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Monday, July 25, 2022

स्त्री विमर्श की नई तपिश





0 उर्मिला मिश्रा
‘इश्क की हरी पत्तियांँ’ की कहानियांँ इश्क़ के उन रंगों से परिचय कराती है,जो दाम्पत्य जीवन के कैनवास के हिस्से बन गये हैं। जवाँं मन की तलहटी में ‘इश्क़ की हरी पत्तियाँ’ के बदलते रंग सवाल करते हैं, कि आखिर वो कौन सी वजह है, कि अब औरत का भी मन मांगे मोर..! बदलती मान्याताओं के चलते दाम्पत्य जीवन  में इश्क़ के कई पेंच हैं। स्त्री-पुरुष के संबंधों को  बहुत गहराई से वरिष्ठ पत्रकार रमेश कुमार ‘रिपु’ ने उकेरा है। बदलती सभ्यता के दौर में नई पीढ़ी के मन की भावनाओं का रंग बदल गया है,क्यों कि  मुहब्बत की जुबाँ बदल गई है। 

संग्रह की पन्द्रह कहानी अलग-अलग मूड की है। और स्त्री पात्र बोल्ड और वर्जना रहित हैं। क्यों कि वे मेट्रो सिटी की हैं,मगर संवेदनशील हैं। स्त्री-पुरुष के रिश्तों के दोनों कगारों की भंगिमा के साथ संवाद मन मोह लेते हैं। इश्क़-मुहब्बत के मामले में लगातार समाज में आ रहे बदलाव को रेखांकित करती कहानियांँ,हांँफती नहीं। कहानी स्त्री विमर्श के दायरे में है ,इसलिए यह कहानी संग्रह मूल्यांकन के लिए चुनौती से कम नहीं है।  

पहली कहानी ‘कितनी दूरियां’ में चाहत की ऐसी अभिव्यंजना है जो पढ़ते-पढ़ते सोचने को विवश कर देती है,कि क्या मुहब्बत का भी कोई मजहब होता है? या मुहब्बत खुद एक मजहब है..
! कहानी खत्म होते ही खुद ही सवाल छोड़ देती है,मन की भावनाओं से देह की कितनी दूरियाँं होती हैं..? इतनी,जैसे होंठ से लिपस्टिक। पांँवों से पायल और फूल से खुशबू! अपने से सात साल बड़ी मुस्लिम लड़की को हिन्दू लड़का उसे रिझाने,मनाने,और प्यार के प्रति उसकी सोच को बदलने कई जतन करता है। अपने टूटे प्यार को भूल कर इश्क की नई पत्तियां चुने। साझा संस्कृति की यह कहानी बताती है,स्त्री मन से ताकतवर हो तो मुहब्बत के लिए मजहब भी बदल सकती है। 

‘एक कतरा मुहब्बत’ बदलती शहरी सभ्यता में मुहब्बत की दास्तां है। युवा बेटी मांँ से किये गये वायदे पर,अपने पिता की पूर्व प्रेमिका को उनसे मिलवाती है। कहानी के कुछ संवाद दिल में जगह बना लेते हैं। ‘बहुत लोग जिन्दगी में लघुकथा की तरह आते हैं और जब जाते हैं, तो उपन्यास की दास्तांँ छोड़ जाते हैं।’ जब भी पत्नी से झगड़ा होता है,मर्दो को अपने पहले प्यार की बड़ी याद आती है।’’ 

‘राइट परसन,इश्क में खजुराहो होना,ज़िन्दगी की बैलेंस शीट,दूसरी मुहब्बत आदि कहानियों को पढ़ने से ऐसा लगता है,मानो कामदेव ने कागज पर संवाद लिखे हों। लिव इन रिलेशनशिप में रहने वाली लड़कियों के बड़े ख्वाब हैl 'बेशर्म दिल 'से पता चलता है
लीव इन रिलेशन शिप वाली लड़कियों की जिन्दगी में ऐसा वक्त आता है,जब उनके पास सिर्फ तन्हाई रह जाती है। अपने ब्वाॅय फ्रेंड को अपनी सहेली के पास भेज देती है। ताकि उसकी सहेली का दिल उस पर आ जाये और वह किसी और पर डोरे डाल सके। ‘मचलती लहर’ इश्क की दुनिया के रहस्मयी संसार की कथा है। जहांँ महबूबा चाहती है, कि उसके पति का मर्डर, उसका प्रेमी कर दे,फिर सुकून से मुहब्बत की शैपेन प्रेमी के साथ पी सके। यह एक थ्रीलर कहानी है। जिसमें रोमांच गजब का है।   

‘दूसरी मुहब्बत’ जैसी औरत समय रहते खुद को नहीं बदलती, तो उनके दाम्पत्य जीवन में इश्क़ का रंग बेनूर हो जाता है। ‘मन का सावन’ दरकती वफ़ाओं के दंश की ऐसी कहानी है,जिसमें युवती को कैंसर होने पर उसका भ्रम टूटता है,कि उसका पति उस पर अपनी जान लुटाता है। बेस्ट फ्रेंड उसका इलाज कराता है। तब उसे माँ की बातों पर यकीं होता है, कि बेस्ट फ्रेंड लाइफ पाटर्नर हों,तो जिन्दगी में शिकायत का मौका नहीं मिलता।  

यदि पति बदल जाये तो पत्नी को कितना बदल जाना चाहिए..? दो दिलों में बढ़ते दरार की अनोखी कहानी है ‘प्यार का रेश्मी धागा’। लेखक ने कहानी को जो भाषा दी है,वह पति और पत्नी की भावनाओ को स्पर्श कराता है। ‘इश्क की हरी पत्तियांँ’ में एक औरत दूसरी औरत को माँ बनने के लिए जो रास्ता सुझाती है,वह पुरुष सत्ता के समक्ष यक्ष प्रश्न है। कोख औरत की है, तो उसकी कोख में किसका बच्चा पलेगा, क्या यह फैसला लेने का हक उसे नहीं मिलना चाहिए..?  

बदलते समय में मेट्रो सिटी की नई सभ्यता की तस्वीर ‘फिर रोये रंग’ में है। गाँव की मासूम लड़की को शातिर युवक अभिनेत्री बनवा देने का सब्ज बाग दिखाकर उसे मुंबई में लाकर न्यूड माॅडल बना देता है। संयोग से उसका सामना अपने प्रेमी से न्यूड माॅडल के रूप में होता है। दरअसल मुहब्बत में कुछ सांसे जिंदा लाश हो जाती हैं। और ऐसी लाशों की गिनती कभी इंसानों में नहीं होती। रंगो की भाषा में संवाद,दिल में उतर जाते हैं। मुहब्बत है तो दुनिया है। मंगर एक सच यह भी है,कि मुहब्बत न होती, तो कुछ भी न होता। 

कहानी की लिखावट और बुनावट उन पाठकों को ज्यादा पसंद आयेगी,जो स्त्री विमर्श की नई तपिश और नई भाषा के दीवाने हैं। 
लेखक- रमेश कुमार ‘रिपु’
कीमत - 228 रुपये
प्रकाशक - प्रलेक प्रकाशन, मुंबई

 

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बीजेपी की गुगली से उद्धव बोल्ड







"बाला साहेब ठाकरे के समय हिन्दुत्व का चेहरा शिवसेना की पहचान थी। छप्पन साल की उस शिवसेना की तस्वीर बीजेपी ने एक झटके में बदल दी। पूरी ताकत के साथ बीजेपी शिंदे के पीछे खड़ी है,ताकि महाराष्ट्र में हर जगह भगवा झंडा लहरा सके और शिवसेना खत्म हो जाये। ऐसे में मातुश्री की पहचान क्या होगी,स्वयं उद्धव ठाकरे भी नहीं जानते।"


