Saturday, September 11, 2021

हाथ से नहीं फिसली सत्ता’’






सियासत की जमीं पर आशंकाओं की उड़ती धूल के बैठते ही एक बात साफ हो गई, कि पाँच राज्यों के चुनाव होने तक भूपेश बघेल के हाथ में ही सत्ता की कमान रहेगी। वे राजनीति में अर्द्धविराम साबित नहीं होंगे।
0 रमेश तिवारी ‘रिपु’
छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सियासी टेबल पर ढाई साल बीतते ही ‘‘पंजा’’ लड़ाने की सियासत अचानक तेज हो गई। जून में मुख्यमंत्री बदलने की हवा चली। लेकिन परिवर्तन की हवा में तब्दील नहीं हुई। फिर अगस्त-सितम्बर में टी.एस सिंह देव ने परिवर्तन की बात कहकर कांगे्रस में खलबली मचा दिये। दस जनपथ इसके लिए तैयार नहीं हुआ। और इसी के साथ मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की सत्ताई सियासत अल्पविराम साबित नहीं हुई। यह अलग बात है कि उनके हाथ से सत्ता की डोर खींचने की सियासत रायपुर से दिल्ली तक दौड़ धूप करने वालों की भारी भद्द हुई।
टी.एस सिंह देव के सलाहकार उन्हें यह बात नहीं समझा सके, कि राजनीति में कोई भी वायदा वक्त के साथ बदल जाता है। राजनीति कोई बीजगणित का सवाल नहीं है, कि सूत्र से हल होता है। छत्तीसगढ़ कांग्रेस की राजनीति राजस्थान और पंजाब के सांचे में नहीं ढलेगी। इसकी वजह यह है, कि भूपेश बघेल के साथ 70 में 52 विधायक हैं। टी.एस सिंह देव अब ज्योतिरादित्य सिंधिया की भूमिका चाहकर भी नहीं निभा सकते। यह बात भूपेश के समर्थन में दिल्ली जाने वाले विधायकों की संख्या बल ने स्पष्ट कर दिया। छत्तीसगढ़ प्रभारी पी.एल पुनिया की पहली पसंद पहले से भूपेश बघेल रहे हैं। दस जनपथ भी छत्तीसगढ़ की राजनीति पर कोई फैसला लेने से पहले पीएल पुनिया की राय को नजर अंदाज नहीं कर सका। ढाई साल की सत्ताई राजनीति में भूपेश बघेल ने संगठन से लेकर दस जनपथ और मीडिया के बीच अपनी ऐसी छाप बना ली कि उस फ्रेम में दूसरा कोई फिट होता दस जनपथ को भी नहीं दिखा।
पाँंच अन्य राज्यों में गोवा,मणिपुर,पंजाब,यूपी और उत्तराखंड होने वाले चुनाव से पहले छत्तीसगढ़ की राजनीतिक नेतृत्च को दस जनपथ के बदल देने से विपक्ष को मुद्दा मिल जाता और  चुनावी औजार भी। चूंकि केन्द्र सरकार इस समय ओबीसी की राजनीति को हवा दिये हुए है। भूपेश बघेल ओबीसी नेता हैं। जाहिर सी बात है कि दस जनपथ ओबीसी नेता भूपेश बघेल के हाथ से सत्ता का हस्तांतरण सवर्ण के हाथ में करने की भूल नहीं करेगा। वैसे भी संगठन में निगम मंडल में सारे लोग भूपेश के समर्थक हैं। ऐसे में बाबा ये सोच कैसे लिए कि दस जनपथ और विधायक उन्हें मुख्यमंत्री बनाने की वकालत करेंगे!

ढाई साल में भूपेश बघेल ने न केवल राज्य में काम किये बल्कि कांग्रेस के संगठन और निगम मंडल पर अपने लोगों को बिठाकर अपनी ताकत बढ़ाई। बाबा बीच- बीच में सरकार पर चोट करने वाले बयान देकर भूपेश बघेल को परेशान करने की कोशिश किए। उसके बदले में उन्हें राजनीतिक नुकसान भी उठाना पड़ा। जिसकी सत्ता होती है,उसके आईने में पत्थर फेकने वालों को आईने की खरोच तो मिलेगी ही। बाबा काग्रेस के वरिष्ठ नेता हैं लेकिन, ढाई साल की सत्ता में वो विधायकों को अपना नहीं बना सके।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि अब बाबा क्या करेंगे? उनकी राजनीति का स्वास्थ्य ठीक रहेगा कि नहीं? मुख्य मंत्री क्या उन्हें और बाएं करेंगे? बाबा कब तक चुप रहेंगे? क्या पांच राज्यों के चुनाव के बाद बाबा फिर दस जनपथ की दौड़ लगायेंगे? हर राजनीतिक व्यक्ति की महत्वाकांक्षा होती है। बाबा भी अपने नाम के साथ मुख्यमंत्री नाम की चाह रखते हैं। हो सकता है कि पांच राज्यों के चुनाव के बाद बाबा को राष्ट्रीय महासचिव या फिर किसी राज्य का प्रभारी बना दिया जाये। बहरहाल,भूपेश की सत्ताई राजनीति की शाम नहीं हुई।



 

 

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