Tuesday, June 2, 2020

सवालों के घेरे में झीरम कांड


झीरम घाटी में कांग्रेस नेताओं की हत्या किसी के इशारे पर हुई या फिर नक्सली हत्या थी? यह अब भी राज है। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल एनआइए की रिपोर्ट से खफा हैं। ऐसे में एसआईटी का गठन और झीरम मामले पर कांग्रेस का फिर से मामला दर्ज करना हैरानी भरा सवाल है।

0 रमेश  तिवारी
             बस्तर में झीरम घाटी हत्याकांड के सात साल बाद भी यह स्पष्ट नहीं हो सका कि कांग्रेस के बड़े नेताओ की हत्या में नक्सलियों का हाथ था या फिर कोई साजिश थी। इस नृशंस हत्याकांड में सरकार और उनकी जांच एजेंसियों को लेकर संदेह के सवाल और टकराव की स्थिति निर्मित होती रही है। लेकिन सच्चाई सामने नहीं आई। भूपेश बघेल सीएम बनने पर एसआईटी का गठन किया। एसआईटी ने एनआईए से जांच फाइल मांगी झीरम की लेकिन, एनआईए ने अभी तक इसमें कोई भी एक्शन नहीं लिया। क्लोजर रिपोर्ट भी नहीं दी। दरअसल एनआईए की रिपोर्ट में झीरम कांड के लिए कांग्रेस को जिम्मदार ठहराया गया था,कांग्रेस रिपोर्ट को झूठ का पुलिंदा करार दिया था। एनआईए की रिपोर्ट में कहा गया कि परिवर्तन यात्रा के दौरान कांग्रेस नेताओं पर हमला,सरकार को दहशत में डालने और सरकार को उखाड़ फेकने की साजिश का हिस्सा था।
कांग्रेस का आरोप है कि विशेष अदालत में एनआईए की रिपोर्ट में पेश गए आरोप पत्र में विवादास्पद मुद्दों को शामिल नही किया गया है। खासकर शहीद के परिजन जिस षडयंत्र की बात कर रहें हैं,जांच रिपोर्ट मंे वो बात नहीं है। लेकिन रिपोर्ट में घटना का सिलसिलेवार जिक्र विस्तार से है। घटना में शहीद हुए नेता स्व. नंदकुमार पटेल के बेटे विधायक उमेश पटेल, स्व. महेंद्र कर्मा के बेटे छविन्द्र कर्मा और स्व.योगेंद्र शर्मा के बेटे हर्षित शर्मा और स्व.उदय मुदलियार के बेटे जितेन्द्र मुदलियार आदि के परिजनों का कहना है कि एनआइए की रिपोर्ट में घटना से जुड़ी कथित राजनीतिक साजिश के बारे में कुछ भी नहीं कहा गया है। गौरतलब है कि 25 मई 2013 को झीरम घाटी में नक्सलियों ने एंबुश लगाया था। जिसमें राज्य के दिग्गज कांग्रेसी नेता प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल कद्दावर नेता वीसी शुक्ल,महेन्द्र कर्मा और उदय मुदलियार समेत 29 लोग शहीद हुए थे। 
राज्य सरकार ने गिनाई खामियां
राज्य सरकार ने एनआईए जांच में खामियां गिनाते हुए केंद्रीय गृह मंत्रालय को चिट्ठी लिखी थी।  केस की जांच एसआईटी स्पेशल इंवेस्टिगेशन टीम से कराने और केस को ट्रांसफर करने की मांग की थी। केंद्रीय गृह सचिव को लिखे पत्र में बताया गया था कि, अब तक की एनआईए जांच में बड़े षडयंत्र को नजरंदाज किया गया है। जांच एजेंसी ने किसी दूसरी थ्योरी पर काम ही नहीं किया। यहां तक कि रमन्ना, गुडसा उसेंडी, गजराला अशोक और दूसरे नक्सलियों के बारे में बाद में कई सबूत मिले। इसके बावजूद एनआईए ने किसी भी चार्जशीट में इनको शामिल नहीं किया।
शहीद आत्माओं को न्याय नहीं मिला
मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कहा है कि झीरम घाटी कांड में शहीद आत्माओं को अभी तक न्याय नही मिला है। झीरम घाटी कांड के षडयंत्र की सच्चाई को सब जानना चाहते है। एनआईए को पूर्व की राज्य सरकार ने जांच सौंपा था और उन्होंने अपनी जांच कम्पलीट कर ली। लेकिन जो झीरम घाटी कांड में षंडयंत्र हुआ है,उसके बारे में कोई जांच नहीं हुई। जो नक्सली पकड़े गये है,उनका और आत्मसमर्पित नक्सलियो का बयान एएनआई ने नहीं लिया। जो घटना स्थल पर थे, उनसे भी बयान नहीं लिया गया। फूलोदवी नेताम सहित झीरम में घटना स्थल पर उपस्थित साथियों का भी बयान एनआईए ने नहीं लिया। एनआईए जांच ही अधूरी है। इस मामले में जांच पूरी हो, सबका बयान हो, जो तथ्य हैं, सामने आने चाहिये।
साक्ष्य क्यों छिपा रहे सीएम
बीजेपी प्रदेश प्रवक्ता सच्चिदानंद उपासने ने कहा, झीरम के मामले में जेब में सबूत होने की बात भूपेश बघेल कहते थे, सालों बीत जाने के बाद भी अब तक सबूत पेश नहीं करने वाले प्रदेश के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल पर साक्ष्य छिपाने का मुकदमा चलाया जाना चाहिए। हर बात के लिए भाजपा के सिर पर अपनी नाकामियों का ठीकरा फोड़ने पर आमादा रहने वाले कांग्रेस के नेता कभी अपने मुख्यमंत्री पर भी तो यह दबाव बनाएं कि वे सबूत पेश करके झीरम की जाँच को अंजाम तक पहुँचने में सहयोग करें।   
एसआईटी कुछ नहीं की
तत्कालीन भाजपा सरकार ने हमले के बाद मामले की जांच एनआईए को सौंप दी थी। सात सालों में एनआईए ने इस मामले में सौ से ज्यादा गिरफ्तारी की लेकिन,घटना क्यों और किसलिए अंजाम दी गई, इसका खुलासा नहीं कर पाई है। 2018 में सत्ता परिवर्तन के बाद कांग्रेस सरकार ने एसआईटी का गठन किया। तत्कालीन आईजी विवेकानंद सिन्हा के नेतृत्व में 10 सदस्यों वाली टीम बनाई गई। टीम में विषय विशेषज्ञों को भी शामिल किया गया और पहली बैठक रायपुर में पीएचक्यू में हुई। बताया जाता है कि एसआईटी गठन के बाद यह इकलौती बैठक थी, इसके बाद कोई बैठक या कोई जांच ही नहीं हो पाई। कांग्रेस का आरोप है कि झीरम कांड की जांच को प्रभावित करने के लिए केन्द्र सरकार एनआईए की जांच रिपोर्ट की नकल नहीं दे रही है। उसकी रिपोर्ट के बगैर एसआईटी मामले की जांच नहीं कर पाएगी।
किसे बचाना चाहती है सरकार
प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता सुशील आनंद शुक्ला ने कहा,’’क्या कारण है झीरम की जांच नही होने दिया जा रहा। जब बिना किसी निष्कर्ष पर पहुचे एन आई ए ने झीरम की जांच बंद कर दी है,ऐसे में केंद्र सरकार मामले की फाइल क्यो वापस नही कर रही है? आखिर किसको बचाने या कौन सा तथ्य छुपाने में के लिए केन्द्र सरकार अड़ंगेबाजी लगा रही है। सवाल यह है कि भाजपा सरकार के कार्यकाल में हुए इस दुर्दान्त नर संहार की जांच भाजपा क्यो नही होने देना चाहती।
झीरम कांड में नया मोड़
शहीद उदय मुलियार के पुत्र जितेन्द्र मुदलियार ने झीाम कांड पर दरभा में रिपोर्ट दर्ज करा कर इस कांड को को एक नया मोड़ दिया दे दिया है। उन्होने कहा हम सात साल से एनआईए का इंतजार कर रहे थे। पर कोई भी पीड़ित पक्ष से बात नहीं किया। एनआईए ने किसी भी पीड़ित पक्ष से इस संबंध में  चर्चा नहीं की है। झीरम में षड़यंत्र के तहत हत्या की गई है। यह राजनीतिक हत्याकांड है। इसमें हम में से किसी को कोई शंका नहीं है। आरटीआई से मिले दस्तावेज में नक्सल मूवमेंट की जानकारी इंटेलिजेंस द्वारा अपने अधिकारों को दी गई गई थी। इंटेलिजेंस मार्च,अप्रैल से ही रेगुलर अधिकारियों को बताना शुरू कर दिया था कि, वहां नक्सली एकत्र हो रहे हैं। उनके पास 19- 20 मई का भी लेटर था कि वहां पर नक्सली ग्रुप मे एकत्र हो रहे हैं। जब वहां ग्रुप में नक्सलियों के एकत्र होने का इनपुट था, तो परिवर्तन यात्रा को सुरक्षा क्यों नहीं दी गई। इसमें षड़यंत्र वाला जो हिस्सा है उसका खुलासा नहीं हुआ तो हम कोर्ट जाएंगे। हमें न्याय चाहिए।
दरअसल झीरम से सुकमा जाने वाला रास्ता स्टेट हाईवे है। स्टेट हाइवे में दोनों तरफ भारी संख्या में नक्सली थे। संवेदनशील एरिया में परिवर्तन यात्रा जा रही थी। जिसकी सूचना सभी अधिकारियों को दी गई थी। फिर सुरक्षा व्यवस्था क्यों नहीं की गई थी? यह अपने आप में एक बड़ा सवाल है। एनआईए ने जांच में षड़यंत्र वाले बिन्दुओं पर जांच क्यों नहीं की,उसका खुलासा होना बाकी है।
सवालों में रिपोर्ट
0 यदि एनआइए की रिपोर्ट सच है तो किन-किन चश्मदीद लोगों से बातें की गई।
0 एनआइए की रिपोर्ट की 7वीं कंडिका में लिखा है कि नक्सली माड़ में क्षेत्रीय सहयोग से समानांतर सरकार चला रहे हैं,लेकिन सरकार ने इसे माओवाद प्रभावित क्षेत्र घोषित किया है। सवाल यह है कि सरकार जानते हुए भी सार्थक कार्रवाई क्यों नहीं की।
0 कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा के पहले मुख्यमंत्री डाॅ.रमन सिंह की विकास यात्रा बस्तर में निकली थी,उस पर नक्सली हमला क्यों नहीं हुआ?
0 नक्सलियों ने किसके इशारे पर इतनी बड़ी वारदात को अंजाम दिया। किसने नक्सलियों को सूचना दी परिवर्तन यात्रा में महेन्द्र कर्मा भी शामिल हैं?
0 झीरम मामले में इतनी बड़ी चूक की वजह क्या है?
0 कांग्रेस नेताओं के काफिले को तीरथगढ़ से तोंगपाल थाने तक सुरक्षा नहीं दी गई थी। लेकिन एनआइए ने इस पर कोई टिप्पणी क्यों नहीं की?
0 हमलावरों ने एक नेता का नाम पूछ कर गोलियां चलाई,इसका मतलब हमला पूर्व नियोजित था और कुछ नेताओं पर किया गया था। इस राजनीतिक साजिश पर भी रिपोर्ट में एक शब्द नहीं कहा गया है,ऐसा क्यों?

