Sunday, June 16, 2019

काठ के घोड़े पर छाॅलीवुड

            काठ के घोड़े पर छाॅलीवुड
छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद से अब तक करीब दो से अधिक फिल्में बनीं लेकिन, बाॅक्स आफिस पर गिनती की ही फिल्में धमाल मचा सकीं। सवाल यह है कि 50 करोड़ से अधिक खर्च होने के बाद भी छत्तीसगढ़ी फिल्में अन्य भाषाओं की फिल्मों की तरह क्यों नहीं चमकीं। जबकि छत्तीसगढ़ के कई कलाकर बड़े पर्दे पर जौहर बिखेर रहे हैं।

0 रमेश कुमार ‘‘रिपु‘‘





    छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद से अब तक डेढ़ सौ से अधिक फिल्में बनीं लेकिन, बाॅक्स आफिस पर गिनती की ही फिल्में धमाल मचा सकीं। सवाल यह है कि आखिर छत्तीसगढ़ी बोली की फिल्में लगातार पिट क्यों रही हैं। जबकि भोजपुरी,बंगाली और मराठी फिल्में ना केवल जल्वा बिखेर रही हैं बल्कि बाॅक्स आॅफिस पर रिकार्ड भी बना रही हैं। छत्तीसगढ़ी फिल्म निर्माता और निर्देशकों की शिकायत है कि सरकार नहीं चाहती है कि छाॅलीवुड भी चमके। यहां के कलाकार रंगीन पर्दे पर अपनी कला का जौहर बिखरते हुए छत्तीसगढ़ का नाम रौशन करें। देखा जाए तो छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद से अब तक डेढ़ सौ से भी अधिक फिल्में बन चुकी हैं। इन दिनों छाॅलीवुड बचाओ‘ की आवाज तेज हुई है। माना जा रहा है कि मल्टीप्लेक्स आने की वजह से यह उद्योग दम तोड़ने लगा है। हालांकि भाजपा और कांग्रेस दोनों ने पिछले चुनाव में अपने घोषणा पत्र में दावा किया था कि सरकार बनी तो छत्तीसगढ़ी फिल्म विकास बोर्ड का गठन किया जाएगा। छत्तीसगढ़ राज्य बने डेढ़ दशक के बाद भी इस दिशा में सरकार ने सार्थक पहल नहीं की। निर्माता निर्देशक सतीश जैन कहते हैं,‘‘ सरकार को लगता है कि फिल्म विकास बोर्ड का गठन होने के बाद लोकप्रिय कलाकारों के राजनीति में आने से वे चुनौती बन सकते हैं‘‘।
छत्तीसगढ़ी फिल्मों के प्रमुख कलाकार पद्म श्री अनुज शर्मा कहते हैं,‘‘राज्य में अब मात्र 50-60 थियेटर बचे हैं। राजधानी में कई थियेटर टूट गए। मल्टीप्लेक्स का दौर आ गया हे। मध्य छत्तीसगढ़ में ही छत्तीसगढ़ी बोली बोली जाती है। ऐसा नहीं है कि छत्तीसगढ़ी फिल्में बाॅलीवुड की फिल्मों की तरह नहीं बनती। ग्लैमर का तड़का,आइटम साॅंग,मारधाड़,ड्रामा,मधुर धुन और सुन्दर दृश्यों से छत्तीसगढ़ी फिल्में भी लदी होती हैं बावजूद इसके, निर्माता निर्देशकांे की यह शिकायत है कि छत्तीसगढ़ के लोग ही फिल्में देखने छविगृह नहीं जाते। इस वजह से छत्तीसगढ़ी फिल्में बेबस हैं बाॅक्स आॅफिस पर रिकार्ड बनाने के लिए‘‘।