Wednesday, June 12, 2019

पर्यावरण की हत्या का ठेका


  पर्यावरण की हत्या का ठेका
बैलाडीला की खदान और पच्चीस हजार हरे पेड़ काटने का ठेका गौतम अडानी को दिये जाने से सियासी बवाल मचा हुआ है। सरकार का दावा है कि रमन सरकार ने यह आदेश दिया था। बस्तर के आदिवासी इसका पुरजोर विरोध कर रहे हैं। वहीं पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी ठेका रद्द नहीं किये जाने पर अपनी जान देने की बात कहकर सरकार को सकते में डाल दिये हैं।

0 रमेश कुमार ’’रिपु’’
                      चलो छत्तीसगढ़ चलो। हरे पेड़ काटना है। गौतम अडानी को बैलाडीला की खदान और 25 हजार 400 पेड़ काटने का ठेका मिला हुआ है। आप बेरोजगार युवक हैं तो आइये। एक कुल्हाड़ी हरे पेड़ों पर चलाइये। पर्यावरण की हत्या में हम आगे नहीं आयेंगे। यही कहोगे तो उससे क्या अडानी का ठेका रद्द हो जायेगा? नहीं,न। तो फिर अपनी बेरोजगारी दूर करिये कुछ दिनों के लिए। ऐसी सियासी अपील विपक्ष इन दिनों भूपेश सरकार का मजाक उड़ाने के लिए कर रहा है।
दरअसल जब तक डाॅ रमन सिंह की सरकार थी कांग्रेस चीखती रही कि विकास के नाम पर हरे पेड़ों की बलि ली जा रही है। अब कांग्रेस की सरकार बैलाडीला की 13 नम्बर की खदान का ठेका अडानी को देकर विरोध को जाल में फंस गई है। यह अलग बात है कि सरकार 7 जून से सरकार के फैसले का विरोध कर रहे आदिवासियों के एक प्रतिनिधि मंडल की चार मांगों को स्वीकार कर आंदोलन की तपिश का कम करने की सियासी चाल चली गई है। प्रभावित क्षेत्र में वनों की कटाई पर तुरंत रोक लगेगी। वर्ष 2014 के फर्जी ग्राम सभा के आरोप की जांच कराई जाएगी। क्षेत्र में संचालित कार्यों पर तत्काल रोक लगाई जावेगी। राज्य सरकार की ओर से भारत सरकार को पत्र लिख कर जन भावनाओं की जानकारी दी जाएगी।
आदिवासी गुस्से में
दंतेवाड़ा से करीब 30 किलोमीटर दूर किरंदुल में 5000 से ज्यादा आदिवासी नेशनल मिनरल डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन(एनएमडीसी) के दफ्तर के बाहर डेरा डाले हुये हैं और बैलाडिला की पहाड़ियों पर हो रहे लौह,खनन का विरोध कर रहे हैं। इस खनन से यहां नंदीराज पहाड़ी के अस्तित्व पर संकट छा गया है जिसे गोंड, धुरवा, मुरिया और भतरा समेत दर्जनों आदिवासी समूह अपना देवता मानते हैं और उसकी पूजा करते हैं। यहां दो पहाड़ हैं। नन्दराज पहाड़ के सामने का पहाड़ पिटोरमेटा देवी का पहाड़ है। दोनों पहाड़ में भरमार लोह अयस्क है। जिसके लिए ही यह सौदा हुआ है। खदान की ऊंची पहाड़ियां सदाबहार हरे भरे पेड़ो से और वनोऔषधियों से भरी हुई थी। ये आदिवासी आसपास के 50 किलोमीटर के दायरे में फैले गांवों से पैदल चलकर किंरदुल पहुंचे है।दंतेवाड़ा, बीजापुर और सुकमा के गांवों से आये लोग तेज गर्मी और बारिश के बावजूद विरोध स्थल पर डटे हुये हैं। उनका कहना है कि अपने आराध्य देवता की प्रतीक इस पहाड़ी को खनन के लिये देने को वो तैयार नहीं हैं। यह पहली बार नहीं है कि खनिजों से समृद्ध पहाड़ को खोदने की तैयारी को आदिवासियों की आस्था का सामना करना पड़ा हो। उड़ीसा में बाक्साइट से भरी नियामगिरी की पहाड़ियों को भी स्थानीय डोंगरिया कोंध आदिवासियों ने अपने आंदोलन से बचाया। नियाम राजा कोंध आदिवासियों का देवता है और सुप्रीम कोर्ट ने इनके पक्ष में फैसला दिया।
भूपेश के समक्ष समस्या
भूपेश सरकार के समक्ष विकट समस्या है। यदि केन्द्र सरकार से पैसा चाहिए तो वो इतनी हिम्मत नहीं दिखा सकती कि अडानी का ठेका रद्द कर दे। वैसे बस्तर जाने के रास्ते में लाइन से पेड़ ऐसे बिछे और कटे हैं जैसे युद्ध में लाशें बिछ जाती हैं। रमन सरकार के समय भी एक लाख पेड़ काटे जा चुके हैं। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने बैलाडीला खदान अडानी को दिए जाने के मामले में कहा कि रमन बताएं कि वे अडानी को माइंस देने के पक्ष में हैं या नहीं। उन्होंने सफाई देते हुए कहा, पिछली सरकार के जो फैसले होते हैं उसे वर्तमान सरकार के अधिकारी तब तक कैरी ऑन करते हैं जब तक कोई नया फैसला नहीं हो जाए।
पेड़ काटने की अनुमति नहीं दी
बैलाडीला पहाड़ में एनएमडीसी के खदान नम्बर 13 में खनन के खिलाफ आदिवासियों के जारी विरोध के बीच वन मंत्री मो अकबर ने दस्तावेज पेश करते हुए बताया कि वहां वृक्ष काटने की अनुमति जनवरी 2018 में तात्कालीन रमन सरकार ने दी थी। उनके खिलाफ लगाए जा रहे सभी आरोप झूठे हैं। कांग्रेस सरकार ने और राज्य वन मंत्रालय ने कोई भी अनुमति पर्यावरण को लेकर नहीं दी थी। सहमति पर्यावरण विभाग ने नहीं बल्कि, पर्यावरण संरक्षण बोर्ड ने दी थी। उन्होंने कहा कि पर्यावरण संरक्षण बोर्ड केंद्र सरकार की जल एवं वायु प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण अधिनियम के तहत गठित एक स्वायतशासी संस्था है, जिसकी कार्रवाई अलग से चलती है। बोर्ड के फैसले अलग से होते हैं। चूंकि ये एक स्वतंत्र इकाई है इसलिए इनकी बैठकों में मंत्री शामिल नहीं होते। गौरतलब है कि पूरे मामले में अजीत जोगी और रमन सिंह ने राज्य सरकार पर अडानी को पर्यावरणीय स्वीकृति देने का आरोप लगाया है। रमन सिंह कहना था कि अप्रेल में मो. अकबर के वन मंत्रालय में वहां पर खनन की पर्यावरणीय स्वीकृति दी थी।
दोहरा मापदंड क्योंः उसेंडी
बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष विक्रम उसेंडी ने कहा है कि राज्य सरकार दोहरा मापदंड अपनाकर गुमराह कर रही है। जल, जंगल और जमीन का मुद्दा आदिवासियों के लिए उनकी अस्मिता और आत्मा से जुड़ा मुद्दा है, जिसका भाजपा पूरा सम्मान व समर्थन करती है। वर्तमान सरकार इस खदान के पक्ष में नहीं थी तो अप्रैल 2019 में पर्यावरण विभाग ने अनुमति का विरोध क्यों नहीं किया। गौरतलब है कि अडानी को खदान का आवंटन बीजेपी सरकार के समय हुआ और दूसरी तरफ गिदौरी.पितौरी कोयला खदान का आवंटन राज्य सरकार के सीएसइबी को हुआ है। खनन का कार्य अडानी कंपनी को लोकसभा चुनाव के एक महीने पहले 848 रुपए प्रति टन के दर पर दिया गया है। मुख्यमंत्री बघेल यह स्पष्ट करें कि इतनी उच्च दर पर कोयला खदान का आवंटन अडानी कंपनी को क्यों किया गया। जबकि गार,े पलमा कोयला खदान बीजेपी सरकार ने लगभग 550 रुपए प्रति टन की दर से दी थी। सवाल यह है कि दोनों कोयला खदानों की दरों में इतना अंतर क्यों है।
पीछे नहीं हटेंगे:मंडावी
