Saturday, May 15, 2021

नहीं भाई भाजपा

            
 उत्तर प्रदेश के त्रिस्तरीय पंचायती चुनाव में 54 मंत्री,विधायक और सांसदों के बावजूद बीजेपी को झटका मिलना क्या इस बात का संकेत है, कि योगी आदित्यनाथ का जलवा फीका पड़ गया है? योगी आदित्यनाथ के गृह जनपद गोरखपुर के लोगों को भाजपा नहीं भाई। क्या यू.पी.में सियासी फिजायें करवट बदलने को बेताब हैं? और भैया लोग राज्य में नई सियासी धुन सुनने की चाह रखते हैं! बंगाल चुनाव की तरह क्या य.ूपी. में भी राष्ट्रीय दलों का आधार सिकुड़ जाएगा और क्षेत्रीय पार्टियाँ लम्बी रेस का घोड़ा साबित होंगी?


 0 रमेश कुमार ‘रिपु’’
पंचायत चुनाव के परिणाम ने औकात बता दी। मंत्रियों की और राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टियों की। प्रदेश में गाँव की चैपाल से लेकर हर शहर के चैराहे पर अगली विधान सभा की चर्चा गर्म है। राज्य में अगले साल विधान सभा चुनाव है। पंचायत चुनाव में मर्यादाएं तार-तार हुई। मगर जवाबदेही जीरो। मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ को अपने 23 कैबिनेट मंत्री 22 राज्यमंत्री और 9 स्वतंत्र प्रभार वाले मंत्रियों पर भरेासा था, कि पंचायत चुनाव में भी गेरूआई राजनीति की पताका लहरायेगी। सांसद से लेकर विधायको को हर मोर्चे पर लगाया गया था। दस का दम। बेचारे साबित हुए बेदम। यानी योगी सरकार की इतनी बड़ी मंत्रियों की फौज और बूथ लेवल पर मजबूत संगठन होने के बाद भी मंसूबों पर पानी फिर गया।
समाजवादी पार्टी,बसपा और कांग्रेस ने भी पंचायत की फ्री स्टाइल सियासी अखाड़े में उतरने के लिए काफी तैयारी की थी। इसलिए कि पंचायती चुनाव को राज्य में 2022 मे होने वाले विधान सभा चुनाव का सेमी फाइनल माना जा रहा था। वहीं सत्ता पक्ष का मानना है, कि मछली-मछली कितना पानी,अभी तय होना बाकी है। दूसरी ओर विपक्ष का दावा है,मछली कहीं पानी के बाहर सूखे में न आ जाए।’’
वैसे पंचायत चुनाव में कोई भी पार्टी अपने उम्मीदवारों की घोंषणा नहीं करती,लेकिन बीजेपी ने अपने उम्मीदवारों की सूची जारी की थी। चुनाव परिणाम से पता चला, कि बीजेपी को शिकस्त मिली है। सपा गदगद है। प्रदेश के 75 जिले में 3050 सीट में हुए चुनाव में सपा को 759 सीटें और बीजेपी को 768 सीटें मिली। बसपा 319,कांग्रेस 125 रालोद 69 आम आदमी पार्टी 64 और 944 सीटें निर्दलीय के खाते में गई। दो सीटों के नतीजे घोषित नहीं हुए। निर्दलीय के दम पर सूबे में कई जगह जिला पंचायत अध्यक्ष बनेंगे। हो सकता है, इस जोड़ तोड़ में बीजेपी आगे निकल जाए।

बदलाव की आहट
बहरहाल,यही माना जाता है,कि राज्य में जिसकी सरकार होती है,पंचायत चुनाव के परिणाम भी उसी के पक्ष में जाते हैं। बदलाव की यह आहट बीजेपी के लिए खतरे की घंटी माना जा रहा है। नेता प्रतिपक्ष राम गोंविद सिंह चैधरी कहते हैं,‘‘यू.पी में सियासी फिजायें करवट बदलने को बेताब हैं? और भैया लोग राज्य में नई सियासी धुन सुनने की चाह रखतेे हैं।’’पंचायती राज की सियासत सूबे की राजनीति में बड़ा दखल रखती है। एक ओर मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ को बड़ी उम्मीद थी, कि राम मंदिर का निर्माण बीजेपी की राजनीति के लिए संजीवनी साबित होगी। लेकिन हैरानी वाली बात है, कि बीजेपी अयोध्या, मथुरा,काशी में मात खा गई। मथुरा से आने वाले दो मंत्री श्रीकांत शर्मा और लक्ष्मी नारायण चैधरी क्षेत्र में भाजपा को जीत नहीं दिला सके। जिला पंचायत की 33 सीटों में बसपा को 13 भाजपा 8 आरएलडी. 8 अन्य 3 और सपा को एक सीट मिली। जबकि बीजेपी मथुरा में कृष्ण जन्म भूमि को गरमा कर भी कुछ नहीं पाई। अयोध्या में उसे करारा झटका लगा। यहाँ 40 सीटों में सपा को 18,बीजेपी को 08,बसपा 04 निर्दलीय एंव अन्य को 10 सीटें मिली। वाराणसी में बीजेपी के खाते में 40 में से केवल 8 सीटें आ सकी, जबकि सपा 14,बीएसपी को 5 सीट मिली। अयोध्या में राम मंदिर के दम पर 2022 का विधान सभा चुनाव जीतने का सपना संजोए हुए है। लेकिन परिणाम मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गोरखपुर में भी बीजेपी के खिलाफ रहा। बीजेपी के जिला अध्यक्ष दिवाकर सिंह ने कहा,‘‘परिणाम निराशाजनक हैं। अयोध्या जिले की हर विधानसभा सीट पर बीजेपी विधायक होने के बावजूद हम 40 जिला पंचायत सीटों में से सिर्फ 8 जीतने में सफल हुए हैं। वहीं बीजेपी का दावा है कि जितने भी निर्दलीय चुनाव जीते हैं,वो उसकी पार्टी के हैं।
योगी को तगड़ा झटका
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गृह जनपद गोरखपुर को बीजेपी का गढ़ माना जाता है।   जिला पंचायत सदस्य पद के लिए 68 सीटों पर हुए चुनाव में बीजेपी का दावा था, कि 20 से कम सीटें नहीं मिलेगी। समाजवादी पार्टी ने 20 सीटें झटक ली है। 21 सीटों पर  निर्दलीय प्रत्याशियों ने कब्जा कर लिया। इसके अलावा बसपा ने 2 कांग्रेस आम आदमी पार्टी और निषाद पार्टी के हिस्से एक-एक सीटें आईं है। पूर्वांचल में भी बीजेपी का दबदबा रहा। लेकिन यहाँ भी बीजेपी को करारी शिकस्त मिली। लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ दुबे कहते हैं,‘‘मतदाताओं में योगी सरकार को लेकर भारी रोष कोरोना महामारी में ऑक्सीजन, बेड और अस्पताल की अव्यवस्था से होने वाली मौत को लेकर था। सरकारी अमला सिर्फ आंकड़ों की बाजीगिरी करता आया है।’’
मायावती उत्साहित
बसपा मुखिया मायावती चुनाव परिणाम से उत्साहित हैं। उन्होंने कहा यह परिणाम आगामी विधानसभा चुनावों के लिए लोगों में नई ऊर्जा, जोश भरने और हौसले बुलंद करने वाला है। हमारी पार्टी के प्रत्याशियों के साथ ही कार्यकर्ता तथा नेता इस परिणाम को पाकर बेहद उत्साहित हैं। हम प्रदेश की जनता का तहे दिल से आभार प्रकट करते हैं। आगरा, मथुरा, मेरठ, बुलंदाशहर, गाजियाबाद, सहारनपुर, आजमगढ़ सहित करीब 25 जिलों से बहुजन समाज पार्टी की परिणाम काफी अच्छा आया है।
योगी सरकार से नाराज
कोरोना और किसान आंदोलन के साइड इफ्ेक्ट इस चुनाव में साफ-साफ दिखे। वहीं कई जगह सपा और बीजेपी की सीटों में कोई खास अंतर नहीं है। लेकिन योगी और पी.एम. मोदी के गढ़ में बीजेपी को वोट करने की बजाय, लोगों ने सपा को पसंद किया। वाराणसी में जिला पंचायत की 40 सीटों में से बीजेपी को आठ सीटों से ही संतोष करना पड़ा। वहीं 17 सीटों पर सपा, कांग्रेस के 5 प्रत्याशी जीते हैं,3 बसपा, 6 निर्दलीय और एक आम सीट आम आदमी पार्टी को मिला। इस चुनाव परिणाम से विपक्ष यह प्रचारित कर रही है कि मतदाताओं का विश्वास बीजेपी से उठ गया है। विपक्ष की बातों से क्या यह मान लिया जाये, कि विधान सभा चुनाव में राष्ट्रीय दलों का आधार सिकुड़ जाएगा और क्षेत्रीय पार्टियाँ लम्बी रेस का घोड़ा साबित होंगी? चूंकि विधान सभा चुनाव आठ माह बाद होेने हैं,यदि समय रहते बीजेपी ने अपनी रणनीति में जन हित के लिए कोई बड़ा बदलाव कर लेती है तभी विपक्ष को चित होगा। जानकारों का कहना है, कि कोरोना इतनी जल्दी जायेगा नहीं और किसानों की नाराजगी भी दूर नहीं होगी। बीजेपी के लिए यही दो कारक कंटक साबित हो सकते हैं।
बीजेपी धमका रहीःयादव
सपा प्रमख अखिलेश यादव ने कहा, बीजेपी यूपी पंचायत चुनाव में जीते लोगों को धमका रही हैं। साल 2022 के विधानसभा चुनावों में उसे भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। बीजेपी ने कभी लोकतंत्र का सम्मान नहीं किया है। बीजेपी सरकार की कुरीतियाँं प्रदेशवासियों को भारी पड़ रहीं हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा,‘‘जीते हुए प्रत्याशियों को जनता का आशीर्वाद प्राप्त हुआ है। जीते हुए प्रत्याशी चुनौती पूर्ण समय में कोरोना महामारी से लड़ने में स्थानीय प्रशासन का सहयोग करें और मानवता की सेवा करने में आगे आएं।’’ वहीं कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू ने कहा, पंचायत चुनाव में पार्टी ने संतोष जनक प्रदर्शन किया है। उनकी पार्टी के 270 जिला पंचायत सदस्य और समर्थित जीते हैं 571 जिला पंचायत सदस्य दूसरे नंबर पर रहे 711 कांग्रेस के प्रत्याशी समर्थक तीसरे पायदान पर रहे हैं।
किसान आंदोलन का असर
पश्चिम यू.पी. यानी पूर्वांचल में किसान आंदोलन और कोरोना की दूसरी लहर ने बीजेपी का खेल बिगाड़ने का काम किया है। मेरठ से लेकर शामली,बिजनौर, मुजफ्फरनगर, मुरादाबाद, गाजियाबाद, बुलंदशहर, बागपत, हापुड़, हाथरस, अलीगढ़, मथुरा में पार्टी को करारी मात मिली। पश्चिम यू.पी में किसान आंदोलन आर.एल.डी. के लिए संजीवनी साबित हुआ है। राष्ट्रीय लोकदल ने 35 सीटें मिलने का दावा किया है। सपा के साथ उसके गठबंधन होने के चलते सपा को 76 सीटें मिली हैं।
बहरहाल पंचायत चुनाव के नतीजों ने बीजेपी को मंथन करने के लिए मजबूर कर दिया हैं। क्यों कि सूबे में आठ महीने के बाद विधानसभा चुनाव होने हैं।

