भूपेश सरकार ने केन्द्र सरकार से धान खरीदी का कोटा 24 लाख मीट्रिक टन से बढ़ाकर 32 लाख मीट्रिक टन करने पत्र लिखा। लेकिन केन्द्र सरकार ने खरीदी पर ही रोक लगा दी। इस बार 90 लाख मीट्रिक टन धान खरीदी का लक्ष्य है। राज्य में लगभग 38 लाख मीट्रिक टन धान की खपत है। इससे ऊपर खरीदी जाने वाली लगभग 49 लाख मीट्रिक टन धान का सरकार क्या करेगी। इसे लेकर चिंता बढ़ गई है।
0 रमेश कुमार ‘‘रिपु’’
धान का कटोरा कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ में धान खरीदी पर टकराव की आंधी के चलते प्रदेश की राजनीति के केन्द्र में किसान आ गए हैं। भूपेश सरकार की मंशा है सीधे केन्द्र सरकार को कटघरे में खड़ा करना। वह प्रदेश के किसानों का ध्यान अपनी ओर खींचने और उनकी नजरो में शुभ ंिचतक बनने के लिए यह बताने में लगे हैं कि उनकी सरकार ढाई हजार रूपये प्रति क्विंटल धान समर्थन मूल्य पर खरीदना चाहती है,लेकिन केन्द्र सरकार खरीदने से मना कर रही है। प्रदेश में करीब 80 प्रतिशत आबादी कृषि से जुड़ी है। और 43 प्रतिशत कृषि भूमि में धान की फसल होती है। धान का रकबा 27 लाख 59 हजार 385 हेक्टेयर है। सन् 2018-19 80 लाख 40 हजार टन धान का उत्पादन हुआ था। 16 लाख पंजीकृत किसानों ने सोसायटी के माध्यम से अपना धान बेचा था। इस बार 19 लाख किसानों ने पंजीयन कराया है।
भूपेश बघेल ने 2500 रुपये क्विंटल धान खरीदी को लेकर केन्द्र सरकार को तीन दफा पत्र लिखा। केंद्रीय मंत्री से मिलकर राशि की मांग की किन्तु केंद्र ने कोई सकारात्मक जवाब नहीं दिया। इसके बावजूद छत्तीसगढ़ की भूपेश बघेल सरकार ने 2500 रुपये क्विंटल धान खरीदा। इस बार भी छत्तीसगढ़ की सरकार 2305 धान खरीदी केन्द्रों के माध्यम से 90 लाख मीट्रिक टन धान खरीदने जा रही है। केंद्र और राज्य के बीच किसानों के समर्थन मूल्य को लेकर अक्सर राजनीति होती रही है।
इंदिरा गांधी कृषि महाविद्यालय की एम.सी की छात्रा पल्लवी तिवारी कहती हैं,‘‘प्रदेश़ के किसानों को अपनी आर्थिक दशा सुधारनी है तो उन्हें अन्य लाभकारी फसलों की तरफ भी जाना होगा। मध्यप्रदेश की तरह सोयाबीन, सूरजमुखी, कपास आदि फसलें लेनी चाहिए। लेकिन सरकार फसल चक्र परिवर्तन करने का रिस्क नहीं लेना चाहती। सरकार किसानों को खुश रखने के लिए कर्ज लेकर बोनस देती है। यानी समर्थन मूल्य से अधिक पर धान खरीद सकती है किंतु उन्हें अन्य लाभकारी फसलों की खेती के लिए प्रोत्साहित नहीं करती।’’
सी.एम.ने लिखा पत्र
सीएम भूपेश बघेल ने कहा,‘‘केंद्रीय खाद्य मंत्री पीयूष गोयल को पत्र लिखकर सेंट्रल पूल में एफसीआई के लिए 26 लाख टन उसना और 14 लाख टन अरवा चावल लेने की मांग की है। साथ ही 2020-21 में समर्थन मूल्य की खरीदे जा रहे धान की समय पर मिलिंग कराने कहा है। सीएम बघेल ने लिखा है कि एफसीआई द्वारा 2016-17 और उससे पहले उसना के अलावा अरवा चावल भी लिया जाता था। इसलिए एफसीआई द्वारा छत्तीसगढ़ की जरूरत से ज्यादा चावल उसना के साथ अरवा के रूप में भी लेना चाहिए।
