Wednesday, July 17, 2019

चौरसिया से अलग है मेरा अंदाज

       प्रसिद्ध बांसुरी वादक रोनू मजूमदार से बातचीत

  चौरसिया  से अलग है मेरा अंदाज


संगीत की दुनिया में बांसुरी की मिठास तब तक नहीं घुलती,जब तक पं. नरेन्द्र नाथ मजूमदार (पं. रोनू मजूमदार) का नाम न लिया जाए। दिल के समुंदर की अनंत गहराइयों में उतर कर रोनू मजूमदार की उंगलियां जब बांसुरी के छह छिद्रों पर सात सुरों का खेल खेलती हैं तो ऐसा लगता है कि हवाएं थम गई हैं। सुर की गंगा भागीरथ की तपस्या को देखने के लिए फिजाएं घ्यानस्थ हो गई हैं। बांस के इस अदने से वाद्य पर रोनू जब सांसों का मंत्र फंूकते हैं तो,लगता है जैसे इस धरा पर स्वयं कन्हैया उतर आए हैं। जिसके तहत सुरों ने देह धारण कर ली हो राग-रागिनी गोप -गोपियां बनकर गरबा कर रही हों। जबकि बांसुरी से सुर की गंगा निकालने वाले रोनू कहते हैं कि ,‘‘ मै तो कृष्ण नहीं हॅू,उनका आशीर्वाद हूूं। संगीत जगत से जुड़ी कुछ ऐसी बातें पं. रोनू मजूमदार ने बड़ी बेबाकी से कही। उनसे हुई बातचीत के प्रमुख अंश-
0 रमेश कुमार ‘‘रिपु‘‘

0 श्री कृष्ण की बांसुरी से लेकर रोनू मजूमदार तक की बांसुरी में क्या बदलाव आया है?
00 बांसुरी के मूल ढांचे में कोई बदलाव नहीं आया। कल भी बांस की बांसुरी से सुर निकलते थे, आज भी निकलते हैं। तान वही है,आवाज वही है और दीवाना बना देने वाली इसमें मधुरता भी है। आज भी इसमें सुनने वालों को अपनी ओर खींच लेने की कशिश है। ताकत है। यदि कुछ बदला है तो बस इसके बजाने का अंदाज। पं. हरिप्रसाद चैरसिया का अलग अंदाज है और मेरा अलग है। कुछ दूसरे अंदाज में भी बजाते हैं।
0 शंख बांसुरी क्या है और इसे बजाने का ख्याल कैसे आया।
00 बात 1988 की हैै। मास्को फेस्टिवल में पं. रविशंकर जी के आर्केस्ट्रा में हम लोग अपने साज बजा रहे थे। तब मेरे दिमाग मे शंख बांसुरी का ख्याल आया। मुझे लगा कि पंडितजी का सितार जिस आरोह-अवरोह पर जा रहा है,पंडित विश्वमोहन भट्ट अपनी वीणा से जिस गहराई को छू रहे  हैं,वहां तक बासुंरी क्यों नहीं पहुंच रही है। तब मैने बासंुरी का आकार को बड़ा करने का फैसला किया और शंख बांसुरी बनाई। 1994 में उसे बजाया और माचिस फिल्म के साथ शंख बांसुरी को ख्याति मिली।
0 क्या वजह है कि बांसुरी लोगों को मोह लेती है,इसके बावजूद इसे उतनी ख्याति नहीं मिली,जितनी कि अन्य वाद्य यंत्रों को?
