Tuesday, November 26, 2024

अब हिन्दुस्तान में मोदिस्तान,कांग्रेस का अवसान

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रमेश कुमार ‘रिपु’ महाराष्ट्र की राजनीति में उद्धव ठाकरे की राजनीति पर्दे के पीछे चली गयी। ठाकरे वाद खत्म होने के कगार पर पहुंच गया। इस चुनाव में बीजेपी केा मिली सीट बताती है कि यदि वो और सीटों पर चुनाव लड़ती तो खुद अपनी पार्टी की सरकार बना लेेती। किसी की जरूरत उसे नहीं पड़ती। नरेन्द्र मोदी के प्रति जुनून तारी है। उनके पैतरे के आगे सारे चित होते जा रहे हैं। नरेन्द्र मोदी के रथ को रोकने की हिम्मत अब किसी में नहीं है। अटल की बीजेपी अब मोदी की बीजेपी है। जो कहते थे 2024 के परिणाम से कि अब मोदी युग खत्म होने के कगार पर है। हरियाणा,महाराष्ट्र,झारखंड चुनाव मोदी की अग्नि परीक्षा है। सच तो यह है कि हिन्दुस्तान में अब मोदिस्तान है। कांग्रेस अवसान पर है। देश के लोगों केा लगता है मोदी ही हर समस्या का हल हैं। महाराष्ट्र में कांग्रेस का पंजा गिर गया। यह होना था। क्यों कि उसे चुनाव लड़ना नहीं आता। मोदी साल भर चुनाव लड़ते हैं। और कांग्रेस चुनाव के वक्त चुनाव की तैयारी करती है। हरियाणा,झारखंड और महाराष्ट्र के चुनाव परिणाम बता रहे हैं राहुल राजनीति में अर्द्ध विराम हो गए हैं। प्रियंका गांधी वायनाड से राहुल गांधी से अधिक मतों से चुनाव जीती हैं। आगे चलकर वो राहुल के सियासी मार्ग में बाधक बन सकती हैं। जिस गति से कांगे्रस के हाथ से राज्य निकलते जा रहे हैं,आने वाले समय में कांग्रेस एक सियासी इतिहास बन कर रह जाएगी। एक थी कांग्रेस। कटेंगे-बंटेगे नारा का भी असर रहा छत्तीसगढ़ माॅडल हरियाणा में दिखा। हरियाणा माॅडल महाराष्ट्र में दिखा। झारखंड में चूंकि डबल इंजन की सरकार नहीं है। इसलिए वहां हरियाणा माॅडल नहीं दिखा। इन तीन राज्यों में चुनाव में एक बात कामन रही। लाड़ली बहना योजना। महाराष्ट्र में साढ़े तीन करोड़ महिलाओं को लाड़ली बहना योजना के तहत राशि दी जा रही है। महाराष्ट्र चुनाव के परिणाम से संजय राउत,पवन खेड़ा आदि नेता संतुष्ट नहंीं है। संजय राउत का यह कहना कि शिंदे के उम्ममीदवार इतनी संख्या में कैसे जीत सकते हैं। यह परिणाम जनता का हो ही नहीं सकता। यह ईवीएम और सरकार का है। हरियाणा में जनता बीजेपी के लोगों को गांवों घुसने नहीं दे रही थी। फिर भी वहां बीजेपी तीसरी बार सरकार बना ली। हरियाणा की तरह महाराष्ट्र में कई सारी ईवीएम मशीन की बैटरी 99 फीसदी चार्ज बताया। यदि वोट पड़ें हैं तो बैटरी फुल कैसे हो सकती है। जाहिर सी बात है कि कहीं न कहीं कुछ तो गड़बड़ है। महाराष्ट्र में असली शिवसेना और असली एनसीपी कौन है इस चुनाव ने बता दिया। महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के दौरान ही बंटेंगे तो कटेंगे नारा खूब चर्चा में रहा। यूपी के सीएम योगी ने इस नारे को महाराष्ट्र विधानसभा में चुनाव प्रचार के दौरान खूब इस्तेमाल किया। ऐसा माना गया कि यह नारा हिंदू समुदाय की अलग अलग जातियों को एक करने के लिए था। तो बीजेपी अकेले सरकार बना लेती महाराष्ट्र की राजनीति में उद्धव ठाकरे की राजनीति पर्दे के पीछे चली गयी। ठाकरे वाद खत्म होने के कगार पर पहुंच गया। इस चुनाव में बीजेपी केा मिली सीट बताती है कि यदि वो और सीटों पर चुनाव लड़ती तो खुद अपनी पार्टी की सरकार बना लेेती। किसी की जरूरत उसे नहीं पड़ती। कांग्रेस 101 सीट पर चुनाव लड़ी उसे 16 सीट मिली। उद्धव ठाकरे की शिवसेना 95 सीट पर और जीती 20 सीट। शरद पवार कल तक महाराष्ट्र की राजनीति के बहुत बड़े उलट फेर वाले नेता माने जाते थे, उनकी पार्टी दस सीट पर सिमट गयी।बीजेपी 148 सीट पर चुनाव लड़ी 132 सीट पाई। एकनाथ शिंदे की शिवसेना 81 सीट पर चुनाव लड़ी और 57 सीट पाई। अजीत पवार की एनसीपी 69 सीट पर चुनाव लड़ी और 41 सीट पाई। देवेंद्र फडणवीस ने चुनाव से पहले कहा कि वो मैं आधुनिक अभिमन्यू हॅूं हर चक्रव्यूह भेदना जानता हॅूं। जाहिर सी बात है महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री यही बनेंगे। कांग्रेस के लिए महाराष्ट्र की हार किसी बड़े झटके से कम नहीं है।क्योंकि अभी हाल ही में उसे हरियाणा विधानसभा चुनाव में शिकस्त का सामना करना पड़ा था।झारखंड में चुनाव के दौरान बीजेपी ने कथित बांग्लादेशी घुसपैठियों का मुद्दा मजबूती से उठाया। लेकिन सफलता नहीं मिली। नायडू-नीतीश सोचेंगे नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू के भरोसे भले केंद्र में मोदी सरकार चल रही है। लेकिन लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा को मिल रही लगातार जीत से समीकरण बदलेगा। ऐसे में नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू मोदी सरकार से अब बहुत तोलमोल करने से पहले दस बार सोचेंगे। महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में भी भाजपा ने मोदी की लोकप्रियता और नीतियों के अधार पर ही चुनाव लड़ा। ऐसे में महाराष्ट्र में बीजेपी की जीत को मोदी की जीत बताया जा रहा है। ऐसे में भाजपा के अंदर अब मोदी का रुतबा और मजबूत होगा। क्योंकि लोकसभा चुनाव के बाद मोदी की लोकप्रियता पर सवाल खड़े होने लगे थे। उद्धव ठाकरे को भारी पड़ा यह माना जा रहा है कि शिवसेना के मूल विचारों से कटना ही उद्धव ठाकरे को भारी पड़ा और अपने गढ़ मुंबई ठाणे और कोंकण में भी वह एकनाथ शिंदे से बुरी तरह पिछड़ गए। दूसरी ओर शरद पवार की पार्टी के नेता भी अजीत पवार पर पार्टी का नाम और चुनाव चिन्ह हथियाने का आरोप लगाते रहे। लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी को इन आरोपों का फायदा भी मिला। लेकिन विधानसभा चुनाव में उन्हें भी मुंह की खानी पड़ी है। अणुशक्ति नगर विधानसभा से स्वरा भास्कर के पति फहद अहमद चुनावी मैदान में हैं। उन्हें एनसीपी शरद पवार ने टिकट दिया था फहाद अहमद का मुकाबला एनसीपी अजित पवारद्ध की प्रत्याशी और नवाब मलिक की बेटी सना मलिक से था। नतीजों में अपने पति के हार के बाद स्वारा ने ईवीएम पर सवाल उठाते हुए चुनाव आयोग से जवाब मांगा। EVM 99 फीसदी कैसे चार्ज स्वरा भास्कर ने ट्वीट करके कहा है कि पूरा दिन वोट होने के बावजूद म्टड मशीन 99 फीसदी कैसे चार्ज हो सकती है।इलेक्शन कमीशन जवाब दे। अणुशक्ति नगर विधानसभा में जैसे ही 99फीसदी चार्ज मशीने खुली उसके बीजेपी समर्थित एनसीपी को वोट मिलने लगे। आखिरी कैसे? स्वरा भास्कर के इस पोस्ट के बाद विपक्ष के अन्य नेता भी ऐसे सवाल चुनाव आयोग से पूछ सकते हैं। बहरहाल चुनाव परिणाम आ गया है आरोप प्रत्यारोप की सियासत चलती रहेगी। लेकिन लोकसभा के बाद विधान सभा चुनाव ने बता दिया कि सियासत का सिंकदर कौन है। फिर भी अच्छे दिन अभी नहीं आए हैं,और उन्हें लाना चाहिए।