रमन सरकार ने पाँचवी अनुसूचित क्षेत्र को संविधान द्वारा मिले विशेष अधिकारों को दरकिनार करते हुए गौतम अडानी की कम्पनी को फायदा पहुुचाने के मकसद से आदिवासियों के जल, जंगल, जमीन को योजनाबद्ध तरीके से तहस नहस करने का खाखा तैयार किया था। अब सात जून से बीजापुर और दंतेवाड़ा जिले के पच्चीस हजार से अधिक आदिवासी विरोध में आंदोलनरत है। इस आंदोलन के समर्थन में बीजापुर विधायक और बस्तर क्षेत्र आदिवासी विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष विक्रम शाह मंडावी ने लौह आयस्क खनन के विरोध में संघर्षरत आदिवासियों से वादा किया कि हिरोली स्थित पिटोम मेटा पहाड़ में बीजापुर, दंतेवाड़ा, और सुकमा के आदिवासियों का देव स्थल है, आदिवासियों की आस्था के साथ किसी भी कंपनी को खिलवाड़ नहीं करने दिया जायेगा। इस मसले पर प्रदेश और केंद्र की सरकार से बात करेंगे। जरूरी हुआ तो वे केन्द्र सरकार के खिलाफ मोर्चा भी खोलेंगे। बस्तर के आदिवासियों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचने देंगे।
मरना पसंद करूंगा: जोगी
पूर्व मुख्यमंत्री एवं जनता कंाग्रेस छत्तीसगढ़ जे के सुप्रीमों अजीत जोगी ने कहा,’मैं मरना पसंद करूंगा लेकिन भूपेश सरकार को अड़ानी को एक फावड़ा या कुदाल चलाने की अनुमति नहीं देने दूंगा।  सरकार बनने के पहले भूपेश कहते थे कि अडानी को एक भी खदान नहीं लेने दूंगा,सरकार बनने के बाद उसी अडानी को पांच खदानें दे दी।
आस्था से खिलवाड़ मंजूर नहीं
नंदराज पहाड़ को बचाने के लिए बैलाडीला में चल रहे आदिवासियों के आंदोलन के बीच पूर्व केंद्रीय मंत्री अरविंद नेताम और नवनिर्वाचित सांसद दीपक बैज ने कहा, आदिवासियों की आस्था से खिलवाड़ सरकार और कोई भी न करे उनके लिए ठीक नहीं होगा। इसकी लड़ाई सड़क से संसद तक लड़ने में पीछे नहीं हटेंगे।
क्यों भड़कता है असंतोष
जमीन अधिग्रहण को लेकर बस्तर मे असंतोष आखिर बढ़ता क्यों है। जाहिर है कि सरकर की बेईमानी और आदिवासियों की समस्याओं को नजर अंदाज किया जाता है।  हर पार्टी की सरकार अपने राज में किसानों, ग्रामीणों और आदिवासियों को विकास की राह में अड़चन मानती आयी हैं। जमीन लेने से पहले न तो ईमानदारी से जनसुनवाई होती है और न ही भू स्वामियों को प्रोजेक्ट के बारे में पूरी जानकारी दी जाती है। इसके अलावा पर्यावरण नियमों की अनदेखी और कृषि क्षेत्र का विनाश लोगों की मुख्य शिकायत रहती है। इसीलिये जिस तरह 15 साल पहले लोहांडीगुडा में लोग जन सुनवाई के तरीके और पारदर्शिता न बरते जाने से भड़के थे, वही स्थिति किरंदुल में धरना दे रहे आदिवासियों की है। सवाल है कि दो सरकारी कंपनियों एनएमडीसी और सीएमडीसी छत्तीसगढ़ मिनरल डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन का ज्वाइंट वेंचर होने के बावजूद आखिर निजी कंपनी अडानी ग्रुप को क्यों आमंत्रित किया गया। मई 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दंतेवाड़ा के पास डिलबिली में 24000 करोड़ रुपये के अल्ट्रा मेगा स्टील प्लांट का उद्घाटन किया। जिसका अभी तक कहीं नामोनिशान नहीं है। यह स्टील प्लांट सरकारी कंपनी स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया की ओर से लगाया जाना है। लेकिन स्थानीय लोगों के विरोध के कारण इस प्रोजेक्ट को यहां नहीं लगाया जा रहा। कहा जा रहा है कि किरंदुल में भी सड़क बनाने के नाम पर करीब 1 लाख पेड़ों को काटा जायेगा, जिससे विरोध के स्वर और ऊंचे हो गए हैं।
नक्सली उठाते हैं फायदा
दंतेवाड़ा में आदिवासी अपनी जमीन और देवता के लिये हाथों में तीर,कमान और कुल्हाड़ी लेकर डटे हैं और उनके सैंकड़ों साथी जनवादी गीत गा रहे है। सरकार इस धरने पर निगरानी के लिये ड्रोन की मदद ले रही है ताकि, संघर्ष में शामिल नक्सलियों की पहचान हो सके। बंगाल के नंदीग्राम और लालगढ़ से लेकर छत्तीसगढ़ के लोहांडीगुडा और दंतेवाड़ा और उड़ीसा के नियामगिरी से लेकर आंध्र प्रदेश के पोलावरम तक माओवादियों के लिये ऐसे आंदोलन अपनी पैठ बढ़ाने के लिए मुफीद होते हैं।
वरिष्ट पत्रिकार रमेश शर्मा कहते हैं,छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल सरकार ने सत्ता में वापसी के बाद टाटा के स्टील प्लांट के लिये ली गई किसानों की जमीन लौटाने का जो काम शुरू किया, उससे विश्वास का माहौल बन सकता था और यही रास्ता बस्तर में नक्सलवाद से लड़ने की दिशा में पहला कदम हैं। लेकिन ताजा घटना बताती है कि सरकार के सामने नये सिरे से विश्वास को बहाल करने की चुनौती है, जिसमें ड्रोन के बजाय ग्रामीणों से बातचीत कहीं बड़ा हथियार होगा’’।
नाम की तख्तियां हैं,पेड़ नहीं
राजधानी रायपुर से लगभग डेढ़ सौ किलोमीटर दूर जांजगीर चांपा जिला से 25 किलोमीटर दूर पामगढ़ विकास खंड और बलौदा वन परिक्षेत्र के तहत भैसो गांव में 10 हेक्टेयर जमीन पर जिधर भी नजर दौड़ाओ तो अफसरों,नेताओं और मंत्रियों के नाम की तख्तियां नजर आती है। लेकिन यह तख्ती लगी क्यों है,पूछने पर गांव के मोहन बघेल बताते हैं, महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गांरंटी योजना के तहत यहां 11 हजार पौधे रोपे गए थे। इसका उद्घाटन मुख्यमंत्री डाॅ रमन सिंह ने पौधा रोपकर किया था। इसके लिए शासन से 17.67 लाख रूपए खर्च किया गया था। कुछ ही दिनों बाद सभी पौधे सूख गए लेकिन, अधिकारियों की लगी तख्तियां हरियर छत्तीसगढ़ का मजाक उढ़ा रही हैं। इस गांव की कथा से अलग एक कथा और भी है।
पोस्टरों में हरियर छत्तीसगढ़
सरगुजा से बस्तर तक हरे हरे पेड़ों की लाशें बिछी हुई हैं। जगदलपुर नेशनल हाइवे के किनारे सैकड़ों पेड़ काट दिए गए हैं। इसी तरह बस्तर जिले मंे माचकोट वन परिक्षेत्र केे तहत पीरिया गाव में एनएमडीसी की पानी की पाइप लाइन बिछाने के लिए सबरी से नगरनार तक 24 किलोमीटर तक के रास्ते में चार हजार पेड़ काटे गए। पूरे बस्तर संभाग में लाखों पेड़ धराशाही कर दिए गए हैं। बावजूद इसके वन मंत्री का दावा है कि हरियर छत्तीसगढ़ है हमारा। सरकार कहती है जंगलों की सुरक्षा के लिए जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है। पौधा रोपण कर जंगल बढ़ाने का प्रयास किया जाएगा। गौरतलब है कि इस साल गर्मी में बिलासपुर का तापमान 48 डिग्री सेल्सियस था। जाहिर है कि हरियर छत्तीसगढ़ सिर्फ नारों और पोस्टरों पर दिख रहा है। हरियर छत्तीसगढ़ योजना के तहत रमन सरकार के समय 9000 करोड़ रूपए का वृक्षारोपण किया गया था,बावजूद इसके जंगलों का रकबा कम होना चैकाता है। 10 साल में 250 वर्ग किलोमीटर जंगल गायब हो गए है। सरगुजा से बस्तर तक अंधाधुंध विकास के नाम पर आधे से अधिक जंगल साफ हो गए हैं।
 