00 यह बात सच है कि बांसुरी को उतनी लोकप्रियता नहीं मिल पाई है,जितनी मिलनी चाहिए थी। भारतीय परंपरा में बांसुरी पहले से जुड़ी हुई है। जितनी लोकप्रियता तबला और सितार आदि को मिली है,उतनी लोकप्रियता बांसुरी को नहीं मिल पाई है। बांसुरी अभी विकास की प्रक्रिया में है। फिर यह कलाकार की साधना पर निर्भर करता है कि वह संगीत की किस विधा में किस ऊंचाई तक जा सकता है। जब तक बिस्मिल्ला खां साहब ने शहनाई को हाथ नहीं लगाया था,वह शादी-ब्याह में बजाया जाने वाला वाद्य यंत्र था। उन्होंने उसे नई ऊंचाई दी। सितार और तबले को एक ही समय में एक से अधिक बड़े कलाकारों ने साधा और उन्हें लोकप्रियता दी। सितार पर रविशंकर, विलायात खां, निखिल बनर्जी,रईस खां और अब्दुल अलीम जाफर खां ने कमाल दिखाया, तो तबले पर अल्ला रक्खा खां,किशनजी महाराज,पं.अनोखेलाल जैसी धुरंधर प्रतिभाएं एक साथ अस्तित्व में रहीं। जो बचा,उसे जाकिर हुसैन ने कर दिखाया। बांसुरी के साथ ऐसा नहीं हुआ। यही वजह है कि बांसुरी और सरोद दुनिया में ख्याति के मामले में तीसरे क्रम पर रह गए। बांसुरी विकास की प्रक्रिया में है।
0 बांसुरी कब शास्त्रीय संगीत की धरातल पर कदम रखा?
00 बात 1932 से 1950 के बीच की है। जब पं. पन्ना लाल घोष ने पहली बार इसे शास्त्रीय संगीत में बजाया और प्रतिष्ठा दी। 1960 में उनकी असमय मृत्यु हो गई। 1965 में पं. हरिप्रसाद चौरसिया ने उनके काम को आगे बढ़ाया। मेरे गुरू पं. विजय राघव राव ने भी इस दिशा में पर्याप्त काम किए।
0 ऐसे कौन से राग हैं जिन्हें मुरली पर नहीं बजाया जा सकता।
00 निश्चय ही एैसे कुछ राग है जिन्हें मुरली पर बजाना सहज नहीं है। विहाग,मालकोंस जैसे राग को बांसुरी पर साधाना काफी कठिन है। छह छिद्रों में 12 स्वर निकालना कोई आसान काम नहीं है। इसमें जितनी रेंज है,उनती और किसी वाद्य यंत्रों में नहीं है। यह पेसिंल जितनी छोटी है तो, शंख बांसुरी जितनी बड़ी भी है। इसमें किसी भी संगीत में समा जाने की पूरी क्षमता है। जैसे सारंगी और वायलिन पर गायकी आसान नहीं है। उसी तरह बांसुरी में इन रागों को साधना आसान नहीं है।
0 कहते हैं कि श्री कृष्ण जब बांसुरी बजाते थे,तो गोप-गोपियां और जंगल के पशु पक्षी दौड़े चले आते थे। आखिर वह सम्मोहन क्यों नहीं दिखाई पड़ता है?
00 श्री कृष्ण लीलाधारी हैं। उनकी बराबरी करना या सोचना ठीक नहीं है। मै कृष्ण तो हॅू नहीं,केवल कृष्ण का प्रसाद हॅू। आज भी बांसुरी मंे वह सम्मोहन,वह ताकत है, वह कशिश है,जिसे सुनकर लोग बरबस खिंचे चले आते हैं। उसका आकर्षण खत्म हो गया है,ऐसा नहीं कह सकते। हां,यह बात अलग है कि उसे सुनने का अंदाज बदल गया है।
0 आज के संगीत और संगीतकार के संदर्भ में आप क्या कहना चाहेंगे।
00 जहां तक आज के संगीतकारों की बात है,सिर्फ अच्छी धुन बना लेना ही काफी नहीं है। संगीत निर्देशक के भीतर गीत,संगीत दोनों एक साथ बजने चाहिए। एक हिस्सा निकाल दिया जाए,तो श्रोताओं को लगे कि कुछ अधूरा है,कुछ छूट गया है। आजकल शास्त्रीय संगीत के मुकाबले ऐसा पाॅपुलर संगीत ज्यादा चलता है। शास्त्रीय संगीत सुनने के लिए श्रोताओं को मानसिक तैयारी करनी पड़ती है। ‘फोक फार्म’जीवन में ज्यादा घुला मिला है। इसलिए ज्यादा स्वीकृत है। कई बार मंच पर जमने के लिए ‘फोक‘ का ही सहारा लेना पड़ता है।
0 फास्ट फूड और फास्ट लाइफ के दौर में क्या फास्ट संगीत का जीवन में होना जरूरी है?