   









‘रिपु’

Saturday, May 23, 2020

पांव पांव पहुंचा कोरोना


कोरोना मुक्ति की ओर कदम बढ़ा रहे छत्तीसगढ़ में कोरोना पांव,पांव पहुंचा। अप्रैल माह तक आधा सैकड़ा भी मरीज नहीं थे। लेकिन मजदूरों की वापसी ने लाॅक डाउन की हवा निकाल दी। माना जा रहा है कि जून तक कोरोना मरीजों की संख्या पांच सैकड़ा पहुंच सकती है।











0 रमेश कुमार ‘रिपु’
           छत्तीसगढ़ कोरोना मुक्ति की ओर कदम बढ़ा रहा था। यहां मरीजों की संख्या अन्य राज्यों की तरह तेजी से नहीं बढ़ी। एम्स से 95 फीसदी मरीज स्वस्थ्य होकर अपने अपने घर चले गये। लेकिन चार मई को शराब दुकान खुलने के बाद,कोरोना मरीजों में संख्या में थोड़ा इजाफा हुआ। सबसे अधिक कोरोना मरीजों में तेजी पन्द्रह से बीस मई के बीच देखी गई। 25-25 मरीज एक दिन में मिले। जाहिर सी बात है कि अन्य राज्यों से आने वाले प्रवासी मजदूरों की वजह से कोरोना मरीजों की संख्या में इजाफा हुआ। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल कहते हैं,केन्द्र सरकार लाॅक डाउन से पहले यदि मजदूरों को उनके राज्यों में भेजने का इंतजाम कर देती, तो कोरोना मरीज जो अब बढ़ते क्रम में दिख रहे हैं,ऐसी स्थिति न आती। राहुल गांधी के कहने पर केंद्र सरकार मजदूरों के खाते में 7500 रुपए डाल देती, तो वे सड़कों पर नहीं भटकते’’।  
सवा दो लाख मजदूर आएंगे
श्रम मंत्री डॉ शिवकुमार डहरिया ने प्रथम प्रवक्ता को बताया कि अन्य राज्यों में फंसे अब तक 75 हजार मजदूरों की छत्तीसगढ़ वापसी हो चुकी है। इनमें से 16 हजार मजदूर रेलमार्ग से आए हैं। जबकि शेष सड़क मार्ग से आए हैं। अन्य राज्यों में फंसे श्रमिकों को लाने के लिए 43 विशेष ट्रेनों को मंजूरी दे दी गई है। राज्य शासन के एप में अभी तक दो लाख 27 हजार लोगों ने वापस आने के लिए रजिस्ट्रेशन कराया है। राज्य सरकार 22 ट्रेनों के लिए अब तक रेलवे को कुल 1.88 करोड़ रुपए का भुगतान कर चुकी है। श्रमिकों के रेल और बस से आने का खर्चा श्रम विभाग उठाएगा। मजदूरों को लाने में लगभग 10 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। जम्मू से श्रमिकों को लाने के साथ ही उत्तराखंड जाने वालों  के लिए भी ट्रेन की व्यवस्था की गई है।  
एक सैकड़ा के पार कोरोना
प्रदेश में संक्रमित मरीजों की संख्या बढ़कर 105 हो गई है। माना जा रहा है कि जून तक पांच सैकड़ा मरीज हो सकते हैं। कोरोना के 31341 संभावित मरीजों की जांच में 29812 लोगों की रिपोर्ट निगेटिव आई है। 1463 सैंपलों की जांच जारी है। वहीं 59 मरीज ठीक होकर घर लौट चुके हैं। वापस आए मजदूरों को क्वारंटीन सेंटर ले जाने के लिए बसों की व्यवस्था की गई हैं। 24 हजार 805 लोगों को क्वारंटीन किया गया है। आने वाले सभी श्रमिकों का स्वास्थ्य परीक्षण के लिए राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में 16 हजार 599 और शहरी क्षेत्रों में 623 क्वारंटीन सेंटर बनाए गए हैं। बालोद में 17 मई को कोरोना संक्रमण के 25 नए मामले सामने आए हैं। ये अब तक के एक दिन में सबसे ज्यादा संक्रमण का केस हैं। अब कोरोना के मरीज उन इलाकों से मिलने लगे हैं,जहां इसकी आशंका नहीं थी। राज्य में कोरोना पॉजिटिव का पहला मामला रायपुर में, मार्च के प्रथम सप्ताह में विदेश से लौटी युवती से सामने आया था। अब जिन लोगों में कोरोना संक्रमण दिख रहा है,सभी सामान्य नागरिक या श्रमिक हैं।
तो सैकड़ों की मौत नहीं होती
स्वास्थ्य मंत्री टी.एस सिंहदेव ने कहा कि अगर भारत सरकार सभी राज्यों के लिए शुरू से ट्रेन चला देती तो लाखों मजदूर सड़कों पर पैदल चलने को मजबूर नहीं होते। सैकड़ों मौतें नहीं होतीं। छत्तीसगढ़ से होकर गुजरने वाले प्रवासी मजदूरों की संख्या 12 से 15 हजार हैं। उनके भोजन की व्यवस्था और राज्यों की सीमा तक छोड़ने की व्यवस्था कर रहे हैं। मजदूर गुजरात से महाराष्ट्र होकर यहां पहुंच रहे हैं। यहां से ओडिशा, झारखंड, बिहार, यूपी,एमपी जा रहे हैं। इनमें से अधिकांश राज्यों में तो बीजेपी की सरकारें हैं। लोगों का जीवन नर्क बना दिया है। ताली बजवाने में एकजुटता का श्रेय केन्द्र सरकार लेती है,ं तो लाखों मजदूरों के सड़क पर चलने की जिम्मेदारी भी लेनी चाहिए’’।
 क्वारंटीन सेंटरों में होंगे 85 हजार टेस्ट
राज्य में में 17 हजार से ज्यादा क्वारंटीन सेंटरों की क्षमता करीब 5.5 लाख है। मई के अंत तक क्वारंटीन सेंटर में रखे प्रवासी मजदूरों के 85 हजार से ज्यादा रैपिड टेस्ट करने की रणनीति बनाई गई है। हर ब्लॉक में औसतन 50 क्वारंटीन सेंटर के हिसाब से फिलहाल 17183 सेंटर हैं। इनमें 56 हजार से ज्यादा श्रमिक रखे गए हैं। किसी भी सेंटर में अगर एक भी पॉजिटिव केस मिलता है तो वहां रह रहे सभी का कोरोना टेस्ट किया जाएगा। ये पूरी प्रक्रिया 14 दिन के क्वारैंटाइन पीरियड के दौरान की जाएगी। सैंपल अलग,अलग आयु समूह के आधार पर एकत्र होंगे, ताकि वैज्ञानिक तरीके से इसका आकलन किया जा सकेगा।     