 

मरीज न बनें अस्पताल

    मरीज न बनें अस्पताल
आयुष्मान योजना से आगे की योजना को छत्तीसगढ़ सरकार उतारना चाहती हैं। ताकि अस्पताल मरीज न बनें। सरकार को सबके सेहत की चिंता है,इसलिए डेढ़ साल के भीतर सभी 27 जिला अस्पतालों को मल्टी स्पेशियलिटी बनाया जाएगा। आयुष्मान योजना में ऐसी कई बीमारियां है, जिनका इलाज नहीं है। और इस योजना का लाभ मरीजों को भर्ती होने के बाद मिलता है। जबकि इससे बेहतर कई योजनाएं प्रदेश में संचालित हैं। प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री टी.एस.सिंह देव से बीमार स्वास्थ्य व्यवस्था की अंतहीन पीड़ा और स्वास्थ्य को लेकर रमेश कुमार ‘‘रिपु‘‘ ने उनसे बातचीत की,जिसके प्रमुख अंश -

0 प्रदेश सरकार आयुष्मान योजना को केरल,ओड़िसा,दिल्ली सरकार की तरह क्या इसलिए बंद करना चाहती है इसलिए कि यह केन्द्र की बीजेपी सरकार की योजना है?
00 छत्तीसगढ़ में अभी आयुष्मान योजना बंद नहीं की जा रही है। बताया जा रहा है कि छत्तीसगढ़ में आयुष्मान पांच लाख रूपये तक का उपचार नहीं कर रही है। छत्तीसगढ़ सरकार के पास आयुष्मान योजना से आगे जाने की योजना है। इसे राजनीतिक रंग देकर लोग देख रहे हैं कि बीजेपी की योजना है इसलिए इसे बंद किया जा रहा है। जबकि ऐसा नहीं है। आयुष्मान योजना को देश की पांच सरकारों ने नहीं स्वीकारा। उनका कहना है कि हमारे यहां इससे बेहतर योजनायें है। प्रदेश सरकार के पास भी इससे अच्छी योजनायें हैं। संजीवनी सहायता कोष जैसी योजनाएं संचालित हैं।
0 कई जिला अस्पताल खुद बीमार हैं। उनके उपचार की दिशा में क्या करने जा रहे हैं?
00 वर्तमान में कई अस्पतालों में विशेषज्ञ चिकित्सक तो हैं लेकिन, जरुरी संसाधनों की कमी है। इसलिए प्रदेश के सभी 27 जिला अस्पतालों को मल्टी स्पेशियलिटी अस्पताल में अपग्रेड किया जाएगा। इसके अलावा सभी 6 मेडिकल कॉलेजों को सुपर स्पेशियलिटी बनाया जाएगा। इसके लिए राज्य सरकार ने तैयारी शुरू कर दी है। योजना के मुताबिक अगले डेढ़ साल में इन अस्पतालों को नई सुविधाओं से लैंस कर दिया जाएगा। ऐसा इसलिए किया जा रहा है कि ताकि स्वास्थ व्यवस्थायें दुरूस्त हो सकंे। ऐसा होने से सामुदायिक और प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र में भी मरीजों को बेहतर इलाज मिल सकेगा।   
0 आयुष्मान योजना को अन्य योजनाओं से बेहतर बताया जा रहा है। यदि ऐसा नहीं है तो फिर खामियां क्या है?
00 छत्तीसगढ़ में आयुष्मान योजना केवल 42-43 लाख नागरिकों को ही कव्हर्ड करता है। 17-18 लाख इसके दायरे में नहीं आते। जबकि सबको स्वास्थ्य सुविधा मिलनी चाहिए। यूपीए सरकार के समय प्रधान मंत्री स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत 50 हजार रूपये तक के इलाज की व्यवस्था थी। पहले 300 रूपये में स्वास्थ्य बीमा होता था, आज 11 सौ रूपये लगते है। जाहिर है कि बीमा कंपनियों के माध्यम से टैक्स पेमेंट दूसरी जगह जा रहा है। 11 सौ रूपये के प्रीमियम पर 50 हजार रूपये तक के इलाज की सुविधा है। जिसमें 60 फीसदी केन्द्र सरकार देती है और 40 फीसदी राशि राज्य सरकार। 50 हजार रूपये के उपचार में छत्तीसगढ़ सरकार ट्रस्ट माॅडल के तहत पेमेंट कर रही है। दरअसल आयुष्मान योजना के संदर्भ में कइयों को जानकारी नहीं है। इस योजना में कई खामियां है। इस योजना में मरीजों को फायदा,उसके भर्ती होने के बाद मिलता है। यानी भर्ती होने से पहले जितनी भी जांचे हैं मसलन,एक्सरे,ब्लड जांच,सोनोग्राफी आदि जांच के लिए मरीज को भर्ती से पहले खुद पेमेंट करना पड़ेगा। जाहिर सी बात है कि हर मरीज तो भर्ती नहीं होता। एक जानकारी के अनुसार 70-86 फीसदी लोग भर्ती नहीं होते। दूसरी ओर आयुष्मान योजना में ऐसी कई बीमारियां हैं, जिनका इलाज नहीं है। गेंगरीन के आॅपरेशन की व्यवस्था है, लेकिन शुगर का नहीं होगा। आयुष्मान योजना में 13 सौ बीमारी के उपचार की व्यवस्था है लेकिन, पांच लाख से ऊपर के इलाज की व्यवस्था नहीं है। 
0 तो क्या आयुष्मान योजना 13 सौ बीमारियों का इलाज जुमला है। यह केवल मन की बातें और प्रचार तक ही सीमित है?
00 एक हद तक यह जुमला ही है। आयुष्मान में 10 करोड़ परिवार को इंगित किया गया है।  50 करोड़ लोग इसके दायरे में आयेंगे। लेकिन 70 करोड़ लोगों को इसका लाभ नहीं मिलेगा। इसकी अपनी सीमा है। छत्तीसगढ़ में पचास हजार के ऊपर के उपचार में केन्द्र सरकार का कोई योगदान नहीं है। यह केवल मन की बातें और प्रचार तक आयुष्मान योजना उपस्थित है। सबको स्वास्थ्य का लाभ मिल सके और बीमार अस्पताल का भी इलाज हो सके, इसलिए छत्तीसगढ़ सरकार ने स्वास्थ्य विभाग की बेहतरी के लिए बेहतर योजनाओं पर काम कर रही है। प्रदेश की संजीवनी सहायता कोष से 30 बीमारियों का इलाज होता है। हाॅर्ट की बीमारी के लिए डेढ़ लाख,किडनी ट्रांसप्लांट के लिए तीन लाख रूपये की सहायता मिलती है।
0 क्या यह मान लिया जाये कि अयुष्मान योजना का विकल्प है सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल?
00 आयुष्मान योजना की कल्पना है निःशुल्क उपचार। लेकिन उसकी अपनी एक सीमा है। हम उस सीमा से आगे जाकर सबको स्वास्थ्य लाभ देना चाहते हैं। पांच लाख से ऊपर जाने की चुनौती है। हार्ट,लीवर आदि के ट्रांसप्लांट की व्यवस्था हो, यह चाहते हैं। सुपर स्पेशियलिटी में न्यूरो सर्जरी, न्यूरो लाजिस्ट कार्डियक नेफ्रो, सर्जरी, पीडियाट्रिक, आंतों समेत सभी बड़ी बीमारियों के विशेषज्ञ और सर्जरी की मशीनरी के साथ डाॅक्टर भी उपलब्ध रहेंगे। मल्टी स्पेशियलिटी मेडिसिन, सर्जरी पीडियाट्रिक,और हड्डी रोग विशेषज्ञ जैसी सुविधाएं उपलब्ध होंगी। प्रदेश में अभी एक मात्र सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल डीकेएस रायपुर में है। योजना के मुताबिक अगले डेढ़ साल में 6 मेडिकल कॉलेजों में मिलेगी सुपर स्पेशियलिटी सुविधा। जिला अस्पतालों में ट्राॅमा सेंटर से लेकर तमाम सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी।
0 मेडिकल काॅलेजों में मरीजों का रिकार्ड रखने को क्यों कहा गया है।
00 दरअसल मेडिकल काॅलेज में हर तरह के मरीज आते है। ओपीडी में जितने भी रजिस्ट्रेशन हो रहे हैं,उनके नाम और बीमारी की जानकारी हर हफ्ते मेडिकल कॉलेज में उपलब्ध कराई जाएगी। हर महीने इसकी समीक्षा कर यह पता लगाया जाएगा कि जिस बीमारी का उपचार प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र में हो सकता है, उसके लिए मरीज मेडिकल कॉलेज क्यों आ रहे हैं।
0 छत्तीसगढ़ में एक चिकित्सक पर 25 हजार मरीजों के उपचार का दायित्व है। ऐसी स्थिति मंे नया छत्तीसगढ़ गढ़बों का नारा कितना असरकारक है।
00 इससे इंकार नहीं है कि चिकित्सकों और विशेषज्ञों की कमी है। सभी जिलों में चिकित्सकों की भर्ती चल रही है। अभी हमारे पास मात्र 132 स्पेशलिस्ट है। जबकि 1500 चाहिए। 800 मेडिकल आॅफीसर की कमी है। 300 मेडिकल आॅफीसर के पद भरे जायेंगे। 425 पद खाली हैं। जिसमें 345 चिकित्सकों के इंटरव्यू के लिए आये हैं। इनकी पोस्टिंग के बाद 600 और मेडिकल आॅफीसर की भर्ती के इश्तिहार निकाले जायेंगे। बेहतर पैकेज दिये जायेंगे। मेडिकल काॅलेज से हर साल एक हजार चिकित्सक निकल रहे हैं। ऐसी नीतियां बनायेंगे कि हर चिकित्सक को दो साल ग्रामीण क्षेत्रों में चिकित्सकीय सेवा देना अनिवार्य है।
0 पिछले 10-15 सालों में डेढ़ हजार चिकित्सक इस्तीफा दे चुके हैं। दो हजार पद रिक्त हैं। ऐसी स्थिति में क्या सरकारी अस्पतालों को निजी हाथों में दे देना चाहिए? 
00 सवाल यह है कि क्या निजी चिकित्सक ग्रामीण क्षेत्रों में जाना पसंद करेंगे। सरकारी नौकरी हर कोई चाहता है। फिर सवाल यह है कि कोई निजी क्षेत्रों में भागकर जो चिकित्सक काम कर रहे हैं वो सरकारी आस्पताल में काम क्यों नहीं करना चाहते। यदि निजी क्षेत्र के चिकित्सक सरकारी अस्पतालों में काम करने को इच्छुक हैं तो आयें। उनका स्वागत है। सरकार उन्हें सवा लाख,दो लाख और ढाई लाख का पेकेज देने को तैयार है। आपको बता दें कि बीजापुर कैंपस में हमारे यहां के प्रतिनिधि गये। उन्होने देखा कि लखनऊ के चिकित्सक वहां काम कर रहे हैं। जब बाहर के लोग यहां काम कर सकते हैं तो फिर यहां क्यों नहीं। दक्षिण भारत के हर जिले में मेेडिकल काॅलेज हैं। एमीबीएस चिकित्सक 20-30 हजार रूपये के वेतन पर काम कर रहे हैं। चुनाव के बाद दक्षिण भारत के कैंपेस में जाकर हम ऐसे चिकित्सकों को आमंत्रित करेंगे। उन्हें वहां से अधिक पैकेज देंगे। सरकारी अस्पतालों में चिकित्सकों की कमी को इस तरह दूर करने की योजना है। जो स्पेशलिस्ट डाॅक्टर ग्रामीण क्षेत्रों में हैं उनकी पोस्टिंग जिला चिकित्सालय में की जायेगी। कांग्रेस के घोषणा पत्र में जिक्र है नर्सो की वेतन विसंगतियों को दूर करना।
0 चिकित्सा के क्षेत्र में सरकार की और क्या योजनायें हैं।
00 मिनी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पीएचसी में अभी दो का स्टाफ होता है। लेकिन इसमें दो स्टाफ और बढ़ाने पर विचार किया जा रहा है। इस तरह दो अतिरिक्त स्टॉफ के साथ इसे 24 घंटे सातों दिन खुला रखने पर विचार किया जा रहा है। पिछले साल भवनहीन अस्पतालों के लिए 900 भवन तैयार किये गये। जहां खनिज से पैसा आ रहा है,उन पैसों का इस्तेमाल वहीं पर चिकित्सा क्षेत्रों में किया जायेगा।
0 पिछले दिनों प्रधान मंत्री ने कहा छत्तीसगढ़ सरकार आयुष्मान योजना का बेहतर क्रियान्वयन नहीं कर रही है। क्या यह सच है।
00 मुझे लगता है कि नेशनल हेल्थ अथाॅरिटी को आंकड़ों की जानकारी है,लेकिन प्रधान मंत्री को नहीं है। इसलिए वे गलत बयानी कर गये छत्तीसगढ़ में। नेशनल हेल्थ अथॉरिटी द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के मुताबिक छत्तीसगढ़ आयुष्मान योजना के क्रियान्वयन पर देश में पहले नंबर पर है। छत्तीसगढ़ में एक लाख में 95 लोगों का इलाज आयुष्मान योजना के द्वारा संभव हुआ है। केंद्र सरकार की नेशनल हेल्थ अथॉरिटी द्वारा जारी किये गये आंकड़े यह बताते हैं कि दूसरे नंबर पर देश में जो राज्य है वहां एक लाख में सिर्फ 26 लोगों का इलाज आयुष्मान योजना से हो पा रहा है।
 

पानी में जले जिन्दगी..