0 रमेश कुमार ‘रिपु’

  ‘एक थे उद्धव और एक थी शिवसेना’। महाराष्ट्र के सियासी पर्दे पर इन दिनों यही फिल्म चल रही है। इस फिल्म के बनने की शुरूआत तभी हो गई थी जब उद्वव ठाकरे ने बीजेपी और शिवसेना के पिछले तैंतीस सालांे के सियासी रिश्ते के चराग को मातुश्री में अमित शाह के सामने हमेशा-हमेशा के लिए बुझा दिया। दरअसल अमित शाह नौ नवम्बर 2019 को मातुश्री गये थे उद्धव ठाकरे से मिलने नई सरकार के गठन के मसौदे पर बात करने। लेकिन उद्धव ने सत्ता के मोह में कांग्रेस और एनसीपी से गठबंधन कर मुख्यमंत्री बन गये। उन्हें लगा वे जो चाहते थे, बगैर बीजेपी के भी पा गये। उद्वव ठाकरे मुख्यमंत्री बन गये लेकिन शिवसेना की हिन्दू वादी छवि पर लगातार कालिख मलते गये। बाला साहेब ठाकरे की शिवसेना महाराष्ट्र विकास अगाड़ी पार्टी बन गई। शिवसेना के शाखा प्रमुख रहे एकनाथ शिंदे के मन को रह-रह कर बाला साहेब ठाकरे की बात पिंच करती थी। 
बात सन् 2012 की विजयदशमी की है। उस समय बाल साहब ठाकरे का स्वास्थ्य ठीक नहीं था,इसलिए वे शिवाजी पार्क नहीं गये। और मातुश्री से वीडियो कांन्फ्रेस के जरिये शिवसेना को संबोधित किया। उन्होंने कहा,‘‘ मैं उद्धव और आदित्य ठाकरे को कभी आप पर थोपूंगा नहीं। यदि कभी लगे कि मैं थोप रहा हूँ,तो शिवसेना छोड़ देना। बाला साहेब की कही बात का शिवसेना के 16 विधायक सहित शिंदे ने अनुशरण किया।  
शिवसेना के विधायक टूट कर शिंदे के सियासी छाते तले आ गये। और महाराष्ट्र विकास अगाड़ी पार्टी की सरकार का क्लामेक्स खत्म हो गया। ऐसे में यह सवाल उठता है कि शिवसेना क्या बिना ठाकरे परिवार के चल सकती है या रहेगी? क्या उद्वव महाराष्ट्र की राजनीति में अल्पविराम हो जायेंगे? मातुश्री की पहचान क्या होगी? क्यों कि विधान सभा में बीजेपी ने अपना अध्यक्ष राहुल नार्वेकर को बनाकर उद्वव ठाकरे को शह देकर मात दे दी। क्या यह मान लिया जाये कि महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे का सियासी चेप्टर खत्म करने के मकसद से सबसे बड़ी पार्टी होने के बाद भी बीजेपी ने देवेन्द्र  फड़णवीस के बजाय एकनाथ शिंद को मुख्यमंत्री बनाया। शिंदे को मुख्यमंत्री बनाना यानी महाराष्ट्र सरकार दिल्ली के रिमोट पर चलेगी। जिसके हाथ में सत्ता होती है,उसी के पास पुलिस,फिल्म जगत,निवेशक,मजदूर यूनियन,विभिन्न कामगार, मुंबई और पश्चिमी मुंबई, जो कि आर्थिक नगरी है,आदि पर नियंत्रण होता है। देश की जीडीपी में महाराष्ट्र का योगदान 14.2 फीसदी है। महाराष्ट्र में बीजेपी अपनी सियासी जमीन का विस्तार अभी तक शिवसेना के साथ मिलकर करती आई है। और शिवसेना अपनी सियासी जमीन खोती गई। मातुश्री से चलने वाली सरकार के हाथ में अब न उसके शिवसेना के विधायक हैं और न ही सत्ता है।
मराठा मानुष की बात करने वाले शरद पवार की सियासी ताकत भी छिन गई। उनके सामने दिक्कत है अपनी बेटी सुप्रिया सुले को कैसे खड़ा करेंगे। उद्धव ठाकरे के सामने   विकट समस्या है। शिवसेना के विधायकों में फूट के बाद सांसद और पदाधिकारी शिंदे के साथ चले गये तो शिवसेना को भारी नुकसान होगा। फिर महाराष्ट्र में बीजेपी इकलौती हिन्दुत्व पार्टी हो जायेगी। देर सबेर यही होना है। इसलिए कि एनसीपी के दो विधायक अनिल देशमुख और नवाब मलिक ई.डी. के चलते जेल में हैं। शिवसेना के संजय राउत से पूछताछ चल ही रही है। ई.डी. का चक्र उद्वव ठाकरे तक भी जा सकता है। प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ने महाराष्ट्र के विधान सभा चुनाव में कहा था,शिवसेना वसूली पार्टी है। शिवसेना का आर्थिक स्त्रोत बीएमसी है। बीएमसी में बीजेपी कब्जा करना चाहेगी। इसलिए कि बीएमसी का अकेले का बजट 46 हजार करोड़ रुपये है। जो किसी भी छोटे राज्य के बजट से कहीं अधिक है। 
एकनाथ शिदें के जरिये बीजेपी उद्वव ठाकरे की शिवसेना को खत्म करने की शुरूआत कर दी है। विधान सभा में शिंदे को बहुमत मिलना और बीजेपी के राहुल नार्वेकर का विधान सभा अध्यक्ष  बनना। नार्वेकर ने विधानसभा में शिवसेना विधायक दल के नेता और चीफ व्हिप पद पर अजय चैधरी और सुनील प्रभु की नियुक्ति रद्द कर दी है। यानी सदन में अब शिवसेना विधायक दल के नेता मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और चीफ व्हिप भरत गोगावले होंगे। शिवसेना ने नई अर्जी दायर करके सुप्रीम कोर्ट से मांग की है, 16 बागी विधायकों को वोट देने से रोका जाए। हालांकि इस पर 11 जुलाई को सुनवाई होगी। कोर्ट का फैसला बागी विधायकों के खिलाफ आने पर सरकार का पासा पलट सकता है।   
उद्धव मुख्यमंत्री बनने के बाद शिवसेना की हिन्दूवादी छवि को दरकिनार कर कांग्रेस की भाषा बोलने लगे। कांग्रेस की पसंद की राजनीति करने लगे। शिवसेना के विधायकों और पदाधिकारियों को रास नहीं आ रहा था। सत्ता के मद में उद्धव शिवसेना के लिए कालिदास बन गये थे। उद्धव ठाकरे के सामने सबसे बड़ी समस्या है किसी तरह बाला साहेब ठाकरे की शिवसेना को बचाना। जिस शिवसेना के दम पर उद्धव महाराष्ट्र में अपनी राजनीति करते थे और बीजेपी के बड़े लीडर को अपने मातुश्री में आने के लिए विवश करते आए हैं,वह ताकत अमितशाह ने शिवसेना में फूट डालकर उनसे छीन ली।    
यह कहना गलत न होगा कि,शिवसेना में अब बालसाहब ठाकरे युग का अवसान हो चुका है। इस युग की समाप्ति की घोषणा भले ही औपचारिक रूप न की गई हो लेकिन एकनाथ शिंदे ही नहीं शिवसेना का हर विधायक,हर कार्यकत्र्ता मानता है, कि उद्धव ठाकरे की वजह से बाला साहेब ठाकरे वाली शिवसेना का चेहरा बदल गया है। और वह शिवसेना कांग्रेस हो गई है। उसकी भाषा भी बदल जाने की वजह से शिवसेना के विधायकों की पहचान पर सवालिया निशान लगने लगा। क्यों कि काग्रेस की इमेज सेक्यूलर की है। मातुश्री के बाहर शिवसेना के लोग क्या बातें कर रहे हैं,अपने काकस में घिरे उद्वव कभी ध्यान नहीं दिया। उद्धव ठाकरे सी.एम. बनने के बाद शिवसेना के विधायकों,सांसदों को तवज्जो देना बंद कर दिये थे।  
राज्य सभा और विधान परिषद के चुनाव के परिणाम से उद्धव नहीं समझ पाये कि उनके और शिवसेना विधायकों के बीच दूरियां बढ गई है। उनकी सरकार पर संकट के बादल मंडरा सकते हैं। राज्य सभा के चुनाव में बीजेपी के तीन सदस्य जीत गये। जबकि बीजेपी के पास निर्दलियों को मिलाकर 113 विधायक होते हैं। फिर भी उसे 123 वोट मिले। और विधान परिषद के चुनाव में 132 वोट मिले।  जाहिर सी बात है कि बीजेपी ने राज्यसभा चुनाव में सत्तापक्ष के 10 विधायकों को तोड़ा था। वही एमएलसी चुनाव में बीजेपी को 134 वोट मिले। यानी बीजेपी के साथ अब तक सत्तापक्ष के 21 विधायक आ गए थे।
सवाल यह है कि क्या अब महाराष्ट्र की राजनीति में उद्धव ठाकरे शिवसेना के ब्रांड एम्बेसेडर नहीं रह गये? इतिहास के पन्ने बताते हैं कि सन् 2005 में नारायण राने को बाल  ठाकरे शिवसेना में लाना चाहते थे। जब इसकी खबर उद्वव को लगी तो उन्होंने कहा,यदि नारायण राने को शिवसेना में लायेंगे तो मै और मेरी पत्नी रश्मी मातुश्री छोड़कर चले जायेंगे। बाल साहब ठाकरे अपने बेटे की जिद के आगे झुक गये। तब नारायण राने ने कहा था, उद्धव बहुत अच्छे आदमी हैं,लेकिन नेतृत्व के रूप में अच्छे नहीं है। उनके नेतृत्व में शिवसेना का कोई भविष्य नहीं है। यानी राने ने उद्धव के बारे में जो बात कही थी,वो सही कही थी। उद्धव के प्रति शिवसेना के जिन लोगों का जुड़ाव था,वो भी खत्म हो गया।   एक थी उद्धव की शिवसेना,अब कहना पड़ रहा है।  
 लेखक - स्वतंत्र पत्रकार है

