Thursday, October 24, 2019

जोगी के लिए मुश्किलों का पहाड़


अजीत जोगी अपने ही बनाये फंदे में फंस गये हैं। उन पर गिरफ्तारी के साथ ही उनकी विधायकी पर भी तलवार लटक रही है। अंतागढ़ उप चुनाव कांड में अजीत और अमित जोगी आरोपी हैं। जेसीसी के प्रदेश अध्यक्ष अमित जोगी के जेल से बाहर निकलने की संभावना कम है। ऐसे में सवाल है कि जोगी की पार्टी बचेगी या खत्म हो जायेगी।








0 रमेश कुमार ’’रिपु’’
                   ’’छत्तीसगढ़ में तीसरी राजनीतिक ताकत जोगी की पार्टी है’’। डाॅ रमन सिंह कभी यह कहकर जोगी का राजनीतिक कद बढ़ाया था। वहीं जोगी की पार्टी को भाजपा की ‘बी’ टीम कांग्रेस कहती आई है। आज पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी और उनका पुत्र अमित जोगी की सियासत के सितारे गर्दिश में हैं। और छत्तीसगढ़ की तीसरी सियासी ताकत इन दिनों संकट के दौर से गुजर रही है। जेसीसी (जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़) के प्रदेश अध्यक्ष अमित जोगी को अपनी नागरिकता की गलत जानकारी देने के आरोप में सेशन कोर्ट ने जेल भेज दिया है। वहीं छत्तीसगढ़ की आदिवासी कल्याण विभाग की उच्चाधिकार हाई पावर कमेटी ने अजीत जोगी को आदिवासी मानने से इंकार कर  दिया है। अजीत जोगी के खिलाफ समीरा पैकरा की शिकायत पर धारा 420,467,468,471 के तहत अपराध दर्ज किया गया है। अंतागढ़ टेप कांड मामले में जोगी के खिलाफ एक नया मोड़ तब आ गया है। अंतागढ़ उप चुनाव कांड के आरोपी पूर्व विधायक मंतूराम पवार ने उपचुनाव को प्रभावित करने के लिए 7.50 करोड़ रूपये के लेन देने का खुलासा प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्टेªट नीरज श्रीवास्वत की कोर्ट में कलमबंद बयान दर्ज कराया। उन्होंने कहा कि उन्हें एक पैसा नहीं दिया गया। 2014 में हुए अंतागढ़ उप चुनाव के सौदे में फिरोज सिद्दकी और अमीन मेनन की भूमिका बिचैलिये की थी। डाॅ रमन सिंह का पहली बार नाम अंतागढ़ मामले में सामाने आया है। इससे राजेश मूणत,अजीत जोगी,अमित जोगी की मुश्किलें बढ़ सकती है। इन तीनो के खिलाफ पंडरी थाने में केस दर्ज है। मामले की जांच एसआइटी कर रही है। इस कांड की जारी सी.डी में इन सभी नेताओं की आवाज होने की आशंका है,लेकिन किसी ने भी अपनी आवाज का सेम्पल एसआइटी को अभी तक नहीं दिया। अब मंतूराम पवार के इस शपथ पत्र से जोगी परिवार पर एक और मुश्किल बढ़ गई। वहीं जेसीसी के मीडिया विभाग के अध्यक्ष इकबाल अहमद रिजवी ने कहा, बीजेपी में रहते हुए मंतूराम पवार ने जिस तरह का बयान दिया है, इससे साफ जाहिर है कि वे कांग्रेस प्रवेश करने वाले हैं। कांग्रेस से मिले प्रलोभन के कारण ही वे इस प्रकार का बयान दे रहे हैं’’। पूर्व मुख्यमंत्री डाॅ रमन सिंह ने कहा,’’ दंतेवाड़ा उप चुनाव नजदीक है।  पहली बार मेरे खिलाफ राजनीतिक षडयंत्र के तहत मेरा नाम उछाला गया है। कांग्रेस की सोची समझी रणनीति के तहत मंतूराम पर दबाव बनाकर यह बयान दिलवाया गया है। इससे पहले भी मंतूराम ने विभिन्न न्यायलयों में शपथ पत्र पर बयान दिया है कि उन्होंने स्वेच्छा से अपना नामांकन वापस लिया था। और इस प्रकरण में पैसा का किसी तरह से कोई लेने देन नहीं हुआ था। इस संबंध में कोर्ट में अपना पक्ष रखूंगा’’। 
कोर्ट ने की गंभीर टिप्पणी
अजीत जोगी के खिलाफ दर्ज मामले से अब वे विधायक रहेंगे या नहीं, 19 सितंबर से कोर्ट इस मामले कीें सुनवाई करेगी। चूंकि अजीत जोगी की पार्टी जेसीसी (जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़) जोगी घराने के इर्द गिर्द घूमती है। अजीत जोगी अपनी पार्टी के सप्रीमों हैं। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर बनी हाई पाॅवर कमेटी की रिपोर्ट पर,इसकी संभावना कम ही है कि हाई कोर्ट जोगी की जाति को लेकर कोई अलग से निर्णय देगी। उनकी विधायकी खत्म होने की आशंका ज्यादा है। वहीं अमित जोगी को हाई कार्ट से बेल मिलने की संभावना कम बनती दिख रही है। उसकी वजह यह है कि सेशन कोर्ट के जज विनय प्रधान ने अपने फैसले में कहा,’’ प्रजातंत्र के पावन धरा पर विधानसभा का सदस्य निर्वाचित होने के लिए फर्जी दस्तावेज तैयार किये हैं। अपराध की गंभीरता को देखते हुए जमानत याचिका खारिज की जाती है’’। वहीं रायपुर की विशेष मजिस्टेट लीना अग्रवाल ने अंतागढ़ टेपकांड मामले में आरोपी जेसीसी के प्रदेश अध्यक्ष अमित जोगी को ट्रांजिट रिमांड पर अदालत में पेश करने का आदेश दिया है। गौरेला पुलिस को पेशी के लिए 12 सितंबर तक का वक्त दिया है।  तीन बड़ी अपराधिक घटनाओं के बाद जेसीसी पार्टी को लेकर सियासी अटकलों का बाजार गर्म है। जोगी की पार्टी जेसीसी रहेगी या टूट जायेगी। अमित जोगी को धोखा धड़ी के जुर्म में कम से कम दो साल की सजा हो सकती हैं। इसलिए कि उनके खिलाफ पुख्ता दस्तावेज हैं। अमित जोगी के जेल में होने से अजीत जोगी भावानात्मक रूप से टूट जायेंगे। उनकी विधायकी खत्म होने और अंतागढ़ मामले की वजह से पार्टी का जनाधार तो खत्म होगा ही साथ अब उन पर जनता की विश्वसनीयता भी घटेगी। सवाल यह है कि जोगी अपनी पार्टी की कमान किसके हाथ में देंगे? 
रेणू की रूचि नहीं राजनीति में
श्रीमती डाॅ. रेणू जोगी पार्टी में ज्यादा अनुभवी हैं। यदि अजीत जोगी की गिरफ्तारी होती है तो पार्टी की कमान रेणू जोगी के हाथ आ सकती है। लेकिन पार्टी को पूरा समय देने में वे भी अक्षम हैं। स्वास्थ्य उनका भी ठीक नहीं रहता। वहीं रेणू जोगी पर कोई आरोप नहीं है। स्वच्छ छवि है ही साथ ही  समझदार नेत्री हैं। लेकिन अजीत जोगी के आदिवासी मामले पर हाई कोर्ट का भी फैसला हाई पाॅवर कमेटी जैसा ही रहा तो फिर रेणू जोगी के संदर्भ में भी तहकीकात के सवाल उठाये जा सकते हैं। उन्होंने आदिवासी के रूप में क्या, क्या, सुविधायें और लाभ लीं। यदि ऐसा कुछ भी साक्ष्य मिलता है तो फिर श्रीमती रेणू जोगी भी फंस सकती हैं। वैसे रेणू जोगी की दिलचस्पी राजनीति मे अब नहीं है। इसी से स्पष्ट है कि वे अंत तक जोगी की पार्टी में शामिल नहीं हुई। लेकिन कांग्रेस से इस्तीफा भी नहीं दिया,पर जोगी के साथ हमेशा रहीं। उन्हें इसके लिए कई बार नोटिस भी दिया गया। जब कांग्रेस ने उन्हें कोटा विधान सभा के लिए टिकट नहीं दी तो वो अजीत जोगी की पार्टी की टिकट पर चुनाव लड़ीं। आज जेसीसी से कोटा की विधायक हैं। ऐसे में यह भी संभावना खत्म हो जाती है कि वे कांग्रेस मंे कभी लौटेंगी। 
जेसीसी का अगला अध्यक्ष कौन?
अजीत जोगी अपनी हर सियासी गोटी बहुत सोच समझ कर चलते हैं। अपने ऊपर किसी भी तरह के खतरे की आशंका को वे पहले ही भंाप जाते हैं। वे कभी नहीं चाहेंगे कि रेणू जोगी पर कोई राजनीतिक संकट मंडराये। ऐसे में उनके घर में उनकी बहू ऋचा जोगी पर जाकर नजर ठहरती है। ऋचा जोगी राजनीति में बहुत समय से सक्रिय हैं। विपक्ष की भूमिका में वे डाॅ रमन सिंह से लेकर भूपेश सरकार तक सक्रिय दिखीं। भूपेश बघेल का ड्रीम प्रोजेक्ट नरवा,घुरवा,गोठान और बाड़ी मामले को सबसे पहले उठाया कि यह प्रोजेक्ट केवल भ्रष्टाचार का जरिया है। पिछला चुनाव जोगी ने ऋचा को अपनी पार्टी के बजाय अकलतरा से बसपा से लड़ाया। बहुत कम वोटों के अंतर से वे चुनाव हारी लेकिन राजनीति में अपनी सक्रियता नहीं छोड़ी। युवाओं के बीच अधिक लोकप्रिय हैं। ऐसे में संभावना यह भी बनती है कि रेणू के इंकार करने पर ऋचा जोगी को प्रदेश अध्यक्ष बनें। वहीं रेणू जोगी कभी नहीं चाहंेगी कि पार्टी की कमान ऋचा के हाथ में आये। क्यों कि ऋचा जोगी सबसे अधिक तेज तर्रार नेत्री हैं,पार्टी के लोगों का कहना है कि श्रीमती रेणू जोगी और ऋचा में बनती नहीं। ऋचा तभी प्रदेश अध्यक्ष बन सकती हैं जब अमित जोगी कहेंगे। अजीत जोगी पार्टी की कमान लोरमी के विधायक धरमजीत सिंह को भी सौप सकते हैं। धरम जीत सिंह चार बार के विधायक और विधान सभा के उपाध्यक्ष रह चुके हैं। अनुभवी होने के साथ ही अजीत जोगी के विश्वासपात्र भी हैं। पूर्व विधायक आर. के. राय पर जोगी को कम भरोसा है। सभी को पता है कि वे जोगी के साथ रहते तो हैं,लेकिन कांग्रेस में वापस आने के लिए कांग्रेस के सभी बड़े नेताओं से संपर्क में है। भूपेश बघेल की पसंद आर. के राय नहीं हैं,इसलिए उनकी कांग्रेस में वापसी अब तक नहीं हुई है।
देवव्रत से परहेज क्यों
खैरागढ़ विधायक देवव्रत सिंह जो कि कांग्रेस से सांसद भी रहे हैं। भूपेश बघेल से इनकी कभी नहीं पटी। कांग्रेस में रहकर इन्होंने भूपेश बघेल की कई बार कांग्रेस हाई कमान से लिखित में शिकायत भी की। इनकी लोकप्रियता खैरागढ़ से राजनांदगांव तक है। युवाओं के बीच सबसे अधिक सक्रिय और रईस नेता हैं। युवा हैं, धारा प्रवाह किसी भी मुद्दे पर बोलने में सक्षम हैं। विपक्ष की भूमिका बड़ी इमानदारी से निबाहते हैं। वहीं पार्टी के लोगों का कहना है कि जोगी कभी नहीं चाहेंगे कि उनकी पार्टी का अध्यक्ष कोई ऐसा व्यक्ति बने जो पार्टी पर अपना दबदबा रखे। जोगी जानते हैं कि देवव्रत बहुत तेज और किसी की नहीं सुनने वाले नेताओं में से हैं। वे एक बार फैसला ले लिये तो आसानी से बदलते नहीं हैं। देवव्रत ंिसंह की वजह सेे जोगी घराने का पार्टी में कोई अस्तित्व ही नहीं रह जायेगा। इससे इंकार भी नहीं है कि देवव्रत सिंह के अध्यक्ष बनने से कांग्रेस और भाजपा दोनों को नुकसान है। भाजपा नहीं करेगी मदद
सबसे बड़ा सवाल यह है कि अपने बनाये राजनीतिक चक्रव्यूह में फंसे जोगी को क्या भाजपा मदद करेगी?इसकी संभावना कम ही दिखती है। उसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि संघ नहीं चाहेगा कि जोगी राजनीति में मजबूती से खड़े रहे हैं। यह अलग बात है कि डाॅ रमन सिंह जोगी को तीसरी सियासी ताकत अपने राजनीतिक फायदे के लिए बताते रहे। लेकिन उसका फायदा विधान सभा चुनाव में नहीं मिला। जिससे डाॅ रमन सिंह की राजनीतिक नजरिये से संघ के समक्ष बड़ी भद्द हुई है। अब डाॅ रमन सिंह सत्ता से बाहर हैं। लेकिन नान घोटाला और अंतागढ़ उप चुनाव कांड में उनके नाम आने से उनकी साख कलंकित हुई है। उनका दामाद डाॅ पुनीत गुप्ता भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरा है। डाॅ रमन सिंह की सत्ता जाने के बाद से कोर्ट के चक्कर में डाॅ पुनीत गुप्ता का समय जाया जा रहा है। भाजपा बंटी हुई है। डाॅ रमन सिंह के साथ संघ भी नहीं है। जाहिर है कि जोगी भाजपा की ‘बी’ टीम होकर भी अकेले पड़ गये हैं।
जोगी के खिलाफ संघ
सामने नगरीय निकाय और पंचायत चुनाव है। डाॅ रमन सिंह चाहते हैं कि चुनाव में जोगी की मौजूदगी रहे। इसलिए अमित जोगी को जेल हुई तो उन्होने भूपेश सरकार को घेरते हुए कहा,सरकार हिम्मत से क्यों नहीं कहती है कि हां हमने अमित जोगी को गिरफ्तार किया है। सरकार को बोलने में परेशानी क्यों हो रही है’’। संघ नहीं चाहता कि जोगी राजनीतिक रूप से मजबूत हों और सक्रिय रहे हैं। इसकी वजह यह है कि संघ हिन्दू राजनीति का समर्थक है। संघ के ज्यादातर लोग अजीत जोगी को ईसाई मानते हैं। जोगी के मुख्यमंत्री रहने के दौरान छत्तीसगढ़ में ईसाई मिशनरी को ज्यादा बढ़ावा मिला है। दिलीप सिंह जूदेव सारी जिन्दगी आदिवासियों का पैर धोकर उन्हें ईसाई से हिन्दू धारा में लाते रहे। आज जोगी अपनी जाति की लड़ाई लड़ रहे हैं। छत्तीसगढ़ में उनकी जाति को लेकर कांग्रेस के नेता ही एक मत नहीं है। जोगी के साथ लंबे समय तक साथ रहे नगरीय प्रशासन एवं विकास मंत्री शिव डहरिया कहते हैं,जोगी न आदिवासी हैं और न ही सतनामी हैं’’।
मुझ पर आरोप गलत हैः भूपेश
मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कहा,मुझ पर लगाये गये आरोप बिलकुल गलत हैं। जोगी पर आरोप भाजपा ने लगाये उनकी जाति की जांच भाजपा ने की। भाजपा की ही समीरा पैकरा ने शिकायत की थी। यह पूरा किया कराया तो भाजपा का है। जोगी ने आदिवासी का अपना जाति प्रमाण पत्र दिखाया। कांग्रेस ने उन्हें विधायक,मंत्री,मुख्यमंत्री बनाया। लेकिन उनका जाति प्रमाण पत्र ही गलत हो जाये तो उसमें क्या किया जा सकता है। 
बहरहाल जोगी की सियासत के सितारे गर्दिश में हैं। सभावना है कि आने वाले दिनों में प्रदेश की राजनीति में कई बदलाव हो सकते हैं।

