Sunday, March 31, 2024

भाने लगी भाजपा,‘हाथ’ का साथ छोड़ा

रमेश कुमार‘रिपु’
मतदान के पहले बीजेपी इस प्रयास में है कि अधिक से अधिक कांग्रेसियों के माथे पर गेरूआई राजनीति का गुलाल लगा कर उन्हें अपना बना लेना है। इससे जनता में यह संदेश जाएगा कि प्रदेश में विपक्ष कमजोर हो गया। वहीं कांग्रेसी कहते हैं,अब भारतीय जनता पार्टी,भारतीय जनता कांग्रेस पार्टी हो गयी है।राजनीति का यह पेशेवराना तरीका है। पार्टी को ऐसा लगता है, कि ऐसा करने से उसके मार्ग के सारे रोढ़े हट गए। तीसरी दफा बीजेपी उदय की बात अभी गांव तक, उतनी तेजी से नहीं पहुंची है। शहरी फिजा में दो तरह की बातें हैं। मोदी को रोकने वाले और मोदी को चाहने वाले। मध्यप्रदेश में बीजेपी की सरकार है। इसलिए मध्यप्रदेश की राजनीति करने वाले यह समझ रहे हैं कि आने वाला कल बीजेपी का ही है,इसलिए ऐसे लोगों के लिए विचारधारा कोई मायने नहीं रखती। उन्हें सत्ताई पार्टी के साथ रहना ज्यादा अच्छा लगता है। चूंकि प्रदेश की राजनीतिक हवा बदल रही है। बीजेपी का दावा है कि पूर्व केन्द्रीय मंत्री सुरेश पचौरी सहित 6 पूर्व विधायक,एक महापौर,207 पार्षद,सरपंच और 500 पूर्व जनप्रतिनिधियों सहित 17 हजार कांग्रेसी बीजेपी ज्वाइन कर चुके हैं। इसीलिए पूर्व गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा कहते हैं,चुनाव तक 70 हजार से एक लाख कांग्रेसी बीजेपी में शामिल हो जाएंगे।गिनीज बुक में नाम दर्ज कराएंगे। भाजपाई बनाना है कांग्रेसियों को.. सवाल यह है कि क्या थोक में कांग्रेसियों को बीजेपी के खेमें में लाने से इस बार बीजेपी 29 सीट जीत जाएगी? मध्यप्रदेश अब शिवराज के हाथ में नहीं है लेकिन, उन्होंने कर्जदार प्रदेश डाॅक्टर मोहन यादव को दिया है। मोहन यकीन दिलाने की कोशिश कर रहे हैं,कि अर्थव्यवस्था बेहतर है। प्रदेश की बागडोर सही पार्टी के हाथ में है। ग्रामीण क्षेत्र हो या फिर शहरी क्षेत्र, उसे विकास के लिए अनाथ नहीं छोड़ा जाएगा। भले उन्हें एक साल में चार नहीं,दस बार कर्ज लेना पड़े। प्रदेश पर करीब चार लाख करोड़ रुपए का कर्ज है।वहीं डिप्टी सी.एम राजेन्द्र शुक्ला रीवा की जमीन निजी हाथों को औने पौन दाम में देकर भाजपा का महाजन बन गए हैं। अभी रीवा संभाग में भाजपा ने चुनावी एजेंडे को सिर के बल खड़ा नहीं कर पाई है। लेकिन मोहन यादव मोदी की तरह हिन्दुत्व के भावनात्मक मुद्दे के उभार के जरिए वोट पाना चाहते हैं।मोहन यादव कहते हैं, हमें खुद मोदी बनना है। पारस पत्थर की तरह बनकर लोहा और दूसरी धातु को बीजेपी बनाना है। राजेन्द्र को सवालों से परहेज डिप्टी सीएम के भाषण में भिन्नता नहीं है। वो शिवराज सिंह की तरह एक ही बात हर बार दोहराते हैं। उनके भाषण रीवा संभाग से बाहर की सीमा को नहीं छूते। जबकि आज लोग यह जानना चाहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्टोरल बांड के संबंधी में जो कहा,उसका सच क्या है। क्या वाकयी में बीजेपी ने चंदा के नाम पर रिश्वत ली है। 16 हजार करोड़ रुपए जिन कंपनियों ने बीजेपी को चंदा दिया, उनके यहां ई.डी. ने छापा मारा तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई। ई.डी.चुनाव के वक्त ही सक्रिय क्यों होती है। मोदी की गारंटी महंगाई, बेरोजगारी,गिरते रुपये पर क्यों नहीं है। केन्द्रीय वित्त मंत्री का बजट जमीनी धरातल पर क्यों नहीं दिखता। प्रदेश कर्जदार प्रदेश क्यों बन रहा है। उनकी पार्टी के रीवा सांसद पर विपक्ष ने जो आरोप लगाए हैं, उसका सच जनता को क्यों नहीं बताते। क्यों जनार्दन मिश्रा ने ऐसा कोई सवाल संसद में नहीं उठाया, जिससे विंध्य न सही, रीवा की जनता का हित जुड़ा हो। आप के विकास के भूगोल में आम आदमी को जगह क्यों नहीं है? मध्यप्रेदश में 12876 स्कूलें बंद क्यों कर दी गयी। विकास के हब के साथ रीवा क्राइम का हब क्यों बन रहा है। सिंगापुर क्यों नहीं बन सका सिंगरौली। ऐसे कई सवाल हैं,जिनसे डिप्टी सीएम परहेज करते हैं। वो शिवराज सिंह चौहान से अलग नहीं है। इसीलिए बीजेपी हाईकमान की नजर में चुनावी महाजन हैं। अब देखना है कि विंध्य की कितनी सीट वो मोदी की झोली में डाल पाते हैं। अमहिया कांग्रेस भाजपा की हुई.. अमहिया में सत्ता अब भी है। कभी यहां अमहिया सरकार श्रीनिवास तिवारी की हुआ करती थी। अब राजेन्द्र शुक्ला की है। धीरे- धीरे अमहिया कांग्रेस का बीजेपी में विलय होता जा रहा है। सुन्दरलाल तिवारी के बेटे सिद्धार्थ ने इसकी शुरूआत की। बीजेपी में जाकर वो विधायक बन गए। श्रीनिवास तिवारी के पीए रमाशंकर मिश्रा उनके समर्थक और सिरमौर विधान सभा के कांग्रेस के एक दर्जन से अधिक पदाधिकारी भोपाल में वीडी शर्मा के हाथ बीजेपी की सदस्यता ली। दो अप्रैल को मुस्लिम नेता डाॅ मुजीब खान सहित और कई कांग्रेसी पदाधिकारी बीजेपी में डाॅ मोहन यादव की उपस्थिति में बीजेपी के हो जाएंगे। जाहिर सी बात है कि सेमरिया विधान सभा में कांग्रेस विधायक अभय मिश्रा ने आधी बीजेपी को कांग्रेसी बना दिया,उसी तर्ज पर डिप्टी सी.एम. कर रहे हैं। वो कौन सी तरकीब है.. सवाल यह है कि अभय मिश्रा ने जो किया क्या वो डिप्टी सीएम कर पाएंगे। जनार्दन मिश्रा को लेकर बीजेपी के अंदर जो उहापोह की स्थिति है। नाराजगी के स्वर तेज हैं,क्या उसे मद्धिम कर पाएंगे। राजेन्द्र शुक्ला उन सभी को बांए कर दिये है,जिनसे उन्हें लगता है वो उनके विधान सभा में भीतरघात कर सकते हैं। उनके सियासी कद को कतर सकते हैं। ऐसे में जनार्दन मिश्रा के लिए व्यापक पैमाने पर अपने प्रबंधकीय चुनावी पैतरे से क्या सब कुछ आल इज वेल कर लेंगे। ऐसी कौन सी तरकीब है, उनके पास जिससे वो जनार्दन मे पक्ष में हवा बनाने के साथ वोटों को मजबूत करती है,शायद अमित शाह भी नहीं जानते होंगे। उस स्थिति में जब बसपा भी चुनावी समर में है। और उनका जिलाध्यक्ष अजय सिंह पटेल उनके और जनार्दन मिश्रा के साथ नहीं है। ऐसे में पटेल वोट किसकी झोली में जाएगी स्वयं राजेन्द्र शुक्ला भी नहीं जानते। त्रिकोंणीय स्थिति बनने पर फायदा इस बार भाजपा को मिलता नहीं दिख रहा है। रीवा में विचारधारा की लड़ाई नहीं बल्कि दो व्यक्त्विों की लड़ाई है। सियासी मामले में अभय से राजेन्द्र की बराबरी भला क्या हो सकती है।लेकिन कांग्रेस भी अनाड़ी नहीं है। अच्छे दिन की चमक खोने की उसने उम्मीदें लगा रखी है।