कृषि मंत्री रविन्द्र चैबे ने कहा, डीसीपी योजना अंतर्गत लिए जाने वाले सभी धान का समय पर निराकरण किया जा सके। धान के रखरखाव में कोई क्षति न हो। राज्य में स्थापित 400 उसना राइस मिलों की मिलिंग क्षमता 5.68 लाख टन प्रतिमाह और 1504 अरवा मिलों की अरवा मिलिंग क्षमता 18.83 लाख टन प्रतिमाह है। इसे ध्यान में रखते हुए खरीफ वर्ष 2020-21 में एफसीआई में 26 लाख टन उसना चावल व 14 लाख टन अरवा चावल उपार्जन की अनुमति दी जाए।
गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ में खरीफ विपणन वर्ष 2020- 21 में समर्थन मूल्य पर लिए जाने वाले धान की कस्टम मिलिंग के बाद 60 लाख टन चावल लेने की कार्ययोजना का अनुमोदन केन्द्र सरकार ने किया है। इसमें एफसीआई में सेंट्रल पूल के अंतर्गत अनुमानित सरप्लस 40 लाख टन चावल उपार्जित किया जाएगा और शेष 20 लाख टन चावल राज्य में पीडीएस की आवश्यकता हेतु छत्तीसगढ़ स्टेट सिविल सप्लाइज कॉर्पोरेशन लिमिटेड में उपार्जित किया जाएगा।
केंद्र सरकार ने कहा
वहीं धान खरीदी शुरू होने से पहले ही केन्द्र ने चिट्ठी लिखकर कहा है कि यदि राज्य सरकार इसी तरह किसानों को बोनस देगी तो वो धान नहीं खरीदेगी। इस पत्र ने सरकार की चिंता बढ़ा दी है क्योंकि राज्य में लगभग 38 लाख मीट्रिक टन धान की खपत होती है। इससे ऊपर खरीदी जाने वाली लगभग 49 लाख मीट्रिक टन धान का सरकार क्या करेगी। इसे लेकर चिंता बढ़ गई है। इससे अरवा और उसना मिलाककर लगभग 34 लाख मीट्रिक टन चावल बनेगा। अब अगर केन्द्र सरकार इसे नहीं लेगी तो फिर इस चावल का वह क्या करेगी। ये एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है।
राजनीति जोरों पर
धान खरीदी मामले पर कांग्रेस प्रवक्ता सुशील आनंद शुक्ला कहते हैं, केन्द्र सरकार धमका रही है, पत्र भेजकर कह रही है कि अगर बोनस दिया तो चावल नहीं खरीदेंगे। यह रवैया किसान विरोधी है। हमारी सरकार 2500 रुपए क्विंटल ही धान खरीदगी। वहीं बीजेपी सांसद सुनील सोनी का कहना है कि क्या कांग्रेस सरकार ने केंद्र से पूछकर अपना घोषणा पत्र तैयार किया था। केंद्र सरकार के पास केवल छत्तीसगढ़ नहीं बल्कि, और भी राज्यों की जिम्मेदारी है। नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक कहते हैं, सरकार को अपने घोषणा पत्र के मुताबिक धान खरीदने का इंतजाम करना चाहिए। बोनस देने का वायदा किया था, जिसे लागू करंे। अपनी जिम्मेदारी से बचने के लिए कांग्रेस सरकार केंद्र पर भेदभाव करने के आरोप लगा रही है।
धान बेचने वाले किसान बढ़े
साल 2018-19 में 15.71 लाख किसानों से 80.38 लाख मीट्रिक टन और साल 2019-20 में 18.38 लाख किसानों से 83.94 लाख मीट्रिक टन धान की बिक्री की थी। राज्य में दो सालों में पंजीकृत किसानों की तुलना में धान बेचने वाले किसानों में बढ़ोतरी हुई है। साल 2017-18 में 76.47 फीसदी किसानों ने धान बेचा था। वहीं 2018-19 में यह आंकड़ा 92.61 प्रतिशत और 2019-20 में 94.02 प्रतिशत पर पहुंचा था। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद वर्ष 2000 में पहली बार सरकार ने समर्थन मूल्य पर लगभग 4.63 लाख मीट्रिक धान खरीदा था। जबकि साल 2014 आते तक यह आंकड़ा लगभग 80 लाख मीट्रिक टन हो गया था। 2013 में हुए चुनाव में भाजपा ने अपने घोषणा.पत्र में 21 सौ रुपए प्रति क्विंटल की दर से धान खरीदी का वादा किया था।