मजदूरों ने केयरटेकर को पीटा
मजदूरों की परेशानियां और उनका दर्द देखकर मन गुस्से से भर जाता है। वहीं देश भर में जन सेवक जगह जगह उनकी सेवा के लिए पानी,भोजन,चप्पल लेकर खड़े हैं। फिर भी कुछ मजदूर मूड़े आ गए हैं। छत्तीसगढ़ के मुंगेली जिले के एक क्वारंटाइन सेंटर में श्रमिकों ने केयरटेकर चमन साहू की जमकर धुनाई कर दी। वजह ये थी कि मजदूरों की फरमाइश पर उन्हें खाने में लस्सी नहीं दी गई। मजदूर क्वारंटीन सेंटर में आने के बाद समझते हैं, उन्हें फाइव स्टार होटल की तरह सुविधा मिलेगी। संक्रमण के डर ने पुलिस के भी हाथ पैर बांध दिए हैं। जिसका खूब फायदा प्रवासी मजदूर उठा रहे हैं। एक तो पहले ही गांव के लोग यहां क्वारंटीन सेंटर बनाए जाने से नाराज है और अब इन मजदूरों के नखरे उठा कर और उनकी फरमाइश पूरी करते,करते लोगों के सब्र का बांध अब टूटने लगा है। कोरिया के क्वारंटीन सेंटर से भागे दो मजदूरों की रिपोर्ट 7 मई को पाॅजिटिव आई। दोनों मजदूर बैकुंठपुर स्थित क्वारंटीन सेंटर में थे, और सैंपल देने के बाद झारखंड भाग निकले। जगदलपुर के स्व. बलिराम कश्यप मेडिकल कॉलेज में बने क्वारंटाइन सेंटर से तमिलनाडु के भागे दो ड्राइवर  पकड़े जाने के बाद जेल भेज दिए गए हैं। मुंगेली से चार मजदूर, और दंतेवाड़ा जिले में अरनपुर के क्वारंटीन सेंटर से 23 मजदूर फरार हो गये।
मुख्यमंत्री की मांग
मुख्यमंत्री भूपेश बघेल चाहते हैं केन्द्र सरकार धान का कोटा 24 लाख टन से बढ़ाकर 31.11 लाख टन कर दे। स्वास्थ्य कर्मियों की तरह पुलिस निगम जिला एवं अन्य विभागों के लोगों को भी पी.एम गरीब कल्याण पैकेज में शामिल करें। मनरेगा के तहत 200 दिन का रोजगार दिया जाए ताकि,लोगों को मई,जून में भी काम दिया जा सके। राज्य के कोल ब्लॉकों से कोयला मंत्रालय द्वारा जमा कराई गई 4140 करोड़ रुपए की लेवी राज्य को दी जाए। राज्य का वित्तीय घाटा भी इस वर्ष जीएसडीपी के 5 प्रतिशत के बराबर रखे जाने तथा उधार की सीमा जीएसडीपी के 6 प्रतिशत तक शिथिल किया जाए।
सी.एम कोष में 56 करोड़ आए
कोविड 19 की रोकथाम और जरूरतमंदों की मदद के लिए मुख्यमंत्री सहायता कोष में कुल 56 करोड़ 4 लाख 38 हजार 815 रुपये जमा हुए। कोरोना वायरस के संक्रमण की रोकथाम के लिये सरकार ने सभी 28 जिलों को 25.25 लाख रुपये और 11 जिलों को 20.20 लाख रुपये जारी किए थे। इस तरह जिलों को अब तक 10 करोड़ 40 लाख रुपये जारी किया जा चुका है। 45 करोड़ 79 लाख 8 हजार 815 रुपये अब भी मुख्यमंत्री सहायता कोष में बचे हैं।   
रोजगार गारंटी में काम
राज्य के श्रम सचिव सोनमणि बोरा ने बताया कि लाॅक डाउन के वक्त करीब 1 लाख 29 हजार मजदूरों ने सरकार से मदद मांगी। उन्हें राशन के साथ नगद मदद की गई। अनुमान है कि छत्तीसगढ़ के करीब तीन लाख लोग दूसरे राज्यों में जाकर मजदूरी करते हैं। इनमें से 50 हजार के आसपास दूसरे राज्यों से पैदल आ गए, जिन्हें 14 दिन के क्वारंटाइन के साथ गावों में रोजगार गारंटी के काम में लगा दिया गया है। 30 हजार के करीब सरकारी साधनों ट्रेन और बसों से आ चुके हैं। वापसी के इच्छुक प्रवासी मजदूरों को लाने के लिए राज्य सरकार 28 ट्रेनों की मांग की थी, 15 की अनुमति मिली है। कुछ प्रक्रियाधीन है। ग्राम पंचायत जनपद पंचायत में नए जाॅब कार्ड के लिए आवेदन देने पर 15 दिवस के भीतर जाॅब कार्ड बन जाएगा। आवेदक का उक्त ग्राम पंचायत का मूल निवासी होना अनिवार्य है एवं आवेदक का किसी भी जाॅब कार्ड में नाम नहीं होना चाहिए। राज्य में 1200 से अधिक लघु और माध्यम उद्योग चालू करा दिए गए हैं। लगभग 92 फीसदी लोगों को रोजगार मिल गया है। इसमें काम करने वाले 60 फीसदी से अधिक मजदूर दूसरे राज्यों के हैं। उम्मीद है कि वे अब अपने राज्य नहीं जायेंगे। 
समर्थन मूल्य की राशि दी
प्रदेश के 18 लाख से ज्यादा किसानों को राजीव गांधी किसान न्याय योजना के तहत पहली किस्त 21 मई से सीधे उनके खाते में जाएगी। इसके लिए 51 सौ करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। किसानों को धान के अंतर की राशि 665 और 685 रुपए दी जाएगी। अंतर की राशि की दूसरी किस्त जुलाई,अगस्त में दिए जाने की संभावना है। उद्योगों में काम शुरू होने से 91 हजार 997 श्रमिकों को रोजगार मिल रहा है। मनरेगा के तहत 9883 पंचायतों में 20 लाख लोगों को रोजगार मिला, जो कि पूरे देश के मनरेगा में 24 प्रतिशत भागीदारी है। वन विभाग की विभिन्न योजनाओं में कुल 6 लाख 42 हजार 949 वनवासियों को रोजगार भी प्रदान किया है।