नक्सली झीरम पार्ट टू के मूड में..

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भूपेश सरकार से नाराज नक्सलियों ने सरकार के साथ उद्योग मंत्री कवासी लखमा को देख लेने की चेतावनी देकर खलबली मचा दिये हैं। सरकार से माओविदियों की नाराजगी की वजह यह है कि कोतागुडा गांव और गोमियापाल में तीन,तीन ग्रामीणों की पुलिस ने नक्सली बताकर हत्या कर दी। भूपेश सरकार नक्सवाद पर वही काम कर रही है जो रमन सरकार ने किया। सवाल यह है कि नक्सलियों की नाराजगी कहीं झीरम पार्ट टू को अंजाम तो नहीं देगी?

0 0 रमेश कुमार ’’रिपु’’’
                  नक्सली क्या अब कांग्रेस नेताओं को अपना निशाना बनायेंगे? झीरम पार्ट टू को अंजाम देंगे? दंतेवाड़ा के भाजपा विधायक भीमा मंडावी की हत्या के बाद ऐसी क्या वजह है कि नक्सली उद्योग मंत्री कवासी लखमा को देख लेने की धमकी दी। आम आदमी की सांसे वैसे ही दहशतजदा है। बस्तर में कहा जाता है,’’यहां के आदिवासी को नक्सलियों का मुखबिर बताकर पुलिस गोली मार देती है अथवा नक्सली पुलिस का मुखबिर कहकर गोली मार दते हैं। यानी हर हाल में गोली मौत का वारंट है बेकसूर आदिवासियों के लिए।
गोली नक्सलियों की हो या फिर पुलिस की,मारा तो आदिवासी ही जाता है। माओवादी अब आदिवासियों का शुभ चिंतक बनने के लिए पुलिस पर आरोपों की गोलियों चलाने लगे हैं। जब जब कोई आदिवासी पुलिस की गोली से मरता है तो नक्सली प्रेस नोट जारी कर सरकार को कटघरे में खड़े करते हैं। जाहिर सी बात है कि इन दिनों भूपेश सरकार से नक्सली नाराज चल रहे हैं। नक्सलियों की दक्षिण बस्तर डिविजनल कमेटी के सचिव विकास ने प्रेस नोट जारी कर कहा, सुकमा जिले के चिंतलनार पंचायत स्थित कोतागुड़ा गांव में 14 सितंबर को ग्रामीण अपने गांव के पुजारीगायता को चुनने के लिए अपनी परंपरा के अनुसार शिकार करने जंगल में गए थे। जंगली सुअर शिकार के दौरान घायल हो गया था,उसका पीछा कर रहे थे। इसी बीच चिंतलनार थाना अंतर्गत के बुर्कापाल कैंप से गश्त पर निकले डीआरजी के जवानों ने ग्रामीणों पर अंधाधुंध गोलीबारी कर सोड़ी देवाल, मुचाकी हड़मा, मुचाकी हिड़मा की निर्मम हत्या कर दी। इनमें से सोड़ी देवाल की घटना स्थल पर ही मौत हुई जबकि दो अन्य ग्रामीणों को घायल अवस्था में पकड़कर उन्हें आमानवीय यातनाएं देकर पुलिस ने उनकी जघन्य हत्या की। अपने दो पेज के पर्चे में माओविदियों ने राज्य सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा कि सरकार चुनावी वायदा भूल गई है। ऐसा लगता है कि भाजपा शासनकाल में कांग्रेस ने फर्जी मुठभेड़ों के विरोध का केवल दिखावा किया है। कथित रुप से ग्रामीणों की हत्या और प्रताड़ना जारी है’’। माओवादियों ने कवासी लखमा को उद्योगों का समर्थक बताया और धमकी दी है। कवासी लखमा आदिवासी विरोधी हैं। उसकी चिकनी चुपड़ी बातों का भंडाफोड़ करें। जबकि कवासी के राजनीतिक विरोधी दबे सुर में नक्सली हिमायती उन्हें बताते हैं। लेकिन माओवादियों की धमकी इस ओर इशारा कर रही है कि कवासी उनके निशाने पर हैं।
इसी तरह की घटना दंतेवाड़ा के गोमियापाल में भी हुई। यहां भी पुलिस ने तीन निर्दोष आदिवासियों को गोली मार दी। गांव के पांच लड़के शराब पी रहे थे। पुलिस ने मडकामरास का पोदिया और मदाड़ी के भीमा को जबरदस्ती अपने साथ ले गई। हिड़मा पुलिस को चकमा देकर अंधेरे का लाभ उठाकर भाग गया। पुलिस अजय,पोदिया और लच्छू को लेकर आगे निकल गई। भीमा पुलिस की गोली का शिकार होने से बच गया। इस मामले पर सामाजिक कार्यकत्र्ता सोनी सोरी और बेला भाटिया ने पुलिस थाने में शिकायत करने पहुंची तो पुलिस ने उल्टे इन लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर दिया।

सलवा जुडूम का विरोध
गौरतलब है कि सलवा जूडूम का कवासी लखमा ने विरोध किया था। तब से कवासी रमन सरकार और सलवा जुडूम समर्थकों की आंखों की किरकिरी बन गये थे। तत्कालीन कलेक्टर के. आर. पिस्दा ने राज्य सरकार को एक गोपनीय पत्र भेजा था जो कि कलेक्ट्रेट में ही सार्वजनिक हो गया था। पत्र में लिखा गया था कि कवासी लखमा से सुरक्षा ले ली जाए। इन्हें नक्सलियों से कोई खतरा नही है। अब राज्य सरकार ने इनकी और इनके बेटे हरीश लखमा की सुरक्षा बढ़ा दी है।

कवासी पर गंभीर अरोप
नक्सलियों ने प्रदेश के उद्योगमंत्री कवासी लखमा को गद्दार और धोखेबाज बताया है। चुनाव के पहले आदिवासी हितैषी होने का ढिंढोरा पीटने वाले ढोंगी आदिवासियों का गद्दार, धोखेबाज कवासी लखमा सत्ता में बैठते ही आदिवासियों के जल,जंगल,जमीन व संसाधनों को कौड़ियों के भाव देशी विदेशी पूंजीपतियों के हवाले करने के लिए स्वयं उद्योग मंत्री बन बैठे हैं। उन्होंने लखमा पर फर्जी मुठभेड़ को अंजाम देने वाले पुलिस कर्मियों को आउट आफ टर्न प्रमोशन दिलवाने का आरोप लगाया है। कवासी की देखरेख में छत्तीसगढ़ भू अर्जन, पुनर्वास, पुर्न व्यवस्थापन कानून 2019 पास कराया गया है, जो कि राज्य के किसानों, दलितों व आदिवासियों की जमीनों, जंगलों, खदानों को छीनकर पूंजीपतियों के हवाले करने के लिए ही बनाया गया है।