  हार के स्वाद ने सोचने को मजबूर किया
पंचायत चुनाव में बीजेपी को मिली करारी हार ने सियासत के सूरमाओं को सोचने के लिए विवश कर दिया है। खासकर अपने अपने गढ़ में गेरूआई राजनीति की लाज बचाने में नाकाम रहने वाले बीजेपी के मंत्री,विधायक और सांसदों को। जवाबदेही के बहीखाते में केन्द्रीय नेतृत्व क्या लिखेगा,यह तो वक्त बतायेगा। हैरानी वाली बात है, कि मध्य यूपी, पूर्वाचल,ब्रज क्षेत्र,बुंदेलखंड ,पश्चिमी यू.पी,रूहेल क्षेत्र और सेन्ट्रल यूपी में में बीजेपी को बढ़त नहीं मिली।
मिस इंडिया रनर अप दीक्षा हारीं
फेमिना मिस इंडिया 2015 की रनर अप दीक्षा सिंह जौनपुर जिले के बसखा से पंचायत लगभग पाँच हजार वोटों से हार गई। अपने राजनीतिक कॅरियर की शुरूआत करने से पहले ही उन्हें हार का सामना करना पड़ा। बीजेपी समर्थित उम्मीदवार नगीना सिंह ने लगभग 5000 मतों के अंतर से जीत दर्ज की दीक्षा सिंह पंचायत चुनाव में 5 वें स्थान पर रहीं। उन्हें विकास के नाम पर केवल 2000 वोट मिले।
0 मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गृह जनपद गोरखपुर के रहने वाले उनके करीबी गोरख सिंह जिला पंचायत सदस्य का चुनाव नहीं जीत सके। वहीं समाजवादी पार्टी अपना दुर्ग बचाने में कामयाब रही।
0 डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य और प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह तक कानपुर देहात नहीं जीता पाए। यहां पर भी सपा व निर्दलीयों ने बाजी मारी और भाजपा को केवल 4 सीटें मिलीं। निर्दलीय और सपा 11-11 पर रहीं। बसपा 6 सीटें जीत सकी। इसी तरह केशव प्रसाद मौर्य कौशांबी और प्रयागराज में भी भाजपा को नहीं जीता पाए यहां पर निर्दलीय और समाजवादी पार्टी ने जीत दर्ज की।
0 समाजवादी पार्टी सपा के वरिष्ठ नेता और राज्य विधानसभा में विपक्ष के नेता राम गोविंद चैधरी के बेटे सहित अनेक सूरमाओं के रिश्तेदारों को पराजकय का सामना करना पड़ा है। सपा के वरिष्ठ नेता राम गोविंद चैधरी के बेटे रंजीत चैधरी जिला पंचायत के वार्ड संख्या 16 से पराजित हो गए हैं। वह तीसरे स्थान पर रहे।
0 कानपुर में दो मंत्री सतीश महाना और नीलिमा कटियार जिला पंचायत सदस्यों को जिताने में कामयाब नहीं हो पाईं। यहाँं भी सपा आगे रही। सपा ने 285 सीटें और भाजपा ने 155 सीटें जीतने का दावा किया है।
0 कैबिनेट मंत्री अनिल राजभर और दारा सिंह चैहान के क्षेत्र मऊ में सपा-बसपा और भाजपा पर निर्दलीय भारी पड़े। मायावती की पार्टी को 7 सीटें मिली हैं तो सपा और भाजपा को दो-दो सीटें मिलीं। 34 सीट में 21 सीट निर्दलीय जीते हैं। मंत्री का दावा है, कि यह सभी सदस्य भाजपा के समर्थन में जिला पंचायत अध्यक्ष बनवाएंगे।
0 कैबिनेट के मंत्री रमापति शास्त्री के भतीजे भी जिला पंचायत के चुनाव हार गए हैं। बृजेश पाठक लखनऊ शहर के मध्य से विधायक हैं। उनको उन्नाव में जिला पंचायत के लिए लगाया गया थाए जहां पर निर्दलीय और सपा अपने ज्यादा सदस्य जीता पाए हैं।
0 प्रतापगढ़ जिले से उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री राजेंद्र प्रताप सिंह मोती सिंह अपनी पत्नी को चुनाव नहीं जीत पाए। मंत्री की पत्नी का टिकट पार्टी ने काट दिया था। उसके बावजूद उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़वाया था। इसके अलावा जल शक्ति मंत्री महेंद्र सिंह जिला पंचायत में कुछ खास प्रदर्शन हीं कर पाए। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कोटे से गन्ना मंत्री बने सुरेश राणा भूपेंद्र चैधरी समेत आधा दर्जन मंत्रियों की मेहनत पर किसान आंदोलन ने पानी फेर दिया।
0 भाजपा के बिल्थरारोड क्षेत्र के विधायक धनन्जय कन्नौजिया की मांँ सर्यकुमारी देवी नगरा क्षेत्र पंचायत के वार्ड संख्या 19 से चुनाव हार गई हैं।
0 भाजपा के पूर्व सांसद हरिनारायण राजभर के बेटे अटल राजभर जिला पंचायत के वार्ड संख्या 24 से सपा नेता व पूर्व मंत्री शारदा नन्द अंचल के पौत्र विनय प्रकाश अंचल जिला पंचायत के वार्ड संख्या 27 से तथा भाजपा के गोरक्षनाथ प्रांत के क्षेत्रीय उपाध्यक्ष देवेंद्र यादव जिला पंचायत के वार्ड संख्या 10 से चुनाव हार गए हैं।
0 भाजपा नेता व पूर्व सांसद बब्बन राजभर के भाई लल्लन राजभर सीयर क्षेत्र पंचायत के गजियापुर ग्राम पंचायत से प्रधान पद का तथा भाजपा सांसद नीरज शेखर के निकट सम्बन्धी आलोक सिंह सीयर क्षेत्र पंचायत के मझौवा से क्षेत्र पंचायत सदस्य का चुनाव हार गए हैं।   
बीएसपी ने गाड़ी फूंकी
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के जिले गोरखपुर में ब्रह्मपुर ब्लॉक  के वार्ड नंबर 60 से बहुजन समाज पार्टी समर्थित उम्मीदवार रविप्रताप निषाद और वार्ड 61 से कोदई निषाद का आरोप है, कि चुनाव में उनकी जीत हुई थी। लेकिन जीत का प्रमाण पत्र हम लोगों को न देकर हारे हुए गोपाल यादव और रमेश को देने से इन दोनों प्रत्याशियों के समर्थकों ने हंगामा शुरू कर दिया। भीड़ ने चैरीचैरा क्षेत्र की नई बाजार पुलिस चैकी फूंक डाली। सुरक्षा में तैनात पीएसी की गाड़ी और सड़क पर खड़ी बाइकों में आग लगा दी। पुलिस और वहांँ से गुजर रही गाड़ियों पर पथराव भी किया।
हथगोले फेके
बाराबंकी जिले में थाना जहांगीराबाद इलाके के बेरिया में चुनावी हार जीत के बाद दो पक्षों में झगड़ा के दौराान लाठी डंडे चले। उसके बाद एक दूसरे के घरों पर हथगोले फेंके जाने लगे। झगड़े का कारण वर्चस्व की लड़ाई बताया जा रहा है। हालांकि पुलिस ने बलपूर्वक मामला शांत करा दिया है। किसी के खिलाफ एफआईआर दर्ज नहीं की गई है। झगड़े में घायल हुए वसीम ने बताया, कि चुनावी तकरार में हो रही लड़ाई को शांत कराने गए थे। लेकिन दूसरे पक्ष ने हमला बोल दिया। गम्भीर रूप से घायल वसीम को इलाज के लिए जिला अस्पताल भेजा गया है।
शादी की रात जीती
रामपुर की रहने वाली पूनम शर्मा 30 मई की रात सात जन्मों के बंधन में बंधने जा रही थी। वह वरमाला के लिए स्टेज पर जाने वाली थी। अचानक इसी बीच उसे पता चला कि वह पंचायत सदस्य का चुनाव 31 वोटों से जीत गई। उसे 601 वोट मिले थे। पूनम ने पंचायत चुनाव में वार्ड नंबर 135 से क्षेत्र पंचायत सदस्य का चुनाव लड़ा था। घर वाले शादी में मशगूल थे। पूनम बार.बार एजेंट के जरिए मतगणना अपडेट ले रही थी। रात करीब 10 बजे पूनम को पता चला कि वह चुनाव जीत गई है। वह वरमाला का कार्यक्रम छोड़कर हाथों में मेंहदी सजाए, लाल जोड़े में मतगणना स्थल पर पहुंच गई। जीत का प्रमाण पत्र हासिल किया। पूनम दोगुनी खुशियों संग अपने घर लौटी और जीवन साथी संग सात फेरे लिए।   
                                       रमेश तिवारी ‘रिपु’
                                    मो. 7974304532   
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Saturday, May 8, 2021