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नफरत का कारखाना बंद करो

0  रमेश कुमार 'रिपु'
         राजनीति का धर्म होना चाहिए,ना कि धर्म की राजनीति। धर्म की राजनीति को रबड़ की तरह खींच कर अपनी टीआरपी बढ़ाने का खेल जब भी होता है,उन्माद की आंधी पर बवाल मचता है। इन दिनों में देश में यही हो रहा है। दुश्वारियां बढ़ती जा रही है।  न्यू इंडिया में लगता है, मजहब ही सीखाता है आपस में बैर करना। अब बैर करने के नायाब तरीके इजाद हो रहे हैं। अजमेर शरीफ की दरगाह में खाविंद हैं सलमान चिश्ती। जबकि ये हिस्ट्री शीटर हैं। इनके खिलाफ कई गंभीर मामले दर्ज हैं। उन्होंने कहा, जो नूपुर का सिर काटकर लायेगा उसके नाम अपना मकान कर दूंगा। जाहिर सी बात है कि उदयपुर में जिहादी शैली की हत्या का जो खौफनाक चेहरा देखने को मिला है,उसकी तपिश को बढ़ाने के लिए सलमान चिश्ती जैसे लोग समाज के लिए चार सौ चालीस वाॅट के सवाल हैं। जिहादी सोच जहरीली है। समाज और देश के हित में नहीं है। वहीं पुलिस का काम है समाज में वैमनस्य की आग भड़ाकाने वालों के खिलाफ कार्रवाई करना। लेकिन सलमान चिश्ती को  पुलिस  ने सलाह दी कि,कह दो शराब के नशे में ऐसा कह दिया। हैरानी होती है,जो व्यक्ति गंभीर मामलों का आरोपी है,उसे जेल में डालने की बजाय पुलिस उसे बचाने मे लगी हे। तो क्या यह मान लिया जायेेेे कि नफरत का रायता फैलाने में पुलिस,नेता और समाज को बाँटने वाले लोग आगे-आगे हैं..! 

पाकिस्तान के मौलाना इंजीनिययर मोहम्मद अली नूपुर मामले में कहते हैं,पहला मुजरिम तस्लीम रहमानी है। पूरे मामले में नूपुर को दोषी ठहराया जा रहा है,वहीं मुस्लिम पैनलिस्ट तस्लीम अहमद रहमानी को लेकर कोई कुछ नहीं कह रहा है। जबकि तस्लीम अहमद रहमानी ने नूपुर को भड़काया। सवाल का उन्होंने जवाब दिया। सवाल यह है कि नूपुर दोषी है तो फिर तस्लीम रहमानी भी दोषी क्यों नहीं है? जो नुपूर को उद्वेलित कर रहे थे। ज्ञानवापी मामले में बहस के दौरान नूपुर शर्मा ने वहीं कहा,जो हदीस में लिखा है। इससे पहले भी जाकिर नाइक यही बात कह चुके हैं। ऐसे में मुसलमानों को नागवार नहीं गुजरनी चाहिए। 

वैसे किसी भी धर्म का अनादर नहीं करना चाहिए। साथ ही कोर्ट में विचाराधीन मामले पर टी.वी.पर बहस नहीं होनी चाहिए। कोर्ट कभी भी भावनाओं में बहकर फैसला नहीं सुनाता। लेकिन नूपुर के मामले में जज साहेबान की नेताओं जैसी टिप्पणी ने सबका ध्यान अपनी ओर खींचा। नूपुर के खिलाफ चार्ज लगा नहीं। कोई गवाही हुई नहीं हुई। कोर्ट में कोई साक्ष्य पेश नहीं हुआ और उदयपुर में मामले के लिए नूपुर कैसे दोषी है,जज साहेबान नहीं बताये। विभिन्न राज्यों में दायर मामले को दिल्ली की किसी अदालत में ट्रांसफर करने की याचिका नूपुर ने दायर की थी। सुप्रीम कोर्ट को उनकी याचिका स्वीकार या खारिज करने पर फैसला देना था। सुप्रीम कोर्ट ने नूपुर की याचिका पर लिखित में अपनी टिप्पणी का जिक्र नहीं किया है। ऐसा पहली बार हुआ। इसीलिनए देश के एक सैकड़ा से अधिक गणमान्य नागरिकों ने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर नूपुर मामले में कही गई बात को वापस लेने की मांग की है।  

फ्रांस में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पाठ पढ़ाते वक्त छात्रों को मोहम्मद साहब का कार्टुन टीचर के दिखाने पर एक आतंकी ने उनकी हत्या कर दी। उन्हें श्रद्धांजलि देते वक्त उनके घर के बाहर मोहम्मद साहब के कई कार्टुन सरकार की तरफ से लगवा दिये गये थे। बात 13 नवम्बर 2015 में फ्रांस की है। पैगम्बर मोहम्मद का कार्टुन छापे जाने पर इस्लाम के नाम पर 137 बेगुनाहों को आतंकियों ने मार दिया था। हमलावर में एक जिंदा था,जिसे सजा हुई, उदयपुर की जिहादी शैली की हत्या के ठीक एक दिन बाद। जिहादी हमले भारत में होते आए हैं। 26/11 का हमला सबसे अधिक भयावह था। कश्मीर में जेहादी आतंकवाद में बरसों से जानें जा रही है। कन्हैया की हत्या उसी तरह हुई है,जिस तरह इस्लामी देशों में होता है। ऐसे मामले में राजनीति नहीं होनी चाहिए। सही कदम उठाना जरूरी है। ताकि नफरत के कारखाने बंद हो सकें। 