पानी में जले जिन्दगी..
जल,जमीन और जंगल की लड़ाई छत्तीसगढ़ में सिर्फ आदिवासी लड़ रहे हैं। सरकार तीनों पर अपना अधिपत्य मानती है। उद्योगपति सरकार में बैठे लोगों को रेड कारपोरेट पर चला कर, सब तरीके का ठेका पा जाते है। साढ़े तीन दशक से नक्सली और आदिवासी इसका विरोध कर रहे हैं। अब स्थिति यह हो गई है कि जल संकट, नक्सली समस्या से बड़ी समस्या बन गई है। इसलिए कि नदियों का पानी उद्योगों ने निचोड़ लिया। तालाबों की जान बिल्डरों ने ले ली। नतीजा पानी का हाहाकार। राजधानी रायपुर से लेकर गांवों तक है। पानी की प्राथमिकता अब रोटी,कपड़ा और मकान से अधिक है। क्यों कि एक तरफ धरती प्यासी है, तो दूसरी ओर लोग प्यासे हैं।
धरती के पेट में पानी नहीं है। जो पानी है बिजली वालों को मुफ्त रमन सरकार दे दी। करोड़ों का पानी पी गये उद्योगपति। आंकड़े बोलते हैं। मेसर्स जायसवाल निको लि. पर 59.44 लाख,मेसर्स मोनेट इस्पात एंड एनर्जी लि. पर 8 करोड़ 45 लाख,सी.एस आई डी सीपर 8 करोड़ 61 लाख,एस के एस इस्पात एंड पॅावर लिं. पर 8 करोड़ 72 लाख,मेसर्स सारडा एनर्जी एंड मिनरल लिं. पर 1 करोड़ 8 लाख बकाया है। रायगढ़ जिले के पांच उद्योगों पर पचास करोड़ रुपए का जलकर बकाया है। इनमें इंड सिनर्जी लिमिटेड कोटमार पर 43 करोड़ 37 लाख, एमएसटी पावर पर 15 लाख 73 हजार, रुक्मणी पावर पर तीन लाख 55 हजार, जिंदल पावर तमनार पर एक करोड़ 41 लाख रुपए और अंजनी स्टील पर पांच करोड़ 51 लाख रुपए की राशि बकाया है। कोरबा के बाल्को नगर में स्थित वेदांता कंपनी लिमिटेड के 540 मेगावाट पावर प्लांट में करीब 6 करोड़ का पानी मुफ्त पी गया।
बस्तर में विकास का सच यह है कि हर साल सैकड़ों आदिवासी जहरीले पानी के कारण मरते हैं। बस्तर में 92, कोंडागांव में 40 कांकेर में 57, बीजापुर में 6 बस्तियों के लोग आज भी फ्लोराइड युक्त पानी पी रहे है। बीजापुर में 31 कस्बों के हजारों ग्रामीण फ्लोरोसिस से पीड़ित हैं। भोपालपटनम के गेर्रागुड़ा गांव में फ्लोराईड युक्त पानी पीकर बच्चों के दांत खराब हो गए हैं। गरियाबंद, देवभोग का सुपेबड़ा गांव में बीते पांच साल में 54 मौतें किडनी फेल होने से हो चुकी। ये सरकारी आंकड़ा है। 231 ग्रामीण किडनी रोग पीड़ित हैं। नए केस भी आ रहे हैं। लेकिन अब तक ग्रामीणों को साफ पानी मुहैया नहीं कराया जा सका। जबकि ये प्रमाणित हो चुका है कि गांव के पानी में फ्लोराइड की मात्रा ज्यादा होने से ग्रामीण किडनी रोगी हो रहे हैं।
कांकेर जिले के अनेक गांवों में ग्रामीण नदियों में बालू को हटाकर गड्ढा कर घंटों इंतजार करते हैं पानी का। पानी रिस रिस कर जब गड्ढे में भर जाता है तो कटोरे से बाल्टी में भरते हैं। कई गांवों में खेतों में गड्ढा कर पानी के लिए ऐसी ही प्रक्रिया अपना रखे हैं।जल के लिए जिंदगी जल रही है। जंगल है तो पानी है। पानी है तो दुनिया है। जंगल कटेंगे तो पानी कहां से मिलेगा। यह तो सरकार में बैठे लोगों को सोचना चाहिए। उन्हें तो उद्योगपति बिसलरी भेज देंगे। लेकिन आदिवासी की किस्मत में तो आर्सेनिक जल या फिर गंदा पानी है।

Sunday, June 9, 2019

जख्मों से भरे चेहरे में साहस

                                                                   जख्मों से भरे चेहरे में साहस

आदिवासियों के बीच सोनी सोरी संघर्ष का चेहरा बन चुकी हैं। वर्दी से उभरने वाली दरिंदगी और महिलाओं से कू्रर व्यवहार के खिलाफ खड़ी होना सोनी सोरी का एक मात्र मकसद है। दिल दहला देने वाले सच को सामने लाने का साहस दिखाई तो उनके ऊपर एसिड अटैक हुआ। वे कहती हैं वर्दी के जुल्म से सच नहीं डरेगा। जख्मों से चेहरा भर गया है,मगर मुझे हर बार दोगुने साहस और हिम्मत से सच का साथ देने की ताकत देता रहेगा।
0 रमेश कुमार ‘‘रिपु‘‘
                 छत्तीसगढ़ में माओवादी हैं तो सुरक्षा बल है। सुरक्षा बल है तो सोनी सोरी की आवाज है। जो वर्दी से उभरने वाली दरिंदगी के खिलाफ गूंजती है। सोनी सोरी का नाम आज छत्तीसगढ़ में किसी परिचय का मोहताज नहीं है। इस आदिवासी बाला को आज बेहद इज्जत की नजरों से देखा जाता है।सामाजिक कार्यकत्र्ता हिमांशु कुमार के मार्ग दर्शन में पढ़ी लिखी यह आदिवासी महिला कभी जबेली स्थित आदिवासियों के सरकारी स्कूल में एक शिक्षिका थी। उनके पिता मदरू राम सोरी 15 साल तक गांव के सरपंच रहे। चाचा नदानाम सोरी सीपीआई के पूर्व विधायक हैं।भाई सहदेव सोरी कांग्रेस में हैं और भतीजा लिंगाराम ने दिल्ली से पत्रकारिता का डिप्लोमा लिया है। सोनी के पति अनिल पुताने को पुलिस माओवाद के साथ आरोप में जेल भेज दिया था,बाद में उनकी मौत हो गई। सन् 2003 में सोनी सोरी ने आप‘ पार्टी के टिकट पर सांसद का चुनाव लड़ा तब से वे ‘‘आप‘‘ के बैनर तले इस क्षेत्र में नक्सलवाद को लेकर आवाज उठा रही है। दंतेवाड़ा जिले में खासकर जहां सोनी सोरी और लिंगा राम रहते हैं,पालनार,समेली,जबेली,और गीदम माओवादियों के गढ़ माने जाते हैं। घने जंगलों में अच्छादित इस इलाके में नक्सलियों और सीआरपी दोनों के ठिकाने हैं।यही वजह है कि यहां हत्यायंे और प्रति हत्यायें दोनों सक्रामक रोग की तरह फैली हुई है। यहा रहना एक सजा है। क्यों कि यहां रहते हुए माओवादियों का  साथ दिया तो पुलिस आपको मार देगी और यदि पुलिस का साथ दिया तो नक्सली मार देंगे। सम्पन्न आदिवासी परिवार से ताल्लुकात रखने वाली सोनी सोरी के पीछे भी पुलिस पड़ गई थी। सन् 2011 में पुलिस ने आरोप लगाया कि माओवादी लिंगाराम कोडपी को एसार के ठेकेदार बी.के.लाला 15 लाख रूपये देते पकड़ा गया और माओवादियों की सहयोगी सोनी सोरी फरार हो गई। पुलिस के इस आरोप के बाद सोनी सोरी कई मुश्किलों से जूझते हुए दिल्ली पहुंची और वहां उन्होंने कुछ मानवाधिकार कार्यकत्र्ताओं से मदद की गुहार लगाई।सोनी सोरी पर इससे पहले भी पुलिस कई फंदे डाल चुकी थी।7 जुलाई 2010 को क्षेत्र के कांग्रेसी कार्यकत्र्ता गौतम के घर डेढ़ सौ नक्सलियों ने हमला किया था। 15 अगस्त 2010 को कुआंकोंडा का नया तहसील आॅफिस एक बम धमाके में पूरी तरह घ्वस्त हो गया था और 16 सितंबर 2010 को नक्सलियों ने नरली में कुछ ट्रकों में आग लगा दी थी। इन सभी मामलों में पुलिस ने कोर्ट में पेश किये गये चालान में सोनी सोरी को आरोपी बनाया था। लेकिन यहां पुलिस अपने ही बुने जाल में फंस गई क्यों कि जिन तारीखों में यह घटनायें हुई दिखाई गई थीं,उन दिनों में सोनी सोरी लगातार जबेली स्कूल जाती रही थीं। जिसका सबूत वह रजिस्टर है जिस पर वो हर दिन अपनी हाजिरी भरती थीं। एसार मामले में सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद अंततः सोनी सोरी को जमानत मिल गई। आज सोनी सोरी आदिवासियों के बीच संघर्ष का चेहरा बन चुकी हैं।वर्दी से उभरने वाली दरिंदगी और महिलाओं से कू्रर व्यवहार की खिलाफत करना सोनी सोरीं का एक मात्र मकसद है। उनकी आवाज को दबाने-कुचलने की हर संभव कोशिश हो रही है। दिल दहला देने वाले सव को लगातार सामने लाने का साहस दिखाने पर उनके ऊपर एसिड अटैक हुआ। लेकिन उनकी हिम्मत टूटी नहीं। वे कहती हैं वर्दी के जुल्म से सच नहीं डरेगा। जख्मों से चेहरा भर गया है,मगर ये जख्म मुझे हर बार दोगुने साहस और हिम्मत से सच का साथ देने की ताकत देते रहेंगे। सोनी सोरी से ओपिनियन पोस्ट की लम्बी बातचीत -