मौत की लहर और बेपरवाह सरकार











सरकार की लापरवाही में मौत की दूसरी लहर ने साढ़े सात हजार लोगों की जानें ले ली। बेपरवाह सरकार ने राजधानी रायपुर कोरोना की राजधानी बना दिया। बेबस जनता अस्पतालों में आॅक्सीजन,बेड और जीवन रक्षक दवाई के लिए परेशान है। शवों को कचरा गाड़ी में ले जाया गया। अंतिम समय भी सम्मान नहीं दे सकी सरकार।   
0 रमेश तिवारी’रिपु’
            छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल नवा छत्तीसगढ़ गढ़ने का दावा करते थे। प्रदेश में सरकार की लापरवाही की वजह से साढ़े सात हजार मौत के बाद जनता पूछ रही है,‘‘ क्या यही नवा छत्तीसगढ़ है? राजधानी रायपुर कोरोना की राजधानी बन गई है। प्रदेश में पहली मौत 29 मई 2020 को हुई थी। इस समय राजधानी रायपुर में रोज 66 और प्रदेश में औसत मौत 175 है। सवाल यह है कि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को जब पता था कि कोविड की दूसरी लहर पहली लहर से भयावह होगी, बावजूद इसके उन्होंने राजधानी रायपर में आईपीएल का मैच क्यों कराया और जी खोल कर फ्री कूपन क्यों बांटे। इसके बाद राष्ट्रीय स्तर पर अपनी राजनीतिक छवि बनाने के लिए असम में चुनाव प्रचार करने पहुंँच गए। इधर प्रदेश में कोरोना का ओलंपिक शुरू हो गया फिर भी मुख्यमंत्री ने कमान नहीं संभाली। देखते ही देखते छत्तीसगढ़ देश में कोरोना के मामले में पांँचवा राज्य बन गया। कोविड की दूसरी लहर मौत की सूनामी बन गई।      
व्यापारी राजकुमार ग्वालानी कहते हैं,‘‘हिन्दुस्तान के अंतिम मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर रंगून में एक शेर लिखे थे,‘‘ कितना बदनसीब है जफर दफ्न के लिए,दो गज जमीन भी नहीं मिली कू ए यार में’’। बहादुर शाह जफ़र भी नहीं जानते थे कि आगे चलकर यह शेर बहुतों की जिन्दगी की बानगी हो जायेगा। बेदिल दिल्ली से लेकर छत्तीसगढ़ तक के अस्पतालों में मरने के लिए लोगों को एक बेड भी नसीब नहीं होगा।’’  
कोविड की आपदा पर प्रदेश सरकार की खामियों पर भाजपा प्रदेश अध्यक्ष विष्णु देव साय ने कहा,‘‘पहली लहर में केंद्र से लॉकडाउन का अधिकार मांगने वाले भूपेश अपनी जिम्मेदारियों से बचते हुए कोरोना रोकथाम की जिम्मेदारी कलेक्टर पर डाल दिए हैं। आज पूरा प्रदेश कोरोना से त्रस्त है और भूपेश अपनी राजनीति में मस्त है।’’
विपक्ष ने मांगा हिसाब
छत्तीसगढ़ में भाजपा नेताओं और कार्यकर्ताओं ने 24 अप्रैल को अपने घरों के बाहर कोरोना से होने वाली मौत, अस्पतालों की अव्यवस्था, दवाईयों की कालाबाजारी के साथ सरकार से डीएमएफ डिस्ट्रिक्ट माईनिंग फंड के दो हजार करोड़ और शराब के सेस के चार सौ करोड़ रूपये का हिसाब मांगा। पूर्व मुख्यमंत्री डाॅ रमन सिंह ने कहा,‘ सरकार दावा कर रही है कि 850 करोड़ रूपये कोरोना इलाज के लिए बजट निर्धारित किया गया है। सरकार बताए कि खर्च कहाँ-कहाँ किया गया है।’’ वहीं कांग्रेस और अन्य पार्टियों के लोग पिछले एक डेढ़ साल से प्रधानमंत्री केयर्स फंड का हिसाब मांँग रहे हैं। सवाल यह है कि दोनों पार्टियों के नेता मिलकर छत्तीसगढ़ के हितों के लिए यहाँ की स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए क्यों नहीं हिसाब माँगते। ऐसा क्यों नहीं सोचते बस्तर में कोई बड़ी नक्सली वारदात होती है, तो घायल जवानों को हवाई जहाज या हेलीकॉप्टर से रायपुर के प्रायवेट और सरकारी मेडिकल कालेज क्यों लाना पड़ता है? जबकि बस्तर में विकास के नाम पर  करोड़ों रूपये व्यय होते हैं। अरबों की खनिज वन संपदा यहाँ से बाहर जाती है। रायपुर राजधानी का मुँह क्यों देखना पड़ता है?
बहरहाल अब पीएम केयर के माध्यम से प्रदेश के चार जिलों आॅक्सीजन प्लांट लगेगा। वहीं राज्य के सभी जिलों में कुल 1322 आइसोलेशन बेड की व्यवस्था की गई है और आवश्यकतानुसार मरीजों को भर्ती कर उपचार किया जा रहा है। रायपुर में 158 आइसोलेशन बेड है, जबकि सबसे अधिक मरने वालों की संख्या यहाँ है।
टीकाकरण के दावे में झोल
सरकार दावा करती है कि रायपुर में रोज 40 हजार टीकाकरण की क्षमता है,लेकिन वैक्सीनेशन की रफ्तार बाकी जिलों की तुलना में धीमी है। यहांँ पांँच हजार टीके भी रोज नहीं लग रहे हैं। दो सौ केन्द्र की जगह मात्र 99 केन्द्रों में टीकाकरण हो रहा है। इस पर स्वास्थ्य मंत्री टी.एस सिंहदेव ने कहा कि वैक्सीन उत्पादक कंपनियां समय से वैक्सीन उपलब्ध कराने को तैयार नहीं हैं। अगर समय से वैक्सीन नहीं मिली तो हमारे पास टीकाकरण अभियान चलाने का कोई तरीका नहीं है। स्वास्थ्यमंत्री का दावा है अभी हमारे पास टीकाकरण के 3 हजार केंद्र हैं। यहांँ 7 हजार वैक्सीनेटर तैनात हैं। इन केंद्रों की संख्या बढ़ाई भी जा सकती है लेकिन वैक्सीन ही नहीं मिलेगी तो वैक्सीनेशन कैसे होगा? केंद्र सरकार से मूल्य और आपूर्ति की सुगमता आदि पर बातचीत कर रहे हैं। जल्द ही सीरम इंस्टीट्यूट की कोवीशील्ड वैक्सीन के 50 लाख डोज का पहला ऑर्डर भेजा जा सकता है।  
साँसों के सौदागर  
कोविड को सरकार नियंत्रित नहीं कर पाई वहीं दूसरी ओर साँसों के सौदागर लोगों की मदद करने की बजाए रेमडेसिविर इंजेक्शन मनमानी कीमत पर बेचते पकड़े गए। पकड़े गए युवकों का राजनीतिक कनेक्शन ने कई सवाल खड़े कर दिये हंै।साइबर सेल के प्रभारी रमाकांत साहू ने बताया कि ये लोग 15 से 30 हजार रुपए में इंजेक्शन बेच रहे थे। इनके पास से 9 इंजेक्शन और 1 लाख 58 हजार रुपए मिले हैं।
जनता को लूट रहें    
देश के दूसरे कोरोना वैक्सीन उत्पादक भारत बायोटेक ने भी राज्य सरकारों और खुले बाजार के लिए वैक्सीन के दाम तय कर दिये हैं। इसके मुताबिक यह राज्य सरकारों को 600 रुपए और निजी अस्पतालों को 1200 रुपए प्रति डोज की दर से बेची जाएगी। अब इस दाम को लेकर बवाल मच गया है। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने केंद्र सरकार पर जनता को लूटने का आरोप लगा दिया है। सीरम इंस्टीट्यूट ने अपनी वैक्सीन कोवीशील्ड का दाम राज्यों के लिए 400 रुपए और खुले बाजार के लिए 600 रुपया प्रति डोज तय किया है। यह कंपनी केंद्र सरकार को 150 रुपए प्रति डोज में वैक्सीन उपलब्ध करा रही है। इसको लेकर राज्यों में भारी असंतोष दिख रहा है।
कचरा गाड़ी में शव
कांग्रेस सरकार के कारण राज्य में उत्पन्न कोरोना संबंधित अव्यवस्थाओं के विरोध में भाजपा का हर नेता अपने -अपने निवास में एक दिवसीय धरना दिया। पूर्व मंत्री एंव विधायक बृजमोहन अग्रवाल ने कहा कि कांग्रेस की अव्यवस्था का आलम यह है कि छत्तीसगढ़ में अस्पतालों में जगह नहीं है। वेंटिलेटर की व्यवस्था नहीं है। ऑक्सीजन सरकार उपलब्ध नहीं करा रही है और सरकार मृतकों का भी सम्मान न कर कचरा  गाड़ी में ढोकर उनका अंतिम संस्कार कर रही है। ऐसी सोई सरकार को जागृत करने के लिए आज भाजपा प्रदेश भर में धरने पर बैठी है। गौरतलब है कि राजनांद गांव के डोंगरगांव ब्लॉक में दो सगी बहनों सहित 4 लोगों की कोरोना से मौत हुई। जिसके बाद इनके शवों को एम्बुलेंस तक प्रशासन ने मुहैया नहीं कराया बल्कि नगर पंचायत के कचरा फेंकने वाले वाहन से शवों को ले जाया गया।
मदद के लिए बढ़ाया हाथ
आॅक्सीजन की कमी का सामना एक तरफ छत्तीसगढ़ सरकार कर रही है,वहीं 11 अप्रैल से 24 अप्रैल तक छत्तीसगढ़ से 270695 मेट्रिक टन आक्सीजन की अन्य राज्यों को आपूर्ति कर जरूरतमंद राज्यों को सहायता पहुंचाई गई है। 11 अप्रैल से 24 अप्रैल तक छत्तीसगढ़ से कर्नाटक को 1682 मेट्रिक टन, आंध्रप्रदेश को 17669 मेट्रिक टन, मध्यप्रदेश को 80122 मेट्रिक टन, गुजरात को 12042 मेट्रिक टन तेलंगाना को 578 मेट्रिक टन और महाराष्ट्र को 10138 मेट्रिक टन मेडिकल आक्सीजन की आपूर्ति की गई है। वहीं सरकार की तमाम दलीलों के बाद हाई कोर्ट ने कहा कि, ऑक्सीजन उपलब्ध कराना राज्य की जिम्मेदारी है। वह सुनिश्चित करे कि इसकी कमी से किसी मरीज की मौत न हो। चीफ जस्टिस पीआर रामचंद्र मेनन और जस्टिस पीपी साहू की बेंच ने कहा कि उद्योगपतियों से सरकार सामंजस्य बनाएए जिससे ऑक्सीजन और इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने में मदद मिले।
आपदा में भेदभाव का आरोप
काग्रेस प्रवक्ता एवं संसदीय सचिव विकास उपाध्याय कहते हैं,‘‘विधायकों को एक माह का वेतन देने की बात आती है, तो कांग्रेस के विधायक मुख्यमंत्री सहायता कोष में राशि देते हैं और भाजपा के विधायक जिला राहत कोष के अलावा अपने लोगों से पीएम केयर्स फंड में राशि दिलवाते हैं। जाहिर है कि बीजेपी वाले आपदा में सहायता राशि देने में भी भेदभाव रखते हैं।  
सीनियर ऑर्थोपीडिक सर्जन डॉ एस फुलझेले और डॉ आरके पंडा के अनुसार कोविड-19 संक्रमण की दूसरी लहर एक भीषण ज्वार की तरह उभरी है। पहल लहर की तुलना में करीब पांँच गुना तेज है। हर्ड इम्यूनिटि हासिल करने के लिए 75 फीसदी आबादी का टीकाकरण करना होगा। देरी से जांँच व इलाज में देरी भारी पड़ रही है। लक्षण दिखते ही जांच करवाने व समय पर इलाज कराने से आधी से ज्यादा मौतें रोकी जा सकती हैं। मॉस्क पहनकर 99 फीसदी संक्रमण को रोका जा सकता है।
बहरहाल कोविड के प्रति सरकार खबरदार नहीं थी। वहीं जनता के साथ सरकार की लापरवाही ने कोरोना को बढ़ने का मौका दिया। टीकाकरण को राज्य सरकार ने गंभीरता से नहीं लिया।
 

 

 

Sunday, April 18, 2021

वामपंथ और दक्षिणपंथ में भेद नहीं

                   
    
मध्यप्रदेश के विधान सभा अध्यक्ष गिरीश गौतम कहते हैं विंध्य प्रदेश बनाना या फिर मऊँगंज को जिला बनाना हमारा विषय नहीं है। यह सरकार का विषय है। यदि जनता चाहती है तो हम उसका विरोध भी नहीं करेंगे। मेरे डीएनए में कामरेड है। बावजूद इसके वाम से दक्षिणपंथ की ओर झुकाव से जन सेवा का धर्म नहीं बदल जाएगा। किसी के बनी रेखा को काटकर अपनी रेखा बनाने में विश्वास नहीं रखता और अपने आप को विंध्य का शेर की बजाय विंध्य का पुत्र कहलाना ज्यादा अच्छा मानता हँू। उनसे  बातचीत किये है  0 रमेश कुमार ’रिपु’





