Sunday, April 18, 2021

लड़नी अब होगी लड़ाई

            
                   

दस दिनों में 27 जवानों के नरसंहार ने साबित कर दिया कि नरम उपाय नाकाम हो गए हैं। नक्सलियों के खिलाफ लड़ाई लड़नी ही होगी। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल असम में वोट की राजनीति करते रहे और राज्य में नक्सली मौत का तांडव। सवाल यह है कि नक्सलियों से बातचीत का रास्ता खोलना चाहिए या फिर नक्सलवाद खात्मे के लिए हंट नहीं,हंटर चाहिए।  


0 रमेश कुमार ’रिपु’
            मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ढाई साल से दावा कर रहे हैं कि, माओवाद कमजोर हो गया हैं। नक्सली अपनी अंतिम लड़ाई लड़ रहे हैं। जबकि मार्च 2020 में नक्सलियों के जाल में फंसकर 17 जवान शहीद हुए थे। 2021 में 23 मार्च को नरायणपुर में पांच जवान शहीद होने पर कहा था कि,जवानों की शहादत बेकार नहीं जायेगी। 3 अप्रैल 2021 को माओवादियों ने बीजापुर जिले के तर्रेम, सिलगेर के टेकलगुड़म और जोनागुड़ा में एंबुश लगाकर 23 जवानों की जानें ले ली। झीरम कांड की तरह नक्सलियों ने बर्बरता का परिचय दिया। जोनागुड़ा में शहीद सुरक्षा कर्मी की नक्सलियों ने हाथ काट कर ले गए। बीजापुर का यह नरसंहार अपने पीछे कई सवाल छोड़ गया है। अब तक छत्तीसगढ़ में 1301 जवान शहीद हो चुके हैं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि, क्या नक्सलियों से बातचीत का रास्ता खोला जाना चाहिए या फिर ग्रीन हंट नहीं, हंटर चाहिए। अथवा सेना का उपयोग करना चाहिए। नक्सलवाद के खत्मे के लिए केन्द्र सरकार ने अतिरिक्त पांच बटालियन दी। तो क्या यह मान लिया जाए कि, आॅपरेशन में कोताही बरती जा रही है? नक्सलियों के इस नरसंहार से सवाल यह उठता है कि कांग्रेस नेता राजबब्बर राजीव गांधी कांग्रेस भवन में 2018 में कहा था कि, नक्सली क्रांतिकारी हैं। वे क्रांति करने निकले हैं। कोई उन्हें रोके नहीं।’ तो क्या मान लिया जाये कि, भूपेश सरकार ने नक्सलियों पर नकेल न लगे, इसलिए अपने घोषणा पत्र को दरकिनार कर अब तक नक्सली नीति नहीं बनाई?
माओ की संवेदनात्मक चाल
गृहमंत्री अमित शाह ने कहा कि, जवानों की शहादत का बदला लिया जाएगा। इस पर नक्सलियों की केंद्रीय कमेटी के प्रवक्ता अभय ने कहा कि जवानों की मौत के लिए केंद्र, राज्य सरकार और नार्थ ब्लॉक जिम्मेदार है। गृहमंत्री बताएं किस किस से बदला लेंगे। विभिन्न मुठभेड़ों में शहीद जवानों के परिजनों के प्रति संवेदना जताते हुए कहा, संगठन की लड़ाई जवानों से नहीं है। सरकार की ओर से हथियार उठाने की वजह से संगठन को उनसे लड़ना पड़ता है। जाहिर है कि, नक्सली लीडर अब संवेदनात्मक बातें करके सारा दोष सरकार पर मड़ना चाहते हैं। वहीं जम्मू-कश्मीर निवासी कोबरा बटालियन के जवान राकेश्वर सिंह मनहास को नक्सली लीडर हिड़मा अपने साथ ले गया है। ऐसा समझा जा रहा है कि, हिड़मा इस जवान को छोड़ने के लिए सरकार के सामने अपनी कोई मांग रख सकता है।  
कई सवाल उठ रहे हैं
