Thursday, December 26, 2019

सवालों के घेरे में सरकार






सत्ता पाने के लिए काग्रेस ने जनता से जो वादे किये थे,वो सत्ताई भंवर में उलझ कर रह गये हैं। सरकार अपने वायदे पर उम्मीद से कम खरी उतरी। डाॅ रमन सिंह कांग्रेस सरकार के एक बरस को बुरे सपने जैसा करार देते हैं। वहीं अजीत जोगी कहते हैं नरवा, गुरवा और बाड़ी में ही उलझी रही सरकार। सवाल यह है कि भूपेश सरकार नवा छत्तीसगढ़ गढ़ने में कितने कदम चली। 

0 रमेश कुमार’’रिपु’’
                 ‘‘नवा छत्तीसगढ़ गढ़बों’’। भूपेश सरकार का यह नारा आज भी प्रदेश के हर जिले में विज्ञापन के रूप में चश्पा है। एक साल में भूपेश सरकार कितने घर चली, विपक्ष सरकार से पूछ रहा है। क्या एक साल में भूपेश का कद बढ़ा या फिर कांग्रेस का, अथवा सरकार का। वैसे देखा जाये तो प्रदेश सरकार ने अपने एक बरस सुर्खियों की राजनीति में ही गंवाये। एक साल की सरकार ने प्रदेश की जनता को क्या दिया। उसके घोषणा पत्र के कितने वायदे पूरे हुए। कांग्रेस के नवा छत्तीसगढ़ गढ़बों के नारे का सच, कितना सच है,इसका सही मूल्यांकन जनता और विपक्ष करता है। वैसे विपक्ष का एक सूत्रीय काम होता है सरकार की खामियां ढूंढना। बावजूद इसके देखा जाये तो भूपेश सरकार पूर्व सरकार के ज्यादातर मामले की जांच के लिए एसआइटी का गठन करते एक बरस बिता दिये। आठ एसआईटी गठित की गई। हाई कोर्ट ने सात एसआईटी को न केवल रद्द किया बल्कि, जांच पर भी रोक लगा दी। सरकार सत्ता में आने के लिए किसानों से ढाई हजार रूपये प्रति क्ंिवटल की दर से धान खरीदने का वायदा किया था। लेकिन अब वह प्रदेश की 2048 केन्द्रों में 1815 और 1835 रुपए की दर पर धान 15 फरवरी तक खरीदेगी। इस साल 54 नए खरीदी केन्द्र बनाए गए हैं। जबकि 48 मंडियों एवं 76 उपमंडियों के प्रांगण का उपयोग भी खरीदी के लिए किया जाएगा। इस साल प्रदेश के 19 लाख 56 हजार किसानों ने धान बेचने के लिए अपना पंजीयन कराया है। जो कि पिछले साल की तुलना में दो लाख 58 हजार ज्यादा है। सरकार द्वारा घोषित 25 सौ रुपए मंेे से अंतर की राशि किसानों को अलग से दी जायेगी। लेकिन कैसे दी जायेगी,यह सरकार ने अभी तक नहीं बताया। अलबत्ता प्रदेश सरकार द्वारा किसानों को अंतर की राशि देने के लिए पांच मंत्रियों की कमेटी बनाई है। जो तेलंगाना की रइत बंधु और ओडिशा की कादिया पॉलिसी का अध्ययन करेगी। कमेटी आगामी बजट सत्र के पहले सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपेगी। सीएम भूपेश कहते हैं कि, किसानों को हर हाल में 25 सौ रुपए प्रति क्विंटल की दर से भुगतान किया जाएगा। सरकार ने शीतकालीन सत्र के अनुपूरक बजट में 205 करोड़ रुपए का प्रावधान किया है। जाहिर सी बात है यदि अंतर की राशि प्रदेश सरकार अपनी जेब से देती है, तो उसे 600 करोड़ रूपये का नुकसान होगा। 
किसानों का गुस्सा सड़कों पर
प्रदेश में किसानों से सरकार 1815 और 1835 रुपए की दर पर धान खरीदने का आदेश जारी किया तो विपक्ष ने हंगामा किया। किसानों ने सड़कों पर प्रदर्शन किया। कवर्धा में धान खरीदी शुरू होने के दूसरे हफ्तें विवाद बढ़ा। कवर्धा के किसानों ने सरकार की खिलाफ़त की और कहा पूरा धान खरीदने का वायदा करने के बाद, तय सीमा में धान लिया जा रहा है। बचा हुआ धान सरकारी सख्ती की वजह से किसान किसी और को भी नहीं बेच सकते। जिले के झिरौनी केंद्र में किसानों ने मुख्यमंत्री का पूतला फूंका। किसानों का कहना है कि सॉफ्टवेयर को ऐसे सेट कर दिया गया है कि, वह एक सीमा तक ही धान खरीदी की एंट्री कर रहा है। जबकि सरकार और इसके अधिकारी पूरा धान लेने  की बात कह रहे हैं। प्रदेश के आधे से अधिक धान खरीदी केन्द्रों में किसानों ने बहिष्कार किया। बावजूद इसके सरकार ने इस साल 85 लाख मीट्रिक टन धान खरीदी का लक्ष्य रखा है।
बुरे सपने जैसी सरकारः रमन
पूर्व मुख्यमंत्री डाॅ रमन सिंह कहते हैं,‘‘ पूरा एक वर्ष छत्तीसगढ़ के लिए एक बुरे सपने जैसा रहा है। गेड़ी चढ़ने,भौरा चलाने और सोंटा मारने से विकास नहीं होता। दरअसल हाल ही में लोक संस्कृति के त्योहार हरेली और गौरा,गौरी पूजन में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने गेड़ी चलाई थी और सोंटा (चाबुक) भी खुद को मरवाया था। इस सरकार की जो सबसे खतरनाक बात रही, वह ये कि जिन वर्गों को बड़े सपने दिखा कर सत्ता में आई,सबसे ज्यादा उन्हें ही परेशान किया। 2500 रुपया प्रति क्ंिवटल कीमत धान की किसानों को देने से सदन में मुकर गए। धान खरीदी केन्द्रों में अराजकता की स्थिति है। सरकार केवल एक कमेटी का गठन करके धान खरीदी को लेकर अपनी जिम्मेदारी से बचना चाहती है। किसानों का कर्जा माफ करने में फर्जीवाड़ा किया गया। जिस किसान ने कर्जा लिया ही नहीं था, उसे ऋण माफी का प्रमाण पत्र थमा दिया गया। राष्ट्रीयकृत व व्यवसायिक बैंकों से कर्ज लेने वाले किसानों का एक रुपया भी माफ नहीं किया गया। 
निर्भया जैसी स्थिति हर जिले में
डाॅ रमन सिंह ने कहा,सत्ता में आयी सरकार केवल बदला और तबादले को ही बदलाव समझ बैठी है। पुलिसिंग का हाल तो ऐसा बेहाल है कि दुष्कर्म और हत्या आदि की घटनाएं रुक ही नहीं रही हैं। खुद सरकार द्वारा दी गयी जानकारी के अनुसार साल भर में 80 हजार से अधिक अपराध छत्तीसगढ़ में दर्ज किये गए हैं। जबकि अभी भी यह साल बचा हुआ है। केवल रायपुर में रेप,हत्या की 80 से अधिक जघन्य वारदात हो चुकी हैं। डॉ रमन ने कहा कि छत्तीसगढ़ में किसी भी जिले में महिलायें, बच्चियां सुरक्षित नहीं हैं। आये दिन हो रहे अनाचार, हत्याए व छेड़छाड़ की घटनाओं से छत्तीसगढ़ की पहचान अब अपराध गढ़ के रूप में होने लगी है। राज्य के रायपुर संभाग में ही 448 रेप व 664 अपहरण के मामले दर्ज किये गये हैं। बिलासपुर संभाग में 891 रेप व 1377 अपहरण के मामले दर्ज किये गये हैं। कुल 27 जिलों में 7 महिने के भीतर ही 35954 अपराध के मामले दर्ज हैं। हर कोने से निर्भया जैसी वारदातें सामने आ रही हैं। इसी विधानसभा में हमने अपने विधायक भीमा मंडावी जी को खोया है। उनकी नृशंस हत्या की एनआई जांच रोकने के लिए एड़ी,चोटी का जोर लगा दिया था। आखिर किस बात की परदेदारी है। क्या छिपाना चाहते हैं ये। अब हाई कोर्ट ने एनआईए जांच का रास्ता साफ किया है। जांच होने दीजिये पता चलेगा। यही कांग्रेस अध्यक्ष रहते हुए झीरम का सबूत अपनी जेब में होने की बात करते थे, कहाँ है साक्ष्य, अभी तक एजेंसियों को दिया क्यों नहीं।
दिल्ली के वकीलों को पैसा लुटाया
प्रदेश भाजपा अध्यक्ष विक्रम उसेंडी कहते हैं,‘‘ पुलिस और प्रशासनिक मशीनरी को केवल बदलापुर की राजनीति के लिए झोंक दिया गया। विधानसभा में सवाल पूछने पर चैंकाने वाली जानकारी सामने आयी कि केवल कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम को ही 60 लाख रूपये की फीस दे दी गई ताकि, झूठा मामला बना कर हमें फंसाया जा सके। ऐसे आरोपियों पर प्रदेश की गाढ़ी कमाई लुटाना कहां का न्याय है। इसके अलावा भी दिल्ली के कांग्रेसी वकीलों पर करोड़ों लुटाये गए। अधिकांश मामलों पर कोर्ट में सरकार को मुंह की खानी पड़ी। प्रदेश सरकार ने नेशनल हेराल्ड को दिया 50 लाख का विज्ञापन। जो जनहित में नहीं है।
सरकार के पास विजन नहीं: जोगी
देखा जाये तो विपक्ष का हर नेता भूपेश सरकार की खिलाफत कर रहा है। उन्होंने कोई ऐसा काम नहीं किया है जिसे विपक्ष कहे कि यह काम ठीक था। छजका के सुप्रीमों अजीत जोगी कहते हैं, 15 साल बाद कांग्रेस सत्ता में आई लेकिन, पूरा एक साल हताशा एवं निराशा से भरा रहा। सरकार के पास कोई विजन नहीं है। इस सरकार ने एक साल नरवा, घुरवा, और बाड़ी में ही गुम रही। युवाओं को रोजगार, किसानों को परेशानी, महंगाई पर नियंत्रण, स्वास्थ्य शिक्षा समेत हर क्षेत्र में सरकार कुछ नहीं कर पाई। सरकार कहती है बिजली बिल आधा कर दिया गया है। भरपूर बिजली दी जा रही है। लेकिन लो वोल्टेज की परेशानी के चलते बालोद जिले के डौंडी विकास खंड के ग्राम पंचायत मथेना में 40 किसानों की 140 एकड़ फसल सूख गई। पुलिस कर्मियों को मिलने वाले नक्सल भत्ते को बंद कर दिया गया। यह फैसला दुर्भाग्यपूर्ण है। 
खत्म हो जायेगा नक्सलवादः भूपेश
मुख्यमंत्री भूपेश बघेल कहते हैं समीक्षा के नजरिये से एक साल की अवधि कम है। प्रदेश की जनता के साथ छल नहीं किया। रमन सरकार 20 लाख हेक्टेयर सिंचाई क्षमता की बात करते रहे, जबकि हमारी क्षमता 11 लाख हेक्टेयर की है। ग्रामीणों को रोजगार दे रहे हैं। ई टेंडर बंद कर दिया गया है। नक्सल समस्या में 50 फीसदी की कमी आई है। पूरी उम्मीद है कि पांच साल में नक्सल समस्या खत्म हो जायेगा। प्रदेश की जनता को 450 करोड़ की बिजली बांटी। धान खरीदी के लिए 21 हजार करोड़ खर्च किया गया है। नरवा, घुरवा और बाड़ी योजना के लिए 4000 करोड़ का फंड दिया गया है। गोठान सरकारी योजना नहीं है। इसका संचालन गांव वालों को ही करना है। हरेली,तीजा और पोरा जो इस प्रदेश का त्योहार है। छुट्टियां घोषित की। मंत्रिमंडल के काम काज की समीक्षा पार्टी हाई कमान और बड़े नेता कर रहे हैं। यह प्रक्रिया चलती रहेगी। हमारी देनदारी 50 हजार करोड़ की है। किसानों का कर्जा माफी,धान खरीदी,मानक बोरा संग्रहण दर बढ़ाया है। इस वजह से  सभी सेक्टरों में उछाल आया है। आदिवासियों की जमीन छीनी जाती रही है। उनको 4200 एकड़ जमीन वापस करने का काम पहली बार हुआ। स्वच्छता दीदी योजना के तहत मानदेय बढ़कर छह हजार किया। जमीन की गाइड लाइन दर में 30 फीसदी की कमी की गई। छोटे भूखंडों की के क्रय विक्रय से रोक हटाया गया। 1250 करोड़ की लागत के 28694 नवीन आवास स्वीकृत किये गये।
सरकार के समक्ष चुनौतियां
इससे इंकार नहीं है कि प्रदेश सरकार को स्थायी रूप से नक्सल समस्या मिली है। सरकार के पास देनदारी अधिक है। घाटे से उबारना और आय बढ़ाना है। 7.18 फीसदी ब्याज दर पर सरकार ने 2 हजार करोड़ का कर्ज लिया। केन्द्र सरकार ने किसानों को बोनस देने से इंकार कर दिया है। लेकिन कांग्रेस के घोंषणा पत्र में ऐसे कई वायदे हैं, जो उसके लिए चुनौती है। हर साल 2500 रूपये क्विंटल किसानों से धान खरीदना। प्रदेश के 40 लाख बेरोजगारों को बेरोजगारी भत्ता देना या फिर उनके लिए रोजगार की व्यवस्था करना। दस लाख बेरोजगारों को ढाई हजार रूपये बेरोजगारी भत्ता देने की बात कही थी। नरवा,घुरवा और बाड़ी योजना को जमीनी धरातल पर सफल करना। कुपोषण दूर करना। शराब बंदी के लिए गठित कमेटी की रिपोर्ट को लागू करना।शराब बंदी का वादा करके सत्ता में आई कांग्रेस अब 1 साल बाद भी शराब बंदी को लेकर कोई भी फैसला नहीं ले पाई। बल्कि दो घंटे और शराब दुकानें खोलने की सीमा बढ़ा दी गई। वहीं शराब से आय का लक्ष्य बढ़ा कर 4700 हजार करोड़ किया गया है। पूरे प्रदेश में ओवर रेट पर शराब बिक रही है उसके करीब 5420 मामले दर्ज किये गये हैं। स्काई वाॅक को तोड़ने की बात कही थी,कमेटी भी गठित की गई। लेकिन हुआ कुछ नहीं। पुलिस भर्ती बल .की परीक्षाओं का परिणाम लंबे समय से रोक कर रखा गया है। 61 हजार नौजवानों का भविष्य अंधकार में है। दो वर्ष की सेवाओं के उपरांत शिक्षाकर्मियों को नियमित करने का वादा भी झूठा साबित हुआ। सरकारी नौकरियों पर एक साल की रोक लगा दी गई। सरकार ने वादा किया था कि महिला स्व सहायता समूहों का कर्जा माफ किया जायेगा। इस वक्त 1 लाख से भी ज्यादा महिला स्व सहायता समूहों का लगभग 1100 करोड़ रुपया कर्जा है। सरकार ने एक फूटी कौड़ी माफ नहीं की। विधवा महिलाओं को 1 हजार रुपए पेंशन देने का वादा था, वो भी पूरा नहीं किया गया। पीड्ल्यूडी विभाग के माध्यम से होने वाले बड़े विकास के कार्य आज प्रदेश भर में रुके हुए हैं। रेल कारिडोर का पैसा रोक कर प्रदेश के विकास को बाधित किया गया है। स्मार्ट सिटी के सभी प्रोजेक्ट रुके। उच्च न्यायालय ने सरकार के कई फैसले को निरस्त किया,मसलन, सहकारी संस्थाओं को भंग करने का मामला हो, आरक्षण बढ़ाने का विषय हो प्रमोशन में आरक्षण देने का मामला हो, अनुसूचित जाति आयोग व महिला आयोग की सदस्यों की नियुक्ति का मामला हो, पूर्व मुख्य सचिव अमन सिंह के खिलाफ एसआईटी गठित करने का मामला हो। पाटन और कवर्धा के 700 किसान अब भी कर्जदार। सहकारी बैंक के सीइओ ने नोटिस दिया है। सरकार के कर्ज माफी घोषणा पर यह प्रश्न चिन्ह है। गन्ना किसान खेत में आग लगा रहे हैं। बंपर पैदावार के बाद भी शक्कर कारखाने में पर्ची नहीं मिलने से किसान परेशान हैं। जनता को लाभ पहुचाने वाली 22 तरह की योजनाओं पर सरकार ने रोक लगा दी।
 सियासी प्रतिशोध में बिताः कौशिक
नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक ने कहा,कांग्रेस सरकार के एक साल का कार्यकाल राजनीतिक प्रतिशोध का रहा है। प्रदेश सरकार के काम की शुरुआत पूर्व मुख्यमंत्री डॉण् रमन सिंह के खिलाफ बदलापुर से शुरू हुई और डॉ रमन सिंह के खिलाफ फिर दुर्भावनापूर्ण कार्रवाई के साथ एक साल इस सरकार ने पूरा किया है। पूरे साल भर प्रदेश के मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता मनगढ़ंत और झूठे आरोप लगाकर भाजपा के पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा सरकार के चरित्र हनन में ही लगे रहे। 
बहरहाल भूपेश सरकार ने एक साल में ढाई घर भले नहीं चली विपक्ष की नजरों में लेकिन अपनी छाप प्रदेश की जनता के बीच छोड़ी। इससे इंकार नहीं कि कांग्रेस सरकार को अपने घोषणा पत्र के कई कामों को अभी करना बाकी है। यदि उसे पूरा नहीं की तो सरकार के प्रति जनता में नाराजगी बढ़ सकती है।














