Friday, October 18, 2024

जमीन वक्फ की,कब्जा कांग्रेसियों का

रमेश कुमार ‘रिपु’ यूपीए सरकार ने वक्फ बोर्ड को हड़प बोर्ड बना दिया। इसका फायदा कांग्रेसियों ने खूब उठाया। वक्फ की जमीनों पर कब्जा कर घर बना लिए। बाद में पार्टी बदल कर बीजेपी में चले गए। मोदी सरकार ने वक्फ संशोधन बिल संसद में पेश किया तो पता चला कि वक्फ के पास रेल्वे से भी ज्यादा जमीन है। वक्फ संशोधन बिल संसद में पेश करने के बाद पता चला कि वक्फ के पास रेल्वे से भी ज्यादा जमीन है। अल्पसंख्यक कल्याण मंत्रालय ने सन् 2022 में बताया था वक्फ बोर्ड के पास 865644 अचल संपत्तियां हैं। लगभग 9.4 लाख एकड़ वक्फ की जमीनों की अनुमानित कीमत 1.2 लाख करोड़ है। लेकिन देखा जाए तो वक्फ की ज्यादातर जमीनों पर कांग्रेसियों का कब्जा है। इसके अलावा बीजेपी के विधायक और मंत्री भी अपना घर बना रखे हैं। वक्फ की जमीन में अस्पताल और स्कूल बनने चाहिए लेकिन काम्पलेक्स और दुकानें बनी हुई है। हर जिले के वक्फ के अध्यक्ष वक्फ की जमीन पर बने दुकानों से कमाई कर रहे हैं। पूर्व विधान सभा अध्यक्ष का घर वक्फ की जमीनों का मामला हमेशा विवादित रहा है। इस समय 58 हजार से ज्यादा वक्फ की जमीनों के मालिकाना हक से जुड़ी याचिकाएं लंबित हैं। करीब साढे बाहर हजार मामले अलग अलग प्रदेशों में लंबित हैं। वहीं 18 हजार से ज्यादा मामले ट्रिव्यूनल में पेंडिग है। और करीब 165 मामले सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में लबित है। संभागीय मुख्यालय रीवा में अमहिया की जमीन का भी मामला लंबित है। इस मोहल्ले के 131 लोगों को नोटिस दी गयी थी। कई लोग जमानत पर हैं। मध्यप्रदेश के पूर्व विधान सभा अध्यक्ष श्रीनिवास तिवारी का घर भी वक्फ की जमीन पर है। यहां के कई विधायक और नेताओं के भी घर बने हुए हैं।रीवा में 70 एकड़ जमीन वक्फ की है। लेकिन 60 एकड़ जमीन पर राजनीतिक और ओहदेदारों का कब्जा है। भोपाल के आरिफ अकील ने वक्फ की जमीन पर आरिफ नगर बसाया। सिद्धार्थ फंस गए पूर्व विधान सभा अध्यक्ष श्रीनिवास तिवारी के पोते सिद्धार्थ तिवारी जो कि त्योंथर से बीजेपी के विधायक हैं। उन्होंने अमहिया मार्ग के किनारे हाजी बाबा सैय्यद जहूर अली की मजार को सरकारी जमीन पर होने की बात कहकर मुस्लिम समाज को स्वास्थ्य मंत्री राजेन्द्र शुक्ला के खिलाफ करने बयान दिया। इसे उन्होंने लैंड जेहाद कहा। लेकिन दरगाह के लोगों ने जिला प्रशासन के समक्ष कागजात पेश कर दिया कि यह पट्टे की जमीन पर मजार बना है। जो रास्ता छोड़ा गया है वो भी पट्टे की जमीन है। सिद्धार्थ का सांसद जनार्दन मिश्रा से 36 का सियासी रिश्ता होने के चलते उन्होंने डिप्टी सीएम को घेरने की कोशिश की। लेकिन मामला उल्टा पड़ गया है। अब जिला वक्फ कह रहा है, सिद्धार्थ जिसमें रह रहे हैं वो जमीन वक्फ की है। खाली करें। क्यों नये बिल की जरूरत नए बिल की जरूरत इसलिए पढ़ गयी है कि 1954 में सरकार ने जो जमीन वक्फ को दी थी वही उसकी जमीन है। लेकिन देखा गया है कि आज की तारीख में वक्फ ने जबरिया सरकारी जमीनों पर कब्जा कर उसे अपना बना लिया है। यही वजह है कि उसके पास रेल्वे से भी ज्यादा जमीनें हैं। जिन जमीनों पर दावा वो कर रहा है उसके कागजात उसके पास होना चाहिए,लेकिन हैं नहीं। यह बात मोदी सरकार जानती है। यही वजह है कि वो कांग्रेस के शासन में वक्फ को मिले अधिकार को संकुचित करने नया बिल संसद में पेश किया है।यह जरूरी भी है। वक्फ किसी की भी जमीन पर अपना दावा ठोक कर उसे अपना बताता आया है। वक्फ के मामले की सुनवाई भी इतनी आसान नहीं है। वक्फ पर सरकार चाहती है नियंत्रण मोदी सरकार वक्फ बोर्ड के काननू में चालीस तरह के बदलाव करना चाहती है। यदि कानून पास हो गया तो वक्फ बोर्ड में दो अन्य जाति के लोग भी रहेंगे। और यही मुस्लिम समुदाय नहीं चाहता। सेक्शन 9 और 14 में बदलाव कर महिलाओं को महिलाओं को भी जगह दी जाएगी। सरकार वक्फ बोर्ड की संपत्तियों पर अपना नियंत्रण चाहती है। भविष्य में वक्फ की संपत्तियों का आडिट कैग के जरिये होगा। राज्य और केंद्र सरकार वक्फ संपत्तियों में दखल नहीं दे सकती हैं, लेकिन कानून में बदलाव के बाद वक्फ बोर्ड को अपनी संपत्ति जिला मजिस्ट्रेट के दफ्तर में रजिस्टर्ड करानी होगी। ताकि संपत्ति के मालिकाना हक की जांच हो सके।नए बिल के पास होने पर वक्फ की संपत्तियों और उसके राजस्व की जांच जिला मजिस्ट्रेट कर सकेंगे। नए बिल से फायदा यह होगा कि वक्फ ट्रिव्यूनल के फैसले को हाई कोर्ट मे चुनौती दिया जा सकेगा। जब तक कोई जमीन दान में नहीं देगा तब तक वह संपत्ती वक्फ की नहीं होगी भले उस पर मस्जिद ही क्यों न हो। नये बिल का विरोध क्यों मुस्लिम सम्प्रदाय वक्फ के नए बिल का विरोध कर रहे हैं। उसकी वजह यह बताते हैं कि वक्फ की संपत्ति अल्लाह के नाम की संपत्ति है। ऐसे में मोदी सरकार वक्फ के कानून में बदलाव करके वक्फ बोर्ड की स्वतंत्रता और स्वायत्ता छीनना चाहती है। जो कि उचित नहीं है। लेकिन ज्यादातर लोगों का कहना है कि वक्फ के कानून में बदलाव होना चाहिए। इसलिए कि मुस्लिम बाहर से आए हैं। ऐसे में मंदिर से ज्यादा जमीनें उनके पास गलत तरीके से हो गयी है। देखा जाए तो देश में सन् 2009 के बाद वक्फ की संपत्तियों में भारी इजाफा हुआ है। वक्फ बोर्ड के पास 865644 अचल संपत्तियां हैं। लगभग 9.4 लाख एकड़ वक्फ की जमीनों की अनुमानित कीमत 1.2 लाख करोड़ है। छत्तीसगढ़ में अवैध कब्जा छत्तीसगढ़ में वक्फ बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष सलमान रिजवी कहते हैं वक्फ की 90 फीसदी जमीनों पर अवैध तरीके से लोग कब्जा कर रखे हैं। इनकी संपत्तियों पर अवैध कब्जे की विस्तृत जांच होनी चाहिए। ज्यादातर संपत्तियों पर कांग्रेस नेताओं का कब्जा है। छत्तीसगढ़ में वक्फ बोर्ड अवैध तरीके से जमीनों पर कब्जा करके 5000 करोड़ रुपए संपत्ति जुटा ली है। उसके पास दस हजार करोड़ से ज्यादा की संपत्ती है। कांग्रेस की यूपीए सरकार ने वक्फ के मूल अधिनियम में संशोधन लाकर वक्फ बोर्डों को अधिक व्यापक अधिकार प्रदान किए गए थे। इसी वजह से वक्फ बोर्ड बहुत अधिक शक्तिशाली हो गया। उसके अधिकारों पर अंकुश जरूरी है। बहरहाल वक्फ बोर्ड हड़प बोर्ड बन गया है।