भगवा छतरी झारखंड में इन वजहों से नहीं तनी

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‘‘झारखड को बीजेपी हाईकमान समझ नहीं पाया। वो घुसपैठिये का मुद्दा पूरे चुनाव में उछालते रहे। जनता इस ओर ध्यान ही नहीं दी। वहीं बीजेपी का चुनावी मैनेजमेंट बहुत कमजोर रहा। टिकट वितरण में बागियों को नहीं समझा सके। आदिवासी वोटरों को लुभाने में बीजेपी पिछड़ गयी। राज्य में लाड़ली बहना योजना ने इंडिया गंठबंधन को छह लाख अधिक वोट दिलाया। हरियाणा फंडा झारखंड में काम नहीं आया।’’ रमेश कुमार ‘रिपु’ महाराष्ट्र में महायुति रिकार्ड मतों से जीती मगर झारखड में बीजेपी सारे दांव अपना कर भी नहीं जीत सकी। ऐसा कौन सी वजह रही है जिस वजह से भगवा छतरी नहीं तनी। बीजेपी का केंद्रीय नेतृत्व को हैरान है कि राज्य में आक्रामक चुनाव प्रचार अभियान के बाद भी आखिर पार्टी की इतनी करारी हार कैसे हो गयी। 81 सीटों वाले झारखंड में एनडीए को 22 जबकि इंडिया गठबंधन ने 56 सीटें मिली। जबकि अंत तक यही माना जा रहा था कि चुनावी लड़ाई में बीजेपी का पलड़ा भारी है। जमीनी मुद्दों को समझ नहीं पाए झारखंड में बीजेपी का सह प्रभारी बनने के बाद हिमंता बिस्वा सरमा ने झारखंड के संथाल परगना इलाके में कथित रूप से बांग्लादेशी घुसपैठ की बात को जोर शोर से उठाया। अन्य बीजेपी नेताओं ने लव और लैंड जिहाद की बात की। यह दावा किया कि झारखंड के आदिवासी इलाकों में बांग्लादेशी घुसपैठिये आ रहे हैं। यहां की आदिवासी महिलाओं से शादी कर उनकी संपत्ति हड़प रहे हैं। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी चुनावी सभाओं में घुसपैठ के मुद्दे को उठाया था। लेकिन यहां के वोटर इसे मुद्दा ही नहीं माना। और नाराज होकर इंडिया गंठबंधन को वोट कर दिया। बीजेपी की रणनीति ध्वस्त बीजेपी ने चुनाव प्रचार के दौरान आदिवासियों की रोटी, माटी,बेटी की हिफाजत को सबसे बड़ा मुद्दा बनाया। बाकी मुद्दों को बीजेपी ने पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। चुनाव नतीजों से पता चलता है कि संथाल परगना इलाके में बीजेपी की यह रणनीति पूरी तरह ध्वस्त हो गयी। बीजेपी खाता भी नहीं खोल पाई। हालांकि उत्तरी छोटा नागपुर इलाके में पार्टी को थोड़ा सा फायदा हुआ। यहां 25 में से 14 सीटें बीजेपी और उसके सहयोगी दलों को मिलीं। घुसपैठिये तक सिमटी बीजेपी इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि झारखंड के चुनाव में बीजेपी के पास कई मुद्दे थे। जिन्हें वह उठा सकती थी। जैसे बेरोजगारी, नौकरियों की कमी, हेमंत सोरेन के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप, सोरेन सरकार के मंत्री आलमगीर आलम से धन की बरामदगी, भर्ती परीक्षाओं के दौरान उम्मीदवारों की मौत। लेकिन वह जनता से जुड़े मुद्दों को हाशिये पर रख कर सारा ध्यान घुसपैठ पर ही केंद्रित किया। जयराम ने नुकसान पहुंचाया महतो समुदाय के उभरते हुए नेता जयराम महतो ने कई विधानसभा सीटों पर बीजेपी और एनडीए को नुकसान पहुंचाया। महतो की पार्टी झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा को कम से कम 11 सीटों सिल्ली, बोकारो, गोमिया, गिरिडीह, टुंडी, इचागढ़, तमार,चक्रधरपुर, चंदनकियारी, कांके और खरसावां पर मिले वोट पर हार जीत के अंतर ज्यादा हैं। सिर्फ एक सीट डुमरी में इसने झामुमो को नुकसान पहुंचाया। डुमरी सीट से जयराम महतो चुनाव जीते हैं।जयराम महतो के राजनीति में आने की वजह से सबसे ज्यादा नुकसान बीजेपी की सहयोगी पार्टी आल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन (आजसू) को हुआ है। आजसू को इस चुनाव में सिर्फ एक सीट पर जीत मिली। जबकि 2019 में उसने दो सीटें जीती थी। चुनाव में आजसू के प्रमुख सुदेश महतो खुद भी सिल्ली विधानसभा सीट से चुनाव हार गए। मैय्या सम्मान योजना झारखंड में मैय्या सम्मान योजना बीजेपी के हार की सबसे बड़ी वजह थी। छह लाख वोट महिलाओं के ज्यादा पड़े पुरुषों की तुलना में। चुनाव में 91.16 लाख महिलाओं ने जबकि 85.64 पुरुषों ने वोट डाला। इस लिहाज से महिलाओं ने करीब 6 लाख वोट ज्यादा डाले। इस योजना के तहत 21 से 49 साल की महिलाओं को हर महीने 1000 रुपए दिए जाते हैं। झामुमो ने मैय्या सम्मान योजना का चेहरा हेमंत सोरेन की पत्नी कल्पना मुर्मू सोरेन को बनाया। कल्पना ने इस योजना को झारखंड की महिलाओं के बीच में पहुंचाने के लिए पूरे राज्य में लगातार बैठकें और सभाएं की। आरक्षित सीटों पर बीजेपी हारी वैसे बीजेपी आदिवासियों के हक की बातें करती है। लेकिन झारखंड चुनाव में परिणाम बताते हैं कि आदिवासी उससे छिटक गया। झारखंड की विधानसभा में 28 सीटें जबकि लोकसभा की 5 सीटें आरक्षित हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी लोकसभा में आरक्षित पांच सीटों में एक भी नहीं जीती थी। 28 आरक्षित विधानसभा सीटों में से बीजेपी सिर्फ एक सीट पर जीत पाई है। इससे ऐसा लगता है कि आरक्षित सीटों पर बीजेपी को बहुत काम करना है। आदिवासी बीजेपी से दूर झारखंड में फिर से हेमंत सोरेन की सरकार बनने से एक बात साफ है कि आदिवासी समुदाय बीजेपी के साथ नहीं जुड़ पाया। जबकि लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद बीजेपी ने बड़े पैमाने पर आदिवासियों तक पहुंचने की कोशिश की थी। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी भी आदिवासी समुदाय से ही आते हैं। बीजेपी ने आदिवासियों के भगवान कहे जाने वाले बिरसा मुंडा की जयंती को जनजातीय गौरव दिवस के रूप में मनाने का ऐलान किया। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बिरसा मुंडा के जन्म स्थान खूंटी में स्थित उलिहातू पहुंचे थे। झारखंड के आदिवासी वोटर केा अपनी तरफ बीजेपी को करना चाहती है तो यहां उसे और काम करना पड़ेगा। विधानसभा चुनाव में बीजेपी के कई बड़े आदिवासी नेताओं की पत्नियों को चुनाव में हार का सामना करना पड़ा। पूर्व मुख्यमंत्री तथा पूर्व केंद्रीय मंत्री अर्जुन मुंडा की पत्नी मीरा मुंडा, पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा की पत्नी गीता कोड़ा भी चुनाव हार गईं। पूर्व मुख्यमंत्री चंपई सोरेन के बेटे बाबूलाल सोरेन बीजेपी के टिकट पर चुनाव हार गए। इलेक्शन मैनेजमेंट ठीक नहीं हरियाणा चुनाव और महाराष्ट्र चुनाव की तरह बीजेपी का इलेक्शन मैनेजमेंट झारखंड में वैसा नहीं था। इस वजह से बीजेपी वोटरों तक अपना पैठ नहीं बना पाई। इसके अलावा टिकट वितरण को लेकर भी नाराजगी रही। सात विधानसभा सीटों पर पार्टी ने गलत टिकट बांटे। कुछ सीटों पर बीजेपी बागियों से निपटने में भी फेल रही। योगी आदित्यनाथ का कटेंगे तो बंटेगे नारे की खूब चर्चा हुई, लेकिन हिन्दू वोटों को झारखंड में नहीं जोड़ पाई। जिससे बीजेपी यहां हरियाणा और महाराष्ट्र जैसा कामयाब नहीं हो सकी।

Friday, October 18, 2024

जमीन वक्फ की,कब्जा कांग्रेसियों का

रमेश कुमार ‘रिपु’ यूपीए सरकार ने वक्फ बोर्ड को हड़प बोर्ड बना दिया। इसका फायदा कांग्रेसियों ने खूब उठाया। वक्फ की जमीनों पर कब्जा कर घर बना लिए। बाद में पार्टी बदल कर बीजेपी में चले गए। मोदी सरकार ने वक्फ संशोधन बिल संसद में पेश किया तो पता चला कि वक्फ के पास रेल्वे से भी ज्यादा जमीन है। वक्फ संशोधन बिल संसद में पेश करने के बाद पता चला कि वक्फ के पास रेल्वे से भी ज्यादा जमीन है। अल्पसंख्यक कल्याण मंत्रालय ने सन् 2022 में बताया था वक्फ बोर्ड के पास 865644 अचल संपत्तियां हैं। लगभग 9.4 लाख एकड़ वक्फ की जमीनों की अनुमानित कीमत 1.2 लाख करोड़ है। लेकिन देखा जाए तो वक्फ की ज्यादातर जमीनों पर कांग्रेसियों का कब्जा है। इसके अलावा बीजेपी के विधायक और मंत्री भी अपना घर बना रखे हैं। वक्फ की जमीन में अस्पताल और स्कूल बनने चाहिए लेकिन काम्पलेक्स और दुकानें बनी हुई है। हर जिले के वक्फ के अध्यक्ष वक्फ की जमीन पर बने दुकानों से कमाई कर रहे हैं। पूर्व विधान सभा अध्यक्ष का घर वक्फ की जमीनों का मामला हमेशा विवादित रहा है। इस समय 58 हजार से ज्यादा वक्फ की जमीनों के मालिकाना हक से जुड़ी याचिकाएं लंबित हैं। करीब साढे बाहर हजार मामले अलग अलग प्रदेशों में लंबित हैं। वहीं 18 हजार से ज्यादा मामले ट्रिव्यूनल में पेंडिग है। और करीब 165 मामले सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में लबित है। संभागीय मुख्यालय रीवा में अमहिया की जमीन का भी मामला लंबित है। इस मोहल्ले के 131 लोगों को नोटिस दी गयी थी। कई लोग जमानत पर हैं। मध्यप्रदेश के पूर्व विधान सभा अध्यक्ष श्रीनिवास तिवारी का घर भी वक्फ की जमीन पर है। यहां के कई विधायक और नेताओं के भी घर बने हुए हैं।रीवा में 70 एकड़ जमीन वक्फ की है। लेकिन 60 एकड़ जमीन पर राजनीतिक और ओहदेदारों का कब्जा है। भोपाल के आरिफ अकील ने वक्फ की जमीन पर आरिफ नगर बसाया। सिद्धार्थ फंस गए पूर्व विधान सभा अध्यक्ष श्रीनिवास तिवारी के पोते सिद्धार्थ तिवारी जो कि त्योंथर से बीजेपी के विधायक हैं। उन्होंने अमहिया मार्ग के किनारे हाजी बाबा सैय्यद जहूर अली की मजार को सरकारी जमीन पर होने की बात कहकर मुस्लिम समाज को स्वास्थ्य मंत्री राजेन्द्र शुक्ला के खिलाफ करने बयान दिया। इसे उन्होंने लैंड जेहाद कहा। लेकिन दरगाह के लोगों ने जिला प्रशासन के समक्ष कागजात पेश कर दिया कि यह पट्टे की जमीन पर मजार बना है। जो रास्ता छोड़ा गया है वो भी पट्टे की जमीन है। सिद्धार्थ का सांसद जनार्दन मिश्रा से 36 का सियासी रिश्ता होने के चलते उन्होंने डिप्टी सीएम को घेरने की कोशिश की। लेकिन मामला उल्टा पड़ गया है। अब जिला वक्फ कह रहा है, सिद्धार्थ जिसमें रह रहे हैं वो जमीन वक्फ की है। खाली करें। क्यों नये बिल की जरूरत नए बिल की जरूरत इसलिए पढ़ गयी है कि 1954 में सरकार ने जो जमीन वक्फ को दी थी वही उसकी जमीन है। लेकिन देखा गया है कि आज की तारीख में वक्फ ने जबरिया सरकारी जमीनों पर कब्जा कर उसे अपना बना लिया है। यही वजह है कि उसके पास रेल्वे से भी ज्यादा जमीनें हैं। जिन जमीनों पर दावा वो कर रहा है उसके कागजात उसके पास होना चाहिए,लेकिन हैं नहीं। यह बात मोदी सरकार जानती है। यही वजह है कि वो कांग्रेस के शासन में वक्फ को मिले अधिकार को संकुचित करने नया बिल संसद में पेश किया है।यह जरूरी भी है। वक्फ किसी की भी जमीन पर अपना दावा ठोक कर उसे अपना बताता आया है। वक्फ के मामले की सुनवाई भी इतनी आसान नहीं है। वक्फ पर सरकार चाहती है नियंत्रण मोदी सरकार वक्फ बोर्ड के काननू में चालीस तरह के बदलाव करना चाहती है। यदि कानून पास हो गया तो वक्फ बोर्ड में दो अन्य जाति के लोग भी रहेंगे। और यही मुस्लिम समुदाय नहीं चाहता। सेक्शन 9 और 14 में बदलाव कर महिलाओं को महिलाओं को भी जगह दी जाएगी। सरकार वक्फ बोर्ड की संपत्तियों पर अपना नियंत्रण चाहती है। भविष्य में वक्फ की संपत्तियों का आडिट कैग के जरिये होगा। राज्य और केंद्र सरकार वक्फ संपत्तियों में दखल नहीं दे सकती हैं, लेकिन कानून में बदलाव के बाद वक्फ बोर्ड को अपनी संपत्ति जिला मजिस्ट्रेट के दफ्तर में रजिस्टर्ड करानी होगी। ताकि संपत्ति के मालिकाना हक की जांच हो सके।नए बिल के पास होने पर वक्फ की संपत्तियों और उसके राजस्व की जांच जिला मजिस्ट्रेट कर सकेंगे। नए बिल से फायदा यह होगा कि वक्फ ट्रिव्यूनल के फैसले को हाई कोर्ट मे चुनौती दिया जा सकेगा। जब तक कोई जमीन दान में नहीं देगा तब तक वह संपत्ती वक्फ की नहीं होगी भले उस पर मस्जिद ही क्यों न हो। नये बिल का विरोध क्यों मुस्लिम सम्प्रदाय वक्फ के नए बिल का विरोध कर रहे हैं। उसकी वजह यह बताते हैं कि वक्फ की संपत्ति अल्लाह के नाम की संपत्ति है। ऐसे में मोदी सरकार वक्फ के कानून में बदलाव करके वक्फ बोर्ड की स्वतंत्रता और स्वायत्ता छीनना चाहती है। जो कि उचित नहीं है। लेकिन ज्यादातर लोगों का कहना है कि वक्फ के कानून में बदलाव होना चाहिए। इसलिए कि मुस्लिम बाहर से आए हैं। ऐसे में मंदिर से ज्यादा जमीनें उनके पास गलत तरीके से हो गयी है। देखा जाए तो देश में सन् 2009 के बाद वक्फ की संपत्तियों में भारी इजाफा हुआ है। वक्फ बोर्ड के पास 865644 अचल संपत्तियां हैं। लगभग 9.4 लाख एकड़ वक्फ की जमीनों की अनुमानित कीमत 1.2 लाख करोड़ है। छत्तीसगढ़ में अवैध कब्जा छत्तीसगढ़ में वक्फ बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष सलमान रिजवी कहते हैं वक्फ की 90 फीसदी जमीनों पर अवैध तरीके से लोग कब्जा कर रखे हैं। इनकी संपत्तियों पर अवैध कब्जे की विस्तृत जांच होनी चाहिए। ज्यादातर संपत्तियों पर कांग्रेस नेताओं का कब्जा है। छत्तीसगढ़ में वक्फ बोर्ड अवैध तरीके से जमीनों पर कब्जा करके 5000 करोड़ रुपए संपत्ति जुटा ली है। उसके पास दस हजार करोड़ से ज्यादा की संपत्ती है। कांग्रेस की यूपीए सरकार ने वक्फ के मूल अधिनियम में संशोधन लाकर वक्फ बोर्डों को अधिक व्यापक अधिकार प्रदान किए गए थे। इसी वजह से वक्फ बोर्ड बहुत अधिक शक्तिशाली हो गया। उसके अधिकारों पर अंकुश जरूरी है। बहरहाल वक्फ बोर्ड हड़प बोर्ड बन गया है।