गृहमंत्री अमित शाह ने इस हादसे की जांच के आदेश दिये हैं। बात साफ है कि सुरक्षा बल से इस बार भी चूक हुई है। फोर्स के बड़े अफसरों की प्लानिंग एग्जीक्यूशन ग्रांउड रिपोर्ट और इंटेलिजेंस की लापरवाही से यह नरसंहार हुआ है। जोनागुड़ा का क्षेत्र गुरिल्ला युद्ध के लिए जाना जाता है। कोबरा बटालियन इसमें माहिर है। ऐसे में यह हादिसा कैसे हो गया? हिड़मा की बटालियन नंम्बर एक आधुनिक हाथियारों से लैंस रहती है,जानकर भी हमले से पहले उसके व्यूह से कैसे बचना है,इसकी प्लानिंग क्यों नहीं की गई? झीरम कांड का मास्टर माइंड हिड़मा ने अपने होने की सूचना पुलिस तक फैलाई। पुलिस न अपने मुखबिरों से पता करने की कोशिश क्यों नहीं की? क्या हिड़मा के खिलाफ आॅपरेशन की जानकारी मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को थी? फौज के अफसर और पुलिस तक किसने खबर पहुंचाई कि नक्सली कमांडर हिड़मा भारी संख्या में नक्सली टेकलगुड़म और जोनागुड़ा में हैं? हैरानी वाली बात है कि सीआरपीएफ,कोबरा बाटालियन,पुलिस का खुफिया तंत्र और इंटेलिजेंस आदि को पता क्यों नहीं चला कि, करीब 700 नक्सली किसी बड़े हादसे की तैयारी कर रहे हैं?
हिड़मा पर 25 लाख का इनाम
इस नरसंहार का मास्टर माइंड मंडावी हिड़मा उर्फ इदमुल पोडियाम भीमा पर 25 लाख रूपये का इनाम है। हिड़मा सुकमा जिलेे के जगरगुडा इलाके के पुडअती गांव का निवासी है। इसकी दो शादी हुई है। इसकी दोनों पत्नियां नक्सली हैं। तीन भाई हैं। मांडवी देवा और मांडवी टुल्ला गांव में खेती करती हैं। तीसरा भाई मांडवी नंदा गांव में नक्सलियों का पढ़ाता है। बहन हिड़मा दोरनपाल में रहती है।
आॅपरेशन की कमांड नलिनी क्यों
इस नरसंहार के लिए पूरी तरह भूपेश सरकार और नक्सल आॅपरेशन के आई.जी नलिनी प्रभात अपनी जवाबदेही से मुक्त नहीं हो सकते। गृह मंत्रालय की राममोहन कमेटी ने ताड़मेटला कांड के लिए  नक्सल आॅपरेशन के आई.जी. नलिनी प्रभात, तत्कालीन सीआरपीएफ के आई जी रमेश चन्द्र,62 बटालियन के कमांडर ए. के. बिष्ट और इंस्पेक्टर संजीव बागड़े दोषी ठहराया था। बावजूद इसके नक्सल आॅपरेशन का दायित्व नलिनी प्रभात का सौंपा जाना अश्चर्य जनक है। ताड़मेटला कांड की जांच कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार नक्सलियों के पास सीआरपीएफ का वायरलेस सेट था। इससे उन्हें फोर्स के मूवमेंट की पूरी जानकारी मिल रही थी। इसी के जरिए उन्हें फोर्स के चिंतलनार कैंप वापस लौटने की तारीख रास्ता और समय पता चल गया था। ऐसे ही 3 अप्रैल 2021 को बीजापुर के जोनागुड़ा में नक्सलियों ने सुनियोजित जानकारी देकर फोर्स को फंसाया। नक्सलियों ने अपनी लोकेशन खबरियों के हाथ अधिकारियों तक पहुंचाई। इसके बाद अधिकारियों ने जवानों को जोनागुड़ा पहुंचने के निर्देश दे दिए।
नक्सलियों ने दो चालें चली