     

Sunday, November 10, 2019

मुहब्बत का सावन

                         मुहब्बत का सावन        
’’तन्हाइयों की बारिश में भीगते भीगते आषाढ़ बीत गया। अब तो सावन भी लग गया। सावन की झड़ी में क्या, इस बरस भी अकेला ही भीगना पड़ेगा? बोलो ना, क्या यह हसरत इस जन्म में मुकम्मल नहीं होगी। मेरी ये दुआ ऊपर वाला कुबूल करने से रहा,तुम ही कुबूल कर लोे’’।
देवेश की मिन्नतों पर रूपाली खिलखिला कर हंसते हुए बोली,’’तुम और तुम्हारी ख्वाहिशें.. दोनों अजीब है। कोई सावन में भीगनेे के लिए ऊपर वाले से दुआ मांगता है,वो अपनी महबूबा के साथ..! ऐसी दीवानगी मेंने कभी न देखी और न सुनी है। मै तुम्हारी यह दुआ कुबुल करने से रही। देखो, ऊपर वाला तुम्हारी दुआ कब कुबूल करता है... मै तो चली’’।
’’पिछले तीन बरस से, हर सावन में देवेश अपने संग मुझे भी सावन में भीगने की गुजारिश कर रहा है। जब वो बड़े प्यार से मुझे प्यासी नज़रों से देखता है तो मै उसकी आंखों में झांक कर देखती हूं कि प्यार का सागर कितना हिलकोरे मार रहा है। सच में, उसे प्यार है या फिर सिर्फ बातों में प्यार जता रहा है। वैसे सच कहूं..हर प्रेमी बातों में प्यार कुछ ज्यादा ही जताते हैं। हर बार की तरह उसे मेरा यही जवाब,मेरा सावन अभी आया नहीं है। ये भी नहीं जानती,वो कब और किस तरह आयेगा। जब आयेगा.. तब भीग लूंगी। कम से कम, अभी तो नहीं’’
सोच लो, कहीं ऐसा न हो तुम्हारा सावन बरसे न। और तुम बगैर भीगी ही रह जाओ’’। देवेश मुस्कुरा के बोला।
’’ऐसा होगा, इसकी उम्मीद कम ही है। और ऐसा हुआ तो फिर मै इस सावन के साथ भीग लूंगी। पर अभी मूड नहीं है। रूपाली आंखें मटकाते हुए बोली।
मुहब्बत और इश्क का यही तो कमाल है। लड़की मुहब्बत तो किसी से भी कर लेती है,लेकिन इश्क सबसे करे, कोई जरूरी नहीं। इश्क में ऐसा बहुत कम होता है कि लड़कियां जल्दीबाजी दिखायें। रूपाली के साथ भी ऐसा ही था। वो देवेश से मुहब्बत तो करती है,लेकिन इश्क के लिए अभी उसे कोई जल्दी नहीं है। क्यों कि रूपाली दुविधा में है। इश्क करे या फिर कॅरियर को देखे। वैसे मुलाकात की हथौड़ी, चाहत की शीलालेख पर बार बार पड़ती है तो, किसी न किसी आकार में ढल ही जाती है। माशूका को यदि आशिक इस बात का यकीन दिला दे कि वो उसके साथ बेवफाई नहीं करेगा। उम्र भर साथ रहने का भरोसा दिलाने में कामयाब हो जाये तो मुहब्बत को इश्क में तब्दील होने में वक़्त नहंीं लगता। रूपाली और देवेश की मुहब्बत में भी ऐसा ही हो रहा था। रूपाली को पहली नज़र में ही देवेश से मुहब्बत हो गई,फिर इश्क भी हो गया। पर उससे इज़हारे इश्क नहीं कर रही थी। पर उसे यकीन हो गया है कि देवेश के साथ वो खुश रहेगी।
जब हम दिल से किसी को चाहने लगते हैं और उस पर यकीन करने लगते हैं तो इश्क के मामले में किसी की भी सलाह,कांटो की तरह चुभती हैं। रूपाली के साथ भी यही हुआ।
रूपाली ने देवेश से शादी करने की इच्छा अपनी मां के सामने जाहिर की तो उसकी मां अराधना न केवल हैरान हुई बल्कि, शाद की बात सुनकर चैंक पड़ी। क्यों कि उन्हें तो कभी लगा ही नहीं कि उनकी बेटी प्यार में है। सभी की मां की तरह उन्होंने भी कहा, ’’ क्या तुम्हें ऐसा नहीं लगता कि अपने कॅरियर को किक मार रही हो? आज एक बड़े मीडिया हाउस में जिस ओहदे पर हो, वहां तक पहुंचने में लोगों को बरसों लग जाते हैं। हो सकता है कल को न्यूज़ एडिटर बना दी जाओ। देवेश के प्यार के लिए यदि तुम अपने कॅरियर को किक मार के सदा के लिए उसकी हो जाना चाहती हो तो, मै यही कहूंगी कि जल्दी बाजी कर रही हो। हो सकता है कि तुम्हारा यह डिसीजिन तुम्हारे आने वाले कल के लिए बेहतर न हो। तुम अपनी ज़िन्दगी के लिए राइट परसन चुन रही हो। मुहब्बत में कदम जब दिल की पगडंडी पर जब चलने लगते हैं तो बहुत कुछ दांव पर लग जाता है। सोच लो,तुम्हारा क्या दांव पर लगने वाला’’।
मां,देवेश एक विदेशी कंपनी में मैनेजर है। वो सेटल है। फिर जिस शिद्दत से वो मुझे प्यार करता है,जरूरी नहीं है कि आप मेरे लिए अरैंज मैरिज करें तो वो देवेश से अच्छा हो। मै देवेश को जानती हूं,पहचानती हूं। उससे प्यार करती हूं। हां,आपकी इस बात से सहमत हूं कि अपने कॅरियर को किक मार रही हूं। लेकिन कभी मुझे नौकरी की जरूरत पड़ी तो मै जानती हूं,अखबारांे में सर्विस कभी भी, मुझे मिल जायेगी। मेरे पास अनुभव है। योग्यता है। लेकिन देवेश मुझे मिलेगा, इसकी गारंटी नहीं है’’।
’’ठीक है। अभी तुम्हें देवेश और उसका प्यार दिख रहा है। नींद की रातों में उसकी आंखें रोशनी सी चमकती है। तुम्हारी हाथों की लकीरों में तुम्हें देवेश का साथ दिखता है। क्या तुझे कभी आकाश की आंखों में प्यार नहीं दिखा? जो बचपन से अब तक तेरे साथ रहा। छोटी- छोटी बातों पर तेरे रूठ जाने पर तुझसे स्वाॅरी कहता था। तेरे पास किताब नहीं थी,वो तुझे अपनी किताबें दे दी परीक्षा के वक़्त और खुद बगैर किताब के परीक्षा दिया। उसकी सदा कोशिश रही कि तुम प्रथम आओ। वो सदैव तुम्हारी मदद के लिए हाथ आगे किये रहता था। याद कर कितनी बार बीमार पड़ी और वो ही तुझे अस्पताल ले गया। तुझे आइस्क्रीम खाना होता था तो वो चिलचिलाती धूप में दुकान चला जाता था। कोई किसी के लिए इतनी दौड़ भाग क्यों करेगा? चाहत भी कोई चीज़ होती है। कोई जुबां से न बोले तो इसका मतलब यह तो नहीं हुआ कि उसके दिल में मुहब्बत नहीं है। रही बात मैनेजर की तो ..वो भी.. मैनेजर है,शहर के बड़े होटल में। आखिर देवेश और आकाश में फर्क क्या है? वो तुझे दिल से चाहता है। मै ने उसकी आंखों में तेरे लिए प्यार उमड़ते कई बार देखा है। हां,उसने कभी अपने प्यार का इज़हार नहीं किया होगा। डरता है, तेरी डाट से। वैसे कभी तुम उसे, अपने आगे फटकने नहीं दी। उसे अपने बराबर कभी खड़ा नहीं होने दी। इसलिए उसकी आंखों में,उसके दिल में,और उसकी चाहत में प्यार  नहीं देखी। लेकिन मै ने कई बार देखा है कि आकाश उसे दिल से बेहद चाहता है। मै देवेश को जानती नहीं,शायद इसलिए आकाश का पक्ष ले रही हूं। ऐसा हो सकता है। फिर भी,कहूंगी...अपनी जिन्दगी का बड़ा फैसला लेने से पहले, एक बार मेरी बातों पर गौर करके देखना। हमें कोई एतराज़ नहीं है, शादी तुम्हारी तो करनी ही है। तुम जहां कहोगी,तुम्हारी पसंद के लड़के से शादी कर देंगे’’।
’’मंा, आकाश मेरा केवल दोस्त है। दोस्त,राइट परसन नहीं होते। बेस्ट फ्रेंड,सदा बेस्ट ही रहते हैं। शादी के पहले भी और शादी के बाद भी। और आकाश को मैने उस नज़र से कभी देखा भी नहीं। उसके प्रति मेरे दिल में ऐसी फीलिंग भी नहीं है,जिससे मै उसके बारे में कुछ सोच सकूं। बड़ी मासूमियत से रूपाली ने कहा।
’’बेस्ट फ्रेंड यदि राइट परसन बनें तो ज़िन्दगी में कभी कोई शिकायत नहीं होती। कभी यह कहने का मौका नहीं मिलता बीवी को कि मै ने तुमसे शादी करके बड़ी गलती की। मुझे देख। तेरे पापा मेरे बेस्ट फ्रेंड थे। आज भी हैं। कभी उन्हें मुझ पर झल्लाते हुए देखी? नहीं ना। बल्कि मै ही उन पर हावी रहती हूं। लेकिन, वो कुछ बोलते नहीं। क्यों कि, वो जानते हैं कि उनकी बेस्ट फ्रेंड को कौन सी बात बुरी लग सकती है’’।
कई बार हमारी आंखों को भी ख़बर नहीं हो पाती है कि बहुतों का प्यार पानी में झलकता महल सा होता है। दिन की धूप में जिसकी बाहांें में झूम जाने का ख़्वाब सजाया और चांदनी रात के फूलों को जूड़े में सजा लेने की चाह जगी,ऐसे हमसफ़र जब भ्रम तोड़ते हैं,तब लगता है पहली नज़र का प्यार सिर्फ धोखा है’’। अनुराधा ने सलाह देते हुए कहा।
रूपाली प्यार के ऐसे मोड़ पर है जहां उसकी पहली और आखिरी चाहत सिर्फ देवेश। उसने अपना फैसला अनुराधा को सुना दिया कि उसके दिल के मकान पूरी तरह देवेश बस चुके हैं। किसी दूसरे की कल्पना नहीं कर सकती। अनुराधा भी रूपाली के फैसले को दरकिनार न करते हुए उसकी शादी देवेश के साथ कर दी।
ज़िन्दगी में कभी कभी इश्क पहले होता है और झंझटें बाद में आती है। रूपाली की नज़र में देवेश का का प्यार किसी इबादत से कम नहीं था। लेकिन उसका यह भ्रम तब टूटा जब उसकी ज़िन्दगी में अचानक एक ऐसी शाम आई कि,उसकी सुबह हुई कि नहीं, उसे पता ही नहीं चला। जिन आंखों ने पहली बार रूपाली को देखकर चांद कहा था। उसके ख़्यालों में खो जाने की चाह हुई थी। वो आज बेवफ़ाई कर रही हैं।हुआ ये कि रूपाली की एक मेडिकल रिपोर्ट ने देवेश और रूपाली के बीच जो प्यार की नदी बहती थी,वो अचानक सूख गई। रिपोर्ट ने देवेश को सकते में डाल दिया।
रूपाली की मेडिकल रिपोर्ट देखकर देवश की आंख फटी की फटी रह गई। वो हैरान हो गया। अपने आप से रिपोर्ट देखकर उसने कहा,’’ अभी से ये दिन देखने के आ गये? आखिर रूपाली की उम्र ही क्या है? सिर्फ 28 साल। और इतनी कम उम्र में उसे बे्रेस्ट कैंसर! हमारी शादी को हुए,अभी एक बरस ही तो हुए हैं। और ये मुसीबत! कैंसर के मरीजों का ख़्याल आते ही उसके पांव तले की जमीन खिसक गई। एक महीने तक उसने रूपाली को बताया नहीं कि उसे ब्रेस्ट कैंसर है। अलबत्ता एक महीने में वो ऐसा बदला कि उसे बरसों बाद देखने वाले देखकर कह ही नहीं सकते कि यह वही देवेश है। जो रूपाली की तारीफ करते थकता नहीं था। उसके प्यार के सिवा उसे कुछ दिखता नहीं था। अब बात, बात पर रूपाली पर गुस्सा करने लगा है। छोटी, छोटी सी बातांे पर.. उस पर खींझने लगा। चाय देने में एक मिनट की भी देरी हो जाने पर उसका हाथ उस पर उठ जाया करता था। देवेश में इस तरह के आये बदलाव से रूपाली हैरान थी। धीरे धीरे उसे भी अंदर ही अंदर गुस्सा आने लगा। मुझ पर जान लुटाने वाला,मुहब्बत की कस्में खाने वाला और कैडल डिनर के लिए आये दिन दबाव डालने वाला शख्स, अचानक बदल कैसे गया? उसमें इतनी नफ़रत से कहां से आ गई। बेवफाई जानबुझकर कर रहा है या फिर वाकय में बेवफा हो गया है?
