Wednesday, March 3, 2021

पत्रकारों को जान के लाले

 











बस्तर में पत्रकारिता कभी भी आसान नहीं रही।पत्रकारांे को पुलिस के खिलाफ लिखने पर पुलिस नक्सलियों का मुखबिर बताकर जेल में डाल देती है और पुलिस का साथ देने पर नक्सली अपना दुश्मन समझ लेते है। यहां पत्रकरिता विकलांग हो गई है।  


0 रमेश कुमार ‘रिपु’
             छत्तीसगढ़ में उस पार्टी की सरकार है,जिसके नेता राजबब्बर ने कांग्रेस भवन में कहा था कि,नक्सली क्रांतिकारी हैं। वे क्रांति के लिए निकले हैं। कोई उन्हें रोके नहीं। सवाल यह है कि, नक्सली किस तरह के क्रांतिकारी हैं,जो जन अदालत लगाकर पत्रकारों को सजा देने की बात कर रहे है। प्रेस नोट जारी कर पत्रकार गणेश मिश्रा,लीलाधर राठी, बीबीसी के पूर्व पत्रकार शुभ्रांशु चैधरी, पी विजय, और फारूख अली को चेतावनी दी हैं। जबकि बस्तर में एक लाख के करीब फोर्स के जवान हैं। और भूपेश सरकार कहती है कि,नक्सली कमजोर हुए हैं। यदि नक्सली कमजोर हुए हैं,तो आम आदिवासी और पत्रकारों को नक्सली धमकी देने की हिमाकत कैसे कर लिए? पत्रकारों का संगठन सुकमा,बिजापुर और जगदलपुर मुख्यालय में धरना प्रदर्शन कर नक्सलियों का विरोध किया है। सरकार की चुप्पी हैरान करती है। बस्तर आईजी पी सुन्दरराज कहते हैं, इस पूरे मामले को पुलिस ने गंभीरता से लिया है। पुलिस माओवादियों के प्रेस नोट की जांच कर रही है। पत्रकारों और समाजसेवी सहित सभी नागरिकों के सुरक्षा की जिम्मेदारी पुलिस की है। किसे कितनी सुरक्षा दी जाएगी, इस बात को हम सार्वजनिक नहीं कर सकते। वहीं प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष विष्णु देव साय कहते हैं,सरकार झूठ बोलाती है कि नक्सलवाद कमजोर हुआ है। उनके हौसले बढ़े हैं। अब पत्रकार उनके निशाने पर है।’’
नक्सलियों के पत्र का जांँच करायेंगे। पुलिस अपने स्तर पर नक्सलवाद के खात्मे के लिए काम कर रही है।’’जाहिर सी बात है कि पत्रकारों की जान की कोई कीमत पुलिस नहीं मानती।
गौरतलब है कि दक्षिण सब जोनल ब्यूरो की ओर से 9 और 12 फरवरी को बीजापुर में प्रेस नोट जारी करते हुए पत्रकारों और कार्पोरेट घराने के लोगों को चेतावनी दी थी कि, भ्रष्टाचारियों और कॉरपोरेट घरानों के लोगों को जन अदालत लगाकर सजा दी जाएगी। 13 फरवरी को दंतेवाड़ा में नक्सलियों ने पत्रकारों के खिलाफ पर्चे भी फेंके। इसके बाद नक्सलियों की तरफ से 15 फरवरी को जारी विज्ञप्ति में सुकमा के पत्रकार लीलाधर राठी व बीजापुर के पत्रकार गणेश मिश्रा को जन अदालत में दंडित करने की चेतावनी देते हुए कहा कि ये कार्पोरेट घरानों के दलाल है। इस घटना की प्रदेश भर के पत्रकारों ने निंदा की है। इसके बाद 17 फरवरी को नक्सलियों का एक पत्र फिर मीडिया के पास आया जिसमें पत्रकारों को आंदोलन नहीं करने की सलाह देते हुए मामले पर चर्चा करने की बात कही। पत्र में लिखा कि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सरकार यहां के प्राकृतिक संसाधनों को कारर्पोरेट घराने के हाथों में सौपने भूअर्जन पुनर्वास व्यवस्थापना कानून 2019 को लाया। जनता को बेदखल करने खदाने और बांधे शुरू करने के लिए समझौता किया। नया कैम्प और खदान खोलने का जनता लगातार विरोध कर रही है। फासीवादी सलवा जुड़ूम,शांति सेना,अग्नि सेना जैसी संस्थाओं के नेता फारूख अली जैसे गुंडों को शोषक वर्ग ने सम्मानित किया। पत्रकार और समाजसेवीं इसका विरोध करें,नहीं तो अंजाम भुगतने तैयार रहें।
पत्रकार गणेश मिश्रा कहते हैं,उनका कार्पोरेट घरानों से कोई ताल्लूक नहीं है। वे विशुद्ध रूप से पत्रकार हैं। लीलाधर राठी कई साल से बीजापुर में किराए के घर में रहते हैं। बरसों से वे ग्रामीण लोगों की आवाज उठाते आ रहे हैं। बात सारकेगुड़ा की हो या एड़समेटा की,उन्होंने निष्पक्ष होकर मसले को कवर किया। लीलाधर राठी कहते हैं,कभी ऐसा काम नहीं किया कि नक्सली नाराज हो जाएं। सुकमा में राठी मार्ट नाम से एक दुकान खोली है,उसमें सभी महिलाएं वर्कर हैं। उनकी पत्नी दुकान की मालकिन हैं। दुकान में काम करने वाली सभी महिलाएं निर्धन हैं। गौरतलब है कि 26 जनवरी को दस लोगों को मार्ट की ओर से सम्मानित किया गया था। चर्चा है कि, सम्मानित जिन्हें किया गया उसमें कुछ लोग सलवा जुड़ूम के समर्थक थे। नक्सली इसीलिए नाराज हैं। सुकमा के पत्रकार लीलाधर राठी एक बार जब माओवादियों ने सब इंस्पेक्टर प्रकाश सोनी को बंधक बना लिया था। जनअदालत से वे लंबी सुनवाई के बाद प्रकाश सोनी को सकुशन रिहा करा लाए थे। बस्तर में शांति स्थापित करने की दिशा में प्रयासरत बीबीसी के पूर्व पत्रकार शुभ्रांशु चैधरी कहते हैं,ं मोबाइल और रेडियो के माध्यम से बस्तर के अंदरूनी इलाकों में लोगों से संवाद स्थापित कर रहे हैं। आदिवासी महिलाओं के लिए सैनेटरी पैड के इस्तेमाल को बढ़ावा देने की पहल को गति दे रहे हैं। ताकि महिलाओं में जागरूकता आए।
नक्सलियों के खिलाफ हुए प्रदर्शन
बीजापुर में 14 फरवरी को नक्सलियों के पर्चे फेंकने के बाद बीजापुर में पत्रकारों ने बैठक की। 16 फरवरी से 22 फरवरी तक धरना,प्रदर्शन कर नक्सलियों का विरोध कर निंदा प्रस्ताव पारित किया। 15 फरवरी को जगदलपुर में सामाजिक संगठनों ने इसके विरोध में नक्सलियों का पुतला दहन किया। 16 फरवरी को पत्रकारों ने दंतेवाड़ा में बाइक रैली निकालकर नक्सलियों के फरमान का विरोध किया। बाइक रैली कंगाल से निकाली गई है। 16 फरवरी को पत्रकारों ने माओ के गढ़ गंगालूर में एक रैली और सभा की। नक्सलियों ने बीजापुर और सुकमा के पत्रकार को जान से मारने की धमकी का विरोध करते हुए जवाब मांगा। 18 फरवरी को कुछ पत्रकार गंगालूर से 10 किलोमीटर आगे नक्सलियों की मांद में घुसे। नक्सली स्मारक के सामने नक्सल विज्ञप्ति का उन्होंने विरोध जताया। 18 फरवरी को पत्रकारों ने बुरगुम गांव में धरना,प्रदर्शन किया। सामाजिक कार्यकर्ता सोनी सोरी ने पत्रकारों के प्रदर्शन का समर्थन किया। जगदलपुर पत्रकार संघ अध्यक्ष एस करीमुद्दीन ने कहा,कि नक्सली जल्द सामने आएं और स्थिति को स्पष्ट करें। इसलिए कि परिवार परेशान है।
पहले भी पत्रकार मारे गए
नक्सलियों के निशाने पर पहली बार पत्रकार नहीं आए हैं। इसके पहले बीजापुर जिले के साईं रेड्डी और बस्तर जिले के नेमीचंद जैन को माओवादियों ने अपना निशाना बनाया है। इन दोनों मृत पत्रकारों के खिलाफ कोई पर्चा जारी नहीं किया गया था। ऐसा पहली बार हुआ है, जब पत्र में बीजापुर के गणेश मिश्रा, सुकमा के लीलाधर राठी बीबीसी के पूर्व पत्रकार शुभ्रांशु चैधरी के साथ माओवादियों के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाले कोंटा के पी. विजय और सुकमा के फारूख अली का नाम शामिल है।  
माओवादियों के जारी पर्चे के जवाब में समाज सेवी फारूख अली ने कहा,नक्सली पीएलजीए सप्ताह के नाम पर निर्दोष ग्रामीणों की जान लेते हैं और अपने आप को क्रांति का दूत कहते हैं। बस्तर से आदिवासी संस्कृति खत्म करना चाहते हैं। बंदूक की नोक पर न केवल लोगों में डर पैदा करना चाहते हैं बल्कि, इसी के दम पर सत्ता हासिल करना चाहते हैं। बस्तर के लोग कभी उनके सपने को पूरा नहीं होने देंगे।
दक्षिण बस्तर पत्रकार संघ अध्यक्ष बप्पी राय कहते हैं,छत्तीसगढ़ के बस्तर में पत्रकारिता बेहद चुनौतीपूर्ण है। जब सरकार और नक्सलियों के बीच कोई वार्ता करनी होती है,तब बस्तर के पत्रकार ही सरकार की मदद करते हैं। बस्तर के पत्रकारों के माध्यम से ही कई बार निर्दोषों को नक्सलियों के कब्जे से छुड़ाया गया है। इतना ही नहीं,बस्तर संभाग के सभी नक्सल प्रभावित जिलों के पत्रकार जब कोई बड़ा नक्सली हमला होता है, तो पत्रकार के रूप में नहीं बल्कि, मददगार बनकर खड़े हो जाते हैं। जान जोखिम में डालकर अंदरूनी इलाकों से खबर लेकर आते है। जिसके बाद वही खबर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय खबर बनती है।’’
बाहरहाल बस्तर में पत्रकारिता इतनी आसान नहीं है। पुलिस के खिलाफ लिखने पर पुलिस नक्सलियों का मुखबिर बताकर पत्रकारों को जेल में डाल देती है और पुलिस का साथ देने परा नक्सली जन अदालत में फैसला करने की बात कहते हैं। यहां पत्रकारिता विकलांग हो गई है,कहें तो गलत नहीं होगा। देखना यह है कि सरकार और पुलिस, पत्रकारों की सुरक्षा माओवादियों से किस तरह करती है।
 