नारायणपुर जिले में 23 मार्च 2021 को आईईडी ब्लास्ट कर पांच जवानों की जानें ली ली थी। पुलिस के पास खूफिया जानकारी थी कि, नक्सली 2021 में कोई बड़ा हमला करेंगे। इसलिए दो हजार जवान आॅपरेशन में भेजे गए थे। जबकि इसके पहले 17 मार्च को नक्सलियों ने विज्ञप्ति जारी कर कहा था कि, वे जनता की भलाई के लिए छत्तीसगढ़ सरकार से बातचीत के लिए तैयार हैं। उन्होंने बातचीत के लिए तीन शर्तें भी रखी थीं। इनमें सशस्त्र बलों को हटाने, माओवादी संगठनों पर लगे प्रतिबंध हटाने और जेल में बंद उनके नेताओं की बिना शर्त रिहाई शामिल थीं। सरकार ने अपनी ओर से निःशर्त समझौता वार्ता की बात कही। कांग्रेस नेता छविन्द्र कर्मा दो माह पहले से कह रहे थे कि, नक्सली जब खामोश रहते हैं, तो वो कोई योजना पर काम कर रहे होते हैं।’’   
एंबुश को तोड़ नहीं पाए
सीआरपीएफ के सेकंड इन कमांड आॅफिसर संदीप कहते हंै,‘‘नक्सली लीडर हिड़मा और सुजाता ने एक बड़े हादिसे की प्लानिंग किये थे। सभी जवान बहादुरी से लड़े। आॅपरेशन करके जवान लौट रहे थे तभी नक्सलियों ने हमला बोला। जवानों के हर मूवमेंट की जानकारी गांव के लोग और महिलाएं नक्सलियों को दे रहे थे।’’ हैरानी वाली बात है कि,नक्सली कमांडर हिड़मा आॅपरेशन के लिए बीजापुर के तर्रेम से 760, उसूर से 200 पामेड से 195 सुकमा 483 एवं नरसापुर से 420 का बल रवाना  हुआ था। सीआरपीएफ डीआरजी जिला पुलिस बल और कोबरा बटालियन के जवानों की ज्वाइन पार्टी सर्चिंग पर निकली थी। सुरक्षा बलों ने पहले पामेड़ इलाके में नक्सलियों के खिलाफ बड़ा ऑपरेशन प्लान किया था। लेकिन इसके बाद सुकमा,बीजापुर की सीमा पर जोनागुड़ा के पास बड़ी संख्या में नक्सलियों की मौजूदगी की जानकारी मिलने के बाद पामेड़ की जगह बीजापुर में ऑपरेशन लांच किया गया। 3 अप्रैल की दोपहर सील गिर के जंगल में घात लगाए 700 नक्सलियों ने पुलिस पार्टी को पहले भीतर तक आने दिया। तीनों से ओर उनके एंबुश में घेरने के बाद अचानक हमला कर दिया। पहला एंबुश पहाड़ी के पास लगाया गया। दूसरा जुन्ना गुड़ा गाँव में जबकि आगे करीब दो किलोमीटर पर तीसरा एंबुश लगाया था। कहां से और कैसे एंबुश तोड़ना है किसी को समझ में नहीं आया। वहीं बस्तर आई. जी. पी. सुदंरराज ने बताया कि अभी तक 9 नक्सलियों के मारे जाने की सूचना है। जबकि 15 से ज्यादा घायल हैं। राष्ट्रीय विशेष सुरक्षा सलाहकार विजय कुमार भी पिछले 10 दिनों से बस्तर में। उन्हें विशेष रूप से बस्तर में नक्सलवाद के खात्मे के लिए तैनात किया गया है। उनके रहते दो नक्सली वारदात हो गई।
झोपड़ियों से गोली बरसी
माओवदियों ने तीन तरफ से हमले का जाल बिछाया और जवान उसकी चलाकी को समझ नहीं पाए। जोनागुड़ा में नक्सलियों ने झोपड़ियों में घात लगाकर हमला किया। टेकलगुड़ा गांव में करीब 30 घर हैं,सभी को नक्सलियों ने खाली कराया और यहां से छिपकर हमला किये। दोनों जगह जवानों की लाशें बिछी रही। खून फैला हुआ था। पेड़ों पर गोलियों के निशान थे। तीन घंटे तक जवानों और नक्सलियों के बीच मुठभेड़ चली। घायल जवानों को पास से गोली मारी और बम से हमला किया।
बहरहाल कब तक बस्तर नक्सलियों के बारूद से दहलता रहेगा? कश्मीर की तरह छत्तीसगढ़ के नक्सलवाद को भी राष्ट्रीय मामला समझना जरूरी हो गया है। कैसे शांति स्थापित होगी छत्तीसगढ़ में इस दिशा में अब विचार करना जरूरी है।
 

 
 