एक दिन रूपाली को स्टेपलर की जरूरत पड़ी। देवेश के टेबल की ड्राज में से स्टेपलर निकालते वक्त एक फाइल दिखी। यहां कौन सी फाइल है? देखें,आखिर कैसी फाइल है। यह सोच कर उसने फाइल पलटी तो देखा कि यह तो उसकी मेडिकल रिपोर्ट है।जिसमें उसे ब्रेस्ट कैंसर है। रिपोर्ट देखकर रूपाली को पहले खुद पर यकीन नहीं हुआ। उसने कई बार अपना नाम पढ़ा। फिर उसने रिपोर्ट में दिये गये मोबाइल नंबर पर फोन करके डाॅक्टर से सच जानना चाहा। उधर से आवाज आई,कैसर पहले स्टेज पर है। 
मुझे कैंसर है। रिपोर्ट आये एक महीने हो गये हैं। और देवेश मुझसे अब तक यह बात छुपा कर क्यों रखी? बताया क्यों नहीं? आखिर क्या चल रहा है देवेश के मन में। कहीं वो इस रिपोर्ट से टूट तो नहीं गया। वो मेरे बारे में सोच,सोच के अंदर से हिम्मत तो नहीं खो दिया। इसीलिए मुझ पर झल्ला उठता है?
कैंसर होने की रिपोर्ट पर रूपाली सन्न रह गई। उसकी आंखों के सामने अंधेरा छा गया। अब क्या होगा। उसने जो सपने देखे थे देवेश के साथ, वो कैसे मुकम्मल होंगे। क्या वो अब मां नहीं बन पायेगी? मां,का ख्याल आते ही रूपाली सिहर उठी। देवेश क्या करेंगे? मै यदि नहीं बची तो...! मेरे बगैर देवेश कैसे रहेगा? देवेश उसके बगैर अधूरा हो जायेेगा। पागल हो जायेगा। उसकी दुनिया उजड़ जायेगी। अभी अभी ही तो हमारी शादी हुई थी। एक बरस में ही, इतना सब कुछ हो जायेगा। कभी सोचा न था। मुझे देवेश को धीरज बंधाना होगा, आदमी बहुत जल्दी टूट जाते हैं। चिंता न करें। मुझे कुछ भी न होगा। ब्रेस्ट कैसर ही हुआ है। पहला स्टेज है। बहुत लोगों को होता है। अब ब्रेस्ट कैंसर लाइलाज नहीं है। हां,जिन्दगी में इसकी कल्पना हम दोनों ने कभी नहीं की थी। खासकर इस उम्र में बिलकुल नहीं। ब्रेस्ट कैसर के बाद ज़िन्दगी खत्म नहीं हो जाती है। यह मर्ज अपने नाम से ही पूरे परिवार को डरा जरूर देता है। मगर मुझे देखिये, मै बिलकुल डरी नहीं हूं। तुम मेरे साथ हो तो.. फिर मुझे कैसा डर...!
अपने आप से कई बातें रूपाली कर ली। अगले पल ही उसने अपने आप को संभालते हुए खुद से बोली,मै जैसा सोच रही हूं,ये सच नहीं हो सकता। क्यों कि मरीज तो मै हूं। देवेश को तो मुझ पर दया दिखानी चाहिए। प्यार आना चाहिए। मुझे अधिक से अधिक खुश रखना चाहिए,लेकिन उनका व्यवहार  इसके ठीक उल्टा क्यों है? एक बार भी उन्होंने हमदर्दी नहीं दिखाई। हमदर्दी के दो शब्द भी नहीं बोले। मुझे कैंसर होते ही, कहीं किसी और से तो उनका इश्क नहीं चल रहा है? क्या मुझे कैंसर होने से देवेश बदल जायेगा..? उसकी मुहब्बत मेरे लिए कम हो जायेगी? उसकी मुहब्बत बदल जायेगी’’? एक साथ मन में कई सवाल रूपाली को घेर लिये। हर सवालों का जवाब चाहिए। यानी देवेश के आने तक उसका इंतज़ार करना ही पड़ेगा। उसे अभी फोन करना ठीक नहीं होगा’’।
रात को खाने की टेबल पर अचानक देवेश चीख पड़ा रूपाली पर। सब्जी में कोई इतनी मिर्ची डालता है..। तुम चाहती क्या हो? कभी दाल में नमक ज्यादा और कभी नमक ही नहीं। आखिर तुम्हें हो क्या गया है। कोई ऐसा खाना बनाता है? ऐसा लगता है तुमने तय कर लिया है कि अच्छा खाना बनाकर खिलाना ही नहीं है। यदि ऐसा है तो, मेरे साथ मत रहो। ऐसे में, तुम्हें अब और बर्दाश्त नहीं कर सकता। अपने मां के पास चली जाओ। ताकि मै चैन से रह सकूं। गुस्से में देवेश बोला।
सब्जी को चखते हुए रूपाली ने कहा,इसमें तो मिर्ची डाली ही नहीं है। मै ऐसे में तुम्हें अब और बर्दाश्त नहीं कर सकता,क्या मतलब देवेश..। रूपाली ने मासूमियत से कहा।
’’नहीं है मिर्ची तो तुम ही खा लो। मुझे ऐसी सब्जी नहीं खानी है, बस’’। चीख कर देवेश ने कहा।
ठीक है,मत खाइये। जो खाना है खा लो। मै बड़े जतन से तुम्हारी पसंद की आलू ,गोभी, मटर की सब्जी बनाई। वो ही पसंद नहीं है। कल ही बोले थे न,कि सब्जी में मिर्ची नहीं डालना। भूल भी गये। कोई बात नहीं। कुछ देर ठहर कर रूपाली बोली, गुस्सा शांत हो गया हो तो यह बताइये, मेरी मेडिकल रिपेार्ट पिछले एक माह से ला कर रखी है लेकिन,बताए क्यों नहीं कि, मुझे बे्रस्ट कैंसर है..!
भूल गया बताना। ब्रेस्ट कैंसर है,यह भी कोई बताने की चीज़ है। नहीं बताया तो क्या हो गया। और फिर तुमने रिपोर्ट देख तो ली’’।
’’एक महीने बाद देखी। इस बीच हम किसी अच्छे डाॅक्टर से मिल सकते थे। कैंसर है। कोई छोटी मोटी बीमारी नहीं। ऐसी बीमारी में क्या कोई ऐसी लापरवाही करता है? मुझे तुमसे यह उम्मीद नहीं थी’’।
’’उम्मीद तो मुझे भी नहीं थी कि तुम्हें कैंसर हो जायेगा’’। देवेश तेज आवाज में बोला।
तो,अब क्या करोगे? धीमी आवाज में रूपाली ने पूछा। उसे जो जवाब देवेश से मिले वो कैंसर से भी बड़ा भयावह था।
’’मैने तुमसे प्यार किया.. शादी किया..खुशी खुशी ज़िन्दगी जीने के लिए। इसलिए नहीं कि एक बीमार ज़िन्दगी को ढोऊं। मुझसे कोई उम्मीद भी नहीं रखना। सर्दी,खांसी,बुखार और मलेरिया जैसी बीमारी होती तो उसके इलाज़ के लिए न बोलता। लेकिन कैंसर..! यह तो मौत से भी बद्तर बीमारी है। मै ही नहीं,कोई भी इस बीमारी की शिकार बीवी से कैसे रिश्ता रखेगा? कैसर के इलाज़ के बाद भी, तुम  डिफेक्टिव समान की तरह हो जाओगी। सारी उम्र कैंसर हास्पीटल भागना पड़ेगा। कैंसर मरीज एक धड़कती लाश से ज्यादा कुछ नहीं है। बीवी होकर भी तुम्हारा होना.. न होना, कोई मायने नहीं रहेगा। तुम मां भी बन सकोगी, इसकी कोई गारंटी नहीं। यदि बन भी गई तो हमेशा डर बना रहेगा कि होने वाली संतान भी कहीं कैंसर की मरीज तो नहीं होगी..!
और कुछ कहने को बाकी हो तो कह लो। पता नहीं फिर कहने को न मिले। सुबुकते हुए रूपाली ने कहा।
’’हां,सच यही है। मेरी बातें कड़वी लग रही होगी,लेकिन गलत नहीं कह रहा हंू। और एक बात.. मै तुम्हारे कैसर इलाज के लिए अपना समय और पैसा जाया नहीं कर सकता। अच्छा होगा कि तुम अपनी मां के पास चली जाओ। मुझे कैंसर वाली बीवी का पति कहलाना पसंद नहीं है। मै तुम्हें नहीं ढो सकता। मै अपना कॅरियर देखूं कि या तुम्हारी बीमारी। जानती हो, बड़ी मुश्किल से नौकरी मिलती है। इस बीमारी के इलाज़ में कई माह लग जाते हैं। और मै इतनी लंबी छुट्टी नहीं ले सकता। इलाज़ कराता रहा तो नौकरी चली जायेगी। प्राइवेट फर्म में इतनी छुट्टी नहीं मिलती। इस बीमारी का भरोसा नहीं, कितने रूपये लगेंगे। वैसे भी तुम्हारे पापा ने दहेज में कुछ खास दिये भी नहीं। इसलिए तुम अपने पापा से कह सकती हो कि...।
बीच में ही टोकते हुए रूपाली ने गुस्से से कहा,’’क्यों,सात लाख दिये तो थे। क्या कम थे? तुम बहुत पानीदार हो तो वही रकम लौटा दो’’।
’’सात लाख जो दिये थे वो सब खर्च भी तो हो गये। कौन सा मेरे घर वालों ने बचा कर बैंक में डाल दिया। देखो मै कोई बहस नहीं करना चाहता। सीधी सी बात,मै कैंसर वाली औरत को बीवी बतौर नहीं रख सकता। और न ही मेरे पास तुम्हारे इलाज़ के लिए समय है’’। देवेश मुंह बनाते हुए कहा।
रूपाली को लगा जैसे उसके पैर तले की जमीन खिसक गई। सिर से आसमान गायब हो गया। जिसके लिए अपनी मां की बातों को इज्ज़त नहीं दी। नज़र अंदाज़ की। वो आज मुझे न केवल नज़र अंदाज़ कर दिया बल्कि, दिल से भी निकाल दिया। क्या ऐसा भी कोई महबूब होता है,जो सावन में एक साथ भीगने की तमन्ना रखता था.. वो कैंसर होने पर एक पल में.. सात फेरे की गांठ को खोल दे? नफ़रत करे,गुस्सा करे। हमसफ़र तो साथ साथ चलते हैं,ये कैसा हमसफ़र है ..जो साथी कोे तकलीफ में देखकर रास्ता बदल दिया। क्या,ऐसे ही लोग बेवफ़ा कहे जाते हैं’’..?
रूपाली हिम्मत से उठ खड़ी हुई और देवेश से कहा,’’ मुझे कैंसर हुआ है तो क्या हुआ,अभी ज़िन्दगी खत्म नहीं हुई है। मै अपने आप से लडूंगी। कोई मेरा साथ दे या न दे’’।
रूपाली अपनी मां के पास लौट आई। कई दिन बीत गये। रूपाली को चुप चुप देखकर अराधना ने एक दिन पूछा,क्या देवेश से झगड़ा करके बिना बताये उसे,यहां चली आई हो ? इस सवाल का कोई जवाब रूपाली ने नहीं दिया।
एक दिन अराधना ने देखा कि रूपाली अपने कमरे में चुप चाप रो रही है। अराधना ने गौर किया कि कोई बात है जो रूपाली उससे छिपा रही है। जानना जरूरी है। उसने आकाश को फोन कर बताया कि रूपाली आई है। उसे आये एक सप्ताह हो गये हैं। लेकिन उसे आज रोते हुए देखी। मगर वो कुछ बता नहीं रही है। उससे बात करके देख,शायद तुझे कुछ बताये’’।
कंपनी की तरफ से आकाश को एक सप्ताह के लिए मलेशिया जाने का ट्रिप मिला था। वह चाह रहा था कोई उसके साथ चले। उसने रूपाली को फोन कर कहा,’’तुझे आये एक सप्ताह हो गया और मुझे फोन करना भी जरूरी नहीं समझी। अरे हां,अब मुझे फोन क्यों करेगी। अब तो तुझे कोई और दोस्त मिल गया है। साथी मिल गया है। हमसफ़र मिल गया है। खैर। ये बता मलेशिया घूमने चलेगी क्या? दरअसल,मुझे कंपनी की तरफ से मलेशिया जाने का ट्रिप मिला है। यदि कोई एतराज़ न हो तो मेरे साथ चलती तो अच्छा रहता। अभी मै घर आ रहा हूं। दो टिकट फिल्म की लिया हूं। बहुत दिन हुए तेरे साथ फिल्म देखे। देख इंकार मत करना’’।
रूपाली ने कहा,’’मेरी तबीयत ठीक नहीं है। इसलिए मन नहीं कर रहा है। मै फिल्म देखने नहीं जा सकती। मम्मी के साथ चले जा’’।
’’मुझे कुछ नहीं सुनना है। तैयार रहना, आ रहा हंू। फिल्म नहीं देखने जाना है तो मत जा। मुझे पेट में दर्द रहता है इसलिए पहले डाॅक्टर के पास जाऊंगा। सब कुछ ठीक रहा तो ही फिल्म जायेंगे। ओ.के‘‘।
आकाश आ गया पर रूपाली तैयार नहीं हुई थी। अराधना के कहने पर मुश्किल से रूपाली आकाश के साथ जाने को तैयार हुई। रास्ते में आकाश ने कहा,पहले फिल्म चलें या फिर डाॅक्टर के पास’’?
रूपाली ने कहा,पहले लेडी डाॅक्टर के पास चलते हैं। उसके बाद फिर देखेंगे,कहां जाना है।