सियासी लड़ाई में कांग्रेस आगे,बीजेपी पीछे

स रमेश कुमार‘रिपु’ राजनीति का रंग हमेशा एक सा नहीं होता है। वो गिरगिट की तरह बदलता रहता है। संभागीय मुख्यालय रीवा में बीजेपी की पार्टी का रंग भी विधान सभा चुनाव के बाद एकदम से बदल गया है। लोकसभा में हर विधान सभा के विधायक और पूर्व महापौर को सियासी लड़ाई की मोर्चेबंदी से बीजेपी ने दूर कर दिया है। इस वजह से लोकसभा की सियासी लड़ाई में बीजेपी अभी पीछे दिख रही है। उसकी वजह कई है। बीजेपी का दावा है, कि दो अप्रैल को मुख्यमंत्री मोहन यादव के आने के बाद गेरूआई राजनीति की पताका दिखने लगेगी। अभी सियासी बैठक और कार्यक्रम में कांग्रेस आगे है। लोकसभा की
लड़ाई कांग्रेस से नीलम अभय मिश्रा के नाम की घोषणा होते ही डिप्टी सी.एम राजेन्द्र शुक्ला और अभय मिश्रा की हो गयी है। जनार्दन मिश्रा ने पूर्व पार्षदों को याद किया, मगर राजेन्द्र शुक्ला ने पूर्व महापौर को दरकिनार कर दिये हैं। जाहिर सी बात है डिप्टी सी.एम.जिस शहर में हो वहां का सियासी गिरगिट उनके अनुसार रंग नहीं बदला तो फिर कैसा पाॅवर और कैसी सियासत। दो अप्रैल को मुख्यमंत्री मोहन यादव रीवा में रहेंगे। जनार्दन मिश्रा नामांकन दाखिल करेंगे। और एक हूंकार भरेंगे,अबकि बार फिर मोदी सरकार। मोदी सरकार चार सौ के पार होगी या नहीं,यह तो मोहन यादव भी नहीं जानते। इसलिए कि कांग्रेस यदि जीतने की रणनीति के साथ चुनाव लड़ी तो वह विधान सभा चुनाव के जीत के अनुसार कम से कम सात से दस सीट जीत सकती है। जबकि कमलनाथ कह रहे है, कांग्रेस 12 सीट जीतेगी। हर वार्डो में महिलाएं घूमेंगी.. कांग्रेस की जन नेत्री कविता पांडे कहती हैं,नीलम मिश्रा के पर्चा दाखिल करने के बाद रीवा शहर के 45 वार्डो में महिला कांग्रेस नेत्रियों का प्रचार शुरू हो जाएगा। कांग्रेसी उत्साहित हैं। अभय मिश्रा के समय कांग्रेस को 52 हजार वोट मिला था और इंजीनियर राजेन्द्र शर्मा के समय कांग्रेस को 56 हजार वोट मिले। लोकसभा में कांग्रेस रीवा विधान सभा में 60 हजार ज्यादा वोट पाएगी। इस बार आठों विधान सभा में कांग्रेस का एक -एक कार्य कर्ता झूठे वायदे पर भारी साबित होगा। कांग्रेस प्रचार में आगे.. कांग्रेस की चुनावी तैयारी बताती है कि इस बार की जंग सचमुच कुरूक्षेत्र का रण होने जा रहा है।यह डिजिटल युग का युद्ध है। और इस मामले में काग्रेस सबसे आगे है। यह कह सकते हैं,कि कांग्रेस दिमाग से चुनाव लड़ रही है। कांग्रेस ग्रामीण क्षेत्र में आगे है जबकि बीजेपी पीछे है। कांग्रेस आठों विधान में बैठक कर चुकी है। ब्लाक स्तर पर उसके कई विधान सभा में कार्यक्रम हो चुके हैं। सेक्टर स्तर पर कार्यक्रम चल रहे हैं। सूचना तकनीक के इस चहचहाते दौर में कांग्रेस ज्यादा से ज्यादा मतदाताओं तक पहुंचने की कोशिश में लगी है। ग्रामीण क्षेत्र में सांसद जनार्दन मिश्रा के प्रति नाराजगी का आलम घना है। वहीं कांग्रेस उम्मीदवार नीलम अभय मिश्रा ग्रामीणों को कांग्रेस को वोट देने के लिए प्रेरित करने के लिए अभियान में जुटी हैं। जिला ग्रामीण कांग्रेस अध्यक्ष इंजीनियर राजेन्द्र शर्मा जिले भर में कांग्रेस के पक्ष में कार्यक्रम कराने और व्यक्तिगत संपर्क बना रहे हैं। आठों विधान सभा में कांग्रेस के प्रत्याशी बीजेपी को शिकस्त देने सांसद जनार्दन मिश्रा के नकारात्मक कामों का प्रचार कर रहे हैं। बीजेपी अपनी दुखती रगों की उधाड़े जाने से बचाने की चिंता कर रही है। कांग्रेस छोड़ेंगे... मुख्यमंत्री डाॅ. मोहन यादव दो अप्रैल को आएंगे। इस दिन कांग्रेस के दो बड़े नेता बीजेपी में शामिल होंगे। एक रीवा से डाॅ. मुजीब खान दूसरे सेमरिया विधान सभा से पूर्व विधान सभा प्रत्याशी। इन दोनों नेताओं के बीजेपी में जाने से बीजेपी को फायदा होगा। मुस्लिम वोटर अभी तक कांग्रेस को वोट करता आया है। इस बार बीजेपी को कर सकता है। मुसलमान हुकूमत में हिस्सेदार केवल चुनावी समझौते के जरिए बन सकता है। मुल्क की कोई भी ऐसी पार्टी नहीं है,जिसे मुसलमानों ने वोट नहीं किया हो। इसके बावजूद नतीजा शून्य रहा। मुस्लिम वोट बीजेपी को सत्ता में आने से नहीं रोक सका। असल में सेकूलर वोटों का बंटवारा ही भाजपा को सत्ता में लाने का सबब बना। सीएए से मुस्लिम नाराज हैं। कोर्ट में याचिका भी दायर है। किधर मुसलमान वोटर... एक बार फिर रीवा जिले के 27 हजार मुसलमानों में मंथन चल रहा है,कि उनके वोट किधर जाएं। यदि बीजेपी बुरी है,तो भली पार्टी कौन है? क्या राजेन्द्र शुक्ला को देखकर बीजेपी को वोट कर दें? अभय मिश्रा कहते हैं,मुसलमानों में एक नई जागृति आ रही है। वे बीजेपी के लुभावने वादे और घोंषणाओं के सुनहरे जाल में नहीं फंसना चाहते। उन्हें एक सच्चे दोस्त की तालाश है। पूर्व मेयर वीरेन्द्र गुप्ता कहते हैं,पार्टी का प्रयास है,कि मुसलमान वोट बैंक की राजनीति से बाहर निकलकर आत्म विश्वास और राष्ट्रवाद की राजनीति की मुख्यधारा में आएं। बीजेपी नहीं चाहती कि लोग उन्हें शक की नज़र से देखें। बबीता साकेत बाहर... कांग्रेस की गुड बुक में बबीता साकेत नहीं है। वो मनगवां विधान में संगठन का काम देख रहे रवि तिवारी की अक्सर खिलाफत करती फिरती है। कांग्रेस प्रत्याशी नीलम अभय मिश्रा ने फोन पर उससे बातें भी की। लेकिन वह यही कही कि वो बीजेपी में नहीं जा रही है। उसके मन में क्या चल रहा है, कोई नहीं जानता। लेकिन यह माना जा रहा है कि उसे कोई जवाबदारी देने से वो भीतरघात कर सकती है। उसके विधान सभा में कांग्रेस प्रत्याशी का गढ़,मनगवां,और लालगांव में कार्यक्रम हो चुके हैं और हो रहे हैं,लेकिन उसे खबर नहीं। कांग्रेस का कोई भी व्यक्ति उस पर भरोसा नहीं कर रहा है खासकर ब्राम्हण वोटर और कांग्रेस कार्य कर्ता । जाहिर सी बात है कि कांग्रेस लोकसभा का चुनाव दिमाग से लड़ रही है,वहीं बीजेपी मोदी के नाम पर। बीजेपी एक व्यक्ति के भरोसे सारा दांव लगाने का लोभ संवरण नहीं कर पा रही है। जबकि कांग्रेस प्रत्याशी नीलम अभय मिश्रा बीजेपी प्रत्याशी पर हमला करने में मुखर हैं। वो हर विधान सभा में बीजेपी के विधायकों को विकास,और युवाओं के रोजगार के साथ राष्ट्रीय मसले पर भी बात कर रही हैं। बीजेपी ने ईडी का डर दिखाकर कंपनियों से चंदा नहीं,रिश्वत ली। इलेक्टरोरेट बांड की सच्चाई देश के सामने आ गयी। सांसद जनार्दन मिश्रा ने अपनी जेबें भरी, रीवा की जनता की अनदेखी की। जाहिर सी बात है एक पार्टी की चमक दिख रही है,दूसरी पार्टी का अभी पता नहीं है। अभी केन न्यूज़ के नेशनल हेड रमेश कुमार 'रिपु' की रीवा से रिपोर्ट