लारेंस का आर्डर,कर दिया मर्डर... खतरा टला नहीं

एनसीपी नेता बाबा सिद्दीकी की हत्या ने पूरी मुंबई पुलिस को हिला दी है। लारेंस का आर्डर केवल बाबा सिद्दीकी की हत्या का ही नहीं था बल्कि उनके बेटे जीशान की भी हत्या करने का था। पुलिस इस हत्याकांड के बाद सलमान की सुरक्षा बढ़ा दी है लेकिन यह माना जा रहा है कि मुबई में डी कंपनी के बाद नया डाॅन लारेंस विश्वनोई बन गया है। जो जेल के अंदर से अपने गुर्गो के जरिए लोगों का मरवा रहा है। एक फोन आ जाने की वजह से बाबा सिद्दीकी का बेटा जीशान की जान बच गयी। लेकिन खतरा टल गया है,ऐसा नहीं कहा जा सकता है। जीशान बांद्रा से ही कांग्रेस विधायक हैं। उनके विधानसभा क्षेत्र में री डेवलपमेंट को लेकर विवाद चल रहा था। इस री डेवलपमेंट के तहत झुग्गियों को तोड़कर वहां रह रहे लोगों को हटाया जाना था। इसके विरोध में जीशान ने अनशन भी किया था। इस हत्या को लेकर पुलिस ने अभी तक कोई खुलासा नहीं कर पाई है। लेकिन सोशल मीडिया की पेास्ट से यह अनुमान लगाया जा रहा है कि री डेवलपमेंट के विरोध को लेकर बाबा सिद्दीकी को धमकी दी गई थी। चूंकि बाबा सिद्दीकी हमेशा से ही सलमान के मददगार रहे हैं। ऐसे में हो सकता है कि लारेंस ने अपने गैंग को बाबा सिद्दीकी और जीशान दोनों के मर्डर की जिम्मेदारी दी गई हो। सलमान से दोस्ती तो खैर नहीं लारेंस गैंग का दावा है कि वे सलमान खान से कोई युद्ध नहीं चाहते थे लेकिन बाबा सिद्दिकी की हत्या की वजह उनके दाऊद इब्राहीम और अनुज थापन के साथ संबंध था। बाबा सिद्दीकी का कथित शराफत का चोला पहन कर लोगों को गुमराह करते आए हैं। उनका बीते समय में दाऊद इब्रहिम के साथ मकोका एक्ट में शामिल होने का भी गवाह है। बिश्नोई गैंग का दावा है कि जो कोई भी सलमान खान और दाऊद के गिरोह की मदद करेगा उसे इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी। गैंग की ओर से चेतावनी दी गई है कि अगर कोई उनके भाई को नुकसान पहुंचाएगा तो उसकी खैर नहीं है। बाबा से मांगा बीस करोड़ शिवकुमार गौतम जो कि बहराइच का रहने वाला है।धर्मराज कश्यप भी यही का है। और गुरमैल सिंह. हरियाणा के कौथल का रहने वाला है।तीनों आरोपियों की पहचान हो गयी है। धर्मराज और गुरमैल की गिरफ्तारी हो चुकी है। वहीं शिवा फरार है। बाबा सिद्दीकी मर्डर केस को पुलिस अन्य एंगल से भी तहकीकात कर रही है। कहीं लारेंस मुंबई मंे डी कंपनी की तरह अपना दबदबा कायम करने के लिए तीनों लड़कों को सामने तो नहीं किया। और इस मर्डर में क्या वाकय में लारेंस विश्वनोई के गुर्गो का हाथ है या फिर डी कंपनी का हाथ है। सूत्रों का कहना है कि कुछ दिनों पहले बाबा सिद्दकी को फोन आया था उनसे बीस करोड़ रुपए मांग गए थे। मांगने वाला अपने आप को डी कंपनी का आदमी बता रहा था। सबसे बड़ा डाॅन लारेंस सबसे बड़ा डाॅन बनने की फिराक में है। पुलिस की मानें तो लारेंस विश्नोई अपने जुर्म का साम्राज्य भारत के 11 राज्य और 6 देशों तक फैला लिया है। हर राज्य की जिम्मेदारी अलग-अलग लोग संभालते हैं। कनाडा, पंजाब दिल्ली की कमान गोल्डी बराड़ के पास है। राजस्थान मध्यप्रदेश की कमान रोहित गोदारा के पास है। वहीं पुर्तगाल अमेरिका दिल्लीएनसीआर महाराष्ट्र बिहार पश्विम बंगाल की कमान अनमोल विश्नोई के पास है। हरियाणा उत्तराखंड की कमान काला जठेड़ी के पास है। पूरे गैंग की रिपोर्ट सीधे साबरमती जेल में बंद लारेंस विश्नोई को दी जाती है। बिश्नोई के गैंग में सात सौ शूटर पुलिस की अपनी कहानी है। उसका दावा है कि बिश्नोई गैंग में 700 से ज्यादा शूटर हैं। जिसमें 300 पंजाब के युवा हैं। गौरतलब है कि एक समय लारेंस बिश्नोई का गैंग सिर्फ पंजाब तक सीमित था। धीरे धीरे उसके साथ अपराधिक और बेरेाजगार युवा उससे जुड़ते गए। उसके अपराध का तंत्र फैलने के बाद उसके सम्मोहन में खुद बखुद युवा जुड़ते गए।

Sunday, September 22, 2024

मुँह खोले,दागे गोले,कोई क्या बोले..

