Wednesday, July 17, 2019

चढ़ने लगी खुशियों की धूप

         
आधी दुनिया ने दुनिया बदलने की ठानी तो कचरे के ढेर की जगह अब फूलों का उद्यान बन गया। नक्सल प्रभावित गांवों के लोगों ने प्रशासन से सड़कें मांगी। नहीं मिली तो पहाड़ का सीना चीरकर अपने लिए सड़कें बना ली। माओवादियों की सोच बदली तो लाल गलियारे का फैलाव रूका। धीरे धीरे बस्तर करवट बदलने लगा। विकास की सुगंध फैली तो गांव की अटारी में खुशियों की धूप भी चढ़ने लगी है।

0 रमेश कुमार ‘‘रिपु‘‘
                   छत्तीसगढ़ का जिला अंबिकापुर बदल गया है। सिर्फ शहर ही नहीं बदला है बल्कि, यहां की आबो हवा भी बदल गई। किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि चंद महिलाएं अंबिकापुर की पहचान बदल देंगी। कुछ जागरूक महिलाओं ने एक ऐसे काम का बीड़ा उठाया जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। अंबिकापुर के प्रवेश द्वार पर करीब 15 एकड़ की जमीन पर कचरे का पहाड़ था जो बढ़ता ही जा रहा था। इसी के साथ दुर्गंध भी। लेकिन कोई उसे हटाने की बात नहीं करता था। सत्यमेय जयते टी.वी सीरियल ने महिलाओं की सोच ही बदल दी। निकल पड़ी कुछ महिलाओं की टोली। कचरा सड़कों पर न फेंके,हमें सौंप दें,हम रोज आपसे कचरा ले लेंगी। उन्हें आइडिया मिला टी.वी से कि यदि कचरे में शामिल प्लास्टिक,लोहा,कागज,इलेक्ट्रानिक सामान आदि की छटनी कर उन्हें बेचा जाए तो आमदनी भी हो सकती है,साथ ही शहर भी स्वच्छ रहेगा। फलों के छिलके,बचे हुए भोजन आदि को अलग कर पशुओं कों दे तो उनका पेट भी भरेगा और गाय,भैंस दूध भी देंगी। जागरूक महिलाओं ने सबसे पहले इसकी शुरूआत कुछ वार्डो में की। चमत्कारी परिणाम आने पर हर वार्ड में महिलाओं ने ठोस अपशिष्ठ प्रबंधन केन्द्र खोल दिया। इतना ही नहीं अब 15 एकड़ की जमीन पर कचरे की ढेर की जगह एक सुन्दर उद्यान है। फूलों की महक लोगों को लुभा रही है।
महिलाओं और शासन के सम्मलित प्रयासों का ही यह कमाल है कि आज वार्ड का हर पार्षद अपनी निधि से हर घर में दो, दो डस्टबीन उपलब्ध करा दिया है। एक नीला और दूसरा लाल। नीला सूखे कचरे के लिए और लाल ऐसे कचरे के लिए जिसमें सड़न की संभावना है। महिला समूहों के काम को सम्मान मिल रहा है। और सभी कह रहे हैं कचरे से सोना निकल रहा है और लोकसुराज की तस्वीर महिलाओं ने गढ़ दिया। इसे सेनेटरी पार्क कहा जाता है। स्वच्छ अंबिकापुर मिशन सहकारी मर्यादित समिति ने एक फेडरेशन बनाया है। 39 समूह है। जिसमें 410 सदस्य हैं। इसकी अध्यक्ष श्रीमती शशिकला सिन्हा कहती हैं,‘‘पूर्व कलेक्टर रितु जी ने सत्य मेव जयते के श्रीनिवासन सर को यहां बुलाकर उनसे महिलाओं को प्रशिक्षण दिलाया। बात 2015 की है।उसके बाद से ही स्वच्छ अंबिकापुर की दिशा में महिलाओं ने आगे हाथ बढ़ाया। महिलाएं जब घर को व्यवस्थित कर सकती हैं तो फिर अपने शहर को क्यों नहीं। बस इसी सोच को मुकम्मल करने की हमने ठानी। अब इसे कोई भी गंदा शहर नहीं कहता‘‘। समिति की सचिव नीलम बखला कहती हैं,‘‘नगर निगम से हमें कचरा एकत्र करने का रिक्शा मिला है। हर रिक्शे के साथ तीन चार महिलाएं होती हैं। पूरे शहर में अलग अलग सेंटर बनाए गए हैं। घर घर जाकर कचरा एकत्र करने के बाद उसे छांटा जाता है। उसमें से प्लास्टिक,लोहा आदि अलग किया जाता है। ताकि कचरे का निष्पादन ठीक से किया जा सके’’।