Thursday, January 25, 2024

राजेन्द्र ने कांग्रेस को कोमा में पहुंचा दिया

रीवा। मध्यप्रदेश के उप मुख्यमंत्री राजेन्द्र शुक्ला ने संभागीय मुख्यालय रीवा में कांग्रेस को कोमा में पहुंचा दिया। सेमरिया विधान सभा मुश्किल से कांग्रेस जीत कर भी मरी हुई है। विधान सभा चुनाव हार चुके इंजीनियर राजेन्द्र शर्मा लोकसभा चुनाव लड़ने का मन बना रहे हैं,वो भी भक्ति के दौर में। जबकि असम में न्याय यात्रा को लेकर राहुल गांधी के खिलाफ एफआईआर दर्ज होने पर रीवा में धरना प्रदर्शन स्थल पर मुश्किल से दो दर्जन कांग्रेसी थे। विधान सभा चुनाव लड़ने वाले एक भी प्रत्याशी धरना स्थल पर नहीं पहुंचे। अभय का सियासी सूचकांक गिरा.. धरना स्थल पर केवल महापौर पहुंचे। उनके जाने के बाद धरना स्थल पर सन्नाटा पसर गया। जाहिर सी बात है कि रीवा विधायक राजेन्द्र शुक्ला के उप मुख्यमंत्री बनने के बाद कांग्रेसियों को सांप सूंघ गया है। कल तक अभय मिश्रा अपना सियासी सूचकांक बढ़ाने दावा कर रहे थे, कि राजेन्द्र शुक्ला के सारे काले चिट्ठे मैं मीडिया को दूंगा। लेकिन उन्हें गार्ड मिलने में देरी हुई तो उनकी धड़कन बढ़ गयी। उन्हें यह बात समझ में आ गयी, कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता। अभय का सियासी सूचकांक शेयर बाजार की तरह अब गिर गया है। यह बात सभी कांग्रेसी समझ गए। इसीलिए धरना स्थल पर कोई भी विधान सभा चुनाव लड़ा प्रत्याशी नहीं पहुंचा। तस्वीर देखकर समझ सकते हैं,कि आने वाले समय में कांग्रेस सत्ता पक्ष की खिलाफत करने या फिर राहुल गांधी के लिए सड़क पर उतरी तो क्या स्थिति रहेगी। कांग्रेस हार के कोमा में.. कांग्रेसी विधान सभा चुनाव में दावा कर रहे थे कि आठ सीट जीतेंगे। सेमरिया जीत कर भी कांग्रेस हार के कोमा में है। वैसे भी अभय मिश्रा को न जिला कांग्रेस के पदाधिकारी तवज्जो देते हैं और न ही वो जिला कांग्रेस को। हैरानी वाली बात है कि आज कलेक्ट्रेट के सामने कांग्रेसी कार्य कर्ता बड़े उत्साह से राहुल गांधी के खिलाफ असम में एफआईआर दर्ज होने के विरोध में पहुंचें। लेकिन शहर कांग्रेस अध्यक्ष से लेकर जिला ग्रामीण कांग्रेस अध्यक्ष तक धरना स्थल पर नहीं थे। जाहिर सी बात है, कि प्रदेश कांग्रेस के आदेश पर रीवा जिला कांग्रेस के कुछ कार्यकर्ता धरना स्थल पर पहुंच गए। लेकिन विरोध जैसा कुछ भी नहीं था। भक्ति युग का दौर है.. जिला कांग्रेस का कोई माई बाप नहीं। सेमरिया से लेकर पूरे आठों विधान सभा में कांग्रेस का नगाड़ा बजाने वाला कोई नहीं है। सेमरिया में सन्नाटा है। सेमरिया के स्वास्थ्य केन्द्र बीड़ा को एनक्यूएस सार्टिफिकेट मिला और उसका श्रेय के पी त्रिपाठी ले गए। रीवा में तेज गति से नए नए काम की शुरूआत हो गयी। कल तक इंजीनियर राजेन्द्र शर्मा व्यवस्थिति विकास की बात कर रहे थे। अब वो किसी भी विकास पर उंगली उठाने से बच रहे हैं। मगर दिग्विजय सिंह के पास फाइल बनाकर ले गए थे, यह बताने के लिए कि लोकसभा चुनाव कांग्रेस जीत सकती है।कांग्रेस को 26फीसदी वोट मिले है। बसपा को 19 फीसदी और भाजपा को 32 फीसदी। भाजपा को हरा सकते हैं। त्रिकोंणीय संघर्ष जिस विधान सभा में रहा वहां बीजेपी हार गयी। यानी बसपा का दमदार उम्मीदवार होने पर बीजेपी हार जाएगी। जनार्दन मिश्रा को टिकट मिलती है तो वो कमजोर प्रत्याशी साबित होंगे। जाहिर सी बात है, कि राजेन्द्र शर्मा लोकसभाा चुनाव लड़ने का मन बना रहे हैं,भक्ति युग के दौर में।