हिन्दू और मुसलमानों के बीच तनाव की अंगीठी जलाने और सांप्रदायिक अशांति फैलाने वाले हर राज्य में दिखते हैं। कर्नाटक में छात्रा का हिजाब पहनकर स्कूल जाने का मामला हो,या हिन्दू मेले में मुसलमानों का दुकान लगाने का मामला हो। विवाद की दरारें बहुत बडी है। मोहम्मद अखलाक की लीचिंग मामला 2016 में हुआ लेकिन,गोरक्षको की संख्या इतनी ज्यादा बढ़ गई कि प्रधान मंत्री को कहना पड़ा कि गुंडे लोग गोरक्षक बन गये हैं। बुचड़खाना चलना मुश्किल हो गया। लव जिहाद को रोकने के लिए योगी ने उत्तर प्रदेश में एंटी रोमियो स्क्वाड बनाया। इनका काम हिन्दू लड़कियो के साथ मुसलिम लड़कों को पकड़ना। शादी शुदा लोगों के घर में, दिमाग में लव जिहाद घुस गया। द कश्मीर फाइल्स फिल्म ने पुराने जख्मों को नया कर दिया। कश्मीरी पंडितों के दर्द को मरहम मिलने की बजाय नफ़रत का रायता फैलाया जाने लगा। सिनेमाघरों से बाहर सांप्रदायिक नारे और मुसलमानों से बदला लेने की बातें कश्मीरी पंडितों की तरफ से आने लगी। 

हेट स्पीच और बयान से अपनी टीआरपी बढ़ाने वालों पर सख्त कार्रवाई नहीं होने की वजह से हिन्दू और मुसलमानों के बीच दरारें बढ़ी है। बिग बॉस फेम श्वेता तिवारी ने भोपाल में कहा, मेरी ब्रा का साइज भगवान ले रहे हैं। फिल्म मेकर लीना मणिमेकलाई कनाडा में एक डाॅक्युमेंट्री बनाई। जिसके एक पोस्टर में मांँ काली के रूप में एक महिला टोरेंटो की सड़क पर सिगरेट पी रही हैं। और हाथ में एलजीबीटी का पोस्टर लिए हुए है। एक दूसरा पोस्टर ट्वीट किया,जिसमें शिव पार्वती सिगरेट पी रहे हैं। काली के प्रति लोगों में आस्था है। लेकिन किसी के धर्म की आस्था को सेकुलर सोच के साथ नहीं जोड़ा जाना चाहिए। परंपरायें और मान्यताओं को मानना या मानना अलग बात है। वहीं टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा कहती हैं,मेरे लिए काली मांस खाने वाली और शराब स्वीकार करने वाली देवी हैं। जबकि काली शक्ति की देवी के रूप में पूजी जाती हैं। एक समय ममता बनर्जी नूपुर को गिरफ्तार करने की बात कह रही थीं,अब महुआ के बयान ने उनकी परेशानी बढ़ा दी है। क्यों कि बंगाल में बीजेपी मोइत्रा के गिरफ्तारी की मांग कर रही है। शशिथरूर ने महुआ का समर्थन किया। मणिशंकर ने कहा महुआ पूरा देश तुम्हारे साथ है। दरअसल सनातन धर्म के बारे में कांग्रेस की विचार धारा है,हिन्दू का विरोध करना। राहुल,कमलनाथ गेरूआ वस्त्र पहने मंदिर जाते देखे गये हैं,लेकिन वे सिर्फ चुनाव के वक्त। मिर्चीबाबा महा मंडेलेश्वर ने 8 जुलाई 2022 को कहा, हिन्दू देवी देवताओं पर कुठाराघात करने वालों के सिर काटकर लाने वाले को बीस लाख रुपये आश्रम की तरफ से दिया जायेगा। मोदी की आम सभा में जय श्री राम के नारे से ममता बनर्जी को एतराज था। उद्धव ठाकरे को हनुमान चालीसा के पाठ से परहेज था। वैसे हेट स्पीच कंट्रोवर्शियल स्टेटमेंट देने वालों की फेहरिस्त लंबी है। ऐसे मामलों में आम आदमी की गिरफ्तारी तो हो जाती है,लेकिन रसूखदारों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होती।  

बहरहाल कन्हैया की हत्या से जाहिर है कि कट्टरपंथी इस्लामिक सोच भारत में कदम रख दिया है। हेट स्पीच और बयान से अपनी टीआरपी बढ़ाने वालों पर सख्त कार्रवाई नहीं होने की वजह से धार्मिक अस्थाओं के साथ खिलवाड़ करने वालों ने हिन्दू और मुसलमानों के बीच दरारें बढ़ा दी है।
0 मो. 7974304532




 

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‘गठबंधन’ वालों को गटक गई बीजेपी



केन्द्र की राजनीति में 2014 के बाद से गठबंधन का दौर खत्म हो गया। मगर राज्यों में यह सिलसिला कायम है। भाजपा प्रदेश में जिस पार्टी से गठबंधन किया आगे चलकर उसे गटक गई। यही वजह है कि कई राज्यों में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बन गई है।  

0 रमेश कुमार‘रिपु’






देश में भाजपा ने साल 2014 से केन्द्र में गठबंधन की सरकार का दौर खत्म कर दिया। जबकि राज्यों में गठबंधन की सरकारें अब भी हैं। जिस पार्टी से भाजपा ने गठबंधन किया आगे चलकर उसे गटक गई। दीगर पार्टियांँ गठबंधन सरकार बनाने के लिए करती आई हैं,लेकिन बीजेपी ने अपनी सियासी जमीन के विस्तार के लिए सियासी दोस्त बनाये। वो चाहे उत्तर प्रदेश में मायावती हों या फिर महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे। दोनों जगह आज बीजेपी बड़ी पार्टी है।  

सियासी इतिहास के मुताबिक गठबंधन की पहली सरकार केन्द्र में (1977-79) जनता पार्टी  थी। इसमें कई घटक दल थे। आगे चलकर इनका विलय हो गया और एक नई पार्टी बनी। 1989 में कई पार्टियों को मिलाकर जनता दल बना। सीटों को लेकर बीजेपी और लेफ्ट से समझौता हुआ। सरकार बनने पर वी.पी सिंह प्रधान मंत्री बने। यानी गठबंधन वाली सरकार का चलन 1989 से शुरू हुआ। सन् 1989 से 1999 के बीच आठ सरकारें बनीं। यह वह समय था, जब कांग्रेस की कमजोरी का फायदा छोटी पार्टियों ने उठाया सरकार बनाने में। नब्बे के दशक से गठबंधन वाली सरकारें बनती रही। 1989, 1990, 1996, 1997, 1998, 1999 और 2004 से 2009 के बीच कई पार्टियों ने गठबंधन सरकारें बनाईं।  

साल 2014 में एक नई राजनीति का उदय हुआ। मोदी के नेतृत्व में बीजेपी को 282 सीटें मिली। भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) ने 336 सीटें पाई। नरेंद्र मोदी ने 26 मई 2014 को प्रधान मंत्री की शपथ ली,तब बीजेपी और उसके गठबंधन दल की केवल सात प्रदेशों में ही सत्ता थी। आज परिस्थियां बदल गई है। अनके राज्यों में बीजेपी की सरकार है। देखा जाये तो बीजेपी ने जिन पार्टियों से सरकार बनाने के लिए गठबंधन किया,आगे चलकर उन्ही पार्टियों को लील गई। राज्य में ऐसी पार्टियांँ हाशिये पर पहुंँच गई । गठबंधन के महत्व को बीजेपी ने समझा और उसे पार्टी के विस्तार में सीढ़ी की तरह इस्तेमाल किया।