लारेंस का आर्डर,कर दिया मर्डर... खतरा टला नहीं

एनसीपी नेता बाबा सिद्दीकी की हत्या ने पूरी मुंबई पुलिस को हिला दी है। लारेंस का आर्डर केवल बाबा सिद्दीकी की हत्या का ही नहीं था बल्कि उनके बेटे जीशान की भी हत्या करने का था। पुलिस इस हत्याकांड के बाद सलमान की सुरक्षा बढ़ा दी है लेकिन यह माना जा रहा है कि मुबई में डी कंपनी के बाद नया डाॅन लारेंस विश्वनोई बन गया है। जो जेल के अंदर से अपने गुर्गो के जरिए लोगों का मरवा रहा है। एक फोन आ जाने की वजह से बाबा सिद्दीकी का बेटा जीशान की जान बच गयी। लेकिन खतरा टल गया है,ऐसा नहीं कहा जा सकता है। जीशान बांद्रा से ही कांग्रेस विधायक हैं। उनके विधानसभा क्षेत्र में री डेवलपमेंट को लेकर विवाद चल रहा था। इस री डेवलपमेंट के तहत झुग्गियों को तोड़कर वहां रह रहे लोगों को हटाया जाना था। इसके विरोध में जीशान ने अनशन भी किया था। इस हत्या को लेकर पुलिस ने अभी तक कोई खुलासा नहीं कर पाई है। लेकिन सोशल मीडिया की पेास्ट से यह अनुमान लगाया जा रहा है कि री डेवलपमेंट के विरोध को लेकर बाबा सिद्दीकी को धमकी दी गई थी। चूंकि बाबा सिद्दीकी हमेशा से ही सलमान के मददगार रहे हैं। ऐसे में हो सकता है कि लारेंस ने अपने गैंग को बाबा सिद्दीकी और जीशान दोनों के मर्डर की जिम्मेदारी दी गई हो। सलमान से दोस्ती तो खैर नहीं लारेंस गैंग का दावा है कि वे सलमान खान से कोई युद्ध नहीं चाहते थे लेकिन बाबा सिद्दिकी की हत्या की वजह उनके दाऊद इब्राहीम और अनुज थापन के साथ संबंध था। बाबा सिद्दीकी का कथित शराफत का चोला पहन कर लोगों को गुमराह करते आए हैं। उनका बीते समय में दाऊद इब्रहिम के साथ मकोका एक्ट में शामिल होने का भी गवाह है। बिश्नोई गैंग का दावा है कि जो कोई भी सलमान खान और दाऊद के गिरोह की मदद करेगा उसे इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी। गैंग की ओर से चेतावनी दी गई है कि अगर कोई उनके भाई को नुकसान पहुंचाएगा तो उसकी खैर नहीं है। बाबा से मांगा बीस करोड़ शिवकुमार गौतम जो कि बहराइच का रहने वाला है।धर्मराज कश्यप भी यही का है। और गुरमैल सिंह. हरियाणा के कौथल का रहने वाला है।तीनों आरोपियों की पहचान हो गयी है। धर्मराज और गुरमैल की गिरफ्तारी हो चुकी है। वहीं शिवा फरार है। बाबा सिद्दीकी मर्डर केस को पुलिस अन्य एंगल से भी तहकीकात कर रही है। कहीं लारेंस मुंबई मंे डी कंपनी की तरह अपना दबदबा कायम करने के लिए तीनों लड़कों को सामने तो नहीं किया। और इस मर्डर में क्या वाकय में लारेंस विश्वनोई के गुर्गो का हाथ है या फिर डी कंपनी का हाथ है। सूत्रों का कहना है कि कुछ दिनों पहले बाबा सिद्दकी को फोन आया था उनसे बीस करोड़ रुपए मांग गए थे। मांगने वाला अपने आप को डी कंपनी का आदमी बता रहा था। सबसे बड़ा डाॅन लारेंस सबसे बड़ा डाॅन बनने की फिराक में है। पुलिस की मानें तो लारेंस विश्नोई अपने जुर्म का साम्राज्य भारत के 11 राज्य और 6 देशों तक फैला लिया है। हर राज्य की जिम्मेदारी अलग-अलग लोग संभालते हैं। कनाडा, पंजाब दिल्ली की कमान गोल्डी बराड़ के पास है। राजस्थान मध्यप्रदेश की कमान रोहित गोदारा के पास है। वहीं पुर्तगाल अमेरिका दिल्लीएनसीआर महाराष्ट्र बिहार पश्विम बंगाल की कमान अनमोल विश्नोई के पास है। हरियाणा उत्तराखंड की कमान काला जठेड़ी के पास है। पूरे गैंग की रिपोर्ट सीधे साबरमती जेल में बंद लारेंस विश्नोई को दी जाती है। बिश्नोई के गैंग में सात सौ शूटर पुलिस की अपनी कहानी है। उसका दावा है कि बिश्नोई गैंग में 700 से ज्यादा शूटर हैं। जिसमें 300 पंजाब के युवा हैं। गौरतलब है कि एक समय लारेंस बिश्नोई का गैंग सिर्फ पंजाब तक सीमित था। धीरे धीरे उसके साथ अपराधिक और बेरेाजगार युवा उससे जुड़ते गए। उसके अपराध का तंत्र फैलने के बाद उसके सम्मोहन में खुद बखुद युवा जुड़ते गए।

Sunday, September 22, 2024

मुँह खोले,दागे गोले,कोई क्या बोले..

‘‘किसी को लोकलाज की चिंता नहीं। लोकतंत्र शर्मिदा होता है,तो होये। नई राजनीतिक भाषा से लोकतंत्र की गरिमा गिरी है। व्यक्तिगत हमले और अमर्यादित भाषाओं का इस्तेमाल करने की होड़ लगी है। संसद में बैठने वालों के भदेश आचारण और गंदी भाषा से एक नई संस्कृति ने आकार लिया है। जबकि सुप्रीम कोर्ट ने हेट स्पीच से बचने की हिदायत दे चुका है। - रमेश कुमार ‘रिपु’ राजनीति में कूटनीति सभी करते हैं। करनी भी चाहिए। तभी तो सुर्खियों में रहेंगे। राजनीति चमकेगी। सड़क से संसद तक सभी यही करते हैं। जब भी मुंह खोलते हैं,जहर उगलते हैं। ताकि बवाल हो। हल्ला मचे। टी.वी.चैनल्स में दिखें। टी.आर.पी. का सवाल है। सभी सियासी दलों को टी.आर.पी.चाहिए। एक दूसरे पर व्यक्तिगत हमले आज की राजनीति का हिस्सा बन गया है। सभी दलों की यही स्थिति है। इसलिए यह चलन में है। लेकिन किसी को मारने की धमकी,यह राजनीति का हिस्सा नहीं होना चाहिए। जैसा कि एकनाथ शिंदे की पार्टी के विधायक संजय गायकवाड़ ने कहा कि जो राहुल गांधी की जीब काटकर लाएगा उसे ग्यारह लाख रुपए दूंगा। संजय गायकवाड़ अमेरिका में राहुल गांधी के आरक्षण पर दिये गए बयान से नाराज होकर यह बात कही। केन्द्रीय मंत्री और बीजेपी नेता रवनीत सिंह बिट्टू ने कहा कि राहुल गांधी देश के नम्बर एक आतंकी हैं। वे भारतीय नहीं हैं। राहुल को पकड़ने वाले को इनाम दिया जाना चाहिए। उनका ये बयान राहुल की अमेरिका यात्रा के दौरान सिक्खों पर की गयी टिप्पणी के लिए आया। यूपी के श्रम मंत्री रघुराज सिंह ने भी राहुल को आतंकी करार दिया।विपक्ष कह रहा है कि मोदी और एकनाथ शिंदे अपने विधायक के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कर रहे है तो जाहिर सी बात है कि ये सब उनके इशारे पर हो रहा है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने प्रधान मंत्री को पत्र लिखा। उन्होंने जवाब नहीं दिया। केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने जवाब दिया। अपनी पार्टी के विधायकों और मंत्री के संदर्भ में उन्होंने कुछ नहीं कहा,मगर मल्लिकार्जुन खड़गे को याद दिलाया कि आपकी पार्टी के लोग पिछले दस सालों में प्रधान मंत्री को एक सौ दस गालियां दी। वहीं बीजेपी के नेता और मंत्री भी इस मामले में पीछे नहीं रहे। यहां तक की प्रधानमंत्री मोदी भी। यह परंपरा स्वस्थ्य राजनीति का परिचायक नहीं है। लाज के पर्दे तार-तार - राममनोहर लोहिया ने कहा था,लोकराज,लोकलाज से चलता है। लेकिन अब राजनीति में लाज के पर्दे तार-तार हो चुके हैं। जयपुर की एक रैली में प्रधान सेवक नरेन्द्र मोदी ने सोनिया गांधी पर कटाक्ष करते हुए कहा था ,वो कांग्रेस की कौन सी विधवा थी,जिसके खाते में पैसा जाता था। किसी महिला के वैधव्य का माखौल उड़ाना क्या सियासी संस्कृति है..? स्त्री सम्मान की दृष्टि से राजनीति की यह भाषा मर्यादाहीन है। पूर्व बीजेपी नेता प्रमोद महाजन ने एक बार सोनिया गांधी की तुलना मोनिका लेविस्की से कर दी थी। कैलाश विजयवर्गीय ने एक ट्वीट किया था,हंगामा होने पर हटा लिया। ट्वीट किया था, विदेशी माँ से उत्पन्न संतान कभी भी राष्ट्रभक्त नहीं हो सकती। क्या यह अपमान नहीं है- विपक्ष के अधीर रंजन चौधरी हों या फिर स्मृति इरानी। राष्ट्रपति को राष्ट्रपत्नी कह दिया। भूल हो गई। जुबान फिसल गई। माफी मांग ली। लेकिन स्मृति इरानी इसे मुद्दा बना लीं। देश की अस्मिता से जोड़ दीं। सड़क से संसद तक बखेड़ा खड़ा करने में स्मृति इरानी भूल गई,वो संसद में क्या बोल रही हैं। संसद में जब तक बोलीं,एक बार भी मैडम राष्ट्रपति, माननीय राष्ट्रपति, श्रीमती शब्द नहीं बोली। बार-बार द्रोपदी मुर्मू चिल्ला रही थीं। क्या यह माननीय राष्ट्रपति के पद का अपमान नहीं है? देश की प्रथम नागरिक राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू का अपमान संसद में भी हुआ। बाहर भी हुआ। शब्दों से। सियासियों की शब्दावली से। उनके हाव भाव से। देश की राजनीति में भाषा का पतन चुनाव से लेकर संसद तक सैकड़ों दफा हुआ। भाषा का चीरहरण -राजनीति में भाषा के संस्कार का चीरहरण होना नई बात नहीं है। भाषण में,संसद में और आरोप प्रत्यारोप के दौरान छीटें उछालने वाली अमर्यादित भाषा के जरिये भीड़ एकत्र करने वाले को कामयाब नेता मान लिया गया है। इसीलिए अटजी को कहना पड़ा,राजनीति वेश्या हो गई। नये दौर में सियासत और सियासी के लफ्ज नंगे हो गये हैं,और शोहरत गाली। सियासत में कॉमेडी का चलन बढ़ गया है। व्यक्तिगत हमले और अमर्यादित भाषाओं का इस्तेमाल करने की होड़ लगी हैं। अपनी-अपनी राजनीति के गाल लवली दिखाने की प्रतिस्पर्धा में संसद में देश हित के मुद्दे नदारत है। जबान विदेश मे फिसल गई - साल 2012 में चुनावी रैली में नरेन्द्र मोदी ने कांग्रेस के शशि थरूर की पत्नी सुनंदा थरूर के बारे में कहा था,वाह क्या गर्ल फ्रेंड है। आपने कभी देखी है 50 करोड़ की गर्ल फ्रेंड। क्या यह भाषा महिलाओं की इज्जत की पक्षधर है, बीजेपी को बताना चाहिए। शशि थरूर ने ट्वीट कर कहा,मोदी जी मेरी पत्नी 50 करोड़ की नहीं,बल्कि अनमोल है। आप को यह समझ में नहीं आएगा,क्योंकि आप किसी के प्यार के लायक नहीं हैं। यह विवाद उस समय सुर्खियों में था। गुजरात के मुख्यमंत्री थे नरेन्द्र मोदी,तब कहा था,मिडिल क्लास के परिवारों की लड़कियों को सेहत से ज्यादा खूबसूरत दिखने की फिक्र होती है। अच्छे फिगर की चाहत में कम खाती हैं। एक बार मोदी की जबान विदेश मे फिसल गई थी। उन्होंने कहा था, न जाने कौन सा पाप किया था जो भारत मे जन्म हुआ। पहले भारत में पैदा होने में भी शर्म आती थी। सवाल यह है कि सत्ता क्या व्यक्ति के संस्कार को लील जाती है। जैसा कि पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती बोलीं. थी,ब्यूरोक्रेसी की औकात क्या है। वो हमारी चप्पलें उठाती है। असल बात ये है कि हम उसके बहाने अपनी राजनीति साधते हैं।’’ नई राजनीतिक भाषा - इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं। शुरू में संसदीय बहसों में कम बोलने की वजह से समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया उन्हें गूंगी गुड़िया कहा करते थे। 2011 के विधान सभा चुनाव मे केरल के पूर्व मुख्यमंत्री अच्युतानंद ने कहा था,राहुल एक अमूल बेबी हैं। जो दूसरे अमूल बेबियों के लिए प्रचार करने आए हैं। साल 2002 में गोधरा कांड को लेकर गुजरात विधान सभा चुनाव में सोनिया गांधी ने तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को ‘मौत का सौदागर’ कहा था। दरअसल नई राजनीतिक भाषा से लोकतंत्र की गरिमा गिरी है। संसद में बैठकर देश हित में,जनहित में कानून बनाने वालों का भदेश आचारण और भाषा से एक नई संस्कृति ने आकार लिया है। जिसमें आदर्श और सम्मान का मूल्य नहीं हैं। राजस्थान विधान सभा चुनाव के दौरान जदयू के नेता शरद यादव ने कहा था,वसुंधरा मोटी हो गई हैं। अब उन्हें आराम करना चाहिए। कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर ने गुजरात चुनाव के वक्त कहा था,नरेन्द मोदी एक नीच किस्म का व्यक्ति है। हाँलाकि बाद में मोदी ने इस बयान को काफी भुनाया। नेता की अपने शहर में,राज्य में,लोगों के बीच, और परिवार में पहचान है। उसकी कही बातें सुनी जाती है। कई लोग उनका अनुसरण भी करते होंगे। जाहिर है, कि उनकी भाषा शैली के बड़े खतरे हैं। रीवा के बीजेपी सांसद जनार्दन मिश्रा ने कहा, “कलेक्टर को थप्पड़ जड़ देने पर दो साल के लिए राजनीति चमक जाती है। इससे पहले उन्होंने एक बयान मे कहा था,पी.एम.आवास नरेन्द्र मोदी के दाड़ी से निकलते हैं।” प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान हार्दिक पटेल ने कहा, धर्म की राजनीति करने वालों को थप्पड़ मारना चाहिए। योगी आदित्यनाथ ने गोरखपुर में कहा था, मुस्लिम समुदाय की संख्या जितनी ज्यादा है, वहां उतने ही बड़े दंगे होते हैं। बात जून 1997 की है। अंडरवियर खाकी रंग का - अब चुनावी भाषणों में संवेदनाएंऔर इज्जत नहीं रहीं। आजम खान ने रामपुर में एक चुनावी जनसभा में जयाप्रदा का नाम लिये बगैर कहा था,जिसको हम ऊँगली पकड़कर रामपुर लाए। उसने हमारे ऊपर क्या-क्या इल्जाम नहीं लगाए। उनकी असलियत समझने में आपको 17 बरस लगे। मैं 17 दिन में पहचान गया,कि इनके नीचे का अंडरवियर खाकी रंग का है। मध्यप्रदेश के गृहमंत्री बाबूलाल गौर ने शराब पीना स्टेटस सिंबल है कहा था। अपराध शराब पीकर डगमगाने से बढ़ते हैं,पीने से नहीं। शराब पीना हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार है। बीजेपी अध्यक्ष के दौरान अमितशाह ने कहा था,राजनेताओं का काम सरहदों में रहने वाले फौजियों से अधिक जोखिमवाला होता है। उनकी बहुत खिलाफत हुई थी। गोवा के मुख्यमंत्री मनेाहर पार्रीकर ने लाल कृष्ण आडवाणी को बासी अचार कह दिया था। जुबान कब किसकी कहां फिसल जाये नहीं कह सकते। रामकृपाली यादव ने मोदी को आतंकवादी और हत्यारा कहा था। कांग्रेसी नेता लाल सिंह ने हदें पार कर दी थी। हम तो कुत्ते भी नस्ल देखकर लेते हैं,मोदी की क्या औकात है। 1999 में राजेश खन्ना ने अटल बिहारी बाजपेयी पर ‘बिलो द बेल्ट’ टिप्पणी करते हुए कहा था औलाद नहीं है पर दामाद हैं.ये पब्लिक सब जानती है। देखा जा रहा है कि राजनीति में आए नए लोगों की भाषा गुंडे मवाली से भी बदतर हो गयी है। जबकि सुप्रीम कोर्ट ने हेट स्पीच से बचने की हिदायत दे चुका है।