Wednesday, January 17, 2024

राम मंदिर से किसे मिलेगी मात और किसे सौगात

"क्या मान लिया जाए कि अयोध्या से इस बार खुलेगा दिल्ली का द्वार। इसीलिए बीजेपी बोल रही है,अबकि बार चार सौ के पार। राम नाम से यदि सत्ता का कमल खिलता है,तो फिर बाबरी मस्जिद गिरने पर कल्याण की सरकार की वापसी होनी चाहिए थी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। फिर भी इंडिया गठबंधन राम मंदिर के उद्घाटन से डरा हुआ है। उसे लगता है सियासी इवेंट बताने से आस्था का आवेग रूक जाएगा। जबकि यह दौर धर्म की राजनीति का है। और बीजेपी भी,मोदी के दौर की है। 0 रमेश कुमार ‘रिपु’ धर्म की राजनीति या फिर राजनीति का धर्म। यह सवाल एक बार फिर हवा में है। राम के नाम पर राजनीति या फिर राजनीति राम पर। राम का सियासीकरण या फिर राम मय भारत। विपक्ष का आरोप है,कि राम के आसरे बीजेपी देश की सामाजिक और सांस्कृतिक परिदृश्य को बदलना चाहती है। राम का राजनीतिकरण कर रही है। रामलला के उद्घाटन को सियासी इवेंट बना दिया है। जबकि इस देश में राम के प्रति आस्था रखने वालों के लिए राम मंदिर, धार्मिक भावना है। जब राम मंदिर नहीं बना था,तब विपक्ष कहता था बीजेपी वाले राम मंदिर बनाएंगे,मगर तारीख नहीं बताएंगे। अब जब 22 जनवरी 2024 को राम मंदिर के उद्घाटन का दिन निहित हो गया तो इसे इंडिया गठबंधन सियासी इवेंट कह रहा है। दरअसल राम मंदिर को लेकर विपक्ष में एक सियासी खौफ है। कहीं धर्म की राजनीति हावी न हो जाए 2024 के चुनाव में। इंडिया गठबंघन की बातें और उनके डर से,क्या यह मान लिया जाए कि अयोध्या से इस बार खुलेगा दिल्ली का द्वार। इसीलिए बीजेपी बोल रही है, अबकि बार चार सौ के पार। राम नाम से यदि सत्ता का कमल खिलता है,तो फिर बाबरी मस्जिद गिरने पर कल्याण की सरकार की वापसी होनी चाहिए थी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इंडिया गठबंधन को लगता है,राम मंदिर के उद्घाटन सियासी इवेंट बताने से आस्था का आवेग रूक जाएगा। जबकि यह दौर धर्म की राजनीति का है। मंदिर का है। और बीजेपी भी,मोदी के दौर की है। राम के आसरे.. बीजेपी का हिन्दू और हिन्दुत्व दोनों नये दौर में उफान पर है। यही परिदृश्य सन् 1980 में शिवसेना को लेकर था। उसे हिन्दू राजनीति वाली पार्टी मान लिया गया था। लेकिन अब वो इंडिया गठबंधन में है। बाल ठाकरे जिस मकसद से शिवसेना का गठन किया था,अब वो मकसद गुम हो गया। बीजेपी हिन्दू राजनीति के घोड़े पर सवार है। इसलिए मोदी कह रहे हैं,देश के 140 करोड़ देशवासियों 22 जनवरी को जब अयोध्या में रामलला विराज रहे हों, तब अपने-अपने घरों में राम ज्योति जलाएं। खुद को नयी ऊर्जा से भरना है। जाहिर है कि, बीजेपी राम के आसरे 2024 का चुनाव जीतना चाहती है। यानी यह मान लिया जाए कि 22 जनवरी के बाद देश देश का राजनीतिक मंजर बदल जाएगा । राजनीति का धर्म भी बदल जाएगा । कहा यही जा रहा है कि यह दौर आस्था का है। मंदिर का है। धर्म की राजनीति का है। तभी तो विपक्ष के 146 सांसदों को निलंबित कर दिये जाने के बाद भी, देश में एक आवाज तक नहीं उठी। सिवाय विपक्ष के। तमिलनाडु में सनातन को लेकर बवाल मचा हुआ है। मोदी गुजरात से आकर बनारस में चुनाव लड़ सकते हैं,तो फिर रामेश्वरम से क्यों नहीं। दक्षिण को साधना भी है। क्यों कि बीजेपी को राम के आसरे अपनी हिदुत्व की परिभाषा भी बदलना है।़ आदिवसियों में नया नारा.. सवाल यह है कि क्या बीजेपी राम के आसरे पश्चिम बंगाल,महाराष्ट्र और बिहार को साधेगी। देश में हिन्दू राष्ट्र का शोर विपक्ष मचा रहा है। वहीं आदिवासियों के भीतर एक नारा उठ रहा है। कुल देवी तुम जाग जाओ। धार्मातरण तुम भाग जाओ। जो भोले नाथ का नहीं, वो हमारी जाति का नहीं। जाहिर सी बात है कि मध्यप्रदेश,छत्तीसगढ़,झारखंड,ओड़िसा,राजस्थान और त्रिपुरा आदि राज्यों में आदिवासियों को प्रभावित करने वाला नारा अपनी एक अलग पहचान बना रहा है। मणिपुर के धार्मिक स्थलों में आग लगाए जा रहे हैं। आदिवासियों को अपनी ओर खीचने के लिए। वहीं हिन्दी पट्टी को बीजेपी अपने रंग में रंगना चाहती है। राम के आसरे वह कितने राज्यों को जीत लेगी,स्वयं बीजेपी भी नहीं जानती। राजनीति में व्यापक बदलाव.. भारत की राजनीति में व्यापक बदलाव आया है। तीन राज्यों में बीजेपी की जीत ने राजनीति की करवट बदल दी। देश का मिजाज बता रहा है,कि लोकसभा चुनाव में राम बाण विपक्ष पर चलेगा। राम मंदिर के उद्घाटन का न्यौता मिलने पर विपक्ष खिलाफत करके बीजेपी के हिन्दुत्व उभार को और बढ़ा दिया है। यह कोई नयी बात नहीं है। सावरकर के समय से हिन्दुत्व की हवा बह रही है। विहिप ने 1980 में आयोध्या का आंदोलन किया था। अशोक सिंघल ने अपने हाथ से विश्वहिन्दू परिषद गठन किया था। उस समय बीजेपी ऐसी नहीं थी,जिस तरह मोदी के दौर में है। विहिप का राम आंदोलन आज आस्था में तब्दील हो गया है। कमण्डल और रथ यात्रा से होती हुई राजनीति, आज धर्म में तब्दील हो गयी है। नयी सियासत में धर्म की राजनीति का उदय हुआ है। यह कह सकते हैं, कि धर्म की राजनीति भी बदल गयी है। तीन राज्यों के चुनाव के नतीजे आने से पहले तक संघ बड़े पशोपश में था। अब उसे भी लगता है कि 2024 में हिन्दू राजनीति काम कर जाएगी। बीजेपी के समक्ष सवा लाख मंदिर बानाने का लक्ष्य है। मंदिर बीजेपी के लिए वोट बैंक बढ़ाने का मंत्र है। विपक्ष कह रहा है कि राम मंदिर एक बहाना है। बीजेपी का मकसद हिन्दू राष्ट्र बनाना है। ताकि भविष्य में फिर कभी विपक्ष में न लौट सके। अब मोदी के पीछे संघ.. मोदी ने बीजेपी की राजनीति का दिशा और दशा बदल दिए हैं। अब संघ को मोदी के पीछे -पीछे चलना पड़ेगा। शिवसेना एक मात्रा हिन्दू पार्टी थी वो भी अपना सियासी लिबास बदल कर इंडिया गठबंधन के शिविर में चली गयी। ऐसे में हिन्दुत्व पार्टी एक मात्र बीेजेपी है। हिन्दुत्व वोट का बंटवारा बीजेपी नहीं चाहती। इसलिए उसने उद्वव ठाकरे को न्यौता नहीं दिया। उद्वव को यह बात चुभ गयी। इसलिए उन्होंने कहा, कि राम किसी एक पार्टी के नहीं है। इस देश के हर हिन्दू के राम हैं।" एतराज नहीं होना चाहिए.. राहुल की न्याय यात्रा से कांग्रेस को वोट मिल सकता है,तो फिर राम मंदिर से बीजेपी के पक्ष में राजनीति के करवट बदलने पर एतराज क्यों? विरोध क्यों? खिलाफत क्यों? राम जब सबके हैं,तो इंडिया गठबंध को यह नहीं कहना चाहिए, कि राम के आसरे बीजेपी देश की राजनीति का मिजाज बदलना चाहती है। जिन्हें लगता है,कि बीजेपी न होती तो राम मंदिर न बनता, वो बीजेपी के साथ हो लेंगे। और जिन्हें लगता है,कि राम मंदिर बनने से देश का सामजिक परिदृष्य और सांस्कृतिक धारणाएं नहीं बदलेंगी,उन्हें विरोध नहीं करना चाहिए। अधूरे राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा नहीं होनी चाहिए। प्राण प्रतिष्ठा का अधिकार साधु-संत और शंकराचार्यो का है। देश के प्रधान का नहीं। उनके तर्क से जो सहमत होंगे 2024 के चुनाव में उनके वोट किसी और को जाएंगे। जाहिर सी बात है कि राजनीति सिर्फ राम आसरे नहीं की जा सकती। मगर,मतदाता की सोच को कोई भी पार्टी नहीं बदल सकती।