और जिन्दगी गुलाबी हो गई
अंबिकापुर की गीता कभी सपने में भी नहीं सोची थी कि एक दिन उसकी जिन्दगी भी गुलाबी हो जाएगी। इसलिए कि दो बच्चों की गीता के पति की अचानक मौत हो जाने से उसकी किस्मत में आंसू के सिवा कुछ रह ही नहीं गया था। हर दिन एक ही ख्याल इस बद्तर जिन्दगी से तो मर जाना ही अच्छा है। लेकिन बच्चों का भविष्य संवारने की उत्कंठा से वह चल पड़ी। लोगों ने उसका उत्साह बढ़ाया और वह मनिहारी का सामान साइकिल पर लेकर निकल पड़ी। रोटी का इंतजाम होने लगा। सिलाई आती थी,एक दुकान खोल ली। एक दिन वह भी जल गई। फिर गीता सड़कों पर। हिम्मत नहीं हारी। उसे पता चला कि यदि कोई महिला फोरव्हीलर चलाना चाहती है तो सरकार प्रशिक्षिण देती है। गीता ने सोचा सीखने में क्या बुराई है। वह ड्राइवरी सीख ली। प्रशिक्षण के दौरान ही उसे पता चला कि प्रशिक्षित महिला वाहन फायनेंस कराना चाहे तो सरकार मदद करती है। गीता ने आटो फाइनेंस करा लिया और गुलाबी जैकेट पहनकर आटो के साथ रेलवे स्टेशन जा पहुंची। इस समय गुलाबी जैकेट पहनें 22 महिलाएं आटो चला रही हैं। तारा प्रजापति भी गुलाबी जैकेट में और उनके पति खाकी जैकेट में। कई महिलाएं टेªक्टर भी चला रही हैं। वे अपने हुनर का इस्तेमाल खेती में कर रही हैं। कलेक्ट्रेड में तीन महिलाओं ने सायकल स्टैंड का ठेका ले लिया है। नग्मा कहती हैं,अच्छा लगता है जब लोगों से सुनती हॅू कि ठेकेदारी में भी महिलाएं सफल हो गई हैं। कलेक्ट्रेड में वाहन पार्किग का ठेका श्रीमती अंजुम बानों के पास है।
जहां चाह,वहां राह
नक्सल प्रभावित बस्तर के जगदलुपर मुख्यालय से 70 किलोमीटर दूर लोहंडीगुड़ा जनपद के तहत ककनार से होकर पुसपाल और कोरली गांव पहुंच विहीन इलाके में आते हैं। लोहंडीगुड़ा विकासखंड नक्सल प्रभावित इलाका होने के चलते अतिसंवेदनशील इलाका है। यहां घाटी के नीचे दो ग्राम पंचायत ककनार और चंदेला ब्लॉक मुख्यालय से 25 किमी की दूरी पर बसे हैं। यहां पहुंचने के लिए पहाड़ी रास्ता ही एकमात्र रास्ता है। ग्राम पंचायत ककनार के पुसपाल गांव में आने,जाने के लिए पहाड़ी मार्ग के अलावा और कोई रास्ता नहीं था। प्रशासन और सरकार से कई बार मांग की गई लेकिन किसी ने भी नहीं सुनी तो ग्रामीण खुद ही जुट गए पहाड़ तोड़ने में। आजादी के इतने वर्ष के बाद भी शासन,प्रशासन यह कभी जानने की कोशिश नहीं किया कि पुसपाल और कोरली गांव के ग्रामीणों की जरूरत क्या है। ग्रामीणों के पहाड़ तोड़कर रास्ता बनाए जाने की खबर स्थानीय विधायक दीपक बैज को लगी तो वे मौके पर पहुंच कर ग्रामीणों का हौसला अफजाई किया साथ ही ग्रामीणों को बधाई देते हुए मार्ग के मुरमीकरण के लिए एक लाख रुपए देने की घोषणा की। गौरतलब है कि कुछ महीने पहले भी लोहंडीगुड़ा ब्लॉक के सैकड़ों ग्रामीणों ने भेजा और सालेपाल में भी इसी तरह पहाड़ तोड़कर सड़क बनाया था। इलाके में अब तक का ये तीसरा मामला है, ग्रामीणों ने स्वस्फूर्त इस तरह का कदम उठाया है। अब ग्रामीणों को इन्द्रवती नदी और पहाड़ियों को पार करके चंदेला एवं ककनार नहीं जाना पड़ेगा। अब वे सीधे परोदा पहुंच कर सीधी सड़क पकड़कर ब्लाक मुख्यालय लोहंडीगुड़ा पहुंच जाएंगे। लौहंडीगुड़ा जनपद के सी.