नक्सली मना रहे हैं वर्षगांठ
मुख्यमंत्री के बयानों से एक बात साफ है कि वे नक्सलियों से दो दो हाथ करने को तैयार हैं।   चैकाने वाली बात है कि माओवादियों के प्रति इतनी सख्ती दिखाने के बावजूद माओवादी बैनर में लिखा है कि 50 वीं वर्षगांठ मनाने एवं नई पार्टी भाकपा माओवादि की 15 वीं वर्षगाँठ समारोह को 21 सितंबर से 8 नवम्बर तक देश भर में क्रांतिकारी जोश के साथ मनाने के साथ दीर्घकालीन जन युद्ध को देशभर में विस्तृत और तेज करना है। नक्सलवादी क्रांति जिंदाबाद। माओवाद ऐलान कर रखा है कि बड़े पैमाने पर पार्टी का सदस्य बनो और दंडकारण्य के क्रांतिकारी आंदोलन को आगे बढ़ाएं। जाहिर सी बात है कि नक्सली संगठन फरवरी तक नई भर्ती करेंगे। उसके बाद वे हमला करेंगे। वहीं उनकी दहशतगर्दी अभी भी कायम है।
गृह मंत्री ताम्रध्वज साहू ने कहा कि इन नौ महीनों में कांग्रेस सरकार ने नक्सली गतिविधियों पर काफी हद तक काबू पाया है। पूर्ववर्ती सरकार में साहस ही नहीं था वर्ना आज तस्वीर कुछ और होती। दंतेवाड़ा की कांग्रेस विधायक देवती कर्मा बोलीं. नक्सल पहले भी था आगे भी रहेगा, इसको खत्म करना मुश्किल है।
डी.जी डी.एम अवस्थी कहते हैं,’’ नक्सली डरे हुए है। इसलिए लगातार इनामी नक्सली सरेंडर कर रहे हैं। प्रदेश में माओवाद लगातार कमजोर होता जा रहा है। ऐसा नहीं लगता कि वे झीरम पार्ट टू कर सकेंगे। वहीं माना जा रहा है कि यदि सरकार नक्सलियों के प्रति अपना सख्त रवैया बनाई रखी तो नक्सली किसी गंभीर वारदात को अंजाम दे सकते हैं। वहीं भविष्य की रणनीति के तहत खुलेआम नई भर्ती का पोस्टर,बैनर और पर्चे बांट रहे हैं, जो अच्छा संकेत नहीं है।

नक्सली वारदातें दो माह की
0 नक्सलियों ने पुलिस की मुखबिरी करने का आरोप लगाते हुए मडकम रोहित की हत्या कर दी है। घटना सुकमा जिले के डब्बाकोंटा की है।
0 नारायणपुर में नक्सलियों ने एक ठेकेदार की सड़क निर्माण में लगी जेबीसी मशीन सहित मिक्चर मशीन को आग के हवाले किया।
0 कांकेर में नक्सलियों द्वारा ब्लास्ट करने से एक कंपनी के तीन कर्मचारियों की मौत हो गई है। जिसके बाद इलाके में सक्रिय नक्सलियों पर सवाल उठने लगे हैं।
0 दुर्गुकोंदल में नक्सलियों ने भारी मात्रा में बैनर.पोस्टर लगाया है। पोस्टर में आरएसएस कार्यकर्ता दादू सिंह की हत्या करने की बात कबूली और गिरफ्तार किए गए निर्दोष आदिवासियों को छोड़ने की चेतावनी दी है।
0 नक्सलियों ने किरन्दुल थानाक्षेत्र में पेरपा चैक पर ग्रामीण ताती बुधराम की धारदार हथियार से हत्या कर दिया और शव को सड़क पर फेंक दिया। पर्चा जारी करते हुए नक्सलियों ने ग्रामीण पर पुलिस की मुखबिरी का आरोप लगाया है।







सरेंडर करने वाले इनामी माओवादी
0 दक्षिण छत्तीसगढ़ की बड़ी नक्सल घटनाओं में शामिल बताई जा रही तेलंगाना राज्य कमेटी की मेंबर सुजाता उर्फ नागाराम रुपा को बीजापुर पुलिस ने गिरफ्तार किया।
0 बीजापुर पुलिस के सामने छह नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है। आत्मसमर्पित नक्सलियों में दिलीप वड्डे चिन्ना प्लाटून कमांडर माड़ डिवीजन पर आठ लाख का इनाम। मड़कम बण्डी डिप्टी सेक्शन कमांडर माड़ डिवीजन पर तीन लाख इनाम। सनकी बड्डे उर्फ सुजाता प्लाटून दो अबूझमाड़ एरिया कमेटी पर दो लाख इनाम। महेश वासम सीएनएम सदस्य नेशनल पार्क एरिया कमेटी, विनोद मेटटा सीएनएम सदस्य नेशनल पार्क एरिया कमेटी का नाम शामिल है।
0 सुकमा पुलिस ने पांच लाख की इनामी महिला नक्सली माड़वी गंगी चिंतागुफा क्षेत्र निवासी डीकेएमएस अध्यक्ष, केरलापाल एरिया कमेटी है जो कि 2006 से नक्सली कमांडर सतिषन्ना के द्वारा संगठन से जोड़ी गई थी। मड़कम हुंगी निवासी चिंतागुफा क्षेत्र कर्कोटा एलओएस सदस्या ईनामी 1 लाख रूपये,कुड़ामी गंगा निवासी कुकानार क्षेत्र पेदारास एलओएस सदस्य ईनामी 1 लाख रूपये, सोड़ी जोगा निवासी गादीरास क्षेत्र नक्सली सहयोगी।
0 दंतेवाड़ा पुलिस को नक्सलियों के खिलाफ बड़ी कामयाबी हाथ लगी। चार इनामी नक्सली समेत 28 नक्सलियों ने जवानों के सामने सरेंडर किया है। आत्मसमर्पित नक्सलियों में 26 नम्बर प्लाटून सदस्य मंगलू 2 लाख का इनाम, बामन कवासी कटेकल्याण एल जी एस सदस्य 1 लाख इनामी, हांदा एल जी एस सदस्य 1 लाख इनामी पोडियामी गंगी, सीएनएम कमांडर 1लाख इनामी सन्नू मरकाम, भीमा कुड़ामी, हांदो कुडामी,रोसोल माडवी,जोगा कवासी, बुधरा माडवी, आयता मडकामी, आयतू मडकामी, हडमा सोढ़ी, मादे कुहराम, बामन मरकाम, लक्खोकुडामी, लखमा मुचाकी, हुंगा मुचाकी, सुकड़ा मुचाकी, गागरू मरकाम, सुकड़ा मड़कामी, हडमाकवासी, लच्छूकोवासी, बामन मरकाम, बुधराम कवासी, हिड़मा मड़काम,सुकड़ा  कवासी, महादेव पोडियाम जनमिलिशिया सदस्य शामिल है।

किसी भी नक्सली नेता को जीवनदान नहीं देंगे: भूपेश
मुख्यमंत्री भूपेश बघेल कहते हंै कि नक्सलियों से समझौता नहीं करंेगे। केन्द्र सरकार को चाहिए कि दूसरे राज्य के जितने भी इनामी नक्सली हैं उन्हें गिरफ्तार करे। आन्ध्र सरकार को निर्देश दे। अन्यथा छत्तीसगढ़ की पुलिस नक्सली नेताओं को जीवनदान नहीं देगी। छत्तीसगढ़ का कोई भी आदिवासी नक्सली नहीं हैं। जो भी यहां नक्सली नेता हैं वे तेलंगाना या फिर आन्ध्र प्रदेश के हैं। उनसे हुई बातचीत के प्रमुख अंश -
0 रमन सरकार के समय भी निर्दोष आदिवासी नक्सली बताकर मार दिये जाते थे। कांगे्रस सरकार के समय भी ऐसी घटनायें हो रही हैं।
00 आंकड़े बढ़ाने के लिए निर्दोष आदिवासियों को नहीं मारेंगे। और उन्हें नक्सली कहकर गिरफ्तार भी नहीं करेंगे। सच तो यह है कि हमारे यहां कोई भी अदिवासी नक्सली नहीं है। जितने भी नक्सली नेता हैं वो आन्ध्र के हैं या फिर तेलंगाना के हैं। हमारे राज्य में जो भी नक्सली नेता आयेगा वो मारा जायेगा। दूसरे राज्य में जाकर हम कार्रवाई नहीं कर सकते। केन्द्र सरकार को चाहिए कि वो बताये कि कितने इनामी नक्सली हैं। हमारे यहां कोई भी आदिवासी नक्सली नहीं है।
0 छत्तीसगढ़ में ज्यादातर नक्सली नेता बाहर के हंै। क्या उनसे बात चीत कर समाधान का कोई रास्ता निकालना चाहेंगे?
0 हम किसी भी नक्सली नेता से बात नहीं करेंगे। वो छत्तीसगढ़ छोड़कर चले जायें अन्यथा हमारी पुलिस उन्हें अभयदान नहीं देगी। अभी तक जितने भी इनामी नक्सली पकड़े गये हैं वो सब के सब भरमार बंदूक के साथ नहीं बल्कि, एक के 47 जैसे घातक हथियार के साथ पकड़े गये हैं। छत्तीसगढ़ में जितने भी इनामी नक्सली हैं वो सब के सब आन्ध्र के हैं। यह आन्ध्र प्रदेश की सरकार की जवाबदारी है कि वह इन्हें गिरफ्तार करे या फिर मारे।
0 ज्यादा तर नक्सलियों के पास विदेशी हथियार हैं। आखिर ये हथियार उन्हें मिलता कहां से है?
0 सबसे बड़ा सवाल यह है कि जो भी इनामी नक्सली पकड़े जाते हैं या फिर मारे जाते हैं उनके पास घातक हथियार कहां से आते हैं। चीन,जपान या फिर विदेशी रायफल छत्तीसगढ़ में बनती नहीं। इसके अलावा गोलियां भी बाहर के होते हैं या फिर हमारे देश के कारखाने के। जाहिर सी बात है कि नक्सलियों के तार बाहर से जुड़े हैं। यह केन्द्र सरकार की जवाबदारी है कि उन्हें हथियार मुहैया कराने वालों का पता करे और उनके खिलाफ कार्रवाई करे।
0 आप कश्मीर मामले का विरोध क्यों करते हैं?
00 भाजपा के घोंषणा पत्र में 370 हटाने का जिक्र था। इसलिए हमें उनके एजेंडे पर एतराज नहीं है। एतराज इस बात पर है कि छत्तीसगढ़ राज्य बना तो मध्यप्रदेश विधान सभा से प्रस्ताव पास हुआ। यू.पी विधान सभा में भी प्रस्ताव पारित होने के बाद उत्तराखंड बना, इसी तरह बिहार विधान सभा में प्रस्ताव पारित होने पर झारखंड बना। लेकिन बिना प्रस्ताव पारित हुए जम्मू और कश्मीर को अलग किये जाने पर हमें एतराज है। राज्य की जनता को बगैर विश्वास में लिये यह किया गया। जनता के विश्वास के साथ अविश्वास किया गया है।
0 इन दिनों मंदी को लेकर हाहाकार मचा हुआ है। क्या छत्तीसगढ़ में भी इसका असर है?
00 देश में मंदी है लेकिन,छत्तीसगढ़ में मंदी के हालात नहीं है। आटो से लेकर रियल स्टेट में भी मंदी नहीं है। प्रदेश सरकार के राजस्व में कमी नहीं आई है बल्कि, बढ़ोतरी हुई है।





 