0 आपॅरेशन प्रहार एक दो तीन चार से क्या नक्सली कमजोर हुए हैं।
डाॅ रमन सिंह जब मुख्यमंत्री थे तब वे ऐसा कहते थे। ऐसा लगता है कि पुलिस अफसर उन्हें ऐसी रिपोर्ट देते रहे होंगे कि नक्सली कजारे हुए हैं। आॅपरेशन प्रहार से नक्सली मारे गये हैं तो जवान भी शहीद हुए है। जो ऐसा कह रहे हैं कि आॅपरेशन प्रहार से नक्सली कमजारे हुए हैं,उनका भ्रम है। बिलकुल भी नक्सली कमजोर नही पड़े है। सच तो यह है कि इस अभियान से आदवासियों पर अत्याचार बढ़ा है।
0 रमन सरकार कहती रही है कि लाल गलियारे का क्षेत्र अब पहले से कम हो गया है। क्या यह मान लिया जाये कि रमन सरकार आगे भी रहती तो नक्सलवाद खत्म हो जाता?
00 रमन सरकार रहती तो नक्सलवाद और बढ़ गया। वारदात तो हर दिन हो रही है। वारदात यदि कम होती तो माना जाता कि नक्सलवाद खत्म होता। आये दिन आदिवासी मारे जाते रहे हैं जवान शहीद होते रहे हैं। सलवा जुड़ूम ने आदिवासियों को बहुत नुकसान किया। नक्सलवाद को खत्म करने रमन सरकार ने सलवा जुडूम को बढ़ावा देकर सबसे बड़ी गलती की।
0 कांग्रेस की सरकार आने से क्या नक्सलवाद खत्म होेने की संभावना है।
00 बस्तर की शाति के लिए कांग्रेस सरकार से बातचीत करेंगे। राहुल गांधी कहते हैं बदलाव लायेंगे। लेकिन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल नक्सलाद को लेकर जिस तरह अपने बयान बदल रहे हैं,उससे ऐसा लगता है कि ये सरकार भी अभी नक्सली समस्या के निराकरण के प्रति गंभीर नहीं है। लेकिन यदि सरकार हम लोगों को बुलाकार बात करती है तो हम बात जरूर करेंगे।
0 छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद खत्म नहीं होने के पीछे पुलिस का कितना हाथ है मानती हैं।
00 पुलिस को सरकार जो आदेश देती है वो वैसा करती है। इससे इंकार भी नहीं किया जा सकता कि ऐसी कई वारदातें हुई हैं बस्तर में जिसमें पुलिस का सीधे हाथ रहा है। सामूहिक बलात्कार और नक्सली बताकर पुलिस ने कईयों को गोली मार दी।  बस्तर के आदिवासियों के साथ जितना जुल्म होगा,बेराजोगारी बढ़ेगी,मार पीट किया जायेगा,सरकार जुल्म करेगी,आदिवासियों को नक्सली बताकर जेल में डाल देना,अच्छी शिक्षा की कमी और महिलाओं केे साथ जुल्म और जल जंगल जमीन से आदिवासियो को जितना बेदखल किया जायेगा नक्सलवाद उतना बढ़ेगा।
0 पुलिस कहती है कि नक्सली जब तक रहेंगे तब तक सोनी सोरी की राजनीति चलती रहेगी।
00 पुलिस से हमारा कोई बैर नहीं है। हमारी लड़ाई सरकार से है। पुलिस में जो हैं,वो भी किसी न किसी के बेटे हैं। पुलिस अपनी रोजी रोटी के लिए सरकार के इशारे पर काम करती है। मुझ पर जो आरोप लगाये गये हैं गलत है कोर्ट ने भी माना है। पुलिस मुझे नक्सली बताकर कई मामले दर्ज की। हम कोर्ट में उसकी लड़ाई लड़ रहे हैं। चार मामले खारिज हो चुके हैं। कुछ मामले चल रहे हैं। कोर्ट तय करेगा कि मै सही हॅू या फिर गलत। आदिवासियों के साथ पुलिस जब तक नक्सलियों की आड़ में जुल्म ढाती रहेगी तब तक सोनी सोरी की आवाज उठती रहेगी।
0 पुलिस कहती है कि आप नक्सलियों से मिली हैं। नक्सली आप से मिलते रहते हैं। यह आरोप या सच भी है।
00 सरकार ने मुझे बदनाम किया। मै टीचर थी। मुझे नक्सली बताया गया। मेरे भाइयों को बेदखल किया गया। यदि मै नक्सलियों की मददगार होती तो नक्सली मेरे पिता की हत्या न करते। उनसे मेरे अच्छे तालुकात होते तो मै अपने पिता को बचा लेती।
0 क्या जो नक्सली सरेंडर किये हैं वो खुश हैं ऐसा मानती हैं
00 सरेंडर को मै जायज नहीं मानती। जो व्यक्ति 10-15 साल तक नक्सली रहा है। उसके साथ अत्याचार और जुल्म होने की वजह से वह नक्सली बना। उसके सरेंडर करने के बाद उसे पुलिस बना कर उसके हाथ में बंदूक थमा दिया गया। गांवों वालों को नक्सलियों का मुखबिर कहकर उनके साथ मारपीट करता है। नक्सलियों के खिलाफ बंदूक उसे दे दिया गया मारने को। यानी नक्सली होकर गोली मारे तो अपराधी है,और पुलिस बनकर अपने आदिवासी भाइयों पर गोली चलाये तो शबासी। यह नीति गलत है।
0 बस्तर आई जी रहे एस आर कल्लूरी का जाना ठीक था या फिर उन्हें कुछ दिन और रखा जाना ठीक था।
00 उनका रहना बस्तर के लिए ठीक नहीं था। उनके चले जाने से बस्तर में हिंसा रूक गई ऐसा भी नहीं है। वे थे तब भी नक्सलियों का खौफ था आज भी है। पुलिस कई आदिवासियों को नक्सली बताकर जेल में डाल दी है। हम कोर्ट में मामला लगा रखे हैं।
0 पुलिस तो आपको माओवादियों की समर्थक कहती है,फिर ऐसी क्या वजह है कि पुलिस ने सरकार से आपको वाय श्रेणी की सुरक्षा देने की वकालत की?
00 पुलिस सच का साथ देने वालों से डरती है। सच से डरती है। निहत्थी औरत से डरती है। मुझे भी अचंभा हुआ कल तक जिस सोनी सोरी को राज्य सरकार माओवादियों की मुखबिर कहकर जेल में डाल दी थी। उसी को वाय श्रेणी कीे सुरक्षा देने की पेशकश की। आखिर ऐसा क्यों? क्या सोनी सोढ़ी बदल गई या फिर सरकार बदल गई। उसे भी लगने लगा कि सोनी माओवादी की मुखबिर नहीं है या फिर बस्तर के आईजी एस.आर.पी. कल्लुरी के खिलाफ उठने वाली ऊगलियों ने उन्हें अंदर तक डरा दिया। आनन फानन में उन्होंने मुझे वाय श्रेणी की सुरक्षा देने सरकार से सिफारिश किए। दरअसल रमन सरकार अपनी साख बचाने के लिए सियासी नाटक की है। सरकार और कल्लुरी यह बाताना चाहते हैं कि वे आदिवासी औरतों के शुभचिंतक हैं। जबकि बस्तर की महिलाएं वर्दीधारी गुंडों की वजह से बहुत ही नारकीय जीवन जी रही हैं।
0 क्या आप उन लोगों को पहचानती हैं,जिन्होंने आप पर एसिड अटैक किया?
00 मेरे साथ कभी भी गंभीर वारदात हो सकती है। पुलिस क्या करने वाली है इसकी भनक मुझे मेरे एक शुभ चिंतक से मिल गई थी। लेकिन ऐसा होगा,इसकी उम्मीद नहीं थी। यदि उस शुभ चिंतक का नाम उजागर कर देती तो पुलिस उसे नक्सली बताकर मार देती। एसआईटी मामले की जांच कर रही है। देखना चाहती हॅंू कि पुलिस किसे आरोपी बनाती है। वैसे इस वारदात की पुलिस तो कई कहानियंा बनाकर मीडिया को दे चुकी है। 
0 आपके साथ हुए वारदात मे क्या बस्तर के आईजी का हाथ हो सकता है?
00 बस्तर के आईजी एसआरपी कल्लूरी मुझ पर हुए एसिड हमले के साजिशकर्ता हो सकते हैं। इस हमले से आईजी के अलावा किसी और को कोई फायदा नहीं होगा। वे मुझे और मेरे रिश्तेदारों को सालभर से परेशान कर रहे हैं। मेरी बहन,पिता और भतीजे को उठा ले गए। भतीजे पर दबाव बना रहे हैं कि वह हमले की जवाबदारी ले ले, ताकि उसके खिलाफ कोर्ट में दस्तावेज पेश कर सकें। आईजी एस.आर.पी. कल्लुरी मेरे पिता को बुलाकर कहे ,‘‘उनकी बेटी गंदी और नंगी औरत है। मै उन्हें बताना चाहूंगी कि दुनिया में कोई भी औरत गंदी नहीं होती। सोच गंदी होती है। आप को जिस मां ने पैदा किया है वो भी गंदी नहीं है। आपकी कार्य प्रक्रिया गंदी है। गरीब आदिवासियों को नक्सली बताकर उन्हें रास्ते से हटाने की साजिश करते हो,इससे बड़ा गंदा काम और क्या होगा।
0 मामले की जांच तो एसआईटी कर रही है। क्या आपको पूरी मदद मिलेेगी,ऐसा भरोसा है?