Monday, May 18, 2020

मजदूरों में वापसी की होड़

 
मजदूर अपने घर वापसी का उत्सव मना रहे हैं। वहीं सरकार को कोरोना का संक्रमण बढ़ने का अंदेशा भी है। वैसे छत्तीसगढ़ में कोरोना के कुल 59 मरीजों में सिर्फ छह ही स्वस्थ्य होने को बचे हैं। सबसे बड़ा सवाल अब यह है कि मजदूरों की वापसी के बाद सरकार इनके रोजगार के लिए क्या करेगी।  










0 रमेश तिवारी ‘‘रिपु’’
              छत्तीसगढ़ के मजदूर बड़ी उम्मीदें लेकर निकले थे निवाले के लिए। लेकिन छाले लेकर लौटे। भरोसा था कि हाथों को इतना काम मिलेगा कि पैसे से हाथ भर जाएंगे। घर के लिए सपने खरीदेंगे। मगर उनके सपनों को कोरोना वायरस ने कुतर दिया। न केवल उनकी उम्मीदे ध्वस्त हुई बल्कि, देश में हाहाकार मच गया। क्यों कि कोरोना एक ऐसा कातिल निकला, जिसके हाथ किसी के खून से सने भी नहीं लेकिन,उसके कहर से सनाका खिंच गया। लाॅक डाउन के बावजूद कई मौतों का गवाह बना अप्रैल और मई महीना। दर्द की कहानियों का इतिहास भी। कई आंखें आंसुओं की पनाहगाह बनी। लोग घरों में लाॅक डाउन थे, पर सरकारें चल रही थीं। सड़कें थीं,पर मंजिल का पता नहीं। रेल के पहिये थमे,मगर पटरियों पर पांव चल रहे थे। मजदूर,मजबूर हो गये। घर से दूर हो गए। लाॅक डाउन का नतीजा है कि भारत,इटली और अमेरिका नहीं बना। सरकारों की राय शुमारी से हिम्मत बंधी। अब मजदूर अपने घर वापसी का उत्सव मना रहे हैं। वहीं,सरकार की चिंता है कैसे राज्य की अर्थव्यवस्था जी उठे। मजदूरों की वापसी के बाद उनके रोजगार,उद्योग धंधे और अर्थ व्यवस्था को फिर से जिंदा करने के यक्ष प्रश्न हैं। वैसे राज्य सरकार ने व्यय में तीस फीसदी की कटौती कर दी है। वित्त विभाग द्वारा जारी आदेश के तहत वित्तीय वर्ष की प्रथम तिमाही में व्यय सीमा कुल बजट प्रावधान के 20 प्रतिशत से अधिक नहीं होगी। विशेषज्ञ यह मानते हैं कि बजट मे कटौती से कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा। इसलिए कि कई विभाग अपना बजट खर्च नहीं कर पाते हैं।
सीएम की नहीं सुनते
छत्तीसगढ़ से देश के 21 राज्यों और चार केंद्र शासित प्रदेशों में करीब तीन लाख प्रवासी मजदूर काम करते हैं। संभावना है कि इनमें से दो लाख मजदूर वापस आ सकते हैं। राज्य सरकार का दावा है कि मजदूरों को लाने और भेजने की व्यवस्था की जा रही है। वहीं यह शिकायत भी है कि मुख्यमंत्री की बातें अधिकारी नहीं सुन रहे हैं। जैसा कि माकपा राज्य सचिव संजय पराते का आरोप है कि माकपा ने तेलंगाना में फंसे 1300 मजदूरों को उनके नाम पते और मोबाइल नंबर भी दिया है। इनमें 89 बच्चे और 128 महिलाएं हैं। ये मजदूर हैदराबाद, सिकंदराबाद, अनंतपुर, रंगारेड्डी, हिमायत नगर, गौलीडोडी, नागल रोड, तुर्कपल्ली, शिवराम पल्ली, सिद्धिपेट, निजमपेट, कोकापेट व अन्य जगहों में फंसे हुए हैं। लेकिन अभी तक कोई पहल सरकार ने नहीं की। 
दस करोड़ होंगे खर्च
श्रम मंत्री डॉ शिवकुमार डहरिया ने युगवार्ता को बताया,‘‘छत्तीसगढ़ में अब तक 108351 मजदूरों ने राज्य में वापसी के लिए पंजीयन कराया है। श्रमिकों के रेल और बस से आने का खर्चा श्रम विभाग उठाएगा। मजदूरों को लाने में लगभग 10 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। दूसरे राज्यों के करीब 27 हजार श्रमिक यहां से जा चुके हैं और 32 हजार लोगों ने जाने के लिए पंजीयन कराया है। प्रवासी मजदूरों के लिए जिलों में हेल्प लाइन के साथ राज्य स्तर पर कंट्रोल रूम बनाया गया है। छत्तीसगढ़ में अन्य राज्यों के मजदूरों की संख्या लगभग 35 हजार है’’।
रोजगार गारंटी में काम
राज्य के श्रम सचिव सोनमणि बोरा ने बताया कि लाॅक डाउन के वक्त करीब 1 लाख 29 हजार मजदूरों ने सरकार से मदद मांगी। उन्हें राशन के साथ नगद मदद की गई। अनुमान है कि छत्तीसगढ़ के करीब तीन लाख लोग दूसरे राज्यों में जाकर मजदूरी करते हैं। इनमें से 50 हजार के आसपास दूसरे राज्यों से पैदल आ गए, जिन्हें 14 दिन के क्वारंटाइन के साथ गावों में रोजगार गारंटी के काम में लगा दिया गया है। 30 हजार के करीब सरकारी साधनों ट्रेन और बसों से आ चुके हैं। वापसी के इच्छुक प्रवासी मजदूरों को लाने के लिए राज्य सरकार 28 ट्रेनों की मांग की थी, 15 की अनुमति मिली है। कुछ प्रक्रियाधीन है। ग्राम पंचायत जनपद पंचायत में नए जाॅब कार्ड के लिए आवेदन देने पर 15 दिवस के भीतर जाॅब कार्ड बन जाएगा। आवेदक का उक्त ग्राम पंचायत का मूल निवासी होना अनिवार्य है एवं आवेदक का किसी भी जाॅब कार्ड में नाम नहीं होना चाहिए। राज्य में 1200 से अधिक लघु और माध्यम उद्योग चालू करा दिए गए हैं। लगभग 92 फीसदी लोगों को रोजगार मिल गया है। इसमें काम करने वाले 60 फीसदी से अधिक मजदूर दूसरे राज्यों के हैं। उम्मीद है कि वे अब अपने राज्य नहीं जायेंगे। 
समर्थन मूल्य की राशि दी
प्रदेश के 18 लाख से ज्यादा किसानों को राजीव गांधी किसान न्याय योजना के तहत पहली किस्त 21 मई से सीधे उनके खाते में जाएगी। इसके लिए 51 सौ करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। किसानों को धान के अंतर की राशि 665 और 685 रुपए दी जाएगी। अंतर की राशि की दूसरी किस्त जुलाई,अगस्त में दिए जाने की संभावना है। उद्योगों में काम शुरू होने से 91 हजार 997 श्रमिकों को रोजगार मिल रहा है। मनरेगा के तहत 9883 पंचायतों में 20 लाख लोगों को रोजगार मिला, जो कि पूरे देश के मनरेगा में 24 प्रतिशत भागीदारी है। वन विभाग की विभिन्न योजनाओं में कुल 6 लाख 42 हजार 949 वनवासियों को रोजगार भी प्रदान किया है।
संक्रमित प्रदेश से आए प्रवासी
राज्य में कुल 59 मरीज थे, जिनमें से 53 मरीज ठीक हो चुके हैं। 6 मरीजों को उपचार चल रहा है। छत्तीसगढ़ में रिकवरी रेट 90 प्रतिशत से अधिक है। अब तक 25 हजार 282 कोरोना वायरस टेस्ट किए जा चुके हैं। 24 हजार 605 लोगों को क्वारंटीन किया गया है। राज्य के श्रमिकों को वापस लाने के लिए पहली ट्रेन गुजरात से आई। आने वाले सभी श्रमिकों का स्वास्थ्य परीक्षण किया गया। इसके लिए राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में 16 हजार 499 और शहरी क्षेत्रों में 623 क्वारंटीन सेंटर बनाए गए हैं। लॉकडाउन के बाद 850 से ज्यादा प्रवासी मजदूर पैदल या लिफ्ट लेकर रायपुर पहुंच चुके हैं। इनमें से 80 फीसदी प्रवासी उन राज्यों से आए हैं जहां कोरोना संक्रमित मरीजों की संख्या टॉप पर है। ज्यादातर मजदूर राजस्थान, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश से आए हैं।  
मुख्यमंत्री की मांग
मुख्यमंत्री भूपेश बघेल चाहते हैं केन्द्र सरकार धान का कोटा 24 लाख टन से बढ़ाकर 31.11 लाख टन कर दे। स्वास्थ्य कर्मियों की तरह पुलिस निगम जिला एवं अन्य विभागों के लोगों को भी पी.एम गरीब कल्याण पैकेज में शामिल करें। मनरेगा के तहत 200 दिन का रोजगार दिया जाए ताकि,लोगों को मई,जून में भी काम दिया जा सके। राज्य के कोल ब्लॉकों से कोयला मंत्रालय द्वारा जमा कराई गई 4140 करोड़ रुपए की लेवी राज्य को दी जाए। राज्य का वित्तीय घाटा भी इस वर्ष जीएसडीपी के 5 प्रतिशत के बराबर रखे जाने तथा उधार की सीमा जीएसडीपी के 6 प्रतिशत तक शिथिल किया जाए।
सी.एम कोष में 56 करोड़ आए
कोविड 19 की रोकथाम और जरूरतमंदों की मदद के लिए मुख्यमंत्री सहायता कोष में कुल 56 करोड़ 4 लाख 38 हजार 815 रुपये जमा हुए। कोरोना वायरस के संक्रमण की रोकथाम के लिये सरकार ने सभी 28 जिलों को 25.25 लाख रुपये और 11 जिलों को 20.20 लाख रुपये जारी किए थे। इस तरह जिलों को अब तक 10 करोड़ 40 लाख रुपये जारी किया जा चुका है। 45 करोड़ 79 लाख 8 हजार 815 रुपये अब भी मुख्यमंत्री सहायता कोष में बचे हैं।   
क्वारंटीन सेंटर से भागे
प्रदेश में कोरिया के क्वारंटीन सेंटर से भागे दो मजदूरों की रिपोर्ट 7 मई को पाॅजिटिव आई। दोनों मजदूर बैकुंठपुर स्थित क्वारंटीन सेंटर में थे और सैंपल देने के बाद झारखंड भाग निकले। जगदलपुर के स्व. बलिराम कश्यप मेडिकल कॉलेज में बने क्वारंटाइन सेंटर से तमिलनाडु के भागे दो ड्राइवर   पकड़े जाने के बाद जेल भेज दिए गए हैं। मुंगेली से चार मजदूर, और दंतेवाड़ा जिले में अरनपुर के क्वारंटीन सेंटर से 23 मजदूर फरार हो गये। तेलंगाना से आये इन मजदूरों की प्रारंभिक जांच में किसी में भी सर्दी खांसी या बुखार जैसे लक्षण नहीं थे। स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव कहते हैं, मई और जून में कोरोना के मरीज बढ़ने की आशंका है।

Wednesday, May 6, 2020

शर्मिली बन गई खूंरेजी

 
        
बस्तर की शर्मिली महिलाएं लाल गलियारे में रहकर खूंरेजी महिलाएं बन गई हैं.उनके हाथ में न केवल नक्सली नेटवर्क की कमान है बल्कि, किसी बड़े हमले की अगुआई भी करती हैं.अपनी जान और इज्जत को जोखिम में डालने वाली माओवादी महिलाओं पर लाखों के इनाम है.जल,जमीन और जंगल की लड़ाई के लिए नक्सली नेताओं ने माकपा के सिद्धांत की घुट्टी पिलाकर इन्हें बंदूक उठाने के लिए विवश कर दिया है.वहीं,राजनीतिक पैरामीटर में ये गरीब हैं,बेरोजगार हैं,कुपोषित हैं.महिला नक्सली अपने हक़ की आखि़री लड़ाई लड़ रही हैं.