लेडी डाॅक्टर की तुझे क्या जरूरत पड़ गई? ठीक है, कह रही है तो पहले वहीं चलते हैं। फिल्म के लिए बहुत टाइम है’’।
डाॅ रूचि रस्तोगी से मिलने रूपाली जाने लगी तो आकाश भी उसके साथ अंदर चला गया। रूपाली पहले उसे बाहर ही बैठने को कहने वाली थी,फिर कुछ सोचकर कुछ नहीं बोली। रूपाली ने डाॅ रूचि को अपनी रिपोर्ट दिखाई।
रिपोर्ट देखकर डाॅ रूचि ने कहा,आपको तो ब्रेस्ट कैंसर हैं। लेट मत करो। अभी फस्ट स्टेज पर है। कोई खतरे की बात नहीं है। अच्छा होगा कि टाटा हास्पीटल में दिखा लो’’।
बे्रस्ट कैंसर हैं! आकाश ने हैरान होकर कहा। और अभी तक यह बात छिपा कर रखी थी!
डाॅक्टर रूचि से सारी बातें समझने के बाद आकाश ने रूपाली से कहा,ऐसा करते हैं फिल्म देखने का प्रोग्राम रिजेक्ट। हम पहले टाटा हास्पीटल चलते हैं। पहले फाइल बनवाते हैं। फिर डाॅक्टर से मिलते हैं। आज ही बहुत कुछ हो जायेगा। तुम्हारा पंजीयन, मेमोग्राफी और ब्लड की रिपोर्ट भी आ जायेगी।
रूपाली ने कहा,मुझे कैंसर है,येे बात मै मम्मी को अभी तक नहीं बताई हूं। तुम्हें पता है,इस मर्ज के इलाज़ में आदमी टूट जाता है। उसका साथ देने वाले भी मरीज हो जाते हैं। कैंसर वाले मरीज को  ढोना पड़ता है। मम्मी सुनेगी तो न जाने कैसा रियेक्ट करेंगी। क्या तुम्हें पता है इलाज़ में कितने रूपये लगेंगे? पहले घर चलते हैं। मम्मी से बात करते हैं,वो क्या कहती हैं। तब तय करेंगे क्या करना हैं। कैंसर हुआ है। अभी इतनी जल्दी खतरे के स्टेज पर नहीं पहुंच जायेगा। हमारे पास समय है’’।
‘‘मै तुम्हारी एक नही सुनूंगा। पहले अस्पताल चलते हैं। वहां देखते हैं आज क्या,क्या हो सकता है। और रहा सवाल मम्मी को बताने का तो वो फोन पर भी बता सकते हैं। लेकिन अभी मम्मी को कुछ नहीं बतायेंगे। रहा सवाल पैसे का तो,तुम्हारे, मेरे बीच ये पैसे की बात कहां से आ गई। तू मुझे अपना बेस्ट फ्रेंड नहीं मानती क्या? तेरी शादी होने के बाद, क्या अब मै तेरा बेस्ट फ्रेंड नहीं रहा? आकाश हक से कहा।
’’ऐसा मैने कब कहा कि तू मेरा बेस्ट फ्रेंड नहीं है। मेरी सांस जब तक चलती रहेगी, तब तक मै यही कहूंगी कि तू ही मेरा बेस्ट फ्रेंड है। बस,खुश। मेरी एक बात मान ले.. पहले घर चलते हैं’’। प्यार जताते हुए रूपाली ने कहा।
’’तेरा ये बेस्ट फ्रेंड आज तेरी बात नहीं सुनेंगा। आज मेरी सुनेगी’’। आकाश ने कहा।
रूपाली रास्ते भर सोचती रही,मै देवेश को अपनी जान समझती रही,लेकिन मेरी जाॅन तो कोई और है। क्या बेस्ट फ्रेंड ऐसे भी होते हैं..? टाटा हास्पीटल में एक बेंच में रूपाली बैठी रही और आकाश इधर से उधर दौड़ता रहा। रूपाली का ब्रेस्ट इक्जामिन के बाद डाॅक्टर ने मेमोग्राफी,और ब्लड की जांच लिखा। रिपोर्ट आने के बाद आॅपरेशन की डेट मिलेगी। दरअसल आकाश ने रूपाली की फाइल डिलेक्स श्रेणी की बनावाया। ताकि जल्द जांच हो जाये और आॅपरेशन भी।
तीन चार दिन में सारी रिपोर्ट आ गई। रूपाली के आॅपरेशन की डेट मिलने के बाद आकाश ने अराधना को बताया,’’रूपाली को ब्रेस्ट कैंसर है। इसलिए वो उस दिन रो रही थी‘‘।
’’ब्रेस्ट कैंसर ? हमारे खानदान में किसी को भी ब्रेस्ट कैंसर कभी नहीं हुआ। मुझे भी नहीं है। फिर इसे कैसे हो गया? ये कब से आई हुई है, लेकिन मुझे अभी तक बताई क्यों नहीं? कब पता चला? किस स्टेज पर है? डाॅक्टर से अभी तक मिली कि नहीं..? मुंबई में रहकर भी इतना लेट,हद हो गई? बड़ी हैरानी से अराधना ने एक संास में कई सवाल कर गईं।
’’चिंता करने की कोई बात नहीं। फस्ट स्टेज पर है। खतरे वाली बात नहीं है। जरा आॅपरेशन करके निकाल देंगे। हां कुछ कैमों लगेंगे। मेरे साथ रूपाली कहीं घूमने नहीं जाती थी,टाटा हास्पीटल ही जाती थी। बहुत डरी हुई थी। वो तो डाॅक्टर ने जब समझाया, तब इसकी हिम्मत बंधी’’। आकाश ने कहा।
ये लड़की,हद कर दी। कैंसर हो गया तुझे,देवेश को पता है कि नहीं? अराधना ने रूपाली से पूछा।
’’हां, मम्मी उन्हें सब पता है। उनका नाम मत लो। मै उनके लिए अजनबी हो गई और वो मेरे लिए’’। रूपाली चिढ़ कर बोली।
’’क्या कहा! तुम्हारे बीच कोई लड़ाई हुई है क्या? जो इस तरह बोल रही है। ये तो पति पत्नी के बीच होते रहता है। देख, तेरे पापा और मेरे बीच क्या झगड़ा नहीं होता। क्या मै इन्हें छोड़ कर चली गई या फिर ये मुझे’’। अराधना समझाते हुए रूपाली से कहा।
’’आप नहीं समझेंगी मम्मी। ऐसी बात नहीं है’’। रूपाली बड़े धैर्य से यह बात कही।
’’फिर कैसी बात है। मुझे जब तक बतायेगी नहीं, पता कैसे चलेगा। तुम दोनों के बीच हुआ क्या है’’। नाराजगी भरे अंदाज में अराधना ने कहा।
’’रूपाली विवश होकर विस्तार से सारी बात बताई तो अराधना सन्न रह गई। गजब कर दिया इस लड़के ने। क्या कोई ऐसा भी करता है? कहती थी कि देवेश बहुत अच्छा है। मुझे सदा खुश रखेगा। ये क्या? जो व्यक्ति पत्नी को कैंसर होने पर सैम्पथी दिखाने की बजाय, ऐसा बोले, उससे तो सारी ज़िन्दगी के लिए मुंख मोड़ लेना.. कहीं ज्यादा अच्छा है। ऊपर से ये कहना कि जब ठीक हो जाओ तब ही आना? जाहिर सी बात है कि उसे तुझसे प्यार कभी था ही नहीं। तेरी नौकरी, तेरी खुबसूरती और योग्यता को देखकर शादी किया था। मेरी बात मान ली होती तो आज ये दिन देखने को नहीं मिलते। जिसे कभी रिस्पांस नहीं दी,वो ही आज तेरे उस पल में काम आया, जहां देवेश को होना चाहिए था। मै कहती थी ना, बेस्ट फ्रेंड यदि लाइफ पार्टनर हों तो ज़िन्दगी में हर दिन सबेरा है’’।   
रूपाली जब तक आॅपरेशन थियेटर से नहीं निकली आकाश बाहर तकता रहा। उसे कमरे में ले जाया गया। आधे घंटे में उसे होश आ गया। सामने उसकी नज़र पड़ी तो उसे आकाश ही दिखा। जो उसके लिए गजरा और गुलाब का गुलदस्ता लेकर आया था। गजरा रूपाली को बेहद पसंद है। अपने बालों में अक्सर वो लगाया करती थी। ये बात देवेश को पता थी लेकिन, शादी के बाद वो कभी रूपाली के लिए गजरा लेकर नहीं आया। आकाश के हाथ में गजरा देखकर उसकी आंखें भर आई। 
’’अर,े अब रोना क्यों? आॅपरेशन हो गया और तुम्हें पता भी नहीं चला। अब जल्दी ठीक हो जाओगी। तुम्हें तो खुश होना चाहिए कि तुम्हारे साथ पूरा घर परिवार है’’। चहक कर आकाश ने कहा।
परिवार! लड़की की जब शादी हो जाती है तो उसका परिवार सिर्फ ससुराल होता है। लेकिन मेरे ससुराल से तो कोई भी मुझे देखने नहीं आया, आकाश। रूआंसी होकर रूपाली ने कहा।
मेरा कहने का मतलब,मम्मी अभी आती होंगी। उनका फोन कुछ देर पहले आया था। आकाश ने कहा।
तभी अराधना जूस,फल,पानी आदि लेकर पहुंची।
अराधना ने आकाश से कहा, ऐसा कर तू सुबह से कुछ खाया पिया नहीं है। खाना लाई हूं,खा ले। रूपाली जूस पी लेगी। तू थक गया होगा। तूझे मलेशिया जाना था न। रूपाली के चक्कर में तेरा जाना कैंसिल तो नहीं हो गया?
नहीं मम्मी, कंपनी को बता दिया है कि अभी नहीं जा सकता। फिर कभी चला जाऊंगा। रूपाली का ट्रीटमेंट ज्यादा जरूरी है। आप आ गई हैं तो मै निकलता हूं। शाम को फिर जाऊंगा’’। कहकर आकाश चला गया।
कोई गैर अपना बनकर साथ दे या फिर सहयोग करे तो... दर्द खुशबू बनकर दिल में उतर जाता है। रूपाली उस खुशबू को महसूस कर रही है। वैसे रूपाली का कुछ लगता नहीं आकाश । आकाश के मां बाप बचपन में ही गुजर गये थे। वो अपने चाचा और चाची के साथ रहता था। दोनों की कोई औलाद नहीं होने की वजह से आकाश को अपने बेटे की तरह पाल कर बड़ा किये। अराधना भी उसे बेहद दुलार और प्यार देती आई हैं। रूपाली और आकाश दोनों एक साथ बड़े हुए।
मिट्टी के चूल्हे में इश्क की अंगीठी के जलने का पता दिल को तब होता है,जब वो किसी और के  लिए धड़कने लगता है। आज रूपाली महसूस कर रही है कि देवेश तो उसके लिए बना ही न था। उसके लिए तो आकाश ही बना था,मै ही उसे पहचानने में गलती कर गई।
वो आकाश और देवेश की तुलना कर रही थी अपने आप में,तभी अराधना ने कहा,’’यदि आकाश न होता तो इतनी जल्दी तेरा आॅपरेशन भी न हो पाता। मुझे उसने पता ही नहीं होने दिया कि तुझे कैंसर है। ऐसा लगता है बचपन में आकाश मेरे हाथों का बना जितना पोहा खाया था, उसने उस नमक का कर्ज़ आज उतार दिया’’। 
हां,मम्मी आपके नमक का कर्ज़ तो उसने उतार दिया लेकिन मुझ पर उसका उधार चढ़ गया। आज मै बेफिक्र होकर संासे ले रही हूं तो उसकी वजह से। देवेश तो मुझे मरने के लिए छोड़ दिया। मेरी ज़िन्दगी के होंठ तो नीले पड़ गये थे। जब मैने अपनी मेडिकल रिपोर्ट देखी कि मुझे कैंसर है, तब उम्र के आकाश पर मेरे सपनों के सारे परिंदे एकाएक गायब हो गये’’।
’’कोई हमारे सपनों के परिंदों को उढ़ा देता है तो कोई उसे वापस लाने चुपके से ज़िन्दगी में आ  जाता है। तुझे याद भले न हो लेकिन मैने कहा था,देवेश के लिए तू अपने कॅरियर को किक मार कर गलती कर रही है। प्यार को बचाये रखने के लिए जरूरी है एक दूसरे में ढलना। एक दूसरे को ट्रस्ट करना। प्यार तो शीशा है। जरा सी ठेस लगी तो पहले प्यार का ताज़महल ढहता है उसके बाद दिल टूटता है’’। अराधना ने कहा।
’’देवेश का नाम मत लो मम्मी। जो मुझे मरने के लिए छोड़ दिया हो,उसका नाम लेकर मेरी पीड़ा को और मत बढ़ाओ। मुझे नई जिन्दगी,बेस्ट फ्रेंड ने दी है। लगता है मेरे आंसुओं से उसका कोई रिश्ता है। मै आज समझी हूं कि कोई जुबां से न बोले,तो इसका मतलब यह नहीं कि उसके दिल में अपने दोस्त के प्यार और उसकी चाहत की तड़प नहीं होती। अब उसके हिस्से का सावन नहीं रोयेगा। न ही उसकी चाहतों का बादल बिछड़ेगा। मै इस करवा चैथ में चांद किसके लिए देखूंगी,यह तय कर लिया है’’।
रूपाली के गालों पर आकाश के लिए प्यार के आंसू लुढ़क आये। जो बता रहे थे मुहब्बत के सावन का कोई महीना नहीं होता। दिल कभी कभी अपनों के लिए खुशी के आंसू भी रो लेता है।

