Monday, May 2, 2022

शांत होती दहाड़

       








मध्यप्रदेश में 42 बाघों की मौत पर हाई कोर्ट ने केन्द्र और राज्य सरकार से जवाब तलब किया है। देश भर में कुल 120 बाघों की मौत हुई है। मध्यप्रदेश ने सन् 2019 में कर्नाटक से से टाइगर स्टेट का दर्जा छीना था। अब जिसके खोने का खतरा है।  
0 रमेश कुमार ‘रिपु’
            मध्यप्रदेश से टाइगर स्टेट का दर्जा एक बार फिर छिन जाने का खतरा मडरा रहा है। इसलिए कि सन् 2021 में 42 टाइगर की मौत पर हाई कोर्ट ने केन्द्र सरकार और राज्य सरकार को नोटिस देकर जवाब मांगा है। सन् 2019 में प्रदेश में 526 बाघ थे। जबकि कर्नाटक में 524 थे। कर्नाटक में 2021 में 15 बाघों की मौत हुई जबकि मध्यप्रदेश में 42 बाधों की मौत हुई है। वहीं देश भर में 120 बाघों की मौत हुई है।
वन्य जीव कार्यकत्र्ता अजय दुबे की जन हित याचिका पर सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश रवि विजय कुमार मलिमथ और जस्टिस विजय कुमार शुक्ला की बेंच ने 22 नवम्बर 2021 को राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण और राज्य सरकार को बाघों की मौत की वजह को विस्तृत जानकारी देने नोटिस जारी किया था। याचिका दाखिल करने के बाद भी छह और बाघों की मौत हुई हैै। जिससे यह संख्या बढ़कर 42 तक पहुंच गई है।    सवाल यह है कि प्रदेश में इतनी संख्या में बाघ मर क्यों रहे हैं? वन विभाग का मानना है, कि अवैध शिकार का ऐसा कोई संगठित गिरोह सामने नहीं आया है। ज्यादातर मामले में बाघों की मौत बिजली के झटके लगने से होती है। जबकि पन्ना में कई बाघों को जहर देकर मारने की भी घटना घटी है।
तीन साल में 93 बाघ मरे
कांग्रेस विधायक सतीश सिकरवार द्वारा विधानसभा में उठाये गये सवाल पर वन मंत्री कुंवर विजय शाह ने बताया कि मध्यप्रदेश में एक जनवरी 2018 से जनवरी 2021 की अवधि में बाघ अभयारण्यों राष्ट्रीय उद्यानों एवं वन्यप्राणी अभयारण्यों में 93 बाघों की मौत हुई है। इनमें से 25 बाघों की मृत्यु अवैध शिकार एवं शेष बाघों की मृत्यु प्राकृतिक कारणों जैसे बीमारी आपसी लड़ाई वृद्धावस्था आदि के कारण हुई है। इस अवधि में बाघों के शिकार के 25 प्रकरण दर्ज किये गये हैं जिनमें अभी तक 77 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है। मध्यप्रदेश में पिछले तीन सालों में 93 बाघों के मौत हुई है।
कहाँं कितने बाघ मरे
प्रदेश में 526 बाघों का घर था। यहाँं सबसे अधिक 42 बाघों की मौत हुई है। इसके बाद महाराष्ट्र में जहां 312 बाघ थे, यहां 26 बाघों ने अपनी जान से हाथ धोया। कर्नाटक जो कि 524 बाघों की मेजबानी करता है, वहां 15 बाघ काल के गाल में समा गए। उत्तर प्रदेश जहांँ लगभग 173 बाघ थे, उनमें से 9 मौतें दर्ज की गई हैं।17 सितंबर 2021 के बाद कर्नाटक में एक भी बाघ की मौत होना नहीं पाया गया। जबकि मध्य प्रदेश में आठ महीने में 31 बाघों की जान जा चुकी है। कुछ का शिकार किया गया तो कुछ स्वाभाविक मौत मरे। इसमें सबसे ज्यादा 18 मौतें टाइगर रिजर्व क्षेत्र में हुई हैं। हाल ही में रातापानी सेंचुरी में भी 2 बाघों के शव मिले थे।
पीसीसीएफवाइल्ड लाइफ आलोक कुमार कहते हैं इससे इंकार नहीं है कि प्रदेश में बाघों की संख्या बड़ी तेजी से बड़ी भी है। इस वजह से उनमें टेरिटोरियल फाइट होती है। इसमें कमजोर बाघ घायल होकर या तो इलाका छोड़ देता है या मर जाता है। यह प्राकृतिक है। टेरिटोरियल फाइट रोकने के लिए सेंचुरी बनाकर नए इलाके की संभावनाओं को तलाशा जा रहा है।
बाघ का शिकार क्यों
कान्हा कुछ समय शिकार के लिए सुर्खियों में था। कुछ साल पहले मुक्की गेट के समीप एक शेर को जहर देकर मारने की खबर से कान्हा कई दिनों तक सुर्खियों में था। एक विदेशी पर्यटक ने एक शिकारी की वीडियों टेप पेश किया तो पूरे मोहकमें में हड़कंप मच गया था। इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि प्रदेश के सभी राष्ट्रीय उद्यान और अभ्यारण्यों में शिकार हो रहे हैं। बाघ और शेरों का शिकार इसलिए होता है कि इन जानवरों के शरीर का हर हिस्सा अन्तरराष्ट्रीय बाजार में भारी  कीमतों में बिकता है। पैसे की चाहत में निरीह और मूक जानवरों की मौत के सौदागर प्राकृतिक संतुलन बिगाड़ रहे हैं। जरूरी है कि विलुप्त हो रहे वन्य प्राणियों का शिकार करने वालों के खिलाफ और कड़े कानून बनाये जायें। साथ ही जंगली जानवरों का शिकार करने वालों को सजा नहंी मौत की सजा दी जानी चाहिए,तभी जंगली जानवरों के प्राणों की रक्षा हो सकेगी।
वन विभाग लापरवाह
जंगली जानवरों की घटती तादाद की मुख्य दो वजह है। वन विभाग का अमला अपनी जिम्मेदारी ठीक से नही निभा पा रहा है। दूसरी यह कि उनका शिकार भी जारी है। जब कहीं कोई मृत बाघ मिलता है तो,वन विभाग का अमला उस घटना पर लीपापोती ही करता है। इस कारण भी शिकारियों के हौसले बुलंद है। हाल ही में नेशनल टाइगर सरंक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) ने कहा,’’मृत बाघों का पोस्टमार्टम तब तक नहंी किया जा सकेगा,जब तक कि पोस्टमार्टम करने वाली टीम मे ंउसका कोई प्रतिनिधि मौजूद नहीं होगा। इसका मतलब यह है कि एनटीसीए की नजरों में हमारे वन विभाग की विश्वसनीयता संदिग्ध है।
वन्य प्राणी अधिनियम 1972 की धारा 9,16,38,52 के तहत यदि कोई बाघ,तेंदुआ या फिर किसी अन्य जंगली जानवर को मारता है तो एक से छह साल की सजा और जुर्माना किया जाता है। लेकिन ऐसा बहुत कम होता है कि अवैध शिकार करने वाले पकड़े जायें।