Monday, January 1, 2024

हाथ’ में खिल गया कमल

'मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में ‘हाथ’ से सत्ता जाने के बाद सवाल यह है, कि कांग्रेस क्या खुद को उबार पाएगी? भूपेश सरकार को लेकर मीडिया और हाईकमान आश्वस्त थे, कि सत्ता नहीं जाएगी। लेकिन भूपेश सरकार के भ्रष्टाचार और उसके अहंकारी मंत्रियों से गुस्साई जनता ने कांग्रेस को किनारे कर दिया। राजस्थान ने अपना सियासी रिवाज कायम रखा। तेलंगाना कांग्रेस को सात्वना पुरस्कार के रूप में मिला। 0 रमेश तिवारी ‘‘रिपु‘‘ किसी ने नही सोचा था कि मध्यप्रदेश,राजथान और छत्तीसगढ़ के चुनाव भाजपा के लिए आनंददायी टी पार्टी साबित होगी। खासकर छत्तीसगढ़ में। मध्यप्रदेश में कमलनाथ और दिग्विजय सिंह यह मान लिए थे, कि इस बार शिवराज की बिदाई तय है। लेकिन कांग्रेस के ये दोनों नेता जनता के मूड और उनकी सोच को नहीं समझ सके। यही हाल छत्तीसगढ़ में भूपेश का था। उन्हें यकीन था कि गढ़बो नवा छत्तीसगढ़ का उनका स्लोगन,गोबर खरीदी,गो मूत्र खरीदी,किसानों की धान खरीदी योजना,किसानों का कर्जा माफ और आदिवासी को लुभाने वाली नीति उनके खाते में जाएगी। इसीलिए भूपेश और प्रदेश प्रभारी कुमारी शैलेजा कहती थीं इस बार 75 के पार। यह तो नहीं हो सका । मगर हाथ से सत्ता चली गयी। छत्तीसगढ़ में भूपेश की गृहलक्ष्मी योजना देर से प्रचारित हुई,जबकि भाजपा महतारी योजना फार्म छपवाकर जनता से भरवाने लगी। मध्यप्रदेश के लाड़ली बहना योजना जैसा ही यह था और यह योजना सियासी गेम चेज करने का सबसे बड़ा कारक बना। भूपेश सरकार को लेकर मीडिया और हाईकमान आश्वस्त थे, कि सत्ता नहीं जाएगी। लेकिन भूपेश सरकार के भ्रष्टाचार और उसके अहंकारी नौ मंत्रियों से गुस्साए प्रदेश वासियों ने कांग्रेस को किनारे कर दिया। राजस्थान ने अपना सियासी रिवाज कायम रखा। तेलंगाना कांग्रेस को सात्वना पुरस्कार के रूप में मिला। भूपेश से कर्मचारी नाराज.. छत्तीसगढ़ में महतारी योजना ने सियासी गेम चेंज कर दिया। मध्यप्रदेश की लाड़ली बहना योजना की तरह। बारह दिन बाद भूपेश ने गृहलक्ष्मी योजना के तहत पन्द्रह हजार रुपए सालाना देने की घोंषणा की। वहीं भूपेश सरकार ने अपने घोंषणा पत्र को पूरा नहीं किये। प्रदेश के छत्तीसगढ़ सर्वे विभागीय संविदा कर्मचारी महासंघ 45 हजार हैं। संविदा अनियमित,दैनिक वेतन भोगी प्लेस मेट,ठेका कर्मचारियों को मिलाकर यह संख्या ढाई लाख से ऊपर है। कर्मचािरयों ने भूपेश के खिलाफ वोट किया। भूपेश सरकार छह लाख वोट से हार गयी। जबकि इन्ही कर्मचारी और उनके परिवार की संख्या ही दस लाख से ज्यादा है। अन्य कर्मचारियों को मिला दें तो यह संख्या पच्चीस लाख हो जाती है। केन्द्र की आयकर टीम और ईडी ने छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल के करीबियों के यहां छापा मार कर सियासी स्थिति बिगाड़ दी। चर्चा थी, कि आने वाले समय में बिहार के चुनाव की फंडिग छत्तीसगढ़ सरकार की तरफ से होना था। कांग्रेस के खिलाफ हवा.. छत्तीसगढ़ में चुनावी नतीजे के सर्वे यही बता रहे थे, कि वहां भूपेश सरकार फिर से लौट रही है। लेकिन भूपेश सरकार का जाना यह बताता है कि ईडी का छापा गलत नहीं था। महादेव ऐप झूठा नहीं था। कोयला घोटाला सही था। भूपेश सरकार के नौ मंत्री बुरी तरह हार गये। वो जनता से कटे हुए थे। भूपेश स्वयं सारे विभाग के मंत्रियों को काम करने की छूट नहीं दी। हर जिले में कलेक्टर मुख्यमंत्री का एजेंट बतौर काम कर रहे थे। उनका राजनीतिक मीडिया प्रभारी हो या फिर मीडिया प्रमुख ने पत्रकारों के दो खेमे बना दिये। पत्रकारों को मुख्यमंत्री से दूर रखा। जिससे मुख्यमंत्री को सही जानकारी नहीं मिल सकी। लाड़ली बहना का अंडर करेंट.. मध्यप्रदेश में सन् 2018 में कांग्रेस की सरकर बनने के बाद कमलनाथ और दिग्विजय सिंह ज्योतिरादत्यि सिंधिया को नाराज न किये होते तो न सरकार जाती और न ही कांग्रेस की इतनी बुरी गत होती। इसलिए भी कि कांग्रेस में ज्योतिरादित्य से बड़ा लोकप्रिय कोई युवा नेता नहीं है। कमलनाथ और दिग्विजय सिंह साढ़े तीन साल तक केवल बयान बाजी करते रहे। जिला स्तर पर कांग्रेस को रिचार्ज करने का काम नहीं किया। संगठनात्मक ढांचा तैयार नहीं किया। चुनाव से पहले दिग्विजय सिंह ने कहा था,कि जिन 60 सीटों पर कभी कांग्रेस चुनाव नहीं जीती उन्हें जीताने की जवाबदारी मेरी है। हैरानी वाली बात है, कि ऐसी सीटों को जीताने के लिए कुछ किया नहीं। प्रदेश में सत्ता परिवर्तन की लहर है यही कहते रहे। बाहर इसका शोर था। लेकिन अंदर लाड़ली बहन का करेंट तेज है, कांग्रेस के बड़े नेता नहीं भाप सके। मध्यप्रदेश में कांग्रेस अनाथ रही.. कमलनाथ मुख्यमंत्री बनने के बाद छिंदवाड़ा,भोपाल और इंदौर से कहीं बाहर नहीं गए। दिग्विजय सिंह के प्रति अब भी जनता में रोष है। कमलानाथ जिले में पार्टी संगठन का ढांचा नहीं खड़ा कर सके। जिले में कांग्रेस के पास जमीनी कार्य कर्ता नहीं है। कमलनाथ और दिग्विजय सिंह की लोकप्रियता गिर गयी है। मीडिया में कमलनाथ और दिग्विजय सिंह को जय वीरू की जोड़ी का नाम मिला। आपसी गुटबाजी और बड़े नेताओं के बीच आपसी खींचतान मीडिया में दिखा। लाड़ली बहना योजना का अंडर करेंट इतना भयावह निकला कि पंजा चारो खाने चित हो गया। कांग्रेस के घोषणा पत्र में उसी बात का जिक्र था, जिसे शिवराज चुनाव से पहले की पूरा कर दिये थे। कमलनाथ का सर्वे भाजपा को 85 सीट से ज्यादा नहीं दे रहा था,स्थिति ठीक उल्टी हो गयी कांग्रेस की। प्रदेश में कमलनाथ का सियासी प्रचार तंत्र कमजोर रहा। कई संभाग में बड़े नेता एक बार भी नहीं गये। संघ ने पूरे प्रदेश में एक लाख से अधिक बैठकें की चुनाव से पहले। उसने जनता की नब्ज को परखा। कई उम्मीदवारों को टिकट संघ के कहने पर मिला। मध्यप्रदेश में कांग्रेस के पास जनाधार वाले नेताओं की कमी है। दिग्विजय सिंह को रिटायर हो जाना चाहिए। वहीं छत्तीसगढ़ में भूपेश को अब नए सिरे से कांग्रेस को खड़ा करना चाहिए। राहुल को भी समझना चाहिए कि केवल भारत जोड़ो यात्रा से कांग्रेस उदय नहीं होगा। यदि ऐसा ही लोकसभा में रहा तो सियासी जगत से कांग्रेस का अंतिम संस्कार हो जाएगा। क्यों कि सन् 2014 के बाद से कांग्रेस की राज्यों से पकड़ कमजोर होती जा रही है। 2004 में 14 राज्यों में कांग्रेस काबिज थी। 2009 में 11 राज्य,2014 में उसकी सत्ता 9 राज्यों तक सिमट गई। 2019 में चुनाव में 6 राज्यों में कांग्रेस की सरकार बनी। लेकिन 2020 में मध्यप्रदेश उसके ‘हाथ’ से निकल गया। 2023 में तीन राज्य हाथ से निकल गये।