गी ड़ाई
दस दिनों में 27 जवानों के नरसंहार ने साबित कर दिया कि नरम उपाय नाकाम हो गए हैं। नक्सलियों के खिलाफ लड़ाई लड़नी ही होगी। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल असम में वोट की राजनीति करते रहे और राज्य में नक्सली मौत का तांडव। सवाल यह है कि नक्सलियों से बातचीत का रास्ता खोलना चाहिए या फिर नक्सलवाद खात्मे के लिए हंट नहीं,हंटर चाहिए।  
0 रमेश कुमार ’रिपु’
            मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ढाई साल से दावा कर रहे हैं कि, माओवाद कमजोर हो गया हैं। नक्सली अपनी अंतिम लड़ाई लड़ रहे हैं। जबकि मार्च 2020 में नक्सलियों के जाल में फंसकर 17 जवान शहीद हुए थे। 2021 में 23 मार्च को नरायणपुर में पांच जवान शहीद होने पर कहा था कि,जवानों की शहादत बेकार नहीं जायेगी। 3 अप्रैल 2021 को माओवादियों ने बीजापुर जिले के तर्रेम, सिलगेर के टेकलगुड़म और जोनागुड़ा में एंबुश लगाकर 23 जवानों की जानें ले ली। झीरम कांड की तरह नक्सलियों ने बर्बरता का परिचय दिया। जोनागुड़ा में शहीद सुरक्षा कर्मी की नक्सलियों ने हाथ काट कर ले गए। बीजापुर का यह नरसंहार अपने पीछे कई सवाल छोड़ गया है। अब तक छत्तीसगढ़ में 1301 जवान शहीद हो चुके हैं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि, क्या नक्सलियों से बातचीत का रास्ता खोला जाना चाहिए या फिर ग्रीन हंट नहीं, हंटर चाहिए। अथवा सेना का उपयोग करना चाहिए। नक्सलवाद के खत्मे के लिए केन्द्र सरकार ने अतिरिक्त पांच बटालियन दी। तो क्या यह मान लिया जाए कि, आॅपरेशन में कोताही बरती जा रही है? नक्सलियों के इस नरसंहार से सवाल यह उठता है कि कांग्रेस नेता राजबब्बर राजीव गांधी कांग्रेस भवन में 2018 में कहा था कि, नक्सली क्रांतिकारी हैं। वे क्रांति करने निकले हैं। कोई उन्हें रोके नहीं।’ तो क्या मान लिया जाये कि, भूपेश सरकार ने नक्सलियों पर नकेल न लगे, इसलिए अपने घोषणा पत्र को दरकिनार कर अब तक नक्सली नीति नहीं बनाई?
माओ की संवेदनात्मक चाल
गृहमंत्री अमित शाह ने कहा कि, जवानों की शहादत का बदला लिया जाएगा। इस पर नक्सलियों की केंद्रीय कमेटी के प्रवक्ता अभय ने कहा कि जवानों की मौत के लिए केंद्र, राज्य सरकार और नार्थ ब्लॉक जिम्मेदार है। गृहमंत्री बताएं किस किस से बदला लेंगे। विभिन्न मुठभेड़ों में शहीद जवानों के परिजनों के प्रति संवेदना जताते हुए कहा, संगठन की लड़ाई जवानों से नहीं है। सरकार की ओर से हथियार उठाने की वजह से संगठन को उनसे लड़ना पड़ता है। जाहिर है कि, नक्सली लीडर अब संवेदनात्मक बातें करके सारा दोष सरकार पर मड़ना चाहते हैं। वहीं जम्मू-कश्मीर निवासी कोबरा बटालियन के जवान राकेश्वर सिंह मनहास को नक्सली लीडर हिड़मा अपने साथ ले गया है। ऐसा समझा जा रहा है कि, हिड़मा इस जवान को छोड़ने के लिए सरकार के सामने अपनी कोई मांग रख सकता है।  
कई सवाल उठ रहे हैं