गौर तलब है कि पन्ना टाइगर रिजर्व में फरवरी 2009 में बाघ विहीन हो गया था। यहां बाघों के कुनबे को बढ़ाने के लिए दो अलग-अलग टाइगर रिजर्व से बाघ-बाघिनों को शिफ्ट किया गया। इसके करीब ढाई साल बाद जंगल में अप्रैल 2012 में एक बाघिन ने 4 शावकों को जन्म दिया। इसके बाद यहां बाघों का कुनबा लगातार बढ़ता गया। वर्तमान में पन्ना में 31 ये अधिक बाघ हैं।
नई सेंचुरी नहीं बने
एक और बाघों की मौत की मूल वजह का पता नहीं चल सका है। लेकिन देखा गया है कि बाघों की मौत को दबाने के लिए हर बार एक घोषणा कर दी जाती है। बाघों को शिकार न हो इसके लिए सुरक्षा के उपाय बेहतर होने की बजाय कमजोर होते हैं। नवंबर में सिंगरौली जिले में रेडियो-काॅलर वाली एक बाघिन शिकार किया गया था। अजय दुबे कहते हैं,बाघों की मौतों और अवैध शिकार के मामले में वन विभाग की ओर से अभियोजन सुनिश्चित किए जाने में विफलता की वजह से मैने जनहित याचिका दायर की।
हाल ही में वन मंत्री विजय शाह ने बुंदेलखंड में नई सेंचुरी घोषित की। जबकि कांग्रेस सरकार की प्रस्तावित 9 सेंचुरी की प्रक्रिया ठंडे बस्ते में पड़ी हुई है। इसमें सीहोर की सरदार वल्लभ भाई सेंचुरी भी शामिल है।
पुलिस के टाइगर सेल और वन विभाग के बीच समय-समय पर शिकारियों पर अंकुश लगाने रणनीति भी बनती है। मगर हालात जस के तस हैं। हालांकि पंजीबद्व अपराधों में आंकड़ो की बाजीगरी की वजह से वन्य प्राणियों के शिकार में कमी परिलिक्षित होती है। लेकिन सच्चाई यह नहीं है। चैंकाने वाली बात यह है, कि पुलिस के पास दर्ज मामले से कहीं ज्यादा वन्य प्राणियों का चोरी छिपे शिकार हो रहा है। इधर टाइगर सेल से जुड़े एक अधिकारी के अनुसार, वन्य प्राणियों की सुरक्षा के लिए वन अमले के साथ संयुक्त अभियान चलाया जाना जरूरी है। बहरहाल सिर्फ बाघ ही नहीं तेंदूआ पर भी संकट शिकारियों का मंडरा रहा है। समय रहते यदि बाघ और तेदूंआ के संरक्षण की दिशा में पहल नहीं की गई तो वो दिन दूर नहीं हैं जब कई नेशनल पार्क बाघ विहीन हो जायेंगे।
   
 

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