ने उसके प्रमुख अंश-
0 आपका कहना था कि, वाम से दक्षिण पंथी इसलिए हुआ कि श्रीनिवास तिवारी को हराना था। बड़ा मंच चाहिए था। क्या अब वाम आपके लिए कोई मायने रखता है?
00 वो बात पुरानी हो गई। राजनीतिक व्यक्ति को मंच अपने लिए नहीं चाहिए। जन कल्याण के काम के लिए स्वाभाविक तौर पर मंच की जरूरत होती है। मैं समझता हूँ बीजेपी से बेहतर मंच और कोई नहीं है। वाम मोर्चा का जहांँ तक सवाल है,कामरेड मेरे डीएनए में है। इसलिए उसे अलग करके नहीं देखना चाहिए।
0 वाम से दक्षिण में विचलन आश्चर्यजनक नहीं है?
00 वाम से दक्षिण में विचलन जरा भी आश्चर्यजनक नहीं है। कोई भी सिद्धांत होगा अंतोगत्वा समाज के लिए ही काम करेगा। वाम पंथ हो या फिर दक्षिण पंथ,दोनों कभी नहीं कहते कि टाटा बिरला के लिए काम करो। देश बहुत बड़ा है। मैं समझता हूँ कि वामपंथी सामाजिक परिदृश्य को नहंी समझ पाए। उन्हांेने धर्म को धर्म की तरह देखा, उसके मर्म को नहंी समझा। उदाहरण बतौर,कुंभ का आयोजन धर्म है लेकिन, बगैर आमंत्रण के लोगों का वहांँ पहुंचना यह धर्म का मर्म है। वामदल मजदूर और गरीबों की बात करता है। दीनदयाल अंत्योदय की बात करते हैं। ऐसी स्थिति में फर्क कहांँ है। अंत्योदय में भी अंंितम छोर पर खड़े व्यक्ति के उत्थान और प्रगति की बात करते हैं। सबका साथ,सबका विकास की धारणा को लेकर चलना चाहिए।
0 कामरेड स्पीकर और नवाचारी स्पीकर दो नाम से आप को लोग जानने लगे हैं। दोनों में कौन सा संबोधन आपके दिल को छूता है।
00 मेरे में कामरेड है। कामरेड को कोई ब्रांड नहीं है। यह अंग्रेजी का शब्द है। जिसका मतलब साथी होता है। सबका साथ,सबका विकास की धारणा को लेकर आगे चलेंगे। सदन अच्छे से चले। मार्शल का इस्तेमाल न करना पड़े।  सदन की गरिमा बनी रहे। इसलिए कुछ नये नियम बनाए हैं। प्रथम बार निर्वाचित विधायकों को सवाल करने का पहले मौका दिया जाएगा। वरीयता और प्रशिक्षण के साथ सदन की गरिमा बनी रहे इसलिए भाषा के संस्कार पर विशेष ध्यान देने को कहा है। अति उत्साह में असंसदीय भाषा का इस्तेमाल से बचें। राजनीति की गरिमा सदन में बनी रहेगी तो बाहर भी उसका मूल्य है। सदन के अंदर झूठा,फेकू,बंटाधार,मामू आदि असंसदीय भाषा सुनने को अब नहंी मिलेगी।
0 आम लोगों की धारणा है कि, अब विंध्य प्रदेश बन जाएगा। कुछ नही ंतो मऊगंज जिला बन ही जाएगा। आप किसे प्राथमिकता देंगे?
00 विंध्य प्रदेश बनाना और मऊगंज को जिला बनाना दोनों हमारा विषय नहीं है। यह सरकार का काम  है। जनता चाहेगी तो विंध्य प्रदेश बन जाएगा और मऊगंज जिला भी बन जाएगा। जनता जो चाहती है, हम उसके खिलाफ नहीं जायेंगे।
0 विंध्य के लोगों की आम धारणा है कि माननीय गिरीश जी कुछ अलग हटकर हैं। तो क्या यह मान लिया जाए कि, श्रीनिवास तिवारी की रेखा को काटकर वो अपनी बड़ी रेखा बनाएंगे?
00 मैं उस सिद्धांत को मानता हूँ, किसी की रेखा को काटकर अपनी रेखा को बड़ी नहीं करना है। न ही किसी दूसरे की रेखा का फालो करूंगा। अपनी रेखा अपने कर्मों से खुद बनाऊंगा। मुझे पद मिला है, तो अपने दायित्वों को पूरा करने के लिए मिला है। मैं अपने लिए अपने को चुनौती मानता हूँ। वक्त और जनता पर यह फैसला छोड़ता हूँॅॅू कि वह खुद मूल्यांकन कर, तय करे कि किसकी रेखा बड़ी है।
0 विंध्य में एक परंपरा है जो बडे पद पर पहुँच जाता है उसे विंध्य का शेर कहते हैं। विंध्य का सूरज आदि ऐसे संबोधन से लाद दिया जाता है। आप को ऐसे संबांेधन से अब तक नवाजा गया या नहीं?
00 मैं अपने आप को विंध्य की धरती का बेटा मानता हॅू। विंध्य का शेर जैसे विंध्या का सूरज आदि संबोधन मुझ पर सूट नहीं करता। मैं विंध्य का शेर होना भी नहीं चाहता।
0 श्री निवास तिवारी ने विंध्य की जनता को संजय गांधी अस्पताल दिये। आप विंध्य को क्या देना चाहंेगे?
00 विंध्य में यह देखने का मिला है कि, यहांँ कैंसर के मरीज बहुत हैं। तंबाखू के सेवन की वजह से कैंसर के मरीजों का पता तब चलता है जब,चैथे या फिर अंतिम स्टेज पर मरीज पहँुंच जाता है। हमने सभी माननीय विधायकों से आग्रह  किया है कि, वे सरकार पर दबाव बनाएं और यहाँं एक रिसर्च सेंटर खोला जाए। ताकि यहां के लोगों को अपने इलाज के लिए बाहर न जाना पड़े।
0 देवतलाब विधान सभा क्षेत्र को क्या देना चाहेंगे?
00 हमारी इच्छा है कि पर्यटन के क्षेत्र में देवतलाब का नाम हो। साथ ही यह प्रयास रहेगा कि, देवतलाब नगर पंचायत के साथ तहसील बन जाए। ताकि जनता को इसका लाभ मिल सके।
0 श्रीनिवास तिवारी के समय सत्ता का एक ही केन्द्र था, जिसे अमहिया सरकार कहते थे। क्या यह मान लिया जाए कि, विंध्य के स्पीकर की परंपरा का निर्वाह होगा या फिर आप दूसरी पार्टी से हैं, तो कुछ और होगा?
00 मंै ऐसी परंपरा पर विश्वास नहीं करता। यदि सत्ता का केन्द्र एक जगह करना होता, तो सारे विधायकों को अपने पास बुलाता। किसी भी विधायक या फिर सांसद से मिलने उनके निवास नहीं जाता।
0 हर राजनीतिक व्यक्ति का एक मुकाम होता है। क्या आपको लगता है कि आप की सियासी यात्रा पूरी हो गई?
00 विधान सभा अध्यक्ष बन जाना ही मेरी राजनीति का मुकाम नहीं है। मंै इसे पड़ाव मानता हॅू। राजनीतिक व्यक्ति की यात्रा सतत चलती रहती है। तब तक, जब तक वो चल सकता है। मेरा मानना है कि हर राजनीतिक व्यक्ति को सदैव जिज्ञासु और विद्यार्थी की भूमिका में रहना चाहिए। ताकि उसे सीखने का मौका मिलता रहे। अपनी राजनीतक यात्रा में भटक न सके।

 

छत्तीसगढ़ में हुए बड़े नरसंहार




छत्तीसगढ़ में कई नरसंहार अब तक हो चुके हैं। पहला नरसंहार 8 अक्टूबर 1998 को हुआ था। माओवादियों ने तर्रेम इलाके से गुजर रही पुलिस जवानों से भरी लॉरी और ठीक पीछे चल रही जीप को लैंड माइंस से उड़ा दिया था। इस हादसे में अठारह जवान शहीद हुए थे।  
23 मार्च नरायणपुर
बस्तर के नारायणपुर में 23 मार्च को नक्सलियों के विस्फोट से, एक बस में बैठकर अपने कैंप की ओर से लौट रहे 25 जवानों में से 5 जवान शहीद हो गये। सुकमा. 21 मार्च 2020
सुकमा जिले के चिंतागुफा इलाके में डीआरजी और एसटीएफ जवान सर्चिंग पर थे। एलमागुंडा के आसपास नक्सलियों के मौजूद होने की सूचना मिली थी। कोरजागुड़ा पहाड़ी के पास छिपे नक्सलियों ने चारों ओर से जवानों पर गोलियों की बौछार कर दी। जिससे 17 जवान शहीद हो गए थे।  
श्यामगिरी. 9 अप्रैल 2019
दंतेवाड़ा में 2019 के लोकसभा चुनाव में मतदान से ठीक पहले नक्सलियों ने चुनाव प्रचार के लिए जा रहे भाजपा विधायक भीमा मंडावी की कार पर हमला किया था। इस हमले में बीजेपी विधायक भीमा मंडावी के अलावा उनके चार सुरक्षा कर्मी भी मारे गए थे।
दुर्गपाल. 24 अप्रैल 2017
सुकमा जिले के दुर्रपाल के पास नक्सलियों द्वारा घात लगाकर किए गए हमले में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के 25 जवान उस समय मारे गए थे। जब वे सड़क निर्माण में सुरक्षा के बीच खाना खा रहे थे।
दरभा. 25 मई 2013
बस्तर के दरभा घाटी में हुए माओवादी हमले में आदिवासी नेता महेंद्र कर्मा कांग्रेस पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष नंद कुमार पटेलए पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल समेत 30 लोग मारे गए थे।
धोड़ाई. 29 जून 2010
नारायणपुर जिले के धोड़ाई में सीआरपीएफ के जवानों पर माओवादियों के हमले में पुलिस के 27 जवान मारे गए।
दंतेवाड़ा. 17 मई 2010
एक यात्री बस में सवार हो कर दंतेवाड़ा से सुकमा जा रहे सुरक्षाबल के जवानों पर माओवादियों ने बारूदी सुरंग लगा कर हमला किया था। जिसमें 12 विशेष पुलिस अधिकारी समेत 36 लोग मारे गए थे।
ताड़मेटला. 6 अप्रैल 2010
बस्तर के ताड़मेटला में सीआरपीएफ के जवान सर्चिंग से लौट कर आराम कर रहे थे। जहां   माओवादियों के बारुदी सुरंग में 76 जवान एक साथ शहीद हुए थे।
मदनवाड़ा. 12 जुलाई 2009
राजनांदगांव के मानपुर इलाके में माओवादियों के हमले की सूचना पा कर पहुंचे पुलिस अधीक्षक विनोद कुमार चैबे समेत 29 पुलिसकर्मियों पर माओवादियों ने हमला बोला और उनकी हत्या कर दी थी।
उरपलमेटा. 9 जुलाई 2007
एर्राबोर के उरपलमेटा में सीआरपीएफ और जिला पुलिस का बल माओवादियों की तलाश कर के वापस बेस कैंप लौट रहा था। इस दल पर माओवादियों ने हमला कर दिया था। जिसमें 23 पुलिसकर्मी मारे गए।
रानीबोदली. 15 मार्च 2007
बीजापुर के रानीबोदली में पुलिस के एक कैंप पर आधी रात को नक्सलियों ने हमला किया था। भारी गोलीबारी की। कैंप को बाहर से आग लगा दिया। इस हमले में पुलिस के 55 जवान मारे गए थे।
 

लड़नी अब होगी लड़ाई

            
                   

दस दिनों में 27 जवानों के नरसंहार ने साबित कर दिया कि नरम उपाय नाकाम हो गए हैं। नक्सलियों के खिलाफ लड़ाई लड़नी ही होगी। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल असम में वोट की राजनीति करते रहे और राज्य में नक्सली मौत का तांडव। सवाल यह है कि नक्सलियों से बातचीत का रास्ता खोलना चाहिए या फिर नक्सलवाद खात्मे के लिए हंट नहीं,हंटर चाहिए।  