Friday, July 19, 2024

देश में धर्म की राजनीति नहीं चलेगी - उमंग

मध्यप्रदेश विधान सभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने कहा कि देश में अब धर्म की राजनीति नहीं चलेगी। जनता ने धर्म की राजनीति करने वाली पार्टी को अल्पमत में ला दिया। जिस राम की राजनीति बीजेपी करती थी,उसे अयोध्या में हार का सामना करना पड़ा। बद्रीनाथ में भी हार गए। देश में हुए 13 उपचुनाव में एनडीए को सिर्फ दो सीट मिली। इंडिया गठबंधन का दबदबा रहा। धर्म की राजनीति करने वाली पार्टी को जनता को नकार रही है,यह जानते हुए भी मुख्य मंत्री मोहन यादव ने धर्म राजस्व विभाग को उज्जैन शिफ्ट कर दिया। क्यों कि संघ का संचालन यहीं से होता है। मंदिरों से पैसा संघ को जाता है।
एक मुलाकात में मध्यप्रदेश विधान सभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने यह बात कही। उन्होंने कहा कि देश वासियों की आस्था का केन्द्र केदारनाथ में 228 किलो सोना का घोटाला हो गया। इसकी जांच कराने की बजाए सरकार केदारनाथ धाम दिल्ली को बनाना चाहती है ताकि सोना चोरी कांड को दबाया जा सकता। देश की जनता धर्म की आड़ में राजनीति करने वाली पार्टी को अब होने वाले राज्यों के चुनाव में भी सबक सिखायेगी। कांग्रेस मनाएगी हत्या दिवस- देश में एक दफा इमरेजेंसी लगाी। लेकिन देश में पिछले दस साल से अघोषित इमरजेंसी लगी हुई है।अपातकाल की यादों को याद रखने के लिए 25 जून को संसद में संविधान हत्या दिवस के रूप में मनाने की बात कही गयी। इस पर कांग्रेस क्या करना चाहेगी? सवाल के जवाब में उन्होंने कहा,बीजेपी शासित राज्यों में संविधान की हत्या थम ही नहीं रहा है। हमें लोकायुक्त नियुक्ति मामले में सुप्रीम कोर्ट तक जाना पड़ा। संविधान की हत्या कहां नहीं हो रहा। है। मणिपुर में नारी के मान-अपमान हत्या दिवस, हाथरस की बेटी हत्या दिवस, लखीमपुर में किसान हत्या दिवस, तीन काले कानून से कृषि हत्या दिवस, पेपर लीक करके हुए परीक्षा प्रणाली हत्या दिवस, अग्निवीर योजना से हुए सामान्य सैन्य भर्ती दिवस, बेरोजगारी से हुए सपनों की हत्या दिवस, बढ़ती महंगाई से हुए आम परिवारों के भविष्य के हत्या दिवस,सामाजिक न्याय हत्या दिवस, आरक्षण हत्या दिवस,पुरानी पेंशन हत्या दिवस,मध्यप्रदेश में बुजुर्गो को दी जाने वाली पेशन बंद करने वाली योजना की हत्या दिवस,बीजेपी के काल को संविधान हत्या दिवस कहूं, तो गलत नहीं होगा। कांग्रेस मनायेगी हत्या दिवस। रीवा में घोटाले का विकास- रीवा के कथित विकास के संदर्भ में उन्होंने कहा कि यहां घोटालों का विकास हुआ है। जनता की आंखों में धूल झोककर विकास का आईना दिखाया जा रहा है। वृक्षारोपण के नाम पर करोड़ो को घोटाला हुआ है। एक समय कनेर के पेड़ रीवा में जगह जगह दिखते थे। वो अब दिखना बंद हो गए। अब तक पचास करोड़ के पौधे रीवा में लग चुके हैं। लेकिन रीवा कहीं भी हरा भरा नहीं दिख रहा है। बाल भारती के सामने की जमीन जो 200 करोड़ की है, उसे 36 करोड़ में दे दिया गया। बिहर नदी के पास की जमीन जो कि 200 करोड़ की है,उसे 65 करोड़ में बेच दिया गया। सिविल लाइन की जमीन 400 करोड़ की है,उसे100 करोड़ में दे दिया गया। बस स्टैड की जमीन,मानस भवन के पास की,गंगा कक्षार आदि जगह की जमीन जो कि 800 करोड़ की है,उसे 65 करोड़ रुपए में दे दिया गया। रीवा में जमीन का बंदरबांट चल रहा है। रीवा की जनता को समझना चाहिए, कि समदड़िया को सस्ते दर पर जमीन क्यों दिया गया। राजेन्द्र से पद वापस लें- एक फिल्म आई थी उड़ता पंजाब। यदि रीवा में कोरेक्स के नशे पर रोक नहीं लगी तो उड़ता रीवा पर फिल्म बन सकती है। इस जिले के डिप्टी सी.एम. राजेन्द शुक्ला हैं। नशे के कारोबार पर रोक लगाने वो यूपी के सी एम.योगी से मदद मांगने गए थे। जाहिर है,कि उन्होंने बता दिया कि वो अपराध और नशे के कारोबार पर नकेल लगाने में अक्षम हैं। असफल हैं। अकेले रीवा में 24683 अपराध हुए हैं। रीवा जिला अपराध का गढ़ बन गया है। बढ़ते अपराध से जाहिर है कि रीवा के युवाओं का भविष्य कैसा होगा,समझने वाली बात है। स्वास्थ्य मामले में भी स्वास्थ्य मंत्री असफल है। कायदे से उनसे डिप्टी सी.एम. का पद ले लिया जाना चाहिए। कर्ज लेकर घी पिला रहे- प्रदेश की सरकार के पास पैसा है नहीं। कर्ज लेकर वो अफसरों और नौकरशाही को घी पिला रहे हैं। प्राप्त 1.27 लाख करोड़ के राजस्व में मात्र 5 हजार करोड़ रुपए से विकास की बात करते हैं। चार हजार करोड़ का बजट है बताते हैं। जमीन के घोटाले पर जांच होनी चाहिए मुख्यमंत्री से कहूंगा। सरकार अक्षम है। केवल वादे कर रही है। फर्जिग नर्सिग काॅलेज किसने खोले, फ़र्ज़ी डिग्रियां किसने बांटी। इसकी सीबीआई जांच होनी चाहिए। राज्य में जितने भी घोटाले हुए हैं, उनकी जांच होनी चाहिए। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिघार को वी केन न्यूज के नेशनल हेड रमेश कुमार रिपु ने नक्सलवाद पर लिखी अपनी "रेड वाॅर" किताब उन्हें दी। उन्होंने कहा इसे पढ़ूंगा और मध्यप्रदेश में नक्सलवाद की स्थिति पर विधान सभा में सवाल करूंगा साथ ही मुख्यमंत्री से इस पर चर्चा करूंगा।