कहीं इतिहास ना बन जाए कांग्रेस..

मध्यप्रदेश छत्तीसगढ़ और राजस्थान में ‘हाथ’ में कमल खिल जाने के बाद से सवाल यह है कि कांग्रेस क्या खुद को उबार पाएगी? या फिर वो आने वाले समय में एक इतिहास बन कर रह जाएगी। क्यों कि सन् 2004 के बाद से लगातार राज्य हारती जा रही है। 0 रमेश कुमार ‘रिपु‘‘ किसी ने नही सोचा था कि मध्यप्रदेश,राजथान और छत्तीसगढ़ के चुनाव भाजपा के लिए आनंददायी टी पार्टी साबित होगी। खासकर छत्तीसगढ़ में। मध्यप्रदेश में कमलनाथ और दिग्विजय सिंह यह मान लिए थे, कि इस बार शिवराज की बिदाई तय है। लेकिन कांग्रेस के ये दोनों नेता जनता के मूड और उनकी सोच को नहीं समझ सके। यही हाल छत्तीसगढ़ में भूपेश का था। उन्हें यकीन था कि गढ़बो नवा छत्तीसगढ़ का उनका स्लोगन,गोबर खरीदी,गो मूत्र खरीदी,किसानों की धान खरीदी योजना,किसानों का कर्जा माफ और आदिवासी को लुभाने वाली नीति उनके खाते में जाएगी। इसीलिए भूपेश और प्रदेश प्रभारी कुमारी शैलेजा कहती थीं इस बार 75 के पार। यह तो नहीं हो सका । मगर हाथ से सत्ता चली गयी। छत्तीसगढ़ में भूपेश की गृहलक्ष्मी योजना देर से प्रचारित हुई,जबकि भाजपा महतारी योजना फार्म छपवाकर जनता से भरवाने लगी। मध्यप्रदेश के लाड़ली बहना योजना जैसा ही यह था और यह योजना सियासी गेम चेज करने का सबसे बड़ा कारक बना। भूपेश सरकार को लेकर मीडिया और हाईकमान आश्वस्त थे, कि सत्ता नहीं जाएगी। लेकिन भूपेश सरकार के भ्रष्टाचार और उसके अहंकारी नौ मंत्रियों से गुस्साए प्रदेश वासियों ने कांग्रेस को किनारे कर दिया। राजस्थान ने अपना सियासी रिवाज कायम रखा। तेलंगाना कांग्रेस को सात्वना पुरस्कार के रूप में मिला। भूपेश से कर्मचारी नाराज.. छत्तीसगढ़ में महतारी योजना ने सियासी गेम चेंज कर दिया। मध्यप्रदेश की लाड़ली बहना योजना की तरह। बारह दिन बाद भूपेश ने गृहलक्ष्मी योजना के तहत पन्द्रह हजार रुपए सालाना देने की घोंषणा की। वहीं भूपेश सरकार ने अपने घोंषणा पत्र को पूरा नहीं किये। प्रदेश के छत्तीसगढ़ सर्वे विभागीय संविदा कर्मचारी महासंघ 45 हजार हैं। संविदा अनियमित,दैनिक वेतन भोगी प्लेस मेट,ठेका कर्मचारियों को मिलाकर यह संख्या ढाई लाख से ऊपर है। कर्मचािरयों ने भूपेश के खिलाफ वोट किया। भूपेश सरकार छह लाख वोट से हार गयी। जबकि इन्ही कर्मचारी और उनके परिवार की संख्या ही दस लाख से ज्यादा है। अन्य कर्मचारियों को मिला दें तो यह संख्या पच्चीस लाख हो जाती है। केन्द्र की आयकर टीम और ईडी ने छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल के करीबियों के यहां छापा मार कर सियासी स्थिति बिगाड़ दी। चर्चा थी, कि आने वाले समय में बिहार के चुनाव की फंडिग छत्तीसगढ़ सरकार की तरफ से होना था। कांग्रेस के खिलाफ हवा.. छत्तीसगढ़ में चुनावी नतीजे के सर्वे यही बता रहे थे, कि वहां भूपेश सरकार फिर से लौट रही है। लेकिन भूपेश सरकार का जाना यह बताता है कि ईडी का छापा गलत नहीं था। महादेव ऐप झूठा नहीं था। कोयला घोटाला सही था। भूपेश सरकार के नौ मंत्री बुरी तरह हार गये। वो जनता से कटे हुए थे। भूपेश स्वयं सारे विभाग के मंत्रियों को काम करने की छूट नहीं दी। हर जिले में कलेक्टर मुख्यमंत्री का एजेंट बतौर काम कर रहे थे। उनका राजनीतिक मीडिया प्रभारी हो या फिर मीडिया प्रमुख ने पत्रकारों के दो खेमे बना दिये। पत्रकारों को मुख्यमंत्री से दूर रखा। जिससे मुख्यमंत्री को सही जानकारी नहीं मिल सकी। लाड़ली बहना का अंडर करेंट.. मध्यप्रदेश में सन् 2018 में कांग्रेस की सरकर बनने के बाद कमलनाथ और दिग्विजय सिंह ज्योतिरादत्यि सिंधिया को नाराज न किये होते तो न सरकार जाती और न ही कांग्रेस की इतनी बुरी गत होती। इसलिए भी कि कांग्रेस में ज्योतिरादित्य से बड़ा लोकप्रिय कोई युवा नेता नहीं है। कमलनाथ और दिग्विजय सिंह साढ़े तीन साल तक केवल बयान बाजी करते रहे। जिला स्तर पर कांग्रेस को रिचार्ज करने का काम नहीं किया। संगठनात्मक ढांचा तैयार नहीं किया। चुनाव से पहले दिग्विजय सिंह ने कहा था,कि जिन 60 सीटों पर कभी कांग्रेस चुनाव नहीं जीती उन्हें जीताने की जवाबदारी मेरी है। हैरानी वाली बात है, कि ऐसी सीटों को जीताने के लिए कुछ किया नहीं। प्रदेश में सत्ता परिवर्तन की लहर है यही कहते रहे। बाहर इसका शोर था। लेकिन अंदर लाड़ली बहन का करेंट तेज है, कांग्रेस के बड़े नेता नहीं भाप सके। मध्यप्रदेश में कांग्रेस अनाथ रही.. कमलनाथ मुख्यमंत्री बनने के बाद छिंदवाड़ा,भोपाल और इंदौर से कहीं बाहर नहीं गए। दिग्विजय सिंह के प्रति अब भी जनता में रोष है। कमलानाथ जिले में पार्टी संगठन का ढांचा नहीं खड़ा कर सके। जिले में कांग्रेस के पास जमीनी कार्य कर्ता नहीं है। कमलनाथ और दिग्विजय सिंह की लोकप्रियता गिर गयी है। मीडिया में कमलनाथ और दिग्विजय सिंह को जय वीरू की जोड़ी का नाम मिला। वहीं आपसी गुटबाजी और बड़े नेताओं के बीच आपसी खींचतान मीडिया में दिखा। सवाल यह है कि कमलनाथ ने अपने सर्वे के आधार पर उन्हें ही टिकट दी जो चुनाव जीत रहे हैं, फिर गलती कहां हो गई? दरअसल लाड़ली बहना योजना का अंडर करेंट इतना भयावह निकला कि पंजा चारो खाने चित हो गया। कांग्रेस के घोषणा पत्र में उसी बात का जिक्र था, जिसे शिवराज चुनाव से पहले की पूरा कर दिये थे। कमलनाथ का सर्वे भाजपा को 85 सीट से ज्यादा नहीं दे रहा था,स्थिति ठीक उल्टी हो गयी कांग्रेस की। प्रदेश में कमलनाथ का सियासी प्रचार तंत्र कमजोर रहा। कई संभाग में बड़े नेता एक बार भी नहीं गये। संघ ने पूरे प्रदेश में एक लाख से अधिक बैठकें की चुनाव से पहले। उसने जनता की नब्ज को परखा। कई उम्मीदवारों को टिकट संघ के कहने पर मिला। मध्यप्रदेश में कांग्रेस के पास जनाधार वाले नेताओं की कमी है। दिग्विजय सिंह को रिटायर हो जाना चाहिए। वहीं छत्तीसगढ़ में भूपेश को अब नए सिरे से कांग्रेस को खड़ा करना चाहिए। राहुल को भी समझना चाहिए कि केवल भारत जोड़ो यात्रा से कांग्रेस उदय नहीं होगा। यदि ऐसा ही लोकसभा में रहा तो सियासी जगत में कांग्रेस इतिहास बन कर रह जाएगी । क्यों कि सन् 2014 के बाद से कांग्रेस की राज्यों से पकड़ कमजोर होती जा रही है। 2004 में 14 राज्यों में कांग्रेस काबिज थी। 2009 में 11 राज्य,2014 में उसकी सत्ता 9 राज्यों तक सिमट गई। 2019 में चुनाव में 6 राज्यों में कांग्रेस की सरकार बनी। लेकिन 2020 में मध्यप्रदेश उसके ‘हाथ’ से निकल गया। 2023 में तीन राज्य हाथ से निकल गये।