ई.ओ अनिल टोम्बरे कहते हैं,ग्रामीण  सड़क बनाने की मांग को लेकर आए थे,लेकिन जहां सड़क बनाने की बात कर रहे थे,वह क्षेत्र वन विभाग का है। इसलिए समस्या आ रही थी‘‘। गांव के मोहन भगत बघेल ने बताया कि पिछले साल बारिश में गांव के चंदरू की तबियत खराब होने पर लौहंडीगुड़ा अस्पताल ले जाने के लिए निकले लेकिन पहाड़ी रास्ता होने की वजह से भारी दिक्कतें आईं। इन्द्रावती नदी उफान पर थी। गांव टापू में तब्दील हो चुका था। करीब नौ घंटे तक पेडों़ और चट्टानों के बीच रहकर गुजारना पड़ा। चंदरू दर्द से छटपटाता रहा। नदी का पानी उतरने के बाद ही अस्पताल पहुंचे। चंदरू की घटना ने हम सभी की आॅखें खोल दी। गांवों वालों ने मिलकर पहाड़ तोड़कर सड़क बनाने का निर्णय लिया। और पुसपाल और कोरली के करीब 130 परिवार सड़क बनाने के लिए जुट गया। सबने हाथ बढ़ाया और देखते ही देखते तीन किलोमीटर तक की सड़क बन गई। प्रशासन के पास जाकर गिड़गिड़ाने से मुक्ति मिल गई। प्रशासनिक अमला इसका डामरीकरण कर दे तो हमेशा के लिए रास्ता सुगम हो जाएगा।
एजूकेशन हब में तब्दील बस्तर
छत्तीसगढ़ के बस्तर में एक दशक पहले जिन्दगी आसान नहीं थी। नक्सल प्रभावित जिलों में शाम ढलते ही घरों के दरवाजे बंद हो जाया करते थे। माओवादियों के बूटों की आहट और गोलियांे की धमक से गांव हमेशा दहशतजदा रहते थे। लेकिन अब घुर नक्सली क्षेत्रों में खुशियांे की धूप चढ़ने लगी है। माओवादियों ने बस्तर के सैकड़ों स्कूलों को बम से ध्वस्त कर दिए थे। इसलिए कि बच्चे अशिक्षित रहेंगे तो उन्हें आसानी से दिगभ्रमित करके माओवादी बना सकेंगे। लेकिन रमन सरकार ने बच्चों केा शिक्षित और जागरूक करने के लिए नए स्कूल खोले। बस्तर कोे घोर नक्सली जिला नारायणपुर के गरांजी में 70 एकड़ में एजुकेशन हब, इसमें केन्द्रीय विद्यालय, माॅडल स्कूल, आदर्श बालक-बालिका स्कूल है। बीजापुर में 741 प्राइमरी,178 माध्यमिक और 27 हायर सेकंडरी स्कूल के साथ पाॅलीटेक्निक, दो काॅलेज के जरिए शिक्षा की ज्योति जल रही है। बस्तर के हर जिले में लाइवलीहुड काॅलेज खोल कर एजूकेशन हब में बस्तर को तब्दील किया। जिसका जिक्र प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी अपने भाषण में अक्सर किया करते हैं। इस समय प्रदेश के 27 जिलों में लाइवलीहुड काॅलेज है।
एक द्रोणाचार्य ऐसा भी
नक्सली क्षेत्र के युवा गुमराह होकर बंदूक उठाकर माओवादी न बन जाए इसकी चिंता अब हर घर में रहती है। गांवों वालों की तरह आर. डी. ए. के सीईओ महादेव कावरेे को भी है। बीजापुर जिले के छोटे से गांव बोरजे से निकलकर आईएएस बनने वाले महादेव कावरे अपने घर में ही 40 बच्चों का शिक्षा दे रहे हैं। इतने ही बच्चों का कॅरियर भी संवार चुके हैं। डिप्टी कलेक्टर महादेव कावरे का अब प्रमोशन हो गया है लेकिन गांवों वाले नहीं चाहते कि वे