़ बावजूद इसके छत्तीसगढ़ बोली की कई फिल्मों ने रिकार्ड भी बनाया है। मोर छइंया भुइंया,टूरा रिक्शा वाला,बीए फस्ट ईयर, मितान 420, महूं दिवाना, तहूं दीवानी, राजा छत्तीसगढ़िया, दूलाफा डू कुछ ऐसी फिल्में हैं जिन्हें दर्शक मिले और लोगों के बीच चर्चा में भी रहीं। ऐसी स्थिति में यह कहना गलत होगा कि छत्तीसगढ़ी फिल्में लोग देखने नहीं जाते। वहीं इससे इंकार भी नहीं है कि फिल्मों को लेकर दर्शकों का नजरिया बदला है। राजधानी रायपुर में पांच दशक पहले 14 छविगृह थे आज गिनती के ही बचे हैं। छविगृह टूट कर काम्पलेक्स में तब्दील हो गए हैं। फिल्मी दर्शक कौशलेश तिवारी कहते हैं,‘‘ छत्तीसगढ़ी भाषा में फिल्में बन रही हैं,बंद नहीं होंगी। दिक्कत यह है कि छत्तीसगढ़ी फिल्मों को टाॅकीज नहीं मिल रहे हैं। श्याम,अमरदीप और प्रभात टाॅकीज में से किसी एक छविग्रृह में छत्तीसगढ़ फिल्में लगती है। जबकि सभी छविगृहों में लगनी चाहिए‘‘।
सरकार सब्सिडी देः योगेश
छत्तीसगढ़ फिल्म एसोसियेशन के पूर्व अध्यक्ष योगेश अग्रवाल कहते हैं,‘‘दरअसल ग्रामीण इलाके में छविगृह नहीं है,जबकि साउथ के हर गांव में टाॅकीजें हैं। सिनेमा हाल जिला से पंचायत स्तर तक खुलना चाहिए। सरकार से हमारा आग्रह है कि वे हमें सब्सिडी दे और टैक्स में छूट दे ताकि हमारे लोग टाॅकीज खोल सकें। फिल्म विकास बोर्ड अब बन जाने की उम्मीद है। कलाकारों से सुझाव मांगा गया है। कलाकार चाहते हैं कि उनका बीमा होना चाहिए। छत्तीसगढ़ फिल्म उद्योग में करीब पांच हजार लोगों को रोजगार मिला हुआ है। सरकार से मदद मिलने के बाद रोजगार के और रास्ते इजाद होंगे। प्रदेश छोटा है। ढाई करोड़ की आबादी है। ज्यादातर लोग हिन्दी बोलते हैं। बावजूद इसके हमारे यहां अब पहले से अच्छी फिल्में बनने लगी हैं,मुंबई के कलाकार भी छत्तीसगढ़ी फिल्में में काम करने लगे हैं। इससे इंकार नहीं है कि   छत्तीसगढ़ी फिल्मों का भविष्य उज्जवल है‘‘।
ज्यादा फिल्मीकरण ठीक नहीं
हिट फिल्म मेकर सतीष जैन कहते हैं,फिल्में ऐसी होनी चाहिए जो लोगों का मनोरंजन करे। दर्शकों को पसंद आए। ज्यादा फिल्मीकरण कर देने से फिल्में पिट जाती हैं। भोजपुरी और मराठी फिल्मों को ओपनिंग मिलती है लेकिन छत्तीसगढ़ी फिल्मों को नहीं। छत्तीसगढ़ी फिल्मों के सबसे बड़ा स्टार अनुज हैं लेकिन, उनकी भी फिल्मों को ओपनिंग नहीं मिलती। कोई अपनी टाॅकीज में छत्तीसगढ़ी फिल्म तभी लगायेगा जब फिल्म अच्छी हो। अच्छी फिल्में बनाने वालों की कमी है। फिल्म विकास निगम बना देने से छत्तीसगढ़ी फिल्मों को कोई लाभ नहीं मिलने वाला। सरकार के प्रभाव वाले और आयोग के लोगों का ही भला होगा। 
करोड़ों रूपए दांव पर
छत्तीसगढ़ी फिल्में ‘‘कहि देबे संदेश‘‘ और ‘घर द्वार‘ को छोड़ दें तो राज्य बनने के बाद ‘‘मोर छइंया भुइंया के बाद से लगातार फिल्में बनती आ रही हैं। छाॅलीवुड जिंदा रहे इसलिए लोग फिल्में बना रहे हैं। 16 साल बाद भी छत्तीसगढ़ी फिल्म इंडस्ट्री मजबूती से खड़ी नहीं हो पाई है। जबकि बाॅलीवुड और टीवी धारावाहिक के कई स्थापित कलाकारों को लेकर फिल्में बनाई गईं और बन भी रही हैं। बावजूद इसके कामयाब फिल्में गिनती की हैं। अब तक छाॅलीवुड में 50 करोड़ से अधिक पूंजी लग चुकी हैं और करोड़ों रूपए अभी भी दांव पर हैं।
कम बजट का प्रयोग फेल