Friday, September 20, 2019

दंतेवाड़ाः किसकी सियासत का करेगा कबाड़ा


कांग्रेस का आगामी राजनीतिक भविष्य दंतेवाड़ा उप चुनाव तय करेगा। इस चुनाव के परिणाम से यह पता चलेगा कि प्रदेश में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल कितना लोकप्रिय हुए। इसलिए कि लोकसभा चुनाव के दाग अब भी नहीं धुले हैं,वहीं डाॅ रमन सिंह सरकार में न रहकर भी लोकसभा की नौ सीट जीता ले गये। हाथ किसी का भी हो,लेकिन श्रेय उन्हें ही मिला। मंतूराम पवार के आरोप निश्चय ही दंतेवाड़ा उप चुनाव को ध्यान में रख कर लगाए गए हैं। पर ऐसा नहीं लगता कि उनके आरोपों की छाया इस चुनाव में दिखेगी। क्यों कि उन्होंने विश्वास खो दिया है। दूसरी वजह यह है कि यहां मुद्दे को लेकर चुनाव लड़ने से कांग्रेस बच रही है, जबकि बीेजेपी विकास की बात कर रही है। कांग्रेस ने चुनाव को आरोप प्रत्यारोप के रंग में रंग दिया है।इससे उसे नुकसान की आशंका ज्यादा है।
उम्मीद टूट सकती है
दंतेवाड़ा में भावानात्मक हवा का थोड़ा बहुत असर है। लेकिन बीजेपी के पक्ष में ज्यादा है। दंतेवाड़ा की यह सीट भाजपा के पास थी। यदि कांग्रेस इसे अपने पक्ष में कर लेती है तो आने वाले निकाय और पंचायत चुनाव में कांग्रेस की उम्मीद,पर पानी फिरने की आशंका कम हो सकती है। वैसे अभी आठ माह की सरकार जनता के बीच अपनी खास छाप नहीं बन सकी है। इसकी वजह यह है कि सरकार का सारा पाॅवर एक जगह सिमट गया। अन्य मंत्री सिर्फं नाम के मंत्री है। नौकरशाह उनकी सुनते नहीं। इस वजह से प्रदेश में काम काज ठप हैं। डाॅ रमन सिंह ने अपने कार्यकाल में दंतेवाड़ा के लिए जो काम किये हैं,उसका लाभ बीजेपी को मिलता है या फिर कांग्रेस को नरवा,घुरवा,बाड़ी और गोठान के नारे से वोट मिलता है,पूरे प्रदेश की नजर है। वेसे मुख्यमंत्री का ड्रीम प्रोजेक्ट पोस्टर की तरह फड़फड़ा रहा है।
आदिवासियों के हक की बात नहीं
दंतेवाड़ा में आम आदिवासी के हक की बात इस उप चुनाव में कोई भी बड़ी पार्टी नहीं कर रही है। सिर्फ आरोप और प्रत्यारोप तक ही सिमट गया है यह चुनाव। दरअसल कांग्रेस को पता है कि उसने अपने आठ माह की सरकार में दंतेवाड़ा के लिए ऐसा कोई काम नहीं किया है, जिसे वो हवा दे सके। न तो पलायन रोकने का उसके पास कोई योजना है। न ही बेरोजगारी दूर करने की कोई ठोस योजना है। बेरोजगारी भत्ता यहां के बेरोजगारों को कब देगी,बताया। बेवजह जेलों में बंद आदिवासियों को कब छोड़ा जायेगा,उसकी तारीख तय की नहीं। सिर्फ घोंषणाओं की बात है। और इस बात को नक्सली भी तूल दे रहे हैं कि कांग्रेस सरकार ने वायदा तो किया था लेकिन, पहल अभी तक नहीं की। दंतेवाड़ा के ग्रामीण क्षेत्र के लोगों को लाल पानी पीना ,अब भी मजबूरी है। उन्हें मीठा पानी कब और कैसे मिलेगा, इसकी बात कांग्रेस के किसी भी मंत्री ने नहीं की। देश चांद पर चन्द्रयान भेज रहा है, उस दौर में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल स्कूल में भौरा चलाने की शिक्षा देते और तस्वीर खिंचाने तक सिमट गये। दूसरी ओर नक्सली आम आदमी कोे मौत के घाट उतारने से बाज नहीं आये। दूसरी तरफ पुलिस पर आरोप है कि उसने आदिवासियों को इनामी नक्सली बताकर भून दिया। जबकि वहां के लोगों का दावा है कि मारे गये लोग नक्सली नहीं हैं। ऐसी वारदातों से सवाल यह उठता है कि दंतेवाड़ा उपचुनाव से इस विधान सभा के लोगों को क्या मिलेगा?
खूनी खेल कितने चुनाव तक
सरकार और पुलिस दोनों यह बताने केा तैयार नहीं है कि कितने इनामी नक्सली हैं। भीमा मंडावी की हत्या नक्सलियों ने की। चुनाव तक और चुनाव के बाद भी न जाने कितने लोग नक्सली बारूद और गोली के चपेट में आयेंगे सरकार को भी पता नहीं। फिर ऐसे चुनाव का क्या अर्थ, यहां का आदिवासी लगाये? सरकार किसी भी पार्टी की हो, यहां के आदिवासी को हर हाल में मरना ही है। चाहे नक्सली मार दें या फिर पुलिस नक्सली बताकर मार दे। यह खेल कितने चुनाव तक चलेगा, सरकार को बताना चाहिए।

Thursday, August 22, 2019

तोते ने उड़ा दी नींद..


कांग्रेस के लिए पी चिंदबरम अर्श के नेता हैं। आज फर्श पर आ गये। सत्ता की फ़िल्म ऐसी ही होती हैं। आज उनकी हर सांस अमित शाह का नाम ले रही होगी। यह तो होना ही था। उन्हें हाई कोर्ट ने 22 बार अग्रिम जमानत दी। तब उन्हें यह बात समझ में नहीं आई कि वे कांग्रेस के लिए बड़े लीडर हो सकते हैं लेकिन, कानून के लिए नहीं। वे अब 26 अगस्त तक सीबीआइ की हिरासत में रहेंगे। जाहिर सी बात है कि यदि उनसे होने वाली पूछताछ से सीबीआइ संतुष्ट नहीं हुई तो उनकी हिरासत की अवधि बढ़ाने की अपील करेगी। और पूछताछ में पुख्ता साबूत मिल गये तो उन्हें जेल भी हो सकती है। वैसे उनके जेल जाने की आशंका ज्यादा है। क्यों कि इसके बाद ईडी भी उनसे सवाल करेगी। जैसा कि बताया जा रहा है कि 16 देशों में उनकी संपत्तियां है। जाहिर सी बात है यह मामला टूजी घोटाले की तरह इतनी आसानी से खत्म नहीं हो जायेगा। ताज्जुब वाली बात है कि उनकी जमानत जब हाई कोर्ट ने खारिज कर दिया तो उन्हें अपने आप को सरेंडर कर देना चाहिए था। कैसे गृहमंत्री थे। 28 घंटे तक सीबीआइ को छकाते रहे। अपनी सफाई सुप्रीम कोर्ट में देने की बजाय, प्रेस कांन्फ्रेस की। हाई कोर्ट ने उन्हें भ्रष्टाचार का सरगना कहा है। उनके मामले को मनी लाउंड्री का क्लासिकल केस कहा। बावजूद इसके कांग्रेस उनके साथ खड़ी है? क्या करें मजबूरी है।इस मामले से एक बात साफ है कि आने वाले समय में कांग्रेस के अन्य बड़े नेता जिन पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं, उनकी मुश्किलें बढ़ सकती है। जैसा कि प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ने पन्द्रह अगस्त को कहा कि देश का एक एक पैसा जिन गलत लोगों के पास है, उसे बाहर लाना जरूरी है।
पी चिदंबरम मामले पर विपक्ष की भंगिमा का बदलना स्वभाविक है। पी चिंदबरम जब गृहमंत्री थे तब उन्होंने अमित शाह को जेल भेजा था। आज चिंदबरम के होश उड़े हुए हैं। कांग्रेस इसे बदलापुर की राजनीति कह रही है। जबकि भाजपा का कहना है कि हाई कोर्ट ने बेल खारिज की तो सीबीआइ ने अपना काम किया। 26 तक चिंदबरम सीबीआइ की कस्टडी में रहेंगे लेकिन, कस्टडी की अवधि नहीं बढ़ी तो ईडी उन्हें अपनी कस्टडी में लेने के लिए अपील करेगी। यानी पी चिंदबरम की सियासी मटकी को फोड़ने के सारे इंतजाम हैं।
पी चिंदबरम की गिरफ्तारी को लेकर जो सियासी नाटक कल रात से आज शाम तक चला। उसमें एक सबसे बड़ी बात यह रही है कि चिंदबरम के वकील कपिल सिब्बल,अभिषेक,विवेक तन्खा आदि ने सीबीआइ की अदालत में बेल देने की बात कही ही नहीं। वो पूरे समय तक सीबीआइ की कस्टडी की खिलाफत करते रहे। वो यही बताते रहे कि जून के बाद, एक बार भी सीबीआइ ने चिंदबरम को बुलाया नहीं। वो हर बार सीबीआइ को पूछताछ में सहयोग किया है। ऐसी स्थिति में सीबीआइ को कस्टडी में लेने का आदेश न दिया जाये।
इस मामले में एक हैरान करने वाली बात है कि भाजपा वाशिंग पावडर बन गई है। जितने भी भ्रष्ट लोग हैं वो भाजपा में शामिल हो गये या फिर भाजपा से हाथ मिला कर धुल गये। लेकिन अन्य दल के लोग अब सरकार के निशाने में हैं।
इनका क्या होगा - जमीन घोटाले में राबर्ट वाड्रा,नेशनल हेराल्ड केस में राहुल गांधी,इसी मामले में सोनिया गांधी, फ्लोर टेस्ट जीतने के लिए विधायकों को खरीदने की कोशिश करने के मामले मे हरीशरावत,आय से अधिक संपत्ति मामले में वीरभद्र,डी.के शिवकुमार,अगस्ता वेस्टलैंड हेलीकाप्टर घोटाला में अहमद पटेल, आय से अधिक संपत्ति के मामले में मायावती आदि हैं, क्या सीबीआइ के पिंजड़े में ये भी कैद होंगे? केन्द्र सरकार भ्रष्ट लोगों के खिलाफ कार्रवाई का जो अभियान शुरू किया है, आने वाले समय में नहीं लगता कि विपक्ष एक जुट होकर सड़कों पर आने की हिम्मत दिखा सकेगा। यदि आते हैं तो फिर तिहाड़ को कई बड़े लोगों के स्वागत के लिए खुद को तैयार रखना पड़ेगा। बहरहाल तोते ने कइयों की नींद उड़ा दी है। यानी अभी तो ये झांकी है,रैली तो पूरी बाकी है।

नक्सलियों के खिलाफ फैसला कब?