Saturday, July 6, 2024

राहुल का नया अवतार,कितना असरदार

"राहुल गांधी नए अवतार मे दिखे। मोदी सरकार की संसद में बखिया उधेड़ी । उनके सवालों पर सत्ता पक्ष को संसद में सफाई देनी पड़ी। सवाल यह है, कि हरियाणा,महाराष्ट्र और झारखंड का वोटर अबकी चुनाव में क्या इंडिया के पक्ष में नयी सियासी पटकथा लिखने का मन बनायेगा।" 0 रमेश कुमार ‘रिपु’ संसद की दीवारों के कानों ने दस साल तक विपक्ष की दमदार विरोध की आवाज सुनने को तरस गयी। केवल गुजरात लाॅबी को ही सियासी इतिहास बनाते देखा। एक सौ चालीस विपक्षी सांसदों को निलंबित होते देखा।उसने विपक्ष की हैसियत देखी ही नहीं। इसलिए कि राजनीतिक सत्ता ने विपक्ष को बेजुबां कर दिया था। विपक्ष एक जुट नहीं था।बंटा हुआ था। इस वजह से दस बरस तक संसद को अपने तरीके से हांका गया। इन दस बरसों तक विपक्ष के सीने में जो सवालों की आग थी,उसे एक जुलाई को नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने सदन के पटल पर जब रखा, तो सत्ता पक्ष के चेहरे पर हवाई उड़ने लगी। जिस सदन में 750 किसानों की मौत पर दो मिनट के लिए मौन नहीं रखा गया। कोरोना काल में मरने वाले मजदूरों पर अफसोस नहीं जताया गया। आक्सीजन नहीं मिलने पर कई सांसें टूट गयी,उनके लिए संसद में कभी सत्ता पक्ष की आंखें गीली नहीं हुई। नोटबंदी में आम आदमी को अपने ही पैसों के लिए पुलिस की लाठियां खानी पड़ी,महिला पहलवानों के साथ की गयी बदसलूकी पर संसद कभी चीखी नहीं। अडानी और अंबानी के सत्ता पक्ष के रिश्तों पर जिसने आवाज उठाई,उसके पीछे ईडी लगा दी गयी। नीट परीक्षा कांड पर कार्रवाई हो रही है कहकर सत्ता पक्ष अपने मंत्री से जवाब तक नहीं मांगा। न ही सदन में कुछ बोला। दस बरस बाद सदन को नेता प्रतिपक्ष मिलने पर उसने विपक्ष की हैसियत देखी। और फिर एक-एक करके मोदी सरकार की बखिया जब राहुल गांधी ने उधेड़ना शुरू किया तो सत्ता पक्ष को सांप सूंघ गया। इतने लाचार कभी नहीं हुए- प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे,तब भी विपक्ष के किसी सवालों का जवाब देना उचित नहीं समझते थे। प्रधान मंत्री बनने पर जब जरूरी समझे,तभी आखिरी में बोले। लेकिन नेता प्रतिपक्ष के उठाए गए सवाल पर मोदी दो बार बोले। कभी अमितशाह के खड़े होने पर पूरा सदन ठिठक जाता था,उन्हें तीन बार राहुल गांधी के सवाल पर बोलना पड़ा। यहां तक कि उन्हें स्पीकर ओम बिरला से कहना पड़ा,अध्यक्ष महोदय हमें संरक्षण दीजिये। ऐसे में,कैसे हम संसद चला पाएंगे। एक साल से मणिपुर जल रहा है,लेकिन सदन में न मोदी बोले और न ही अमितशाह। ऐसा लगता है कि मणिपुर देश का हिस्सा नहीं है। राजनीति नए रंग में- संघ की शाखा से निकली बीजेपी जिस हिन्दुत्व पर राजनीति करती आई है,उसकी नेता प्रतिपक्ष ने बखिया उधेड़ी तो मोदी को बोलना पड़ा। राहुल ने कहा,हिन्दू धर्म में हिंसा कहीं नहीं है। हिन्दू धर्म सिखाता है,डरना मना है। यह अहिंसा का देश है। भगवान शिव कहते हैं,डरो मत,डराओ मत। वे अहिंसा की बात करते हैं। बीजेपी के जो लोग अपने आप को हिन्दू कहते हैं,वे चैबीसों घंटे हिंसा करते हैं। हिन्दू हिंसा नहीं फैला सकता। वो नफरत नहीं करता। जाहिर है,कि आप हिन्दू हैं ही नहीं। राहुल के बयान पर प्रधान मंत्री मोदी ने हिन्दू कार्ड खेलकर संसद की दिशा बदलने की कोशिश की। उन्होंने कहा,पूरे हिंदू समाज को हिंसक कहना गंभीर विषय है। राहुल ने कहा,नरेंद्र मोदी जी पूरा हिंदू समाज नहीं है। आरएसएस पूरा हिंदू समाज नहीं है। बीजेपी पूरा हिंदू समाज नहीं है। संसद में राहुल के भाषण देश की राजनीति को नए सिरे से परिभाषित कर सकती है। राहुल गांधी ने मोदी के बही खाते का चिट्ठा खोल कर बीजेपी के उन सांसदों को खुश कर दिये,जो मोदी,अमितशाह के सामने बोलने से डरते हैं। और जिन्हें मंत्री नहीं बनाया गया वो भी। राहुल ने कहा बीजेपी के भीतर कितना डर है,इसी से समझ सकते हैं,कि नरेन्द्र मोदी के सामने गडकरी,राजनाथ मेरे से नमस्कार तक नहीं करते। हिन्दू बनाम हिन्दुत्व- हिन्दू शब्द आते ही बीजेपी नींद से जाग जाती है। क्यों कि बीजेपी खुद को हिन्दू पार्टी मानती है। इसलिए बीजेपी के नेताओं ने राहुल के बयान पर प्रेस वार्ता कर दुष्प्रचार किया। कहा,राहुल गांधी ने हिन्दुओं को अपमान किया है। ऐसा इसलिए किया, ताकि बीजेपी का वोट बैंक खिसके नहीं। जबकि ऐसा करके बीजेपी अपना वोट बैंक का नुकसान कर रही है। वैसे हिन्दुत्व को लेकर विरोधाभासी विचार हैं। के.एन.गोविंदाचार्य कहते हैं हिन्दू का एक भाव सार्वभौमिकता का संदेश देता है। दूसरा भाव है,कि यह एक उन्माद का नाम है,जो मुसलमानों को निशाना बनाता है। ऐसे विरोधाभासी विचार,अकारण नहीं है। राजनीति में धुएं के लिए आग का होना जरूरी है। मोदी आरएसएस के प्रचारक रहे हैं। आरएसएस और बीजेपी में हिन्दुत्व समाया हुआ है। इसीलिए मोदी चुनाव में भी मुसलमानों के खिलाफ खूब बोलते आए हैं। आरआरएस के प्रचारक यशवंत राव केलकर कहा करते थे, हिन्दुत्व को लेकर अटल बिहारी बाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी, के. सुदर्शन और विनय कटियार की समझ अलग है।हिन्दुत्व से हर किसी का अपना अपना अभिप्राय है। हिन्दुत्व को लेकर हर व्यक्ति में अलग- अलग दृष्टिकोंण झलकता है। यह भविष्य में परेशानियां खड़ी करेगा।’’ तेल की धार दिखी- राहुल गांधी ने संसद में कुछ गलत नहीं कहा,कि सरकार के खिलाफ जो खड़ा हो जाए या फिर उसकी नीतियों पर सवाल उठा दे,उसकी खैर नहीं। मेरे खिलाफ 21 मुकदमें दर्ज हुए।ई.डी.ने पांच घंटे तक पूछताछ की। मेरी संसद सदस्यता छीन ली गयी। मुझसे मेरा सरकारी आवास छीन लिया गया। देश में दो सी.एम. को जेल में डाल दिया गया। एक को अब छोड़ा गया है। विपक्ष को डराया गया। देश में नौकरी खत्म कर,डर का पैकेज दिया। प्रोफेशनल स्कीम नीट को कमर्शियल स्कीम बनाया। जुलाई 2004 में बेरोजगारी 9 फीसदी,कृषि दर में लगातार कटौती आज 1.80 फीसदी रह गयी है। राहुल गांधी ने अपने 90 मिनट के भाषण पर सरकार की उस नब्ज को पकड़ा,जिससे सरकार के माथे पर पसीना आ गया। यह कहना गलत नहीं होगा,कि राहुल गांधी ने संसद में बीजेपी और मोदी के उस आवरण को उतार दिया,जिसे वो पहनकर राजनीति करते हैं। सत्ता पक्ष उठते बैठते रहे- देश में उद्योगपतियों का 16लाख करोड़ रुपए माफ हो सकता है,तो किसानों का भी थोड़ा कर्ज माफ किया जा सकता है। किसानों ने एमएसपी मांगी,लेकिन सरकार देने से मना कर दी। सरकार का रवैया चौकाता है।कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान को सफाई देनी पड़ी,कि नेता प्रतिपक्ष गलत बयानी कर रहे हैं। एमएसपी पर खरीद जारी है। अग्निवीर पी.एम को ब्रेन चाइल्ड है। इस पर रक्षा मंत्री राजनाथ ने आपत्ति दर्ज कर सरकार की खामियों में पर्दा डालने का प्रयास किया। संसद में गलतबयानी की जा रही है। राहुल ने कहा,हमारी सरकार आएगी तो हम हटा देंगे। मोदी के विकसित भारत का सच- राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर मोदी सदन में मोदी बता रहे थे, भारत विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में चल पड़ा है। और 2047 को देश विकसित राष्ट्र बन जाएगा। देश की अर्थव्यवस्था दौड़ पड़ेगी। जबकि देश पर 272 लाख करोड़ का कर्ज है। राहुल गांधी पर तंज कसते हुए मोदी ने कहा, आजकल बच्चे का मन बहलाने का काम चल रहा है। हिन्दू समाज को सोचना होगा,ये अपमान संयोग है या प्रयोग। कांग्रेस 2024 से परजीवी पार्टी कहलाएगी। कांग्रेस जिसके साथ रहती है,उसे खा जाती है। जबकि बीजेपी ने जिन राज्य में जिस पार्टी से गठबंधन किया,उसे निगल गयी। वहीं दूसरी ओर मोदी के विकसित भारत की हाथरस के पुलराई गांव में कलई खुल गयी। सत्संग के बाद भगदड़ मचने से सौ से अधिक लोगों की मौत हो गयी। संसद में मोदी बता रहे थे,कि डबल इंजन की सरकार से प्रदेश विकसित हो रहे हैं। एक तरफ विकसित भारत का सपना संसद में मोदी दिखा रहे थे। दूसरी ओर हाथरस के सिंकदराऊ सीएचसी के बाहर चारों तरफ लाशें बिखरी हुई थी। दो घंटे बाद भी अस्पताल में सीएमओ तक भी नहीं पहुंचे। अस्पताल तक ले जाने के लिए एक एबुंलेस तक नहीं थी। अस्तपाल में सिर्फ एक डाॅक्टर था। प्रशासन का एक आदमी तक नहीं पहुंचा। हाथरस मे जो घायल थे,उन्हें इलाज नहीं मिलने से मर गए। सवाल यह है कि मोदी तीसरे कार्यकाल में भी किस विकसित भारत का सपना दिखा रहे हैं। सवाल यह है कि डिजिटल इंडिया के दौर में मोदी ने अपना भाषण क्यों नहीं रोका? बहुत देर बाद उन्होंने संवदेना व्यक्त की। मनमानी नहीं चलेगी- मौजूदा सियासी इतिहास अब नए तरीके से लिखा जाएगा कि संसद में विपक्ष की आवाज गूंजी। दस साल तक लगा ही नहीं,कि देश में लोकतंत्र है। तभी तो लाल कृष्ण आडवाणा कहते थे,देश में अघोषित आपातकाल है। राहुल गांधी ने संसद में जिन मुद्दों की चर्चा की, उस पर दस साल तक मोदी सरकार ने बात नहीं की। किसान कानून अडाणी और अंबानी के लिए लाया गया। किसानों को मुआवजा दिलाने के लिए बनाया गया बिल रद्द कर दिया। सात सौ किसान शहीद हुए,हमने कहा किसानों के लिए दो मिनट का मौन संसद में रखा जाए। आपने कहा वो किसान नहीं आतंकवादी हैं। मणिपुर को सरकार की योजना ने हिंसा में जला दिया। पहली बार भारत के इतिहास में जनता से स्टेट छीने गए।जम्मू-कश्मीर-लद्दाख से स्टेट छीना। नेता प्रतिपक्ष ने सरकार को बीस मुद्दों पर घेर कर बता दिया कि अबकी बार मनमानी नही चलेगी। यह अलग बात है कि राहुल गांधी ने सरकार को संसद में घेरा,लेकिन उसमें से कई अंश हटा दिये गए हैं। हटाए गए हिस्सों में हिंदुओं और पीएम नरेंद्र मोदी, बीजेपी, आरएसएस समेत अन्य पर कमेंट शामिल हैं। देश में नए तरीके की इमरजेंसी - संविधान के अनुच्छेद 105(1) के तहत संदन के हर सांसद को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मिली है। हटाए गए अंश नियम 380 के दायरे में नहीं आते। राहुल गांधी को संसद में जो कहना था,कह दिया। वही सच है।अंश हटा देने से सच नहीं मिट जाएगा। बहरहाल राहुल गांधी नए अवतार मे दिखे। मोदी सरकार की संसद में बखिया उधेड़ी । उनके सवालों पर सत्ता पक्ष को संसद में सफाई देनी पड़ी। सवाल यह है,कि हरियाणा,महाराष्ट्र और झारखंड का वोटर अबकी चुनाव में क्या इंडिया के पक्ष में नयी सियासी पटकथा लिखने का मन बनायेगा।