 
 
 
 
 


 

Tuesday, February 23, 2021

सरकार और माओ दोनों भटक गए हैं

 
       

छत्तीसगढ़ में माओवादी हैं,तो सुरक्षा बल है। सुरक्षा बल है,तो सोनी सोरी की आवाज़ है। जो वर्दी से उभरने वाली दरिंदगी के खिलाफ गूंजती है। सोनी सोरी मानती है कि, फोर्स के दम पर नक्सलवाद खत्म नहीं होगा। पाँच बटालियन और मिलने से महिलाओ के साथ अनाचार बढ़ेगा। लोन वार्रंाटू सिर्फ पैसा और प्रमोशन पाने, पुलिस का काॅसेप्ट है। इससे नक्सलवाद कमजोर नहीं होगा। नक्सलवाद  पर इस तरह की तमाम बातें सोनी सोरी से की। प्रस्तुत है उनसे हुई बातचीत के प्रमुख अंश - 


0 रमेश कुमार ‘‘रिपु’’
0 छत्तीसगढ में नक्सली हिंसा बढ़ने की वजह क्या मानती हैं?
00 छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद से आदिवासियों के साथ ज्यादा अत्याचार होने लगा है। पेसा कानून की बात की जाती है लेकिन, उसे अमल में नहीं लाया जाता है। ग्राम सभा होनी चाहिए। पर होती नहीं। मैं मानती हूूॅ कि, सीआरपीएफ के कई कैंप लगे हैं,नक्सलियों से मुक्ति के लिए। सवाल यह उठता है,जब कैंप लगे हैं,तो फिर आदिवासियों के साथ जुल्म,अत्याचार क्यों होता है। महिलाओं के साथ अनाचार क्यों होता है? आदिवासियों को नक्सली बताकर बार बार जेल क्यों भेजा जाता है? सरकार सोचती है कि,ऐसा करने से नक्सलवाद खत्म हो जाएगा, तो गलत सोचती है। आदिवासी परेशान होकर कहता है, जब झूठे तरीके से नक्सली बताकर जेल में डाला जा रहा है,तो नक्सली ही बन जाते हैं।
0 क्या आप मानती हैं कि, जब तक पुलिस निर्दोष आदिवासियों केा नक्सली बताकर गोली मारती रहेगी या फिर जेल में डालती रहेगी, नक्सलवाद खत्म नहीं होगा।
00पुलिस बल के जरिये सरकार जो कर रही है,उससे नक्सलवाद खत्म नहीं हो सकता। लड़ाई यहांँ जल,जमीन और जंगल की है। न कि नक्सलियों की लड़ाई है। सरकार की नीतियाँं आदिवासियो के हित में नहीं है। सरकार पेसा कानून को अमल में तो लाए। महिलाओं के साथ होने वाले अनाचार और जुल्म को रोकने क्या कर रही है,यह तो बताये। आदिवासियों को नक्सली बताकर गोली मारने का सिलसिला थमेगा नहीं,ऐसे में नक्सलावाद कैसे खत्म होगा?
0 बस्तर के आई जी रहे एस.आर.पी कल्लूरी की वजह से नक्सलवाद मे कमी आई या फिर नक्सलवाद और बढ़ा?
00 कल्लूरी के पहले भी नक्सलवाद था और अब भी है। बल्कि पहले से अधिक है। जब तक आदिवासियों के पक्ष में सरकार खड़ी नहीं होगी,नक्सलवाद खत्म नहीं हो सकता। कोरोना काल के मार्च महीने में 17 डीआरजी के जवान शहीद हुए। सरकार कहती है,नक्सलवाद कमजोर हो रहा है,यह सिर्फ अखबारों में दिखता है। सच्चाई यह है कि, नक्सलवाद पहले से और बढ़ा है। बस्तर में आदिवासी नक्सलियों के मुखबिर के शक में मार दिये जाते है। नक्सली भी पुलिस के मुखबिर के आरोप में आदिवासियों को मार देते हंै। नक्सली मरने की जगह, आदिवासी पहले भी मरते थे। आज भी मर रहे हैं।
0 क्या आपको लगता है कि, नक्सली अपने मकसद से भटक गये हैं।
00 आदिवासियों के लिए सरकार बड़ी बड़ी बाते करती है,लेकिन करती क्या है? जब से होश संभाली हूूॅ, देख रही हॅू कि निर्दोष आदिवासी ही पिस रहा है। सरकार और माओ दोनों भटक गए हैं। दोनों अपने मकसद के विपरीत चल रहे हैं।
0 कांग्रेस सरकार और बीजेपी सरकार, दोनों में से किसे मानती है कि नक्सलवाद के खिलाफ उनका काम अच्छा है?
00 बीजेपी हो या फिर कांग्रेस, दोनों नक्सलवाद से निपटने मे असफल है। बीजेपी के समय सलवा जुड़ूम से आदिवासियों को जो जख्म मिले,उसे भुलाया नहीं जा सकता। नक्सल समस्या के लिए कांग्रेस ने अपने घोंषणा पत्र मे जो बातें कहीं थी, लगता है उसे भूल गई है। नक्सल नीति बनाने की बात की थी। दो साल बाद भी नहीं बनी।
0 क्या आप माानती हैं कि, नक्सली क्रांतिकारी हैं। वे क्रांति करने निकले हैं।
00 बंदूक से लड़ाई करने वालों को क्रांतिकारी कैसे कह सकते हैं। माओ की गोली हो या फिर पुलिस की,दोनों से इंसान मरते है। मानवता मरती आई है। आदिवासी मरते हैं। विचारों से जो क्रांति लाए, उसे ही क्रांतिकारी कहेंगे।
0 लोन वार्रंाटू को, क्या पुलिस का सही कांस्पेट है मानती हैं?
00 लोन वार्राटू पूरी तरह फजी कांस्पेट है। हैरानी वाली बात है कि,दंतेवाड़ा जिले में 400 माओवादी सरेंडर करते है फिर भी चार,चार एनकांउटर होता है। आखिर क्यों? दरअसल सरेंडर करने वाले किसान हैं, आदिवासी हैं। जब एक जिले में इतने माओवादी सरेंडर कर रहे है, तो सोचने वाली बात है कि पूरे बस्तर में आखिर कितने नक्सली होंगे? दंतेवाड़ा नक्सल मुक्त क्यों नहीं होता? पिछले दिनों राज्यपाल मेडम से यही सवाल की। उनके पास कोई जवाब नहीं था। जल,जमीन और जंगल उद्योगपतियों को देकर, सरकार जल,जमीन और जंगल की हत्या करा रही है।    
0 केन्द्र सरकार ने पाँंच बटालियन और दी है बस्तर को। इससे आदिवासियों का भला होगा क्या?
00 पाँच बटालियन देने से कैंप और बन जायेंगे। जब जब फोर्स की संख्या बढ़ी है, महिलाओं के साथ होने वाले अनाचार में इजाफा ही हुआ है। यहांँ माओवादियों से पत्रकार सुरक्षित नहीं है। आम आदमी सुरक्षित नहीं है। खुलेआम पत्रकारों को माओवादी धमका रहे हैं। सरकार दावे के साथ नहीं कह सकती कि वह लोगों को माओ से सुरक्षा मुहैया करा सकती है। हजारों कैप लगा लें,नक्सलवाद खत्म नहीं होगा। बातचीत करनी चाहिए।
0 पुलिस फजी मुकदमे क्यों बनाती है?
00 पुलिस आदिवासियों के खिलाफ फर्जी मुकदमे दर्ज कर उन्हें नक्सली बताती है, अपने नाम के लिए। अपने प्रमोशन के लिए। पैसे का खेल है। गाँव से किसानों,ग्रामीण आदिवासियों को पकड़ कर लाते हैं और उन्हें एक लाख, दो लाख का इनामी नक्सली बताते है। मार देने पर दस लाख का इनामी नक्सली हो जाता है। कोई आदिवासी विरोध करता है, तो उसे यूपीए कानून के तहत कार्रवाई का डर दिखाया जाता है। अपना स्टेटस बढ़ाने के लिए पुलिस फर्जी मुकदमेे गढ़ती है। बस्तर में हजारों लोगों के खिलाफ फर्जी मुकदमे दर्ज कर पुलिस उन्हें जेल में डाल दी। निर्मलक्का और उसके पति चन्द्रशेखर रेड्डी को नक्सली बताकर जेल में डाल दिया गया था। उसका पति पहले ही छूट गया था। लेकिन, निर्मलक्का 12 साल बाद निर्दोष जेल से छूटी। सवाल यह है कि, वह नक्सली थी, तो बाइज्जत बरी कैसे हो गई।
0 पुलिस वाले आदिवासी महिलाओं के साथ अनाचार करके,उन्हें माओवादी बताकर गोली क्यों मार देते है या फिर जेल में क्यों डाल देते हैं?
00 पुलिस आदिवासी महिलाओं के साथ रेप करती है। फिर उसे माओवादी बताकर गोली मार देती है, ताकि देशवासियों की उसके प्रति सहानुभूति न रहे। महिला को माओवादी बताकर, खुद का बचाव करती है पुलिस।  
0 नक्सलवाद खत्म कैसे होगा?
00 सरकार को चाहिए कि,वह बातचीत का रास्ता अपनाए। बातचीत उन आदिवासियों के साथ करे, जो दिन रात पुलिस के बीच रहता है। माओवादियों का सामना करता है। उसकी समस्या किससे है। उसकी समस्या क्या है? उसे सरकार समझे। फर्जी तरीके से नक्सली बताकर जेल में डाल देने वालों से बात करे। जल,जमीन और जंगल पर कब्जा करने वालों को, रोकने वालों से बातें करें। आदिवासियों की समस्या को जब तक दूर करने की सरकार नहीं सोचेगी,नक्सलवाद खत्म नहीं होने वाला। माओवादियों से बात करने के लिए भूपेश सरकार ने मना कर दिया है। वे कहते हैं, पहले नक्सली हथियार छोड़ें। ऐसे में कैसे बात होगी। बस्तर के जंगलों के भीतर जो रहते हैं, उनसे पूछें कि, उन्हें कैसा विकास चाहिए। गोली और लाठी से उनकी आवाज दबा दी जाती है। बातचीत से निश्चय ही नक्सलवाद खत्म होगा।
0 पुलिस की आंँखों में सोनी सोरी क्यों खटकती है?
00 सोनी सोरी खटकेगी क्यों नहीं। आदिवासी भाई बहनों के सुख दुख में उनके साथ खड़ी रहती है। उन पर होने वाले जुल्म,अत्याचार और बहनों के साथ होने वाली रेप की घटनाओं के खिलाफ कंधे से कंधा मिलाकर पुलिस की ज्यादती का विरोध करती है। उनके आँसुओं को अपना आंँसू समझती है। मेरी नस नस वाकिफ है, पुलिस के जुल्म से। मेरे ऊपर कैमिकल्स अटैक हुआ,मेरे गुप्तांग में कंकर पत्थर डाले गये,मारपीट की गई। मैं पुलिस के हर हथकंडे को जान गई हूॅ। पुलिस को लगता है कि, मैं आदिवासियों की नहीं, माओवादियों की मदद करती हूूॅ। जबकि ऐसा नहीं है। माओवादियों के साथ न थी और न रहूंगी। कुछ पुलिस वाले मुझे इज्जत भी देते हैं। उन्हें लगता है कि, मेरी लड़ाई आदिवासी भाई और बहनों के लिए है।  
 