  कश्मीर समस्या पर बड़ा फैसला लिया जा सकता है तो नक्सलवाद पर क्यों नहीं? क्यों कि छत्तीसगढ़ में फौज से अधिक नक्सली नहीं हैं। जिनके नेतृत्व में नक्सलवाद पल्लवित हो़ रहा है,उनकी शिनाख्त हो चुकी है। ऐसे में नक्सलियों के खिलाफ सरकार को ठोस फैसला लेने की जरूरत है,ताकि छत्तीसगढ़ नक्सलवाद के शिकंजे से मुक्त हो सके।








 0 रमेश कुमार ‘‘रिपु‘‘
                 छत्तीसगढ़ राज्य बनने की खुशी के साथ नक्सलियों के आतंक की पीड़ा भी यहां के लोगों को विरासत में मिली है। करीब दो दशक से छत्तीसगढ़ की शिराओं मंे नक्सलवाद का लहू बह रहा है। चैकाने वाली बात है कि नक्सली आतंक से पहले सरगुजा लहू लुहान हुआ, अब बस्तर इसकी जद में है। प्रदेश में पहले 14 जिलों में नक्सलियों की तूती बोलती थी, आज 18 जिलों में नक्सलियों का आतंक इस बात का प्रमाण है कि सरकार किसी भी पार्टी की हो,राज्य में इनकी हुकूमत चलती है। नक्सलियों के आतंक राज को इसी से समझा जा सकता है कि आजादी के बाद से अब तक छत्तीसगढ़ के दौ सौ से अधिक गांवों में जनगणना नहीं हुई। जाहिर सी बात है कि नक्सलियों की दहशत इस काम में सबसे बड़ी बाधा है।
लाल आतंक से जूझ रहे छत्तीसगढ़ के लोगों के मन में एक आस जगी है कि जम्मू, कश्मीर मामले पर केन्द्र सरकार एक ठोस फैसला ले सकती है तो फिर छत्तीसगढ़ के नक्सलवाद पर क्यों नहीं? चूंकि कश्मीर जैसी बड़ी समस्या नहीं है नक्सलवाद, लेकिन छत्तीसगढ़ के लोगों का दर्द भी कश्मीरी पंडितों से कम नहीं है। लोगों को अपना घर,गांव और संपत्ति छोड़ना पड़ा है। राज्य के गठन से लेकर अब तक नक्सलवाद की वजह से 1175 जवान शहीद हुए हैं तो दूसरी ओर 1700 से अधिक नागरिक मारे जा चुके हैं। वहीं 1800 नक्सली भी मारे गये। यह सिलसिला थम नहीं रहा है। जानें तो दोनों ओर से जा रही हैं। नक्सली मरें या फिर जवान शहीद हों अथवा आम नागरिक नक्सलवाद की भेंट चढ़े। सवाल यह है कि लाशों की संख्या बढ़ने से हित किसका है?इससे इंकार नहीं किया जा सकता नक्सलवाद समस्या पर भाजपा की हो या फिर कांग्रेस की सरकार, किसी ने भी गंभीरता से लिया ही नहीं। जैसा कि पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी कहते हैं,‘‘नक्सलवाद राजनीतिक पार्टियों के लिए खाद पानी है। इच्छा शक्ति की कमी के चलते ही नक्सलवाद आज भी अट्ठहास कर रहा है‘‘। डाॅ रमन सिंह ने प्रदेश की जनता से वायदा किये थे कि यदि उनकी सरकार बनी तो 2022 तक नक्सलवाद को खत्म कर देंगे। जाहिर सी बात है कि उन्हें भरोसा था कि जिस तरह पुलिस नक्सलियों के खिलाफ आॅपरेशन प्रहार अभियान को गति दे रही है,उससे नक्सली टूट जायेंगे। चूंकि पहले नक्सली एक लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले थे लेकिन, अब 60 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में सिमट गये हैं। लेकिन उनका आतंक भूपेश सरकार में भी कम नहीं हुआ है। बारिश में वैसे उनका मूवमेंट न के बराबर होता है,पर दहशहत का आलम यह है कि बस्तर के छह सौ से अधिक गांव पिछले डेढ़ दशक से खाली हैं। लोग गांव छोड़कर शहर में आकर बस गये हैं।

आर्थिक विषमता की दिक्कतः नैयर
नक्सलवाद के खात्में के लिए कोई भी सरकार आम लोगों से राय शुमारी नहीं ली। बस्तर के आदिवासियों से बातें करने के लिए सरकार अपना प्रतिनिधि भी नहीं भेजी। यह अलग बात है कि प्रदेश के हर मुख्यमंत्री यही कहते रहे कि नक्सलियों से बात करने के लिए दरवाजे खुले हुए हैं। लेकिन कभी खुद पहल नहीं की। सरकार नक्सलवाद को अपने चश्में से देखती है। यही वजह है कि नक्सली छाया घटने की बजाय बढ़ती गई। प्रदेश में नक्सलवाद की वजह के संदर्भ में दैनिक ट्रिव्यून के पूर्व संपादक  रमेश नैयर कहते हैं, कश्मीर का मामला छत्तीसगढ़ के नक्सलवाद से अलग है। वो देश की भावनाओं से जुड़ा मामला था और नक्सलवाद प्रदेश का मामला है। केन्द्र सरकार ने नक्सलियों से निपटने के लिए सुरक्षा बल तैनात किये हैं। वे अपने तरीके से काम भी कर रहे हैं। बस्तर ही नहीं उन सभी जिलों में सुरक्षा बल तैनात है,जहां नक्सलियों की पैठ है। नक्सल समस्या का निदान अब तक नहीं निकल पाने की सबसे बड़ी वजह है कि आर्थिक असमानता। जल,जंगल और जमीन के मालिक आदिवासी हैं,लेकिन वो अब उद्योगपतियों के मजदूर बनकर रह गये हैं। यहां का आदिवासी जितना गरीब होगा,नक्सलवाद उतना ही मजबूत होगा। इसलिए कि जल,जंगल और जमीन के लिए नक्सली आदिवासी के साथ खड़े होते आये हैं। जिससे वे आदिवासियों का विश्वास पात्र बन गयेे हैं। जबकि सरकार अभी तक आदिवासियों का विश्वास नहीं जीत पाई है। जब तक आदिवासियों का विश्वास सरकार नहीं जीत पायेगी, तब तक नक्सलवाद के अंत की संभावना कम है। इससे इंकार नहीं है कि पहले से नक्सली गतिवधियां कम हुई है सुरक्षा बलों की वजह से लेकिन, यह कहना गलत होगा कि नक्सलवाद की पकड़ कमजोर हो गई है। सरकार किसी भी पार्टी की हो जल,जंगल और जमीन को लेकर भ्रष्टाचार हद से अधिक हुआ है। जिस तरह से जंगल काटने का ठेका दिया जा रहा है उद्योगपतियों को,आने वाले समय में हमारी पीढ़ियां पानी को तरसेगी। इतना ही नहीं पानी को लेकर नक्सली हमले से इंकार  भी नहीं किया जा सकता’’।

नक्सलियों से ज्यादा सैनिक
नक्सली प्रभावित जिलों में केन्द्रीय सुरक्षा बलों की 45 बटालियनों को मिलाकर 60 हजार से अधिक जवान तैनात हैं। इतनी संख्या में सुरक्षा बलों की मौजूदगी से एक बात साफ है कि बस्तर नक्सलियो की वजह से असुरक्षित है। इसी के साथ विकास का पोस्टर भी फट गया है। शिक्षा व्यवस्था चैपट हो चुकी है। क्यों कि 300 स्कूलों को नक्सलियों ने खंडहर में तब्दील कर दिया। नक्सली मानते हैं कि आदिवासियों के बच्चे पढ़कर शिक्षित हो जायेंगे तो नक्सली नहीं बनेंगे। बस्तर के कई इलाके आज भी सड़क मार्ग से वंचित हैं। जहां सड़कें हैं भी, नक्सलियों ने काट दियें है या फिर सड़क मार्ग के किनारे आईडी लगा रखे है। बस्तर के किस मार्ग में आईडी लगी है,कहना मुश्किल है। बस्तर में नक्सलियों की समानांतर सरकार की वजह से 40 हजार करोड़ से अधिक के विकास काम ठप हैं। जबकि प्रदेश का कुल बजट रमन सरकार के समय करीब 85 हजार करोड़ रूपये हुआ करता था,जाहिर सी बात है कि यह प्रदेश के कुल बजट का आधा है। बस्तर सबसे अधिक नक्सल से प्रभावित है। नक्सलियों ने ढाई दशक में 1700 आंगन बाड़ी केन्द्र,219 अस्पताल,220 किलोमीटर सड़कें नहीं बनने दी। जबकि कई मार्गो की सड़कों के निर्माण में जवान शहीद हुए हैं।

दृढ़ इच्छा शक्ति चाहिएः शिव
दैनिक भास्कर के संपादक शिव दुबेे कहते हैं,‘‘जिस तरह से कश्मीर के मामले में राजनीतिक दृढ़ इच्छा शक्ति सामने आई है उसी तरह छत्तीसगढ़ के नक्सलवाद के प्रति भी राजनीतिक दृढ इच्छा शक्ति के लिए सरकार को कड़ा निर्णय लेना चाहिए। केवल फौज से समस्या का निदान नहीं हो सकता।  आॅपरेशन चलाना और दिखाना दोनों अलग अलग है। इसलिए भी कि प्रदेश में नक्सलियों से निपटने के लिए जितनी फौज है, उतने नक्सली नहीं है। जिस दिन दिल्ली से रायपुर तक नक्सलवाद को खत्म करने की राजनीतिक ताकत का इस्तेमाल किया जायेगा, उस दिन नक्सलवाद खत्म हो जायेगा। अभी तक यह होता आया है कि राज्य सरकार केन्द्र को और केन्द्र सरकार, राज्य सरकार को इस मामले में दोषी ठहराते आये हैं। दरअसल दोनों सराकारों के बीच इस मामले को लेकर तालमेल का अभाव देखा गया है। कश्मीर मामले में बाहरी आतंक का साया था लेकिन, नक्सलवाद मामले में बाहरी नहीं अंदरूनी मामला है। नक्सलवाद जिनके नेतृत्व में चल रहा है,उसमें ज्यादातर लोगों की शिनाख्त हो चुकी है। जाहिर सी बात है कि नक्सलवाद को लेकर जो आॅपरेशन अभियान चालाये जा रहे हैं,या चलाये गये हैं,वो समस्या का हल नहीं हो सकते। कश्मीर मामले को लेकर जब बड़ा फैसला लिया जा सकता है तो नक्सलवाद पर भी विचार किया जाना चाहिए। क्यों कि यह केवल बस्तर का ही नहीं, प्रदेश के 18 जिलों का मामला है’’।

 दहशत का साम्राज्य
छत्तीसगढ़ का बेरोजगार आदिवासी माओवादी बन के दहशत का साम्राज्य खड़ा कर लिया हैं। हर बरस एक हजार करोड़ रूपए की उगाही कर तेलंगाना पहुंचा रहा, लेकिन बदले में उसे मिलती है मौत की गोली। इस सच को यहां का नक्सली बना आदिवासी समझने को तैयार नहीं। उसे लगता है कि सरकार तो नौकरी देती नहीं है,आय का एक मात्र जरिया नक्सली बनना ही है। लेकिन एक सच यह भी है कि छत्तीसगढ़,उड़ीसा, झारखंड और मध्यप्रदेश में कहीं भी माओवादी मरें, उससे आंन्ध्र के नक्सली लीडरों की आॅखों गीली नहीं होती। न उन्हें कोई नुकसान होता है। छत्तीसगढ़ के माओवादी हर बरस करोड़ों रूपए आंन्ध्र के नक्सली लीडरों को विभिन्न तरीके से राशि वसूल कर पहुंचा रहे हैं। पूर्व मुख्यमंत्री डाॅ रमन सिंह ने 2009 में कहे थे कि राज्य में नक्सली वन व्यापारियों, परिवहन मालिकों और लौह अयस्क खनन कंपनियों से हर वर्ष 300 करोड़ रुपये की जबरन वसूली करते हैं‘‘। बस्तर के डी.आई.जी पी. सुन्दर राज कहते हैं कि नक्सली हर बरस यहां से एक हजार करोड़ रूपए विभिन्न मदों से एकत्र करते हैं‘‘। जाहिर है कि छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद के नाम से लड़ी जा रही लड़ाई में शामिल यहां का बेरोजगार आदिवासी नहीं जानता कि लाल गलियारे में अपनी जिन्दगी और मौत की कहानियांे का जो फतंासी वह गढ़ रहा है उसके पीछे कितने करोड़ रूपए के दहशत का साम्राज्य है। सरकार को इससे कोई सरोकार नहीं है।