0 रमेश कुमार ’रिपु’
            मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ढाई साल से दावा कर रहे हैं कि, माओवाद कमजोर हो गया हैं। नक्सली अपनी अंतिम लड़ाई लड़ रहे हैं। जबकि मार्च 2020 में नक्सलियों के जाल में फंसकर 17 जवान शहीद हुए थे। 2021 में 23 मार्च को नरायणपुर में पांच जवान शहीद होने पर कहा था कि,जवानों की शहादत बेकार नहीं जायेगी। 3 अप्रैल 2021 को माओवादियों ने बीजापुर जिले के तर्रेम, सिलगेर के टेकलगुड़म और जोनागुड़ा में एंबुश लगाकर 23 जवानों की जानें ले ली। झीरम कांड की तरह नक्सलियों ने बर्बरता का परिचय दिया। जोनागुड़ा में शहीद सुरक्षा कर्मी की नक्सलियों ने हाथ काट कर ले गए। बीजापुर का यह नरसंहार अपने पीछे कई सवाल छोड़ गया है। अब तक छत्तीसगढ़ में 1301 जवान शहीद हो चुके हैं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि, क्या नक्सलियों से बातचीत का रास्ता खोला जाना चाहिए या फिर ग्रीन हंट नहीं, हंटर चाहिए। अथवा सेना का उपयोग करना चाहिए। नक्सलवाद के खत्मे के लिए केन्द्र सरकार ने अतिरिक्त पांच बटालियन दी। तो क्या यह मान लिया जाए कि, आॅपरेशन में कोताही बरती जा रही है? नक्सलियों के इस नरसंहार से सवाल यह उठता है कि कांग्रेस नेता राजबब्बर राजीव गांधी कांग्रेस भवन में 2018 में कहा था कि, नक्सली क्रांतिकारी हैं। वे क्रांति करने निकले हैं। कोई उन्हें रोके नहीं।’ तो क्या मान लिया जाये कि, भूपेश सरकार ने नक्सलियों पर नकेल न लगे, इसलिए अपने घोषणा पत्र को दरकिनार कर अब तक नक्सली नीति नहीं बनाई?
माओ की संवेदनात्मक चाल
गृहमंत्री अमित शाह ने कहा कि, जवानों की शहादत का बदला लिया जाएगा। इस पर नक्सलियों की केंद्रीय कमेटी के प्रवक्ता अभय ने कहा कि जवानों की मौत के लिए केंद्र, राज्य सरकार और नार्थ ब्लॉक जिम्मेदार है। गृहमंत्री बताएं किस किस से बदला लेंगे। विभिन्न मुठभेड़ों में शहीद जवानों के परिजनों के प्रति संवेदना जताते हुए कहा, संगठन की लड़ाई जवानों से नहीं है। सरकार की ओर से हथियार उठाने की वजह से संगठन को उनसे लड़ना पड़ता है। जाहिर है कि, नक्सली लीडर अब संवेदनात्मक बातें करके सारा दोष सरकार पर मड़ना चाहते हैं। वहीं जम्मू-कश्मीर निवासी कोबरा बटालियन के जवान राकेश्वर सिंह मनहास को नक्सली लीडर हिड़मा अपने साथ ले गया है। ऐसा समझा जा रहा है कि, हिड़मा इस जवान को छोड़ने के लिए सरकार के सामने अपनी कोई मांग रख सकता है।  
कई सवाल उठ रहे हैं
गृहमंत्री अमित शाह ने इस हादसे की जांच के आदेश दिये हैं। बात साफ है कि सुरक्षा बल से इस बार भी चूक हुई है। फोर्स के बड़े अफसरों की प्लानिंग एग्जीक्यूशन ग्रांउड रिपोर्ट और इंटेलिजेंस की लापरवाही से यह नरसंहार हुआ है। जोनागुड़ा का क्षेत्र गुरिल्ला युद्ध के लिए जाना जाता है। कोबरा बटालियन इसमें माहिर है। ऐसे में यह हादिसा कैसे हो गया? हिड़मा की बटालियन नंम्बर एक आधुनिक हाथियारों से लैंस रहती है,जानकर भी हमले से पहले उसके व्यूह से कैसे बचना है,इसकी प्लानिंग क्यों नहीं की गई? झीरम कांड का मास्टर माइंड हिड़मा ने अपने होने की सूचना पुलिस तक फैलाई। पुलिस न अपने मुखबिरों से पता करने की कोशिश क्यों नहीं की? क्या हिड़मा के खिलाफ आॅपरेशन की जानकारी मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को थी? फौज के अफसर और पुलिस तक किसने खबर पहुंचाई कि नक्सली कमांडर हिड़मा भारी संख्या में नक्सली टेकलगुड़म और जोनागुड़ा में हैं? हैरानी वाली बात है कि सीआरपीएफ,कोबरा बाटालियन,पुलिस का खुफिया तंत्र और इंटेलिजेंस आदि को पता क्यों नहीं चला कि, करीब 700 नक्सली किसी बड़े हादसे की तैयारी कर रहे हैं?
हिड़मा पर 25 लाख का इनाम
इस नरसंहार का मास्टर माइंड मंडावी हिड़मा उर्फ इदमुल पोडियाम भीमा पर 25 लाख रूपये का इनाम है। हिड़मा सुकमा जिलेे के जगरगुडा इलाके के पुडअती गांव का निवासी है। इसकी दो शादी हुई है। इसकी दोनों पत्नियां नक्सली हैं। तीन भाई हैं। मांडवी देवा और मांडवी टुल्ला गांव में खेती करती हैं। तीसरा भाई मांडवी नंदा गांव में नक्सलियों का पढ़ाता है। बहन हिड़मा दोरनपाल में रहती है।
आॅपरेशन की कमांड नलिनी क्यों
इस नरसंहार के लिए पूरी तरह भूपेश सरकार और नक्सल आॅपरेशन के आई.जी नलिनी प्रभात अपनी जवाबदेही से मुक्त नहीं हो सकते। गृह मंत्रालय की राममोहन कमेटी ने ताड़मेटला कांड के लिए  नक्सल आॅपरेशन के आई.जी. नलिनी प्रभात, तत्कालीन सीआरपीएफ के आई जी रमेश चन्द्र,62 बटालियन के कमांडर ए. के. बिष्ट और इंस्पेक्टर संजीव बागड़े दोषी ठहराया था। बावजूद इसके नक्सल आॅपरेशन का दायित्व नलिनी प्रभात का सौंपा जाना अश्चर्य जनक है। ताड़मेटला कांड की जांच कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार नक्सलियों के पास सीआरपीएफ का वायरलेस सेट था। इससे उन्हें फोर्स के मूवमेंट की पूरी जानकारी मिल रही थी। इसी के जरिए उन्हें फोर्स के चिंतलनार कैंप वापस लौटने की तारीख रास्ता और समय पता चल गया था। ऐसे ही 3 अप्रैल 2021 को बीजापुर के जोनागुड़ा में नक्सलियों ने सुनियोजित जानकारी देकर फोर्स को फंसाया। नक्सलियों ने अपनी लोकेशन खबरियों के हाथ अधिकारियों तक पहुंचाई। इसके बाद अधिकारियों ने जवानों को जोनागुड़ा पहुंचने के निर्देश दे दिए।
नक्सलियों ने दो चालें चली
नारायणपुर जिले में 23 मार्च 2021 को आईईडी ब्लास्ट कर पांच जवानों की जानें ली ली थी। पुलिस के पास खूफिया जानकारी थी कि, नक्सली 2021 में कोई बड़ा हमला करेंगे। इसलिए दो हजार जवान आॅपरेशन में भेजे गए थे। जबकि इसके पहले 17 मार्च को नक्सलियों ने विज्ञप्ति जारी कर कहा था कि, वे जनता की भलाई के लिए छत्तीसगढ़ सरकार से बातचीत के लिए तैयार हैं। उन्होंने बातचीत के लिए तीन शर्तें भी रखी थीं। इनमें सशस्त्र बलों को हटाने, माओवादी संगठनों पर लगे प्रतिबंध हटाने और जेल में बंद उनके नेताओं की बिना शर्त रिहाई शामिल थीं। सरकार ने अपनी ओर से निःशर्त समझौता वार्ता की बात कही। कांग्रेस नेता छविन्द्र कर्मा दो माह पहले से कह रहे थे कि, नक्सली जब खामोश रहते हैं, तो वो कोई योजना पर काम कर रहे होते हैं।’’   
एंबुश को तोड़ नहीं पाए
सीआरपीएफ के सेकंड इन कमांड आॅफिसर संदीप कहते हंै,‘‘नक्सली लीडर हिड़मा और सुजाता ने एक बड़े हादिसे की प्लानिंग किये थे। सभी जवान बहादुरी से लड़े। आॅपरेशन करके जवान लौट रहे थे तभी नक्सलियों ने हमला बोला। जवानों के हर मूवमेंट की जानकारी गांव के लोग और महिलाएं नक्सलियों को दे रहे थे।’’ हैरानी वाली बात है कि,नक्सली कमांडर हिड़मा आॅपरेशन के लिए बीजापुर के तर्रेम से 760, उसूर से 200 पामेड से 195 सुकमा 483 एवं नरसापुर से 420 का बल रवाना  हुआ था। सीआरपीएफ डीआरजी जिला पुलिस बल और कोबरा बटालियन के जवानों की ज्वाइन पार्टी सर्चिंग पर निकली थी। सुरक्षा बलों ने पहले पामेड़ इलाके में नक्सलियों के खिलाफ बड़ा ऑपरेशन प्लान किया था। लेकिन इसके बाद सुकमा,बीजापुर की सीमा पर जोनागुड़ा के पास बड़ी संख्या में नक्सलियों की मौजूदगी की जानकारी मिलने के बाद पामेड़ की जगह बीजापुर में ऑपरेशन लांच किया गया। 3 अप्रैल की दोपहर सील गिर के जंगल में घात लगाए 700 नक्सलियों ने पुलिस पार्टी को पहले भीतर तक आने दिया। तीनों से ओर उनके एंबुश में घेरने के बाद अचानक हमला कर दिया। पहला एंबुश पहाड़ी के पास लगाया गया। दूसरा जुन्ना गुड़ा गाँव में जबकि आगे करीब दो किलोमीटर पर तीसरा एंबुश लगाया था। कहां से और कैसे एंबुश तोड़ना है किसी को समझ में नहीं आया। वहीं बस्तर आई. जी. पी. सुदंरराज ने बताया कि अभी तक 9 नक्सलियों के मारे जाने की सूचना है। जबकि 15 से ज्यादा घायल हैं। राष्ट्रीय विशेष सुरक्षा सलाहकार विजय कुमार भी पिछले 10 दिनों से बस्तर में। उन्हें विशेष रूप से बस्तर में नक्सलवाद के खात्मे के लिए तैनात किया गया है। उनके रहते दो नक्सली वारदात हो गई।
झोपड़ियों से गोली बरसी
माओवदियों ने तीन तरफ से हमले का जाल बिछाया और जवान उसकी चलाकी को समझ नहीं पाए। जोनागुड़ा में नक्सलियों ने झोपड़ियों में घात लगाकर हमला किया। टेकलगुड़ा गांव में करीब 30 घर हैं,सभी को नक्सलियों ने खाली कराया और यहां से छिपकर हमला किये। दोनों जगह जवानों की लाशें बिछी रही। खून फैला हुआ था। पेड़ों पर गोलियों के निशान थे। तीन घंटे तक जवानों और नक्सलियों के बीच मुठभेड़ चली। घायल जवानों को पास से गोली मारी और बम से हमला किया।
बहरहाल कब तक बस्तर नक्सलियों के बारूद से दहलता रहेगा? कश्मीर की तरह छत्तीसगढ़ के नक्सलवाद को भी राष्ट्रीय मामला समझना जरूरी हो गया है। कैसे शांति स्थापित होगी छत्तीसगढ़ में इस दिशा में अब विचार करना जरूरी है।
 

 
 