‘‘किसी को लोकलाज की चिंता नहीं। लोकतंत्र शर्मिदा होता है,तो होये। नई राजनीतिक भाषा से लोकतंत्र की गरिमा गिरी है। व्यक्तिगत हमले और अमर्यादित भाषाओं का इस्तेमाल करने की होड़ लगी है। संसद में बैठने वालों के भदेश आचारण और गंदी भाषा से एक नई संस्कृति ने आकार लिया है। जबकि सुप्रीम कोर्ट ने हेट स्पीच से बचने की हिदायत दे चुका है। - रमेश कुमार ‘रिपु’ राजनीति में कूटनीति सभी करते हैं। करनी भी चाहिए। तभी तो सुर्खियों में रहेंगे। राजनीति चमकेगी। सड़क से संसद तक सभी यही करते हैं। जब भी मुंह खोलते हैं,जहर उगलते हैं। ताकि बवाल हो। हल्ला मचे। टी.वी.चैनल्स में दिखें। टी.आर.पी. का सवाल है। सभी सियासी दलों को टी.आर.पी.चाहिए। एक दूसरे पर व्यक्तिगत हमले आज की राजनीति का हिस्सा बन गया है। सभी दलों की यही स्थिति है। इसलिए यह चलन में है। लेकिन किसी को मारने की धमकी,यह राजनीति का हिस्सा नहीं होना चाहिए। जैसा कि एकनाथ शिंदे की पार्टी के विधायक संजय गायकवाड़ ने कहा कि जो राहुल गांधी की जीब काटकर लाएगा उसे ग्यारह लाख रुपए दूंगा। संजय गायकवाड़ अमेरिका में राहुल गांधी के आरक्षण पर दिये गए बयान से नाराज होकर यह बात कही। केन्द्रीय मंत्री और बीजेपी नेता रवनीत सिंह बिट्टू ने कहा कि राहुल गांधी देश के नम्बर एक आतंकी हैं। वे भारतीय नहीं हैं। राहुल को पकड़ने वाले को इनाम दिया जाना चाहिए। उनका ये बयान राहुल की अमेरिका यात्रा के दौरान सिक्खों पर की गयी टिप्पणी के लिए आया। यूपी के श्रम मंत्री रघुराज सिंह ने भी राहुल को आतंकी करार दिया।विपक्ष कह रहा है कि मोदी और एकनाथ शिंदे अपने विधायक के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कर रहे है तो जाहिर सी बात है कि ये सब उनके इशारे पर हो रहा है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने प्रधान मंत्री को पत्र लिखा। उन्होंने जवाब नहीं दिया। केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने जवाब दिया। अपनी पार्टी के विधायकों और मंत्री के संदर्भ में उन्होंने कुछ नहीं कहा,मगर मल्लिकार्जुन खड़गे को याद दिलाया कि आपकी पार्टी के लोग पिछले दस सालों में प्रधान मंत्री को एक सौ दस गालियां दी। वहीं बीजेपी के नेता और मंत्री भी इस मामले में पीछे नहीं रहे। यहां तक की प्रधानमंत्री मोदी भी। यह परंपरा स्वस्थ्य राजनीति का परिचायक नहीं है। लाज के पर्दे तार-तार - राममनोहर लोहिया ने कहा था,लोकराज,लोकलाज से चलता है। लेकिन अब राजनीति में लाज के पर्दे तार-तार हो चुके हैं। जयपुर की एक रैली में प्रधान सेवक नरेन्द्र मोदी ने सोनिया गांधी पर कटाक्ष करते हुए कहा था ,वो कांग्रेस की कौन सी विधवा थी,जिसके खाते में पैसा जाता था। किसी महिला के वैधव्य का माखौल उड़ाना क्या सियासी संस्कृति है..? स्त्री सम्मान की दृष्टि से राजनीति की यह भाषा मर्यादाहीन है। पूर्व बीजेपी नेता प्रमोद महाजन ने एक बार सोनिया गांधी की तुलना मोनिका लेविस्की से कर दी थी। कैलाश विजयवर्गीय ने एक ट्वीट किया था,हंगामा होने पर हटा लिया। ट्वीट किया था, विदेशी माँ से उत्पन्न संतान कभी भी राष्ट्रभक्त नहीं हो सकती। क्या यह अपमान नहीं है- विपक्ष के अधीर रंजन चौधरी हों या फिर स्मृति इरानी। राष्ट्रपति को राष्ट्रपत्नी कह दिया। भूल हो गई। जुबान फिसल गई। माफी मांग ली। लेकिन स्मृति इरानी इसे मुद्दा बना लीं। देश की अस्मिता से जोड़ दीं। सड़क से संसद तक बखेड़ा खड़ा करने में स्मृति इरानी भूल गई,वो संसद में क्या बोल रही हैं। संसद में जब तक बोलीं,एक बार भी मैडम राष्ट्रपति, माननीय राष्ट्रपति, श्रीमती शब्द नहीं बोली। बार-बार द्रोपदी मुर्मू चिल्ला रही थीं। क्या यह माननीय राष्ट्रपति के पद का अपमान नहीं है? देश की प्रथम नागरिक राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू का अपमान संसद में भी हुआ। बाहर भी हुआ। शब्दों से। सियासियों की शब्दावली से। उनके हाव भाव से। देश की राजनीति में भाषा का पतन चुनाव से लेकर संसद तक सैकड़ों दफा हुआ। भाषा का चीरहरण -राजनीति में भाषा के संस्कार का चीरहरण होना नई बात नहीं है। भाषण में,संसद में और आरोप प्रत्यारोप के दौरान छीटें उछालने वाली अमर्यादित भाषा के जरिये भीड़ एकत्र करने वाले को कामयाब नेता मान लिया गया है। इसीलिए अटजी को कहना पड़ा,राजनीति वेश्या हो गई। नये दौर में सियासत और सियासी के लफ्ज नंगे हो गये हैं,और शोहरत गाली। सियासत में कॉमेडी का चलन बढ़ गया है। व्यक्तिगत हमले और अमर्यादित भाषाओं का इस्तेमाल करने की होड़ लगी हैं। अपनी-अपनी राजनीति के गाल लवली दिखाने की प्रतिस्पर्धा में संसद में देश हित के मुद्दे नदारत है। जबान विदेश मे फिसल गई - साल 2012 में चुनावी रैली में नरेन्द्र मोदी ने कांग्रेस के शशि थरूर की पत्नी सुनंदा थरूर के बारे में कहा था,वाह क्या गर्ल फ्रेंड है। आपने कभी देखी है 50 करोड़ की गर्ल फ्रेंड। क्या यह भाषा महिलाओं की इज्जत की पक्षधर है, बीजेपी को बताना चाहिए। शशि थरूर ने ट्वीट कर कहा,मोदी जी मेरी पत्नी 50 करोड़ की नहीं,बल्कि अनमोल है। आप को यह समझ में नहीं आएगा,क्योंकि आप किसी के प्यार के लायक नहीं हैं। यह विवाद उस समय सुर्खियों में था। गुजरात के मुख्यमंत्री थे नरेन्द्र मोदी,तब कहा था,मिडिल क्लास के परिवारों की लड़कियों को सेहत से ज्यादा खूबसूरत दिखने की फिक्र होती है। अच्छे फिगर की चाहत में कम खाती हैं। एक बार मोदी की जबान विदेश मे फिसल गई थी। उन्होंने कहा था, न जाने कौन सा पाप किया था जो भारत मे जन्म हुआ। पहले भारत में पैदा होने में भी शर्म आती थी। सवाल यह है कि सत्ता क्या व्यक्ति के संस्कार को लील जाती है। जैसा कि पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती बोलीं. थी,ब्यूरोक्रेसी की औकात क्या है। वो हमारी चप्पलें उठाती है। असल बात ये है कि हम उसके बहाने अपनी राजनीति साधते हैं।’’ नई राजनीतिक भाषा - इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं। शुरू में संसदीय बहसों में कम बोलने की वजह से समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया उन्हें गूंगी गुड़िया कहा करते थे। 2011 के विधान सभा चुनाव मे केरल के पूर्व मुख्यमंत्री अच्युतानंद ने कहा था,राहुल एक अमूल बेबी हैं। जो दूसरे अमूल बेबियों के लिए प्रचार करने आए हैं। साल 2002 में गोधरा कांड को लेकर गुजरात विधान सभा चुनाव में सोनिया गांधी ने तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को ‘मौत का सौदागर’ कहा था। दरअसल नई राजनीतिक भाषा से लोकतंत्र की गरिमा गिरी है। संसद में बैठकर देश हित में,जनहित में कानून बनाने वालों का भदेश आचारण और भाषा से एक नई संस्कृति ने आकार लिया है। जिसमें आदर्श और सम्मान का मूल्य नहीं हैं। राजस्थान विधान सभा चुनाव के दौरान जदयू के नेता शरद यादव ने कहा था,वसुंधरा मोटी हो गई हैं। अब उन्हें आराम करना चाहिए। कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर ने गुजरात चुनाव के वक्त कहा था,नरेन्द मोदी एक नीच किस्म का व्यक्ति है। हाँलाकि बाद में मोदी ने इस बयान को काफी भुनाया। नेता की अपने शहर में,राज्य में,लोगों के बीच, और परिवार में पहचान है। उसकी कही बातें सुनी जाती है। कई लोग उनका अनुसरण भी करते होंगे। जाहिर है, कि उनकी भाषा शैली के बड़े खतरे हैं। रीवा के बीजेपी सांसद जनार्दन मिश्रा ने कहा, “कलेक्टर को थप्पड़ जड़ देने पर दो साल के लिए राजनीति चमक जाती है। इससे पहले उन्होंने एक बयान मे कहा था,पी.एम.आवास नरेन्द्र मोदी के दाड़ी से निकलते हैं।” प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान हार्दिक पटेल ने कहा, धर्म की राजनीति करने वालों को थप्पड़ मारना चाहिए। योगी आदित्यनाथ ने गोरखपुर में कहा था, मुस्लिम समुदाय की संख्या जितनी ज्यादा है, वहां उतने ही बड़े दंगे होते हैं। बात जून 1997 की है। अंडरवियर खाकी रंग का - अब चुनावी भाषणों में संवेदनाएंऔर इज्जत नहीं रहीं। आजम खान ने रामपुर में एक चुनावी जनसभा में जयाप्रदा का नाम लिये बगैर कहा था,जिसको हम ऊँगली पकड़कर रामपुर लाए। उसने हमारे ऊपर क्या-क्या इल्जाम नहीं लगाए। उनकी असलियत समझने में आपको 17 बरस लगे। मैं 17 दिन में पहचान गया,कि इनके नीचे का अंडरवियर खाकी रंग का है। मध्यप्रदेश के गृहमंत्री बाबूलाल गौर ने शराब पीना स्टेटस सिंबल है कहा था। अपराध शराब पीकर डगमगाने से बढ़ते हैं,पीने से नहीं। शराब पीना हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार है। बीजेपी अध्यक्ष के दौरान अमितशाह ने कहा था,राजनेताओं का काम सरहदों में रहने वाले फौजियों से अधिक जोखिमवाला होता है। उनकी बहुत खिलाफत हुई थी। गोवा के मुख्यमंत्री मनेाहर पार्रीकर ने लाल कृष्ण आडवाणी को बासी अचार कह दिया था। जुबान कब किसकी कहां फिसल जाये नहीं कह सकते। रामकृपाली यादव ने मोदी को आतंकवादी और हत्यारा कहा था। कांग्रेसी नेता लाल सिंह ने हदें पार कर दी थी। हम तो कुत्ते भी नस्ल देखकर लेते हैं,मोदी की क्या औकात है। 1999 में राजेश खन्ना ने अटल बिहारी बाजपेयी पर ‘बिलो द बेल्ट’ टिप्पणी करते हुए कहा था औलाद नहीं है पर दामाद हैं.ये पब्लिक सब जानती है। देखा जा रहा है कि राजनीति में आए नए लोगों की भाषा गुंडे मवाली से भी बदतर हो गयी है। जबकि सुप्रीम कोर्ट ने हेट स्पीच से बचने की हिदायत दे चुका है।