बस्तर कश्मीर है छग काः सुनील
नक्सलियों की वजह से बस्तर का पर्यटन उद्योग खत्म होने के कगार पर है। बावजूद इसके नक्सलियों ने सरगुजा के बाद बस्तर को अपना वसूली का केन्द्र बना रखा है। लाल गलियारे के लावे के संदर्भ में रायपुर के सांसद और प्रदेश भाजपा उपाध्यक्ष सुनील सोनी कहते हैं,‘बस्तर छत्तीसगढ़ का कश्मीर है। निश्चय ही नक्सलियों के आतंक की वजह से हर सांसे दहशतजदा रहती है। केन्द्र सरकार नक्सलवाद के खात्मे के लिए समय समय पर कदम उठाती रही है। नक्सलवाद के खात्मे के लिए निश्चय की गृहमंत्री कुछ सोच रखे होंगे। कायदे से राज्य सरकार को चाहिए कि वो नक्सलवाद के खात्मे के लिए केन्द्र सरकार से बैठ कर बात करे। और निदान की दिशा में कदम उठाना चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं लगता है कि राज्य सरकार नक्सलवाद के खात्मे के लिए कटिबद्ध है।

मनमानी का हक नहींःसिंहदेव
पंचायत एवं स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंह देव कहते हैं,‘‘कश्मीर के मामले से एक बात साफ हो गई है कि केन्द्र सरकार अपने फायदे के लिए कुछ भी कर सकती है। भावानात्मक आधार पर निर्णय लिया गया है। एक प्रांत को खंडित करने का यह तरीका ठीक नही है। कल के दिन किसी भी राज्य में गवर्नर रूल लगाकर राज्य को केन्द्र शासित घोषित कर देंगे। छत्तीसगढ़ में कोई बड़ी नक्सली वारदात हो जाये और राष्ट्रपति शासन यह कहकर लगा दिया जाये कि राज्य सरकार नक्सलियों पर नियंत्रण करने में नाकाम हो। या फिर संवैधानिक ढांचे को खंडित कर इसे केन्द्र शासित राज्य बना दो। प्रजातंत्र में कोई भी पार्टी हो उसे मनमानी करने का हक नहीं है। रहा सवाल नक्सलवाद के खात्मे का तो निश्चय ही छत्तीसगढ़ के लिए यह समस्या कोढ़ है। सरकार अपने स्तर पर इसके खात्मे में लगी है। उम्मीद है,बहुत जल्द सफल हो जायेंगे‘‘।

छग के नक्सली हाशिए पर
तात्कालीन बस्तर आईजी एसआरपी कल्लूरी के समय भारी संख्या में माओवादी सरेंडर किए।लेकिन लाल गलियारा खाली नहीं हुआ। डीजीपी डी.एम अवस्थी कहते हैं,‘बारिश के तीन महीने माओवादी अपनी संख्या बढ़ाने के अभियान को अंजाम देते हैं। लेकिन इस बार बारिश में भी सुरक्षा बलों की सर्तकता और आॅपरेशन प्रहार को अंजाम देने की वजह से  बस्तर में नए नक्सलियों के भर्ती की खबर नहीं है। सुकमा,दंतेवाड़ा,बीजापुर और नारायणपुर में नक्सलियों के खात्मे के लिए आॅपरेशन जारी है‘‘। दरअसल सरेंडर करने वाले नक्सलियों का कहना है,ऊंचे पदों पर तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के माओवादियों के पैठ होने से निचले स्तर पर तैनात छत्तीसगढ़ के माओवादियों में असंतोष बढ़ता जा रहा है। क्यों कि माओवादी से संबंधित सभी तरह की रणनीति में छत्तीसगढ़ के नक्सलियों को शामिल नहीं किया जाता। न ही उनसे कोई राय ली जाती है। तेलंगाना के नक्सली लीडरों के आगे यहां के माओवादी हाशिए पर हैं।

नक्सलियों ने दी धमकी
नक्सली संगठन के दक्षिण बस्तर सब जोनल कमेटी ने 20 जुलाई को एक पर्चा जारी कर स्वीकारा कि पुलिस द्वारा चलाए जा रहे एंटी नक्सल ऑपरेशन जुलाई 2018 से 3 अगस्त 2019 के बीच में उनके 96 साथी मारे गए हैं। वहीं बस्तर की सरहद से लगे धमतरी जिले में 24 जुलाई को सीतानदी एरिया कमेटी ने जारी पर्चों में पुलिस की मुखबिरी करने वालों के नामों का उल्लेख करते हुए जान से मारने की धमकी दी है। लिखा है, फारेस्ट वालों को जनअदालत में सजा दिया जाएगा। जितने भी जमीन हैं, सभी में पौधा लगाना चाहिए। पैसा खाकर जंगल कटवाओगे तो जान जायेगी। दारू की भट्टी, अंग्रेजी शराब दुकान बंद करो। घर.घर में शराब बनाना बंद किया जाए। जंगल में बूटा काटने व आग लगाने वाले का हाथ काटा जाएगा। ऐसी धमकी से जाहिर है कि नक्सलवाद का पानी खतरे से ऊपर बह रहा है।
 

Friday, July 26, 2019

अंडे के फंडे में घिरी सरकार

   
क्या भूपेश सरकार हिन्दुत्व की छवि के खिलाफ है या फिर ब्राम्हण विरोधी है?यदि ऐसा नही है तो फिर स्कूलों और आंगन बाड़ी केन्द्रों में बगैर राय शुमारी के अंडा परोसने का आदेश क्यों जारी किया? ब्राम्हण,जैन,अग्रवाल,महेश्वरी,और कबीर पंथी आदि समाज के लोग अंडा को छूना भी पाप समझते हैं। ऐसे में उनके बच्चों की थाली में अंडा परोसने के पीछे कौन सा राजनीतिक कारण है?

0 रमेश कुमार ’’रिपु’’
                 
जाहिर सी बात है कि भूपेश सरकार संडे हो या मंडे,खूब खाओ अंडे के इश्तिहार से प्रभावित होकर प्रदेश में 44 फीसदी कुपोषण को दूर करने के लिए स्कूली बच्चों और आंगन बाड़ी केन्द्रों में गर्भवती महिलाओं को अंडा वितरण का आदेश दिया।लेकिन ब्राम्हण,जैन,अग्रवाल,महेश्वरी,मारवाड़ी,कबीरपंथी आदि समाज के लोगों को अपने बच्चों की थाली में अंडा परोसा जाना, उनके गले नहीं उतरा और वो सरकार के निर्णय के खिलाफ सड़कों पर उतर आये। हर जिले में अंडा वितरण का विरोध सरकार के लिए मुसीबत बन गया। विपक्ष इस मुद्दे को लपक लिया। भूपेश सरकार पर ब्राम्हण विरोधी छवि का लेबल पहले से ही लगा हुआ है,ऊपर से स्कूलों में अंडा वितरण के आदेश ने सोने में सुहागा का काम कर दिया।
प्रदेश कांग्रेस के मीडिया प्रभारी शैलेष त्रिवेदी कहते हैं,’’कुपोषण की स्थिति में सुधार के लिए रमन सरकार ने जो काम किये वो पर्याप्त नहीं थे। अनुसूचित जनजाति के बच्चों में कुपोषण की यह दर 38 फीसदी से अधिक है। प्रदेश में 75 फीसदी से अधिक आबादी अंडे का सेवन करती है। प्रदेश में कुछ संस्था और जाति के लोग अंडा वितरण का विरोध कर रहे हैं जबकि देश के 15 से अधिक राज्यों में मध्यान्ह भोजन और आंगनबाड़ी केंद्रों में कई सालों से अंडे का वितरण किया जा रहा है। जाहिर सी बात है कि भूपेश सरकार की मंशा गलत नहीं है’’। वहीं ज्यादातर लोगों का कहना है कि तरीका गलता है।

  क्या भूपेश सरकार हिन्दुत्व की छवि के खिलाफ है या फिर ब्राम्हण विरोधी है? यदि ऐसा नहीं है तो फिर स्कूलों और आंगन बाड़ी केन्द्रों में बगैर राय शुमारी के अंडा परोसने का आदेश क्यों जारी किया? ब्राम्हण,जैन,अग्रवाल,महेश्वरी,मारवाड़ी और कबीरपंथी आदि समाज के लोग अंडा को छूना भी पाप समझते हैं। ऐसे में उनके बच्चों की थाली में अंडा परोसने के पीछे कौन सा राजनीतिक कारण है? इस सवाल पर शिक्षा मंत्री प्रेमसाय सिंह कहते हैं,’’अंडा मांसाहार है या शाकाहार, इसे लेकर भ्रम काफी पहले टूट चुका हैं। जो बच्चे अंडा खाना चाहेंगे, उन्हें अंडा दिया जाएगा और जो बच्चे अंडा नहीं चाहेंगे, उन्हें दूध,केला या उतनी ही कैलोरी का अन्य प्रोटीनयुक्त पदार्थ दिया जाएगा। स्कूलों में अंडा बंटेगा या नहीं, इसका फैसला शाला विकास समिति तय करेगी। जहां की समिति अंडा परोसने के पक्ष में होगी वहां स्कूलों में अंडा दिया जाएगा। जहां समिति नहीं चाहेगी, वहां बच्चों के घर अंडा पहुंचाने की व्यवस्था की जाएगी, लेकिन बच्चों को अंडा अवश्य दिया जाएगा’’।