Monday, June 17, 2024

रंग बदलता संघ

"मोदी जिनके दम पर प्रधान मंत्री बने हैं,अब वो इनकी चौकीदारी करेंगे,ताकि ये उनके सेक्यूलर काम काज को चोटिल न कर सकें।वहीं संघ प्रमुख मोहन भागवत ने गुजरात लाॅबी को निशाने पर लेते हुए सीख दी कि अहंकार से संगठन और पार्टी नहीं चलती। मर्यादा जरूरी है। बीजेपी हमें अपना रंग न दिखाए। संघ है तो बीजेपी है। बगैर संघ के बीजेपी ढाई घर चलने का सपना छोड़ दे। वरना, उसकी स्थिति मौजूदा चुनाव से भी बदतर हो जाएगी।"
0 रमेश कुमार ‘रिपु’ इन दिनों देश के सियासी कैनवास पर एक नयी तस्वीर देखी जा रही है। संघ और बीजेपी के बीच तल्खी तस्वीर। यह तस्वीर अचानक नहीं बनी। तस्वीर की रेखाएं चुनाव से पहले ही बननी शुरू हो गयी थी। केवल इंतज़ार किया जा रहा था,कि सत्ता की तस्वीर कौन सी बनने जा रही है। सत्ताई तस्वीर 2014 और 2019 जैसी होगी,या फिर कुछ अलग हटकर। मोदी ने संसद में कहा था,अबकि बार चार सौ पार। कुछ हफ्ते पहले कहा था, कि मुझे परमात्मा ने भेजा है। अब कह सकते हैं,कि चुनाव परिणाम के बाद उनके पैर जमीन पर आ गए होंगे। विपक्ष को खत्म करने की सत्ताई साजिश मोहन भागवत को रास नहीं आ रही थी। मगर चुप रहे। मोदी ने चुनाव में भाषा का संस्कार भूल कर जिस तरीके से विपक्ष पर हमला बोले ,वो संघ के संस्कार की भाषा नहीं है। जबकि प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी स्वयं संघ की पृष्ठभूमि से हैं। चौथे चरण के चुनाव के बाद बीजेपी और संघ के बीच टकराव की तलवार जे.पी.नड्डा ने यह कहकर खींच दी,कि अब बीजेपी बड़ी पार्टी हो गयी है। उसे संघ की जरूरत नहीं है। एक झटके में नड्डा ने संघ को राजनीति का पाठ पढ़ा दिये। नड्डा के बयान से भाजपा में आए नेता भ्रमित हो गए। संघ कार्यकर्ता हाथ पर हाथ धरे रह गए। और किसी ने नड्डा के बयान पर कुछ कहा नहीं। सफाई भी नहीं दी। मोहन भागवत भी जानते हैं,जे.पी.नड्डा से यह बात किसने कहलवाया है। बावजूद इसके संघ प्रमुख चुप रहे। वो यह मान कर चल रहे थे,कि सामाजिक और सांस्कृतिक जमीन को मोदी को समझेंगे। लेकिन ऐसा पूरे चुनाव में नहीं में दिखा। उसका परिणाम यह रहा,कि मोदी की गारंटी का असर कई राज्यों में नहीं दिखा। वो स्चयं बहुत कम वोटों से चुनाव जीते। जबकि उससे अधिक वोटों से गैर राजनीतिक व्यक्ति किशोरी लाल अमेठी में एक लाख 67 हजार से अधिक वोटों से चुनाव जीते। अहंकारी नहीं होते सेवक - चुनाव के बाद संघ प्रमुख मोहन के तेवर और बयान चर्चा में हैं। उन्होंने कहा,सच्चा सेवक मर्यादा का पालन करता है। उसमें अहंकार नहीं होता, कि मैंने यह काम किया है। जो ऐसा नहीं करता है,सिर्फ उसे ही सच्चा सेवक कहा जा सकता है। इसे अलोचना नहीं सकारात्मक सलाह ही कहा जाएगा। यदि मोदी तीसरे कार्यकाल में इसे नहीं भूलेंगे तो बेहतर प्रधान मंत्री साबित हो सकते हैं। वैसेे पूरा चुनाव मोदी केंद्रित था। मोदी का परिवार से लेकर मोदी की गारंटी तक के प्रचार के तरीके के आगे मोदी का चेहरा दिखा। बस अड्डे से लेकर पेट्रोल पंपों तक मोदी का विज्ञापन दिखता था। अहंकार की सीमा इतनी लांधी की रामलला की प्राण प्रतिष्ठा साधु,संत महात्मा को करना चाहिए, स्वयं की। वैसे दूसरे कार्यकाल में ऐसा लगा,कि मोदी अपने आप को नेता कम, मसीहा ज्यादा समझने लगे हैं। मोहन भागवत के बयान के कई अर्थ निकाले जा रहे हैं। उन्होंने कहा, मणिपुर में हो रही हिंसा को रोका जाना चाहिए। संघ का मुख्यपत्र आर्गनाइजर ने भी बीजेपी और पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की आलोचना करते हुए लिखा,लोकसभा चुनाव के नतीजे बीजेपी के अति आत्मविश्वासी नेताओं और कार्यकर्ताओं के लिए आइना है। अयोघ्या हारे अपने अहंकार की वजह से। मोदी ने कई अच्छे काम किये हैं। लेकिन हिन्दू -मुसलमानों के बीच दरार पैदा की। लेकिन गोरक्षा के नाम पर जो हत्याएं हुई,मुस्लिम मांस व्यापारियों,पशु पालक,किसानों की,उसकी निंदा प्रधान मंत्री मोदी ने नहीं की। अमितशाह ने धमकी भरा भाषण दिये। उन्होंने कहा, कि बांग्लादेश से अवैध तरीके से आए लोग दीमक की तरह फैल गए है।दूसरे भाषण में कहा, नागरिकता के लिए रजिस्टर बनेगा। उन मुसलमानों को देश से निकाला जाएगा जिनके पास नागरिकता साबित करने के लिए दस्तावेज नहीं होगा। संघ का ज्ञान - अटल बिहारी वाजपेयी ने सी.एम. नरेंद्र मोदी का राजधर्म का पाठ पढ़ाया था,तो इस बार संघ प्रमुख ने मर्यादा और सच्चे सेवक का ज्ञान देने का काम किया है। पी.एम. मोदी जो खुद संघ के इतने करीब रहे हैं,उनको लेकर इस प्रकार की बयानबाजी के पीछे आखिर कौन सी वजह है। या फिर किस मकसद से ऐसा कहा गया। सियासी गलियारों में ऐसे सवाल केरल में 31 जुलाई को होने वाली संघ की बैठक तक टहल कदमी करते रहेंगे। मोहन भागवत के बयान जब तक समझा जाता,संघ के कार्यकर्ता इन्द्रेश का बयान आग में घी डालने का काम किया है। जिस पार्टी ने भगवान राम की भक्ति की लेकिन अहंकारी हो गई,उसे 241 पर रोक दिया गया। जिनकी राम में कोई आस्था नहीं थी,उन्हें 234 पर रोक दिया गया। गोरखपुर में योगी आदित्यनाथ से मोहन भागवत की मुलाकात से गुजरात लाॅबी के कान खड़े हो गए हैं। ऐसा होना स्वभाविक है। इसलिए कि अमित शाह, योगी आदित्यनाथ को यू.पी.के मुख्यमंत्री पद से हटाना चाहते हैं। यूपी में हार का ठिकरा वो योगी पर फोड़ना चाहते हैं। अमितशाह के अति करीबी ओ.पी. राजभान,उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य,बृजेश पाठक और दिनेश योगी को तवज्जो देते नहीं। संघ मानता है,उप मुख्यमंत्री की जरूरत नहीं है। मौजूदा चुनाव में यू.पी.में योगी का नहीं गुजरात लाॅबी का था। अमितशाह ने 25 टिकट बांटे थे।बिसात अमितशाह ने बिछाया था। योगी को सजा क्यो मिले?दिल्ली योगी की बात सुनने को तैयार नहीं है। जबकि योगी गुलदस्ता लेकर नड्डा के घर गए।अमितशाह,राजनाथ और शिवराज के पास भी। संघ प्रमुख के मुखर होने पर अब बीजेपी का कोर कार्यकर्ता बोल रहा है। योगी आदित्यनाथ से पूछ कर टिकट नहीं दिया गया है। बीजेपी को सीट कम मिलने पर इसके लिए दोषी वो हैं,जिन्होंने टिकट बांटे। संघ की चिंता जायज - संघ को चिंता है। दस साल में बीजेपी का जो वोट बैंक बनकर तैयार हुआ है वो हरियाणा,महाराष्ट्र और झारखंड के चुनाव में बिखर न जाए। उसे संजोना है। यदि इन तीन राज्यों मे बीजेपी हार गयी तो बहुत देर हो जाएगी। फिर बिहार भी हाथ से निकल सकता है। संघ नहीं चाहता,कि राज्य दर राज्य बीजेपी गंवा दे। संघ यही मान रहा है,कि यूपी में बीजेपी की हार की मूल वजह अमितशाह हैं। मौजूदा हालात से जाहिर है,कि जिस तरह अमितशाह यू.पी. में योगी आदित्यनाथ के काम काज पर दखल दे रहे हैं,उस स्थिति में यू.पी. में चुनाव हुए तो अखिलेश को कुछ ज्यादा नहीं करना पड़ेगा। यू.पी. की 80 सीट मायने रखता है। संघ मान रहा है,कि योगी पर नकेल लगाने से यूपी हाथ से निकल जाएगा। वैसे विदर्भ और नागपुर ही नहीं, पूरे महाराष्ट्र में बीजेपी को वोट नहीं मिला। सवाल यह है, कि इसकी गारंटी कौन लेगा। कांग्रेस को 13 सीट मिली। महाराष्ट्र में बीजेपी को 14 और एनडीए को 25 सीट का नुकसान हुआ। संघ को लगता है,एक नया सियासी चक्रव्यूह रचने का वक़्त आ गया है। संसदीय दल की बैठक में राज्य के मुख्यमंत्रियों की क्या जरूरत है? गुजरात लाॅबी को इस बात का अदेशा था,कि संसदीय दल की बैठक में यदि अपने लिए संघ से निकले सांसद नया नेता न चुन लिए तो मोदी नेहरू की बराबरी नहीं कर पाएंगे।केरल में 31 जुलाई को संघ की बैठक है। जाहिर है,वहां गुजरात लाॅबी की गतिविधियां और बीजेपी की कार्यशैली सहित अनेक सवालों पर चर्चा होगी। हो सकता है,कि वहां नीतिन गडकरी को पी.एम. बनाए जाने की बात उठे। और योगी को 2029 का चेहरा बनाने की बात हो सकती है। संघ को घृणा थी राजनीति से - इतिहास के पन्ने बताते हैं,कि भारतीय समाज की कायाकल्प के लिए संघ की स्थापना हुई थी। अपने आरंभिक दिनों में संघ मानता था,कि राजनीति घृणित चीज़ है।इसलिए संघ ने अपना सारा ध्यान चरित्र निर्माण की ओर केन्द्रित रखा। समय-समय पर संघ में बदलाव होते रहे। सन् 2013 का साल संगठन में बुनियादी बदलाव का गवाह बना। अमरावती की एक बैठक में संगठन ने तय किया,कि वो बीजेपी को सियासी सत्ता दिलाने अपनी शखाओं और स्वयं सेवकों के व्यापक नेट वर्क का चुनाव में इस्तेमाल करेगा। इस बदलाव के पीछे दो मकसद था। राजनैतिक सत्ता के पाने के साथ हिन्दू समाज को संगठित करना। अपातकाल के बाद हुए चुनाव को अपवाद मानें तो संघ ने कभी किसी राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा नहीं लिया।लेकिन समय-समय पर बीजेपी और जनसंघ के भीतर पदों पर लोग तैनात किये जाते रहे हैं। बीजेपी आहिस्ता-आहिस्ता कामयाब होती गयी। और बीजेपी ने ही संघ को राजनीतिक दायरे के भीतर लाने का काम किया। संघ की मात्र इतनी भूमिका रही,कि अपने लोगों को बीजेपी के अंदर रखवाने की। सन् 2004 और 2009 की चुनावी हार के बाद संघ दखल देते हुए बीजेपी नेतृत्व परिवर्तन की वकालत की। सन् 2013 में संघ के सह सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले ने कहा,‘‘ भारत में सामजिक,राजनीतिक और सांस्कृतिक बदलाव तभी आ सकता है,जब बीजेपी सभी राज्यों की सत्ता पर काबिज हो। धीरे-धीरे बीजेपी दो दर्जन के करीब राज्यों में अपनी सरकार बना ली। बहरहाल मोदी जिनके दम पर प्रधान मंत्री बने हैं,अब वो इनकी चौकीदारी करेंगे,ताकि ये उनके सेक्यूलर काम काज को चोटिल न कर सकें। संघ प्रमुख मोहन भागवत ने गुजरात लाॅबी को निशाने पर लेते हुए सीख दी कि अहंकार से संगठन और पार्टी नहीं चलती। मर्यादा जरूरी है। बीजेपी हमें अपना रंग न दिखाए। संघ है,तो बीजेपी है। बगैर संघ के बीजेपी ढाई घर चलने का सपना छोड़ दे। वरना,उसकी स्थिति मौजूदा चुनाव से भी बदतर हो जाएगी।