00 मै तो दिल्ली से आने के बाद एसआईटी के अधिकारियों को ढूंढ रही हॅू कि मेरा बयान ले लें। लेकिन कोई भी अभी तक आया नहीं। आएं तो पता चले कि वो क्या पूछते हैं। अभी कुछ नहीं कह सकती कि मुझे उनसे मदद मिलेगी कि नहीं। पुलिस और सरकार के इशारे पर एसआईटी काम करेगी तो मदद मिलने की संभावना तो कम ही है।
0 पुलिस आपको माओवादी का समर्थक किस आधार पर कहती है।
00 माओवादी नहीं चाहते कि सरकारी स्कूल चलें। बच्चे पढ़ें। मै दंतेवाड़ा की जबेली पंचायत में शिक्षक थी। वहां माओवादी अक्सर आते जाते थे। माओवादी नहीं चाहते थे कि आश्रम में स्कूल चले। उन्होंने घोषणा कि आश्रम में स्कूलें लगाना बंद करें अन्यथा उन्हें गिरा देंगे। मै ने उनसे कहा कि आश्रम गिरा दोगे तो बच्चे कहां पढ़ेंगे। उनसे उनकी तालीम का हक न छीनो। उन्होंने कहा कि एक शर्त पर तुम्हारी बात मान ली जाएगी कि यहां पुलिस वाले नहीं ठहरेंगे। मै ने उन्हें इस बात का भरोसा दिलाया। आश्रम में पुलिस को ठहरने नहंीं दियां। प्रशासन को संदेह हुआ कि माओवादी मेरी बातें मानते है। पुलिस वालों ने कहा कि मै पुलिस की मुखबिर बन जाऊं। लेकिन इंकार कर दिया तो मुझे माओवादियों का समर्थक होने की साजिश कर, प्रचार किया गया। आज भी इस बात का विरोध कर रही हूूं।
0 लेकिन पुलिस का आरोप है कि माओवादियों को पैसा पहुंचाती हो।
00 पुलिस का काम है झूठा आरोप लगाना। आज तक यह सिद्ध नहंीं कर सकी कि मै माओवादियों के संपर्क में रहती हॅू। उन्हें उद्योगपतियों का पैसा पहुंचाती हॅू। जिस घटना से मुझे पुलिस जोड़ रही है,झूठ है। पैसा पहुंचाने के काम में मानकर नाम का एक पुलिस कर्मी सहित कुछ और लोग शामिल थे। जबकि पुलिस का कहना था कि मै माओवादियों को पैसा पहुंचा दूं तो तुम्हारे पति और तुम पर जो मामला दर्ज है, उसे खत्म कर दिया जाएगा। उनकी बातें नहीं मानी तो मुझे झूठे केस में फंसा दिए। चूंकि पहले से मुझ पर पुलिस का मुखबिर बनने का दबाव डाला जा रहा था। अपनी हार देखते हुए पुलिस मुझे झूठे केस में फंसाते आ रही है।
0 पुलिस से आपकी नहीं जमती। क्या यह मान लें कि कानून और पुलिस के बीच आपका छत्तीस का रिश्ता है?
00 मै कानून पर भरोसा करती हॅू। तभी तो अपने अंचल की महिलाओं के हक के लिए लड़ रही हॅू। उनके साथ पुलिस की ज्यादती के खिलाफ आवाज उठा रही हू। नहीं तो मै भी बंदूक उठाकर लाल गलियारे का रूख कर लेती। शिक्षिका बन कर बच्चों को जागृत क्यों करती कानून के प्रति और राष्ट्र के प्रति। माओवादियों की मै हितैषी होती तो मेरे पिता मुंडाराम के पैर में नक्सली गोली न मारते। मेरा घर न उजाड़ा जाता। माओवादी से पीड़ित होने का मुआवजा न दिया जाता। यदि मै पुलिस के अत्याचार और जुल्म के खिलाफ न बोलूं तो यही पुलिस कल से मुझे माओवादी या फिर माओवादी की समर्थक कहना छोड़ देंगे। लेकिन मै जख्मों से भरे चेहरे के बावजूद अन्याय के खिलाफ खड़ी होना नहीं छोड़ सकती।
00 क्या आप मानती है कि पुलिस भारी संख्या में जिन्हें माओवादी बताकर सरेंडर करा रही है वो सच में नक्सली ही है?
00 जिस तेजी से माओवादियों के सरेंडर करने की खबरे आ रही हैं,उस पर सभी को संदेह है। कई ऐसी वारदातों का खुलासा की हॅू,जिसमें पुलिस के आला अफसरों ने नक्सली बताकर जिन्हें शूट किया वे सब के सब ग्रामीण थे। उनका पुलिस के पास कोई अपराधिक रिकार्ड नहीं था। माओवादियों ने भी कई बार पाम्पलेट बांटकर कहा कि पुलिस जिन लोगों को मारी है या फिर पकड़ी है वे नक्सली नहीं है। पुलिस अपनी वाहवाही के लिए नकली नक्सली को  आत्मसमर्पण कराई है।
0 क्या यह सच है कि पुलिस ग्रामीणों को भी नक्सली बताकर मार देती है?
00 इसकी सूची बेहद लंबी है। सुकमा थाना क्षेत्र के अदलमपल्ली जंगल में गत 4 नवंबर को पुलिस ने तीन नक्सलियों को मुठभेड़ में मारने का दावा किया,किन्तु दोरनापाल थाने को घेरकर ग्रामीणों ने दावा किया कि मारे गए तीनों आदिवासी किसान थे,नक्सली नहीं। बीती कई घटनाएँ इस बात की साक्षी हैं, जिसमें चैपाल में इकठ्ठा हुए ग्रामीणों, खेतों में भेड़,बकरी चराने वाले या फिर महुआ बिन रही महिलाएं पुलिस को देखकर  डर कर भागने लगीं तो पुलिस ने उन्हें भून दिया। बात 7 मई 2013 को बीजापुर जिले के एड्समेटा में पूजा के लिए एकत्र हुए आदिवासियों को पुलिस एवं कोबरा बटालियन के जवानों ने घेर लिया और गोलियां बरसाईं। इस गोलीबारी में 3 बच्चों सहित 8 ग्रामीण मारे गए। पुलिस को जब अपनी गलती का एहसास हुआ तो इस घटना को उसने मुठभेड़ की शक्ल दे दी। 6 जुलाई 2011 को बलरामपुर जिले के चांदो थाना क्षेत्र के अंतर्गत लांगर टोला में 17 वर्षीय मीना खलको को पुलिस ने माआवोदी बताकर उस समय गोली मारी जब वह भेड़ों को चरा रही थी। अनीता झा न्यायिक आयोग की रिपोर्ट में उसकी हत्या एवं बलात्कार की पुष्टि हुई। इसके आधार पर तत्कालीन थाना प्रभारी सहित 25 पुलिस जवानों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज किया गया। गत 24 दिसंबर को चिंतलनार में 75 नक्सलियों के आत्मसमर्ण का ढिंढोरा पीटा गया। जबकि उसमें आधा सैकड़ा लोग ग्रामीण थे। घर में सो रहे हिड़मा को पुलिस ने मीटिंग के नाम पर उठा ले गई और हत्या कर बताया कि आठ लाख का इनामी नक्सली था। नुप्पो भीमा दंतेवाड़ा का रहने वाला किसान था। उसे माओवादी बताकर जवानों ने मार डाला।
0 बस्तर में माओवादी और सुरक्षा बलों के बीच चल रही जंग में कौन जीत सकता है?
00 कौन जीतेगा और कौन हारेगा मै नहीं जानती। लेकिन एक बात कहूंगी कि इस लड़ाई में दोनों तरफ से आदिवासियों की ही हार है। मर तो आदिवासी ही रहे हैं। वो चाहे नक्सली बनकर पुलिस की गोली से मरें या फिर माओवादियों को पनाह देने या फिर मददगार बनने पर पुलिस उन्हें प्रताड़ित करे अथवा माओवादियों के लिए काम नहीं करने पर नक्सलियों की गोली का शिकार हों।
0 बस्तर में महिलाओं को नक्सलियों से ज्यादा खतरा है या फिर पुलिस से,क्या मानती हो?
00 इस समय बस्तर में नक्सलियों की आड़ में पुलिस महिलाओं को शिकार बना रही है। वो चाहे मालिनी सुब्रहमणियम को प्रताड़ित करने का मामला हो या फिर दंतेवाड़ा,बीजापुर में सामूहिक बलात्कार का अथवा महिलाओं को अपने मातृत्व का प्रमाण देने का हो या फिर स्वयं सोनी सोरी हो। दंतेवाड़ा जेल में मुझे निर्वस्त्र रखा जाता था। जहां पुलिस वाले मेरे अंगों के साथ जंगली बर्ताव करते थे। (यह कहकर सोनी फफक कर रो पड़ी) दंतेवाड़ा एसपी ने तो मेरे गुप्तांग में पत्थर तक डाल दिए थे। बस्तर में आदिवासी महिलाओं के साथ पुलिस का बर्ताव शालीन नहीं है।
0 पुलिस की आॅखों की किरकिरी बनी हुई हो,खुद पर अब अटैक होने लगा है। ऐसे में क्या जीवन का कोई मकसद है?
00 बगैर मकसद के जीना भी कोई जीना है। जेल में थी तो कोई मकसद नहीं था। मर जाना चाहती थी। लेकिन जेल में महिलाओं की बुरी हालत और उनके साथ हुई घिनौनी वारदात ने जीने का मकसद तय कर दिया। बस्तर संभाग में आदिवासी महिलाओं के साथ घिनौने और बर्बर तरीके से पुलिस पेश आ रही है। यदि इनकी खिलाफत करने वाला कोई न हो तो जीना दुश्वार हो जाए। बहन,बेटियों को ऐसे आतताइयों का जुल्म सहते हुए सिसकने नहंीं दूंगी। चाहे पुलिस मेरा एनकांउटर ही कर दे।