Friday, July 19, 2024

देश में धर्म की राजनीति नहीं चलेगी - उमंग

मध्यप्रदेश विधान सभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने कहा कि देश में अब धर्म की राजनीति नहीं चलेगी। जनता ने धर्म की राजनीति करने वाली पार्टी को अल्पमत में ला दिया। जिस राम की राजनीति बीजेपी करती थी,उसे अयोध्या में हार का सामना करना पड़ा। बद्रीनाथ में भी हार गए। देश में हुए 13 उपचुनाव में एनडीए को सिर्फ दो सीट मिली। इंडिया गठबंधन का दबदबा रहा। धर्म की राजनीति करने वाली पार्टी को जनता को नकार रही है,यह जानते हुए भी मुख्य मंत्री मोहन यादव ने धर्म राजस्व विभाग को उज्जैन शिफ्ट कर दिया। क्यों कि संघ का संचालन यहीं से होता है। मंदिरों से पैसा संघ को जाता है।
एक मुलाकात में मध्यप्रदेश विधान सभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने यह बात कही। उन्होंने कहा कि देश वासियों की आस्था का केन्द्र केदारनाथ में 228 किलो सोना का घोटाला हो गया। इसकी जांच कराने की बजाए सरकार केदारनाथ धाम दिल्ली को बनाना चाहती है ताकि सोना चोरी कांड को दबाया जा सकता। देश की जनता धर्म की आड़ में राजनीति करने वाली पार्टी को अब होने वाले राज्यों के चुनाव में भी सबक सिखायेगी। कांग्रेस मनाएगी हत्या दिवस- देश में एक दफा इमरेजेंसी लगाी। लेकिन देश में पिछले दस साल से अघोषित इमरजेंसी लगी हुई है।अपातकाल की यादों को याद रखने के लिए 25 जून को संसद में संविधान हत्या दिवस के रूप में मनाने की बात कही गयी। इस पर कांग्रेस क्या करना चाहेगी? सवाल के जवाब में उन्होंने कहा,बीजेपी शासित राज्यों में संविधान की हत्या थम ही नहीं रहा है। हमें लोकायुक्त नियुक्ति मामले में सुप्रीम कोर्ट तक जाना पड़ा। संविधान की हत्या कहां नहीं हो रहा। है। मणिपुर में नारी के मान-अपमान हत्या दिवस, हाथरस की बेटी हत्या दिवस, लखीमपुर में किसान हत्या दिवस, तीन काले कानून से कृषि हत्या दिवस, पेपर लीक करके हुए परीक्षा प्रणाली हत्या दिवस, अग्निवीर योजना से हुए सामान्य सैन्य भर्ती दिवस, बेरोजगारी से हुए सपनों की हत्या दिवस, बढ़ती महंगाई से हुए आम परिवारों के भविष्य के हत्या दिवस,सामाजिक न्याय हत्या दिवस, आरक्षण हत्या दिवस,पुरानी पेंशन हत्या दिवस,मध्यप्रदेश में बुजुर्गो को दी जाने वाली पेशन बंद करने वाली योजना की हत्या दिवस,बीजेपी के काल को संविधान हत्या दिवस कहूं, तो गलत नहीं होगा। कांग्रेस मनायेगी हत्या दिवस। रीवा में घोटाले का विकास- रीवा के कथित विकास के संदर्भ में उन्होंने कहा कि यहां घोटालों का विकास हुआ है। जनता की आंखों में धूल झोककर विकास का आईना दिखाया जा रहा है। वृक्षारोपण के नाम पर करोड़ो को घोटाला हुआ है। एक समय कनेर के पेड़ रीवा में जगह जगह दिखते थे। वो अब दिखना बंद हो गए। अब तक पचास करोड़ के पौधे रीवा में लग चुके हैं। लेकिन रीवा कहीं भी हरा भरा नहीं दिख रहा है। बाल भारती के सामने की जमीन जो 200 करोड़ की है, उसे 36 करोड़ में दे दिया गया। बिहर नदी के पास की जमीन जो कि 200 करोड़ की है,उसे 65 करोड़ में बेच दिया गया। सिविल लाइन की जमीन 400 करोड़ की है,उसे100 करोड़ में दे दिया गया। बस स्टैड की जमीन,मानस भवन के पास की,गंगा कक्षार आदि जगह की जमीन जो कि 800 करोड़ की है,उसे 65 करोड़ रुपए में दे दिया गया। रीवा में जमीन का बंदरबांट चल रहा है। रीवा की जनता को समझना चाहिए, कि समदड़िया को सस्ते दर पर जमीन क्यों दिया गया। राजेन्द्र से पद वापस लें- एक फिल्म आई थी उड़ता पंजाब। यदि रीवा में कोरेक्स के नशे पर रोक नहीं लगी तो उड़ता रीवा पर फिल्म बन सकती है। इस जिले के डिप्टी सी.एम. राजेन्द शुक्ला हैं। नशे के कारोबार पर रोक लगाने वो यूपी के सी एम.योगी से मदद मांगने गए थे। जाहिर है,कि उन्होंने बता दिया कि वो अपराध और नशे के कारोबार पर नकेल लगाने में अक्षम हैं। असफल हैं। अकेले रीवा में 24683 अपराध हुए हैं। रीवा जिला अपराध का गढ़ बन गया है। बढ़ते अपराध से जाहिर है कि रीवा के युवाओं का भविष्य कैसा होगा,समझने वाली बात है। स्वास्थ्य मामले में भी स्वास्थ्य मंत्री असफल है। कायदे से उनसे डिप्टी सी.एम. का पद ले लिया जाना चाहिए। कर्ज लेकर घी पिला रहे- प्रदेश की सरकार के पास पैसा है नहीं। कर्ज लेकर वो अफसरों और नौकरशाही को घी पिला रहे हैं। प्राप्त 1.27 लाख करोड़ के राजस्व में मात्र 5 हजार करोड़ रुपए से विकास की बात करते हैं। चार हजार करोड़ का बजट है बताते हैं। जमीन के घोटाले पर जांच होनी चाहिए मुख्यमंत्री से कहूंगा। सरकार अक्षम है। केवल वादे कर रही है। फर्जिग नर्सिग काॅलेज किसने खोले, फ़र्ज़ी डिग्रियां किसने बांटी। इसकी सीबीआई जांच होनी चाहिए। राज्य में जितने भी घोटाले हुए हैं, उनकी जांच होनी चाहिए। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिघार को वी केन न्यूज के नेशनल हेड रमेश कुमार रिपु ने नक्सलवाद पर लिखी अपनी "रेड वाॅर" किताब उन्हें दी। उन्होंने कहा इसे पढ़ूंगा और मध्यप्रदेश में नक्सलवाद की स्थिति पर विधान सभा में सवाल करूंगा साथ ही मुख्यमंत्री से इस पर चर्चा करूंगा।