Thursday, June 13, 2024

नए साथी करेंगे फेवर या दिखाएंगे तेवर

"एनडीए सरकार बनाने में फेवर करने वाले दलों के तेवर स्पीकर के चुनाव तक संयमित रहेगा,इसमें संदेह है। तोल- मोल की सरकार कितने घर चलेगी न मोदी जानते हैं ,न ही नीतिश और न ही चन्द्रबाबू नायडू। मोहन भागवत से लेकर पूरा विपक्ष इंतजार कर रहा है अपने टाइम का।" 0 रमेश कुमार ‘रिपु’ सरकार वही।चेहरे वही।मोहरे वही।पासे भी वही हैं। सिर्फ कुछ साथी नए हैं। अब बीजेपी की नहीं, एनडीए की सरकार है। सरकार का नाम बदला है। मजबूरी है। विवशता है। क्यों कि सबको साथ लेकर चलना है। सरकार बनाने में साथ देने वाले साथियों के दम पर मोदी सियासी पहाड़ चढ़ने का मन बनाए हैं। सौ दिन के सियासी एजेंडे का खाका भी खींच लिये हैं। सरकार चल पड़ी है। प्रधान मंत्री मोदी ने इसका संकेत दे दिया है। किसानों को सौगात दी। पीएम किसान सम्मान निधि की 17वीं किस्त जारी की।9.3 करोड़ किसानों को लाभ होगा और करीब बीस हजार करोड़ रुपए बांटे जाएंगे। आवास योजना के तहत 3 करोड़ ग्रामीण और शहरी घरों के निर्माण किये जाएंगे।अभी तक दस वर्षो में कुल 4.21 करोड़ घर बनाये गए हैं। चुनाव में बेरोजगारी मुद्दा छाया रहा। इसलिए रोजगार पर खास ध्यान रहेगा। बुनियादी सवाल - मगर राजनीति के कुछ बुनियादी सवाल हैं। जो 18 जून को सांसदों के शपथ के बाद 20 जून को होने वाले स्पीकर चुनाव में विपक्ष के साथ देश की नज़र है। क्यों कि प्रधान मंत्री मोदी इस बार नए अवतार में हैं। होना भी चाहिए। नए सोच के साथ खड़े हैं । उन्हें सबका साथ चाहिए। और सबका विकास करना है। मोदी के लिए 140 करोड़ लोग परमात्मा का स्वरूप हो सकते हैं। लेकिन, जिन्हें लेकर सियासी पहाड़ चढ़ना है। दूर तक चलना है। क्या वो बीस जून को चलते-चलते ठहर कर नहीं कहेंगे, कि स्पीकर तो हमारा होगा? आप ने बीजेपी सांसदों को गृह मंत्रालाय,वित्त मंत्रालय,रक्षा मंत्रालय,कृषि विभाग,परिवहन मंत्रालय दे दिया। कोई बात नहीं। सभी बड़े और सम्मानीय विभाग बांट लिये। फिर भी हम कुछ नहीं बोले। लेकिन स्पीकर भी आप की ही पार्टी का हो, ऐसा नहीं चलेगा। सियासत की ढाई चाल सिर्फ आप ही नहीं,हम भी चलना जानते हैं। राजनीतिक सीन में इंडिया गठबंधन है ही साथ, अब एनडीए के घटक दलों में नीतीश और चन्द्रबाबू नायडू भी है। इन्हें एनडीए सरकार की फिल्म में मेहमान कलाकार नहीं कह सकते। असली खेला होना बकाया है। राजनीति में कुछ सवाल ऐसे हैं,जिन्हें नज़र अंदाज नहीं किया जा सकता। उनमें से एक सवाल यह है,कि बीस जून को यदि टीडीपी नेता चन्द्र बाबू नायडू अड़ गए कि स्पीकर हमारी पार्टी से होगा, नीतीश भी यही चाहते हैं। डीटीपी ने स्पीकर का अपना उम्मीदवार उतार दिया, चुनाव करा लेते हैं। ऐसे में टीडीपी के पीछे पूरा इंडिया गठबंधन खड़ा दिखे तो कोई आश्चर्य नहीं। जदयू भी साथ हो तो हैरानी नहीं। ऐसे में बीजेपी का स्पीकर उम्मीदवार चुनाव हार गया तो पूरी एनडीए सरकार एक पल में ताश के पत्ते के महल की तरह ढह जाएगी। चन्द्र बाबू नायडू और नीतिश कुमार दोनों मोदी और अमितशाह के खेल से वाकिफ हैं। दोनों की बिसात को भी जानते हैं। यदि बीजेपी का स्पीकर हुआ तो बीजेपी को 240 से 272 होने में कोई ताकत नहीं है, जो रोक सके। सारा खेल छह माह के भीतर हो जाएगा। उनके पास हाथ मलने के सिवा कुछ नहीं बचेगा। सवाल यह भी है,कि चन्द्र बाबू नायडू क्या आन्ध्र प्रदेश को विशेष दर्जा दिये जाने की शर्त पर स्पीकर पद से पीछे हट जाएंगे। और हट गए तो इसकी क्या गारंटी है,कि उनकी पार्टी के सांसद टूट कर बीजेपी में शामिल नहीं होंगे। मोदी की गारंटी जनता को मिले या न मिले, मगर बीजेपी को बहुमत मिलने की पूरी संभावना है। पार्टी टूटने का भय - जब किसी पार्टी की सरकार बनती है,तो वैसे भी छोटे- मोटे दल सरकार के साथ बगैर न्यौता दिये मिल जाते हैं। छोटे-छोटे राज्यों के गैर बीजेपी के सांसद मिल ही जाएंगे। वो बाहर से सरकार को समर्थन देने में पीछे नहीं हटेंगे।वो चाहे केन्द्र में एनडीए की सरकार हो या फिर इंडिया गठबंधन की। बीजेपी का स्पीकर होने पर सभी को अपनी पार्टी टूटने का डर है। और कोई ऐसे वक्त का इंतजार नहीं करना चाहता। सभी को वक्त का इंतजार - मंत्रिमंडल के गठन के बाद विभाग बंटवारे को लेकर नाराजगी एनडीए में देखी जा रही है। जाहिर है,बात खुश करने की है। अखिलेश यादव वैसे कह ही चुके हैं,कि यदि किसी को खुश करने से सरकार बनती है,तो हमें खुश करने में कोई दिक्कत नहीं है। जिसे जो विभाग चाहिए ले ले। शरद पवार वक्त का इंतजार कर रहे हैं। वो एनडीए सरकर के गिरने की राह देख रहे हैं। सभी को वक़्त का इंतजार है। एक नाथ शिंदे की पार्टी शिवसेना के पास सात सांसद है। जिसे प्रधान मंत्री मोदी असली शिवसेना कहते हैं। लेकिन उनकी पार्टी से केवल एक व्यक्ति को मंत्री बनाया गया। जबकि जतिन राम माझी अपनी पार्टी के अकेले सांसद हैं,उन्हें कैबिनेट मंत्री बनाया गया है। प्रफुल्ल पटेल पिछली बार कैबिनेट मंत्री थे,इस बार उन्हें राज्य मंत्री बनाए जाने का आफर था। अजीत पवार ने कहा,सरकार चलाने का अनुभव हमारे पास है।हमें फुसलाने की कोशिश न करें। ऐसे नहीं चलेगा। लल्लन सिंह को पशुपालन विभाग मिला है। जबकि इन्हें कोई बड़ा विभाग मिलने की उम्मीद थी। जाहिर सी बात है, कि इनका सियासी अपमान किया गया है। उद्धव ठाकरे कह रहे हैं, पी.एम. के रूप में मोदी पसंद नहीं हैं। नीतिन गडकरी हों तो विचार करेंगे। यानी गुजरात मानुस और मराठा मानुस में टकराहट वाली बात है। दिल्ली अपने अनुरूप यू.पी. में राजनीति करना चाहती है। योगी को हटाना चाहती है।योगी राजनाथ,नीतिन गडकरी,और जेपी नड्डा से भी मिले।25 टिकट अमित शाह ने दिये और सीट नहीं आई तो योगी आदित्यनाथ का इसमें क्या दोष? जबकि महाराष्ट्र बीजेपी के हाथ से निकल गया है। बीजेपी सरकार के अल्पमत होने पर संघ प्रमुख मोहन भागवत ने मोदी पर निशाना साधा। जिस विचार धारा के पालने में बीजेपी पली, वही अब संघ को आंखें दिखाए,ऐसा नहीं चलेगा। मोहन भागवत ने दो टुक कह दिया। मणिपुर में पिछले कई माह से अशांति का वातावरण है। मगर उसे हल करने कोशिश नहीं की गयी।इसे प्राथमिकता में रखते हुए शांति बहाली का प्रयास किया जाना चाहिए। इस मामले में विपक्ष संसद में भी पूछता रहा,कि प्रधान मंत्री मणिपुर पर खामोश क्यों हैं? एक वर्ष से भी अधिक समय बीत गया, मगर मणिपुर में हिंसा कायम है। कुकी और मैतेई समुदाय के बीच संघर्ष चल रहा है। अपनी -अपनी चाहत - नीतीश चाहते हैं जब महाराष्ट्र,हरियाणा और झारखंड के चुनाव की घोंषणा हो तो बिहार का भी। वो जानते हैं,अब वोट बीजेपी में स्थानांतरित नहीं हो रहा है बिहार में। पिछले विधान सभा में भी यही हुआ था। विधान सभा चुनाव हो जाने पर वो स्वतंत्र हो जाएंगे। जबकि बिहार में चुनाव अगले साल होना है। नीतीश के मन का नहीं होने पर नाराजगी का ठिकरा भी फूटेगा। वैसे जेडीयू अपनी नाराजगी का संकेत देना शुरू कर दिया है। जेडीयू के प्रवक्ता के. सी. त्यागी ने अग्निवीर और यूनिफार्म सिविल कोड पर सवाल उठा दिए हैं। त्यागी ने साफ- साफ कहा,कि अग्निवीर योजना को लेकर लोगों में नाराजगी है।हमारी पार्टी इस पर विस्तार से चर्चा चाहती है। मुस्लिम आरक्षण खत्म करना,वन नेशन वन इलेक्शन,प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट में बदलाव,वक्फ बोर्ड खत्म करना,सीएए का कम्पलीट इम्प्लिमेंटेशन और यूनिफाॅर्म सिविल कोड पर जेडीयू चर्चा चाहती है। टीडीपी भी इन सभी मुद्दों पर बीजेपी के पक्ष में नहीं है। खासकर मुस्लिम आरक्षण,महिला आरक्षण,वक्फ बोर्ड को खत्म करना,प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट को खत्म करना। जाहिर सी बात है कि एनडीए सरकार बनाने में फेवर करने वाले दलों के तेवर स्पीकर के चुनाव तक संयमित रहेगा,इसमें संदेह है। तोल- मोल की सरकार कितने घर चलेगी न मोदी जानते हैं ,न ही नीतीश और न ही चन्द्रबाबू नायडू। मोहन भागवत से लेकर पूरा विपक्ष इंतजार कर रहा है, अपने टाइम का।