Thursday, October 24, 2019

जोगी के लिए मुश्किलों का पहाड़


अजीत जोगी अपने ही बनाये फंदे में फंस गये हैं। उन पर गिरफ्तारी के साथ ही उनकी विधायकी पर भी तलवार लटक रही है। अंतागढ़ उप चुनाव कांड में अजीत और अमित जोगी आरोपी हैं। जेसीसी के प्रदेश अध्यक्ष अमित जोगी के जेल से बाहर निकलने की संभावना कम है। ऐसे में सवाल है कि जोगी की पार्टी बचेगी या खत्म हो जायेगी।








0 रमेश कुमार ’’रिपु’’
                   ’’छत्तीसगढ़ में तीसरी राजनीतिक ताकत जोगी की पार्टी है’’। डाॅ रमन सिंह कभी यह कहकर जोगी का राजनीतिक कद बढ़ाया था। वहीं जोगी की पार्टी को भाजपा की ‘बी’ टीम कांग्रेस कहती आई है। आज पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी और उनका पुत्र अमित जोगी की सियासत के सितारे गर्दिश में हैं। और छत्तीसगढ़ की तीसरी सियासी ताकत इन दिनों संकट के दौर से गुजर रही है। जेसीसी (जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़) के प्रदेश अध्यक्ष अमित जोगी को अपनी नागरिकता की गलत जानकारी देने के आरोप में सेशन कोर्ट ने जेल भेज दिया है। वहीं छत्तीसगढ़ की आदिवासी कल्याण विभाग की उच्चाधिकार हाई पावर कमेटी ने अजीत जोगी को आदिवासी मानने से इंकार कर  दिया है। अजीत जोगी के खिलाफ समीरा पैकरा की शिकायत पर धारा 420,467,468,471 के तहत अपराध दर्ज किया गया है। अंतागढ़ टेप कांड मामले में जोगी के खिलाफ एक नया मोड़ तब आ गया है। अंतागढ़ उप चुनाव कांड के आरोपी पूर्व विधायक मंतूराम पवार ने उपचुनाव को प्रभावित करने के लिए 7.50 करोड़ रूपये के लेन देने का खुलासा प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्टेªट नीरज श्रीवास्वत की कोर्ट में कलमबंद बयान दर्ज कराया। उन्होंने कहा कि उन्हें एक पैसा नहीं दिया गया। 2014 में हुए अंतागढ़ उप चुनाव के सौदे में फिरोज सिद्दकी और अमीन मेनन की भूमिका बिचैलिये की थी। डाॅ रमन सिंह का पहली बार नाम अंतागढ़ मामले में सामाने आया है। इससे राजेश मूणत,अजीत जोगी,अमित जोगी की मुश्किलें बढ़ सकती है। इन तीनो के खिलाफ पंडरी थाने में केस दर्ज है। मामले की जांच एसआइटी कर रही है। इस कांड की जारी सी.डी में इन सभी नेताओं की आवाज होने की आशंका है,लेकिन किसी ने भी अपनी आवाज का सेम्पल एसआइटी को अभी तक नहीं दिया। अब मंतूराम पवार के इस शपथ पत्र से जोगी परिवार पर एक और मुश्किल बढ़ गई। वहीं जेसीसी के मीडिया विभाग के अध्यक्ष इकबाल अहमद रिजवी ने कहा, बीजेपी में रहते हुए मंतूराम पवार ने जिस तरह का बयान दिया है, इससे साफ जाहिर है कि वे कांग्रेस प्रवेश करने वाले हैं। कांग्रेस से मिले प्रलोभन के कारण ही वे इस प्रकार का बयान दे रहे हैं’’। पूर्व मुख्यमंत्री डाॅ रमन सिंह ने कहा,’’ दंतेवाड़ा उप चुनाव नजदीक है।  पहली बार मेरे खिलाफ राजनीतिक षडयंत्र के तहत मेरा नाम उछाला गया है। कांग्रेस की सोची समझी रणनीति के तहत मंतूराम पर दबाव बनाकर यह बयान दिलवाया गया है। इससे पहले भी मंतूराम ने विभिन्न न्यायलयों में शपथ पत्र पर बयान दिया है कि उन्होंने स्वेच्छा से अपना नामांकन वापस लिया था। और इस प्रकरण में पैसा का किसी तरह से कोई लेने देन नहीं हुआ था। इस संबंध में कोर्ट में अपना पक्ष रखूंगा’’। 
कोर्ट ने की गंभीर टिप्पणी
अजीत जोगी के खिलाफ दर्ज मामले से अब वे विधायक रहेंगे या नहीं, 19 सितंबर से कोर्ट इस मामले कीें सुनवाई करेगी। चूंकि अजीत जोगी की पार्टी जेसीसी (जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़) जोगी घराने के इर्द गिर्द घूमती है। अजीत जोगी अपनी पार्टी के सप्रीमों हैं। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर बनी हाई पाॅवर कमेटी की रिपोर्ट पर,इसकी संभावना कम ही है कि हाई कोर्ट जोगी की जाति को लेकर कोई अलग से निर्णय देगी। उनकी विधायकी खत्म होने की आशंका ज्यादा है। वहीं अमित जोगी को हाई कार्ट से बेल मिलने की संभावना कम बनती दिख रही है। उसकी वजह यह है कि सेशन कोर्ट के जज विनय प्रधान ने अपने फैसले में कहा,’’ प्रजातंत्र के पावन धरा पर विधानसभा का सदस्य निर्वाचित होने के लिए फर्जी दस्तावेज तैयार किये हैं। अपराध की गंभीरता को देखते हुए जमानत याचिका खारिज की जाती है’’। वहीं रायपुर की विशेष मजिस्टेट लीना अग्रवाल ने अंतागढ़ टेपकांड मामले में आरोपी जेसीसी के प्रदेश अध्यक्ष अमित जोगी को ट्रांजिट रिमांड पर अदालत में पेश करने का आदेश दिया है। गौरेला पुलिस को पेशी के लिए 12 सितंबर तक का वक्त दिया है।  तीन बड़ी अपराधिक घटनाओं के बाद जेसीसी पार्टी को लेकर सियासी अटकलों का बाजार गर्म है। जोगी की पार्टी जेसीसी रहेगी या टूट जायेगी। अमित जोगी को धोखा धड़ी के जुर्म में कम से कम दो साल की सजा हो सकती हैं। इसलिए कि उनके खिलाफ पुख्ता दस्तावेज हैं। अमित जोगी के जेल में होने से अजीत जोगी भावानात्मक रूप से टूट जायेंगे। उनकी विधायकी खत्म होने और अंतागढ़ मामले की वजह से पार्टी का जनाधार तो खत्म होगा ही साथ अब उन पर जनता की विश्वसनीयता भी घटेगी। सवाल यह है कि जोगी अपनी पार्टी की कमान किसके हाथ में देंगे? 
रेणू की रूचि नहीं राजनीति में
श्रीमती डाॅ. रेणू जोगी पार्टी में ज्यादा अनुभवी हैं। यदि अजीत जोगी की गिरफ्तारी होती है तो पार्टी की कमान रेणू जोगी के हाथ आ सकती है। लेकिन पार्टी को पूरा समय देने में वे भी अक्षम हैं। स्वास्थ्य उनका भी ठीक नहीं रहता। वहीं रेणू जोगी पर कोई आरोप नहीं है। स्वच्छ छवि है ही साथ ही  समझदार नेत्री हैं। लेकिन अजीत जोगी के आदिवासी मामले पर हाई कोर्ट का भी फैसला हाई पाॅवर कमेटी जैसा ही रहा तो फिर रेणू जोगी के संदर्भ में भी तहकीकात के सवाल उठाये जा सकते हैं। उन्होंने आदिवासी के रूप में क्या, क्या, सुविधायें और लाभ लीं। यदि ऐसा कुछ भी साक्ष्य मिलता है तो फिर श्रीमती रेणू जोगी भी फंस सकती हैं। वैसे रेणू जोगी की दिलचस्पी राजनीति मे अब नहीं है। इसी से स्पष्ट है कि वे अंत तक जोगी की पार्टी में शामिल नहीं हुई। लेकिन कांग्रेस से इस्तीफा भी नहीं दिया,पर जोगी के साथ हमेशा रहीं। उन्हें इसके लिए कई बार नोटिस भी दिया गया। जब कांग्रेस ने उन्हें कोटा विधान सभा के लिए टिकट नहीं दी तो वो अजीत जोगी की पार्टी की टिकट पर चुनाव लड़ीं। आज जेसीसी से कोटा की विधायक हैं। ऐसे में यह भी संभावना खत्म हो जाती है कि वे कांग्रेस मंे कभी लौटेंगी। 
जेसीसी का अगला अध्यक्ष कौन?
अजीत जोगी अपनी हर सियासी गोटी बहुत सोच समझ कर चलते हैं। अपने ऊपर किसी भी तरह के खतरे की आशंका को वे पहले ही भंाप जाते हैं। वे कभी नहीं चाहेंगे कि रेणू जोगी पर कोई राजनीतिक संकट मंडराये। ऐसे में उनके घर में उनकी बहू ऋचा जोगी पर जाकर नजर ठहरती है। ऋचा जोगी राजनीति में बहुत समय से सक्रिय हैं। विपक्ष की भूमिका में वे डाॅ रमन सिंह से लेकर भूपेश सरकार तक सक्रिय दिखीं। भूपेश बघेल का ड्रीम प्रोजेक्ट नरवा,घुरवा,गोठान और बाड़ी मामले को सबसे पहले उठाया कि यह प्रोजेक्ट केवल भ्रष्टाचार का जरिया है। पिछला चुनाव जोगी ने ऋचा को अपनी पार्टी के बजाय अकलतरा से बसपा से लड़ाया। बहुत कम वोटों के अंतर से वे चुनाव हारी लेकिन राजनीति में अपनी सक्रियता नहीं छोड़ी। युवाओं के बीच अधिक लोकप्रिय हैं। ऐसे में संभावना यह भी बनती है कि रेणू के इंकार करने पर ऋचा जोगी को प्रदेश अध्यक्ष बनें। वहीं रेणू जोगी कभी नहीं चाहंेगी कि पार्टी की कमान ऋचा के हाथ में आये। क्यों कि ऋचा जोगी सबसे अधिक तेज तर्रार नेत्री हैं,पार्टी के लोगों का कहना है कि श्रीमती रेणू जोगी और ऋचा में बनती नहीं। ऋचा तभी प्रदेश अध्यक्ष बन सकती हैं जब अमित जोगी कहेंगे। अजीत जोगी पार्टी की कमान लोरमी के विधायक धरमजीत सिंह को भी सौप सकते हैं। धरम जीत सिंह चार बार के विधायक और विधान सभा के उपाध्यक्ष रह चुके हैं। अनुभवी होने के साथ ही अजीत जोगी के विश्वासपात्र भी हैं। पूर्व विधायक आर. के. राय पर जोगी को कम भरोसा है। सभी को पता है कि वे जोगी के साथ रहते तो हैं,लेकिन कांग्रेस में वापस आने के लिए कांग्रेस के सभी बड़े नेताओं से संपर्क में है। भूपेश बघेल की पसंद आर. के राय नहीं हैं,इसलिए उनकी कांग्रेस में वापसी अब तक नहीं हुई है।
देवव्रत से परहेज क्यों
खैरागढ़ विधायक देवव्रत सिंह जो कि कांग्रेस से सांसद भी रहे हैं। भूपेश बघेल से इनकी कभी नहीं पटी। कांग्रेस में रहकर इन्होंने भूपेश बघेल की कई बार कांग्रेस हाई कमान से लिखित में शिकायत भी की। इनकी लोकप्रियता खैरागढ़ से राजनांदगांव तक है। युवाओं के बीच सबसे अधिक सक्रिय और रईस नेता हैं। युवा हैं, धारा प्रवाह किसी भी मुद्दे पर बोलने में सक्षम हैं। विपक्ष की भूमिका बड़ी इमानदारी से निबाहते हैं। वहीं पार्टी के लोगों का कहना है कि जोगी कभी नहीं चाहेंगे कि उनकी पार्टी का अध्यक्ष कोई ऐसा व्यक्ति बने जो पार्टी पर अपना दबदबा रखे। जोगी जानते हैं कि देवव्रत बहुत तेज और किसी की नहीं सुनने वाले नेताओं में से हैं। वे एक बार फैसला ले लिये तो आसानी से बदलते नहीं हैं। देवव्रत ंिसंह की वजह सेे जोगी घराने का पार्टी में कोई अस्तित्व ही नहीं रह जायेगा। इससे इंकार भी नहीं है कि देवव्रत सिंह के अध्यक्ष बनने से कांग्रेस और भाजपा दोनों को नुकसान है। भाजपा नहीं करेगी मदद
सबसे बड़ा सवाल यह है कि अपने बनाये राजनीतिक चक्रव्यूह में फंसे जोगी को क्या भाजपा मदद करेगी?इसकी संभावना कम ही दिखती है। उसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि संघ नहीं चाहेगा कि जोगी राजनीति में मजबूती से खड़े रहे हैं। यह अलग बात है कि डाॅ रमन सिंह जोगी को तीसरी सियासी ताकत अपने राजनीतिक फायदे के लिए बताते रहे। लेकिन उसका फायदा विधान सभा चुनाव में नहीं मिला। जिससे डाॅ रमन सिंह की राजनीतिक नजरिये से संघ के समक्ष बड़ी भद्द हुई है। अब डाॅ रमन सिंह सत्ता से बाहर हैं। लेकिन नान घोटाला और अंतागढ़ उप चुनाव कांड में उनके नाम आने से उनकी साख कलंकित हुई है। उनका दामाद डाॅ पुनीत गुप्ता भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरा है। डाॅ रमन सिंह की सत्ता जाने के बाद से कोर्ट के चक्कर में डाॅ पुनीत गुप्ता का समय जाया जा रहा है। भाजपा बंटी हुई है। डाॅ रमन सिंह के साथ संघ भी नहीं है। जाहिर है कि जोगी भाजपा की ‘बी’ टीम होकर भी अकेले पड़ गये हैं।
जोगी के खिलाफ संघ
सामने नगरीय निकाय और पंचायत चुनाव है। डाॅ रमन सिंह चाहते हैं कि चुनाव में जोगी की मौजूदगी रहे। इसलिए अमित जोगी को जेल हुई तो उन्होने भूपेश सरकार को घेरते हुए कहा,सरकार हिम्मत से क्यों नहीं कहती है कि हां हमने अमित जोगी को गिरफ्तार किया है। सरकार को बोलने में परेशानी क्यों हो रही है’’। संघ नहीं चाहता कि जोगी राजनीतिक रूप से मजबूत हों और सक्रिय रहे हैं। इसकी वजह यह है कि संघ हिन्दू राजनीति का समर्थक है। संघ के ज्यादातर लोग अजीत जोगी को ईसाई मानते हैं। जोगी के मुख्यमंत्री रहने के दौरान छत्तीसगढ़ में ईसाई मिशनरी को ज्यादा बढ़ावा मिला है। दिलीप सिंह जूदेव सारी जिन्दगी आदिवासियों का पैर धोकर उन्हें ईसाई से हिन्दू धारा में लाते रहे। आज जोगी अपनी जाति की लड़ाई लड़ रहे हैं। छत्तीसगढ़ में उनकी जाति को लेकर कांग्रेस के नेता ही एक मत नहीं है। जोगी के साथ लंबे समय तक साथ रहे नगरीय प्रशासन एवं विकास मंत्री शिव डहरिया कहते हैं,जोगी न आदिवासी हैं और न ही सतनामी हैं’’।
मुझ पर आरोप गलत हैः भूपेश
मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कहा,मुझ पर लगाये गये आरोप बिलकुल गलत हैं। जोगी पर आरोप भाजपा ने लगाये उनकी जाति की जांच भाजपा ने की। भाजपा की ही समीरा पैकरा ने शिकायत की थी। यह पूरा किया कराया तो भाजपा का है। जोगी ने आदिवासी का अपना जाति प्रमाण पत्र दिखाया। कांग्रेस ने उन्हें विधायक,मंत्री,मुख्यमंत्री बनाया। लेकिन उनका जाति प्रमाण पत्र ही गलत हो जाये तो उसमें क्या किया जा सकता है। 
बहरहाल जोगी की सियासत के सितारे गर्दिश में हैं। सभावना है कि आने वाले दिनों में प्रदेश की राजनीति में कई बदलाव हो सकते हैं।

नक्सली झीरम पार्ट टू के मूड में..

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भूपेश सरकार से नाराज नक्सलियों ने सरकार के साथ उद्योग मंत्री कवासी लखमा को देख लेने की चेतावनी देकर खलबली मचा दिये हैं। सरकार से माओविदियों की नाराजगी की वजह यह है कि कोतागुडा गांव और गोमियापाल में तीन,तीन ग्रामीणों की पुलिस ने नक्सली बताकर हत्या कर दी। भूपेश सरकार नक्सवाद पर वही काम कर रही है जो रमन सरकार ने किया। सवाल यह है कि नक्सलियों की नाराजगी कहीं झीरम पार्ट टू को अंजाम तो नहीं देगी?