 










Monday, January 18, 2021

एम.पी.में पांव पसारते नक्सली

     
छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र में लाल गलियारे का विस्तार करने के बाद माओवादी मध्यप्रदेश के बालाघाट, मंडला, डिंडौरी और अमरकंटक तक अपना विस्तार करने में जुट गए हैं। नक्सली गतिविधियां बढ़ने की वजह से हॉकफोर्स का मुख्यालय बालाघाट शिफ्ट कर दिया गया है। सवाल यह है कि क्या बस्तर के माओवादियों के बढ़ते कदम रूक पाएंगे?


0 रमेश कुमार ‘‘रिपु’’
                   बस्तर के नक्सली मध्य प्रदेश में डेढ़ दशक के बाद फिर अपनी आवा जाही तेज कर दिये हंै। यह माना जा रहा है कि माओवादी अपना विस्तार करने के मक़सद हलचल तेज कर दिये हैं। बालाघाट जिले में नक्सलियों के दलम का दखल कान्हा नेशनल पार्क और उसके आगे तक बढ़ता जा रहा है। वे मंडला, डिंडोरी और अमरकंटक की तरफ पैठ बनाने में लगे हैं। कान्हा पार्क में गांँव नहीं होने से नक्सलियों का जत्था रास्ते में नाकेदारों की चैकियों में रूक कर रखे राशन पानी को चट कर जाते हैं। क्यों कि कान्हा नेशनल पार्क के अन्दर और पार्क के कई किलोमीटर दूर तक गाँव नहीं हैं। नक्सलियों को यहांँ रहने,रूकने और खाने का कोई सहारा नहीं मिलता है। इस वजह से वे लगातार मूवमेंट कर रहे हैं। वन विभाग ने इसकी रिपोर्ट पुलिस मुख्यालय और गृह विभाग को भेजी है। हालांकि वन कर्मचारियों को नक्सली किसी भी तरह का नुकसान नहीं पहुंचाते हैं। लेकिन नक्सलियों की वजह से मंडला के वन क्षेत्र में कटाई कुछ दिनों तक प्रभावित थी।  
छत्तीसगढ़ के बस्तर और महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में माओवादियों के विस्तार के बाद मध्यप्रदेश के कान्हा किसली टाइगर रिजर्व,मुकी क्षेत्र और मंडला में इनकी गतिविधियांँ देखी जा रही हैं। प्रदेश के गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा भी मानते हैं कि, माओवादियों का दायरा बढ़ने लगा है। इसलिए जनवरी,फरवरी 2021 में सीआरपीएफ की छह कंपनियां मंडला-बालाघाट में तैनात की जाएगी। इनमें 75 फीसदी लड़ाकू जवान होंगे।’’ नक्सली गतिविधियां बढ़ने की वजह से हॉकफोर्स का मुख्यालय बालाघाट शिफ्ट कर दिया गया है। जिसमें 5 दिसंबर को ही आई.पी.एस. नागेंद्र सिंह और सहायक पुलिस निरीक्षक घनश्याम मालवीय की पोस्टिंग की गई है। नवंबर 2020 में कान्हा के बफर क्षेत्र में एक नक्सली ऑपरेशन को भी अंजाम दिया जा चुका है।  
बस्तर के नक्सली मूवमेंट कर रहें
बालाघाट में माओवादियों की मूवमेंट 2019 से अचानक बढ़ गई है। इस बीच कुछ इनामी माओवादी मुठभेड़ में मारे भी गये हैं। गौरतलब है कि जुलाई 2019 की दरम्यिानी रात में लांजी क्षेत्र के पुजारी टोला में पुलिस और नक्सलियों के बीच मुठभेंड हुई थी,जिनमें एक महिला सहित दो इनामी नक्सली मारे गये थे। उसके बाद 17 सितंबर 2020 को कान्हा पार्क के बफर जोन से लगे बांधाटोला और समनापुर के जंगल से पुलिस और नक्सलियों के बीच मुठभेड़ में 12 लाख का इनामी नक्सली ओसा उर्फ बादल गिरफ्तार किया गया। 7 नवंबर 2020 को भी पुलिस ने कान्हा राष्ट्रीय उद्यान के करीब मालखेड़ी के जंगल में मुठभेड़ में एक महिला नक्सली को मार गिराया था। ये महिला नक्सली खटिया मोर्चा दलम 02 की बताई गई थी। जी.पी सिंह एडी.जी नक्सल ऑपरेशन कहते हैं,‘‘कान्हा टाइगर रिजर्व में मूवमेंट छत्तीसगढ़ बॉर्डर की तरफ से बढ़ा है। नवंबर में रिजर्व के बफर क्षेत्र में एक ऑपरेशन किया जा चुका है। सर्विलांस तेज है। अतिरिक्त फोर्स बुलवाई जा रही है। बस्तर और गढ़चिरौली में कार्रवाई जारी है, इसीलिए कुछ नक्सलियों ने मध्यप्रदेश की तरफ रूख किया है।’’
दो इनामी महिला नक्सली मारी गईं
11 दिसबर 2020 की रात्रि करीब साढे 10 बजे सुरक्षाबलों और नक्सलियों के बीच हुई मुठभेड़ मंे दो महिला नक्सली मारी गई। शोभा पति उमेश गावड़े 30 वर्ष मलाजखंड एरिया कमेटी की सक्रिय सदस्य है, जो कि गढचिरौली निवासी बताई गई है। इस पर मध्यप्रदेश सरकार ने 3 लाख रूपये,छत्तीसगढ़ में 6 लाख और महाराष्ट्र में 06 लाख सहित कुल 14 लाख इनाम घोषित था। उस पर म.प्र में 04, छत्तीसगढ़ में 11 और महाराष्ट्र में 06 अपराध दर्ज थे। दूसरी महिला नक्सली सरिता उर्फ आयते उम्र 24 वर्ष निवासी गंगालूर एरिया बस्तर क्षेत्र महाराष्ट्र मारी गई। सावित्री बस्तर की दरेकसा एरिया कमेटी की सदस्य है। इस पर मध्यप्रदेश सरकार ने 3 लाख रूपये, छत्तीसगढ़ 05 लाख रूपये और महाराष्ट्र सरकार ने 06 लाख रूपये कुल 14 लाख रूपये इनाम घोषित था। इस पर मध्यप्रदेश में 19 छत्तीसगढ़ में 01 और महाराष्ट्र में 05 अपराध दर्ज थे।      
बालाघाट में 47 ग्रामीणों की हत्या
बालाघाट जिले में पिछले तीन दशक से नक्सलियों की गतिविधियां बनी हुई है। जिनके खात्मे के लिये 08 हजार सुरक्षा बल कार्य कर रहे है। बालाघाट जिले के 160 गांँव प्रभावित है। नक्सल उन्मूलन के नाम पर केंद्र सरकार से सन् 2020 के लिए 03 करोड़ रूपये का बजट मिला। अब तक नक्सलियों ने पुलिस मुखबीरी के शक में 47 ग्रामीणों की हत्या कर चुके हैं। वहीं 37 पुलिस जवान शहीद हुए हैं। पुलिस नक्सली मुठभेड़ में  20 सक्रिय नक्सली मारे जा चुके हैं।  
कई दमल सक्रिय हैं
बालाघाट जिले में हार्डकोर नक्सलियों के तीन दलम कार्य कर रहे हैं। टाडा दलम, मलाजखंड दलम और कान्हा नेशनल पार्क में, विस्तार दलम। विस्तार दलम मुख्यालय बनाकर विस्तार कर रहा है। इसके अलावा यहां कई दलम हैं जो माहौल को खराब कर रहे हैं। इनमें मलाजखंड, टांडा दलम, कान्हा-भोरम दलम, परसवाड़ा दलम, विस्तार दलम, केबी डिवीजन, खटिया.मोर्चा दलम और देवरी दलम हैं। इन दलमों के नक्सली ग्रामीणों को भड़काने की कोशिश कर रहे हैं। बालाघाट पुलिस रेंज के आई.जी के.पी वेंकटेश्वर राव कहते हैं,‘‘बालाघाट व मंडला जिले में बस्तर के नक्सली, कबीरधाम जिले से लेकर भोरमदेव अभ्यारण्य के रास्ते अपना विस्तार करने में जुटे हैं। हालांकि पुलिस भी इन नक्सलियों के खिलाफ लगातार कार्रवाई कर रही है।’’
नब्बे के दशक में आये थे नक्सली
मध्यप्रदेश का आदिवासी बहुल जिला बालाघाट में नब्बे के दशक तक सब कुछ ठीक था। बैगा और गोंड़ जाति के लोग आदिम युग की संस्कृति में ही मस्त रहते हैं। लेकिन बालाघाट के पुलिस अधीक्षक रीना मित्रा के समय माओवादियों ने मुखबिरी के शक में एक व्यक्ति की हत्या कर दी थी। पहली बार यहांँ के लोगों ने सुना कि, नक्सलियों ने ऐसा किया है। इसके बाद लाल आतंक की आमद धीरे धीरे अंचल में बढ़ने लगी। बालाघाट में सीतापाल विस्फोट कांँड में 16 जवान शहीद हुए, तो प्रदेश में सनाका खिंच गया। तब से अब तक लाल आतंक की लकीर छोटी नहीं हुई। और यहीं से नक्सलियों की धमक और उनकी दहशत की तपिश बढ़ी। 15 सितम्बर 1999 को किरनापुर स्थित निवासगृह में दिग्विजय सिंह के कबीना मंत्री लिखीराम कावरे की हत्या करके नक्सलियों ने सरकार को चुनौती दी थी। लिखीराम कावरे की हत्या में शामिल जमुना को मार्च 2019 में छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव में मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ पुलिस ने संयुक्त कार्रवाई में मारा गया था। जमुना पर मध्यप्रदेश शासन की ओर से पांच लाख रुपये, छत्तीसगढ़ शासन ने आठ लाख रुपये और जिला गोदिंया महाराष्ट्र की पुलिस नें छह लाख रुपये और सीबीआई ने 50 हजार रुपये का इनाम रखा था।
नक्सलियों के बढ़ते कदम
बस्तर की तरह नक्सली बालाघाट जिले में उत्पात नहीं करते, लेकिन उनकी दशहत है। वर्तमान मे नक्सलियों की गतिविधियां पूर्व की तरह दक्षिण बैहर के चैरियां, एचिलौरा, राशिमेटा, सोनगुड्डा, कोरका, बोंदारी, मछुरदा, सालेटेकरी, किरनापुर, एलांजी क्षेत्र के आलीटोला, बोरबन, कलकत्ता, बोदालझोला, देवरबेली, सायर, संदूका, टेमनी, बडगुड, सतोना, रिसेवाडा, टिमकीटोला, सीतापालाआदि जगहों पर इनकी गतिविधियां देखी गई है। इसके अलावा राष्ट्रीय उद्यान कान्हा पार्क क्षेत्र के गढी, मुक्की, मलांजखंड और बैहर क्षेत्र से लगे गांव मालखेडी,समनापुर, बांधाटोला क्षेत्रो में नक्सलियों की गतिविधियों की सूचना पुलिस को लगातार मिल रही है। पुलिस का मानना है कि बस्तर की तरह बालाघाट को नक्सली अपना मुख्यालय बनाने की फिराक में है। करीब दो सैकड़ा नक्सली होने का अनुमान है। राज्य के पूर्व पुलिस महानिदेशक डीजीपी वी. के. सिंह ने कहा था कि नक्सली राज्य में अपना विस्तार कर रहे हैं। बालाघाट के साथ ही वे मंडला में सक्रिय हैं और अपना प्रभाव डिंडोरी के अलावा अमरकंटक में भी बढ़ाना चाहते हैं।’’
जाहिर सी बात है कि नक्सली दण्डकारण्य राज्य बनाने के लिए अपना दायरा बढ़ा रहे हंै। लेकिन ऐसा नहीं लगता कि नक्सलियों के बढ़ते कदम को सरकार आसानी से रोक लेगी। इसलिए कि बलाघाट के बैगा जन जातियों का उद्धार सरकार नहीं कर पाई है। नक्सली बैगा आदिवासियों का फायदा उठाने एक बार फिर मध्यप्रदेश में अपने पांँव पसार रहे हैं।
 