सत्ता में आने के बाद भाजपा अपने लिए दो काल्पनिक सियासी दुश्मन गढ़ा। एक था वामपंथ,जो अब ढूंढो तो जानें की स्थिति में है। दूसरा कांग्रेस मुक्त भारत। 2014 के बाद बीजेपी को जो कांग्रेस मिली,वो ठीक से विपक्ष भी नहीं है। आम चुनाव के बाद से 2014 तक में कांग्रेस 60 चुनाव हारी। यह सिलसिला थम नहीं रहा है। बात करते हैं बीजेपी ने गठबंधन करके किन पार्टियों को गर्त में पहुंँचाया।

उत्तर प्रदेश में बीजेपी ने बीएसपी सुप्रीमो मायावती को तीन बार मुख्यमंत्री बनाया। 1995 की सरकार में बीजेपी शामिल नहीं हुई। बाद में दो बार शामिल हुई। तब बीजेपी को काफी सुनने को मिला था। बीजेपी की ओर से मैसेज गया कि हमने दलित को मुख्यमंत्री बनाया। इससे बीजेपी को लाभ हुआ। उसने बीएसपी के वोट बैंक में जगह बनाई। आज बीएसपी यूपी में हाशिये पर है।और बीजेपी लगातार दो बार से सरकार में है।

राजस्थान में जनता पार्टी के नेता नाथुराम मिर्घा थे। बाद में सीटों का समझौता जद से हुआ। बीजेपी को राजपूत और अन्य जातियों का वोट मिलता था। बाद में भैरोसिंह शेखावत ने प्रत्येक जाट परिवार से एक सदस्य बीजेपी के लिए मांगा। धीरे-धीरे बीजेपी को राजस्थान में खड़ा कियां। उन्ही की वजह से आज राजस्थान मे बीजेपी दमखम से खड़ी है। कई बार सरकार भी बनी। यहांँ वैसे कभी भी एक पार्टी की सरकार दोबारा नहीं बनती।

बीजेपी हर हाल में दक्षिण भारत की राजनीति में अपना दखल चाहती थी। इसलिए कर्नाटक में जेडीएस से गठबंधन करके 2008 में सरकार बनाई। उस समय तक जेडीएस बीजेपी से बड़ी पार्टी हुआ करती थी। साल 2018 के चुनाव में 224 सीटों वाली कर्नाटक विधान सभा में बीजेपी को 104 सीटें मिली। लेकिन जेडीएस-कांग्रेस ने गठबंधन करके 120 सीटों के साथ सरकार बना ली। मगर 2019 में खेला हो गया। जेडीएस-कांग्रेस गठबंधन वाली सरकार के 16 विधायक बीजेपी के संपर्क में आ गये। चौदह माह पुरानी जेडीएस-कांग्रेस सरकार गिर गई। आज बीजेपी की सरकार है। मध्यप्रदेश में भी यही हुआ। साल 2022 में कांग्रेस नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस छोड़ दी और 22 विधायकों ने विधानसभा से इस्तीफा दे दिया। जिससे कमलनाथ सरकार गिर गई। अब यहांँ बीजेपी की सरकार है। 

गोवा में बीजेपी खड़ी होने के लिए महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी के साथ गठबंधन किया। बीजेपी व्यवस्थित तरीके से अपने पंख फैलाये। जिससे साल 2017 के चुनाव में बीजेपी को 13 सीटें मिली,एमजीपी,जीएफपी और दो निर्दलीय विधायकों के सहारे सरकार बना ली थी। साल 2022 के चुनाव में बीजेपी की सीट बढ़कर 20 हो गई। बहुमत से एक सीट दूर रहने पर वह 3 निर्दलीय और महाराष्ट्रवादी गोमांतक(एमजीपी) के 2 विधायकों के समर्थन से सरकार बना ली। यहां अब गोमांतक जूनियर पार्टी है।

हरियाणा में बीजेपी कभी तीसरे नम्बर की पार्टी थी। यहाँ राजनीति जाट और गैर.जाट के बीच बंटी हुई है। कांग्रेस से अलग होकर हरियाणा विकास पार्टी के सुप्रीमों चैधरी बंसी लाल से बीजेपी ने हाथ मिला कर सरकार बनाई। फिर धीरे-धीरे उसने बंसी लाल के अलावा इंडियन लोक दल,गैर जाट, गैर पंजाबी पार्टी,हरियाणा जनहित पार्टी में सुनियोजित तरीके से अपनी पकड़ मजबूत की। बीजेपी ने 2014 में भजन लाल के बेटे कुलदीप बिश्नोई को मुख्यमंत्री बनाने के अपने वादे से मुकर गई। बिश्नोई ने हड़बड़ी में बीजेपी से गठबंधन तोड़ दिया। साल 2019 के चुनाव में 90 सदस्यीय विधान सभा में बीजेपी के 40 और जननायक जनता पार्टी(जजपा) के 10 और अन्य सहयोगियों के दम पर बीजेपी सरकार में है और 31 सदस्यों वाली कांग्रेस विपक्षी पार्टी है।

2014 के आम चुनाव में बीजेपी ने जब नरेंद्र मोदी को चुनाव प्रचार कमेटी का प्रमुख बनाया तो जेडीयू ने भाजपा के साथ 17 साल पुराने गठबंधन को खत्म कर लिया। 2014 के लोकसभा में मिली असफलता के बाद जेडीयू और आरजेडी ने कांग्रेस के साथ मिलकर 2015 में बिहार विधानसभा चुनाव लड़ा। सरकार भी बना ली। लेकिन 26 जुलाई 2017 को नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा दे कर बीस महीने पुराने महागठबंधन से पार्टी को अलग कर लिया। अगले ही दिन उन्होंने बीजेपी के सहयोग से बिहार में सरकार बना ली। बिहार में लालू यादव और नीतीश कुमार के बीच टूटी दोस्ती का फायदा बीजेपी ने उठाया। साल 2020 के विधानसभा चुनाव में जेडीयू से 30 सीटें अधिक जीतने के बावजूद बीजेपी ने नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बने रहने दिया। 

असम में भगवा राजनीति के फैलाव के लिए बीजेपी ने असमगढ़ परिषद पार्टी (एजीपी) से गठबंधन किया। यहां दो बार सरकार बनाई। आज बीजेपी पर निर्भर है एजीपी। जम्मू कश्मीर में पीडीपी के साथ मिलकर बीजेपी ने सरकार बनाई तो उसकी बड़ी किरकिरी हुई। इसलिए कि महबूबा मुफ्ती अलगाववाद की राजनीति करती हैं। लेकिन बीजेपी ने अपना जनाधार बढ़ाने समझौता किया। पीडीपी के प्रभावशाली नेता पार्टी को छोड़ कर चले गये। कांग्रेस का जनाधार खिसक गया है। पीडीपी का प्रभाव भी सीमित हो गया है। 

महाराष्ट्र में बीजेपी से शिवसेना का 1989 से समझौता है। मगर 2014 में बात नहीं बनी। बीजेपी 282 सीटों पर चुनाव लड़ कर 122 सीट जीती। 2019 में शिवसेना को 56 और बीजेपी को 106 सीट मिली। यानी ठाकरे परिवार की पार्टी को बीजेपी निगल गई। देर सबरे झारखंड में भी बदलाव हो सकता है। ओड़िसा,पश्चिम बंगाल,पंजाब और तमिलनाडु में स्थानीय नेतृत्व में कमी के चलते गेरूआई राजनीति की पताका नहीं फहरी। मगर सियासी प्रयास जारी है।

 