0 0 रमेश कुमार ’’रिपु’’’
                  नक्सली क्या अब कांग्रेस नेताओं को अपना निशाना बनायेंगे? झीरम पार्ट टू को अंजाम देंगे? दंतेवाड़ा के भाजपा विधायक भीमा मंडावी की हत्या के बाद ऐसी क्या वजह है कि नक्सली उद्योग मंत्री कवासी लखमा को देख लेने की धमकी दी। आम आदमी की सांसे वैसे ही दहशतजदा है। बस्तर में कहा जाता है,’’यहां के आदिवासी को नक्सलियों का मुखबिर बताकर पुलिस गोली मार देती है अथवा नक्सली पुलिस का मुखबिर कहकर गोली मार दते हैं। यानी हर हाल में गोली मौत का वारंट है बेकसूर आदिवासियों के लिए।
गोली नक्सलियों की हो या फिर पुलिस की,मारा तो आदिवासी ही जाता है। माओवादी अब आदिवासियों का शुभ चिंतक बनने के लिए पुलिस पर आरोपों की गोलियों चलाने लगे हैं। जब जब कोई आदिवासी पुलिस की गोली से मरता है तो नक्सली प्रेस नोट जारी कर सरकार को कटघरे में खड़े करते हैं। जाहिर सी बात है कि इन दिनों भूपेश सरकार से नक्सली नाराज चल रहे हैं। नक्सलियों की दक्षिण बस्तर डिविजनल कमेटी के सचिव विकास ने प्रेस नोट जारी कर कहा, सुकमा जिले के चिंतलनार पंचायत स्थित कोतागुड़ा गांव में 14 सितंबर को ग्रामीण अपने गांव के पुजारीगायता को चुनने के लिए अपनी परंपरा के अनुसार शिकार करने जंगल में गए थे। जंगली सुअर शिकार के दौरान घायल हो गया था,उसका पीछा कर रहे थे। इसी बीच चिंतलनार थाना अंतर्गत के बुर्कापाल कैंप से गश्त पर निकले डीआरजी के जवानों ने ग्रामीणों पर अंधाधुंध गोलीबारी कर सोड़ी देवाल, मुचाकी हड़मा, मुचाकी हिड़मा की निर्मम हत्या कर दी। इनमें से सोड़ी देवाल की घटना स्थल पर ही मौत हुई जबकि दो अन्य ग्रामीणों को घायल अवस्था में पकड़कर उन्हें आमानवीय यातनाएं देकर पुलिस ने उनकी जघन्य हत्या की। अपने दो पेज के पर्चे में माओविदियों ने राज्य सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा कि सरकार चुनावी वायदा भूल गई है। ऐसा लगता है कि भाजपा शासनकाल में कांग्रेस ने फर्जी मुठभेड़ों के विरोध का केवल दिखावा किया है। कथित रुप से ग्रामीणों की हत्या और प्रताड़ना जारी है’’। माओवादियों ने कवासी लखमा को उद्योगों का समर्थक बताया और धमकी दी है। कवासी लखमा आदिवासी विरोधी हैं। उसकी चिकनी चुपड़ी बातों का भंडाफोड़ करें। जबकि कवासी के राजनीतिक विरोधी दबे सुर में नक्सली हिमायती उन्हें बताते हैं। लेकिन माओवादियों की धमकी इस ओर इशारा कर रही है कि कवासी उनके निशाने पर हैं।
इसी तरह की घटना दंतेवाड़ा के गोमियापाल में भी हुई। यहां भी पुलिस ने तीन निर्दोष आदिवासियों को गोली मार दी। गांव के पांच लड़के शराब पी रहे थे। पुलिस ने मडकामरास का पोदिया और मदाड़ी के भीमा को जबरदस्ती अपने साथ ले गई। हिड़मा पुलिस को चकमा देकर अंधेरे का लाभ उठाकर भाग गया। पुलिस अजय,पोदिया और लच्छू को लेकर आगे निकल गई। भीमा पुलिस की गोली का शिकार होने से बच गया। इस मामले पर सामाजिक कार्यकत्र्ता सोनी सोरी और बेला भाटिया ने पुलिस थाने में शिकायत करने पहुंची तो पुलिस ने उल्टे इन लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर दिया।

सलवा जुडूम का विरोध
गौरतलब है कि सलवा जूडूम का कवासी लखमा ने विरोध किया था। तब से कवासी रमन सरकार और सलवा जुडूम समर्थकों की आंखों की किरकिरी बन गये थे। तत्कालीन कलेक्टर के. आर. पिस्दा ने राज्य सरकार को एक गोपनीय पत्र भेजा था जो कि कलेक्ट्रेट में ही सार्वजनिक हो गया था। पत्र में लिखा गया था कि कवासी लखमा से सुरक्षा ले ली जाए। इन्हें नक्सलियों से कोई खतरा नही है। अब राज्य सरकार ने इनकी और इनके बेटे हरीश लखमा की सुरक्षा बढ़ा दी है।

कवासी पर गंभीर अरोप
नक्सलियों ने प्रदेश के उद्योगमंत्री कवासी लखमा को गद्दार और धोखेबाज बताया है। चुनाव के पहले आदिवासी हितैषी होने का ढिंढोरा पीटने वाले ढोंगी आदिवासियों का गद्दार, धोखेबाज कवासी लखमा सत्ता में बैठते ही आदिवासियों के जल,जंगल,जमीन व संसाधनों को कौड़ियों के भाव देशी विदेशी पूंजीपतियों के हवाले करने के लिए स्वयं उद्योग मंत्री बन बैठे हैं। उन्होंने लखमा पर फर्जी मुठभेड़ को अंजाम देने वाले पुलिस कर्मियों को आउट आफ टर्न प्रमोशन दिलवाने का आरोप लगाया है। कवासी की देखरेख में छत्तीसगढ़ भू अर्जन, पुनर्वास, पुर्न व्यवस्थापन कानून 2019 पास कराया गया है, जो कि राज्य के किसानों, दलितों व आदिवासियों की जमीनों, जंगलों, खदानों को छीनकर पूंजीपतियों के हवाले करने के लिए ही बनाया गया है।

नक्सली मना रहे हैं वर्षगांठ
मुख्यमंत्री के बयानों से एक बात साफ है कि वे नक्सलियों से दो दो हाथ करने को तैयार हैं।   चैकाने वाली बात है कि माओवादियों के प्रति इतनी सख्ती दिखाने के बावजूद माओवादी बैनर में लिखा है कि 50 वीं वर्षगांठ मनाने एवं नई पार्टी भाकपा माओवादि की 15 वीं वर्षगाँठ समारोह को 21 सितंबर से 8 नवम्बर तक देश भर में क्रांतिकारी जोश के साथ मनाने के साथ दीर्घकालीन जन युद्ध को देशभर में विस्तृत और तेज करना है। नक्सलवादी क्रांति जिंदाबाद। माओवाद ऐलान कर रखा है कि बड़े पैमाने पर पार्टी का सदस्य बनो और दंडकारण्य के क्रांतिकारी आंदोलन को आगे बढ़ाएं। जाहिर सी बात है कि नक्सली संगठन फरवरी तक नई भर्ती करेंगे। उसके बाद वे हमला करेंगे। वहीं उनकी दहशतगर्दी अभी भी कायम है।
गृह मंत्री ताम्रध्वज साहू ने कहा कि इन नौ महीनों में कांग्रेस सरकार ने नक्सली गतिविधियों पर काफी हद तक काबू पाया है। पूर्ववर्ती सरकार में साहस ही नहीं था वर्ना आज तस्वीर कुछ और होती। दंतेवाड़ा की कांग्रेस विधायक देवती कर्मा बोलीं. नक्सल पहले भी था आगे भी रहेगा, इसको खत्म करना मुश्किल है।
डी.जी डी.एम अवस्थी कहते हैं,’’ नक्सली डरे हुए है। इसलिए लगातार इनामी नक्सली सरेंडर कर रहे हैं। प्रदेश में माओवाद लगातार कमजोर होता जा रहा है। ऐसा नहीं लगता कि वे झीरम पार्ट टू कर सकेंगे। वहीं माना जा रहा है कि यदि सरकार नक्सलियों के प्रति अपना सख्त रवैया बनाई रखी तो नक्सली किसी गंभीर वारदात को अंजाम दे सकते हैं। वहीं भविष्य की रणनीति के तहत खुलेआम नई भर्ती का पोस्टर,बैनर और पर्चे बांट रहे हैं, जो अच्छा संकेत नहीं है।

नक्सली वारदातें दो माह की
0 नक्सलियों ने पुलिस की मुखबिरी करने का आरोप लगाते हुए मडकम रोहित की हत्या कर दी है। घटना सुकमा जिले के डब्बाकोंटा की है।
0 नारायणपुर में नक्सलियों ने एक ठेकेदार की सड़क निर्माण में लगी जेबीसी मशीन सहित मिक्चर मशीन को आग के हवाले किया।
0 कांकेर में नक्सलियों द्वारा ब्लास्ट करने से एक कंपनी के तीन कर्मचारियों की मौत हो गई है। जिसके बाद इलाके में सक्रिय नक्सलियों पर सवाल उठने लगे हैं।
0 दुर्गुकोंदल में नक्सलियों ने भारी मात्रा में बैनर.पोस्टर लगाया है। पोस्टर में आरएसएस कार्यकर्ता दादू सिंह की हत्या करने की बात कबूली और गिरफ्तार किए गए निर्दोष आदिवासियों को छोड़ने की चेतावनी दी है।
0 नक्सलियों ने किरन्दुल थानाक्षेत्र में पेरपा चैक पर ग्रामीण ताती बुधराम की धारदार हथियार से हत्या कर दिया और शव को सड़क पर फेंक दिया। पर्चा जारी करते हुए नक्सलियों ने ग्रामीण पर पुलिस की मुखबिरी का आरोप लगाया है।







सरेंडर करने वाले इनामी माओवादी
0 दक्षिण छत्तीसगढ़ की बड़ी नक्सल घटनाओं में शामिल बताई जा रही तेलंगाना राज्य कमेटी की मेंबर सुजाता उर्फ नागाराम रुपा को बीजापुर पुलिस ने गिरफ्तार किया।
0 बीजापुर पुलिस के सामने छह नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है। आत्मसमर्पित नक्सलियों में दिलीप वड्डे चिन्ना प्लाटून कमांडर माड़ डिवीजन पर आठ लाख का इनाम। मड़कम बण्डी डिप्टी सेक्शन कमांडर माड़ डिवीजन पर तीन लाख इनाम। सनकी बड्डे उर्फ सुजाता प्लाटून दो अबूझमाड़ एरिया कमेटी पर दो लाख इनाम। महेश वासम सीएनएम सदस्य नेशनल पार्क एरिया कमेटी, विनोद मेटटा सीएनएम सदस्य नेशनल पार्क एरिया कमेटी का नाम शामिल है।
0 सुकमा पुलिस ने पांच लाख की इनामी महिला नक्सली माड़वी गंगी चिंतागुफा क्षेत्र निवासी डीकेएमएस अध्यक्ष, केरलापाल एरिया कमेटी है जो कि 2006 से नक्सली कमांडर सतिषन्ना के द्वारा संगठन से जोड़ी गई थी। मड़कम हुंगी निवासी चिंतागुफा क्षेत्र कर्कोटा एलओएस सदस्या ईनामी 1 लाख रूपये,कुड़ामी गंगा निवासी कुकानार क्षेत्र पेदारास एलओएस सदस्य ईनामी 1 लाख रूपये, सोड़ी जोगा निवासी गादीरास क्षेत्र नक्सली सहयोगी।
0 दंतेवाड़ा पुलिस को नक्सलियों के खिलाफ बड़ी कामयाबी हाथ लगी। चार इनामी नक्सली समेत 28 नक्सलियों ने जवानों के सामने सरेंडर किया है। आत्मसमर्पित नक्सलियों में 26 नम्बर प्लाटून सदस्य मंगलू 2 लाख का इनाम, बामन कवासी कटेकल्याण एल जी एस सदस्य 1 लाख इनामी, हांदा एल जी एस सदस्य 1 लाख इनामी पोडियामी गंगी, सीएनएम कमांडर 1लाख इनामी सन्नू मरकाम, भीमा कुड़ामी, हांदो कुडामी,रोसोल माडवी,जोगा कवासी, बुधरा माडवी, आयता मडकामी, आयतू मडकामी, हडमा सोढ़ी, मादे कुहराम, बामन मरकाम, लक्खोकुडामी, लखमा मुचाकी, हुंगा मुचाकी, सुकड़ा मुचाकी, गागरू मरकाम, सुकड़ा मड़कामी, हडमाकवासी, लच्छूकोवासी, बामन मरकाम, बुधराम कवासी, हिड़मा मड़काम,सुकड़ा  कवासी, महादेव पोडियाम जनमिलिशिया सदस्य शामिल है।

किसी भी नक्सली नेता को जीवनदान नहीं देंगे: भूपेश
मुख्यमंत्री भूपेश बघेल कहते हंै कि नक्सलियों से समझौता नहीं करंेगे। केन्द्र सरकार को चाहिए कि दूसरे राज्य के जितने भी इनामी नक्सली हैं उन्हें गिरफ्तार करे। आन्ध्र सरकार को निर्देश दे। अन्यथा छत्तीसगढ़ की पुलिस नक्सली नेताओं को जीवनदान नहीं देगी। छत्तीसगढ़ का कोई भी आदिवासी नक्सली नहीं हैं। जो भी यहां नक्सली नेता हैं वे तेलंगाना या फिर आन्ध्र प्रदेश के हैं। उनसे हुई बातचीत के प्रमुख अंश -
0 रमन सरकार के समय भी निर्दोष आदिवासी नक्सली बताकर मार दिये जाते थे। कांगे्रस सरकार के समय भी ऐसी घटनायें हो रही हैं।
00 आंकड़े बढ़ाने के लिए निर्दोष आदिवासियों को नहीं मारेंगे। और उन्हें नक्सली कहकर गिरफ्तार भी नहीं करेंगे। सच तो यह है कि हमारे यहां कोई भी अदिवासी नक्सली नहीं है। जितने भी नक्सली नेता हैं वो आन्ध्र के हैं या फिर तेलंगाना के हैं। हमारे राज्य में जो भी नक्सली नेता आयेगा वो मारा जायेगा। दूसरे राज्य में जाकर हम कार्रवाई नहीं कर सकते। केन्द्र सरकार को चाहिए कि वो बताये कि कितने इनामी नक्सली हैं। हमारे यहां कोई भी आदिवासी नक्सली नहीं है।
0 छत्तीसगढ़ में ज्यादातर नक्सली नेता बाहर के हंै। क्या उनसे बात चीत कर समाधान का कोई रास्ता निकालना चाहेंगे?
0 हम किसी भी नक्सली नेता से बात नहीं करेंगे। वो छत्तीसगढ़ छोड़कर चले जायें अन्यथा हमारी पुलिस उन्हें अभयदान नहीं देगी। अभी तक जितने भी इनामी नक्सली पकड़े गये हैं वो सब के सब भरमार बंदूक के साथ नहीं बल्कि, एक के 47 जैसे घातक हथियार के साथ पकड़े गये हैं। छत्तीसगढ़ में जितने भी इनामी नक्सली हैं वो सब के सब आन्ध्र के हैं। यह आन्ध्र प्रदेश की सरकार की जवाबदारी है कि वह इन्हें गिरफ्तार करे या फिर मारे।
0 ज्यादा तर नक्सलियों के पास विदेशी हथियार हैं। आखिर ये हथियार उन्हें मिलता कहां से है?
0 सबसे बड़ा सवाल यह है कि जो भी इनामी नक्सली पकड़े जाते हैं या फिर मारे जाते हैं उनके पास घातक हथियार कहां से आते हैं। चीन,जपान या फिर विदेशी रायफल छत्तीसगढ़ में बनती नहीं। इसके अलावा गोलियां भी बाहर के होते हैं या फिर हमारे देश के कारखाने के। जाहिर सी बात है कि नक्सलियों के तार बाहर से जुड़े हैं। यह केन्द्र सरकार की जवाबदारी है कि उन्हें हथियार मुहैया कराने वालों का पता करे और उनके खिलाफ कार्रवाई करे।
0 आप कश्मीर मामले का विरोध क्यों करते हैं?
00 भाजपा के घोंषणा पत्र में 370 हटाने का जिक्र था। इसलिए हमें उनके एजेंडे पर एतराज नहीं है। एतराज इस बात पर है कि छत्तीसगढ़ राज्य बना तो मध्यप्रदेश विधान सभा से प्रस्ताव पास हुआ। यू.पी विधान सभा में भी प्रस्ताव पारित होने के बाद उत्तराखंड बना, इसी तरह बिहार विधान सभा में प्रस्ताव पारित होने पर झारखंड बना। लेकिन बिना प्रस्ताव पारित हुए जम्मू और कश्मीर को अलग किये जाने पर हमें एतराज है। राज्य की जनता को बगैर विश्वास में लिये यह किया गया। जनता के विश्वास के साथ अविश्वास किया गया है।
0 इन दिनों मंदी को लेकर हाहाकार मचा हुआ है। क्या छत्तीसगढ़ में भी इसका असर है?
00 देश में मंदी है लेकिन,छत्तीसगढ़ में मंदी के हालात नहीं है। आटो से लेकर रियल स्टेट में भी मंदी नहीं है। प्रदेश सरकार के राजस्व में कमी नहीं आई है बल्कि, बढ़ोतरी हुई है।