आत्महत्या कर लिया किसान
कोंडागांव जिले के बड़ेराजपुर तहसील के मारंगपुरी निवासी किसान धनीराम ने फांसी लगा ली। उसके पास 6.70 एकड़ जमीन थी। इस हिसाब से 100 क्विंटल धान बेचने की तैयारी में था। पर सरकारी रिकॉर्ड में जमीन का रकबा घट जाने से केवल 11 क्विंटल धान बेचने का ही टोकन कटा। उस पर कोऑपरेटिव बैंक का 61932 रुपए कर्ज भी था। ग्रामीण किसान की आत्महत्या के पीछे मात्र 11 क्विंटल धान बेचने के टोकन को मुख्य कारण बता रहे हैं। धनीराम ने 2.713 हेक्टेयर भूमि पर धान बोया था लेकिन त्रुटिवश 0.320 हेक्टेयर में धान की प्रविष्ठि हो गई थी। इसके लिए पटवारी को निलंबित कर दिया गया है और तहसीलदार को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है।
कांग्रेस दिल्ली में करेगी आंदोलन
केन्द्र ने दो टूक कह दिया है कि यदि भूपेश सरकार किसानों को बोनस देगी तो चावल नहीं खरीदेंगे। केन्द्र के इस निर्णय के बाद राज्य सरकार के सामने धान खरीदी को लेकर संकट पैदा हो गया। इस फैसले से नाराज कांग्रेस नेताओं ने केंद्र के खिलाफ दिल्ली में आंदोलन की रणनीति तैयार कर ली है। केन्द्र व राज्य संबंधों में किसान हित को लेकर टकराहट का सिलसिला पुराना है। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद केन्द्र में एनडीए की सरकार थी, तब अजीत जोगी ने पूरे मंत्रिमंडल के सहयोगियों के साथ 7 रेसकोर्स रोड पर धरना,प्रदर्शन किया था। इस बार भी छत्तीसगढ़ की सरकार 2305 धान खरीदी केन्द्रों के माध्यम से 90 लाख मीट्रिक टन धान खरीदने जा रही है। वहीं केन्द्र सरकार मात्र 8 प्रतिशत फसल ही समर्थन मूल्य पर खरीदती है।
धान का कटोरा कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ में चावल की 23 हजार से ज्यादा किस्में हैं। प्रदेश के कृषि विवि में इन किस्मों का जर्मप्लाज्म सुरक्षित रखा है। छत्तीसगढ़ में लगभग दर्जनभर ऐसी किस्में हैं जिनकी फसल ली जा रही है। इनमें मुख्य रूप से आईआर.54, आईआर.36, इंदिरा सोना, पूर्णिमा, समलेश्वरी, दंतेश्वरी नरेंद्र धान.97, एमटीयू.1010 शताब्दी और सहभागी धान प्रमुख हैं। इनमें लगभग सभी मोटे धान की श्रेणी में आते हैं।
पहले दिन यानी एक दिसम्बर को 30 हजार 446 किसानों ने धान बेचा। किसानों से 98 हजार 968 मीट्रिक धान खरीदी की गई है। बहरहाल चालू विपणन वर्ष में किसानों की संख्या और धान के रकबे में बढ़ोत्तरी को देखते हुए इस साल समर्थन मूल्य पर बीते वर्ष की तुलना में अधिक खरीदी का अनुमान है। वहीं अन्य राज्यों से दलाल प्रदेश में धान मंगा कर खपाने की जुगत में लगे हैं। मध्यप्रदेश और झारखंड से की कई गाड़ियां धान से लदी पकड़ी गई हैं।







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