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Thursday, May 26, 2022

जंगल से जंगली बर्ताव




सरकार ने तय कर लिया है कि जंगल को जंगल नहीं रहने देंगे। इसलिए हसदेव अरण्य क्षे़त्र में कोयला के लिए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के आदेश को ठेगा दिखाते हुए पाँच लाख हरे पेड़ों की हत्या की अनुमति दे दी।
0 रमेश कुमार ‘रिपु’









                जंगल है तो हरियाली है। हरियाली है तो पानी है। पानी है तो जीवन है। जीवन है तो राष्ट्र है। मगर सरकार हजारों आदिवासियों की जिन्दगी और जानवरों की जान को नज़र अंदाज कर जंगल के साथ जंगली बर्ताव कर रही है। धड़ल्ले से नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के आदेश को ठेगा दिखा कर राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की बात मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने मान ली। और राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड कंपनी जो कि अडानी समूह की है,उसे छत्तीसगढ़ सरकार ने परसा ईस्ट केते बासन खदान और परसा खदान के खनन की अनुमति दे दी है। इसमें 4 लाख 50 हजार पेड़ काटे जाएंगे। इससे हाथियों और इंसानों के बीच संघर्ष बढ़ेगा। कोयला खदान शुरू होने पर बांगो परियोजना पर खतरे की आशंका है। हसदेव नदी में जो पानी आता है,वह इसी जंगल और पहाड़ से होकर आता है। इसी के दम पर बांगो परियोजना संचालित है। छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य एवं ग्रामीण विकास मंत्री टीएस सिंहदेव मानते हैं,कि हसदेव के बचाव के लिए ‘नो गो एरिया’ ही एकमात्र तरीका है।
दरअसल विकास की अवधारणा पर जोर देने वाली सरकार प्राकृतिक संसाधनों पर अपना हक़ समझती है। इसलिए छत्तीसगढ़ सरकार ने केन्द्र सरकार के समक्ष अपना परिवाद भी नहीं भेजी। वैसे कई मामले में छत्तीसगढ़ सरकार का केन्द्र सरकार से तनातनी रहती है। इतना ही नहीं कांग्रेस अडाणी समूह का हमेशा विरोध करती है। जाहिर सी बात है कि भूपेश सरकार की इस मामले में मौन सहमति है। जबकि सात महीने पहले हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति के लोग सरगुजा, कोरबा और सूरजपुर जिले से पैदल चलकर राजधानी रायपुर में मुख्यमंत्री भूपेश से मिले थे। समिति के अध्यक्ष उर्मेश्वर सिंह आर्मो ने  मुख्यमंत्री को याद दिलाया,कि 2015 में राहुल गांधी मदनपुर आये थे। उन्होंने कहा था, इस क्षेत्र को बचाने का संघर्ष कर रहे हैं, तो हम आपके साथ खड़े हैं। मुख्यमंत्री ने भरोसा दिलाया कि गांँव और जंगल को उजड़ने नहीं देंगे। ग्राम सभा के फर्जी प्रस्ताव से खनन स्वीकृति पाने के आरोपों की भी जाँंच की बात कही थी। अब अडानी के पक्ष में फर्जी ग्रामसभा करके कोल ब्लॉक की स्वीकृति दी जा रही है। जाहिर सी बात है 841.538 हेक्टेयर वन भूमि पर इस परियोजना के शुरू होने से पूरे क्षेत्र में पेड़ों की कटाई होगी। वहीं सैकड़ों ग्रामीणों को अपना गांँव-घर छोड़कर जाना पड़ेगा। जंगलों में रहने वाले जानवरों को भी अपना ठिकाना बदलना पड़ेगा।  
प्रदेश के मुखिया की चुप्पी पर हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति ने खनन को रोकने  हाई कोर्ट में याचिका दायर की। लेकिन छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 11 मई 2020 को भूमि अधिग्रहण को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया। वहीं सुप्रीम कोर्ट ने इससे ही जुड़े एक मामले में केंद्र सरकार,राज्य सरकार,राजस्थान विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड और परसा केते कॉलरीज को चार सप्ताह में नोटिस का जवाब मांगा है। इससे हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति की उम्मीद जगी है। सबकी नजर सुप्रीम कोर्ट पर है।  
केन्द्र ने अनदेखी किया
हसदेव अरण्य जंगल ‘नो गो एरिया’ पहले से ही घोषित है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने 2014 में परसा ईस्ट केते बासन खदान को दी गई अनुमति को ही रद्द कर दिया था। ट्रिब्यूनल ने भारतीय वन्यजीव संस्थान और इंडियन काउंसिल आफ फारेस्ट्री रिसर्च से इस क्षेत्र में खनन से क्या प्रभाव पड़ेगा,उसका अध्ययन कराने को कहा था। लेकिन केन्द्र सरकार ने अध्ययन कराए बिना ही खदानों के खनन की अनुमति दे दी। अब सात साल बाद वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट अपनी 277 पेज की रिपोर्ट में कहा, देश के एक प्रतिशत हाथी छत्तीसगढ़ में हैं। यहांँ हाथियों और इंसानों के संघर्ष में औसत हर बरस 15 जन हाॅनि केवल छत्तीसगढ़ में होती है। इस क्षेत्र में पूरे वर्ष भर हाथी के अलावा अन्य वन्य जीव रहते हैं। कोरबा वन मंडल में हसदेव अरण्य कोलफील्ड क्षेत्र के पास बाघ भी देखा गया है। यह क्षेत्र अचानकमार टाइगर रिजर्व, भोरमदेव वन्यजीव अभ्यारण और कान्हा टाइगर रिजर्व से जुड़ा हुआ है।  
रिपोर्ट नहीं ली गई
भारत सरकार की फॉरेस्ट एडवाइजरी कमेटी ने केंद्रीय वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने जुलाई 2011 की गई अनुशंसा को निरस्त कर दिया था। जबकि एक हजार 898 हेक्टेयर में परसा ईस्ट केते बासन कोल ब्लॉक के लिए स्टेज वन की अनुमति प्रदान की थी। लेकिन सन् 2012 में स्टेज 2 का फाइनल क्लीयरेंस जारी होने पर 2013 में खनन शुरू हो गया। छत्तीसगढ़ के सुदीप श्रीवास्तव ने इसके खिलाफ नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल  प्रिंसिपल बेंच में अपील दायर की। ग्रीन ट्रिब्यूनल ने भारतीय वानिकी अनुसंधान, शिक्षा परिषद और भारतीय वन्यजीव संस्थान से अध्ययन कराने की सलाह दी। वर्ष 2017 में केंद्रीय पर्यावरण वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने केते एक्सटेंशन का अप्रूवल इस शर्त के साथ जारी किया कि दोनों संस्थाओं से हसदेव अरण्य कोल्ड फील्ड की जैव विविधता पर रिपोर्ट ली जाएगी।
खत्म हो जायेगा जंगल
छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के आलोक शुक्ला का कहना है,सरकार ने परसा कोयला खदान के साथ परसा ईस्ट केंते बासन एक्सटेंशन खदान के दूसरे चरण को भी मंजूरी दे दी है। इसकी वजह से एक लाख 70 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में समृद्ध जैव विविधता वाला जंगल बर्बाद हो जाएगा। इसका असर नदियों पर भी पड़ेगा। सैकड़ों लोगों को अपने गांँव से उजड़ना पड़ेगा। वहीं हसदेव अरण्य की चिंता केवल देश में ही नहीं, दुनिया  भर के पर्यावरण प्रेमी को है। इसलिए विरोध कर रहे हैं। ब्रिटेन,आस्टेªलिया में लोगों ने हसदेव अरण्य को बचाने के लिए सड़क पर उतर कर प्रदर्शन किया। बस्तर के ग्रामीण इलाकों के हजारों आदिवासी सरकार के इस अव्यावहारिक निर्णय का विरोध कर रहे हैं। बिजली के लिए कोयला बहुत जरूरी है,लेकिन पर्यावरण की सुरक्षा उससे भी ज्यादा जरूरी है। भीषण गर्मी में छत्तीसगढ़ का पारा 46-47 डिग्री सेल्सियस तक पहुंँच जाता है। ऐसे में जंगल की कटाई से बिलासपुर,कोरबा,सरगुजा में तापमान 50 डिग्री सिल्सियस तक पहुंँच सकता है। और हरित छत्तीसगढ़ बनाने की योजना को भी नुकसान होने का अंदेशा है। जरूरी है कि कोयला के लिए खनन वहांँ होना चाहिए,जहांँ जंगल कम है,बसाहट नहीं है और जंगली जानवर कम हैं।
भूपेश मान गये
एक ओर सरकार कहती है कि हमने अनुसूचित जनजाति को वन अधिकार के तहत पट्टे दे दिए हैं और दूसरी ओर वहांँ रहने वाले ग्रामीण विकास की तथाकथित आंधी में उजाड़ दिए जाते हैं। अबूझमाड़ की रावघाट संघर्ष समिति का भी दर्द यही है। वह भी हसदेव के परसा कॉल ब्लॉक में होने वाली पेड़ों की कटाई का विरोध कर रहे हैं। गौरतलब है,राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोतं रायपुर में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से अप्रैल में मुलाकात कर कहा, उनके राज्य में कोयला संकट खड़ा होने से बिजली घरों के संचालन में दिक्कत आ रही है। भूपेश सरकार ने उनकी बात मान ली और परसा कोयला खदान के लिए वन भूमि देने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। केंद्र सरकार ने 2019 में ही मंजूरी दे दी थी। बहरहाल जंगल कब तक जंगल रहेंगे,ंयह सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर निर्भर करता है।
 