 


Friday, September 20, 2019

दंतेवाड़ाः किसकी सियासत का करेगा कबाड़ा


कांग्रेस का आगामी राजनीतिक भविष्य दंतेवाड़ा उप चुनाव तय करेगा। इस चुनाव के परिणाम से यह पता चलेगा कि प्रदेश में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल कितना लोकप्रिय हुए। इसलिए कि लोकसभा चुनाव के दाग अब भी नहीं धुले हैं,वहीं डाॅ रमन सिंह सरकार में न रहकर भी लोकसभा की नौ सीट जीता ले गये। हाथ किसी का भी हो,लेकिन श्रेय उन्हें ही मिला। मंतूराम पवार के आरोप निश्चय ही दंतेवाड़ा उप चुनाव को ध्यान में रख कर लगाए गए हैं। पर ऐसा नहीं लगता कि उनके आरोपों की छाया इस चुनाव में दिखेगी। क्यों कि उन्होंने विश्वास खो दिया है। दूसरी वजह यह है कि यहां मुद्दे को लेकर चुनाव लड़ने से कांग्रेस बच रही है, जबकि बीेजेपी विकास की बात कर रही है। कांग्रेस ने चुनाव को आरोप प्रत्यारोप के रंग में रंग दिया है।इससे उसे नुकसान की आशंका ज्यादा है।
उम्मीद टूट सकती है
दंतेवाड़ा में भावानात्मक हवा का थोड़ा बहुत असर है। लेकिन बीजेपी के पक्ष में ज्यादा है। दंतेवाड़ा की यह सीट भाजपा के पास थी। यदि कांग्रेस इसे अपने पक्ष में कर लेती है तो आने वाले निकाय और पंचायत चुनाव में कांग्रेस की उम्मीद,पर पानी फिरने की आशंका कम हो सकती है। वैसे अभी आठ माह की सरकार जनता के बीच अपनी खास छाप नहीं बन सकी है। इसकी वजह यह है कि सरकार का सारा पाॅवर एक जगह सिमट गया। अन्य मंत्री सिर्फं नाम के मंत्री है। नौकरशाह उनकी सुनते नहीं। इस वजह से प्रदेश में काम काज ठप हैं। डाॅ रमन सिंह ने अपने कार्यकाल में दंतेवाड़ा के लिए जो काम किये हैं,उसका लाभ बीजेपी को मिलता है या फिर कांग्रेस को नरवा,घुरवा,बाड़ी और गोठान के नारे से वोट मिलता है,पूरे प्रदेश की नजर है। वेसे मुख्यमंत्री का ड्रीम प्रोजेक्ट पोस्टर की तरह फड़फड़ा रहा है।
आदिवासियों के हक की बात नहीं
दंतेवाड़ा में आम आदिवासी के हक की बात इस उप चुनाव में कोई भी बड़ी पार्टी नहीं कर रही है। सिर्फ आरोप और प्रत्यारोप तक ही सिमट गया है यह चुनाव। दरअसल कांग्रेस को पता है कि उसने अपने आठ माह की सरकार में दंतेवाड़ा के लिए ऐसा कोई काम नहीं किया है, जिसे वो हवा दे सके। न तो पलायन रोकने का उसके पास कोई योजना है। न ही बेरोजगारी दूर करने की कोई ठोस योजना है। बेरोजगारी भत्ता यहां के बेरोजगारों को कब देगी,बताया। बेवजह जेलों में बंद आदिवासियों को कब छोड़ा जायेगा,उसकी तारीख तय की नहीं। सिर्फ घोंषणाओं की बात है। और इस बात को नक्सली भी तूल दे रहे हैं कि कांग्रेस सरकार ने वायदा तो किया था लेकिन, पहल अभी तक नहीं की। दंतेवाड़ा के ग्रामीण क्षेत्र के लोगों को लाल पानी पीना ,अब भी मजबूरी है। उन्हें मीठा पानी कब और कैसे मिलेगा, इसकी बात कांग्रेस के किसी भी मंत्री ने नहीं की। देश चांद पर चन्द्रयान भेज रहा है, उस दौर में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल स्कूल में भौरा चलाने की शिक्षा देते और तस्वीर खिंचाने तक सिमट गये। दूसरी ओर नक्सली आम आदमी कोे मौत के घाट उतारने से बाज नहीं आये। दूसरी तरफ पुलिस पर आरोप है कि उसने आदिवासियों को इनामी नक्सली बताकर भून दिया। जबकि वहां के लोगों का दावा है कि मारे गये लोग नक्सली नहीं हैं। ऐसी वारदातों से सवाल यह उठता है कि दंतेवाड़ा उपचुनाव से इस विधान सभा के लोगों को क्या मिलेगा?
खूनी खेल कितने चुनाव तक
सरकार और पुलिस दोनों यह बताने केा तैयार नहीं है कि कितने इनामी नक्सली हैं। भीमा मंडावी की हत्या नक्सलियों ने की। चुनाव तक और चुनाव के बाद भी न जाने कितने लोग नक्सली बारूद और गोली के चपेट में आयेंगे सरकार को भी पता नहीं। फिर ऐसे चुनाव का क्या अर्थ, यहां का आदिवासी लगाये? सरकार किसी भी पार्टी की हो, यहां के आदिवासी को हर हाल में मरना ही है। चाहे नक्सली मार दें या फिर पुलिस नक्सली बताकर मार दे। यह खेल कितने चुनाव तक चलेगा, सरकार को बताना चाहिए।

Thursday, August 22, 2019

तोते ने उड़ा दी नींद..


कांग्रेस के लिए पी चिंदबरम अर्श के नेता हैं। आज फर्श पर आ गये। सत्ता की फ़िल्म ऐसी ही होती हैं। आज उनकी हर सांस अमित शाह का नाम ले रही होगी। यह तो होना ही था। उन्हें हाई कोर्ट ने 22 बार अग्रिम जमानत दी। तब उन्हें यह बात समझ में नहीं आई कि वे कांग्रेस के लिए बड़े लीडर हो सकते हैं लेकिन, कानून के लिए नहीं। वे अब 26 अगस्त तक सीबीआइ की हिरासत में रहेंगे। जाहिर सी बात है कि यदि उनसे होने वाली पूछताछ से सीबीआइ संतुष्ट नहीं हुई तो उनकी हिरासत की अवधि बढ़ाने की अपील करेगी। और पूछताछ में पुख्ता साबूत मिल गये तो उन्हें जेल भी हो सकती है। वैसे उनके जेल जाने की आशंका ज्यादा है। क्यों कि इसके बाद ईडी भी उनसे सवाल करेगी। जैसा कि बताया जा रहा है कि 16 देशों में उनकी संपत्तियां है। जाहिर सी बात है यह मामला टूजी घोटाले की तरह इतनी आसानी से खत्म नहीं हो जायेगा। ताज्जुब वाली बात है कि उनकी जमानत जब हाई कोर्ट ने खारिज कर दिया तो उन्हें अपने आप को सरेंडर कर देना चाहिए था। कैसे गृहमंत्री थे। 28 घंटे तक सीबीआइ को छकाते रहे। अपनी सफाई सुप्रीम कोर्ट में देने की बजाय, प्रेस कांन्फ्रेस की। हाई कोर्ट ने उन्हें भ्रष्टाचार का सरगना कहा है। उनके मामले को मनी लाउंड्री का क्लासिकल केस कहा। बावजूद इसके कांग्रेस उनके साथ खड़ी है? क्या करें मजबूरी है।इस मामले से एक बात साफ है कि आने वाले समय में कांग्रेस के अन्य बड़े नेता जिन पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं, उनकी मुश्किलें बढ़ सकती है। जैसा कि प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ने पन्द्रह अगस्त को कहा कि देश का एक एक पैसा जिन गलत लोगों के पास है, उसे बाहर लाना जरूरी है।
पी चिदंबरम मामले पर विपक्ष की भंगिमा का बदलना स्वभाविक है। पी चिंदबरम जब गृहमंत्री थे तब उन्होंने अमित शाह को जेल भेजा था। आज चिंदबरम के होश उड़े हुए हैं। कांग्रेस इसे बदलापुर की राजनीति कह रही है। जबकि भाजपा का कहना है कि हाई कोर्ट ने बेल खारिज की तो सीबीआइ ने अपना काम किया। 26 तक चिंदबरम सीबीआइ की कस्टडी में रहेंगे लेकिन, कस्टडी की अवधि नहीं बढ़ी तो ईडी उन्हें अपनी कस्टडी में लेने के लिए अपील करेगी। यानी पी चिंदबरम की सियासी मटकी को फोड़ने के सारे इंतजाम हैं।
पी चिंदबरम की गिरफ्तारी को लेकर जो सियासी नाटक कल रात से आज शाम तक चला। उसमें एक सबसे बड़ी बात यह रही है कि चिंदबरम के वकील कपिल सिब्बल,अभिषेक,विवेक तन्खा आदि ने सीबीआइ की अदालत में बेल देने की बात कही ही नहीं। वो पूरे समय तक सीबीआइ की कस्टडी की खिलाफत करते रहे। वो यही बताते रहे कि जून के बाद, एक बार भी सीबीआइ ने चिंदबरम को बुलाया नहीं। वो हर बार सीबीआइ को पूछताछ में सहयोग किया है। ऐसी स्थिति में सीबीआइ को कस्टडी में लेने का आदेश न दिया जाये।
इस मामले में एक हैरान करने वाली बात है कि भाजपा वाशिंग पावडर बन गई है। जितने भी भ्रष्ट लोग हैं वो भाजपा में शामिल हो गये या फिर भाजपा से हाथ मिला कर धुल गये। लेकिन अन्य दल के लोग अब सरकार के निशाने में हैं।
इनका क्या होगा - जमीन घोटाले में राबर्ट वाड्रा,नेशनल हेराल्ड केस में राहुल गांधी,इसी मामले में सोनिया गांधी, फ्लोर टेस्ट जीतने के लिए विधायकों को खरीदने की कोशिश करने के मामले मे हरीशरावत,आय से अधिक संपत्ति मामले में वीरभद्र,डी.के शिवकुमार,अगस्ता वेस्टलैंड हेलीकाप्टर घोटाला में अहमद पटेल, आय से अधिक संपत्ति के मामले में मायावती आदि हैं, क्या सीबीआइ के पिंजड़े में ये भी कैद होंगे? केन्द्र सरकार भ्रष्ट लोगों के खिलाफ कार्रवाई का जो अभियान शुरू किया है, आने वाले समय में नहीं लगता कि विपक्ष एक जुट होकर सड़कों पर आने की हिम्मत दिखा सकेगा। यदि आते हैं तो फिर तिहाड़ को कई बड़े लोगों के स्वागत के लिए खुद को तैयार रखना पड़ेगा। बहरहाल तोते ने कइयों की नींद उड़ा दी है। यानी अभी तो ये झांकी है,रैली तो पूरी बाकी है।

नक्सलियों के खिलाफ फैसला कब?

  कश्मीर समस्या पर बड़ा फैसला लिया जा सकता है तो नक्सलवाद पर क्यों नहीं? क्यों कि छत्तीसगढ़ में फौज से अधिक नक्सली नहीं हैं। जिनके नेतृत्व में नक्सलवाद पल्लवित हो़ रहा है,उनकी शिनाख्त हो चुकी है। ऐसे में नक्सलियों के खिलाफ सरकार को ठोस फैसला लेने की जरूरत है,ताकि छत्तीसगढ़ नक्सलवाद के शिकंजे से मुक्त हो सके।








 0 रमेश कुमार ‘‘रिपु‘‘
                 छत्तीसगढ़ राज्य बनने की खुशी के साथ नक्सलियों के आतंक की पीड़ा भी यहां के लोगों को विरासत में मिली है। करीब दो दशक से छत्तीसगढ़ की शिराओं मंे नक्सलवाद का लहू बह रहा है। चैकाने वाली बात है कि नक्सली आतंक से पहले सरगुजा लहू लुहान हुआ, अब बस्तर इसकी जद में है। प्रदेश में पहले 14 जिलों में नक्सलियों की तूती बोलती थी, आज 18 जिलों में नक्सलियों का आतंक इस बात का प्रमाण है कि सरकार किसी भी पार्टी की हो,राज्य में इनकी हुकूमत चलती है। नक्सलियों के आतंक राज को इसी से समझा जा सकता है कि आजादी के बाद से अब तक छत्तीसगढ़ के दौ सौ से अधिक गांवों में जनगणना नहीं हुई। जाहिर सी बात है कि नक्सलियों की दहशत इस काम में सबसे बड़ी बाधा है।
लाल आतंक से जूझ रहे छत्तीसगढ़ के लोगों के मन में एक आस जगी है कि जम्मू, कश्मीर मामले पर केन्द्र सरकार एक ठोस फैसला ले सकती है तो फिर छत्तीसगढ़ के नक्सलवाद पर क्यों नहीं? चूंकि कश्मीर जैसी बड़ी समस्या नहीं है नक्सलवाद, लेकिन छत्तीसगढ़ के लोगों का दर्द भी कश्मीरी पंडितों से कम नहीं है। लोगों को अपना घर,गांव और संपत्ति छोड़ना पड़ा है। राज्य के गठन से लेकर अब तक नक्सलवाद की वजह से 1175 जवान शहीद हुए हैं तो दूसरी ओर 1700 से अधिक नागरिक मारे जा चुके हैं। वहीं 1800 नक्सली भी मारे गये। यह सिलसिला थम नहीं रहा है। जानें तो दोनों ओर से जा रही हैं। नक्सली मरें या फिर जवान शहीद हों अथवा आम नागरिक नक्सलवाद की भेंट चढ़े। सवाल यह है कि लाशों की संख्या बढ़ने से हित किसका है?इससे इंकार नहीं किया जा सकता नक्सलवाद समस्या पर भाजपा की हो या फिर कांग्रेस की सरकार, किसी ने भी गंभीरता से लिया ही नहीं। जैसा कि पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी कहते हैं,‘‘नक्सलवाद राजनीतिक पार्टियों के लिए खाद पानी है। इच्छा शक्ति की कमी के चलते ही नक्सलवाद आज भी अट्ठहास कर रहा है‘‘। डाॅ रमन सिंह ने प्रदेश की जनता से वायदा किये थे कि यदि उनकी सरकार बनी तो 2022 तक नक्सलवाद को खत्म कर देंगे। जाहिर सी बात है कि उन्हें भरोसा था कि जिस तरह पुलिस नक्सलियों के खिलाफ आॅपरेशन प्रहार अभियान को गति दे रही है,उससे नक्सली टूट जायेंगे। चूंकि पहले नक्सली एक लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले थे लेकिन, अब 60 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में सिमट गये हैं। लेकिन उनका आतंक भूपेश सरकार में भी कम नहीं हुआ है। बारिश में वैसे उनका मूवमेंट न के बराबर होता है,पर दहशहत का आलम यह है कि बस्तर के छह सौ से अधिक गांव पिछले डेढ़ दशक से खाली हैं। लोग गांव छोड़कर शहर में आकर बस गये हैं।