 
 
 
   
 
 
 
 

 



















नक्सलवाद के पंजे में छग की गर्दन

      












नक्सलियों ने छत्तीसगढ़ को गृहराज्य बना लिया है। बस्तर का अबूझमाड़ जंगल माओवादियों की राजधानी है। राज्य के 14 जिले नक्सल प्रभावित हैं,जबकि नक्सलियों की आवाजाही 18 जिलों में है। देश के तमाम नक्सली संगठन बस्तर के दंडकारण्य जोन को ही फालो करते हैं। माओवादी छत्तीसगढ़ को दंडकारण्य राज्य बनाने जन युद्ध कर रहे हैं,वहीं मुख्यमंत्री भूपेश बघेल कहते हैं,नक्सली जब तक हथियार नहीं छोड़ेंगे, उनसे बात नहीं करेंगे। सवाल यह है कि और कितने गणतंत्र के बाद छत्तीसगढ़ नक्सलवाद के पंजे से मुक्त होगा।
0 रमेश कुमार ‘‘रिपु’’
                ‘‘नक्सली संगठन आतंरिक सुरक्षा के लिए खतरनाक हैं।’’ पूर्व प्रधान मंत्री डाॅ मनमोहन सिंह ने माओवादियों की हिंसक घटनाओं के आधार पर यह कहा था। 2010 में दंतेवाड़ा में नक्सलियों ने घात लगाकर 76 जवानों की एक ही दिन में हत्या कर दी थी। इतने जवान एक दिन में कभी भी किसी युद्ध में शहीद नहीं हुए। बावजूद इसके मुख्यमंत्री भूपेश बघेल कहते हैं,‘‘नक्सली संविधान पर विश्वास करें और हथियार छोड़े तभी बात होगी।’’जाहिर सी बात है कि नक्सली हथियार नहीं छोड़ेंगे। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल शायद भूल गये हैं कि उनकी पार्टी के कांग्रेस नेता राजबब्बर ने चुनाव के पहले कांग्रेस भवन में 4 नवम्बर 2018 को कहा था,‘‘नक्सली क्रांतिकारी हैं। वे क्रांति करने निकले हैं। उन्हें कोई रोके नहीं।’’
क्या यह मान लिया जाए कि राजब्बर नक्सलियों का हौसला आफजाई करने आए थे। ताकि नक्सली, कांग्रेसी समर्थक हो जाएं? और बस्तर की सभी 12 सीटें कांग्रेस की झोली में आ जाए। ऐसा ही हुआ। स्व. महेन्द्र कर्मा की पत्नी और काग्रेस विधायक देवती कर्मा कहती हैं,‘‘नक्सलवाद को कोई भी पार्टी खत्म नहीं कर सकती। नक्सलवाद पहले भी था,आज है, और कल भी रहेगा। वे सवाल करती हैं कि झीरम कांड में कांग्रेस के कई बड़े नेताओं की नक्सलियों ने हत्या कर दी थी। झीरम कांड में कांग्रेस का वोट प्रतिशत बढ़ा, लेकिन सरकार बीजेपी की ही क्यों बनी?
देवती कर्मा और राजबब्बर की बातों से सवाल यह है कि,क्या नक्सलियों ने बीजेपी के खिलाफ वोट कराया? डाॅ रमन सिंह कहते थे, यदि हमारी पार्टी की सरकार बनी तो 2022 तक नक्सलवाद खत्म कर देंगे।’’तो क्या यह मान लिया जाए कि नक्सली डर गए थे। और वे राजबब्बर की बातों से खुश होकर मन से कांग्रेसी हो गए हैं। इसलिए राज्य में अब उपद्रव नहीं कर रहे हैं।
क्यों बढ़ गया नक्सलवाद
भूपेश सरकार दावा कर रही है कि राज्य में 45 फीसदी नक्सली वारदात में कमी आई है। जबकि बीजेपी की राज्य सभा सदस्य सरोज पांडेय कहती हैं,राज्य सरकार ने नक्सलियों के आगे घुटने टेक दिये हैं। जिसके दुष्परिणाम हम सभी को आने वाले समय मे भुगतने होंगे।’’वर्ष 2020 में 38 नक्सली मारे गये और 28 जवान शहीद हुए हैं। 2018-20 के दौरान पुलिस ने 216 नक्सलियों को मार गिराया वहीं 966 नक्सली सरेंडर किये। जाहिर सी बात है कि ऐसा आगे भी होता रहेगा। कांग्रेस के मीडिया प्रभारी शैलेष त्रिवेदी कहते हैं,‘‘डाॅ रमन सिंह ने माओवादियों के आगे घुटने टेकने का काम किया। तभी तो दक्षिण बस्तर के 3 ब्लाकों तक सीमित माओवाद, भाजपा सरकार के 15 साल के कार्यकाल में 14 जिलों तक फैला। भाजपा नेता रामविचार नेताम ने माओवादियों को 4 लाख रूपये चंदा देकर रसीद भी दी थी। सन् 2004 की विधानसभा की कार्यवाही में इस बात पर चर्चा भी हुयी थी। कांग्रेस ने जाँच की मांँग की जिसे अस्वीकृत कर रामविचार नेताम द्वारा माओवादियों को चंदा देने की मामले को रमन सरकार ने दबाया। छत्तीसगढ़ में नक्सली हिंसा में बढ़ोत्तरी के लिये भाजपा की गलत नीतियां  जिम्मेदार थीं।’’
एक सच यह भी
राजनीतिक सच अपनी जगह है। लेकिन एक सच्चाई यह है कि नक्सलियों ने छत्तीसगढ़ को गृहराज्य बना लिया है। बस्तर का अबूझमाड़ जंगल माओवादियों की राजधानी है। दंडकारण्य केन्द्रीय लड़ाई के लिए सेंटर है। राज्य के 14 जिले नक्सल प्रभावित हैं,जबकि नक्सलियों की आवाजाही 18 जिलों में है। देश के तमाम नक्सली संगठन बस्तर के दंडकारण्य जोन को ही फालो करते हैं। नक्सलियों के अंतरराष्ट्रीय संबंध हैं। अर्बन नक्सली उनकी मदद करते हैं। माओवादी छत्तीसगढ़ को दंडकारण्य राज्य बनानो जन युद्ध कर रहे हैं। बीस साल का छत्तीसगढ़ पूछता है,लाल सलाम का आतंक, कितने चुनाव के बाद खत्म होगा?
माओवादियों का विदेशी संबंध
आन्ध्र प्रदेश के नक्सली लीडर कोसा, कामरेड अतायु और गणेश का नक्सलवाद, बस्तर के अबूझमाड़ से लेकर देश के दस राज्यों में चार दशक से लाल लावा छितरा रहा है। केन्द्र सरकार की तरह विदेश कूटनीति के लिए नक्सली अंतरराष्ट्रीय समर्थन हासिल करने के लिए 21 सितंबर 2004 से दूसरे देशों के नक्सली संगठनों से लगातार बैठकें कर रहे हैं। सन् 2006 में माओवादियों के लीडर जर्मनी की कम्युनिष्ट पार्टी एमएलजीडी और नार्वे की एकेपी के नेताओं से मिलकर बैठकें की। इस बैठक का मकसद था, आधुनिक हथियार के साथ ही समर्थन जुटाना था। आधुनिक हथियार के जरिये, वो अब सीधे लड़ाई लड़ने लगे हैं। जैसा कि 3 मई 2018 को सुरक्षाबलों और माओवादियों के बीच हुई मुठभेड़ के बाद जर्मन हेक्लर और कोच एच.के जी .3 राइफल बरामद हुई। झारखं डमें चीनी रायफल मिली। जाहिर सी बात है कि नक्सली संगठन सरकार को अपनी ताकत की ताकीद कराने विदेशी हथियार बाहर से लाते हैं। 2010 में हुए दंतेवाड़ा का नरंसहार, से लेकर मार्च 2020 तक हुए नक्सली हमले इस बात का प्रमाण है कि अब बस्तर का लाल गलियारा केन्द्रीय लड़ाई में अपने आप को कमजोर नहीं मानता।
अफीम की खेती करते हैं