00 संगीत फास्ट फूड नहीं है। यह दिल से सुना और बजाया जाता है। फास्ट लाइफ में युवा वर्ग किसी चीज को बहुत गहराई से अपनाने के लिए उत्सुक नहीं है। लेकिन शास्त्रीय संगीत के प्रति उनके मन में जिज्ञासा का भाव फिर भी रहता है। यही वजह है कि वे बड़ी संख्या में संगीत सभाओं में जाते हैं। संगीतकार को जमाने के साथ कदम ताल मिलाकर चलना ही पड़ता है। रीमिक्स को मै बुरा नहीं मानता और न फ्यूजन को,बशर्ते वह सही ढंग से किया गया हो।
0 आज फ्यूजन का प्रयोग काफी बढ़ गया है,इससे क्या सगीत की आत्मा जिंदा रहेगी?
00 यदि रीमिक्स और फ्यूजन का प्रयोग समझदारी के साथ हो,तो वह किसी को बुरा नहीं लगेगा। रीमिक्स में इस बात का ध्यान रखा जाए कि जो कुछ उस समय नहीं किया जा सका था,उसका भी इसमें समावेश करके इसे एक नया अयाम दिया जाए,तो भला किसे एतराज होगा? फ्यूजन जन रूचि को ध्यान में रखकर किया जाने वाला एक सहज साधारण प्रयोग मात्र नहीं है। यदि गंभीरता पूर्वक,विवेक के साथ फ्यूजन को अहमियत दी जाए तो,संगीत को समृद्ध बनाने में सहायक सिद्ध होगा। लेकिन फ्यूजन का प्रयोग करने वाले ऐसे कितने संगीतकार है, जिन्हें माइनर काड्र्स के साथ कोमल गंधार वाले रागों की भी समझ है?जमाने के साथ कदम ताल मिला के चलने क लिए ही मैने भारतीय संगीत के साथ पाश्चात्य संगीत का विधिवत अध्ययन किया है।
0 मंच पर आप जब बांसुरी वादन की एकल प्रस्तुति करते हंैं,तो किन बातों का ध्यान रखते हैं?
00 मंच पर एकल बांसुरी वादन के समय स्वरों की मार्मिकता,रागों की प्रकृतिगत शुद्धता,समय,सिद्धांत एवं तालों के लयात्मक गुणों का पूरा ध्यान रखना पड़ता है। लेकिन जब फिल्म,रीमिक्स या फ्यूजन अलबम के लिए संगीत तैयार करना होता है तो,उस विचारधारा का संगीत के जरिए रेखांकित करने का पूरा प्रयास करता हॅू,जो कथानक का विषय होता है।
0 कार्यक्रम प्रस्तुत करते समय क्या कभी एकाग्रता भी भंग हुई है?