0 रमेश तिवारी ‘‘रिपु‘‘
                               छत्तीसगढ़ के अबूझमाढ़ की दुर्गम पहाड़ी और जंगल में माओवादियों का मुख्य गढ़ है.वामपंथी उग्रवाद का संचालन इन्हीं जंगलों से हो रहा है.इन्हीं घने जंगलों में माओवादी अपनी समानांतर सरकार चलाते हैं.जिसे वे जनताना सरकार कहते हंै.नक्सली जिला सुकमा की सरहद  आंन्ध्र प्रदेश और ओड़िसा से मिलती है.जिसे पुलिस माओवादियों की राजधानी कहती है.माओवादियों के नेटवर्क का संचालन यहीं से होता है. सन् 2005 तक नक्सली लीडरों ने महिलाओं की सेना तैयार नहीं किये थे. 2006 में नक्सली लीडरों ने निर्णय लिया महिला सेना तैयार करने का.उसके बाद हर घर से एक बेटी और बेटा यह कहकर नक्सलियों ने मांगा कि तुम्हारे हक की लड़ाई हम सरकार से लड़ रहे हैं,इसलिए अपना एक बेटा या फिर बेटी दें.धीरे धीरे नक्सलियों के एक बड़े नेटवर्क का संचालन महिला नक्सली करने लगी.नक्सली संगठन में जो आदिवासी महिलायें हंैं, वे सभी युवा है.कभी आदिवासी महिलाओं को शर्मिली कहा जाता था,लेकिन अब इनके चेहरे पर लज्जा नहीं दिखती.बर्बरता और कू्ररता की एक मिसाल बन गई हैं.नक्सली नेता अपने संगठन में खूंरेजी महिलाओं को उन्हें कैडर के हिसाब से पद देते हैं.पद,प्रतिष्ठा और अच्छे वेतन के लिए आदिवासी लड़कियां चूल्हा चैका और पढ़ाई छोड़कर माओवादी बन रही हैं.
माओवादियों की धारण है कि राजनैतिक सत्ता बंदूक की नली से निकलती है.पीएलजीए (पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी) पुरूषों की तरह महिलाओं को भी नियुक्त करता है.उन्हें सैन्य प्रशिक्षण दिया जाता है.छापामार दस्तों की अगुआई की जिम्मेदारी भी प्रशिक्षित महिलाओं को दी जाती है.बस्तर में नक्सलियों के एक बड़े नेटवर्क की कमान युवा महिलाओं के हाथों में है.बस्तर की आदिवासी महिलाएं बड़ी मेहनती हैं.हाड़तोड़ मेहनत करना और पुरूषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खेती किसानी से लेकर वनोपज एकत्र करना, हाट बाजारों में बेचने के अलावा घर गृहस्थी और बाल बच्चे संभालना उनका यह स्थायी गुण है.विषम परिस्थितियों में नहीं घबराना आदिवासी महिलाओं की विशेषता है.आदिवासी महिलाओं की यही विशेषता लालगलियारे की जरूरत बन गया.आदिवासी औरतों में अनुशासन और किसी भी काम को मन लगाकर करने की इच्छा शक्ति बहुत तेज होती है.उनकी इस खूबी का इस्तेेमाल माओवादी नेताओं ने किया और उन्हें खूंखार छापामार बना दिए.पैसा और टेर्रर की वजह से भी आदिवासी महिलायें अब नक्सली मूवमेंट को अंजाम दे रही हैं.जंगल में रहते हुए इनका आचरण जंगली हो गया है.दया और ममता से इनका कोई सरोकार नहीं रहा.पुलिस के शारीरिक और मानसिक शोषण की वजह से पुलिस की ये सख्त दुश्मन हैं.जाहिर सी बात है कि पुलिस की छवि आदिवासियों के बीच अच्छी नहीं है.हिड़मा का पुलिस ने सामूहिक बलात्कार करने के बाद उसे महिला नक्सली का ड्रेस पहनाकर गोली मार दी थी.मीडिया को बाद में बताया  कि इनामी नक्सली थी.मीना खलको कांड में भी यही हुआ था.यह अलग बात है कि मानवाधिकार आयोग की जांच में खुलासा होने पर पुलिस कर्मियों के खिलाफ कार्रवाई हुई थी.वहीं ऐसे सैकड़ांे मामले हैं,जिसमें पुलिस के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई.वर्दी के खिलाफ नक्सली महिलायें हिंसा की नई परिभाषा गढ़ रही हैं.इनकी बर्बरता और हिंसक वारदात की वजह से पुलिस ने कई महिला नक्सलियों पर इनाम घोषित किया है.जिसमें कुमारी वनोजा पर 8 लाख,कुमारी सोढ़ी लिंगे पर 5 लाख एवं माड़वी मंगली की गिरफ्तारी पर 3 लाख रूपए का इनाम है.
नक्सली वारदात में महिलाएं
पुलिस भी मानती है कि इन 14 सालों में बड़ी संख्या में महिलाएं नक्सली दलम मेें शामिल होकर नक्सली संगठन को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई हैं.बस्तर संभाग के दरभा, भेज्जी, फरसगढ़, कुटरू, छोटेडोंगर, झारा घाटी, आवापल्ली, आमाबेड़ा, ओरछा सहित आधा दर्जन इलाकों में महिलाओं को एरिया कमांडर के पद पर तैनात कर नक्सली मूवमेंट को बढ़ाने और हिंसा फैलाने का काम सौंपा गया है. इस समय बस्तर की जेलों में लगभग 50 खूंखार महिला नक्सली कैद हैं.इनमें आधा दर्जन हार्डकोर महिला नक्सली हैं.जो नक्सलियों के बड़े मूवमेेंट को आपरेट करती थीं.छत्तीसगढ़ की ज्यादातर नक्सली वारदातांे में महिलाओं की भूमिका रही है.दरभा के झीरम घाटी पर हुए कांग्रेसियों की परिवर्तन यात्रा हमले को भी नक्सली महिला लीडरों ने अंजाम दिया था.बस्तर में नक्सलियों के खिलाफ आंदोलन छेड़ने वाले कांग्रेस नेता महेंद्र कर्मा को झीरम घाटी में बेरहमी से महिला नक्सलियों ने मारा था. महिला नक्सली कर्मा को पीटते हुए सड़क से लगभग आधा किलोमीटर अन्दर ले गई थीं और इस दौरान उनके चेहरे पर चाकुओं से वार भी करती रहीं.ये क्रोध का चरम था.कई घटनाओं में महिला नक्सलियों के नाम सामने आने के बाद पुलिस ने भी अति संवेदनशील क्षेत्रों में संदिग्ध महिलाओं पर नजर रखना प्रारम्भ कर दिया है.नक्सल प्रभावित जिला सुकमा के बुरकापाल में 24 अप्रैल 2017 को माओवादी और सुरक्षा बल के जवानों के बीच हुई मुठभेड़ में तीन सैकड़ा से अधिक माओवादी थे. जिसमें से आधे से अधिक वर्दी में महिला नक्सलीं थी. जो सुरक्षा बल के जवानों पर गोलियां चला रही थीं.अविभाजित दंतेवाड़ा में 2010 में हुई नक्सली वारदात, जिसमें 76 सैनिक मारे गये थे.महिला नक्सलियों ने रैकी करके ही घटना को अंजाम दिया था.फोर्स के कैंप और हाट बजार में बड़ी असानी से महिलाएं चली जाती हैं,इसलिए भी माओवादियों ने महिलाओं की फौज तैयार की है.
बसंती का कहर
कांकेर जिले के लोहारी गांव की आठ लाख की इनामी नक्सली कमांडर संध्या उर्फ बसंती उर्फ जुरी गावड़े  2001 में नक्सलियों के बाल संगठन में शामिल हुई थी.इसके बाद संगठन में अलग-अलग जगहों पर महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाने के बाद अपने गांव में जन मिलिशिया कमांडर के तौर पर काम कर रही थी.नक्सल नेताओं के शोषण से तंग आ कर बसंती ने आत्मसमर्पण कर दिया.उसका प्रमुख काम पुलिस पार्टी पर हमला कर हथियार लूटना, सीनियर नक्सली नेताओं की सुरक्षा करना.उसने जो गंभीर वारदात को अंजाम दिया,उसमें से दुर्गूकोन्दल, आमाबेड़ा, कोयलीबेड़ा और पखांजूर थाना क्षेत्र में कई जगह विस्फोट, आगजनी और एम्बुश लगाने की घटनाओं में शामिल.13 सितंबर 2003 दंतेवाड़ा जिले के गीदम थाने में हमला और लूट. 2007 में बीजापुर जिले के रानीबोदली कैंप पर हमला. 2010 में चिंतलनार में हमला,जिसमें 76 सैनिक मारे गये थे. 