Saturday, July 6, 2024

राहुल का नया अवतार,कितना असरदार

"राहुल गांधी नए अवतार मे दिखे। मोदी सरकार की संसद में बखिया उधेड़ी । उनके सवालों पर सत्ता पक्ष को संसद में सफाई देनी पड़ी। सवाल यह है, कि हरियाणा,महाराष्ट्र और झारखंड का वोटर अबकी चुनाव में क्या इंडिया के पक्ष में नयी सियासी पटकथा लिखने का मन बनायेगा।" 0 रमेश कुमार ‘रिपु’ संसद की दीवारों के कानों ने दस साल तक विपक्ष की दमदार विरोध की आवाज सुनने को तरस गयी। केवल गुजरात लाॅबी को ही सियासी इतिहास बनाते देखा। एक सौ चालीस विपक्षी सांसदों को निलंबित होते देखा।उसने विपक्ष की हैसियत देखी ही नहीं। इसलिए कि राजनीतिक सत्ता ने विपक्ष को बेजुबां कर दिया था। विपक्ष एक जुट नहीं था।बंटा हुआ था। इस वजह से दस बरस तक संसद को अपने तरीके से हांका गया। इन दस बरसों तक विपक्ष के सीने में जो सवालों की आग थी,उसे एक जुलाई को नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने सदन के पटल पर जब रखा, तो सत्ता पक्ष के चेहरे पर हवाई उड़ने लगी। जिस सदन में 750 किसानों की मौत पर दो मिनट के लिए मौन नहीं रखा गया। कोरोना काल में मरने वाले मजदूरों पर अफसोस नहीं जताया गया। आक्सीजन नहीं मिलने पर कई सांसें टूट गयी,उनके लिए संसद में कभी सत्ता पक्ष की आंखें गीली नहीं हुई। नोटबंदी में आम आदमी को अपने ही पैसों के लिए पुलिस की लाठियां खानी पड़ी,महिला पहलवानों के साथ की गयी बदसलूकी पर संसद कभी चीखी नहीं। अडानी और अंबानी के सत्ता पक्ष के रिश्तों पर जिसने आवाज उठाई,उसके पीछे ईडी लगा दी गयी। नीट परीक्षा कांड पर कार्रवाई हो रही है कहकर सत्ता पक्ष अपने मंत्री से जवाब तक नहीं मांगा। न ही सदन में कुछ बोला। दस बरस बाद सदन को नेता प्रतिपक्ष मिलने पर उसने विपक्ष की हैसियत देखी। और फिर एक-एक करके मोदी सरकार की बखिया जब राहुल गांधी ने उधेड़ना शुरू किया तो सत्ता पक्ष को सांप सूंघ गया। इतने लाचार कभी नहीं हुए- प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे,तब भी विपक्ष के किसी सवालों का जवाब देना उचित नहीं समझते थे। प्रधान मंत्री बनने पर जब जरूरी समझे,तभी आखिरी में बोले। लेकिन नेता प्रतिपक्ष के उठाए गए सवाल पर मोदी दो बार बोले। कभी अमितशाह के खड़े होने पर पूरा सदन ठिठक जाता था,उन्हें तीन बार राहुल गांधी के सवाल पर बोलना पड़ा। यहां तक कि उन्हें स्पीकर ओम बिरला से कहना पड़ा,अध्यक्ष महोदय हमें संरक्षण दीजिये। ऐसे में,कैसे हम संसद चला पाएंगे। एक साल से मणिपुर जल रहा है,लेकिन सदन में न मोदी बोले और न ही अमितशाह। ऐसा लगता है कि मणिपुर देश का हिस्सा नहीं है। राजनीति नए रंग में- संघ की शाखा से निकली बीजेपी जिस हिन्दुत्व पर राजनीति करती आई है,उसकी नेता प्रतिपक्ष ने बखिया उधेड़ी तो मोदी को बोलना पड़ा। राहुल ने कहा,हिन्दू धर्म में हिंसा कहीं नहीं है। हिन्दू धर्म सिखाता है,डरना मना है। यह अहिंसा का देश है। भगवान शिव कहते हैं,डरो मत,डराओ मत। वे अहिंसा की बात करते हैं। बीजेपी के जो लोग अपने आप को हिन्दू कहते हैं,वे चैबीसों घंटे हिंसा करते हैं। हिन्दू हिंसा नहीं फैला सकता। वो नफरत नहीं करता। जाहिर है,कि आप हिन्दू हैं ही नहीं। राहुल के बयान पर प्रधान मंत्री मोदी ने हिन्दू कार्ड खेलकर संसद की दिशा बदलने की कोशिश की। उन्होंने कहा,पूरे हिंदू समाज को हिंसक कहना गंभीर विषय है। राहुल ने कहा,नरेंद्र मोदी जी पूरा हिंदू समाज नहीं है। आरएसएस पूरा हिंदू समाज नहीं है। बीजेपी पूरा हिंदू समाज नहीं है। संसद में राहुल के भाषण देश की राजनीति को नए सिरे से परिभाषित कर सकती है। राहुल गांधी ने मोदी के बही खाते का चिट्ठा खोल कर बीजेपी के उन सांसदों को खुश कर दिये,जो मोदी,अमितशाह के सामने बोलने से डरते हैं। और जिन्हें मंत्री नहीं बनाया गया वो भी। राहुल ने कहा बीजेपी के भीतर कितना डर है,इसी से समझ सकते हैं,कि नरेन्द्र मोदी के सामने गडकरी,राजनाथ मेरे से नमस्कार तक नहीं करते। हिन्दू बनाम हिन्दुत्व- हिन्दू शब्द आते ही बीजेपी नींद से जाग जाती है। क्यों कि बीजेपी खुद को हिन्दू पार्टी मानती है। इसलिए बीजेपी के नेताओं ने राहुल के बयान पर प्रेस वार्ता कर दुष्प्रचार किया। कहा,राहुल गांधी ने हिन्दुओं को अपमान किया है। ऐसा इसलिए किया, ताकि बीजेपी का वोट बैंक खिसके नहीं। जबकि ऐसा करके बीजेपी अपना वोट बैंक का नुकसान कर रही है। वैसे हिन्दुत्व को लेकर विरोधाभासी विचार हैं। के.एन.गोविंदाचार्य कहते हैं हिन्दू का एक भाव सार्वभौमिकता का संदेश देता है। दूसरा भाव है,कि यह एक उन्माद का नाम है,जो मुसलमानों को निशाना बनाता है। ऐसे विरोधाभासी विचार,अकारण नहीं है। राजनीति में धुएं के लिए आग का होना जरूरी है। मोदी आरएसएस के प्रचारक रहे हैं। आरएसएस और बीजेपी में हिन्दुत्व समाया हुआ है। इसीलिए मोदी चुनाव में भी मुसलमानों के खिलाफ खूब बोलते आए हैं। आरआरएस के प्रचारक यशवंत राव केलकर कहा करते थे, हिन्दुत्व को लेकर अटल बिहारी बाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी, के. सुदर्शन और विनय कटियार की समझ अलग है।