गृहमंत्री अमित शाह ने इस हादसे की जांच के आदेश दिये हैं। बात साफ है कि सुरक्षा बल से इस बार भी चूक हुई है। फोर्स के बड़े अफसरों की प्लानिंग एग्जीक्यूशन ग्रांउड रिपोर्ट और इंटेलिजेंस की लापरवाही से यह नरसंहार हुआ है। जोनागुड़ा का क्षेत्र गुरिल्ला युद्ध के लिए जाना जाता है। कोबरा बटालियन इसमें माहिर है। ऐसे में यह हादिसा कैसे हो गया? हिड़मा की बटालियन नंम्बर एक आधुनिक हाथियारों से लैंस रहती है,जानकर भी हमले से पहले उसके व्यूह से कैसे बचना है,इसकी प्लानिंग क्यों नहीं की गई? झीरम कांड का मास्टर माइंड हिड़मा ने अपने होने की सूचना पुलिस तक फैलाई। पुलिस न अपने मुखबिरों से पता करने की कोशिश क्यों नहीं की? क्या हिड़मा के खिलाफ आॅपरेशन की जानकारी मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को थी? फौज के अफसर और पुलिस तक किसने खबर पहुंचाई कि नक्सली कमांडर हिड़मा भारी संख्या में नक्सली टेकलगुड़म और जोनागुड़ा में हैं? हैरानी वाली बात है कि सीआरपीएफ,कोबरा बाटालियन,पुलिस का खुफिया तंत्र और इंटेलिजेंस आदि को पता क्यों नहीं चला कि, करीब 700 नक्सली किसी बड़े हादसे की तैयारी कर रहे हैं?
हिड़मा पर 25 लाख का इनाम
इस नरसंहार का मास्टर माइंड मंडावी हिड़मा उर्फ इदमुल पोडियाम भीमा पर 25 लाख रूपये का इनाम है। हिड़मा सुकमा जिलेे के जगरगुडा इलाके के पुडअती गांव का निवासी है। इसकी दो शादी हुई है। इसकी दोनों पत्नियां नक्सली हैं। तीन भाई हैं। मांडवी देवा और मांडवी टुल्ला गांव में खेती करती हैं। तीसरा भाई मांडवी नंदा गांव में नक्सलियों का पढ़ाता है। बहन हिड़मा दोरनपाल में रहती है।
आॅपरेशन की कमांड नलिनी क्यों
इस नरसंहार के लिए पूरी तरह भूपेश सरकार और नक्सल आॅपरेशन के आई.जी नलिनी प्रभात अपनी जवाबदेही से मुक्त नहीं हो सकते। गृह मंत्रालय की राममोहन कमेटी ने ताड़मेटला कांड के लिए  नक्सल आॅपरेशन के आई.जी. नलिनी प्रभात, तत्कालीन सीआरपीएफ के आई जी रमेश चन्द्र,62 बटालियन के कमांडर ए. के. बिष्ट और इंस्पेक्टर संजीव बागड़े दोषी ठहराया था। बावजूद इसके नक्सल आॅपरेशन का दायित्व नलिनी प्रभात का सौंपा जाना अश्चर्य जनक है। ताड़मेटला कांड की जांच कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार नक्सलियों के पास सीआरपीएफ का वायरलेस सेट था। इससे उन्हें फोर्स के मूवमेंट की पूरी जानकारी मिल रही थी। इसी के जरिए उन्हें फोर्स के चिंतलनार कैंप वापस लौटने की तारीख रास्ता और समय पता चल गया था। ऐसे ही 3 अप्रैल 2021 को बीजापुर के जोनागुड़ा में नक्सलियों ने सुनियोजित जानकारी देकर फोर्स को फंसाया। नक्सलियों ने अपनी लोकेशन खबरियों के हाथ अधिकारियों तक पहुंचाई। इसके बाद अधिकारियों ने जवानों को जोनागुड़ा पहुंचने के निर्देश दे दिए।
नक्सलियों ने दो चालें चली