आर्थिक विषमता की दिक्कतः नैयर
नक्सलवाद के खात्में के लिए कोई भी सरकार आम लोगों से राय शुमारी नहीं ली। बस्तर के आदिवासियों से बातें करने के लिए सरकार अपना प्रतिनिधि भी नहीं भेजी। यह अलग बात है कि प्रदेश के हर मुख्यमंत्री यही कहते रहे कि नक्सलियों से बात करने के लिए दरवाजे खुले हुए हैं। लेकिन कभी खुद पहल नहीं की। सरकार नक्सलवाद को अपने चश्में से देखती है। यही वजह है कि नक्सली छाया घटने की बजाय बढ़ती गई। प्रदेश में नक्सलवाद की वजह के संदर्भ में दैनिक ट्रिव्यून के पूर्व संपादक  रमेश नैयर कहते हैं, कश्मीर का मामला छत्तीसगढ़ के नक्सलवाद से अलग है। वो देश की भावनाओं से जुड़ा मामला था और नक्सलवाद प्रदेश का मामला है। केन्द्र सरकार ने नक्सलियों से निपटने के लिए सुरक्षा बल तैनात किये हैं। वे अपने तरीके से काम भी कर रहे हैं। बस्तर ही नहीं उन सभी जिलों में सुरक्षा बल तैनात है,जहां नक्सलियों की पैठ है। नक्सल समस्या का निदान अब तक नहीं निकल पाने की सबसे बड़ी वजह है कि आर्थिक असमानता। जल,जंगल और जमीन के मालिक आदिवासी हैं,लेकिन वो अब उद्योगपतियों के मजदूर बनकर रह गये हैं। यहां का आदिवासी जितना गरीब होगा,नक्सलवाद उतना ही मजबूत होगा। इसलिए कि जल,जंगल और जमीन के लिए नक्सली आदिवासी के साथ खड़े होते आये हैं। जिससे वे आदिवासियों का विश्वास पात्र बन गयेे हैं। जबकि सरकार अभी तक आदिवासियों का विश्वास नहीं जीत पाई है। जब तक आदिवासियों का विश्वास सरकार नहीं जीत पायेगी, तब तक नक्सलवाद के अंत की संभावना कम है। इससे इंकार नहीं है कि पहले से नक्सली गतिवधियां कम हुई है सुरक्षा बलों की वजह से लेकिन, यह कहना गलत होगा कि नक्सलवाद की पकड़ कमजोर हो गई है। सरकार किसी भी पार्टी की हो जल,जंगल और जमीन को लेकर भ्रष्टाचार हद से अधिक हुआ है। जिस तरह से जंगल काटने का ठेका दिया जा रहा है उद्योगपतियों को,आने वाले समय में हमारी पीढ़ियां पानी को तरसेगी। इतना ही नहीं पानी को लेकर नक्सली हमले से इंकार  भी नहीं किया जा सकता’’।

नक्सलियों से ज्यादा सैनिक
नक्सली प्रभावित जिलों में केन्द्रीय सुरक्षा बलों की 45 बटालियनों को मिलाकर 60 हजार से अधिक जवान तैनात हैं। इतनी संख्या में सुरक्षा बलों की मौजूदगी से एक बात साफ है कि बस्तर नक्सलियो की वजह से असुरक्षित है। इसी के साथ विकास का पोस्टर भी फट गया है। शिक्षा व्यवस्था चैपट हो चुकी है। क्यों कि 300 स्कूलों को नक्सलियों ने खंडहर में तब्दील कर दिया। नक्सली मानते हैं कि आदिवासियों के बच्चे पढ़कर शिक्षित हो जायेंगे तो नक्सली नहीं बनेंगे। बस्तर के कई इलाके आज भी सड़क मार्ग से वंचित हैं। जहां सड़कें हैं भी, नक्सलियों ने काट दियें है या फिर सड़क मार्ग के किनारे आईडी लगा रखे है। बस्तर के किस मार्ग में आईडी लगी है,कहना मुश्किल है। बस्तर में नक्सलियों की समानांतर सरकार की वजह से 40 हजार करोड़ से अधिक के विकास काम ठप हैं। जबकि प्रदेश का कुल बजट रमन सरकार के समय करीब 85 हजार करोड़ रूपये हुआ करता था,जाहिर सी बात है कि यह प्रदेश के कुल बजट का आधा है। बस्तर सबसे अधिक नक्सल से प्रभावित है। नक्सलियों ने ढाई दशक में 1700 आंगन बाड़ी केन्द्र,219 अस्पताल,220 किलोमीटर सड़कें नहीं बनने दी। जबकि कई मार्गो की सड़कों के निर्माण में जवान शहीद हुए हैं।

दृढ़ इच्छा शक्ति चाहिएः शिव
दैनिक भास्कर के संपादक शिव दुबेे कहते हैं,‘‘जिस तरह से कश्मीर के मामले में राजनीतिक दृढ़ इच्छा शक्ति सामने आई है उसी तरह छत्तीसगढ़ के नक्सलवाद के प्रति भी राजनीतिक दृढ इच्छा शक्ति के लिए सरकार को कड़ा निर्णय लेना चाहिए। केवल फौज से समस्या का निदान नहीं हो सकता।  आॅपरेशन चलाना और दिखाना दोनों अलग अलग है। इसलिए भी कि प्रदेश में नक्सलियों से निपटने के लिए जितनी फौज है, उतने नक्सली नहीं है। जिस दिन दिल्ली से रायपुर तक नक्सलवाद को खत्म करने की राजनीतिक ताकत का इस्तेमाल किया जायेगा, उस दिन नक्सलवाद खत्म हो जायेगा। अभी तक यह होता आया है कि राज्य सरकार केन्द्र को और केन्द्र सरकार, राज्य सरकार को इस मामले में दोषी ठहराते आये हैं। दरअसल दोनों सराकारों के बीच इस मामले को लेकर तालमेल का अभाव देखा गया है। कश्मीर मामले में बाहरी आतंक का साया था लेकिन, नक्सलवाद मामले में बाहरी नहीं अंदरूनी मामला है। नक्सलवाद जिनके नेतृत्व में चल रहा है,उसमें ज्यादातर लोगों की शिनाख्त हो चुकी है। जाहिर सी बात है कि नक्सलवाद को लेकर जो आॅपरेशन अभियान चालाये जा रहे हैं,या चलाये गये हैं,वो समस्या का हल नहीं हो सकते। कश्मीर मामले को लेकर जब बड़ा फैसला लिया जा सकता है तो नक्सलवाद पर भी विचार किया जाना चाहिए। क्यों कि यह केवल बस्तर का ही नहीं, प्रदेश के 18 जिलों का मामला है’’।

 दहशत का साम्राज्य
छत्तीसगढ़ का बेरोजगार आदिवासी माओवादी बन के दहशत का साम्राज्य खड़ा कर लिया हैं। हर बरस एक हजार करोड़ रूपए की उगाही कर तेलंगाना पहुंचा रहा, लेकिन बदले में उसे मिलती है मौत की गोली। इस सच को यहां का नक्सली बना आदिवासी समझने को तैयार नहीं। उसे लगता है कि सरकार तो नौकरी देती नहीं है,आय का एक मात्र जरिया नक्सली बनना ही है। लेकिन एक सच यह भी है कि छत्तीसगढ़,उड़ीसा, झारखंड और मध्यप्रदेश में कहीं भी माओवादी मरें, उससे आंन्ध्र के नक्सली लीडरों की आॅखों गीली नहीं होती। न उन्हें कोई नुकसान होता है। छत्तीसगढ़ के माओवादी हर बरस करोड़ों रूपए आंन्ध्र के नक्सली लीडरों को विभिन्न तरीके से राशि वसूल कर पहुंचा रहे हैं। पूर्व मुख्यमंत्री डाॅ रमन सिंह ने 2009 में कहे थे कि राज्य में नक्सली वन व्यापारियों, परिवहन मालिकों और लौह अयस्क खनन कंपनियों से हर वर्ष 300 करोड़ रुपये की जबरन वसूली करते हैं‘‘। बस्तर के डी.आई.जी पी. सुन्दर राज कहते हैं कि नक्सली हर बरस यहां से एक हजार करोड़ रूपए विभिन्न मदों से एकत्र करते हैं‘‘। जाहिर है कि छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद के नाम से लड़ी जा रही लड़ाई में शामिल यहां का बेरोजगार आदिवासी नहीं जानता कि लाल गलियारे में अपनी जिन्दगी और मौत की कहानियांे का जो फतंासी वह गढ़ रहा है उसके पीछे कितने करोड़ रूपए के दहशत का साम्राज्य है। सरकार को इससे कोई सरोकार नहीं है।

बस्तर कश्मीर है छग काः सुनील
नक्सलियों की वजह से बस्तर का पर्यटन उद्योग खत्म होने के कगार पर है। बावजूद इसके नक्सलियों ने सरगुजा के बाद बस्तर को अपना वसूली का केन्द्र बना रखा है। लाल गलियारे के लावे के संदर्भ में रायपुर के सांसद और प्रदेश भाजपा उपाध्यक्ष सुनील सोनी कहते हैं,‘बस्तर छत्तीसगढ़ का कश्मीर है। निश्चय ही नक्सलियों के आतंक की वजह से हर सांसे दहशतजदा रहती है। केन्द्र सरकार नक्सलवाद के खात्मे के लिए समय समय पर कदम उठाती रही है। नक्सलवाद के खात्मे के लिए निश्चय की गृहमंत्री कुछ सोच रखे होंगे। कायदे से राज्य सरकार को चाहिए कि वो नक्सलवाद के खात्मे के लिए केन्द्र सरकार से बैठ कर बात करे। और निदान की दिशा में कदम उठाना चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं लगता है कि राज्य सरकार नक्सलवाद के खात्मे के लिए कटिबद्ध है।

मनमानी का हक नहींःसिंहदेव
पंचायत एवं स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंह देव कहते हैं,‘‘कश्मीर के मामले से एक बात साफ हो गई है कि केन्द्र सरकार अपने फायदे के लिए कुछ भी कर सकती है। भावानात्मक आधार पर निर्णय लिया गया है। एक प्रांत को खंडित करने का यह तरीका ठीक नही है। कल के दिन किसी भी राज्य में गवर्नर रूल लगाकर राज्य को केन्द्र शासित घोषित कर देंगे। छत्तीसगढ़ में कोई बड़ी नक्सली वारदात हो जाये और राष्ट्रपति शासन यह कहकर लगा दिया जाये कि राज्य सरकार नक्सलियों पर नियंत्रण करने में नाकाम हो। या फिर संवैधानिक ढांचे को खंडित कर इसे केन्द्र शासित राज्य बना दो। प्रजातंत्र में कोई भी पार्टी हो उसे मनमानी करने का हक नहीं है। रहा सवाल नक्सलवाद के खात्मे का तो निश्चय ही छत्तीसगढ़ के लिए यह समस्या कोढ़ है। सरकार अपने स्तर पर इसके खात्मे में लगी है। उम्मीद है,बहुत जल्द सफल हो जायेंगे‘‘।

छग के नक्सली हाशिए पर
तात्कालीन बस्तर आईजी एसआरपी कल्लूरी के समय भारी संख्या में माओवादी सरेंडर किए।लेकिन लाल गलियारा खाली नहीं हुआ। डीजीपी डी.एम अवस्थी कहते हैं,‘बारिश के तीन महीने माओवादी अपनी संख्या बढ़ाने के अभियान को अंजाम देते हैं। लेकिन इस बार बारिश में भी सुरक्षा बलों की सर्तकता और आॅपरेशन प्रहार को अंजाम देने की वजह से  बस्तर में नए नक्सलियों के भर्ती की खबर नहीं है। सुकमा,दंतेवाड़ा,बीजापुर और नारायणपुर में नक्सलियों के खात्मे के लिए आॅपरेशन जारी है‘‘। दरअसल सरेंडर करने वाले नक्सलियों का कहना है,ऊंचे पदों पर तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के माओवादियों के पैठ होने से निचले स्तर पर तैनात छत्तीसगढ़ के माओवादियों में असंतोष बढ़ता जा रहा है। क्यों कि माओवादी से संबंधित सभी तरह की रणनीति में छत्तीसगढ़ के नक्सलियों को शामिल नहीं किया जाता। न ही उनसे कोई राय ली जाती है। तेलंगाना के नक्सली लीडरों के आगे यहां के माओवादी हाशिए पर हैं।

नक्सलियों ने दी धमकी
नक्सली संगठन के दक्षिण बस्तर सब जोनल कमेटी ने 20 जुलाई को एक पर्चा जारी कर स्वीकारा कि पुलिस द्वारा चलाए जा रहे एंटी नक्सल ऑपरेशन जुलाई 2018 से 3 अगस्त 2019 के बीच में उनके 96 साथी मारे गए हैं। वहीं बस्तर की सरहद से लगे धमतरी जिले में 24 जुलाई को सीतानदी एरिया कमेटी ने जारी पर्चों में पुलिस की मुखबिरी करने वालों के नामों का उल्लेख करते हुए जान से मारने की धमकी दी है। लिखा है, फारेस्ट वालों को जनअदालत में सजा दिया जाएगा। जितने भी जमीन हैं, सभी में पौधा लगाना चाहिए। पैसा खाकर जंगल कटवाओगे तो जान जायेगी। दारू की भट्टी, अंग्रेजी शराब दुकान बंद करो। घर.घर में शराब बनाना बंद किया जाए। जंगल में बूटा काटने व आग लगाने वाले का हाथ काटा जाएगा। ऐसी धमकी से जाहिर है कि नक्सलवाद का पानी खतरे से ऊपर बह रहा है।