हिन्दुत्व से हर किसी का अपना अपना अभिप्राय है। हिन्दुत्व को लेकर हर व्यक्ति में अलग- अलग दृष्टिकोंण झलकता है। यह भविष्य में परेशानियां खड़ी करेगा।’’ तेल की धार दिखी- राहुल गांधी ने संसद में कुछ गलत नहीं कहा,कि सरकार के खिलाफ जो खड़ा हो जाए या फिर उसकी नीतियों पर सवाल उठा दे,उसकी खैर नहीं। मेरे खिलाफ 21 मुकदमें दर्ज हुए।ई.डी.ने पांच घंटे तक पूछताछ की। मेरी संसद सदस्यता छीन ली गयी। मुझसे मेरा सरकारी आवास छीन लिया गया। देश में दो सी.एम. को जेल में डाल दिया गया। एक को अब छोड़ा गया है। विपक्ष को डराया गया। देश में नौकरी खत्म कर,डर का पैकेज दिया। प्रोफेशनल स्कीम नीट को कमर्शियल स्कीम बनाया। जुलाई 2004 में बेरोजगारी 9 फीसदी,कृषि दर में लगातार कटौती आज 1.80 फीसदी रह गयी है। राहुल गांधी ने अपने 90 मिनट के भाषण पर सरकार की उस नब्ज को पकड़ा,जिससे सरकार के माथे पर पसीना आ गया। यह कहना गलत नहीं होगा,कि राहुल गांधी ने संसद में बीजेपी और मोदी के उस आवरण को उतार दिया,जिसे वो पहनकर राजनीति करते हैं। सत्ता पक्ष उठते बैठते रहे- देश में उद्योगपतियों का 16लाख करोड़ रुपए माफ हो सकता है,तो किसानों का भी थोड़ा कर्ज माफ किया जा सकता है। किसानों ने एमएसपी मांगी,लेकिन सरकार देने से मना कर दी। सरकार का रवैया चौकाता है।कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान को सफाई देनी पड़ी,कि नेता प्रतिपक्ष गलत बयानी कर रहे हैं। एमएसपी पर खरीद जारी है। अग्निवीर पी.एम को ब्रेन चाइल्ड है। इस पर रक्षा मंत्री राजनाथ ने आपत्ति दर्ज कर सरकार की खामियों में पर्दा डालने का प्रयास किया। संसद में गलतबयानी की जा रही है। राहुल ने कहा,हमारी सरकार आएगी तो हम हटा देंगे। मोदी के विकसित भारत का सच- राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर मोदी सदन में मोदी बता रहे थे, भारत विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में चल पड़ा है। और 2047 को देश विकसित राष्ट्र बन जाएगा। देश की अर्थव्यवस्था दौड़ पड़ेगी। जबकि देश पर 272 लाख करोड़ का कर्ज है। राहुल गांधी पर तंज कसते हुए मोदी ने कहा, आजकल बच्चे का मन बहलाने का काम चल रहा है। हिन्दू समाज को सोचना होगा,ये अपमान संयोग है या प्रयोग। कांग्रेस 2024 से परजीवी पार्टी कहलाएगी। कांग्रेस जिसके साथ रहती है,उसे खा जाती है। जबकि बीजेपी ने जिन राज्य में जिस पार्टी से गठबंधन किया,उसे निगल गयी। वहीं दूसरी ओर मोदी के विकसित भारत की हाथरस के पुलराई गांव में कलई खुल गयी। सत्संग के बाद भगदड़ मचने से सौ से अधिक लोगों की मौत हो गयी। संसद में मोदी बता रहे थे,कि डबल इंजन की सरकार से प्रदेश विकसित हो रहे हैं। एक तरफ विकसित भारत का सपना संसद में मोदी दिखा रहे थे। दूसरी ओर हाथरस के सिंकदराऊ सीएचसी के बाहर चारों तरफ लाशें बिखरी हुई थी। दो घंटे बाद भी अस्पताल में सीएमओ तक भी नहीं पहुंचे। अस्पताल तक ले जाने के लिए एक एबुंलेस तक नहीं थी। अस्तपाल में सिर्फ एक डाॅक्टर था। प्रशासन का एक आदमी तक नहीं पहुंचा। हाथरस मे जो घायल थे,उन्हें इलाज नहीं मिलने से मर गए। सवाल यह है कि मोदी तीसरे कार्यकाल में भी किस विकसित भारत का सपना दिखा रहे हैं। सवाल यह है कि डिजिटल इंडिया के दौर में मोदी ने अपना भाषण क्यों नहीं रोका? बहुत देर बाद उन्होंने संवदेना व्यक्त की। मनमानी नहीं चलेगी- मौजूदा सियासी इतिहास अब नए तरीके से लिखा जाएगा कि संसद में विपक्ष की आवाज गूंजी। दस साल तक लगा ही नहीं,कि देश में लोकतंत्र है। तभी तो लाल कृष्ण आडवाणा कहते थे,देश में अघोषित आपातकाल है। राहुल गांधी ने संसद में जिन मुद्दों की चर्चा की, उस पर दस साल तक मोदी सरकार ने बात नहीं की। किसान कानून अडाणी और अंबानी के लिए लाया गया। किसानों को मुआवजा दिलाने के लिए बनाया गया बिल रद्द कर दिया। सात सौ किसान शहीद हुए,हमने कहा किसानों के लिए दो मिनट का मौन संसद में रखा जाए। आपने कहा वो किसान नहीं आतंकवादी हैं। मणिपुर को सरकार की योजना ने हिंसा में जला दिया। पहली बार भारत के इतिहास में जनता से स्टेट छीने गए।जम्मू-कश्मीर-लद्दाख से स्टेट छीना। नेता प्रतिपक्ष ने सरकार को बीस मुद्दों पर घेर कर बता दिया कि अबकी बार मनमानी नही चलेगी। यह अलग बात है कि राहुल गांधी ने सरकार को संसद में घेरा,लेकिन उसमें से कई अंश हटा दिये गए हैं। हटाए गए हिस्सों में हिंदुओं और पीएम नरेंद्र मोदी, बीजेपी, आरएसएस समेत अन्य पर कमेंट शामिल हैं। देश में नए तरीके की इमरजेंसी - संविधान के अनुच्छेद 105(1) के तहत संदन के हर सांसद को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मिली है। हटाए गए अंश नियम 380 के दायरे में नहीं आते। राहुल गांधी को संसद में जो कहना था,कह दिया। वही सच है।अंश हटा देने से सच नहीं मिट जाएगा। बहरहाल राहुल गांधी नए अवतार मे दिखे। मोदी सरकार की संसद में बखिया उधेड़ी । उनके सवालों पर सत्ता पक्ष को संसद में सफाई देनी पड़ी। सवाल यह है,कि हरियाणा,महाराष्ट्र और झारखंड का वोटर अबकी चुनाव में क्या इंडिया के पक्ष में नयी सियासी पटकथा लिखने का मन बनायेगा।