Saturday, June 8, 2019

नक्सली बम से सांसें बेदम

                                                            नक्सली बम से सांसें बेदम
 नक्सलियों ने भाजपा विधायक सहित नौ जवानों की जान लेकर भूपेश सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया। कांकेर, धमतरी,राजनांदगांव और दंतेवाड़ा में हिंसक वारदात से स्पष्ट है कि नक्सली संख्या में कम हुए हैं,लेकिन कमजोर नहीं हुए हैं।

0 रमेश कुमार ‘‘रिपु‘‘
                सात अप्रैल को मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की राजनांदगांव के मानुपर में सभा होनी थी। लेकिन उनके पहुंचने के कुछ घंटे पहले नक्सलियों ने एक के बाद एक दो सीरियल ब्लास्ट मानपुर मोहला मुख्य मार्ग और ख्वास फड़की के पास कर, नक्सल डी.जी गिरधारी नायक की उस बात को गलत साबित कर दिये गये कि नक्सली कमजोर हुए हैं। सवाल यह है कि यदि नक्सली कमजोर हुए हैं तो सीरियल ब्लास्ट क्या बताने के लिए किया गया। जबकि माओवादी तीन आईडी बम लगा रखे थे। तीसरा ब्लास्ट नहीं हुआ, क्यों नहीं किया गया, यह पुलिस के लिए जांच का विषय है। जबकि पुलिस के आला अफसरों को पता है कि 2003 के विधान सभा चुनाव में झीरम घाटी में कांग्रेस ने अपने 29 नेताओं को खो दिया था।
गौरतलब है कि मानपुर इलाका घुर नक्सल प्रभावित क्षेत्र है। साल 2009 में नक्सलियों ने एक बड़ी घटना को अंजाम दिया था। तब तत्कालीन एस.पी वीके चैबे सहित 29 जवान शहीद हो गए थे। धमाके की चपेट में आकर आईटीबीपी का एक जवान घायल हो गया। जबकि राजनांदगांव में सुरक्षा की जिम्मेदारी आईटीबीपी के पास है। माओवादी मानपुर से परगोनी के बीच और अपने प्रभाव वाले इलाके में लोकसभा चुनाव के बहिष्कार का पोस्टर बैनर लगा रखे हैं। जगह जगह पर्चे फेक कर दहशत फैलाने का काम किया है। जम्मू,कश्मीर के अलगाववादी संगठनों के समर्थन में बैनर लगाकर खुफिया ऐजेंसी की नींदे उड़ा दी है। नक्सली जिला बीजापुर में तालाब के किनारे पर्चे देखे गये हैं। नक्सलियों ने पर्चे में लिखा है कि हमारे देश में मौजूदा लुटेरी व्यवस्था को उखाडकर उसकी जगह सच्ची जनवादी और स्वालंबन व्यवस्था का निर्माण करें। जाहिर सी बात है कि नक्सली क्षेत्र में चुनाव इस बार टेढ़ी खीर है।
नक्सली अपने रंग में
कांकेर,धमतरी के बाद राजनांदगांव में माओवादियों की वारदातों से एक बात साफ है कि नक्सली इस चुनाव में पूरी तरह अपने रंग में है। इसका प्रमाण है मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की राजनांदगांव के मानुपर में सभा से पहले लगातार विस्फोट होना। लगातार नक्सलियों की हिंसक वारदातों के बाद केन्द्र सरकार और राज्य सरकार के बीच भी नक्सलियों के किसी बड़े हमले की जानकारियों शेयर की गई। आत्मसमर्पित नक्सलियों ने भी बड़ी वारदात की सूचना पहले से ही दिये थे। राजधानी रायपुर में नौ अप्रैल को किसी बड़े नक्सली हमले को लेकर 27 इनपुट शेयर हुए। पुलिस के उच्चाधिकारियों से लेकर थाने के टीआई तक ने माओवादियों के हमले की जानकारी मिलने पर हमले की आशंका जताई।
रोका गया था मंडावी को
नक्सली मूवमेंट की सूचना मिलने पर विधायक भीमा मंडावी को छोटे रास्ते से जाने से मना किया गया था। बावजूद इसके वो चुनाव प्रचार के लिए अपने अंगरक्षकों के साथ बचेली से शाम को बुलेट पू्रफ वाहन से उसी रास्ते से लौट रहे थे,जहां नक्सली घात लगाकर बैठे थे। नक्सल प्रभावित क्षेत्र होने के कारण दंतेवाड़ा में चुनाव प्रचार दोपहर 3 बजे ही खत्म हो गया था। नुकुलनार थाने से 4 किलोमीटर पहले ग्राम श्यामगिरी के निकट माओवादियों ने ब्लास्ट किया। माओवादी इस घटना में करीब 70 किलो आईईडी का इस्तेमाल किया था। विस्फोट इतना शक्तिशाली था कि वाहन के परखच्चे उड़ गए। घटना स्थल पर दस फीट गहरा गड्ढा हो गया है। बारूदी विस्फोट में बुलेट पू्रफ वाहन में सवार जिला बल के 4 जवानों हेड कांस्टेबल छगन कुलदीप, रामलाल ओयामी, आरक्षक सोमड़ू कवासी एवं चालक दंतेश्वर राव सहित विधायक भीमाराम मंडावी शहीद हो गए। नक्सली शहीद जवानों की एक इंसास रायफल एवं दो एके 47 बंदूक एवं उनके कारतूस लूटकर ले गए हैं। विस्फोट के बाद छिपे नक्सलियों ने आधे घंटे तक फायरिंग की। दंतेवाड़ा के एस.पी अभिषेक पल्लव ने कहा,पुलिस के पास इस किस्म के हमले की सूचना थी। इसलिए एक बूथ को शिफ्ट भी किया गया था और मंडावी को इसकी सूचना दी गई थी। नक्सल डीजी गिरधारी नायक ने दावा किया कि झीरम घाटी कांड की तरह ही नक्सलियों ने इस अटैक की तैयारी की थी। उल्लेखनीय है कि इसी मार्ग पर 28 फरवरी 2014 में नक्सलियों द्वारा किए गए ब्लास्ट में टीआई विवेक शुक्ला सहित 5 जवान शहीद हो गए थे। स्पेशल डी.जी डी.एम अवस्थी ने बताया, भाजपा विधायक को पहले ही जानकारी दी गई थी कि कुआकोंडा के पास इस रूट पर सुरक्षा मौजूद नहीं है और उन्हें वहां नहीं जाना चाहिए’’। 
स्टार प्रचारक सहमे
लाल आतंक के खौफ का आलम यह है कि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और आबकारी मंत्री कवासी लखमा के आलाव कोई बस्तर में चुनाव प्रचार करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। डाॅ रमन सिंह,मोदी और अमित शाह जाने से बचते रहे हैं। वहीं नक्सलियों ने अपने हमले का तरीका बदल दिया है। अब वे पुलिस सर्चिग पार्टी पर हमले करने की बजाय कस्बाई क्षेत्र में स्थित थानों,कैम्प और चैकियों को निशाना बना रहे हैं। चूंकि बारिश में नक्सली कमजोर पड़ जाते है। गरमी में वो जंगलों से बाहर निकल आते हैं। अप्रैल से जून तक वे टेक्टिकल काउंटर आॅफेंसिव कैपेन (टीसीओसी) चलाते हैं। इसलिए चुनाव कराना थोड़ा कठिन काम है।
नक्सली बौखलाये क्यों
चुनाव से पहले माओवादियों की हिंसक वारदातों में इजाफा इस बात का संकेत हैं कि वे नहीं चाहते कि राज्य में चुनाव हो। 4 अप्रैल को कांकेर के पखांजूर से 35 किलोमीटर दूर मोहल्ला जंगल में मुठभेड़ में बीएसफ के चार जवान शहीद हुए।गौलतलब है कि 18 फरवरी 2018 को बीएसएफ का कैंप महला गांव में खोले जाने का नक्सलियों ने विरोध किया,क्योंकि कोयलीबेड़ा विकासखंड का गांव महला कभी नक्सलियों का गढ़ हुआ करता था। यहां कैंप खुलने के बाद से नक्सली बैकफुट पर चले गए थे। नक्सली कैंप खुलने के बाद से अब तक यहां के जवानों पर तीन बड़े हमले कर चुके हैं। जिसमें सालभर में 6 जवान शहीद हुए हैं। धमतरी के बोरई थाना के चमेदा गांव के पास साले भाट के जंगल में पांच अप्रैल को घात लगाए नक्सलियों ने सर्चिंग टीम में शामिल 45 जवानों पर नक्सलियों ने अंधाधुंध फायरिंग की। इस हमले में सीआरपीएफ 211 बटालियन के हेड कांस्टेबल हरिश्चंद्र पाल शहीद हो गए। वही कांस्टेबल सुधीर कुमार घायल हो गया। हाल ही में धमतरी पुलिस ने  6 लाख के इनामी सीतानदी के एरिया कमांडर अजित मोडियाम सहित दो नक्सलियों को गिरफ्तार किया था। इसके बाद से ही नक्सली बौखलाए हुए हैं। गौरतलब है कि 2009 में भी इसी इलाके के पास रिसगाव में एक बड़ा नक्सली हमला हुआ था। जिसमे 13 जवान शहीद हुए थे। आशंका है कि नक्सलियों ने चुनाव में गड़बड़ी करने के लिए खासी तैयारी कर रखी है। वहीं पुलिस के सामने चुनौती है नक्सलियों के काले मंसूबों को नाकाम कर निष्पक्ष और निर्भीक मतदान कराना। वहीं कांकेर के पखांजूर महल के जंगल में दो सौ की संख्या में नक्सलियों का हमला करना इस बात का संकेत हैं कि वे पूरी तैयारी में रहते हैं।
नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक ने कांकेर में नक्सली मुठभेड़ में चार जवानों के शहीद होने पर कहा कि    प्रदेश सरकार की ढुलमुल नीतियों के चलते पिछले तीन माह में नक्सली आतंक की काफी वारदातें हुई हैं। पूर्ववर्ती प्रदेश भाजपा सरकार ने सख्ती से नक्सली गतिविधियों पर काबू पाया था लेकिन, मौजूदा सरकार के ढुलमुल रवैए और स्पष्ट दृृष्टिकोण के अभाव के चलते नक्सली फिर खून,खराबा कर दहशतगर्दी का खेल खेलने लग गये हैं’’।
अलगाववादी संगठन से संबंध
कांकेर में 11 अप्रैल को मतदान कराने फोर्स का दबाव बढ़ा तो नक्सली धमतरी जिले के सिहावा,बोरई और खल्लारी क्षेत्र में दस्तक दे दिये। इस क्षेत्र में सीतानदी दलम और गोबरा दलम सक्रिय हैं। गौरतलब है कि नक्सली इन्ही दो दलम की मदद से बोरई में छिपे हैं। बोरई में सीआरपीएफ के जवानों को डेरा है,इसलिए मुठभेड़ की संभावना बढ़ जाती है। माओवादियों ने पुलिस की परेशानी बढ़ा दिये हैं। दरअसल अरनपुर थाना क्षेत्र के नीलावाया मार्ग पर नक्सलियों ने जम्मू,कश्मीर के अलगाववादी संगठन (जेकेएलएफ) जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के समर्थन में पोस्टर बैनर लगाये। पोस्टर और बैनर में नक्सलियों ने जम्मू,कश्मीर के अलगाववादी संगठन जेकेएलएफ पर प्रतिबंध को केंद्र की मोदी सरकार की तानाशाही, ब्राह्मणवादी फासिस्ट नीति का नतीजा करार दिया है। नक्सलियों के जेकेएलएफ के समर्थन में आने से खुफिया एजेंसियां अन्य आतंकी व अलगाववादी संगठनों से उनके तार जुड़े होने की आशंकाओं की पड़ताल कर रही हैं।
भूपेश सरकार से खफा
नक्सली भूपेश सरकार से खुश नहीं हैं। उन्होंने अपने बैनर के जरिये आरोप लगाया है कि भूपेश सरकार फर्जी मुठभेड़ में ग्रामीणांे को मार रही है। ताड़बल्ला और गोरडेलगुडा मुठभेड़ को फर्जी बताया है। इनमें नक्सलियों ने अपने 13 साथियों के मारे जाने का जिक्र भी किया है। जबकि दंतेवाड़ा पुलिस के समक्ष सरेंडर करने वाला नक्सली पनसराम वट्टी ने बताया कि सभी नक्सली ही थे। पनसराम नक्सलियों की इंद्रावती एरिया कमेटी प्लाटून नम्बर 16 का कमांडर है। जिस वक्त यह घटना हुई थी उसमें पनसराम भी शामिल था। सरेंडर नक्सली ने बताया कि 6 फरवरी को बीजापुर के इन्द्रवती नदी पार ताड़बला में नक्सली बम बनाने व हथियार चलाने की ट्रेनिंग ले रहे थे। जहां हमला हुआ वह ट्रेनिंग कैम्प था। यहां तीन दिनों से हथियार चलाने, बम बनाने की ट्रेनिंग दी जा रही थी। यहां हर दिन सुबह 8 बजे से ट्रेनिंग शुरू होती थी। वर्दी पहनकर ही ट्रेनिंग दी जाती थी। बहरहाल बारिश शुरू होने से पहले तक नक्सली छग में अपना रंग दिखाते रहेंगे।
 