नक्सली संगठन शोषित,गरीब,आदिवासी और भूमिहीन किसानों के हक की लड़ाई की बात राजनीतिक दलों की तरह करते हैं। जबकि नक्सली संगठन का लेवी और उगाही करना एक मात्र लक्ष्य है। बस्तर में जितने भी उद्योग हैं,उनसे नक्सली पैसा लेते हैं। नौ सितंबर 2011 में बैलाडीला खदानों से लौह अयस्क ले रही बहुराष्ट्रीय कंपनी एस्सार अपनी सुरक्षा के लिए 15 लाख रूपये एक स्थानीय ठेकेदार बी.के. लाला को दो नक्सल समर्थकों को देते हुए पुलिस ने रंगे हाथों पकड़ा था। पुलिस का मानना है कि माओवादी छत्तीसगढ़ से एक हजार करोड़ रूपये से अधिक की राशि हर बरस उगाह कर आंध्र पहुंचाते हैं। नोटबंदी और कोरोना काल में उनकी उगाही का धंधा मंदा पड़ा है। दंतेवाड़ा के तत्कालीन आइ.जी एस.आर.पी. कल्लूरी ने 2010 में बीजापुर में नक्सलियों की अफीम की खेती पकड़ी थी। कल्लूरी कहते हैं, गांँजा और अफीम की खेती से भी नक्सली खासा धन जमा कर लेते हैं। खुफिया रिपोर्टों से खुलासा हुआ है कि नक्सल प्रभावित पाँंच राज्यों में नक्सली 1443 हेक्टेयर जमीन पर अफीम की खेती करते हैं। लेवी का आधा से अधिक हिस्सा मिलिट्री कमांड को जाता है। उससे हथियार खरीदे जाते हैं। सुरक्षा बलों का कहना है कि सन् 2007 में नक्सलियों ने 17.5 करोड़ रुपए खर्च कर एके.47 और राकेट लांचर खरीदे थे। इसी तरह दिसंबर 2008 में 200 ए.के.47 राइफलें खरीदीं। जाहिर सी बात है कि नक्सलियों के पास सुरक्षा बलों से लड़ने के सारे आधुनिक हथियार हैं। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल कहते हैं,छत्तीसगढ़ में ना ही ए. के. 47 बनती है और ना ही गोली के कारखाने हैं। अवैध हथियार कहाँ से और कैसे आते हैं, गृहमंत्रालय को पता करना चाहिए।’’
दण्डकारण्य राज्य की तैयारी
दंतेवाड़ा एस.पी अभिषेक पल्लव कहते हैं, बस्तर के नक्सलियों के संबंध चीन और नेपाल से हैं। वो वहांँ के नक्सली संगठन से मिलते हैं।’’दरअसल माओवादी दूर की सोच रखते हैं। वे जानते हैं कि दंडकारण्य राज्य या देश बनाने के लिए हमें विदेशी कूटनीतिक का सहारा लेना पड़ेगा। इसके लिए वे सन् 1996 में वर्कर्स पार्टी आॅफ बेल्जियम द्वारा आयोजित अंतरराष्ट्रीय परिसंवाद में हिस्सा लिए। इस परिसंवाद में 40 देशों के करीब 60 संगठनों ने हिस्सा लिया था। उस समय पीडब्लयूजी से जुड़े माओवादियों ने फिलीपीन्स के सीपीसी,जर्मनी के एमएलपीडी,पेरू के जीसीबी,तुर्की के टीकेपी,नार्वे के एकेपी के अतिरिक्त अन्य कई साम्यवादी संगठलों से संपर्क किया था। पिछले 20 वर्षो से नेपाली माओवादियों के साथ बैठकें कर रहे हैं। दंडकारण्य राज्य बनाने की तैयारी नक्सली जोर शोर से कर रहे हैं। उनकी मंशा है, पहले अपने प्रभाव वाले राज्यों में दण्डकाराण्य प्रदेश बनाने की। केन्द्र सरकार ने एमपी और छत्तीसगढ़ को पांँच-पाँच बटालियन दी है,नक्सलियों से लड़ने के लिए। आशंका है कि नक्सली गुरिल्ला युद्ध तेज कर सकते हैं। ओड़िसा में नक्सलियों की बैठक में तय किया गया है कि तमिलनाडु,कर्नाटक,गुजरात से लेकर केरल,नेपाल और बंगाल तक स्वतंत्र गलियारा बनाना। अपनी ताकत बढ़ाना। सामाजिक,जनजाति पृष्ठभूमि के लोगों को जोड़ना। वैसे भी नक्सली संगठनों ने अपना विस्तार उत्तर बिहार,पंजाब, हिमाचल, गुजरात प्रदेश तक कर चुके हैं। मध्यप्रदेश में बालाघाट से आगे बढ़ने की योजना है। इन दिनों दो सौ से ज्यादा नक्सली बालाघाट में हैं। कलकत्ता की बैठक में नेपाल से आन्ध्र तक रेड जोन बनाने का फैसला हो चुका है। यानी नक्सली आन्ध्र में एक बार फिर पैठ बनाना चाहते हैं।
संगठन में बौद्धिक महिलाएं
बस्तर में एक सैकड़ा स्थानीय गुरिल्ला दस्ता है। 70 सैन्य दल बेहद खतरनाक हैं। जिन्हें हर तरीके का प्रशिक्षण दिया गया है। नक्सली महिला दस्ते में पढ़ी लिखी महिलाओं की संख्या अधिक है। कू्ररता में ये पुरूषों से बीस हैं। झीरम कांड हो और ताड़मेटला कांड, इसका प्रमाण है। जहानाबाद जेल ब्रेक कांड करने में बस्तर की महिला नक्सलियों का हाथ था। गुरिल्ला सदस्यों की मुखिया सुजाता है,जो कि स्नातक है। पार्टी के पोलित ब्यूरो की सदस्य एम. कोटेश्वर राव की पत्नी है। बस्तर में करीब चार हजार महिलाएं गुरिल्ला की सदस्य हैं। पुलिस चैकियों की तरह अलग अलग इलाके में दलम सक्रिय हैं। दलम सैन्य कार्रवाई करते हैं। जबकि संघम जन अदालत लगाने और माओवादी एजेंडा को प्रचारित करने का काम करते हैं। इसके अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में जमीनी झगड़े,पारिवारिक विवाद,जातीय संघर्ष के अलावा वैवाहिक मुद्दों का भी निपटारा करने लगे हैं। इसके पीछे अपनी छवि को राबिन हुड की तरह पेश करना है। बस्तर में एक सैकड़ा के करीब इनामी नक्सली हैं। जिनमें एक से 20 लाख रूपये तक की इनामी महिला नक्सली भी हैं। पुलिस ने इनामी नक्सलियों के बड़े बड़े पोस्टर लगा रखे हैं। सूचित करने वालों को इनाम देने की घोषणा कर रखी है। बस्तर के बीजापुर में 17 स्कूल कई बरसों से बंद है। नक्सली इन स्कूलों में नक्सलवाद का पाठ पढ़ाते हैं।
तो छग नेपाल बन जाएगा
कभी किसी ने सोचा भी नहीं रहा होगा कि 40 हजार किलोमीटर में फैला अबूझमाढ़ माओवादियों का दण्डकारण्य बन जाएगा। सन् 1979 में सीतारमैया ने छह सदस्यों के एक दल को दंडकारण्य भेजा था। वो यहां 1990 तक रहे और दंडकारण्य को नक्सलियों को आधार क्षेत्र बनाया। सीतारमैया नक्सलियों के जत्थे को दंडकारण्य इसलिए भेजा था, ताकि ठीक से परख कर बताएं कि तेलंगाना में वारदात करने के बाद बस्तर का यह क्षेत्र आश्रय के लिए ठीक है कि नहीं। झारखंड का बूढ़ा पहाड़ जो छत्तीसगढ़,झारखंड ओर उत्तर प्रदेश की सीमाओं को छूता है। नक्सली तीनों राज्यों में आने जाने का जरिया इसी बूढ़ा पहाड़ को बना रखें है। अबूझमाढ़ नक्सलियों का मजबूत ठिकाना है और झारखंड के नक्सलियों के लिए बूढ़ा पहाड़ सुरक्षात्मक ठिकाना है। पुलिस चाहकर भी ना अबूझमाड़ में घुस पाती है और न ही बूढ़ा पहाड़ में हमला बोल सकती। बहरहाल आज माओवादियों ने छत्तीसगढ़ और झारखंड को अपना गृह राज्य बना लिया है। यह माना जा रहा है कि यदि कांग्रेस सरकार 2023 तक नक्सलवाद खत्म नहीं कर सकी, तो छत्तीसगढ़ को दूसरा नेपाल बनने से रोक पाना मुश्किल हो जाएगा।
 

Monday, January 4, 2021

धान के कटोरे में उबाल

   
'' किसान कृषि सुधारों से नाराज होकर राज्य में प्रदर्शन कर रहे हैं। वहीं बीजेपी को किसान महापंचायत स्थल की मिली अनुमति को रद्द किये जाने से  गुस्से में है। बीजेपी का मानना है कि किसानों को इन कानूनों में जो आपत्तियां दिख रही थी,बातचीज के बाद केन्द्र सरकार ने दूर करने की बात कही है। ऐसे में आंदोलन का कोई औचित्य नहीं है।  ''