छत्तीसगढ़ के फिल्म मेकर्स को लगता है कि फिल्मों का ग्लैमर लोगों को अपनी ओर खींचता है। इसलिए नए कलाकारों को लेकर कम बजट में आसानी से फिल्म बनाई जा सकती हैं। लेकिन यह प्रयोग लगातर फेल हो रहा है। अच्छे कलाकार और अच्छी पटकथा नहीं होने की वजह से फिल्में अपनी लागत नहीं निकाल पा रही हैं। आम दर्शकों का कहना है कि जब फिल्म ही देखना है तो फिर बाॅलीवुड की फिल्में क्यों न देखें। टिकट का पैसा तो उतना ही लगना है। दरअसल फिल्म निर्माता बनने की चाह में लोग अपना पैसा छाॅलीवुड में लगा तो रहे हैं, लेकिन दर्शकों को पर्दे तक खींचने वाली फिल्में नहीं बना पा रहे हैं।   छत्तीसगढ़ी फिल्म बनाने वाले अब भोजपुरी या फिर हिन्दी फिल्मों की ओर रूख कर लिए हैं। जाहिर सी बात है कि छत्तीसगढ़ी फिल्मों को विकसित होने में अभी वक्त लगेगा।
सरकार का सहयोग जरूरी
छत्तीसगढ़ी फिल्म के निर्माता और निर्देशक मनोज वर्मा भी छत्तीसगढ़ी फिल्म की जगह स्थानीय कलाकारों को लेकर ‘पिपली लाइव’ तर्ज पर एक हिन्दी फिल्म बना रहे हैं। इनका कहना है छत्तीसगढ़ी फिल्म से ही मै पैदा हुआ हॅू, इसलिए इसे नहीं छोड़ सकता। दरअसल बाहर निकलना जरूरी था। आखिर कब तक कुंए में रहोगे। छत्तीसगढ़ी फिल्मों को सरकार का सहयोग नहीं मिल रहा है। जहां दर्शक हैं, वहां टाॅकीज नहीं हैं,जहां टाॅकीज है, वहां दर्शक नहीं है। निर्माता आखिर कब तक अपने घर का पैसा लगायेगा। दीगर भाषाओं की फिल्मों के लिए 20 सेंटर एक साथ मिला जाते हैं लेकिन छत्तीसगढ़ी फिल्मों के साथ ऐसा नहीं है। बुद्धिजीवी वर्ग छत्तीसगढ़ी फिल्म देखता नहीं और दूसरों को भी देखने से मना करता है। 50 दिन छत्तीसगढ़ी फिल्म के चलने पर ही पैसा वसूल होगा। लेकिन मुश्किल से 10 थियेटर में चलती हैं, वह भी एक सप्ताह चल जाए बहुत है। सरकार का जब तक सहयोग और सब्सिडी नहीं मिलेगी छाॅलीवुड डायलसिस पर रहेगा। यहां के कलाकारों मंे समर्पण की भावना है जिसकी वजह से छत्तीसगढ़ी फिल्में बन रही हैं। मेरी अगली फिल्म बक्शी जी के उपन्यास पर आधारित है। ’’भूलन कांदा‘‘। जिसमें चार गाने छत्तीसगढ़ी में और अन्य गाने हिन्दी में है। फिल्म में गांव का व्यक्ति शहर में आकर भीा छत्तीसगढ़ी भाषा बोलता है। गांव की मिट्टी का आदमी हूं,अपनी मिट्टी को कैसे भूल सकता हॅूं। ‘‘महूं दिवाना,तहूं दिवानी‘‘ फिल्म को यू ट्यूब पर दो लाख लोग देख चुके हैं। हर रोज मुझे 50 फोन आते हैं और फिल्म की बड़ी तारीफ करते हैं। इंटरनेट पर फिल्म देखी जाएगी तो उससे निर्माता निर्देशक को कुछ नहीं मिलेगा। लोग छविगृह जाएं और मनोरंजन करें‘‘।
फिल्म को दर्शक चाहिए
फिल्म निर्माता चन्द्रशेखर चैहान कहते हैं,‘‘ फिल्में बनाने मात्र से छाॅलीवुड का कल्याण नहीं होगा। जरूरी है कि उसे दर्शक मिलें। 16 साल से फिल्में बन रही हैं। जाहिर सी बात है कि फिल्में बनना बंद नहीं होगा, इसलिए कि लोगों में जुनून है। फिर भी छत्तीसगढ़ी भाषा के प्रति लोगों में लगाव होना जरूरी है। दर्शकों के मनांेरजंन को ध्यान में रखकर जब तक फिल्में नहंीं बनेंगी वो टाॅकीज में ज्यादा दिन नहीं चलेंगी।   भोजपुरी,मराठी और बंगाली आदि भाषाओं में फिल्में बन रहीं हैं और चल भी रही हैं,इसलिए कि सरकार का उन्हें सहयोग मिल रहा है।