Monday, June 17, 2024

रंग बदलता संघ

"मोदी जिनके दम पर प्रधान मंत्री बने हैं,अब वो इनकी चौकीदारी करेंगे,ताकि ये उनके सेक्यूलर काम काज को चोटिल न कर सकें।वहीं संघ प्रमुख मोहन भागवत ने गुजरात लाॅबी को निशाने पर लेते हुए सीख दी कि अहंकार से संगठन और पार्टी नहीं चलती। मर्यादा जरूरी है। बीजेपी हमें अपना रंग न दिखाए। संघ है तो बीजेपी है। बगैर संघ के बीजेपी ढाई घर चलने का सपना छोड़ दे। वरना, उसकी स्थिति मौजूदा चुनाव से भी बदतर हो जाएगी।"
0 रमेश कुमार ‘रिपु’ इन दिनों देश के सियासी कैनवास पर एक नयी तस्वीर देखी जा रही है। संघ और बीजेपी के बीच तल्खी तस्वीर। यह तस्वीर अचानक नहीं बनी। तस्वीर की रेखाएं चुनाव से पहले ही बननी शुरू हो गयी थी। केवल इंतज़ार किया जा रहा था,कि सत्ता की तस्वीर कौन सी बनने जा रही है। सत्ताई तस्वीर 2014 और 2019 जैसी होगी,या फिर कुछ अलग हटकर। मोदी ने संसद में कहा था,अबकि बार चार सौ पार। कुछ हफ्ते पहले कहा था, कि मुझे परमात्मा ने भेजा है। अब कह सकते हैं,कि चुनाव परिणाम के बाद उनके पैर जमीन पर आ गए होंगे। विपक्ष को खत्म करने की सत्ताई साजिश मोहन भागवत को रास नहीं आ रही थी। मगर चुप रहे। मोदी ने चुनाव में भाषा का संस्कार भूल कर जिस तरीके से विपक्ष पर हमला बोले ,वो संघ के संस्कार की भाषा नहीं है। जबकि प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी स्वयं संघ की पृष्ठभूमि से हैं। चौथे चरण के चुनाव के बाद बीजेपी और संघ के बीच टकराव की तलवार जे.पी.नड्डा ने यह कहकर खींच दी,कि अब बीजेपी बड़ी पार्टी हो गयी है। उसे संघ की जरूरत नहीं है। एक झटके में नड्डा ने संघ को राजनीति का पाठ पढ़ा दिये। नड्डा के बयान से भाजपा में आए नेता भ्रमित हो गए। संघ कार्यकर्ता हाथ पर हाथ धरे रह गए। और किसी ने नड्डा के बयान पर कुछ कहा नहीं। सफाई भी नहीं दी। मोहन भागवत भी जानते हैं,जे.पी.नड्डा से यह बात किसने कहलवाया है। बावजूद इसके संघ प्रमुख चुप रहे। वो यह मान कर चल रहे थे,कि सामाजिक और सांस्कृतिक जमीन को मोदी को समझेंगे। लेकिन ऐसा पूरे चुनाव में नहीं में दिखा। उसका परिणाम यह रहा,कि मोदी की गारंटी का असर कई राज्यों में नहीं दिखा। वो स्चयं बहुत कम वोटों से चुनाव जीते। जबकि उससे अधिक वोटों से गैर राजनीतिक व्यक्ति किशोरी लाल अमेठी में एक लाख 67 हजार से अधिक वोटों से चुनाव जीते। अहंकारी नहीं होते सेवक - चुनाव के बाद संघ प्रमुख मोहन के तेवर और बयान चर्चा में हैं। उन्होंने कहा,सच्चा सेवक मर्यादा का पालन करता है। उसमें अहंकार नहीं होता, कि मैंने यह काम किया है। जो ऐसा नहीं करता है,सिर्फ उसे ही सच्चा सेवक कहा जा सकता है। इसे अलोचना नहीं सकारात्मक सलाह ही कहा जाएगा। यदि मोदी तीसरे कार्यकाल में इसे नहीं भूलेंगे तो बेहतर प्रधान मंत्री साबित हो सकते हैं। वैसेे पूरा चुनाव मोदी केंद्रित था। मोदी का परिवार से लेकर मोदी की गारंटी तक के प्रचार के तरीके के आगे मोदी का चेहरा दिखा। बस अड्डे से लेकर पेट्रोल पंपों तक मोदी का विज्ञापन दिखता था। अहंकार की सीमा इतनी लांधी की रामलला की प्राण प्रतिष्ठा साधु,संत महात्मा को करना चाहिए, स्वयं की। वैसे दूसरे कार्यकाल में ऐसा लगा,कि मोदी अपने आप को नेता कम, मसीहा ज्यादा समझने लगे हैं। मोहन भागवत के बयान के कई अर्थ निकाले जा रहे हैं। उन्होंने कहा, मणिपुर में हो रही हिंसा को रोका जाना चाहिए। संघ का मुख्यपत्र आर्गनाइजर ने भी बीजेपी और पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की आलोचना करते हुए लिखा,लोकसभा चुनाव के नतीजे बीजेपी के अति आत्मविश्वासी नेताओं और कार्यकर्ताओं के लिए आइना है। अयोघ्या हारे अपने अहंकार की वजह से। मोदी ने कई अच्छे काम किये हैं। लेकिन हिन्दू -मुसलमानों के बीच दरार पैदा की। लेकिन गोरक्षा के नाम पर जो हत्याएं हुई,मुस्लिम मांस व्यापारियों,पशु पालक,किसानों की,उसकी निंदा प्रधान मंत्री मोदी ने नहीं की। अमितशाह ने धमकी भरा भाषण दिये। उन्होंने कहा, कि बांग्लादेश से अवैध तरीके से आए लोग दीमक की तरह फैल गए है।दूसरे भाषण में कहा, नागरिकता के लिए रजिस्टर बनेगा। उन मुसलमानों को देश से निकाला जाएगा जिनके पास नागरिकता साबित करने के लिए दस्तावेज नहीं होगा। संघ का ज्ञान - अटल बिहारी वाजपेयी ने सी.एम. नरेंद्र मोदी का राजधर्म का पाठ पढ़ाया था,तो इस बार संघ प्रमुख ने मर्यादा और सच्चे सेवक का ज्ञान देने का काम किया है। पी.एम. मोदी जो खुद संघ के इतने करीब रहे हैं,उनको लेकर इस प्रकार की बयानबाजी के पीछे आखिर कौन सी वजह है। या फिर किस मकसद से ऐसा कहा गया। सियासी गलियारों में ऐसे सवाल केरल में 31 जुलाई को होने वाली संघ की बैठक तक टहल कदमी करते रहेंगे। मोहन भागवत के बयान जब तक समझा जाता,संघ के कार्यकर्ता इन्द्रेश का बयान आग में घी डालने का काम किया है। जिस पार्टी ने भगवान राम की भक्ति की लेकिन अहंकारी हो गई,उसे 241 पर रोक दिया गया। जिनकी राम में कोई आस्था नहीं थी,उन्हें 234 पर रोक दिया गया। गोरखपुर में योगी आदित्यनाथ से मोहन भागवत की मुलाकात से गुजरात लाॅबी के कान खड़े हो गए हैं। ऐसा होना स्वभाविक है। इसलिए कि अमित शाह, योगी आदित्यनाथ को यू.पी.के मुख्यमंत्री पद से हटाना चाहते हैं। यूपी में हार का ठिकरा वो योगी पर फोड़ना चाहते हैं। अमितशाह के अति करीबी ओ.पी. राजभान,उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य,बृजेश पाठक और दिनेश योगी को तवज्जो देते नहीं। संघ मानता है,उप मुख्यमंत्री की जरूरत नहीं है। मौजूदा चुनाव में यू.पी.में योगी का नहीं गुजरात लाॅबी का था। अमितशाह ने 25 टिकट बांटे थे।बिसात अमितशाह ने बिछाया था। योगी को सजा क्यो मिले?दिल्ली योगी की बात सुनने को तैयार नहीं है। जबकि योगी गुलदस्ता लेकर नड्डा के घर गए।अमितशाह,राजनाथ और शिवराज के पास भी। संघ प्रमुख के मुखर होने पर अब बीजेपी का कोर कार्यकर्ता बोल रहा है। योगी आदित्यनाथ से पूछ कर टिकट नहीं दिया गया है। बीजेपी को सीट कम मिलने पर इसके लिए दोषी वो हैं,जिन्होंने टिकट बांटे। संघ की चिंता जायज - संघ को चिंता है। दस साल में बीजेपी का जो वोट बैंक बनकर तैयार हुआ है वो हरियाणा,महाराष्ट्र और झारखंड के चुनाव में बिखर न जाए। उसे संजोना है। यदि इन तीन राज्यों मे बीजेपी हार गयी तो बहुत देर हो जाएगी। फिर बिहार भी हाथ से निकल सकता है। संघ नहीं चाहता,कि राज्य दर राज्य बीजेपी गंवा दे। संघ यही मान रहा है,कि यूपी में बीजेपी की हार की मूल वजह अमितशाह हैं। मौजूदा हालात से जाहिर है,कि जिस तरह अमितशाह यू.पी. में योगी आदित्यनाथ के काम काज पर दखल दे रहे हैं,उस स्थिति में यू.पी. में चुनाव हुए तो अखिलेश को कुछ ज्यादा नहीं करना पड़ेगा। यू.पी. की 80 सीट मायने रखता है। संघ मान रहा है,कि योगी पर नकेल लगाने से यूपी हाथ से निकल जाएगा। वैसे विदर्भ और नागपुर ही नहीं, पूरे महाराष्ट्र में बीजेपी को वोट नहीं मिला। सवाल यह है, कि इसकी गारंटी कौन लेगा। कांग्रेस को 13 सीट मिली। महाराष्ट्र में बीजेपी को 14 और एनडीए को 25 सीट का नुकसान हुआ। संघ को लगता है,एक नया सियासी चक्रव्यूह रचने का वक़्त आ गया है। संसदीय दल की बैठक में राज्य के मुख्यमंत्रियों की क्या जरूरत है? गुजरात लाॅबी को इस बात का अदेशा था,कि संसदीय दल की बैठक में यदि अपने लिए संघ से निकले सांसद नया नेता न चुन लिए तो मोदी नेहरू की बराबरी नहीं कर पाएंगे।केरल में 31 जुलाई को संघ की बैठक है। जाहिर है,वहां गुजरात लाॅबी की गतिविधियां और बीजेपी की कार्यशैली सहित अनेक सवालों पर चर्चा होगी। हो सकता है,कि वहां नीतिन गडकरी को पी.एम. बनाए जाने की बात उठे। और योगी को 2029 का चेहरा बनाने की बात हो सकती है। संघ को घृणा थी राजनीति से - इतिहास के पन्ने बताते हैं,कि भारतीय समाज की कायाकल्प के लिए संघ की स्थापना हुई थी। अपने आरंभिक दिनों में संघ मानता था,कि राजनीति घृणित चीज़ है।इसलिए संघ ने अपना सारा ध्यान चरित्र निर्माण की ओर केन्द्रित रखा। समय-समय पर संघ में बदलाव होते रहे। सन् 2013 का साल संगठन में बुनियादी बदलाव का गवाह बना। अमरावती की एक बैठक में संगठन ने तय किया,कि वो बीजेपी को सियासी सत्ता दिलाने अपनी शखाओं और स्वयं सेवकों के व्यापक नेट वर्क का चुनाव में इस्तेमाल करेगा। इस बदलाव के पीछे दो मकसद था। राजनैतिक सत्ता के पाने के साथ हिन्दू समाज को संगठित करना। अपातकाल के बाद हुए चुनाव को अपवाद मानें तो संघ ने कभी किसी राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा नहीं लिया।लेकिन समय-समय पर बीजेपी और जनसंघ के भीतर पदों पर लोग तैनात किये जाते रहे हैं। बीजेपी आहिस्ता-आहिस्ता कामयाब होती गयी। और बीजेपी ने ही संघ को राजनीतिक दायरे के भीतर लाने का काम किया। संघ की मात्र इतनी भूमिका रही,कि अपने लोगों को बीजेपी के अंदर रखवाने की। सन् 2004 और 2009 की चुनावी हार के बाद संघ दखल देते हुए बीजेपी नेतृत्व परिवर्तन की वकालत की। सन् 2013 में संघ के सह सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले ने कहा,‘‘ भारत में सामजिक,राजनीतिक और सांस्कृतिक बदलाव तभी आ सकता है,जब बीजेपी सभी राज्यों की सत्ता पर काबिज हो। धीरे-धीरे बीजेपी दो दर्जन के करीब राज्यों में अपनी सरकार बना ली। बहरहाल मोदी जिनके दम पर प्रधान मंत्री बने हैं,अब वो इनकी चौकीदारी करेंगे,ताकि ये उनके सेक्यूलर काम काज को चोटिल न कर सकें। संघ प्रमुख मोहन भागवत ने गुजरात लाॅबी को निशाने पर लेते हुए सीख दी कि अहंकार से संगठन और पार्टी नहीं चलती। मर्यादा जरूरी है। बीजेपी हमें अपना रंग न दिखाए। संघ है,तो बीजेपी है। बगैर संघ के बीजेपी ढाई घर चलने का सपना छोड़ दे। वरना,उसकी स्थिति मौजूदा चुनाव से भी बदतर हो जाएगी।