0 रमेश कुमार ‘‘रिपु’’
छत्तीसगढ़ में केन्द्र की कृषि नीति पर अपनी अपनी स्टाइल में सियासत किये जाने से धान के कटोरे में  उबाल आ रहा है। केन्द्र के कृषि नीति में सुधारों से नाराज होकर राज्य के किसान प्रदर्शन कर रहे हैं। वहीं जिला कवर्धा में बीजेपी को किसान महापंचायत स्थल की मिली अनुमति को अचानक जिला प्रशासन ने रद्द कर देने पर पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डॉ रमन सिंह नाराज हो गए। जाहिर सी बात है कि बीजेपी प्रदेश में आगामी चुनाव को लेकर प्लान के तहत काम करना शुरू कर दिया है। बीजेपी के सूत्रों का कहना है कि पश्चिम बंगाल के चुनाव के बाद नरेन्द्र मोदी और अमित शाह छत्तीसगढ़ पर फोकस करेंगे। इसलिए कि चुनाव की फंडिग भी कांग्रेस को इसी राज्य से होती है। मध्यप्रदेश में चुनावी फंडिग की राशि को लेकर कमलनाथ,दिग्विजय सिंह सहित कई नेता फंस गए हंै। वही फंदा भूपेश सरकार पर पड़ने का अंदेशा है। डाॅ रमन सिंह को छत्तीगसढ़ की कांग्रेस सरकार को घेरने की खुली छूट दी गई है। साथ ही उनके नेतृत्व में एक कमेटी बनाई गई है। जिसमें राज्य सभा सदस्य सरोज पांडे, प्रदेश अध्यक्ष विष्णुदेव साय, नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक के अलावा राज्य के अन्य नेताओं को शामिल किया गया है। प्रदेश प्रभारी पुरेन्दश्वरी अगले साल तक क्या रणनीति बनायेंगी, अभी कुछ तय नहीं है। जिस तरह अजीत जोगी से सत्ता छीना गया था, वही रणनीति भूपेश सरकार के खिलाफ बनाने की योजना है। बहरहाल धान खरीदी के बहाने राज्य में ठनाठनी है।  
 लेकिन बीजेपी में गुटबाजी भी कम नहीं है। अभी तक दुर्ग शहर और ग्रामीण में अध्यक्ष की नियुक्ति नहीं हो पाई है।
किसान राजनीति गरमाई
प्रदेश के किसानों को बीजेपी किसान महापंचायत के जरिये समझाने में लगी है कि केन्द्र की कृषि नीति हित में है,वहीं कांग्रेस सहित अन्य राजनीतिक दल बिल के विरोध में प्रदर्शन कर रहे हैं। पूर्व मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह ने युगवार्ता से किसान आंदोलन को राजनीतिक साजिश बताया। किसानों को भ्रम में डालकर कुछ लोग आंदोलन चला रहे हैं। किसानों को इन कानूनों में जो आपत्तियां दिख रही थीं,बातचीत के बाद केंद्र सरकार ने दूर करने की बात कही है। ऐसे में आंदोलन का कोई औचित्य नहीं है। वहीं नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक ने कहा जिस कृषि बिल को लेकर यहांँ के किसानों को डराया जा रहा है,वह अभी छत्तीसगढ़ में लागू नहीं है। सवाल यह है कि पूरे छत्तीसगढ़ में किसान आत्महत्या क्यों कर रहे हैं?’’जाहिर सी बात है कि किसान आंदोलन के जरिये प्रदेश में राजनीतिक दलों के बीच सियासी तकरार के साथ एक दूसरे को घेरने की राजनीति हो रही है। किसान आंदोलन किस बिन्दु पर जाकर खत्म होगा,कोई तय नहीं है।  
किसान अर्बन इलाके के नहीं
पाठ्य पुस्तक निगम के अध्यक्ष शैलेश नितिन त्रिवेदी ने बृजमोहन अग्रवाल के बयान पर नाराजगी जाहिर करते हुए कहा, किसानों को अर्बन नक्सली कहने वाले खेती की इतनी समझ भी नहीं रखते हैं कि किसान अर्बन इलाकों में नहीं, गांवों में रहते हैं। राजीव गांधी न्याय योजना के तहत भूपेश सरकार धान खरीदी पर प्रति क्विंटल 2500 रुपए का भुगतान करती है। यह केंद्र की ओर से तय धान के समर्थन मूल्य 1868 और 1888 रुपए प्रति क्विंटल से ज्यादा है। किसान भाजपा के किसान विरोधी चाल चरित्र और चेहरा को पहचानते हैं। भाजपा की सरकार ने भी 7 साल में किसानों से किए वादे को पूरा नहीं किया बल्कि, किसान विरोधी तीन काले कानून लाकर किसानों को गुलामी की ओर ढकेलने की साजिश की है। आंदोलनकारी किसानों के समर्थन में छत्तीसगढ़ के किसानों का रायपुर के बूढ़ातालाब स्थित धरना स्थल पर क्रमिक अनशन जारी है। बहरहाल केन्द्र सरकार को चुनौती देने के लिए किसानों के साथ पूरा विपक्ष आकर लामबंद है। धान के कटोरे में असंतोष खदबदा रहा है।
किसानों की परेशानी  
एक तरफ कांग्रेस किसान नीति का विरोध कर रही है। वहीं भूपेश सरकार किसानों की समस्याओं पर ध्यान नहीं दे रही है। डायल 112 में केवल 36 घंटे में 408 शिकायत दर्ज हुई। सीएम भूपेश बघेल ने डायल112 पर किसानों की आने वाली शिकायतों को 24 घंटे में निदान करने के निर्देश दिए हैं। गिरदावरी या रकबे में कमी से लेकर किसी भी तरह की शिकायत का हल न्यूनतम समय पर वरिष्ठ अधिकारी निकालें और मॉनिटरिंग करने कहा गया है,ताकि किसी तरह की लापरवाही न हो सके। लेकिन निवारण की गति बहुत धीमी है।
रकबा ही कर दिया कम
अभनपुर सिवनी के किसान रितु कुमार ने शिकायत दर्ज करायी कि उन्होंने 25 हेक्टेयर में खेती की है,लेकिन मंडी में सिर्फ 19 हेक्टेयर खेती के हिसाब से धान की खरीदी की जा रही है। उनका रकबा कम कर देने से अपना बकाया धान कैस और कहां बेचें समस्या खड़ी हो गई है।  
खाते में नहीं बेच पा रहे धान
संकरी के किसान महेश कुमार ने अपनी शिकायत में कहा है कि मै अपने खाते में धान नहीं बेच पा रहा हॅू। मंडी में मौजूद अफसरों और स्टाफ ने मेरा धान खरीदने से ही मना कर दिया है। मेरा पूरा धान मंडी में ही रखा हुआ है।
जमीन नहीं की गई ऑनलाइन
धरसींवा के सोंदरा मंडी से एक किसान ने शिकायत दर्ज करायी है कि उनकी पथरीडीह में डेढ़ एकड़ जमीन है। लेकिन रिकार्ड में ही दर्ज नहीं किया गया है। इस वजह से उनकी जमीन का रिकार्ड ऑनलाइन नहीं दिखा रहा। इस वजह से उनके धान की खरीदी नहीं की जा रही है।
हर शिकायत का निदान करने के निर्देश
सीएम भूपेश बघेल ने डायल.112 पर जो भी शिकायतें आ रही हैं उसका 24 घंटे में निदान करने के निर्देश दिए हैं। इसके लिए ऐसी व्यवस्था बनाई गई हैए जिससे संबंधित व्यक्ति तक शिकायत पहुुुंचे और तत्काल उस दिक्कत को दूर किया जा सके। किसान 112 पर अपनी शिकायत बताएंगेए उनका कॉल स्टेट कंट्रोल रूम में भी कनेक्ट होगा। इस तरह गिरदावरी या रकबे में कमी से लेकर अन्य तरह की कोई भी शिकायत हो तो उसका न्यूनतम समय पर हल निकाला जा सकेगा। वरिष्ठ अधिकारियों को इसकी मॉनिटरिंग करने कहा गया हैए जिससे किसी तरह की लापरवाही न हो सके।
 









Friday, December 18, 2020

अपनी मर्जी का वजीरे आला

     