गी ड़ाई
दस दिनों में 27 जवानों के नरसंहार ने साबित कर दिया कि नरम उपाय नाकाम हो गए हैं। नक्सलियों के खिलाफ लड़ाई लड़नी ही होगी। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल असम में वोट की राजनीति करते रहे और राज्य में नक्सली मौत का तांडव। सवाल यह है कि नक्सलियों से बातचीत का रास्ता खोलना चाहिए या फिर नक्सलवाद खात्मे के लिए हंट नहीं,हंटर चाहिए।  
0 रमेश कुमार ’रिपु’
            मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ढाई साल से दावा कर रहे हैं कि, माओवाद कमजोर हो गया हैं। नक्सली अपनी अंतिम लड़ाई लड़ रहे हैं। जबकि मार्च 2020 में नक्सलियों के जाल में फंसकर 17 जवान शहीद हुए थे। 2021 में 23 मार्च को नरायणपुर में पांच जवान शहीद होने पर कहा था कि,जवानों की शहादत बेकार नहीं जायेगी। 3 अप्रैल 2021 को माओवादियों ने बीजापुर जिले के तर्रेम, सिलगेर के टेकलगुड़म और जोनागुड़ा में एंबुश लगाकर 23 जवानों की जानें ले ली। झीरम कांड की तरह नक्सलियों ने बर्बरता का परिचय दिया। जोनागुड़ा में शहीद सुरक्षा कर्मी की नक्सलियों ने हाथ काट कर ले गए। बीजापुर का यह नरसंहार अपने पीछे कई सवाल छोड़ गया है। अब तक छत्तीसगढ़ में 1301 जवान शहीद हो चुके हैं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि, क्या नक्सलियों से बातचीत का रास्ता खोला जाना चाहिए या फिर ग्रीन हंट नहीं, हंटर चाहिए। अथवा सेना का उपयोग करना चाहिए। नक्सलवाद के खत्मे के लिए केन्द्र सरकार ने अतिरिक्त पांच बटालियन दी। तो क्या यह मान लिया जाए कि, आॅपरेशन में कोताही बरती जा रही है? नक्सलियों के इस नरसंहार से सवाल यह उठता है कि कांग्रेस नेता राजबब्बर राजीव गांधी कांग्रेस भवन में 2018 में कहा था कि, नक्सली क्रांतिकारी हैं। वे क्रांति करने निकले हैं। कोई उन्हें रोके नहीं।’ तो क्या मान लिया जाये कि, भूपेश सरकार ने नक्सलियों पर नकेल न लगे, इसलिए अपने घोषणा पत्र को दरकिनार कर अब तक नक्सली नीति नहीं बनाई?
माओ की संवेदनात्मक चाल
गृहमंत्री अमित शाह ने कहा कि, जवानों की शहादत का बदला लिया जाएगा। इस पर नक्सलियों की केंद्रीय कमेटी के प्रवक्ता अभय ने कहा कि जवानों की मौत के लिए केंद्र, राज्य सरकार और नार्थ ब्लॉक जिम्मेदार है। गृहमंत्री बताएं किस किस से बदला लेंगे। विभिन्न मुठभेड़ों में शहीद जवानों के परिजनों के प्रति संवेदना जताते हुए कहा, संगठन की लड़ाई जवानों से नहीं है। सरकार की ओर से हथियार उठाने की वजह से संगठन को उनसे लड़ना पड़ता है। जाहिर है कि, नक्सली लीडर अब संवेदनात्मक बातें करके सारा दोष सरकार पर मड़ना चाहते हैं। वहीं जम्मू-कश्मीर निवासी कोबरा बटालियन के जवान राकेश्वर सिंह मनहास को नक्सली लीडर हिड़मा अपने साथ ले गया है। ऐसा समझा जा रहा है कि, हिड़मा इस जवान को छोड़ने के लिए सरकार के सामने अपनी कोई मांग रख सकता है।  
कई सवाल उठ रहे हैं
गृहमंत्री अमित शाह ने इस हादसे की जांच के आदेश दिये हैं। बात साफ है कि सुरक्षा बल से इस बार भी चूक हुई है। फोर्स के बड़े अफसरों की प्लानिंग एग्जीक्यूशन ग्रांउड रिपोर्ट और इंटेलिजेंस की लापरवाही से यह नरसंहार हुआ है। जोनागुड़ा का क्षेत्र गुरिल्ला युद्ध के लिए जाना जाता है। कोबरा बटालियन इसमें माहिर है। ऐसे में यह हादिसा कैसे हो गया? हिड़मा की बटालियन नंम्बर एक आधुनिक हाथियारों से लैंस रहती है,जानकर भी हमले से पहले उसके व्यूह से कैसे बचना है,इसकी प्लानिंग क्यों नहीं की गई? झीरम कांड का मास्टर माइंड हिड़मा ने अपने होने की सूचना पुलिस तक फैलाई। पुलिस न अपने मुखबिरों से पता करने की कोशिश क्यों नहीं की? क्या हिड़मा के खिलाफ आॅपरेशन की जानकारी मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को थी? फौज के अफसर और पुलिस तक किसने खबर पहुंचाई कि नक्सली कमांडर हिड़मा भारी संख्या में नक्सली टेकलगुड़म और जोनागुड़ा में हैं? हैरानी वाली बात है कि सीआरपीएफ,कोबरा बाटालियन,पुलिस का खुफिया तंत्र और इंटेलिजेंस आदि को पता क्यों नहीं चला कि, करीब 700 नक्सली किसी बड़े हादसे की तैयारी कर रहे हैं?
हिड़मा पर 25 लाख का इनाम
इस नरसंहार का मास्टर माइंड मंडावी हिड़मा उर्फ इदमुल पोडियाम भीमा पर 25 लाख रूपये का इनाम है। हिड़मा सुकमा जिलेे के जगरगुडा इलाके के पुडअती गांव का निवासी है। इसकी दो शादी हुई है। इसकी दोनों पत्नियां नक्सली हैं। तीन भाई हैं। मांडवी देवा और मांडवी टुल्ला गांव में खेती करती हैं। तीसरा भाई मांडवी नंदा गांव में नक्सलियों का पढ़ाता है। बहन हिड़मा दोरनपाल में रहती है।
आॅपरेशन की कमांड नलिनी क्यों
इस नरसंहार के लिए पूरी तरह भूपेश सरकार और नक्सल आॅपरेशन के आई.जी नलिनी प्रभात अपनी जवाबदेही से मुक्त नहीं हो सकते। गृह मंत्रालय की राममोहन कमेटी ने ताड़मेटला कांड के लिए  नक्सल आॅपरेशन के आई.जी. नलिनी प्रभात, तत्कालीन सीआरपीएफ के आई जी रमेश चन्द्र,62 बटालियन के कमांडर ए. के. बिष्ट और इंस्पेक्टर संजीव बागड़े दोषी ठहराया था। बावजूद इसके नक्सल आॅपरेशन का दायित्व नलिनी प्रभात का सौंपा जाना अश्चर्य जनक है। ताड़मेटला कांड की जांच कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार नक्सलियों के पास सीआरपीएफ का वायरलेस सेट था। इससे उन्हें फोर्स के मूवमेंट की पूरी जानकारी मिल रही थी। इसी के जरिए उन्हें फोर्स के चिंतलनार कैंप वापस लौटने की तारीख रास्ता और समय पता चल गया था। ऐसे ही 3 अप्रैल 2021 को बीजापुर के जोनागुड़ा में नक्सलियों ने सुनियोजित जानकारी देकर फोर्स को फंसाया। नक्सलियों ने अपनी लोकेशन खबरियों के हाथ अधिकारियों तक पहुंचाई। इसके बाद अधिकारियों ने जवानों को जोनागुड़ा पहुंचने के निर्देश दे दिए।
नक्सलियों ने दो चालें चली
नारायणपुर जिले में 23 मार्च 2021 को आईईडी ब्लास्ट कर पांच जवानों की जानें ली ली थी। पुलिस के पास खूफिया जानकारी थी कि, नक्सली 2021 में कोई बड़ा हमला करेंगे। इसलिए दो हजार जवान आॅपरेशन में भेजे गए थे। जबकि इसके पहले 17 मार्च को नक्सलियों ने विज्ञप्ति जारी कर कहा था कि, वे जनता की भलाई के लिए छत्तीसगढ़ सरकार से बातचीत के लिए तैयार हैं। उन्होंने बातचीत के लिए तीन शर्तें भी रखी थीं। इनमें सशस्त्र बलों को हटाने, माओवादी संगठनों पर लगे प्रतिबंध हटाने और जेल में बंद उनके नेताओं की बिना शर्त रिहाई शामिल थीं। सरकार ने अपनी ओर से निःशर्त समझौता वार्ता की बात कही। कांग्रेस नेता छविन्द्र कर्मा दो माह पहले से कह रहे थे कि, नक्सली जब खामोश रहते हैं, तो वो कोई योजना पर काम कर रहे होते हैं।’’   
एंबुश को तोड़ नहीं पाए
सीआरपीएफ के सेकंड इन कमांड आॅफिसर संदीप कहते हंै,‘‘नक्सली लीडर हिड़मा और सुजाता ने एक बड़े हादिसे की प्लानिंग किये थे। सभी जवान बहादुरी से लड़े। आॅपरेशन करके जवान लौट रहे थे तभी नक्सलियों ने हमला बोला। जवानों के हर मूवमेंट की जानकारी गांव के लोग और महिलाएं नक्सलियों को दे रहे थे।’’ हैरानी वाली बात है कि,नक्सली कमांडर हिड़मा आॅपरेशन के लिए बीजापुर के तर्रेम से 760, उसूर से 200 पामेड से 195 सुकमा 483 एवं नरसापुर से 420 का बल रवाना  हुआ था। सीआरपीएफ डीआरजी जिला पुलिस बल और कोबरा बटालियन के जवानों की ज्वाइन पार्टी सर्चिंग पर निकली थी। सुरक्षा बलों ने पहले पामेड़ इलाके में नक्सलियों के खिलाफ बड़ा ऑपरेशन प्लान किया था। लेकिन इसके बाद सुकमा,बीजापुर की सीमा पर जोनागुड़ा के पास बड़ी संख्या में नक्सलियों की मौजूदगी की जानकारी मिलने के बाद पामेड़ की जगह बीजापुर में ऑपरेशन लांच किया गया। 3 अप्रैल की दोपहर सील गिर के जंगल में घात लगाए 700 नक्सलियों ने पुलिस पार्टी को पहले भीतर तक आने दिया। तीनों से ओर उनके एंबुश में घेरने के बाद अचानक हमला कर दिया। पहला एंबुश पहाड़ी के पास लगाया गया। दूसरा जुन्ना गुड़ा गाँव में जबकि आगे करीब दो किलोमीटर पर तीसरा एंबुश लगाया था। कहां से और कैसे एंबुश तोड़ना है किसी को समझ में नहीं आया। वहीं बस्तर आई. जी. पी. सुदंरराज ने बताया कि अभी तक 9 नक्सलियों के मारे जाने की सूचना है। जबकि 15 से ज्यादा घायल हैं। राष्ट्रीय विशेष सुरक्षा सलाहकार विजय कुमार भी पिछले 10 दिनों से बस्तर में। उन्हें विशेष रूप से बस्तर में नक्सलवाद के खात्मे के लिए तैनात किया गया है। उनके रहते दो नक्सली वारदात हो गई।
झोपड़ियों से गोली बरसी
माओवदियों ने तीन तरफ से हमले का जाल बिछाया और जवान उसकी चलाकी को समझ नहीं पाए। जोनागुड़ा में नक्सलियों ने झोपड़ियों में घात लगाकर हमला किया। टेकलगुड़ा गांव में करीब 30 घर हैं,सभी को नक्सलियों ने खाली कराया और यहां से छिपकर हमला किये। दोनों जगह जवानों की लाशें बिछी रही। खून फैला हुआ था। पेड़ों पर गोलियों के निशान थे। तीन घंटे तक जवानों और नक्सलियों के बीच मुठभेड़ चली। घायल जवानों को पास से गोली मारी और बम से हमला किया।
बहरहाल कब तक बस्तर नक्सलियों के बारूद से दहलता रहेगा? कश्मीर की तरह छत्तीसगढ़ के नक्सलवाद को भी राष्ट्रीय मामला समझना जरूरी हो गया है। कैसे शांति स्थापित होगी छत्तीसगढ़ में इस दिशा में अब विचार करना जरूरी है।
 