यहां से जाएं। वे बताते हैं कि गांव के प्राइमरी स्कूल में पढ़ने के दौरान नक्सलियों ने सरपंच की हत्या कर दी थी। सरंपच के दोनों बच्चे भी उनके साथ ही पढ़ते थे। इस घटना ने उनकी सोच बदल दी। उन्होनें ठाना कि चाहे कुछ भी हो जाए गांवों के युवाओं और बच्चों को माओवादी नहंीं बनने दूंगा। डिप्टी कलेक्टर बनने के बाद से वे लगातार युवाओं को मार्गदर्शन देते आ रहे हैं और बच्चों को अपने ही घर में शिक्षा दे रहे है। गांवों वाले उनकी सुरक्षा के लिए रात रात भर जागते हैं ताकि माओवादी उन्हें
लाल गलियारे से की तौबा
समाज की मुख्यधारा से जुड़ने की यह इच्छा शक्ति ही है कि अब लाल गलियारे से लोग ऊब कर स्वेच्छा से माओवादी सरेंडर करने लगे हैं। बस्तर के साथ खुद को भी बदलने की धारणा की वजह से अब माओवादियों के खिलाफ पूरा बस्तर मुखर होने लगा है। उनके खिलाफ धरना,प्रदर्शन,रैली और आम सभा होने लगी हैं। सरेंडर करने वाले माओवादी स्वयं पुलिस का सहयोग कर रहे हैं। यही वजह है कि लाल गलियारे में भी अब बनने लगी है समृद्धि की सड़कें। नेशनल हाइवे 63 गीदम से बीजापुर तक 88 किलोमीटर सड़क,भोपालपट्टनम तक निर्माण हो रहा है। इन्द्रावती नदी पर 26 पिलर के जरिए बीजापुर से जगरगुंडा की ओर सड़क आ रही है। 50 किलोमीटर तक बन गई है। यह चैकाने वाली बात है कि जगरगुण्डा की ओर जा रही सड़क के निमार्ण के दौरान अरनपुर थाने से कोंडासावली तक के हिस्से में पिछले पांच छह माह में 75 आईईडी मिल चुके हैं। बस्तर की जमीन में जगह जगह माओवादी बारूद बिछा रखे हैं। बावजूद इसके सड़कें बन रही हैं। थाना तोंगपाल क्षेत्र के ग्राम कासनपाल के विद्यालय में गत दिनों दो सौ से अधिक माओवादी और उनके समर्थकों ने सरेंडर किया। माह अक्टूबर तक नौ सौ माओवादी सरेंडर कर चुके हैं,वहीं 109 नक्सली मारे जा चुके हैं। वहीं बस्तर के आई जी एस.आर.पी.कल्लुरी दावा करते हैं कि 2018 तक बस्तर को नक्सल मुक्त कर देंगे। 
बन गया सबका आदर्श रायखेड़ा
जिद करो दुनिया बदलो वाली बात को चरितार्थ किया है रायपुर से 38 किलोमीटर दूर तिल्दा तहसील का गांव रायखेड़ा। जो अब सभी गांवों के लिए आदर्श गांव बन चुका है। स्वच्छ भारत अभियान में यह गांव पूरी तरह क्लीन हुआ। 20 महिला स्वसहायता समूह और फिर पुरूषों ने भी खुले में शौच के खिलाफ ऐसी जागरूकता छेड़ी कि खुले में शौच से यह गांव मुक्त हो गया। इतना ही नहीं पूरा गांव कम्प्यूटराज हो गया है। दर्जन भर घरों में डेस्कटाॅप और इतने ही युवा लैपटाॅप पर हैं। इस गांव में पत्र व्यवहार और शिकायतें भी मेल की जा रही हैं। यह गांव अब वाई फाई जोन होने जा रहा है। दस साल पहले यह गांव अमूमन जैसे गांव होते हैं समस्या ग्रस्त, वैसा ही था। 10 हजार अबादी वाला यह गांव अब सभी समस्याओं से मुक्त है। जिला पंचायत सीईओ नीलेश कुमार के मुताबिक डेढ़ से दो साल में रायखेड़ा की तस्वीर बदल गई है। यह जिले का पूरी तरह से आदर्श गांव है। इतनी कोशिश और गांव करेंगे तो प्रशासन उन्हें इसी तरह विकसित करना चाहेगा।
 








कोई नुकसान न पहुंचा सकें।

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