मुख्यमंत्री बतौर भूपेश बघेल ने अपने दो साल के कार्यकाल में नवा छत्तीसगढ़ गढ़ने ढेर सारी योजनाओं की घोंषणा की। अपनी मर्जी की राजनीति भी खूब की ।इन दिनों टी.एस सिंह देव और और मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के बीच बढ़ती खटास की की खबर सूर्खियांें में है। अचानक भूपेश बघेल ने इस्तीफा दे दूंगा कहकर उन बातों को हवा दे दियां कि पार्टी उन्हें अर्द्धविराम करने की तैयारी में है। चर्चा है कि पश्चिम बंगाल के चुनाव के बाद प्रदेश को नया मुख्यमंत्री मिल सकता है।  
0 रमेश कुमार ‘‘रिपु’’
                बतौर तीसरे मुख्यमंत्री 17 दिसम्बर 2018 को भूपेश बघेल ने जब कुर्सी संभाली, तो लोगों की जुबान पर एक सवाल तब भी था और आज भी है। टी.एस सिंहदेव ने मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ दी या फिर दोनों के बीच कोई सियासी समझौता हुआ है? सवाल को तवज्जो नहीं मिली। समय के साथ भूपेश बघेल प्रदेश कांग्रेस में और पार्टी हाईकमान मे अपनी पकड़ बनाते चले गये। वक्त के साथ भूपेश को यह एहसास होने लगा कि उनके राजनीतिक रास्ते में आगे चलकर टी.एस सिंहदेव कंटक बन सकते हैं,तो उनके मीडिया सलाहकारों ने सत्ता के दो धु्रव बना दिये। एक टी.एस सिंह देव और दूसरा भूपेश बघेल।
बेचैन करने वाली बात
कभी भूपेश बघेल और टी.एस सिंह देव प्रदेश में जय और वीरू की जोड़ी के नाम से प्रसिद्ध थे,लेकिन उसमें गांठ पर गांठ पड़ती गई। टी.एस सिंह देव से मुख्यमंत्री भूपेश बघेल धीरे धीरे दूरियांँ बनाने लगे और उनके अधिकारों में कटोती करने लगे। उन्हें सरकारी प्रवक्ता से हटा दिया। उनकी छवि धूमिल करने उनको सूचित किये बगैर स्वास्थ्य विभाग की भूपेश बघेल ने बैठक की। उनकी हर फाइलों पर नजर रखी जाने लगी। अब वे दूसरे नम्बर के मंत्री की हैसियत से बाहर हैं। उनकी जगह कृषि मंत्री रविन्द्र चैबे और वन मंत्री मोहम्मद अकबर ने ले ली। कांग्रेस के सीनियर लीडर की छवि को धूमिल करने की सारी कोशिशों के बीच टी एस सिंह देव मौन की राजनीति का रास्ता चुना। अपना ध्यान अपने विभाग पर फोकस किया। प्रदेश में ही हीं देश में नम्बर एक पर पंचायत और सांख्यिकी विभाग रहा। मनरेगा,पी.एम सड़क योजना,जीएसटी वसूली में छत्तीसगढ़ सबसे आगे रहा। कोरोना काल में हर जिले में सस्ती जांच की व्यवस्था की।
शिलान्यास की राजनीति
भूपेश बघेल प्रदेश में अपनी छवि को निखारने दूसरे साल ताबड़तोड़ लाखों करोड़ों रूपये की योजनाओं का, शिलान्यास की राजनीति को अहमियत दी। वहीं आयकर विभाग का छापा उनके निज सचिव के यहाँ पड़ने पर बड़ी भद्ध भी हुई। इस बीच टी एस सिंह देव और मुख्यमंत्री बघेल के बीच बढ़ती दूरियों से कांग्रेस की प्याली में टकराहट का ज्वार भी देखा गया। किसानो के खाते में साल के अंत तक राशि नहीं आने पर एक चैनल को इस्तीफा देने की बात कहकर सीधे सीधे उन्होंने सरकार को घेरा। कांग्रेस के घोषणा पत्र को पूरा नहीं किये जाने को लेकर भी स्वास्थ्य एवं पंचायत मंत्री टीएस सिंह देव ने सरकार पर ऊगली उठाने लगे तो मुख्यमंत्री ने उनके पर कतरना शुरू किया। जाहिर सी बात है कि दो साल तक मुख्यमंत्री ने अपनी छवि राष्ट्रीय नेता बनाने में लगाई,वहीं दूसरी ओर कांग्रेस को अपने हाथ में लेने के सारे जतन भी किये। प्रदेश प्रभारी पी एल पुनिया कहते हैं,‘‘ भूपेश सरकार का दो साल का कार्यकाल लाजवाब रहा। प्रदेश की जनता की आकांक्षाओं के अनुकूल,सरकार खरी उतरी।’’
बेचैन करने वाली बात
राजनीतिक हल्कों में यह चर्चा है कि भूपेश बघेल को प्रदेश कांग्रेस में अर्द्धविराम करने की तैयारी हाई कमान ने कर ली है। टी.एस सिंह देव और भूपेश के बीच ढाई-ढाई साल मुख्यमंत्री बने रहने का सियासी समझौता हुआ है। जाहिर सी बात है यदि छत्तीसगढ़ में यह फार्मूला लागू हुआ, तो राजस्थान में भी यही होगा। संसदीय सचिव विकास उपाध्याय कहते हैं,भूपेश बघेल कांग्रेस और प्रदेश में अपनी राजनीतिक बेल की जड़ें इतनी गहरी कर लिये हैं कि उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटाने के लिए हाई कमान के पास कोई वजह नहीं है।’’वहीं स्वास्थ्य पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री टीएस सिंहदेव ने कहा मुख्यमंत्री का कार्यकाल आलाकमान की इच्छा पर निर्भर करता है। मुख्यमंत्री दो दिन के भी हुए हैं और 15 साल के भी। यह सब आलाकमान तय करता है। पिछले दिनों कांग्रेस की महासचिव प्रियंका गांधी के साथ भूपेश की विशेष मुलाकात,चर्चा में थी। यह कयास लगाया गया कि उन्हें केन्द्र की राजनीति के लिए राष्ट्रीय महासचिव बनाया जा रहा है। गौरतलब है कि भूपेश बघेल केन्द्र सरकार पर लगातार हमला करते आए हैं। इससे वो सुर्खियों में हैं। केन्द्र की लगभग हर योजना पर मीन मेख निकाली। कृषि नीति को भी अपने राज्य में लागू नहीं करने, अलग से कानून बनाने कैबिनेट की बैठक की।
केन्द्र कर रहा है भेदभाव
मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने अपनी सरकार के दो वर्षों के कार्यकाल पर कहा कि देश का जीडीपी सिकुड़ गया है, जो कि बेहद चिंतनीय है। लेकिन छत्तीसगढ़ में मंदी का असर नहीं है। छत्तीसगढ़ एक मॉडल है। हम कोशिश कर रहे हैं कि छत्तीसगढ़ के जो उत्पाद हैं, उनके विक्रय की व्यवस्था की जा सके। बीजापुर, बिलासपुर, सूरजपुर जैसे तमाम क्षेत्रों में विकास कार्य हुए हैं। केंद्र सरकार हमें पैसे नहीं दे रही है। जीएसटी का 4000 करोड़ से अधिक की राशि हमें मिलनी थी। केंद्र सरकार भेदभाव कर रही है। सभी के हाथ में रोजगार हो यह कोशिश राज्य सरकार की है। मनरेगा में बेहतर कार्य हुआ है। वाटर रिचार्जिंग जैसे क्षेत्र में बेहतर कार्य किए जा रहे हैं। इस बार 2305 खरीदी केन्द्र बनाए गए हैं। इस बार सरकार ने 90 लाख मीट्रिक टन खरीदी का लक्ष्य रखा है। किसानों को पांच बार टोकन दिए जाएंगे। प्रदेश में 2017-18 में 56.85 लाख टन धान की खरीदी हुई थी। अब यह आंकड़ा 83.94 लाख टन तक पहुंच गया है। इस बार धान का रकबा 27 लाख 59 हजार 385 हेक्टेयर से अधिक है। किसानों की संख्या 12 लाख 6 हजार से बढ़कर 18 लाख 38 हजार हो गई है।
मोहन मरकाम हुए खफा
प्रदेश कांग्रेस की राजनीति में भले भूपेश बघेल अपनी पकड़ा बनाए हुए हैं लेकिन, मुख्यमंत्री बदले जाने की चर्चा के चलते प्रदेश अध्यक्ष मोहन मरकाम भी अपने सुर बदल दिये हैं। निगम मंडल की नियुक्ति में उनके अपने समर्थकों का नाम नही होने से मरकाम बैठक से नाराज होकर चले गए। यह माना जा रहा था कि मोहन मरकाम भूपेश के रबड़ स्टाम्प हैं। कांग्रेस में 30 आदिवासी विधायक हैं,जो कि मरकाम के साथ हैं। भूपेश बघेल ने परिस्थिति को देखकर कहा कि संगठन और पार्टी की रायशुमारी के बाद निगम मंडल में नियुक्ति की जाएगी।
सत्ता विभाजन फार्मूला साफ करें
चर्चा है कि हाईकमान के सामने हुए मौखिक समझौते के तहत पहले ढाई साल भूपेश बघेल मुख्यमंत्री रहेंगे,इसके बाद के ढाई साल टी.एस सिंहदेव। इन चर्चाओं पर नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक ने कहा, ‘‘कांग्रेस हाईकमान सत्ता विभाजन के इस फार्मूले को स्पष्ट करे। और बताए प्रदेश का अगला मुख्यमंत्री कौन रहेगा।’’
किसान अन्याय योजना
प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष विष्णुदेव साय ने राजीव गांधी किसान न्याय योजना को अन्याय योजना बताते हुए कहा, किसानों को आधे अधूरे भुगतान पर चिंता जताते हुए प्रेदश के वरिष्ठ मंत्री टीएस सिंह देव को उनकी चुनौती याद दिलायी है। स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंह देव ने कहा था किसानों को अंतर की राशि नहीं मिलेगी तो वे इस्तीफा दे देंगे। एक माह विलंब से धान खरीदी हो रही है। किसानों को गत वर्ष का बकाया अब तक नहीं मिला। मुख्यमंत्री बताएं क्या नयी खरीदी से पूर्व किसानों का पुराना भुगतान हो जाएगा। केंद्र सरकार ने नए कृषि कानूनों में किसानों को 72 घंटों के भीतर उनकी खरीदी गई उपज के एकमुश्त भुगतान का प्रावधान कर दिया है और ऐसा न होने पर यह आपराधिक कृत्य माना जाएगा।  
सफल रहे
भूपेश बघेल तेदूपत्ता का बोनस ढाई हजार से बढ़ाकर चार हजार रूपये किये।
 धान के समर्थन मूल्य की राशि ढाई हजार रूपये की। गोधन न्याय योजना के तहत दो रूपये किलो गोबर खरीद रही है सरकार।
नरूवा,गरूवा, घुरूवा और बाड़ी योजना से ग्राम सुराज का अलख जगाया। बिजली बिल में आधी छूट। मोर जमीन,मोर मकान, मुख्यमंत्री मितान योजना,पौनी पसारी योजना,हमर गांव,हमर योजना के तहत ग्राम पंचायत,जनपद पंचायत,जिला पंचायत को अच्छा काम करने पर पुरस्कृत करना।
 धरसा विकास योजना,पढ़ाई तंहर दुआर,पढ़ाई तुहर मोहल्ला,पचास रूपये में कोविड की जांच की सुविधा मुहैया की।
भूपेश चूके
किसानों को गत वर्ष का बकाया अब तक नहीं मिला।
सरकार बनते ही पूर्ण शराबबंदी का वायदा।
बेरोजगारों को चार हजार रूपये मासिक बेरोजगारी भत्ता नहीं दिया। अपराध पर नियंत्रण नहीं।
नक्सलवाद के खात्मे के लिए अब तक नीति नहीं बनी। कांग्रेस के घोषणा पत्र के वायदे अधूरे हैं।
धान कीएमएसपी ढाई हजार रूपये चार किश्तों में देकर सरकार बिचैलियों को लाभ पहुंचाना चाहती है। प्रदेश को कर्जदार बना दिया।
 
 

धान खरीदी पर टकराव

     










भूपेश सरकार ने केन्द्र सरकार से धान खरीदी का कोटा 24 लाख मीट्रिक टन से बढ़ाकर 32 लाख मीट्रिक टन करने पत्र लिखा। लेकिन केन्द्र सरकार ने खरीदी पर ही रोक लगा दी। इस बार 90 लाख मीट्रिक टन धान खरीदी का लक्ष्य है। राज्य में लगभग 38 लाख मीट्रिक टन धान की खपत है। इससे ऊपर खरीदी जाने वाली लगभग 49 लाख मीट्रिक टन धान का सरकार क्या करेगी। इसे लेकर चिंता बढ़ गई है।