छत्तीसगढ़ के डीजीपी दुर्गेश माधव अवस्थी कहते हैं,‘‘ बहुत सारी नक्सली वारदातों में महिला माओवादियों के हाथ होने की जानकारी मिली है.गुप्त सूचना के आधार पर आॅपरेशन चलाए हैं.2019 से अब तक हर महीने माओवादियों के कैंप पर हमले किये हैं.हमारे एक भी कैंप पर वे अब तक हमला नहीं कर पाए हैं.नक्सलियों में दहशत है.भारी संख्या में महिलाएं सरेंडर कर मुख्य धारा शामिल हुई हैं.जाहिर है कि नक्सलवाद से महिलाओं को मोहभंग होने लगा है’’.
27 जवानों की जान ली सुकाय
नक्सल प्रभावित दंतेवाड़ा जिले के गीदम थाना क्षेत्र से आठ लाख की इनामी नक्सली सुकाय वेट्टी सन् 2011 में एलजीएस सदस्य के रूप में नक्सली संगठन से जुड़ी.पूर्वी बस्तर डिविजन के कुआनार में एल.जी.एस. की सक्रिय सदस्य थी.सन् 2010 में मुडपाल के जंगल में पुलिस पर एम्बुश लगाकर हमला,नारायणपुर के धौड़ाई इलाके में सीआरपीएफ के जवानों पर हमला, इसमें 27 जवान शहीद हुए थे.2013 में कोंडागांव के केशकाल थाना क्षेत्र में पुलिस नक्सली मुठभेड़ में शामिल थी.
नाबालिग युवतियांे की मांग
आन्ध्र प्रदेश और छत्तीसगढ़ में हुई कई बड़ी नक्सली वारदातों को अंजाम देने वाली तीन लाख की इनामी नक्सली रमोली नेताम अपने पति गोंविद नेताम के साथ सरेंडर की, कहती है,’’बड़े नेता नाबालिग युवतियों को संगठन में शामिल करने का दबाव बनाते हैं.पहले युवतियों में जोश भरा जाता है कि, यह अपने लोगों के लिए हमारी लड़ाई है,लेकिन शामिल होने के बाद दोयम दर्जे का व्यवहार किया जाता है.जुगरी निवासी छिनारी नारायणपुर मर्दापाल एलओएस सदस्य के रूप में वर्ष 2008 में भर्ती हुई थी.उसे भानपुरी एरिया कमेटी सदस्य की जिम्मेदारी दी गई थी.दोनों महिला नक्सलियों पर 50-50 हजार का इनाम था.माओवादियों को प्रेम और संतान पैदा करने की इजाजत नहीं होती.आठ लाख रूपए की इनामी नक्सली 20 वर्षीया आसमती को 10 लाख रूपए के इनामी नक्सली संपत से प्यार हो गया.इन दोनों की मुहब्बत परवान चढ ही रही थी,इसकी भनक कमेटी के सचिव राजू उर्फ रामचन्द्र रेड्डी को लग गई.दोनों को अलग कर दिया.आसमती को यह अच्छा नहंी लगा और वह घर बसाने के लिए लाल गलियारे से नाता तोड़ने के लिए संपत को विवश किया और दोनों ने हथियार डाल दिए.
भेदभाव नहीं
आदिवासी समाज में महिलाओं के साथ भेदभाव की स्थिति नहीं है.समता का दर्जा दिया गया है.बस्तर में बेरोजगारी मुद्दा नहीं है.शहरी लोग और सरकारी तंत्र जब उन तक पहुंचा, तो उन्होंने बताया गया कि पिछड़े हो.रहन सहन ठीक नहीं है.कच्चे मकान में रहते हो. कपड़ा ठीक से पहनो.सरकारी पैरामीटर में वे गरीब कहे गये.आदिवासी कभी कुपोषित नहीं थे.अपनी जिन्दगी में आदिवासी महिलायें खुश थीं.इसलिए भी कि जातिगत भेदभाव उनके साथ कभी नहीं था.इसलिए भी कि सभी एक ही जाति के हैं.सवाल यह है कि फिर आदिवासी महिलाएं नक्सलवाद को आत्मसात क्यों की?देखा जाये तो बस्तर अंचल में आदिवासी संसाधन पर कब्जे की लड़ाई है.जल, जंगल,और जमीन की लड़ाई है.सरकार जल, जंगल, और जमीन पर कब्जा उद्योगपतियों को दे रही है.जबकि सदियों से इन पर आदिवासियों का कब्जा था.जंगलों को काट कर उद्योग धंधे स्थापित करने के लिए सड़कंे बनाने की सरकार की नीतियों की वजह से आज हर आदिवासी को दिग्भ्रमित करने की खेल खेला जा रहा है.आन्ध्र के नक्सली नेताओं ने आकर छत्तीसगढ़ के आदिवासी समाज में माकपा के सिद्धांत का बीज बोया.यही वजह है कि आज छत्तीसगढ़ के 28 जिलों में 18 जिले नक्सलवाद की आग में जल रहे हैं. सरेडर करने वाली महिला नक्सलियों यह बात समझ में आ गई कि राजनीति की सत्ता बंदूक की गोली से नहीं निकलेगी.आन्ध्र के नक्सली लीडर ने उनका दैहिक और मानसिक शोषण करने का यह तरीका निकाला है.
क्यों बन रही हैं नक्सली
आदिवासी समाज की महिलायें नक्सली क्यों बन रही है?इसके पीछे एक नहीं चार प्रमुख कारण हैं.उनके घर का कोई व्यक्ति पुलिस से प्रताड़ित होकर नक्सली बन गया, तो उनके घर की महिलायें भी उनके साथ  बंदूक उठा लीं.किसी का प्रेमी नक्सली बन गया, तो वो भी नक्सली बन गई.जिस आदिवासी महिला या पुरूष का दिमाग माकपा के सिद्धांत से प्रभावित होकर परिवर्तित हो गया वो नक्सली बन गया.लेकिन इन सब कारणों के अलावा एक सबसे प्रमुख कारण वसूली को माना जा रहा है.जंगली क्षेत्र में सड़कें,पुलिया,पुल या फिर विकास के अन्य निर्माण कार्यो में लगे ठेकेदारों से वसूली करना.टेंडर के आधार पर अपना प्रतिशत तय कर रखे हैं.नहीं देने वाले ठेकेदार काम नहीं कर सकते.उनके ट्रेक्टर,जेसीबी मशीन,डंपर,वाहन आदि को नक्सली फूंक देते हैं.नक्सली दहशत अब वूसली का जरिया बन गया है.तेंदूत्ता सीजन में सबसे अधिक राशि नक्सलियों को वसूली से मिलती है.
बस्तर में कमांडेंट के पद पर रहे कमलेश कमल कहते हैं,‘‘आदिवासी महिलाओं को लगता है कि नक्सली बनना अन्य विकल्पों से बेहतर विकल्प है.भूख या फिर बेरोजगारी से मरने की जगह गोली से मर जाना ज्यादा ठीक है.नक्सली बनने के बाद समर्पण कर देने से एक निश्चत रकम मिलती है.यह लालच भी महिलाओं को नक्सली धारा की ओर खींचती है’’
कुछ जीवन में करना है.अन्याय के खिलाफ लड़ना है. आदिवासी महिलायें प्रलोभन में बड़ी आसानी से फंस जाती हैं.नक्सली ब्रेन वास करते हैं आदिवासियों का.देखिये सरकार तुम्हारे साथ कितना सौतेला व्यवहार करती है.तुम्हारे जल,जंगल और जमीन को उद्योगपतियों को देकर तुम्हें कमजोर कर रही है.तुम्हारे वन उपज पर उद्योगपति कब्जा कर रहे हैं.सरकार के खिलाफ आपकी लड़ाई हम लड़ंगे,तुम लोग हमारा सहयोग करें’’
बहरहाल अब स्थानीय महिलाएं समझ गई हैं कि माओवादी केवल उनका शारीरिक शोषण के लिए उन्हें नक्सली बनाए हैं. इस वजह से नक्सलवाद के प्रति उनमें गुस्सा है और वे सरेंडर करने की दिशा में अधिक सोचने लगी हैं. पुलिस का दबाव भी काम कर रहा है. बस्तर के आईजी विवेकानंद सिन्हा कहते हैं, स्थानीय आदिवासियों का माओवाद से मोह भंग हो रहा है.अब नक्सलाद अंतिम सांसे गिन रहा है’’.