नारायणपुर जिले में 23 मार्च 2021 को आईईडी ब्लास्ट कर पांच जवानों की जानें ली ली थी। पुलिस के पास खूफिया जानकारी थी कि, नक्सली 2021 में कोई बड़ा हमला करेंगे। इसलिए दो हजार जवान आॅपरेशन में भेजे गए थे। जबकि इसके पहले 17 मार्च को नक्सलियों ने विज्ञप्ति जारी कर कहा था कि, वे जनता की भलाई के लिए छत्तीसगढ़ सरकार से बातचीत के लिए तैयार हैं। उन्होंने बातचीत के लिए तीन शर्तें भी रखी थीं। इनमें सशस्त्र बलों को हटाने, माओवादी संगठनों पर लगे प्रतिबंध हटाने और जेल में बंद उनके नेताओं की बिना शर्त रिहाई शामिल थीं। सरकार ने अपनी ओर से निःशर्त समझौता वार्ता की बात कही। कांग्रेस नेता छविन्द्र कर्मा दो माह पहले से कह रहे थे कि, नक्सली जब खामोश रहते हैं, तो वो कोई योजना पर काम कर रहे होते हैं।’’   
एंबुश को तोड़ नहीं पाए
सीआरपीएफ के सेकंड इन कमांड आॅफिसर संदीप कहते हंै,‘‘नक्सली लीडर हिड़मा और सुजाता ने एक बड़े हादिसे की प्लानिंग किये थे। सभी जवान बहादुरी से लड़े। आॅपरेशन करके जवान लौट रहे थे तभी नक्सलियों ने हमला बोला। जवानों के हर मूवमेंट की जानकारी गांव के लोग और महिलाएं नक्सलियों को दे रहे थे।’’ हैरानी वाली बात है कि,नक्सली कमांडर हिड़मा आॅपरेशन के लिए बीजापुर के तर्रेम से 760, उसूर से 200 पामेड से 195 सुकमा 483 एवं नरसापुर से 420 का बल रवाना  हुआ था। सीआरपीएफ डीआरजी जिला पुलिस बल और कोबरा बटालियन के जवानों की ज्वाइन पार्टी सर्चिंग पर निकली थी। सुरक्षा बलों ने पहले पामेड़ इलाके में नक्सलियों के खिलाफ बड़ा ऑपरेशन प्लान किया था। लेकिन इसके बाद सुकमा,बीजापुर की सीमा पर जोनागुड़ा के पास बड़ी संख्या में नक्सलियों की मौजूदगी की जानकारी मिलने के बाद पामेड़ की जगह बीजापुर में ऑपरेशन लांच किया गया। 3 अप्रैल की दोपहर सील गिर के जंगल में घात लगाए 700 नक्सलियों ने पुलिस पार्टी को पहले भीतर तक आने दिया। तीनों से ओर उनके एंबुश में घेरने के बाद अचानक हमला कर दिया। पहला एंबुश पहाड़ी के पास लगाया गया। दूसरा जुन्ना गुड़ा गाँव में जबकि आगे करीब दो किलोमीटर पर तीसरा एंबुश लगाया था। कहां से और कैसे एंबुश तोड़ना है किसी को समझ में नहीं आया। वहीं बस्तर आई. जी. पी. सुदंरराज ने बताया कि अभी तक 9 नक्सलियों के मारे जाने की सूचना है। जबकि 15 से ज्यादा घायल हैं। राष्ट्रीय विशेष सुरक्षा सलाहकार विजय कुमार भी पिछले 10 दिनों से बस्तर में। उन्हें विशेष रूप से बस्तर में नक्सलवाद के खात्मे के लिए तैनात किया गया है। उनके रहते दो नक्सली वारदात हो गई।
झोपड़ियों से गोली बरसी
माओवदियों ने तीन तरफ से हमले का जाल बिछाया और जवान उसकी चलाकी को समझ नहीं पाए। जोनागुड़ा में नक्सलियों ने झोपड़ियों में घात लगाकर हमला किया। टेकलगुड़ा गांव में करीब 30 घर हैं,सभी को नक्सलियों ने खाली कराया और यहां से छिपकर हमला किये। दोनों जगह जवानों की लाशें बिछी रही। खून फैला हुआ था। पेड़ों पर गोलियों के निशान थे। तीन घंटे तक जवानों और नक्सलियों के बीच मुठभेड़ चली। घायल जवानों को पास से गोली मारी और बम से हमला किया।
बहरहाल कब तक बस्तर नक्सलियों के बारूद से दहलता रहेगा? कश्मीर की तरह छत्तीसगढ़ के नक्सलवाद को भी राष्ट्रीय मामला समझना जरूरी हो गया है। कैसे शांति स्थापित होगी छत्तीसगढ़ में इस दिशा में अब विचार करना जरूरी है।
 

 
 

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