छत्तीसगढ़ी फिल्में माॅल में भी चलें
फिल्म अभिनेत्री तान्या तिवारी कहती हैं,छत्तीसगढ़ी फिल्मों के लिए दर्शक के साथ सेंटर का अभाव है। पटकथा और निर्देशन अच्छा होने पर ही फिल्में चलती हैं। छत्तीसगढ़ी फिल्मों के प्रचार प्रसार से अधिक जरूरी है इस भाषा का प्रचार। सरकार को चाहिए कि माॅल में चलने वाली फिल्मों के लिए ऐसी व्यवस्था करे कि चार शो में एक शो छत्तीसगढ़ी फिल्म का हो। फिल्में लगातार फ्लाप होती हैं तो माहौल पर असर पड़ता है। फिर भी लगातार फिल्में बनती रहेंगी तो सुधार होगा। छत्तीसगढ़ी फिल्मों में सबसे बड़ी खामी यह है कि भूमिका के अनुसार कलाकारों का चयन नहीं किया जाता। रूपए बचाने के चक्कर में नए कलाकारों को ले लिया जाता है। नए कलाकारों को यदि अवसर ही देना है तो उन्हें ऐसे कलाकारों के साथ काम करने का अवसर दें जिनके साथ वे अपने आप को समायोजित कर सकें और पात्र को पर्दे पर जीवंत बना सकें। नए कलाकारों को उम्दा तरीके से लाॅच किया जाना चाहिए। चैकानी वाली बात यह भी है कि जो निर्माता हैं वहीं फिल्म का हीरो भी बन जाता है। वह ही तय करता है कि फिल्म में कौन नायिका होगी और कौन कौन कलाकार। जबकि फिल्म की पटकथा के अनुसार कलाकारों का चयन होना चाहिए‘‘।

संस्कृति विभाग के निदेशक आशुतोष मिश्रा कहते हैं,‘‘छत्तीसगढ़ी फिल्में चलें और छाॅलीवुड ंिजंदा रहे, ऐसी सरकार की भी मंशा है। छत्तीसगढ़ी फिल्म विकास बोर्ड के लिए काफी काम हो चुके हैं। ड्राफ्ट आदि तैयार हो गया है। संस्कृति विभाग कलाकारों को प्रोत्साहन देते आया है। उम्मीद है आने वाले समय में और भी अच्छे काम इस दिशा में होेंगे और छाॅलीवुड से जुड़े कालाकारों को लाभ मिलेगा। हाल ही में सलहाकार समिति की बैठक बुलाई गई थी। विचार किया जा रहा है कि बोर्ड क्या काम करेगा। अगली बैठक में संभवतः कुछ ठोस नतीजे आने की उम्मीद है‘‘।
फिल्मों की सफलता के लिए आज बड़े बजट की फिल्म का टेंªड चल निकला है। ऐसा भी नहीं है कि छत्तीसगढ़ी फिल्म के निर्माताओं ने भव्य फिल्में नहीं बनाई। लेकिन भव्य फिल्मों का टेंªंड ‘झन भूलो मां बाप ला‘‘ फिल्म से खत्म हो गया। छोटे बजट की फिल्मों का दौर आया। इस दौर में कुछ फिल्में चली तो फिर छोटे बजट की फिल्मों की बाढ़ आ गई। नतीजा दर्शकों ने नकारना शुरू कर दिया। फिल्म राजा छत्तीसगढ़िया,और मया को दर्शकांे का अच्छा प्यार मिला। लेकिन कम बजट की फिल्मों में उम्दा कलाकार और पटकथा लेखक अच्छे नहीं होने से फिल्में दम तोड़ने लगीं। जाहिर है कि छत्तीसगढ़ी फिल्मों के लिए आगे, अभी और कठिन डगर है।


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