 



Saturday, May 24, 2014

जीने के लिए दर्द संभालने होंगे..

जीने के लिए दर्द संभालने होंगे.. हर आंसू पूछता है,सियासत के कितने नए सौदागर आएंगे। सत्ता के कितने सिंकदर आएंगे। कितने चुनाव के बाद दहशत की परछाइयांे का डोलना बंद होगा। कितनी सांसे सरकार के लिए कुर्बान होंगी। कितनी नक्सली गोलियां प्रदेश की रखवाली करने वाले जवानों को सीने में खानी पड़ेगी। मौत और विधान सभा के बीच कितनी दूरियां हैं,कोई बताएगा,अबकी बार,मोदी सरकार में। कायनात की घाटी झीरम घाटी। जो अब बन चुकी है मौत की घाटी। मौत की नई कहानी का सिलसिला थमता ही नहीं। नक्सलियों के कब्जे में यह घाटी आए दिन दर्द के बही खाते खोल देती है। झीरम घाटी में नक्सलियों ने कइयों को मौत की नींदें दी और दे भी रहे हैं। लेकिन चैकाने वाली बात यह है कि सरकार नक्सलियों के आगे अब भी बेबस है। सरकार के लिए कितनी जानें कुर्बानी देंगी और शहीदों की पट्टिका में नाम लिखे जाने का सिलसिला चलेगा, इसका जवाब सरकार के नुमाइदों के पास नहीं है। हमेशा की तरह एक ही जवाब, हम नक्सलियों को मुंह तोड़ जवाब देंगे। सरकार ने अपनी तरफ से कभी नक्सलियों की गोली का शिकार हुए लोगों की याद में शहीद दिवस मनाने का निर्णय नहीं लिया। अलबत्ता मौत का मुआवजा बांटने में अपने हाथ सिकोड़े नहीं,यही वजह है कि भीड़ से कभी उसके खिलाफ आवाज नहीं उठी। लेकिन मौत का मुआवजा बांट देना ही सरकार की जवाब देही है,ऐसा कहकर सरकार को कटघरे में खड़े करने से नहीं रोका जा सकता। इसलिए कि सरकार की जवाबदेही है कि वो आम आदमी की जिन्दगी की सुरक्षा करे। मगर चैकाने वाली बात यह है कि छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद से जिस गति से इस नये राज्य का विकास हुआ,उसी गति से नक्सलियों की ताकतों में इजाफा हुआ। जाहिर है कि अदावत और शहादत के खेल में सियासत का बहुत बड़ा योगदान रहा है। अभी तक केवल आम आदमी और पुलिस के जवान ही नक्सली गोली के शिकार होते रहे हैं। लेकिन 25 मई 2013 की शाम ने छग के माथे पर दर्द की जो रेखा खींच दिया वो दर्द आज भी कइयों के आॅखों से महुए के रस की तरह आंसू बनकर टपक रहा है। यह एक ऐसा दर्द है जो सदियों तक आत्मा की शिराओं में रिसता रहेगा। हर आंसू सरकार से पूछता है कि जीने के लिए क्या दर्द को सम्हालने होंगे। दर्द को श्रद्धाजलि देने के कई सियासी उपक्रम हैं। इसी बहाने शहीद हुए लोगों को नमन करने और याद करने की इच्छाएं आकार लेती है दिल के किसी कोने में। यह हर साल होगा। कांग्रेस के मंच पर। कांग्रेस ने झीरम घाटी में बहुत कुछ खोया। जिनके दम पर कांग्रेस छग में सांसे लेती थी,अब वो न तो कांग्रेस के बीच हैं और न ही जनता के बीच। सरकार ने झीरम घाटी की पहली बरसी के तीन दिन पहले जस्टिस प्रशांत मिश्रा आयोग को 18 पेज का शपथ पत्र और 200 पेज का दस्तावेज सौप कर बता दिया कि झीरम घाटी में क्या हुआ। झीरम घाटी 25 मई को मौत की घाटी कैसे बनी,इसे बताने में सरकार को एक बरस लग गए। किसी को जिन्दगी देने में कई बरस लग जाते हैं, मगर मौत देने में पल दो पल। कांग्रेस अपने नेताओं की याद में 25 मई को शहीद दिवस मनाने जा रही है। शहादत पर सियासत अच्छी बात नहीं है। लेकिन नक्सलियों की गोली का शिकार कोई बड़ा नेता हो और उसकी मौत पर भी सियासत ना हो, ऐसा कभी हुआ नहीं। 25 मई 2013 की घटना के बाद से लेकर आज तक भाजपाई और कांगे्रसी तंबू में मौत पर सियासत हो रही है। इतने बड़े हमले के पीछे कौन सी आॅखें गड़ी थी, जांच में सामने नहीं आया है। लेकिन अंदेशा और शक की सुई जिस नेता पर घूम रही है,वो घूमती रहेगी,उन सबके दिलों में जो अपनों को खोए हैं। घटना दर घटना हो रही है। घाटी खून से रंग रही है। ना नक्सली बदले और न ही नक्सल आॅपरेशन का तरीका बदला। ना सरकार बदली और न ही उसका सिस्टम। बदलाव इतना ही हुआ,पहले गृहमंत्री थे ननकी राम कंवर,अब अब रामसेवक पैकरा हैं। जिनके पास सिर्फ सियासी जवाब हैं। चुनाव की चलते नक्सलियों पर नकेल लगाने और झीरम घाटी में हुए हादसों पर कोई ठोस निर्णय नहीं ले सके। लेकिन इस बात को स्वीकारते हैं दमदारी के साथ, इस दिशा में काम होना चाहिए था। केन्द्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद से लाल गलियारे के फैलाव पर रोक लगने का भरोसा जताते हैं। सरकारी लापरवाही के चलते अब तक डेढ़ सौ से अधिक लोगों की जानें जा चुकी है। यह सिलसिला यहीं थम जाएगा,इसका दावा न तो सरकार कर सकती और ना ही नक्सलियों की मांद में जाकर मुंह तोड़ जवाब देने का दावा करने वाली पुलिस। पुलिस और नक्सलियों के बीच 2013 से अप्रैल 2014 तक सवा दौ सौ बार मुठभेड़ हो चुकी है। 662 नक्सलियों को गिरफ्तार करके पुलिस अपनी पीठ थपथपा सकती है। लेकिन सच्चाई तो यही है कि जो दर्द नक्सलियों की गोली से मिले हैं,सरकार की लापरवाही के चलते, वो संभाले नहीं संभलते। लोग टूट गए है। हर आंसू पूछता है,सियासत के कितने नए सौदागर आएंगे। सत्ता के कितने सिंकदर आएंगे। कितने चुनाव के बाद दहशत की परछाइयों का डोलना बंद होगा। कितनी सांसे सरकार के लिए कुर्बान होंगी। कितनी नक्सली गोलियां प्रदेश की रखवाली करने वाले जवानों को सीने में खानी पड़ेगी। मौत और विधान सभा के बीच कितनी दूरियां हैं,कोई बताएगा,अबकी बार,मोदी सरकार में।

Friday, March 1, 2013

उस राह पे चलें जहां दो दिल जुड़ जाते हैं.....

 उस राह पे चलें जहां दो दिल जुड़ जाते हैं
वो बातें न करें जिससे रिश्ते बिगड़ जाते हैं

तेरा मेरा  रिश्ता है जैसे  सुई और धागे का
फिर  क्यों  संबंधों के  धागे  उखड़ जाते हैं

मुहब्बत  से  न बोलूं ,अब  एतराज  होता है
प्यार की जुबां से,नफरत वाले उखड़ जाते हैं

प्यार में नींद  नहीं आती, गोली खाने  से भी
ये वो  जादू है, चेहरे  के रंग  उड़  जाते है

कितना भी घना हो, नफरत का जंगल  रिपु‘
वक्त की  आंधियों  में, सब उजड़  जाते हैं

                     0 रमेश कुमार ‘रिपु‘
                     मे. 09300244876