 
 

Wednesday, March 3, 2021

पत्रकारों को जान के लाले

 











बस्तर में पत्रकारिता कभी भी आसान नहीं रही।पत्रकारांे को पुलिस के खिलाफ लिखने पर पुलिस नक्सलियों का मुखबिर बताकर जेल में डाल देती है और पुलिस का साथ देने पर नक्सली अपना दुश्मन समझ लेते है। यहां पत्रकरिता विकलांग हो गई है।  


0 रमेश कुमार ‘रिपु’
             छत्तीसगढ़ में उस पार्टी की सरकार है,जिसके नेता राजबब्बर ने कांग्रेस भवन में कहा था कि,नक्सली क्रांतिकारी हैं। वे क्रांति के लिए निकले हैं। कोई उन्हें रोके नहीं। सवाल यह है कि, नक्सली किस तरह के क्रांतिकारी हैं,जो जन अदालत लगाकर पत्रकारों को सजा देने की बात कर रहे है। प्रेस नोट जारी कर पत्रकार गणेश मिश्रा,लीलाधर राठी, बीबीसी के पूर्व पत्रकार शुभ्रांशु चैधरी, पी विजय, और फारूख अली को चेतावनी दी हैं। जबकि बस्तर में एक लाख के करीब फोर्स के जवान हैं। और भूपेश सरकार कहती है कि,नक्सली कमजोर हुए हैं। यदि नक्सली कमजोर हुए हैं,तो आम आदिवासी और पत्रकारों को नक्सली धमकी देने की हिमाकत कैसे कर लिए? पत्रकारों का संगठन सुकमा,बिजापुर और जगदलपुर मुख्यालय में धरना प्रदर्शन कर नक्सलियों का विरोध किया है। सरकार की चुप्पी हैरान करती है। बस्तर आईजी पी सुन्दरराज कहते हैं, इस पूरे मामले को पुलिस ने गंभीरता से लिया है। पुलिस माओवादियों के प्रेस नोट की जांच कर रही है। पत्रकारों और समाजसेवी सहित सभी नागरिकों के सुरक्षा की जिम्मेदारी पुलिस की है। किसे कितनी सुरक्षा दी जाएगी, इस बात को हम सार्वजनिक नहीं कर सकते। वहीं प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष विष्णु देव साय कहते हैं,सरकार झूठ बोलाती है कि नक्सलवाद कमजोर हुआ है। उनके हौसले बढ़े हैं। अब पत्रकार उनके निशाने पर है।’’
नक्सलियों के पत्र का जांँच करायेंगे। पुलिस अपने स्तर पर नक्सलवाद के खात्मे के लिए काम कर रही है।’’जाहिर सी बात है कि पत्रकारों की जान की कोई कीमत पुलिस नहीं मानती।
गौरतलब है कि दक्षिण सब जोनल ब्यूरो की ओर से 9 और 12 फरवरी को बीजापुर में प्रेस नोट जारी करते हुए पत्रकारों और कार्पोरेट घराने के लोगों को चेतावनी दी थी कि, भ्रष्टाचारियों और कॉरपोरेट घरानों के लोगों को जन अदालत लगाकर सजा दी जाएगी। 13 फरवरी को दंतेवाड़ा में नक्सलियों ने पत्रकारों के खिलाफ पर्चे भी फेंके। इसके बाद नक्सलियों की तरफ से 15 फरवरी को जारी विज्ञप्ति में सुकमा के पत्रकार लीलाधर राठी व बीजापुर के पत्रकार गणेश मिश्रा को जन अदालत में दंडित करने की चेतावनी देते हुए कहा कि ये कार्पोरेट घरानों के दलाल है। इस घटना की प्रदेश भर के पत्रकारों ने निंदा की है। इसके बाद 17 फरवरी को नक्सलियों का एक पत्र फिर मीडिया के पास आया जिसमें पत्रकारों को आंदोलन नहीं करने की सलाह देते हुए मामले पर चर्चा करने की बात कही। पत्र में लिखा कि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सरकार यहां के प्राकृतिक संसाधनों को कारर्पोरेट घराने के हाथों में सौपने भूअर्जन पुनर्वास व्यवस्थापना कानून 2019 को लाया। जनता को बेदखल करने खदाने और बांधे शुरू करने के लिए समझौता किया। नया कैम्प और खदान खोलने का जनता लगातार विरोध कर रही है। फासीवादी सलवा जुड़ूम,शांति सेना,अग्नि सेना जैसी संस्थाओं के नेता फारूख अली जैसे गुंडों को शोषक वर्ग ने सम्मानित किया। पत्रकार और समाजसेवीं इसका विरोध करें,नहीं तो अंजाम भुगतने तैयार रहें।
पत्रकार गणेश मिश्रा कहते हैं,उनका कार्पोरेट घरानों से कोई ताल्लूक नहीं है। वे विशुद्ध रूप से पत्रकार हैं। लीलाधर राठी कई साल से बीजापुर में किराए के घर में रहते हैं। बरसों से वे ग्रामीण लोगों की आवाज उठाते आ रहे हैं। बात सारकेगुड़ा की हो या एड़समेटा की,उन्होंने निष्पक्ष होकर मसले को कवर किया। लीलाधर राठी कहते हैं,कभी ऐसा काम नहीं किया कि नक्सली नाराज हो जाएं। सुकमा में राठी मार्ट नाम से एक दुकान खोली है,उसमें सभी महिलाएं वर्कर हैं। उनकी पत्नी दुकान की मालकिन हैं। दुकान में काम करने वाली सभी महिलाएं निर्धन हैं। गौरतलब है कि 26 जनवरी को दस लोगों को मार्ट की ओर से सम्मानित किया गया था। चर्चा है कि, सम्मानित जिन्हें किया गया उसमें कुछ लोग सलवा जुड़ूम के समर्थक थे। नक्सली इसीलिए नाराज हैं। सुकमा के पत्रकार लीलाधर राठी एक बार जब माओवादियों ने सब इंस्पेक्टर प्रकाश सोनी को बंधक बना लिया था। जनअदालत से वे लंबी सुनवाई के बाद प्रकाश सोनी को सकुशन रिहा करा लाए थे। बस्तर में शांति स्थापित करने की दिशा में प्रयासरत बीबीसी के पूर्व पत्रकार शुभ्रांशु चैधरी कहते हैं,ं मोबाइल और रेडियो के माध्यम से बस्तर के अंदरूनी इलाकों में लोगों से संवाद स्थापित कर रहे हैं। आदिवासी महिलाओं के लिए सैनेटरी पैड के इस्तेमाल को बढ़ावा देने की पहल को गति दे रहे हैं। ताकि महिलाओं में जागरूकता आए।
नक्सलियों के खिलाफ हुए प्रदर्शन
बीजापुर में 14 फरवरी को नक्सलियों के पर्चे फेंकने के बाद बीजापुर में पत्रकारों ने बैठक की। 16 फरवरी से 22 फरवरी तक धरना,प्रदर्शन कर नक्सलियों का विरोध कर निंदा प्रस्ताव पारित किया। 15 फरवरी को जगदलपुर में सामाजिक संगठनों ने इसके विरोध में नक्सलियों का पुतला दहन किया। 16 फरवरी को पत्रकारों ने दंतेवाड़ा में बाइक रैली निकालकर नक्सलियों के फरमान का विरोध किया। बाइक रैली कंगाल से निकाली गई है। 16 फरवरी को पत्रकारों ने माओ के गढ़ गंगालूर में एक रैली और सभा की। नक्सलियों ने बीजापुर और सुकमा के पत्रकार को जान से मारने की धमकी का विरोध करते हुए जवाब मांगा। 18 फरवरी को कुछ पत्रकार गंगालूर से 10 किलोमीटर आगे नक्सलियों की मांद में घुसे। नक्सली स्मारक के सामने नक्सल विज्ञप्ति का उन्होंने विरोध जताया। 18 फरवरी को पत्रकारों ने बुरगुम गांव में धरना,प्रदर्शन किया। सामाजिक कार्यकर्ता सोनी सोरी ने पत्रकारों के प्रदर्शन का समर्थन किया। जगदलपुर पत्रकार संघ अध्यक्ष एस करीमुद्दीन ने कहा,कि नक्सली जल्द सामने आएं और स्थिति को स्पष्ट करें। इसलिए कि परिवार परेशान है।
पहले भी पत्रकार मारे गए
नक्सलियों के निशाने पर पहली बार पत्रकार नहीं आए हैं। इसके पहले बीजापुर जिले के साईं रेड्डी और बस्तर जिले के नेमीचंद जैन को माओवादियों ने अपना निशाना बनाया है। इन दोनों मृत पत्रकारों के खिलाफ कोई पर्चा जारी नहीं किया गया था। ऐसा पहली बार हुआ है, जब पत्र में बीजापुर के गणेश मिश्रा, सुकमा के लीलाधर राठी बीबीसी के पूर्व पत्रकार शुभ्रांशु चैधरी के साथ माओवादियों के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाले कोंटा के पी. विजय और सुकमा के फारूख अली का नाम शामिल है।  
माओवादियों के जारी पर्चे के जवाब में समाज सेवी फारूख अली ने कहा,नक्सली पीएलजीए सप्ताह के नाम पर निर्दोष ग्रामीणों की जान लेते हैं और अपने आप को क्रांति का दूत कहते हैं। बस्तर से आदिवासी संस्कृति खत्म करना चाहते हैं। बंदूक की नोक पर न केवल लोगों में डर पैदा करना चाहते हैं बल्कि, इसी के दम पर सत्ता हासिल करना चाहते हैं। बस्तर के लोग कभी उनके सपने को पूरा नहीं होने देंगे।
दक्षिण बस्तर पत्रकार संघ अध्यक्ष बप्पी राय कहते हैं,छत्तीसगढ़ के बस्तर में पत्रकारिता बेहद चुनौतीपूर्ण है। जब सरकार और नक्सलियों के बीच कोई वार्ता करनी होती है,तब बस्तर के पत्रकार ही सरकार की मदद करते हैं। बस्तर के पत्रकारों के माध्यम से ही कई बार निर्दोषों को नक्सलियों के कब्जे से छुड़ाया गया है। इतना ही नहीं,बस्तर संभाग के सभी नक्सल प्रभावित जिलों के पत्रकार जब कोई बड़ा नक्सली हमला होता है, तो पत्रकार के रूप में नहीं बल्कि, मददगार बनकर खड़े हो जाते हैं। जान जोखिम में डालकर अंदरूनी इलाकों से खबर लेकर आते है। जिसके बाद वही खबर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय खबर बनती है।’’
बाहरहाल बस्तर में पत्रकारिता इतनी आसान नहीं है। पुलिस के खिलाफ लिखने पर पुलिस नक्सलियों का मुखबिर बताकर पत्रकारों को जेल में डाल देती है और पुलिस का साथ देने परा नक्सली जन अदालत में फैसला करने की बात कहते हैं। यहां पत्रकारिता विकलांग हो गई है,कहें तो गलत नहीं होगा। देखना यह है कि सरकार और पुलिस, पत्रकारों की सुरक्षा माओवादियों से किस तरह करती है।
 