   
 

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Tuesday, May 24, 2022

बस्तर की विडंबना की तहरीर



0 रमेश कुमार ‘रिपु’

बस्तर के आदिवासियों की ज़िन्दगी का पूरा सच यथार्थ के धरातल पर लोकबाबू ने अपनी किताब बस्तर-बस्तर में लिखा है। बस्तर की जिन्दगी के कटु सच से सामना कराती है यह किताब। अन्याय और विषमता की जिस पृष्ठ भूमि से कथनाक की शुरूआत होती है,उसकी तस्वीर आज भी नहीं बदली है। आदिवासियों की आदिम संस्कृति,जीवन में माओवादियों की दस्तक और सलवा जुड़ूम के बाद भी बहुत बदलाव नहीं आया है। लेकिन एक सच यह भी है,कि माओवादियों की वजह से आदिवासियों में जागृति आई है। वे अपने हक़ के बारे में बातें करने लगे हैं। और मंत्रणा करने लगे हैं। जैसा कि गूफा पल्टन यानी माओवादी ने इरमा के यहांँ खाने के दौरान कहा,महाराष्ट्र में तेंदूपत्ता की तुड़ाई में एक पूड़े का पैंसट पैसा है और आन्ध्र में सत्तर पैसा,यहांँ पैतालीस पैसा दे रहे हैं,तो बहुत कम है। यहांँ के मालिक और ठेकेदार को वही रेट देना चाहिए। आप लोग संगठित होंकर आवाज उठायें,बाकी हम देख लेंगे।’’

दरअसल यह उपन्यास बस्तर के आदिवासियों के साथ होने वाले अन्याय और विषमता की जिस पृष्ठ भूमि को रेखांकित करता है,उसमें जरा भी कल्पनिक जीवन और रचा गया इतिहास नहीं है। लेखक ने पात्रों के जरिये बस्तर की ऐतिहासिक धरोहर और रमणीय स्थलों से भी परिचय कराया है। इरमा अपने प्रेमी रग्घू के साथ देखकर अचंभित हो जाती है,कि चित्रकोट में इन्द्रावती की धारा नब्बे फुट नीचे गिरती है। तीरथगढ़ का झरना कांगेर नदी के पानी से बना है। और कोटमसर की अंधेरी और लम्बी गुफा अंचल में चर्चित है। लोहाण्डीगुड़ा में मावली माता है। बस्तर के प्राकृतिक सौन्दर्य अदभुत हैं। हिड़मा और हूंगा के जरिये घोटूल परंपरा के सच से सामना कराया गया है। बस्तर में बहुत सारी नदियांँ है। नदियांँ हैं इसलिए जीवन है। पनकू मामा इरमा को बताते हैं कि दण्डकारण्य के इस हिस्से में इन्द्रावती के अलवा शंकिनी, डंकिनी, कोटरी, शबरी, बल्लरी, दूधनदी, नारंगी, तालपेरू,जैसी बहुत नदियांँ है। लेकिन गोदावरी नदी सबसे बड़ी है। बस्तर के अबूझ जंगल का नाम अबूझमाड़,और इसे बस्तर क्यों कहते हैं,दण्डकारण्य क्यों कहते हैं,ऐसे सवालों के भी जवाब हैं। 

यह किताब चार खंडो में है। पहले खंड में बस्तर के आदिवासियों की जिन्दगी और उनकी  संस्कृति से परिचय के साथ सरकारी मुलाजिमों द्वारा आदिवासी महिलाओं का दैहिक एवं सामाजिक शोंषण के अक्स की जो तस्वीर किताब में है,वो काल्पनिक नहीं यथार्थ है।   यानी अबूझमाड़ के किस्सों में अंधा युग भी है। किताब में गढ़े गये पात्र गोडवी और हल्बी भाषा में बातें करते हैं। इससे यह एहसास होता है,कि हम बस्तर के गांँवों और वहांँ की आबो- हवा के साथ ही लोक जीवन को करीब से देख रहे हैं। यह किताब बस्तर की पुरातत्व संपदा और आदिवासियों की अछूती संस्कृति,खान-पान और जंगली जीवन के हर पक्ष से परिचय कराती हैं। दूसरे खंड विस्थापन के पीड़ा को उकेरा गया है। बस्तरवासियों का शोषण, हुक्मरानों का छलावा,सलवा जुडूम की घिनौनी राजनीति, पुलिस की बर्बरता और नक्सलियों के आतंक को बेनकाब करता है यह उपन्यास। दरअसल दंण्डकारण्य में किसी का घर स्थायी नहीं होता। लोग यहांँ बसते हैं उजड़ने के लिए। तुलतुली गांँव का जंगल तेंदू के पेड़ और केलों के जंगल के लिए जाना जाता है।

तीसरा खंड सलवा जुड़ूम से मिले जख्मों का कथानक है। सलवा जुड़ूम ने हजारों आदिवासियों को उनके गांँव से,उनके जीवन से और उनके रिश्तदारों से अलग कर दिया। इरमा के मासूम भाई को पुलिस वालों ने नक्सलियों का मुखबिर कहकर मार दिया। उसके माँं-बाप और मामा को जंगल में मार दिया गया। उसकी आबरू पुलिस वालों ने लूट। इरमा को नक्सली कैंप में नया जीवन मिलता है। और वह शीते के नाम से खूंखार नक्सली बन जाती है। उसे सड़ी व्यवस्था ने नक्सली बना दिया। सलवा जुड़ूम के दौरान बस्तर में अघोषित इमरजेंसी लगी थी। पत्रकार रमेश पैकरा का नक्सली लीडर शंकर के इन्टरव्यू से पता चलता है कि उनकी मांगे और विचार नाजायज नहीं है। उनकी नज़र में हर समस्या का हल कम्युनिज्म ही है।