Thursday, June 13, 2024

नए साथी करेंगे फेवर या दिखाएंगे तेवर

"एनडीए सरकार बनाने में फेवर करने वाले दलों के तेवर स्पीकर के चुनाव तक संयमित रहेगा,इसमें संदेह है। तोल- मोल की सरकार कितने घर चलेगी न मोदी जानते हैं ,न ही नीतिश और न ही चन्द्रबाबू नायडू। मोहन भागवत से लेकर पूरा विपक्ष इंतजार कर रहा है अपने टाइम का।" 0 रमेश कुमार ‘रिपु’ सरकार वही।चेहरे वही।मोहरे वही।पासे भी वही हैं। सिर्फ कुछ साथी नए हैं। अब बीजेपी की नहीं, एनडीए की सरकार है। सरकार का नाम बदला है। मजबूरी है। विवशता है। क्यों कि सबको साथ लेकर चलना है। सरकार बनाने में साथ देने वाले साथियों के दम पर मोदी सियासी पहाड़ चढ़ने का मन बनाए हैं। सौ दिन के सियासी एजेंडे का खाका भी खींच लिये हैं। सरकार चल पड़ी है। प्रधान मंत्री मोदी ने इसका संकेत दे दिया है। किसानों को सौगात दी। पीएम किसान सम्मान निधि की 17वीं किस्त जारी की।9.3 करोड़ किसानों को लाभ होगा और करीब बीस हजार करोड़ रुपए बांटे जाएंगे। आवास योजना के तहत 3 करोड़ ग्रामीण और शहरी घरों के निर्माण किये जाएंगे।अभी तक दस वर्षो में कुल 4.21 करोड़ घर बनाये गए हैं। चुनाव में बेरोजगारी मुद्दा छाया रहा। इसलिए रोजगार पर खास ध्यान रहेगा। बुनियादी सवाल - मगर राजनीति के कुछ बुनियादी सवाल हैं। जो 18 जून को सांसदों के शपथ के बाद 20 जून को होने वाले स्पीकर चुनाव में विपक्ष के साथ देश की नज़र है। क्यों कि प्रधान मंत्री मोदी इस बार नए अवतार में हैं। होना भी चाहिए। नए सोच के साथ खड़े हैं । उन्हें सबका साथ चाहिए। और सबका विकास करना है। मोदी के लिए 140 करोड़ लोग परमात्मा का स्वरूप हो सकते हैं। लेकिन, जिन्हें लेकर सियासी पहाड़ चढ़ना है। दूर तक चलना है। क्या वो बीस जून को चलते-चलते ठहर कर नहीं कहेंगे, कि स्पीकर तो हमारा होगा? आप ने बीजेपी सांसदों को गृह मंत्रालाय,वित्त मंत्रालय,रक्षा मंत्रालय,कृषि विभाग,परिवहन मंत्रालय दे दिया। कोई बात नहीं। सभी बड़े और सम्मानीय विभाग बांट लिये। फिर भी हम कुछ नहीं बोले। लेकिन स्पीकर भी आप की ही पार्टी का हो, ऐसा नहीं चलेगा। सियासत की ढाई चाल सिर्फ आप ही नहीं,हम भी चलना जानते हैं। राजनीतिक सीन में इंडिया गठबंधन है ही साथ, अब एनडीए के घटक दलों में नीतीश और चन्द्रबाबू नायडू भी है। इन्हें एनडीए सरकार की फिल्म में मेहमान कलाकार नहीं कह सकते। असली खेला होना बकाया है। राजनीति में कुछ सवाल ऐसे हैं,जिन्हें नज़र अंदाज नहीं किया जा सकता। उनमें से एक सवाल यह है,कि बीस जून को यदि टीडीपी नेता चन्द्र बाबू नायडू अड़ गए कि स्पीकर हमारी पार्टी से होगा, नीतीश भी यही चाहते हैं। डीटीपी ने स्पीकर का अपना उम्मीदवार उतार दिया, चुनाव करा लेते हैं। ऐसे में टीडीपी के पीछे पूरा इंडिया गठबंधन खड़ा दिखे तो कोई आश्चर्य नहीं। जदयू भी साथ हो तो हैरानी नहीं। ऐसे में बीजेपी का स्पीकर उम्मीदवार चुनाव हार गया तो पूरी एनडीए सरकार एक पल में ताश के पत्ते के महल की तरह ढह जाएगी। चन्द्र बाबू नायडू और नीतिश कुमार दोनों मोदी और अमितशाह के खेल से वाकिफ हैं। दोनों की बिसात को भी जानते हैं। यदि बीजेपी का स्पीकर हुआ तो बीजेपी को 240 से 272 होने में कोई ताकत नहीं है, जो रोक सके। सारा खेल छह माह के भीतर हो जाएगा। उनके पास हाथ मलने के सिवा कुछ नहीं बचेगा। सवाल यह भी है,कि चन्द्र बाबू नायडू क्या आन्ध्र प्रदेश को विशेष दर्जा दिये जाने की शर्त पर स्पीकर पद से पीछे हट जाएंगे। और हट गए तो इसकी क्या गारंटी है,कि उनकी पार्टी के सांसद टूट कर बीजेपी में शामिल नहीं होंगे। मोदी की गारंटी जनता को मिले या न मिले, मगर बीजेपी को बहुमत मिलने की पूरी संभावना है। पार्टी टूटने का भय - जब किसी पार्टी की सरकार बनती है,तो वैसे भी छोटे- मोटे दल सरकार के साथ बगैर न्यौता दिये मिल जाते हैं। छोटे-छोटे राज्यों के गैर बीजेपी के सांसद मिल ही जाएंगे। वो बाहर से सरकार को समर्थन देने में पीछे नहीं हटेंगे।वो चाहे केन्द्र में एनडीए की सरकार हो या फिर इंडिया गठबंधन की। बीजेपी का स्पीकर होने पर सभी को अपनी पार्टी टूटने का डर है। और कोई ऐसे वक्त का इंतजार नहीं करना चाहता। सभी को वक्त का इंतजार - मंत्रिमंडल के गठन के बाद विभाग बंटवारे को लेकर नाराजगी एनडीए में देखी जा रही है। जाहिर है,बात खुश करने की है। अखिलेश यादव वैसे कह ही चुके हैं,कि यदि किसी को खुश करने से सरकार बनती है,तो हमें खुश करने में कोई दिक्कत नहीं है। जिसे जो विभाग चाहिए ले ले। शरद पवार वक्त का इंतजार कर रहे हैं। वो एनडीए सरकर के गिरने की राह देख रहे हैं। सभी को वक़्त का इंतजार है। एक नाथ शिंदे की पार्टी शिवसेना के पास सात सांसद है। जिसे प्रधान मंत्री मोदी असली शिवसेना कहते हैं। लेकिन उनकी पार्टी से केवल एक व्यक्ति को मंत्री बनाया गया। जबकि जतिन राम माझी अपनी पार्टी के अकेले सांसद हैं,उन्हें कैबिनेट मंत्री बनाया गया है। प्रफुल्ल पटेल पिछली बार कैबिनेट मंत्री थे,इस बार उन्हें राज्य मंत्री बनाए जाने का आफर था। अजीत पवार ने कहा,सरकार चलाने का अनुभव हमारे पास है।हमें फुसलाने की कोशिश न करें। ऐसे नहीं चलेगा। लल्लन सिंह को पशुपालन विभाग मिला है। जबकि इन्हें कोई बड़ा विभाग मिलने की उम्मीद थी। जाहिर सी बात है, कि इनका सियासी अपमान किया गया है। उद्धव ठाकरे कह रहे हैं, पी.एम. के रूप में मोदी पसंद नहीं हैं। नीतिन गडकरी हों तो विचार करेंगे। यानी गुजरात मानुस और मराठा मानुस में टकराहट वाली बात है। दिल्ली अपने अनुरूप यू.पी. में राजनीति करना चाहती है। योगी को हटाना चाहती है।योगी राजनाथ,नीतिन गडकरी,और जेपी नड्डा से भी मिले।25 टिकट अमित शाह ने दिये और सीट नहीं आई तो योगी आदित्यनाथ का इसमें क्या दोष? जबकि महाराष्ट्र बीजेपी के हाथ से निकल गया है। बीजेपी सरकार के अल्पमत होने पर संघ प्रमुख मोहन भागवत ने मोदी पर निशाना साधा। जिस विचार धारा के पालने में बीजेपी पली, वही अब संघ को आंखें दिखाए,ऐसा नहीं चलेगा। मोहन भागवत ने दो टुक कह दिया। मणिपुर में पिछले कई माह से अशांति का वातावरण है। मगर उसे हल करने कोशिश नहीं की गयी।इसे प्राथमिकता में रखते हुए शांति बहाली का प्रयास किया जाना चाहिए। इस मामले में विपक्ष संसद में भी पूछता रहा,कि प्रधान मंत्री मणिपुर पर खामोश क्यों हैं? एक वर्ष से भी अधिक समय बीत गया, मगर मणिपुर में हिंसा कायम है। कुकी और मैतेई समुदाय के बीच संघर्ष चल रहा है। अपनी -अपनी चाहत - नीतीश चाहते हैं जब महाराष्ट्र,हरियाणा और झारखंड के चुनाव की घोंषणा हो तो बिहार का भी। वो जानते हैं,अब वोट बीजेपी में स्थानांतरित नहीं हो रहा है बिहार में। पिछले विधान सभा में भी यही हुआ था। विधान सभा चुनाव हो जाने पर वो स्वतंत्र हो जाएंगे। जबकि बिहार में चुनाव अगले साल होना है। नीतीश के मन का नहीं होने पर नाराजगी का ठिकरा भी फूटेगा। वैसे जेडीयू अपनी नाराजगी का संकेत देना शुरू कर दिया है। जेडीयू के प्रवक्ता के. सी. त्यागी ने अग्निवीर और यूनिफार्म सिविल कोड पर सवाल उठा दिए हैं। त्यागी ने साफ- साफ कहा,कि अग्निवीर योजना को लेकर लोगों में नाराजगी है।हमारी पार्टी इस पर विस्तार से चर्चा चाहती है। मुस्लिम आरक्षण खत्म करना,वन नेशन वन इलेक्शन,प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट में बदलाव,वक्फ बोर्ड खत्म करना,सीएए का कम्पलीट इम्प्लिमेंटेशन और यूनिफाॅर्म सिविल कोड पर जेडीयू चर्चा चाहती है। टीडीपी भी इन सभी मुद्दों पर बीजेपी के पक्ष में नहीं है। खासकर मुस्लिम आरक्षण,महिला आरक्षण,वक्फ बोर्ड को खत्म करना,प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट को खत्म करना। जाहिर सी बात है कि एनडीए सरकार बनाने में फेवर करने वाले दलों के तेवर स्पीकर के चुनाव तक संयमित रहेगा,इसमें संदेह है। तोल- मोल की सरकार कितने घर चलेगी न मोदी जानते हैं ,न ही नीतीश और न ही चन्द्रबाबू नायडू। मोहन भागवत से लेकर पूरा विपक्ष इंतजार कर रहा है, अपने टाइम का।