 
 
 
 
 


 

Tuesday, February 23, 2021

सरकार और माओ दोनों भटक गए हैं

 
       

छत्तीसगढ़ में माओवादी हैं,तो सुरक्षा बल है। सुरक्षा बल है,तो सोनी सोरी की आवाज़ है। जो वर्दी से उभरने वाली दरिंदगी के खिलाफ गूंजती है। सोनी सोरी मानती है कि, फोर्स के दम पर नक्सलवाद खत्म नहीं होगा। पाँच बटालियन और मिलने से महिलाओ के साथ अनाचार बढ़ेगा। लोन वार्रंाटू सिर्फ पैसा और प्रमोशन पाने, पुलिस का काॅसेप्ट है। इससे नक्सलवाद कमजोर नहीं होगा। नक्सलवाद  पर इस तरह की तमाम बातें सोनी सोरी से की। प्रस्तुत है उनसे हुई बातचीत के प्रमुख अंश - 


0 रमेश कुमार ‘‘रिपु’’
0 छत्तीसगढ में नक्सली हिंसा बढ़ने की वजह क्या मानती हैं?
00 छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद से आदिवासियों के साथ ज्यादा अत्याचार होने लगा है। पेसा कानून की बात की जाती है लेकिन, उसे अमल में नहीं लाया जाता है। ग्राम सभा होनी चाहिए। पर होती नहीं। मैं मानती हूूॅ कि, सीआरपीएफ के कई कैंप लगे हैं,नक्सलियों से मुक्ति के लिए। सवाल यह उठता है,जब कैंप लगे हैं,तो फिर आदिवासियों के साथ जुल्म,अत्याचार क्यों होता है। महिलाओं के साथ अनाचार क्यों होता है? आदिवासियों को नक्सली बताकर बार बार जेल क्यों भेजा जाता है? सरकार सोचती है कि,ऐसा करने से नक्सलवाद खत्म हो जाएगा, तो गलत सोचती है। आदिवासी परेशान होकर कहता है, जब झूठे तरीके से नक्सली बताकर जेल में डाला जा रहा है,तो नक्सली ही बन जाते हैं।
0 क्या आप मानती हैं कि, जब तक पुलिस निर्दोष आदिवासियों केा नक्सली बताकर गोली मारती रहेगी या फिर जेल में डालती रहेगी, नक्सलवाद खत्म नहीं होगा।
00पुलिस बल के जरिये सरकार जो कर रही है,उससे नक्सलवाद खत्म नहीं हो सकता। लड़ाई यहांँ जल,जमीन और जंगल की है। न कि नक्सलियों की लड़ाई है। सरकार की नीतियाँं आदिवासियो के हित में नहीं है। सरकार पेसा कानून को अमल में तो लाए। महिलाओं के साथ होने वाले अनाचार और जुल्म को रोकने क्या कर रही है,यह तो बताये। आदिवासियों को नक्सली बताकर गोली मारने का सिलसिला थमेगा नहीं,ऐसे में नक्सलावाद कैसे खत्म होगा?
0 बस्तर के आई जी रहे एस.आर.पी कल्लूरी की वजह से नक्सलवाद मे कमी आई या फिर नक्सलवाद और बढ़ा?
00 कल्लूरी के पहले भी नक्सलवाद था और अब भी है। बल्कि पहले से अधिक है। जब तक आदिवासियों के पक्ष में सरकार खड़ी नहीं होगी,नक्सलवाद खत्म नहीं हो सकता। कोरोना काल के मार्च महीने में 17 डीआरजी के जवान शहीद हुए। सरकार कहती है,नक्सलवाद कमजोर हो रहा है,यह सिर्फ अखबारों में दिखता है। सच्चाई यह है कि, नक्सलवाद पहले से और बढ़ा है। बस्तर में आदिवासी नक्सलियों के मुखबिर के शक में मार दिये जाते है। नक्सली भी पुलिस के मुखबिर के आरोप में आदिवासियों को मार देते हंै। नक्सली मरने की जगह, आदिवासी पहले भी मरते थे। आज भी मर रहे हैं।
0 क्या आपको लगता है कि, नक्सली अपने मकसद से भटक गये हैं।
00 आदिवासियों के लिए सरकार बड़ी बड़ी बाते करती है,लेकिन करती क्या है? जब से होश संभाली हूूॅ, देख रही हॅू कि निर्दोष आदिवासी ही पिस रहा है। सरकार और माओ दोनों भटक गए हैं। दोनों अपने मकसद के विपरीत चल रहे हैं।
0 कांग्रेस सरकार और बीजेपी सरकार, दोनों में से किसे मानती है कि नक्सलवाद के खिलाफ उनका काम अच्छा है?
00 बीजेपी हो या फिर कांग्रेस, दोनों नक्सलवाद से निपटने मे असफल है। बीजेपी के समय सलवा जुड़ूम से आदिवासियों को जो जख्म मिले,उसे भुलाया नहीं जा सकता। नक्सल समस्या के लिए कांग्रेस ने अपने घोंषणा पत्र मे जो बातें कहीं थी, लगता है उसे भूल गई है। नक्सल नीति बनाने की बात की थी। दो साल बाद भी नहीं बनी।
0 क्या आप माानती हैं कि, नक्सली क्रांतिकारी हैं। वे क्रांति करने निकले हैं।
00 बंदूक से लड़ाई करने वालों को क्रांतिकारी कैसे कह सकते हैं। माओ की गोली हो या फिर पुलिस की,दोनों से इंसान मरते है। मानवता मरती आई है। आदिवासी मरते हैं। विचारों से जो क्रांति लाए, उसे ही क्रांतिकारी कहेंगे।
0 लोन वार्रंाटू को, क्या पुलिस का सही कांस्पेट है मानती हैं?
00 लोन वार्राटू पूरी तरह फजी कांस्पेट है। हैरानी वाली बात है कि,दंतेवाड़ा जिले में 400 माओवादी सरेंडर करते है फिर भी चार,चार एनकांउटर होता है। आखिर क्यों? दरअसल सरेंडर करने वाले किसान हैं, आदिवासी हैं। जब एक जिले में इतने माओवादी सरेंडर कर रहे है, तो सोचने वाली बात है कि पूरे बस्तर में आखिर कितने नक्सली होंगे? दंतेवाड़ा नक्सल मुक्त क्यों नहीं होता? पिछले दिनों राज्यपाल मेडम से यही सवाल की। उनके पास कोई जवाब नहीं था। जल,जमीन और जंगल उद्योगपतियों को देकर, सरकार जल,जमीन और जंगल की हत्या करा रही है।    
0 केन्द्र सरकार ने पाँंच बटालियन और दी है बस्तर को। इससे आदिवासियों का भला होगा क्या?
00 पाँच बटालियन देने से कैंप और बन जायेंगे। जब जब फोर्स की संख्या बढ़ी है, महिलाओं के साथ होने वाले अनाचार में इजाफा ही हुआ है। यहांँ माओवादियों से पत्रकार सुरक्षित नहीं है। आम आदमी सुरक्षित नहीं है। खुलेआम पत्रकारों को माओवादी धमका रहे हैं। सरकार दावे के साथ नहीं कह सकती कि वह लोगों को माओ से सुरक्षा मुहैया करा सकती है। हजारों कैप लगा लें,नक्सलवाद खत्म नहीं होगा। बातचीत करनी चाहिए।
0 पुलिस फजी मुकदमे क्यों बनाती है?
00 पुलिस आदिवासियों के खिलाफ फर्जी मुकदमे दर्ज कर उन्हें नक्सली बताती है, अपने नाम के लिए। अपने प्रमोशन के लिए। पैसे का खेल है। गाँव से किसानों,ग्रामीण आदिवासियों को पकड़ कर लाते हैं और उन्हें एक लाख, दो लाख का इनामी नक्सली बताते है। मार देने पर दस लाख का इनामी नक्सली हो जाता है। कोई आदिवासी विरोध करता है, तो उसे यूपीए कानून के तहत कार्रवाई का डर दिखाया जाता है। अपना स्टेटस बढ़ाने के लिए पुलिस फर्जी मुकदमेे गढ़ती है। बस्तर में हजारों लोगों के खिलाफ फर्जी मुकदमे दर्ज कर पुलिस उन्हें जेल में डाल दी। निर्मलक्का और उसके पति चन्द्रशेखर रेड्डी को नक्सली बताकर जेल में डाल दिया गया था। उसका पति पहले ही छूट गया था। लेकिन, निर्मलक्का 12 साल बाद निर्दोष जेल से छूटी। सवाल यह है कि, वह नक्सली थी, तो बाइज्जत बरी कैसे हो गई।
0 पुलिस वाले आदिवासी महिलाओं के साथ अनाचार करके,उन्हें माओवादी बताकर गोली क्यों मार देते है या फिर जेल में क्यों डाल देते हैं?
00 पुलिस आदिवासी महिलाओं के साथ रेप करती है। फिर उसे माओवादी बताकर गोली मार देती है, ताकि देशवासियों की उसके प्रति सहानुभूति न रहे। महिला को माओवादी बताकर, खुद का बचाव करती है पुलिस।  
0 नक्सलवाद खत्म कैसे होगा?
00 सरकार को चाहिए कि,वह बातचीत का रास्ता अपनाए। बातचीत उन आदिवासियों के साथ करे, जो दिन रात पुलिस के बीच रहता है। माओवादियों का सामना करता है। उसकी समस्या किससे है। उसकी समस्या क्या है? उसे सरकार समझे। फर्जी तरीके से नक्सली बताकर जेल में डाल देने वालों से बात करे। जल,जमीन और जंगल पर कब्जा करने वालों को, रोकने वालों से बातें करें। आदिवासियों की समस्या को जब तक दूर करने की सरकार नहीं सोचेगी,नक्सलवाद खत्म नहीं होने वाला। माओवादियों से बात करने के लिए भूपेश सरकार ने मना कर दिया है। वे कहते हैं, पहले नक्सली हथियार छोड़ें। ऐसे में कैसे बात होगी। बस्तर के जंगलों के भीतर जो रहते हैं, उनसे पूछें कि, उन्हें कैसा विकास चाहिए। गोली और लाठी से उनकी आवाज दबा दी जाती है। बातचीत से निश्चय ही नक्सलवाद खत्म होगा।
0 पुलिस की आंँखों में सोनी सोरी क्यों खटकती है?
00 सोनी सोरी खटकेगी क्यों नहीं। आदिवासी भाई बहनों के सुख दुख में उनके साथ खड़ी रहती है। उन पर होने वाले जुल्म,अत्याचार और बहनों के साथ होने वाली रेप की घटनाओं के खिलाफ कंधे से कंधा मिलाकर पुलिस की ज्यादती का विरोध करती है। उनके आँसुओं को अपना आंँसू समझती है। मेरी नस नस वाकिफ है, पुलिस के जुल्म से। मेरे ऊपर कैमिकल्स अटैक हुआ,मेरे गुप्तांग में कंकर पत्थर डाले गये,मारपीट की गई। मैं पुलिस के हर हथकंडे को जान गई हूॅ। पुलिस को लगता है कि, मैं आदिवासियों की नहीं, माओवादियों की मदद करती हूूॅ। जबकि ऐसा नहीं है। माओवादियों के साथ न थी और न रहूंगी। कुछ पुलिस वाले मुझे इज्जत भी देते हैं। उन्हें लगता है कि, मेरी लड़ाई आदिवासी भाई और बहनों के लिए है।