Monday, May 4, 2020

पीलिया के शिकंजे में रायपुर

 कोरोना वायरस के खतरे के बीच राजधानी रायपुर में पीलिया 36 वार्डो में अपना पैर पसार चुका है।   कई वार्डो के पानी में खतरनाक बैक्टीरिया ई-कोलाई,स्यूडोमोनास,प्रोटियाज,क्लेवसिला पाया गया है। नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग ने प्रदेश के सभी निकायों को नालियों के बीच से जाने वाली पेयजल पाइप को बदलने के निर्देश दिए हैं, पर पैसे का कोई इंतजाम नहीं किया है। 







0 रमेश तिवारी ‘‘रिपु‘‘
             छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में मुख्यमंत्री हैं। स्वास्थ्य मंत्री हैं। पूरी सरकार है। नगर निगम के कमीश्नर हैं। फिर भी उस काग्रेस सरकार के रहते पीलिया हो गया,जो पीलिया होने पर सड़क पर उतरती थी। नगर निगम के प्लांट से गंदा पानी शहर में सप्लाई किए जाने से इस बार पीलिया हुआ। सरकार का दावा है कि अमृत मिशन योजना के तहत शहर में करीब दो सौ किलोमीटर पेयजल पाइप लाइन बिछाया गया है। नई पानी की टंकियों से पानी सप्लाई की जा रही है। ऐसे में, पीलिया होने पर राजनीति का गरमाना स्वाभाविक है। हमेशा की तरह एक ही सवाल,आखिर राजधानी को पीलिया दिया किसने? महापौर एजाज ढेबर अपने बचाव मे कहते हैं,‘‘पीलिया इससे पहले भी रायपुर में हुआ है। सांसद सुनील सोनी जब मेयर थे, उस वक्त पेयजल की पाइप लाइन नालियों में डाली गई थी,उसी का नतीजा है’’।
कोरोना वायरस के खतरे के बीच तीन अप्रैल को कई लोगांे को पीलिया होने की रिपोर्ट आई तब सरकार का ध्यान गया। हैरान करने वाली बात है कि नेहरु मेडिकल कॉलेज के माइक्रो बायोलॉजी विभाग की रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ कि आमापारा और मंगल बाजार इलाके के पानी में ई-कोलाई और स्यूडोमोनास,प्रोटियाज,क्लेव सिला बैक्टरिया मिला है। इस रिपोर्ट से नगर निगम के स्वास्थ्य विभाग में हड़कंप मच गया। तीन सौ लोगों को पीलिया हुआ था,जो बढ़कर करीब दो हजार पहुंच गया है। पीलिया के शिकंजे में शहर के 35 वार्ड हैं। जो बढ़ भी सकता है।
हाई कोर्ट में याचिका
बिलासपुर हाईकोर्ट में पीलिया को लेकर एक जनहित याचिका दायर किये जाने पर मनोज परांजपे, अमृतो दास और सौरभ डांगी को न्यायमित्र नियुक्त किया है। न्यायमित्र सौरभ डांगी ने बताया कि हाईकोर्ट में जनहित याचिका लंबित है। नहरपारा और मोवा में हाईकोर्ट के आदेश के अनुपालन में टैंकर से पानी सप्लाई करने और नालियों से जाने वाली पेयजल लाइन को बदलने कमीश्नर को पत्र लिखा गया है। पिछले वर्ष बिलासपुर, रायपुर, दुर्ग सहित राज्य के अन्य जिलों में पीलिया फैला था।
भाजपा-कांग्रेंस आमने सामने 
भाजपा ने मेयर एजाज ढेबर और एमआईसी पर पीलिया से निपटने में नाकाम होने का आरोप लगाया है। वहीं मेयर एजाज ढेबर ने कहा कि पीलिया प्रभावित क्षेत्रों में रायपुर सांसद सुनील सोनी,प्रदेश प्रवक्ता संजय श्रीवास्तव कितनी दफा गए? पीलिया केवल पानी से ही नहीं बल्कि, दूषित भोजन से भी फैल रहा है। मेयर एजाज ढेबर ने फिल्टर प्लांट में लापरवाही बरतने वाले दो इंजीनियरों को शो काॅज नोटिस जारी किया है। बीजेपी के प्रदेश प्रवक्ता संजय श्रीवास्तव ने कहा,राजधानी में पीलिया का प्रकोप चिंता का विषय है। सड़ चुके पाइपों को हटाया जाए। निगम परिषद दलगत राजनीति से उठकर पार्षद और निर्दलीय पार्षदों में समन्वय स्थापित कर व्यवस्था को सुधारें। पूर्व मंत्री राजेश मूणत ने कहा,  पीलिया के प्रकोप पर ठेले,खोमचों वालों के दूषित खानपान पर ठीकरा फोड़ना गलत है। इसलिए कि लॉक डाऊन के चलते लोग बाहर का कुछ नहीं खाए हैं। राजधानी के विभिन्न इलाकों में हेपेटाइटिस ए वाइरस की वजह से लगभग 18 सौ मरीजों को पीलिया होना बेहद गंभीर मामला है,जिनमें से 519 मरीजों में बिलीरुबिन का अधिक मात्रा में पाया जाना और 317 मरीजों में अलग,अलग प्रकार के हेपेटाइटिस के लक्षण मिले हैं,जो चिंता का विषय है।
एक सच इनका
नगरीय प्रशासन मंत्री शिव डेहरिया ने कहा,एक सप्ताह के भीतर रायपुर में 24256 मीटर पाइप लाइन बदली गई है। 440 नल कनेक्शन शिफ्ट किए गए हैं। प्रभावित इलाकों में नल कनेक्शन शिफ्ट करने का काम अब भी जारी है’’। सुन्दर नगर की सुमन द्विवेदी कहती हैं,‘‘सबसे बड़ा सवाल यह है कि, गर्मी में पीलिया राजधानी में क्यों होता है? इसी पाइप से पानी ठंड और बरसात में भी सप्लाई होता है। कहीं न कहीं निगम प्रशासन पीलिया के लिए दोषी है’’। निगम प्रशासन के अनुसार शहर के 116 मोहल्ले में 55549 से ज्यादा क्लोरीन की गोली बांटी गई है। 10315 व्यक्तियों को ओआरएस का घोला बांटा गया। अब तक 2237 व्यक्तियों का रक्त परीक्षण किया गया। पीलिया की जानकारी के लिए 14562 घरों में भ्रमण किया गया है। प्रभावित इलाकों में स्वास्थ्य शिविर भी लगाए गए हैं। बैजनाथपारा, छोटापारा की जल आपूर्ति रोक कर पीलिया वाले इलाके में पुरानी पाइप लाइन को काट कर नई पाइप लाइन डालने का काम चल रहा है। मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ मीरा बघेल कहती हंै, पीलिया से सभी को खतरा है,लेकिन गर्भवती महिलाओं को ज्यादा है। विभाग इसकी जांच कर रहा है’’। 
राशि का इंतजाम नहीं 
नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग ने प्रदेश के सभी निकायों को नाले नालियों के बीच से गुजरी पाइप लाइनें बदलने के निर्देश दिए हैं लेकिन, इसके लिए पृथक से राशि का कोई इंतजाम नहीं किया है। शासन के निर्देश पर निगम ने पूरे निगम एरिया का सर्वे कराने कहा था। बिलासपुर निगम एरिया में 135 जगहांें पर लीकेज और 300 से अधिक स्थानों पर नाले नालियों के बीच से गुजरीं पाइप लाइनों को बदलने के लिए करीब 3000 मीटर से अधिक पाइप लाइन की जरूरत पड़ेगी। मेयर रामशरण यादव ने सभी आठों जोन को पाइप लाइनों के लीकेज दुरुस्त करने तथा प्लास्टिक पाइप लाइनों को बदलने कहा है। वहीं प्रभाकर पांडेय कमिश्नर नगर निगम बिलासपुर,का कहना है कि जिस उपभोक्ता की पाइप लाइनें नालियों के बीच से गुजरीं हैं, उन्हें ऊपर उठाया जाएगा। इससे पाइप लाइनों को पूरी तरह बदलने की जरूरत नहीं पड़ेगी’’। 
खतरनाक मोहल्ले
लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग ने शहर के 58 इलाकों से पानी का सैंपल लेकर जांच किया तो 32 जगहों के पानी में ई कोलाई,क्लेबसिला और स्यूडोमोनास बैक्टीरिया मिले हैं। आमापारा, मंगल बाजार, डी.डी नगर, महामाया पारा, प्रोफेसर कालोनी, हीरापुर मंगल बाजार, वासुदेव पारा, कुशालपुर, लाखेनगर चांगोराभाठा, दलदल सिवनी, मोवा, टाटीबंध, अटारी, महामाया पारा, चूड़ामणि, उरकुरा, उरला समेत बीरगांव में पीलिया के मरीज हैं। हैरानी वाली बात यह है कि 34 जगहों के पानी की रिपोर्ट में 20 जगह का पानी पीने के काबिल नहीं है। 
जाहिर सी बात है कि पीलिया की वजह से अभी केवल दो मौतें हुई है। इसकी रोकथाम के लिए जल्द ही कारगर कदम उठाना जरूरी है अन्यथा आने वाले दिनों में कोरोना संक्रमण से ज्यादा पीलिया राजधानी का संकट बढ़ाएगा। 

18 जिलों का जल, जीवन नहीं है
रायपुर पीलिया की गिरफ्त में है। वहीं दूसरी ओर प्रदेश के 18 जिलों के 592 गांवों के पानी में फ्लोरोसिस और फ्लोराइड की मात्रा बहुत अधिक। सबसे बुरी स्थिति रायपुर संभाग की है। रायपुर संभाग के 246 गांवों का पानी पीने योग्य नहीं है। इन गांवों का पानी लोगों की हड्डियां कमजोर कर रहा है। यह खुलासा राज्य स्वास्थ्य यांत्रिकी (पीएचई) विभाग ने किया है। प्रभावित गांवों में दंतरोग और हड्डियों से संबंधित मरीजों की संख्या बढ़ती जा रही है। बस्तर और बीजापुर के 9-9 गांव, बिलासपुर. 2, धमतरी. 41, जशपुर. 23, कांकेर. 54,कवर्धा. 01, कोरबा. 84, कोरिया. 4, महासमुंद. 02, रायगढ़. 4, रायपुर. 246, राजनांदगांव, 2, सरगुजा. 75, दुर्ग, 6, बालोद 28 और बेमेतरा के दो गांवों के पानी में फ्लोरोसिस और फ्लोराइड की मात्रा बहुत अधिक है। ऐसे गांवों में भी अन्य बीमारियां हो सकती है।

Tuesday, April 28, 2020

प्रकृति के आए ‘अच्छे दिन’

      
पेड़ों की शाखें उदास थीं। क्यों कि उनके कंधों पर पंक्षी नहीं बैठते थे। दरिया की तह पर मछली,कछुआ रोया करते थे। क्यों कि  नदियों के पानी में आक्सिजन कम थी। पर्यावरण की सेहत सुधरी तो जंगली जानवर शहर पहुंच गए। लाॅक डाउन से जल,जंगल और जमीन में अच्छे दिन लौट आए हैं।