00 मुस्कुराते हुए.. । मत पूछिए.. कई बार ऐसे क्षण आते  है। उस समय केवल प्रभु से प्रार्थना और योग साधना काम आती है। कई श्रोता ऐसे भी होते हैं,जो कि बीच में कुछ दूसरा सुनाएं की फरमाइश कर बैठते हैं। ऐसे में बहुत मुश्किल होता है। कलाकार कुछ नई चीज सुनाना चाहता है और श्रोता है कि अपनी बात पर अड़ जाता है। उसकी पसंद का भी ध्यान रखना पड़ता है। माहौल न बिगड़े,इस बात का विशेष ध्यान रखना पड़ता है।
0 तालियों की गड़गड़ाहट के बीच कैसा महसूस करते हैं।
00 तालियों की गड़गड़ाहट ही कलाकार के लिए एक ऐसा नशा है जो,उसके भीतर उत्साह का संचार करता है और जीवन मंे बेहतर करने के लिए उद्वेलित करता है। ये भी सच है कि तालियों की गड़गड़ाहट से किसी भी कलाकार की भूख शांत नहीं होती और न ही उसकी जरूरतें पूरी होती है। बावजूद इसके जीवन में तालियों की गड़गड़ाहट भी जरूरी है।
0 आपने कई फिल्मों में संगीत दिए हैं। क्या कभी व्यावसायिक दबाव के लिए समझौता करने की भी स्थिति आई है।
00 हिन्दी फिल्मों के अतिरिक्त मराठी फिल्मों में भी संगीत दिया है। लेकिन अभी तक तो ऐसी स्थिति नहीं आई कि व्यक्तिगत स्वार्थ के चलते या फिर व्यवसायिकता के चलते किसी तरह का समझौता करना पड़ा है। किसी भाव को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाना मकसद होता है,तो मै इसे एक चुनौती के रूप में काम करता हॅू। आखिर हर व्यक्ति की तरह कलाकार की भी अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है।
0 आप अपनी बात किस तरह प्रमाणित करेंगे?
00 कलाकार को अपनी बात प्रमाणित करने के लिए कोई प्रमाण देना पड़े यह जरूरी नहीं है। इसलिए कि उसका काम ही प्रमाण है। मेरा यह सौभाग्य है कि भारत रत्न पं. रविशंकर और संगीत निर्देशक स्व. आर.डी बर्मन के साथ कई वर्षांे तक काम किया है। मै समझता हॅू कि व्यावसायिकता के बावजूद कोई भी संगीतकार शायद ही समझौता करता होगा। मुगल-ए-आजम का संगीत सुनें,तो आप पाएंगे कि इस फिल्म  का केवल गाना ही नहीं,हर धुन मुगलिया सल्तनत का प्रतिनिधित्व करती सुनाई देती है। इसी तरह सत्यजीत रे की फिल्म ’’पांचाली‘‘ का संगीत फिल्म निर्देशक की सोच को आगे बढ़ाता है। मै समझता हॅू कि किसी भी संगीत निर्देशक की सार्थकता और उसकी सफलता इसी में है कि वह उस फिल्म के निर्माता,निर्देशक,लेखक और कथानक के मर्म को समझते हुए आगे बढ़े और सहयोग करे। केवल कानों को अच्छी लगने वाली धुन बना देने भर से संगीतकार की जवाबदारी पूरी नहीं हो जाती। संगीत ऐसा हो कि सुनने वाले को लगे कि यदि इसके एक सुर को भी इधर से उधर कर दिया जाए तो उसमें मधुरता नहीं हर जाएगी।
0 क्या आपको आने वाली नई पीढ़ी में बांसुरी वादन को आगे बढ़ाने की संभावनाएं नजर आती है?
00 किसी भी कलाकार के बाद कोई भी कला मरती नहीं है। कई कलाकार है,जिनमें अकूत प्रतिभा है और जो अपने साथ बांसुरी को ऊंचाई प्रदान कर सकते हैं। यदि वह ऐसा नहीं करेंगे,तो लोग उन्हें जानेंगे कैसे? रूपक कुलकर्णी,नित्यानंद जी,हल्दीपू,राकेश चौरसिया जैसे कुछ कलाकार हैं,जो बांसुरी पर काम कर रहे हैं,जो कि संभावनाओं से भरे हुए हैं।


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