Wednesday, June 19, 2019

पत्रकारिता का पतन...


यकीन नहीं होता पर देख कर यकीन करना ही पड़ेगा। कुछ लोग पत्रकारिता का पतन करने का ठेका ले रखा है। बात करते है संवेदना की और खुद कोई पत्रकार संवेदनहीन हो जाये तो बड़ी शर्म आती है। आज तक की रिपोर्टर अंजना ओम कश्यप को इतनी भी तमीज नहीं है कि कोई डाॅक्टर मौत के कगार पर खड़े बच्चों के इलाज में जुटा है तो, उससे सवाल दर सवाल करना चाहिए कि नहीं? अंजना को इतनी तो समझ होनी चाहिए कि एक डाॅक्टर सिर्फ इलाज करता है,व्यवस्था नहीं करता है। अस्पताल में मरीजों के लिए बेड की व्यवस्था अस्पताल प्रशासन करता है। अस्पताल का अधीक्षक की जवाबदेही होती है। प्रदेश के मुख्यमंत्री की जवाबदेही होती है। सरकार की होती है। लेकिन बिहार में चमकी बीमारी से बेहाल बच्चों के इलाज में जुटे एक चिकित्सक से कल वो लाइव सवाल कर रहीं थी,अभी जो बच्चा आया है,उसे कहां भर्ती करेंगे। बिस्तर तो है नहीं। कहां रखेंगे। आईसीयू में क्यों सीधे भर्ती नहीं कर रहे हैं। बेड यहां है नहीं,फिर बच्चे को किस बेड में रखोगे।
वो डाॅक्टर बार बार कह रहा है अभी जो बच्चा आया है, उसे नर्स देख रही है। और भी बच्चें हैं, आप देख रही हैं उन्हें भी इलाज की जरूरत है। एक एक करके देख रहे हैं। लेकिन अंजना ओम कश्यप न जाने किस हैसियत से उसे लताड़ रही थीं। मानो उस डाॅक्टर से बड़ी डाॅक्टर हैं। उन्हें सब कुछ पता है कि डाॅक्टर के इलाज में क्या खामियां है।
उनके सवाल देखिये, अभी अभी सी.एम यहां से गये हैं,यह आपकी व्यवस्था है। आप को पता होना चाहिए कि बच्चे को कौन सा इलाज तत्काल देना चाहिए। बताइये अभी तक कितने बच्चे मर चुके है। चिकित्सक ने कहा,आप विभाग में नीचे जाकर इसकी जानकारी ले सकती हैं। यह आईसीयू है। लेकिन अंजना उस डॅाक्टर को बीमार बच्चे की इलाज में रूकावट लगतार डाल रही थीं,उन्हें अपनी टीआरपी की पड़ी थी। अपनी पत्रकारिता झाड़ रही थीं। सच्चाई तो यह है कि आज तक का लेबल जब तक है, तभी तक उनकी पत्रकारिता है। उनकी पत्रकारिता कैसी है सारा देश कल देखा। सबने थू थू किया। ऐसे लोगों को यह समझ नहीं है कि कब, कहां,क्या सवाल करना चाहिए। पत्रकारिता ऐसे लोगों की हरकत से ही कलंकित हुई है।

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