अंडा वितरण से इन्द्र नाराज
सरकार को घेरने विपक्ष को मौका चाहिए। उसने बच्चों की थाली में अंडा परोसने की योजना को हिन्दुत्व से जोड़ दिया। हिन्दुत्व की छवि खराब करने की साजिश करार दे दिया। और भाजपा ने मानसून सत्र में स्कूलों में अंडा परोसने के फैसले के खिलाफ काम रोको प्रस्ताव प्रस्तुत किया। गौरतलब है कि काम रोको प्रस्ताव तब लाया जाता है, जब वास्तव में कोई बड़ी घटना घटित हो। अंडा वितरण भाजपा के लिए बड़ी घटना है। पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने सदन में आरोप लगाया कि सरकार कुछ व्यापारियों को लाभ पहुंचाने के मकसद से बच्चों की थाली में अंडा परोसना चाहती है। सरकार की यह योजना बच्चों कोें मांसाहार बना देगी। कबीरपंथी,ब्राम्हण जैन, अग्रवाल, वैष्णव, मारवाड़ी, माहेश्वरी समाज के लोग ज्ञान के मंदिर में अंडा वितरण किए जाने के खिलाफ हैं। सावन महीने में सरकार के अंडा बांटने के फैसले नेे इंद्रदेव को नाराज कर दिया, इसलिए पानी नहीं गिर रहा है। प्रदेश के 18 जिलों में सूखे की स्थिति है’’। इस पर आबकारी मंत्री कवासी लखमा ने कहा, छत्तीसगढ़ में जब पन्द्रह साल तक भाजपा की सरकार थीं, तब तो मुर्गी पालन और मछली पालन पर खूब जोर दिया गया। तब बृजमोहन ने इस्तीफा क्यों नहीं दिया।
अंडा वितरण पर सर्वे हो
वहीं अंडा परोसे जाने के फैसले के खिलाफ आंदोलन करने वाले कबीरपंथियों के गुरु प्रकाश मुनि का कहना है कि ज्ञान के मंदिर में अंडा नहीं परोसा जाना चाहिए। सरकार को स्कूल और आंगनबाड़ी केंद्रों में अंडा वितरण करने से पहले एक सर्वे करा लेती। जो बच्चे अंडा खाना चाहते हैं, सरकार उनके परिजनों को अंडा दें ताकि, वे अपने बच्चों को घर पर ही अंडा खिला सकें। बहुत से धार्मिक संगठन अंडा वितरण योजना को धर्म और आस्था के खिलाफ भी मान रहे हैं। कबीर धाम समिति के जिला अध्यक्ष ईश्वरीय साहू ने कहा सरकार की यह नीति बहुत गलत है। पूर्व काल में सद्गुरु कबीर साहब नें गाँव गाँव घूमकर मांसाहार बंद करने एवं शाकाहार का प्रचार किया है। नशा मुक्ति के लिए भी उन्होंने प्रयास किये हैं। जिन्हें आज शासन भूल गया है।
घर पहुंचायेगी अंडा सरकार
छत्तीसगढ़ में अंडे पर उबलती सियासत के बीच मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के निर्देश के बाद राज्य सरकार ने स्पष्टीकरण में कहा कि जिन स्कूलों में मिड डे मील में अंडा दिए जाने को लेकर सहमति नहीं बनेगी, वहां बच्चों को अंडा घर पहुंचाकर दिया जाएगा। स्कूल शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव गौरव द्विवेदी ने राज्य के सभी कलेक्टरों को पत्र लिखकर कहा है कि शाला विकास समिति और पालकों की बैठक में ऐसे छात्र,छात्राओं को चिन्हांकित किया जाये जो मिड डे मील में अंडा नहीं लेना चाहते।
अंडा का विकल्प
जिन स्कूलों में अंडे का वितरण किया जाएगा। वहां के शाकाहारी बच्चों के लिए प्रोटीनयुक्त खाद्य पदार्थ सुगंधित सोया, सुगंधित दूध, प्रोटीन क्रंच, फोर्टिफाइड बिस्किट, फोर्टिफाइड सोयाबीन, सोया मूंगफल्ली चिकी, सोया पापड़, फोर्टिफाइड दाल जैसे विकल्प रखे जाएं। 15 जनवरी 2019 को राज्य शासन ने स्कूली बच्चों में प्रोटीन और कैलोरी की पूर्ति के लिए मिड डे मील में सप्ताह में दो दिन अंडा, दूध या समतुल्य न्यूट्रिशन दिए जाने का निर्णय लिया था।
सरकार आंख दिखा रही
जेसीसी (जनता छत्तीसगढ़ कांग्रेस) विधायक धर्मजीत सिंह ने विधानसभा में अंडा वितरण का मामला शून्यकाल में उठाते हुए कहा, स्कूली बच्चों को अंडा दिया जाना जरूरी नहीं है। वर्ग संघर्ष की स्थिति बनने न दिया जाए। जिद्द से राजनीति नहीं होती। कबीर और गुरु घासीदास की धरती को बचाना चाहिए। सरकार आज अंडा खाने कह रही है, कल को बीफ खाने का निर्देश जारी कर देगी। चैकाने वाली बात है कि चुनाव में कांग्रेसी जाते है तो कबीरपंथी समाज के सामने घुटने टेकते हैं और अब जब अंडा देने का समाज विरोध कर रहा है तो आंखें दिखा रहे हैं। पीसीसी अध्यक्ष मोहन मरकाम ने कहा सरकार ने अंडे का विकल्प रखा है। जिन्हें अंडा नहीं खाना है, उनके लिए दूध की व्यवस्था की गई है। बीजेपी विधायक शिवरतन शर्मा ने कहा राज्य में 35 लाख कबीरपंथी निवासरत हैं। इस समाज मे अंडा.मांसाहार प्रतिबंधित है। समाज की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए उनकी मांगों को सुना जाना चाहिए।
कई संगठन चाहते हैं अंडा बंटे
सरकार के आंकड़े बताते हैं कि राज्य में 38 फीसदी बच्चे कुपोषित हैं। जबकि अनुसूचित जनजाति के बच्चों में कुपोषण की दर सर्वाधिक 44 फीसदी है। आदिवासी बहुल इलाकों में बच्चों को अंडा दिए जाने की मांग की जाती रही है। राज्य सरकार भी कुपोषण खत्म करने के लिहाज से अंडा वितरित किए जाने के फैसले को वापस नहीं लेना चाहती। वहीं आधा सैकड़ा संगठनों ने मिड डे मील में अंडा दिए जाने के सरकार के फैसले पर अपना समर्थन किया है।
सरकार चिंतन करेःरमन
मिड डे मिल में अंडा दिये जाने का भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डॉ रमन सिंह ने विरोध करते हुए कहा, सरकार को इस फैसले पर चिंतन करने की जरूरत है। क्यांे कि ये धार्मिक आस्था और वैचारिक बात है। ये ऐसे लोग हैं जो कबीर पंथ को मानते है जो किसी जाति या धर्म से नही हैं, ये उचित नही है। 
क्या है अंडे में
अंडों को खिलाने के ऊपर चल रहे विवाद के चलते पीपल फॉर एनीमल मेनका गांधी की संस्था रायपुर इकाई की कस्तूरी बलाल ने बताया की बहुत सारे लोग यह नहीं जानते कि भारतीय पोल्ट्री में पाई जाने वाली मुर्गियां व अंडे बहुत ही निम्न गुणवत्ता के होते हैं। मुर्गियों को जिस जगह रखा जाता है वह बहुत ही गंदी रहती हैं। वहां पर ना पर्याप्त हवा होती है ना सूर्य की रोशनी। मुर्गियों को लगातार लाइट के उजाले में रखा जाता है। जिसके कि ज्यादा अंडे दे सकें। मुर्गियों को खाने में मरी मुर्गियों का मांस,रसायन में मिलाकर दिया जाता है, साथ में एंटीबायोटिक दिए जाते हैं। यह मुर्गियां अपने ही मल की गंदगी पर बैठती है। जिससे उन्हें घाव हो जाते हैं। अमूमन विभिन्न प्रकार के कीड़े लग जाते हैं। इन मुर्गियों में ब्रोंकाइटिस, इनफ्लुएंजा न्यू कैटल डिजीजए ैंसउवदमससं एक प्रकार का बैक्टीरिया जिससे टाइफाइड तथा पानी जनित रोग होते हैं, पाया जाता है। कम पोशक आहार देने से मुर्गियों के अंडों के शैल अंडे का बाहरी हिस्सा कमजोर हो जाते हैं। जिससे बाहर पाए जाने वाले बैक्टीरिया अंडे के अंदर चले जाते हैं। मुर्गियों को दी जाने वाली एंटीबायोटिक की कुछ मात्रा भी अंडो के अंदर चली जाती है। इनका असर अंडे के गर्म करने पर भी खत्म नहीं होता। लगातार ऐसे अंडों को खाने से मानव में उन एंटीबायोटिक्स के लिए रेजिस्टेंस डिवेलप हो जाता है, जो अंडों के खाने के कारण मानव शरीर के अंदर पहुंच जाते हैं। विभिन्न रिसर्च में ऐसी मुर्गियों के अंडों में विभिन्न प्रकार के पेस्टिसाइड जैसे डीडीटीएचसीएच भारी मेटल जैसे लेड, केडीलियम पाए गए हैं। मानव शरीर पर इनका असर दूरगामी होता है। धीरे.धीरे यह मानव के किसी भी अंग को जैसे किडनी इत्यादि को नुकसान पहुंचाती हैं। बच्चों का रेजिस्टेंस कम होता है। अतः उन्हें नुकसान पहुंचने की ज्यादा संभावना रहती है।
 









Wednesday, July 17, 2019

सबसे बड़ा बौद्ध स्थल सिरपुर

                     
 छत्तीसगढ़ में  नालंदा से भी बड़ा बौद्ध स्थल सिरपुर है। क्यों कि नालंदा में चार बौद्ध विहार मिले हैं,जबकि सिरपुर में दस बौद्ध विहार पाए गए। दस हजार बौद्ध भिक्षुकों को पढ़ाने के पुख्ता प्रमाण के अलावा बौद्ध स्तूप भी हैं। पाण्डुवंशीय शासकों के काल में सिरपुर ही कोसल की राजधानी थी। यहां ब्राम्हण,बौद्ध और जैन तीनों धर्म के लोग थे,यानी सर्वधर्म समभाव की भावना थी। ईटो से बना लक्ष्मण मंदिर अद्भुत है। वहीं पश्चिममुखी विशाल शिवमंदिर के एक ही जगतपीठ पर पांच गर्भगृह निर्मित है जो कि देश में सबसे अद्वितीय और ऊंची है।