 0 रमेश कुमार ‘‘रिपु’’
             धान का कटोरा कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ में धान खरीदी पर टकराव की आंधी के चलते प्रदेश की राजनीति के केन्द्र में किसान आ गए हैं। भूपेश सरकार की मंशा है सीधे केन्द्र सरकार को कटघरे में खड़ा करना। वह प्रदेश के किसानों का ध्यान अपनी ओर खींचने और उनकी नजरो में शुभ ंिचतक बनने के लिए यह बताने में लगे हैं कि उनकी सरकार ढाई हजार रूपये प्रति क्विंटल धान समर्थन मूल्य पर खरीदना चाहती है,लेकिन केन्द्र सरकार खरीदने से मना कर रही है। प्रदेश में करीब 80 प्रतिशत आबादी कृषि से जुड़ी है। और 43 प्रतिशत कृषि भूमि में धान की फसल  होती है। धान का रकबा 27 लाख 59 हजार 385 हेक्टेयर है। सन् 2018-19 80 लाख 40 हजार टन धान का उत्पादन हुआ था। 16 लाख पंजीकृत किसानों ने सोसायटी के माध्यम से अपना धान बेचा था। इस बार 19 लाख किसानों ने पंजीयन कराया है। 
भूपेश बघेल ने 2500 रुपये क्विंटल धान खरीदी को लेकर केन्द्र सरकार को तीन दफा पत्र लिखा।     केंद्रीय मंत्री से मिलकर राशि की मांग की किन्तु केंद्र ने कोई सकारात्मक जवाब नहीं दिया। इसके बावजूद छत्तीसगढ़ की भूपेश बघेल सरकार ने 2500 रुपये क्विंटल धान खरीदा। इस बार भी छत्तीसगढ़ की सरकार 2305 धान खरीदी केन्द्रों के माध्यम से 90 लाख मीट्रिक टन धान खरीदने जा रही है। केंद्र और राज्य के बीच किसानों के समर्थन मूल्य को लेकर अक्सर राजनीति होती रही है।
इंदिरा गांधी कृषि महाविद्यालय की एम.सी की छात्रा पल्लवी तिवारी कहती हैं,‘‘प्रदेश़ के किसानों को अपनी आर्थिक दशा सुधारनी है तो उन्हें अन्य लाभकारी फसलों की तरफ भी जाना होगा। मध्यप्रदेश की तरह सोयाबीन, सूरजमुखी, कपास आदि फसलें लेनी चाहिए। लेकिन सरकार फसल चक्र परिवर्तन करने का रिस्क नहीं लेना चाहती। सरकार किसानों को खुश रखने के लिए कर्ज लेकर बोनस देती है। यानी समर्थन मूल्य से अधिक पर धान खरीद सकती है किंतु उन्हें अन्य लाभकारी फसलों की खेती के लिए प्रोत्साहित नहीं करती।’’  
सी.एम.ने लिखा पत्र
सीएम भूपेश बघेल ने कहा,‘‘केंद्रीय खाद्य मंत्री पीयूष गोयल को पत्र लिखकर सेंट्रल पूल में एफसीआई के लिए 26 लाख टन उसना और 14 लाख टन अरवा चावल लेने की मांग की है। साथ ही 2020-21 में समर्थन मूल्य की खरीदे जा रहे धान की समय पर मिलिंग कराने कहा है। सीएम बघेल ने लिखा है कि एफसीआई द्वारा 2016-17 और उससे पहले उसना के अलावा अरवा चावल भी लिया जाता था। इसलिए एफसीआई द्वारा छत्तीसगढ़ की जरूरत से ज्यादा चावल उसना के साथ अरवा के रूप में भी लेना चाहिए।
कृषि मंत्री रविन्द्र चैबे ने कहा, डीसीपी योजना अंतर्गत लिए जाने वाले सभी धान का समय पर निराकरण किया जा सके। धान के रखरखाव में कोई क्षति न हो। राज्य में स्थापित 400 उसना राइस मिलों की मिलिंग क्षमता 5.68 लाख टन प्रतिमाह और 1504 अरवा मिलों की अरवा मिलिंग क्षमता 18.83 लाख टन प्रतिमाह है। इसे ध्यान में रखते हुए खरीफ वर्ष 2020-21 में एफसीआई में 26 लाख टन उसना चावल व 14 लाख टन अरवा चावल उपार्जन की अनुमति दी जाए।
गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ में खरीफ विपणन वर्ष 2020- 21 में समर्थन मूल्य पर लिए जाने वाले धान की कस्टम मिलिंग के बाद 60 लाख टन चावल लेने की कार्ययोजना का अनुमोदन केन्द्र सरकार ने किया है। इसमें एफसीआई में सेंट्रल पूल के अंतर्गत अनुमानित सरप्लस 40 लाख टन चावल उपार्जित किया जाएगा और शेष 20 लाख टन चावल राज्य में पीडीएस की आवश्यकता हेतु छत्तीसगढ़ स्टेट सिविल सप्लाइज कॉर्पोरेशन लिमिटेड में उपार्जित किया जाएगा।   
केंद्र सरकार ने कहा
वहीं धान खरीदी शुरू होने से पहले ही केन्द्र ने चिट्ठी लिखकर कहा है कि यदि राज्य सरकार इसी तरह किसानों को बोनस देगी तो वो धान नहीं खरीदेगी। इस पत्र ने सरकार की चिंता बढ़ा दी है क्योंकि राज्य में लगभग 38 लाख मीट्रिक टन धान की खपत होती है। इससे ऊपर खरीदी जाने वाली लगभग 49 लाख मीट्रिक टन धान का सरकार क्या करेगी। इसे लेकर चिंता बढ़ गई है। इससे अरवा और उसना मिलाककर लगभग 34 लाख मीट्रिक टन चावल बनेगा। अब अगर केन्द्र सरकार इसे नहीं लेगी तो फिर इस चावल का वह क्या करेगी। ये एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है।
राजनीति जोरों पर
धान खरीदी मामले पर कांग्रेस प्रवक्ता सुशील आनंद शुक्ला कहते हैं, केन्द्र सरकार धमका रही है, पत्र भेजकर कह रही है कि अगर बोनस दिया तो चावल नहीं खरीदेंगे। यह रवैया किसान विरोधी है। हमारी सरकार 2500 रुपए क्विंटल ही धान खरीदगी। वहीं बीजेपी सांसद सुनील सोनी का कहना है कि क्या कांग्रेस सरकार ने केंद्र से पूछकर अपना घोषणा पत्र तैयार किया था। केंद्र सरकार के पास केवल छत्तीसगढ़ नहीं बल्कि, और भी राज्यों की जिम्मेदारी है। नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक कहते हैं, सरकार को अपने घोषणा पत्र के मुताबिक धान खरीदने का इंतजाम करना चाहिए। बोनस देने का वायदा किया था, जिसे लागू करंे। अपनी जिम्मेदारी से बचने के लिए कांग्रेस सरकार केंद्र पर भेदभाव करने के आरोप लगा रही है।
धान बेचने वाले किसान बढ़े
साल 2018-19 में 15.71 लाख किसानों से 80.38 लाख मीट्रिक टन और साल 2019-20 में 18.38 लाख किसानों से 83.94 लाख मीट्रिक टन धान की बिक्री की थी। राज्य में दो सालों में पंजीकृत किसानों की तुलना में धान बेचने वाले किसानों में बढ़ोतरी हुई है। साल 2017-18 में 76.47 फीसदी किसानों ने धान बेचा था। वहीं 2018-19 में यह आंकड़ा 92.61 प्रतिशत और 2019-20 में 94.02 प्रतिशत पर पहुंचा था। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद वर्ष 2000 में पहली बार सरकार ने समर्थन मूल्य पर लगभग 4.63 लाख मीट्रिक धान खरीदा था। जबकि साल 2014 आते तक यह आंकड़ा लगभग 80 लाख मीट्रिक टन हो गया था। 2013 में हुए चुनाव में भाजपा ने अपने घोषणा.पत्र में 21 सौ रुपए प्रति क्विंटल की दर से धान खरीदी का वादा किया था।
आत्महत्या कर लिया किसान
कोंडागांव जिले के बड़ेराजपुर तहसील के मारंगपुरी निवासी किसान धनीराम ने फांसी लगा ली। उसके पास 6.70 एकड़ जमीन थी। इस हिसाब से 100 क्विंटल धान बेचने की तैयारी में था। पर सरकारी रिकॉर्ड में जमीन का रकबा घट जाने से केवल 11 क्विंटल धान बेचने का ही टोकन कटा। उस पर कोऑपरेटिव बैंक का 61932 रुपए कर्ज भी था। ग्रामीण किसान की आत्महत्या के पीछे मात्र 11 क्विंटल धान बेचने के टोकन को मुख्य कारण बता रहे हैं। धनीराम ने 2.713 हेक्टेयर भूमि पर धान बोया था लेकिन त्रुटिवश 0.320 हेक्टेयर में धान की प्रविष्ठि हो गई थी। इसके लिए पटवारी को निलंबित कर दिया गया है और तहसीलदार को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है।     
कांग्रेस दिल्ली में करेगी आंदोलन
केन्द्र ने दो टूक कह दिया है कि यदि भूपेश सरकार किसानों को बोनस देगी तो चावल नहीं खरीदेंगे। केन्द्र के इस निर्णय के बाद राज्य सरकार के सामने धान खरीदी को लेकर संकट पैदा हो गया। इस फैसले से नाराज कांग्रेस नेताओं ने केंद्र के खिलाफ दिल्ली में आंदोलन की रणनीति तैयार कर ली है। केन्द्र व राज्य संबंधों में किसान हित को लेकर टकराहट का सिलसिला पुराना है। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद केन्द्र में एनडीए की सरकार थी, तब अजीत जोगी ने पूरे मंत्रिमंडल के सहयोगियों के साथ 7 रेसकोर्स रोड पर धरना,प्रदर्शन किया था। इस बार भी छत्तीसगढ़ की सरकार 2305 धान खरीदी केन्द्रों के माध्यम से 90 लाख मीट्रिक टन धान खरीदने जा रही है। वहीं केन्द्र सरकार मात्र 8 प्रतिशत फसल ही समर्थन मूल्य पर खरीदती है।
धान का कटोरा कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ में चावल की 23 हजार से ज्यादा किस्में हैं। प्रदेश के कृषि विवि में इन किस्मों का जर्मप्लाज्म सुरक्षित रखा है। छत्तीसगढ़ में लगभग दर्जनभर ऐसी किस्में हैं जिनकी फसल ली जा रही है। इनमें मुख्य रूप से आईआर.54, आईआर.36, इंदिरा सोना, पूर्णिमा, समलेश्वरी, दंतेश्वरी नरेंद्र धान.97, एमटीयू.1010 शताब्दी और सहभागी धान प्रमुख हैं। इनमें लगभग सभी मोटे धान की श्रेणी में आते हैं।
पहले दिन यानी एक दिसम्बर को 30 हजार 446 किसानों ने धान बेचा। किसानों से 98 हजार 968 मीट्रिक धान खरीदी की गई है। बहरहाल चालू विपणन वर्ष में किसानों की संख्या और धान के रकबे में बढ़ोत्तरी को देखते हुए इस साल समर्थन मूल्य पर बीते वर्ष की तुलना में अधिक खरीदी का अनुमान है। वहीं अन्य राज्यों से दलाल प्रदेश में धान मंगा कर खपाने की जुगत में लगे हैं। मध्यप्रदेश और झारखंड से की कई गाड़ियां धान से लदी पकड़ी गई हैं।