डबल इंजन की सरकार,कैसे होगी वादों की नैया पार

"मध्यप्रदेश,छत्तीसगढ़ और राजस्थान में सोशल इंजीनियरिंग की रणनीति को अंजाम दिया गया है। अब पिछड़ों के कंधे पर सवार होकर बीजेपी लोकसभा चुनाव फतह करना चाहती है। तीनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों को मोदी की गारंटी को लोकसभा चुनाव से पहले पूरा करके बताना है, कि उनके राज्य में अच्छे दिन आ गए हैं। सवाल यह है कि चुनौती के सागर पर वादों की स्टीमर कैसे चलेगी। मोदी की गारंटी पर विपक्ष की नजर है, कि कहीं यह जुमला बनकर न रह जाए।" 0 रमेश कुमार ‘रिपु’
मोदी की गारंटी के दम पर भाजपा मध्यप्रदेश,छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भगवा रंग में रंग गयी। सियासत का सिंकदर एक बर फिर बन कर मोदी उभरे। अब सवाल यह है कि मुख्यमंत्री डाॅ मोहन यादव,विष्णु देव साय और भजन शर्मा किस तरह अपने प्रदेश में अच्छे दिन लाते हैं। इसलिए कि इनके सामने चुनौतियों का पहाड़ है। खास कर तीनों राज्यों की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। मध्यप्रदेश पर सन् 2019 में 195178 करोड़ कर्ज था जो सन् 2023 में बढ़कर 378617 करोड़ हो गया है। यानी प्रति व्यक्ति कर्ज 43731 रुपए है। प्रति व्यक्ति आय 140583 रुपए है। राजस्थान पर कर्ज का बोझ बढ़ता गया। सन् 2019 में 31184 करोड़ था जो सन् 2023 में बढ़कर 537012 करोड़ हो गया। यानी प्रति व्यक्ति ऋण 66277 रुपए है। प्रति व्यक्ति आय 156149 रुपए है। छत्तीसगढ़ पर सन् 2019 में 68988 करोड़ रुपए का कर्ज था जो सन् 2023 में बढ़कर 118166 करोड़ हो गया। प्रति व्यक्ति पर ऋण 39154 रुपए है। और प्रति व्यक्ति आय 133898 रुपए है। तीनों राज्यों में डबल इंजन की सरकार है। रेवड़ी किस राज्य पर भारी होगी यह भी बड़ा सवाल है। साथ ही लोकसभा चुनाव की तैयारी भी। मोहन को बड़ी लकीर खींचनी होगी.. तीनों राज्यों में बने मुख्यमंत्री के पास अनुभव की कमी है। ऐसी स्थिति में राज्य की पस्त माली हालत को बगैर केन्द्र की मदद से बेहतर करना राज्य सरकारों के सामने विकट समस्या है। संसाधन स्वयं के दम पर जुटाने होंगे। चूंकि बीजेपी के संकल्प पत्र में ऐसे कई वादे हैं और मोदी की गारंटी हैं, जो बीजेपी शासित राज्यों के समक्ष चुनौती है,लोकसभा से पहले इन्हें पूरा करना। इसलिए कि तीनों मुख्यमंत्रियों के सामने 2024 का विजन है। मध्यप्रदेश में शिवराज की लोकप्रियता बहुत है। उनके साथ कोई विवाद नहीं रहा। वो जनता के नेता है। उन्हें सत्ता का घमंड कभी नहीं रहा। और यह भी जताने की कभी कोशिश नहीं किया, कि प्रदेश में जो भी है वो उनके दम की वजह से है। हमेशा वे संगठन को लेकर चले। वो आज मुख्यमंत्री नहीं हैं, लेकिन बहनों के दिलों में वो बरसों तक रहेंगे। भाजपा को शिवराज की तरह ऐसा नेता मिलना मुश्किल होगा। पार्टी उनका क्या इस्तेमाल करेगी,यह अभी कुछ नहीं कहा जा सकता। वहीं उनकी लोकप्रियता का भी सामना करते हुए डाॅ मोहन यादव को अपनी लकीर खींचनी है। उन्हें ऐसा कुछ करना पड़ेगा, कि जनता शिवराज सिंह को भूले। इसके अलावा प्रहलाद पटेल,कैलाश विजय वर्गीय,वीडी शर्मा,जैसे अनके बड़े नेता हैं। उनसे तालमेल बनाना है। जाहिर सी बात है कि नयी भाजपा को नये तरीके से गढ़ा जा रहा है। सोशल इंजीनियरिंग की रणनीति के तहत डाॅक्टर मोहन यादव को मोदी ने मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री बनाकर बड़ा सियासी मैसेज दिया है। लालू प्रसाद यादव,अखिलेश यादव,तेजस्वी यादव से उन्हें बड़ा बनाना है। केवल ओबीसी वोटों को साधना ही नहीं है। वैसे बीजेपी नए भारत की राजनीति में पिछड़ों की पीठ पर सवार है। मोदी ने ओबीसी और दलित कार्ड खेलकर विभिन्न पार्टियों के जुड़े दिग्गजों को चुनौती दी है। राजेन्द्र शुक्ला ब्राम्हण,जगदीश देवड़ा दलित को उप मुख्यमंत्री और नरेन्द सिंह तोमर को विधान सभा अध्यक्ष बनाकर मोदी ने सोशल इंजीनियरिंग की रणनीति का इस्तेमाल किया है। ऐसा ही छत्तीसगढ़ और राजस्थान में किया है। राजस्थान में भजन शर्मा मुख्यमंत्री हैं और छत्तीसगढ़ में विजय शर्मा उप मुख्यमंत्री अरूण साव ओबीसी और विष्णुदेव साय आदिवासी के बड़े नेता है। सामाजिक विस्तार की बीजेपी