चौथे

खंड में रोमांच है। नक्सली इरमा से उसके मंगेतर रग्घू के मिलने की उत्सुकता और उसे दादा जिस तरह आॅखों में पट्टी बांध कर जंगल-जंगल घुमाते हैं और फिर अचानक उसे यह कहकर छोड़ देते हैं, कि कामरेड सीते तुमसे नहीं मिलना चाहती। वह हर हाल में उससे मिलकर उसके मन की बात जानना चाहता है। उसके लिए नक्सली भी बनना पड़ा तो गुरेज नहंीं करेगा। लेकिन सरकारी मास्टर बन जाने की खुशी को यूं ही जाया नहीं करना चाहता। और वह खुद से फैसला लेता है,यदि पानी की बोतल पुल के दूसरी तरफ निकल गई तो वह इरमा को भूलकर अपने गाँंव लौट जायेगा। और जब बोतल नहंीं निकली तो वह पत्थर उस दिशा में फेकता है,जिस दिशा में बोतल थी। तभी उसे नदी के पानी से युवती की आवाज में, एक चीख उठी,चुप ‘माइलोटिया।’
किताब की भाषा में टूटन नहीं है। उत्सुकता जगाती है,कि इसके बाद क्या है। बस्तर का पूरा दर्शन यह किताब कराती है। यह उपन्यास भले डेढ़ दशक पुराने कथानक पर केन्द्रित है लेकिन,वर्तमान प्रासंगिकता पर ऊगली नहीं उठाई जा सकती।
किताब - बस्तर-बस्तर
लेखक - लोकबाबू
प्रकाशक-राजपाल
कीमत -450 रुपये

 

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Wednesday, May 18, 2022

औरंगजेब के पैरोकार चुप क्यों हैं...


औरंगजेब को सेकूलर बताने वाले चुप है। उसे सहिष्णु बताने वाले खामोश हैं। कथित बाबरी मस्जिद पर केसरिया झंडा फहरा दिया गया था, तो कइयों का कलेजा फट गया था। पर कांग्रेस,सपा,जद और बसपा से लेकर वाममोर्चा हल्ला मचा रहा था। आज ज्ञानवापी मस्जिद में बाबा के मिल जाने पर जनउधारी राहुल गांधी,मंदिर मस्जिद जाने वाले अखिलेश,चंडीपाठ करने वाली ममता बनर्जी,यदुवंशी बताने वाले आरजेडी,फ्री तीर्थ यात्रा करने वाले केजरी वाल,पार्टी का नाम शिवसेना, वो भी



चुप है। लेफ्ट तो सदा चुप रहता है। और तो और देश के सभी वामपंथी लेखकों के मुंह पर दही जम गया है।  कठमुल्ले के ठेकदारों ने कभी नहीं स्वीकारा कि ज्ञानवापी मंदिर है, न कि मस्जिद। सैकड़ो साल से बाबा पर वजू हो रहा था। हैरानी वाली बात है कि जेएनयू के प्रोफेसर के एन पट्टिनकर औरंगजेब को सेकूलर और सहिष्णु बताने कई झूठी कहानियांँ गढ़ दी। मुगलों ने कभी मंदिर तोड़कर मस्जिद नहीं बनाई। उन्हांेने यहां तक कह दिया कि बनारसा में सूफी और पंडित के बीच गठजोड़ हो गया था,उनके शासन के नियमों के मुताबिक गलत था इसलिए मंदिर तोड़ा गया।

सच्चाई यह है,कि भारतीय जनमानस के बीच जगह बनाने में नाकामयाब था आलमगीर औरंगजेब। आम लोगों के बीच औरंगजेब की छवि हिंदुओं से नफरत करने वाले धार्मिक उन्माद से भरे कट्टरपंथी बादशाह की थी। जिसे कथित जनऊधारी की पार्टी के समर्थक सबसे बड़ा सहिष्णु बताते हैं। वह व्यक्ति अपने राजनीतिक उद्देश्यों को पूरा करने के लिए अपने बड़े भाई दारा शिकोह को भी नहीं बख्शा।

औरगंजेब को लेकर कई प्रोफेसर और इतिहासकारों ने कहानियां गढ़ी है। औरंगजेब बंगाल जा रहे थे। कई हिन्दू राजाआंे ने उनसे कहा, कि बाबा काशीनाथ के दर्शन करना चाहती है उनकी रानियां। इसलिए वे वहांँ कुछ दिनों तक ठहरना चाहती है। जब दर्शन करने गई तो एक रानी गायब हो गई। इस पर कहा गया कि इससे मंदिर अशुद्ध हो गया। बाद में वो रानी मिल गई। उन्होने कहा, कि औरंगजेब के सैनिकों ने उनकी जान और लाज बचाई,इसलिए यहां मस्जिद बननी चाहिए। जबकि इन बातों का को कोई प्रमाण नहीं है।

सनातन धर्म में मंदिर को शुद्ध करने की व्यवस्था है। विधि विधान है। ऐसा नहीं है कि मंदिर को तोड़ दिया जाये। जेएनयू के प्रोफेसर हांे या फिर औरंगजेब केा सेकूलर बताने वालों के पास इन सब बातों को कोई साक्ष्य नहीं है। केवल मनगढ़त कहानियों से सत्य नहंी बदलता। आस्था नहीं बदलती है। कोर्ट का यह कहना,कि बाबा मिले है ंतो यह सबसे बड़ा साक्ष्य है।

जो  लोग गंगा-जमुना संस्कृति की बात करते हैं उन्हें शर्म आनी चाहिए। कथित ज्ञानवापी मस्जिद का सर्वे न हो इसके लिए अपने आप को सेकूलर बताने वाले हर तरह का अडंगा लगाया। जबकि शरियत में मनाही है, कि मंदिर को तोड़कर मस्जिद बनाने की। फिर औरंगजेब का समर्थन कथित सेकूलर वाले आज भी कर रहे हैं। बाबा को फव्वारा बताने वालों का शर्म आनी चाहिए। क्या फव्वारा शिवलिंग जैसा होता है..?
सनातन धर्म पर विश्वास करने वाले मानते हैं, कि काशी अविनाशी है। यहाँं सिर्फ डमरू वाले बाबा की ही सरकार चलती है। लेकिन कठमुल्लों ने उन्हें डुबो दिया था। अब उनका अवतरण हुआ है। नंँदी सही जगह पर बैठे हुए हैं। वो इंतजार कर रहे हैं,कब बाबा आयेंगे। अब उनका इंतजार खत्म हो गया। नंँदी महाराज और स्वयंभू शिवलिंग की काहनी का जिक्र लंदन के के एम ए शेरिंग की किताब सेक्रेड सिटी आफ द हिंदूज में भी है। जय काशी बाबा की।


    
 

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ramesh kumar ''ripu''
रायपुर, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़
दैनिक युगधर्म रायपुर में 1986 में रिपोटर्र के रूप में पत्रकारिता की शुरूआत। 1988-90 तक उपसंपादक दैनिक नवभास्कर रायपुर,नेशनल टुडे न्यूज सतना सहायक संपादक,दैनिक जागरण रीवा सहायक संपादक, दैनिक भास्कर बिलासपुर सहायक संपादक 1993-95, दैनिक जागरण रीवा संपादकीय प्रभारी 1996-2000। कुछ स्थानीय अखबारों में संपादक। जबलपुर,नागपुर के अखबारों का ब्यूरो। दैनिक जागरण 2012-13 में राजनीतिक संपादक, दैनिक दबंग दुनिया रायपुर,कार्यकारी संपादक 2014, राष्ट्रीय पाक्षिक पत्रिका यथावत का छग ब्यूरो 2015-17, राष्ट्रीय पाक्षिक पत्रिका ओपिनियन पोस्ट छग,एम.पी ब्यूरो 2017-2019 मार्च तक। वर्तमान में राष्ट्रीय पाक्षिक पत्रिका प्रथम प्रवक्ता का छग ब्यूरो।
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