 0 रमेश कुमार ‘‘रिपु‘‘
                      सिरपुर का अतीत,सांस्कृतिक समृद्धि और वास्तुकला वक्त की कब्र में दफ्न था। इसके अतीत की परतें अनावृत हुई तो कई चैकाने वाले तथ्यों से सामना हुआ। चैकाने वाली बात यह थी कि पाण्डुवंशीय शासकों के काल में सिरपुर ही दक्षिण कोसल की राजधानी थी। यहां ब्राम्हण,बौद्ध और जैन तीनों धर्म से संबंधित मूर्तियांें का निर्माण हुआ। यानी सर्वधर्म समभाव की भावना थी। अभी तक यह माना जाता रहा है कि नालंदा,तक्षशिला और पाटिल पुत्र ही शिक्षा के स्तंभ है। नालंदा का बौद्ध विहार ही सबसे बड़ा है,लेकिन यह सच नहीं है। नालंदा में चार बौद्ध विहार मिले हैं, जबकि सिरपुर में दस बौद्ध विहार पाए गए। इनमें छह,छह फिट की बुद्ध की मूर्तियां मिली हैं। सिरपुर के बौद्ध विहार दो मंजिलें हैं जबकि,नालंदा के विहार एक मंजिला ही हैं। यहां 10000 बौद्ध भिक्षुकों को पढ़ाने के पुख्ता प्रमाण मिले हैं। सिरपुर का बौद्ध मठ नालंदा से अधिक विकसित था। चीनी यात्री व्हेनसांग के अनुसार दक्षिण दिशा में कुछ दूरी पर एक प्राचीन संघाराम था। जिसके करीब एक स्तूप था। इसे राजा अशोक ने बनवाया था। सम्राट अशोक के समय के धर्मलेख सरगुजा के रामगढ़ की सीताबोंगरा और जोगीन्मारा गुफाओं में भी पाए गए हैं। मेघदूत में कालिदास द्वारा वर्णित रामगिरि इसी रायगढ़ को माना जाता है। नागार्जुन बोधिसत्व का इस संघाराम में निवास था। वैसे बौद्ध विद्वान नागार्जुन के सिरपुर आने के संबंध में इतिहासकारों में एक मत नहीं है। व्हेनसांग के अनुसार यहां सौ संघाराम थे। खैर अभी तक खुदाई में इतने नहीं मिले हैं,लेकिन संभावना है कि खुदाई हुई तो मिल सकते हंै। सिरपुर के बौद्ध विहारों में जातक और पंचतंत्र की कथाओं का अंकन है। सिरपुर में बुद्ध के चैमासा बिताने के प्रमाण हैं। भगवान बुद्ध के समय गया से लाया गया वटवृक्ष अभी भी बाजार क्षेत्र में है।
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से 85 किलोमीटर दूर जंगलों के बीच बसा सिरपुर गांव को पुरातात्विक पहचान न मिलती,यदि सागर विश्वविद्यालय और मध्यप्रदेश शासन पुरातत्व विभाग की ओर से एम.जी.दीक्षित के संयुक्त निर्देशन में 1953 से 1956 तक उत्खनन ना किया गया होता तो, टीले में जो राज दबे हुए थे,वे दबे ही रहते। दो बौद्ध बिहार अनावृत हुए। जिसमें एक का नाम आनंद प्रभुकुटी विहार और दूसरे का नाम स्वस्तिक विहार रखा गया। उत्खनन में कई एतिहासिक धरोहर की चीजें मिलीं। सिलबट्टा, बर्तन, जंजीर, दीपक,पूजा के पात्र,कांच की चूड़ियां,मिट्टी की मुहरें,खिलौने, आभूषण बनाने के अनेक उपकरण आदि। तीन सिक्के भी मिले। एक सिक्का शरभपुरी शासक प्रसन्न मात्र का,दूसरा कलचुरी शासक रत्नदेव के समय का और तीसरा सिक्का चीनी राजा काई युवान(713-741 ईस्वी) के समय का है। 
पांचवी शताब्दी में बसा सिरपुर
सिरपुर की प्राचीनता का सर्वप्रथम परिचय शरभपुरीय शासक प्रवरराज और महासुदेवराज के ताम्रपत्रों से होता है। जिनमें श्रीपुर से भूमिदान दिया गया था। इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि पांण्डुवंशीय शासकों के काल में सिरपुर राजनीतिक,सांस्कृतिक,अध्यात्मिक और कला केन्द्र के रूप में प्रतिष्ठित हुआ। ऐतिहासिक जनश्रुति है कि भद्रावती के सोमवंशी पाण्डव नरेशों ने भद्रावती को छोड़कर सिरपुर बसाया था। ये राजा पहले बौद्ध थे,बाद में शैवमत के अनुयायी बन गए। सिरपुर को पांचवी शताब्दी में बसाया गया था। ख्ुादाई से पता चलता है कि इसके पुरातात्विक स्मारक,समृद्ध परंपरा और सांस्कृतिक विरासत बेजोड़ थी। छठवीं सदी से 10 वीं सदी तक यह बौद्ध धर्म का प्रमुख तीर्थ स्थल था। ऐसी मान्यता है कि 12 वीं सदी में आए विनाशकारी भूकम्प में कोसल तबाह हो गया था।
बौद्ध सम्प्रदाय सिरपुर पहुंचा कैसे
सवाल यह है कि यहां बौद्ध सम्प्रदाय के लोग बसे कैसे। नागार्जुन की उपस्थिति के संबंध में एक मत नहीं है। चीनी इतिहासकार व्हेनसांग के अनुसार सिरपुर में महात्मा बुद्ध के समय से बौद्ध धर्म का इतिहास मिलता था। पांण्डुवंश के प्रारंभिक शासक भवदेव रणकेसरी बौद्ध धर्म के उपासक थे। महाशिवगुप्त बालार्जुन शैवमतावलंबी थे। ऐसी मान्यता है कि महाशिवगुप्त बालार्जुन धर्म सहिष्णु राजा थे। इसलिए उनके राज्य में शैव,वैष्णव और बौद्ध धर्म अस्तित्व में थे। बालार्जुन का हर संम्प्रदाय के प्रति झुकाव था। इसलिए उन्होंने बौद्ध विहारों के प्रति अपनी उदारता दिखाते हुए ना केवल धन दान में दिए बल्कि, संरक्षण भी दिए थे। इसलिए यहां बौद्ध सम्प्रदाय विकसित और प्रचारित हुआ। उस समय यहां 100 संघाराम थे तथा महायान संप्रदाय के दस हजार भिक्षु निवास करते थे। 
तीवर देव सबसे बड़ा बौद्ध विहार
दक्षिण कोसल में अब तक के सबसे बड़े विहार के रूप में तीवर देव बौद्ध विहार है। जो कि 2002-03 के उत्खनन मे मिला। तीवर देव महाविहार विशाल और भव्य है। इसकी शिल्पकला अद्भुत है। यह बौद्ध विहार लगभग 902 वर्ग मीटर में फैला है। इसे दो भागों में विभक्त किया जा सकता है। प्रथम विहार के मध्य में 16 अलंकृत प्रस्तर स्तंभों वाला मंण्डप है। इन स्तंभों पर ध्यान में लीन बुद्ध,मोर,चक्र,सिंह आदि का शिल्पांकन है। यह विहार भी अन्य विहारों की तरह है। चारों ओर भिक्षुओं की कोठरियां है,मध्य में आंगन है। गर्भगृह है। गर्भगृह के सामने वाले मंण्डप के चारों ओर गलियारा है। इस विहार में जल निकासी के लिए प्रस्तर निर्मित भूमिगत नालियों के अवशेष मिले हैं। इस विहार के प्रवेश द्वार का शिल्पांकन बहुत ही अलंकृत है। हाथियों के मैथुन मुद्रा में प्रदर्शित किया गया है। जबकि अन्य बौद्ध विहारों में ऐसा नहीं है। इसके अलावा आलिंगनबद्ध प्रणय प्रदर्शित करती युगल मूर्तियां भी आकर्षण का केन्द्र है। मगरमच्छ एवं वानर की कथा को उकेरा गया है। कुम्हार द्वारा चाक पर मिट्टी के बर्तन बनाने का दृश्य व्यवसाय एवं उसके महत्व को उल्लेखित करते हैं। 
ईटों का बौद्ध विहार
सिरपुर में सभी बौद्ध विहार ईटों से निर्मित हैं। कह सकते है कि आज के एक नम्बर के ईंटे से अच्र्छे इंटे प्रयोग में लाए गए थे। विहारों की तल योजना में गुप्तकालीन मंदिर तथा आवासीय भवन का निर्माण किया गया है। विहार में भिक्षुओं के ध्यान,निवास,स्नान के अलावा अध्यापन की सुविधाएं थी। खुदाई में 43 रिहायसी कमरों के अवशेष मिले हैं। प्रत्येक विहार के सामने बरामदा और सभागृह है। पीछे की ओर भिक्षुओं के निवास स्थल है। कुछ कमरें बडे़ हैं,जिसमें तीन भिक्षु रह सकते हैं। कुछ बहुत ही छोटेे हैं,जिसमें एक ही व्यक्ति रह सकता है। महाशिवगुप्त बालार्जुन के शासन काल में आनंद प्रभु नामक बौद्ध भिक्षु ने विहार का निर्माण कराया था। आनंद प्रभु कुटी विहार में 16 स्थूल प्रस्तर स्तंभ हैं। सभा मंडल,छज्जा और प्रतिमाएं इसी पर आधारित हैं। बुद्ध की एक प्रतिमा है जो बंद कमरे में है। इस प्रतिमा के दक्षिण दिशा में पद्मपाणि की पूर्ण आकार की प्रतिमा है। देव मंदिर के दक्षिण में गंगा की और वाम में यमुना की प्रतिमा है। मठ के बरामदे में 14 कोठरियां है। सभी में आले है। एक आला दरवाजे की सांकल के लिए,दूसरा दीपक के लिए, तीसरा ताले के लिए और चैथा वहां निवास करने वाले भिक्षुओं के सामान रखने के लिए था। यह मठ दो मंजिला है। हर मठ में एक सीढ़ी है। जिससे ऊपर जाया जा सकता है। यहां एक प्रवेश द्वार है। इससे लगा कमरा कोषागार लगता है। इसलिए कि कोषागार में जाने के लिए समीप ही एक कमरे की दीवार के आधार के साथ खिड़कीनुमा पल्ला होने का संकेत मिलता है। अन्न भंडार और कोषागर की व्यवस्था हर मठ में देखने को मिलती है। सामूहिक अध्ययन के लिए एक बड़ा कमरा है। छोटे, छोटे कमरे और कुछ थोड़ा बड़े हैं। ईटों से बना मठ बाहर से देखेने पर नहीं लगता कि अंदर कई कक्ष होंगे।
एक सच ऐसा भी
खुदाई में तीन अन्य छोटे मठ भी मिले हैं। इनमें एक भिक्षुणी मठ था। इसमें बड़ी संख्या में सीपी तथा कांच की चूड़ियां मिली है। इस मठ में एक नक्काशीदार छोटे स्तूप व एक चमकता हुआ वज्र मिला है। मिली मुद्राओं पर बौद्ध धर्म से संबंधित सूक्तियां अंकित है। बुद्ध के अलावा अन्य मूर्तियांे में सातवीं शताब्दी के अक्षरों में बौद्ध बीजमंत्र उत्कीर्ण है। गंधेश्वर मंदिर में मिली बुद्ध की प्रतिमा में आठवीं शताब्दी के अक्षरों में बौद्धमंत्र उत्कीर्ण है। बताया जाता है कि आनंद प्रभु कुटि विहार का उपयोग बौद्ध भिक्षु-भिक्षुणियों द्वारा आवास हेतु किया जाता था। इसके बाद इस विहार का उपयोग शैव धर्मानुयायियों के द्वारा किया गया। इन शैव धर्मावलम्बियों ने या तो बौद्ध धर्मानुयायियों को विहार से निर्वासित कर दिया या इनकी खाली कोठरियों पर कब्जा कर लिया होगा। शैव धार्मवलम्बियों ने बौद्ध विहार में रखी बुद्ध की प्रतिमा भी नहीं हटाए, इसके पीछे मान्यता है कि बुद्ध विष्णु के दशावतारों में एक है।
गठिया पत्थर की मूर्तियां
सिरपुर की सभी मूर्तियां गठिया पत्थर की बनी हुई है। यहां सभी स्थानों के शिल्प चित्रण में हंस और मयूर   है। ज्यादातर मूर्तियों में दैहिक सौन्दर्य में लयात्मकता,केामलता और रसात्मकता की झलक दिखती है।   लेकिन एक बात चैंकाती है कि शिव पार्वती और गणेश की प्रतिमा के साथ महिषासुरमर्दिनी की मूर्तियांे के साथ गंगा की मूर्तियां है। बौद्ध विहारों से बुद्ध की प्रतिमा को हटाया नहीं गया। ऐसा माना जाता है कि बुद्ध की प्रतिमा के द्वार पर गंगा की प्रतिमा की उपस्थिति का संबंध हिन्दू धर्म के साथ साथ बौद्ध धर्म से भी है। इसलिए बौद्ध विहार के पास ही शिव की प्रतिमाएं विराजी रहीं।
चैत्य मेहराब से अलंकृत लक्ष्मण मंदिर  पुरातत्व के जानकार कौशलेश तिवारी कहते हैं,‘‘ईटों से निर्मित लक्ष्मण मंदिर देश में अद्वितीय है। इस मंदिर का निर्माण काल ईस्वी 650 के करीब का है। इसे महाशिवगुप्त बालार्जुन की माता वासटा अपने पति हर्षगुप्त जो वैष्णव धर्मानुयानी थी,हर्षगुप्त की मौत के बाद शैव धर्म अपना ली,उनकी पुण्य अभिवृद्धि के लिए लक्ष्मण मंदिर का निर्माण कराया था। लक्ष्मण मंदिर का शिखर कई ढलाव वाला है। यह शिखर चैत्य मेहराब रचना से अलंकृत है। जिनके बीच में स्तंभ के समान सीधे दंड बने हुए है। इसके ऊपर कुडु से अलंकृत कपोतों की रचना है। सभी शिखर एक के ऊपर एक बने हुए है। चैत्य मेहराबों की दो पत्तियों से सुसज्जित हैं। जो छोटे होते गए हैं। मंदिर के प्रवेश द्वार पर शेषशायी विष्णु हैं, उभयद्वार शाखा पर विष्णु के प्रमुख अवतार,कृष्णलीला के दृश्य,मिथुन दृश्य और वैष्णव द्वारपालों का अंकन है। इस मंदिर की बनावट की खासियत यह है कि शिखर को सजाने के लिए चैत्य गवाक्षों की अर्द्ध पंक्त्यिों से की गई है। इसके क्षैतिज पट्टियों पर कगूरों और लघु चैत्य पर ताखों की सजावट है। शिखर का कलश नष्ट हो गया है। खुदाई से मिली मूर्तियों को लक्ष्मण मंदिर के पास बने संग्रहालय में रखी हुई हैं। बहरहाल सिरपुर की खुदाई बंद है,यदि पुनः होती है तो कई अद्भुत और अकल्पनीय साक्ष्यों से सामना हो सकता है।