0 रमेश तिवारी ‘‘रिपु’’
                         शोर की भीड़ में एक पीढ़ी ने पूरी जिन्दगी गुजार दी। कभी खामोशी की  दहलीज
शोर की भीड़ और मोटर कारों की कर्कस स्वरों के पैरों तले रोजी स्टर्लिंग,गुलाबी मैना और गौरैया की चहचाहट हर रोज रौंद दी जाती थी। लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ। आदमी घरों में कैद हुआ और सात समुंदर पार से इंसानी सरहदों को पार कर स्टर्लिग बिलासपुर पहुंच गई। इंसानों ने अपने लिए सरहदें बनाए हैं लेकिन, प्रकृति के आंगन में रहने वालों की कोई सरहद नहीं है। 
चहहचाने लगे पंक्षी
हवाओं के झूले में झूलने वाले पंक्षी के स्वरों का माधुर्य खो जाता था। बिलासपुर के वंदना पावर प्लांट के 18 एकड़ एरिया मंे झंुड के झुंड आसमानों में उढ़ते रोजी स्टर्लिग दिखते हैं, तो ऐसा लगता है कि आसमान इनके लिए स्वागत मंच सजाए हुए है। गीत गाते ये पेड़ों से विदा होते हैं और गीत गाते, शाम होते पेड़ों पर लौट आते हैं। इस पेड़ से उस पेड़ तक उड़ते हुए इनका चहचहाना, मन को मोह लेता है। आदमी भले घरों में कैद है लेकिन, ये आजाद हैं। आदमी जिस गाड़ी पर बैठकर सैर सपाटा करता था,उस पर ये सुबह-शाम बैठकर पंचायत लगाते दिख जाती हैं। हैरानी वाली बात है कि, दो पखवाड़े के बाद भी इनके पंखों में धूल नहीं है। मछलियां पकड़ने में इन्हें पसीना आ जाता था। लेकिन अब बड़ी आसानी से इनकी चोंच में मछली आ जाती है। तालाबों में न केवल जल बिहार करते हैं और अपन साथियों को बुला लेते हैं उनके साथ पानी में छपाक छपई करते हैं। कुछ गुनगुनाते हैं तो कबूतर भी गुटरगू करने लगते है। पपीहा पीऊ पीऊ करता है। बतख अपनी चोंच में पानी भर लाता है। जंगल के मोर का मन शहर में आ कर करता है कि, बादल छा जाए तो अपना नृत्य प्रस्तुत कर दे।
सात समुंदर पार से आई
यूरोप से आने वाली रोजी स्टर्लिग विशाल समूहों में रहने वाली नन्ही चिड़िया है। सैकड़ों की संख्या में रोजी स्टर्लिंग पहली बार 2013 में बेलमुंडी आए थे। स्वभाव से ये बेहद संवेदनशील होती हैं। फोटाग्राफर शिरीष डामरे ने बताया कि कुछ स्थानीय लोगों ने इन पर पत्थर से हमला किया, जिससे ये रूठ गईं। फिर ये 20014 में ये नहीं आईं। दरअसल खतरे का अंदेशा होने पर ये पंक्षी अपना स्थान बदल देते हैं। 2015 से बिलासपुर से 15 किलोमीटर दूर बेलमुंडी का रूख कर लिया। यहां तालाब है। और ऊंची ऊंची घास में विश्राम करती हैं।  









  पर बैठकर गौरैया, तोता,कबूतर, रोजी स्टर्लिंग, गुलाबी मैना,पपीहा या फिर मोर की आवाज नहीं सुनी। जब भी सुनी,डोर बेल में दर्ज इनकी कृत्रिम आवाज ही सुनी। कलयुगी बयार में,भौतिकवादी संस्कार में जिन्दगी से जुड़े वन्य जी के राग आज की आपाधापी में गुम हो गए या फिर हमसे दूर हो गए। दुनिया वही है। शहर और उसकी गलियां भी। गांव के नदी,पोखर,झरने,जंगल, पहाड़ और आदमी भी वही है। लेकिन कोरोना वाइरस की दस्तक से प्राकृतिक जीवन की तस्वीर बदल गई। 

दुनिया गुलमोहर हो गई
गुलमोहर,टेसू और अमलतास की रंगत सबका मन मोह लेती है। यह सब हुआ है पर्यावरण की सेहत सुधार के चलते। पिछले बरस की तुलना इस बरस महुए कुछ ज्यादा ही खुशियों के आंसुओं की तरह टप टप गिर रहे हैं। आमों के पेड़ों के पत्तों की हरियाली देखकर तोता भी हैरान है कि मै ज्यादा हरा हूं या फिर पत्ते। गौरैया रोशनदान से झांक कर देखती है कि बच्चों के मोबाइल पर मेरे जैसी कौन है। बच्चे उससे क्या बातें कर रहे हैं। टीवी से सितार की आवाज जब झिंगुर के कानों में पड़ती तो वह भी यमन राग सुनाने लगता है। कोरोना वाइरस के चलते प्रकृति में कई तरह के बदलाव देखने को मिल रहे हैं। कई तरह के रंग बिरंगी पंक्षी अब घरों के मुंडेर पर,लान के पौधों पर नृत्य करते दिखने लगे हैं। तोता मैना की कहानी केवल किताबों में पढ़ी और सुनी गई है। लेकिन आम के पेड़ों पर तोता मैना को चोंच लड़ाते देखकर मन कहता है,काश आदमी इनसे सीख पाता कैसे प्यार से रहना चाहिए। ये कभी किसी की बुराई नहीं करते। गौरैया किसी के खेत से, तोता किसी के पेड़ों से आम जरूरत से ज्यादा कभी नहीं ले गये। काश, ऐसा कोई ऐसा कैमरा होता, जिनमें इनकी दिलकश हरकतों को कैद कर लेते और बना लेता एक यादों का अलबम।
प्रदूषण में कमी आई
हवाई सफर रूकने से कार्बन डाईऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड, बैंजीन आदि गैसों के उत्सर्जन में 22 फीसदी की कमी आई तो हवा स्वच्छ हो गई। धरती की ओजोन में बढ़ते छिद्र से वैज्ञानिक परेशान हो रहे थे। धरती गर्म होती जा रही थी। ऐसी स्थिति में सुधार हुआ है। उद्योगों का प्रदूषण और कचरा नदी,नाले में गिरना बंद हुआ तो 60 फीसदी पर्यावरण स्वच्छ हो गया। शहरों के नदी,तालाबों के घाट अब नहाने लायक हो गए हैं। रायपुर के सिलतरा में 350 फैक्ट्री है और उरला में डेढ़ सौ फैक्ट्रियां है। भिलाई स्टील प्लांट अलग से। जाहिर सी बात है कि, प्रकृति की हरियाली का हरापन लौटा और प्रदूषण घटा तो आसमान साफ हो गए। दिल्ली में आसमान में चांद सितारे दिखने लगे।  
थैक्यू कोरोना
मिस्टर कोरोना तुम्हें थैंक्यू करने का मन कर रहा है। तुम्हारी वजह से पूरी दुनिया लाॅक डाउन होने से गुस्सा है लेकिन, करीब 50 से 75 हजार लोग प्रीमैच्योर मौत से बच गए। साफ सुथरी हवा मिलने से 5 साल से कम उम्र के करीब 4000 बच्चे और 70 साल से नीचे के 51000 से 73000 वयस्कों की जिंदगी प्रदूषण की मुसीबत से बच गई। कई जगह गंगा का पानी निर्मल हो गया। जबकि गंगा को निर्मल करने के लिए चार हजार करोड़ रूपये से अधिक खर्च हो चुके हैं। लेकिन राम की गंगा मैली की मैली रही। लॉकडाउन से नदी में औद्योगिक कचरे की डंपिंग में कमी आई है। गंगा का पानी ज्यादातर मॉनिटरिंग सेंटरों में नहाने के लिए उपयुक्त पाया गया है। 
दुर्ग जिले के पाटन क्षेत्र के बेलौदी, पहंदा, ठकुराइन टोला, रुही, मटंग एवं अन्य गांवों में माइग्रेटरी बर्ड्स, रोजी स्टर्लिंग, ब्लैक हेडेड, इबिस सैंड पाइपर, स्पून बिल स्टार्क, पेंटेड बिल स्टार्क, विस्लिंग डक, ग्रे हेरान, पर्पल हेरॉन आदि देखे गए हैं। जो यूरोप, चाइना, रूस, मंगोलिया, लद्दाख, तिब्बत और साइबेरिया जैसे देशों से हजारों किमी का सफर कर आए हैं। पाटन क्षेत्र का उत्तर पूर्वी इलाका खारुन नदी से घिरा हुआ है। गांवों के तालाबों में घोंघा और मछली खाने वाले पेंटेड बिल स्टार्क, स्पून बिल स्टार्क,ग्रे हेरान, पर्पल हेरान आदि को बेलौदी बांध, सेमरी बांध, मटंग बांध, बोरवाय बांध में इन पंक्षियों की जमघट लोगों को लुभा रही है। ओपन बिल स्टार्क लंबी और आकर्षक चोंच वाले ये पक्षी राजिम के पास लचकेरा, पथरियाय,मुंगेली के पास पड़ियाइन सहित कोरबा, रतनपुर, सैदा, पाली, हसदेव के किनारेे कनकी, कवर्धा, अकलतरा, नरियरा में बहुतायत से पाए जाते हैं। सिरपुर तालाब में माइग्रेटी बर्ड्स देखे जा सकते हैं। प्रशासन और गैरसरकारी संगठनों के साथ नागरिकों को भी अब यह बात समझ में आ गई कि प्रदूषण खत्म किया जाना जरूरी है ताकि, पंक्षियों के साथ आदमी का रिश्ता बन सके।  
ओडिशा तट पहुंचे 8 लाख कछुए         
ओड़िसा में समुंदर के किनारे धूप के गलीचे पर बैठ कर अंगडाई लेते ओलिव रिडले कछुओं का समूह गोवा के किनारे धूप लेती गोरियों की याद दिला रहे हैं। दरअसल इस बार ओड़िसा में प्रदूषण का स्तर कम होने से समुद्री जीवन में भी बदलाव देखा जा रहा है। प्रदूषण के अलावा नाव,बोट, से अपनी जान गवाने या फिर घायल होने वाले ये कछुए इस बार भारी संख्या में पहुंच रहे हैं। 24 मार्च से पर्यटकों की आवाजाही नहीं होने से बेफिक्र होकर कछुए गहिरमाथा और रूसीकुल्य में छह करोड़ से ज्यादा अंडे दिए हैं।