया.यही वजह है कि आज छत्तीसगढ़ के 28 जिलों में 18 जिले नक्सलवाद की आग में जल रहे हैं. सरेडर करने वाली महिला नक्सलियों यह बात समझ में आ गई कि राजनीति की सत्ता बंदूक की गोली से नहीं निकलेगी.आन्ध्र के नक्सली लीडर ने उनका दैहिक और मानसिक शोषण करने का यह तरीका निकाला है.
क्यों बन रही हैं नक्सली
आदिवासी समाज की महिलायें नक्सली क्यों बन रही है?इसके पीछे एक नहीं चार प्रमुख कारण हैं.उनके घर का कोई व्यक्ति पुलिस से प्रताड़ित होकर नक्सली बन गया, तो उनके घर की महिलायें भी उनके साथ  बंदूक उठा लीं.किसी का प्रेमी नक्सली बन गया, तो वो भी नक्सली बन गई.जिस आदिवासी महिला या पुरूष का दिमाग माकपा के सिद्धांत से प्रभावित होकर परिवर्तित हो गया वो नक्सली बन गया.लेकिन इन सब कारणों के अलावा एक सबसे प्रमुख कारण वसूली को माना जा रहा है.जंगली क्षेत्र में सड़कें,पुलिया,पुल या फिर विकास के अन्य निर्माण कार्यो में लगे ठेकेदारों से वसूली करना.टेंडर के आधार पर अपना प्रतिशत तय कर रखे हैं.नहीं देने वाले ठेकेदार काम नहीं कर सकते.उनके ट्रेक्टर,जेसीबी मशीन,डंपर,वाहन आदि को नक्सली फूंक देते हैं.नक्सली दहशत अब वूसली का जरिया बन गया है.तेंदूत्ता सीजन में सबसे अधिक राशि नक्सलियों को वसूली से मिलती है.
बस्तर में कमांडेंट के पद पर रहे कमलेश कमल कहते हैं,‘‘आदिवासी महिलाओं को लगता है कि नक्सली बनना अन्य विकल्पों से बेहतर विकल्प है.भूख या फिर बेरोजगारी से मरने की जगह गोली से मर जाना ज्यादा ठीक है.नक्सली बनने के बाद समर्पण कर देने से एक निश्चत रकम मिलती है.यह लालच भी महिलाओं को नक्सली धारा की ओर खींचती है’’
कुछ जीवन में करना है.अन्याय के खिलाफ लड़ना है. आदिवासी महिलायें प्रलोभन में बड़ी आसानी से फंस जाती हैं.नक्सली ब्रेन वास करते हैं आदिवासियों का.देखिये सरकार तुम्हारे साथ कितना सौतेला व्यवहार करती है.तुम्हारे जल,जंगल और जमीन को उद्योगपतियों को देकर तुम्हें कमजोर कर रही है.तुम्हारे वन उपज पर उद्योगपति कब्जा कर रहे हैं.सरकार के खिलाफ आपकी लड़ाई हम लड़ंगे,तुम लोग हमारा सहयोग करें’’
बहरहाल अब स्थानीय महिलाएं समझ गई हैं कि माओवादी केवल उनका शारीरिक शोषण के लिए उन्हें नक्सली बनाए हैं. इस वजह से नक्सलवाद के प्रति उनमें गुस्सा है और वे सरेंडर करने की दिशा में अधिक सोचने लगी हैं. पुलिस का दबाव भी काम कर रहा है. बस्तर के आईजी विवेकानंद सिन्हा कहते हैं, स्थानीय आदिवासियों का माओवाद से मोह भंग हो रहा है.अब नक्सलाद अंतिम सांसे गिन रहा है’’.