की योजना नई नहीं है। लेकिन इसकी उम्मीद किसी को नहीं थी कि ऐसा होगा। देश की राजनीति में जाति का असर इतना प्रभावी है कि मोदी अपने भाषणों में कई बार यादवों सहित सभी ओबीसी जातियों को आकर्षित करने के लिए खुद निसंकोच पिछड़ी जाति का बताया। लालू और नीतिश की राजनीति की काट पेश करने के लिए मोदी ने तीनों राज्यों में ऐसा किया है। विभिन्न जातियों को एक सामाजिक गठजोड़ तैयार करना चाहते हैं,ताकि चुनाव में बहुमत हासिल किया जा सके। मोहन के समक्ष चुनौतियां.. मोहन यादव कैसे अखिलेश यादव और लालू प्रसाद यादव, नीतिश कुमार की सियासी रेखा से बड़ी रेखा खींचते हैं,बीजेपी भी नहीं जानती। इसलिए कि उनके समक्ष एक-एक करके बीजेपी के संकल्प पत्रों को पूरा करना है। गेहूं 2700 रुपए प्रति क्विंटल और धान 3100 रुपए प्रति क्विंटल किसानों से खरीदना। गरीब परिवारों को 12वीं तक मुफ्त शिक्षा देना है। गरीब छात्राओं को के.जी. से पी.जी तक मुफ्त शिक्षा। हर परिवार में एक सदस्य को रोजगार या स्वरोजगार देना। लाड़ली बहनों को पक्का मकान और पांच साल गरीबों को मुफ्त राशन देना है। किसानों को सालाना 12000 रुपए देना। 100 रुपए में 100 यूनिट बिजली,450 में गैस सिलेंडर,महिलाओं को हर माह तीन हजार रुपए देना। तेंदूपत्ता के लिए 4000 रुपए प्रति बोरा देना,जन्म से शादी तक बेटी को 2 लाख रुपए देना। इस समय राज्य में मल्टीडाइमेशनल गरीबी 21 फीसदी से ज्यादा है। 2021 के अनुसार 1.82 करोड़ लोग गरीब हैं। बुजुर्गो को 600 रुपए मासिक पेंशन देना है। बढ़ते कर्ज के बीच मोदी की गारंटी को पूरा करना है। सन् 2024 के लिए बजट खर्च 306,103 करोड़ रुपए है। मोहन यादव के समक्ष आर्थिक चुनौतियां बहुत हैं। विष्णु कैसे लाएंगे अच्छे दिन.. छत्तीसगढ़ में बीजेपी की सरकार बनते ही वोटर कहना शुरू कर दिया है कि कौन सा वादे पहले पूरा होना चाहिए। किसान चाहता है, कि रमन सरकार के समय का दो साल का लंबित बोनस उसे जल्द मिल जाए। प्रधान मंत्री आवास के तहत 18 लाख लोगों को छत मिल जाए। महिलाएं चाहती हैं, कि हर महीने महतारी योजना के तहत एक-एक हजार रुपए उनके खाते में आ जाएं। किसानों को धान का समर्थन मूल्य पर 3200 रुपए प्रति क्विंटल मिल जाए।चूंकि प्रदेश में धान खरीदी एक नम्वंबर से चल रही है। तेंदूपत्ता भी 5500 रुपए प्रति बोरा की राशि मिलने लगे। मुफ्त इलाज दस लाख रुपए और गरीबों को सिलेंडर 500 रुपए में चाहिए। भूमिहीन मजूदूरों को सालाना दस हजार रुपए देना। भाजपा की सरकार पूरे पांच साल रहेगी और एक साथ अपने संकल्प पत्र के वादे को पूरा करेगी, इसकी संभावना कम है। ऐसा हुआ तो विपक्ष सरकार को सड़क से विधान सभा तक घेरेगी। भजन के सामने चुनौती... समाजिक और आर्थिक आंकड़ों को एक तरफ रखकर इस बार चुनाव की नयी परिभाषा मोदी की गारंटी के रूप में सामने आई। राजस्थान में रोटी बदलने का वैसे भी रिवाज है। लेकिन बदलाव की सत्ता जिस तरह मोदी की गारंटी ने लिखी,उसे चुनौती नहीं दी जा सकती। लेकिन राजस्थान में इस बार गहलोत सरकार की उपलब्धि को दरकिनार करते हुए भाजपा ने केवल जाति और संस्कृति के गणित को ही समाने नहीं रखा, बल्कि विकास के सिद्धांत को भी रखा। लोगों की जरूरतों को अहमियत दी। जनता की सेवा करने वाली सरकार बताने के लिए संकल्प पत्र में ऐसे कई वादों को जोड़ा गया है, जो मुख्यमंत्री भजन शर्मा के सामने चुनौती बनकर खड़े हैं। 12वीं पास मेघावी छात्रों को मुफ्त स्कूटी। छात्रों को के.जी से पीजी तक मुफ्त शिक्षा। गरीब परिवारों को 400 रुपयों में गैस सिलेंडर।एआइआइएमएस की तर्ज पर आइआइटी की तर्ज पर काॅलेज का निर्माण। मातृ वंदन की राशि 4000 हजार से बढ़ाकर 8000 रुपए करना। बेटी के जन्म पर दो लाख रुपए का बांड। एसआइटी से पेपर लीक की जांच। 2.5 लाख युवाओं को सरकारी नौकरी। किसानों को सलाना 12 हजार रुपए देना। सवाल यह है कि इन तीन राज्यों की जनता को उक्त लाभ मिलेंगे तो भाजपा शासित अन्य राज्यों में नहीं मिलने से क्या,वहां की जनता आवाज नहीं उठाएगी। फिर रेवड़ी कल्चर की राजनीति का क्या होगा। सवाल यह है,कि चुनौती के सागर पर वादों की स्टीमर कैसे चलेगी। मोदी की गारंटी पर विपक्ष की नजर है, कि कहीं यह जुमला बनकर न रह जाए।