Wednesday, June 12, 2024

अबकी बार खत्म हुआ मोदी का एकाधिकार





"तीसरी बार मोदी सरकार मजबूत या फिर मजबूर,यह सवाल संसद में विश्वास मत हासिल करने तक कायम रहेगा। साथ ही मोदी की अग्नि परीक्षा भी है, गठबंधन की सरकार चलाना। क्यों कि एनडीए के घटक दलों की विचार धारा बीजेपी से मेल नहीं खाती है। उन्हें कड़े फैसले लेने में भी जदयू और टीडीपी से सहमति लेनी पड़ेगी।क्यों कि अबकी बार मोदी का एकाधिकार खत्म हो गया है।"
- रमेश कुमार 'रिपु'
अबकी सरकार में सियासी दलों के एजेंडे अपने-अपने हैं। सब अलग भी हैं। जुड़े भी हैं। दबंग चन्द्रबाबू नायडू मोदी के साथ हैं भी,नहीं भी हैं। नितिश ने मोदी का पैर छूकर सम्मान दिया मगर, कब पलट जाएंगे, इसका एहसास मोदी की मंडली को है। सभी छुट्टे हैं। पाला बदलने में एक मिनट की भी देरी नहीं करेंगे।लेकिन सुविधानुसार।सहूलियत के हिसाब से सांप सीढ़ी वाली राजनीति में अपने पासे फेंकेंगे।नितिश और चन्द्रबाबू नायडू कब तक साथ रहेंगे, यह लोकतंत्र की सियासत का वक़्त भी नहीं जानता। कल तक मोदी बीजेपी के प्रधानमंत्री थे। अब एनडीए के प्रधान मंत्री रहेंगे।दरअसल सत्ता की थैली में चिल्हर ज्यादा हो गए हैं। आगे भी रहेंगे। इंडिया गठबंधन की थैली हो या फिर एनडीए की थैली। दोनों एक समान है।राष्ट्रीय रुतबे का अवसान हो रहा है तेजी से। दोनों हताश हैं। क्या कांग्रेस और क्या भाजपा। लेकिन सबकी अपनी- अपनी रणनीतियां हैं। इस बार विपक्ष पिछली दफ़ा से कहीं अधिक मजबूत है। वहीं मोदी का अबकी बार एकाधिकार भी खत्म हो गया। मजबूर हैं और रहेंगे । क्यों कि पेंच बहुत है। पैतरे बाजी भी अनगिनत। कहने को नौ जून को प्रधान मंत्री पद के शपथ तक और मंत्रिमंडल के गठन तक सभी जुड़े हैं।मगर अलग भी हैं।

शर्तो की राजनीति - कुछेक ऐसे सवाल है,जिनसे आज नहीं, तो कल रूबरू होना पड़ेगा। मोदी को। पूरे देश को। पूरे विपक्ष को। शर्तो की राजनीति या फिर कहें शर्तो की बुनियाद पर टिकी एनडीए की सरकार। एनडीए के सांसदों की बैठक में मोदी ने कहा, एनडीए की सरकार बनने जा रही है। इसके पहले 2014 और 2019 में बीजेपी की सरकार कहा था। अटल जी की सरकर की तरह मोदी की सरकार के दिन भी आ सकते हैं। कई दलों की बग्गी वाली सरकार, एक ही दिशा में कब तक चलेगी, मोदी भी नहीं जानते। क्यों कि मोदी कभी ऐसी राजनीति किये नहीं। गुजरात में मुख्यमंत्री थे,तब भी वो एकाधिकार की राजनीति किये हैं। पिछले दस साल में उन्होंने ऐसा कोई दल नहीं,जिसे ठगा नहीं। और कोई ऐसा दल नहीं,जिसे खत्म करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।गोवा,महाराष्ट्र,उत्तराखंड और मध्यप्रदेश को कोई भूला नहीं है। गिरते शेयर बाजार और गिरते रुपए की तरह इस चुनाव में मोदी की साख गिरी है। पिछली बार छह लाख वोट से जीतने वाले मोदी इस बार डेढ़ लाख वोट पर सिमट गए। शिवराज सिंह चौहान को मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री बनाने की बजाए किनारे कर दिया था, वो आठ लाख बीस हजार वोट से जीते। जाहिर सी बात है, भाजपा के अंदर इस चुनाव ने कई खेमे बनने की रेखा खींच दी है। आज नहीं तो कल दिखेगी।

मनमाफिक मंत्री पद चाहिए - नरेन्द्र मोदी के प्रधान मंत्री के पद की शपथ लेने से पहले ही सियासी उथल पुथल की झलक दिखने लगी है। नितिश और चन्द्रबाबू नायडू दोनों को अपने-अपने प्रदेश के लिए विशेष दर्जा चाहिए। उनकी अपनी सियासी शर्त भी है। चन्द्रबाबू नायडू को लोकसभा का अध्यक्ष पद चाहिए। वो जानते हैं, मोदी और अमितशाह का भरोसा नहीं। उनके सांसदों को कभी भी तोड़ सकते हैं। बीजेपी का स्पीकर होगा तो मोदी की ही सुनेंगे।जगन रेड्डी के चार सांसद बीजेपी की ओर जा रहे हैं, अभी से हल्ला है. नायडू को परिवहन मंत्रालय चाहिए। गृहमंत्रालय चाहिए। ताकि पुलिस और सीबीआई उनके साथ रहे। सभावना है कि नागरिक उड्डयन,इलेक्ट्रानिक,आईटी,शहरी विकास और स्टील मंत्रालय मिल सकता है। नितिश को रेल मंत्रालय और वित्त विभाग चाहिए। ताकि ईडी उनके पास रहें। पंचायती राज ग्रामीण विकास,कृषि जैसे मंत्रालय मिल सकता है। एनडीए के घटक दलों में नायडू और नितिश इस बार मोदी का एकाधिकार खत्म करने वाले विभाग चाहते हैं। इनकी पार्टी के सांसदों को कौन सा मंत्री पद मिलता है,दो तीन दिन बाद पता चलेगा। वैसे मोदी नहीं चाहेंगे कि रक्षा,वित्त,गृह और विदेश मंत्रालय एनडीए के दलों के पास हो। बीजेपी के प्रवक्ताओं की ओर से कहा जा रहा है,कि गठबंधन का प्रेशर बीजेपी नहीं लेगी। किसी सहयोगी की अतार्किक    अनावश्यक मांग के आगे नहीं झुकेगी। गठबंधन के नियमों और गठबंधन धर्म के तहत काम होगा।

कई मोर्चे पर चिंतन - देखा जाए तो सरकार नितिश और नायडू के पर्स में हैं। यानी इस बार भाजपा लस्त पस्त है। लकवाग्रस्त है। नेता हैं,पर निष्प्रभ। कम सीटें आने से पार्टी के नेता हताश हैं। एक साथ कई मोर्चे पर चिंतन चल रहा है। मोदी से भी अधिक वोटों से जीत कर आने वाले नेताओं की भरभार है। कहने को तो सामूहिक नेतृत्व। पर लचर,लाचार। संघ की निगाहें टिकी है मंत्रिमंडल के गठन पर। इस बार मोदी संघ की कितनी सुनते हैं,सवाल यह भी है। नड्डा बोल ही चुके हैं,बीजेपी बड़ी पार्टी हो गयी है,उसे संघ की जरूरत नहीं है। यदि मोहन भागवत ने संघ वाले सांसदों से कह दिया,कि वो मोदी को अपना नेता न चुनें तो बीजेपी के अंदर की सियासत बदल जाएगी। इस बार पूरी पार्टी मोदी की जेब में नहीं है। मोदी के मंत्रिमंडल में नितिन गडकरी को स्थान नहीं मिलने पर चाल चरित्र और चेहरा की बात करने वाली पार्टी की तस्वीर भी बदल सकती है। भाजपा मोदी की जागीर है या फिर संघ की। यह सवाल देर सबेर धूल की तरह उढ़ सकता है।
बीजेपी के 14 सहयोगियों के पास 53 सीटें हैं। पी.एम.आवास में हुई बैठक में इन्होंने लिखकर दिया है कि हमारा समर्थन मोदी के साथ है। सबके मन में मंत्री बनने की चाह है। छोटे- छोटे राज्यों के दलों को भी जोड़ने में बीजेपी लगी है। गठबंधन धर्म सरकार चलाने में रोड़ा बन सकते हैं। अभी से सियासी कयास लगाए जाने लगे हैं। क्यों कि कुछ ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर मोदी अपने कदम पीछे नहीं किये तो सरकार गिर जाएगी। उन्हें भी समझौता करना पड़ सकता है। मसलन - एक देश एक चुनाव। इसके खिलाफ है टीडीपी, जबकि जदूय इसके समर्थन में है। विपक्ष भी नहीं चाहता एक देश एक चुनाव। परिसीमन के भी विरोध में है टीडीपी। बीजेपी ने 2029 तक महिला आरक्षण का वादा किया है। यह परिसीमन पर ही लागू होगा। इसी तरह युनिफार्म सिविल कोड को बीजेपी पूरे देश में लागू करना चाहती है। उत्तराखंड में लागू हो चुका है। मोदी इसे राष्ट्रीय प्राथमिकता से अलग कर सकते हैं। राम मंदिर बनने का लाभ बीजेपी को देश में क्या यूपी में भी नहीं मिला। अयोध्या,चित्रकूट,सीतापुर,बस्ती,प्रयागराज,सुल्तानपुर,रामटेक,कोप्पल,रामेश्वरम,नासिक, में बीजेपी हार गयी है। इसलिए काशी मथुरा का दावा अब बीजेपी नहीं करेगी। टीडीपी ने सन्2018 में आंध्र को विशेष दर्जा नहीं दिये जाने पर बीजेपी से नाता तोड़ लिया था। इसी तरह मुस्लिमों को चार फीसदी आरक्षण देने के मुद्दे पर दोनों पार्टियों में टकराव हो सकता है। जदयू सार्वजननिक क्षेत्र की कंपनियों में विनिवेश के खिलाफ है। बीजेपी को अपने कदम पीछे करना पड़ सकता है।अग्निवीर मामले में बीजेपी को अपना फैसला बदलना पड़ सकता है। जदयू नेता के.सी.त्यागी ने कह दिया है,बनने पर सरकार इस पर विचार करे।
तीसरा कार्यकाल चुनौती भरा - मोदी का तीसरा कार्यकाल चुनौती भरा है। क्यो कि एनडीए घटक दलों को मोदी खुश किये बगैर कोई भी फैसला नहीं ले पाएंगे। मोदी सरकार पर आने वाले तीन महीने चुनौती भरे होंगे। इसलिए कि इसी साल महाराष्ट्र,हरियाणा और झारखंड में चुनाव है। हरियाणा में 2019 में बीजेपी की दस सीटें थी। इस बार घटकर पांच सीट हो गयी है। कांग्रेस को पांच सीट मिली है। जाहिर है हरियाणा जीतना मुश्किल हो सकता है। झारखंड में झामुमो और कांग्रेस की सरकार है। वहां भी दलित आरक्षण मुद्दा विधान सभा तक कायम रहा तो बीजेपी के लिए नुकसान हो सकता है। महाराष्ट्र में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी है। उसे दस सीट मिली है। जाहिर है कि मोदी के लिए सरकार चलाना अग्नि परीक्षा से कम नहीं है। अभी तो बवाल इसी बात के लिए है कि कम सांसद वाले नेताओं को मंच पर बिठाया गया और ज्यादा सांसद वालों को दर्शक दिर्घा में। यू.पी. के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी को लेकर अमितशाह भारी नाराज हैं। जबकि मोदी ने उनकी पीठ थपथपा दी है। यानी मोदी समझ रहे हैं, कि नेहरू के तीन बार प्रधान मंत्री बनने के रिकार्ड की बराबरी करना है,तो सबको खुश करके चलना पड़ेगा।

 

Thursday, June 6, 2024

अबकी बार बैसाखियों पर सरकार

 


केन्द्र में अबकी बार मोदी या फिर बीजेपी की नहीं बल्कि, एनडीए की सरकार होगी। लेकिन बैसाखियों के सहारे चलने वाली सरकार के प्रधानमंत्री नरेन्द मोदी पहले की तरह ताकतवर नहीं रहेंगे। नितिश के पास बहुत विकल्प हैं। चंन्द्रबाबू नायडू और नितिश की विचारधारा मोदी से मेल नहीं खाती। इसलिए हमेशा संशय बना रहेगा सरकार के गिरने का।

- रमेश कुमार ‘रिपु’
अबकी बार चार सौ पार वाला नारा चार जून की शाम को बूढ़ा हो गया। इसी के साथ मोदी की राजनीति के चेहरे पर झुर्रियां आ गयी। और उनकी सत्ताई सियासत बैसाखी पर आ गयी। अपने मन की बात कहने वाले को अब दूसरे के मन की बात सुननी पड़ेगी। मोदी प्रधान मंत्री बनेंगे या फिर संघ किसी और को आगे करेगा। यह सवाल अभी दो -चार दिन सियासी गलियारे में दौड़ते रहंगे। वैसे मोदी ने राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्म को इस्तीफा दे दिया है।साथ ही मंत्रिमंडल भंग करने सिफारिश कर दी है। अब सबकी निगाहें टिकी है कि एनडीए का जो हिस्सा हैं,वो क्या मोदी को प्रधान मंत्री आसानी से बन जाने देंगेे या फिर बारगनिंग करेंगे? चंद्रबाबू नायडू और नितिश के हाथ में सत्ता की चाबी है। सबसे बड़ा सवाल यह है, कि नितिश के साथ मोदी ने जो किया क्या वो भूल जाएंगे? चंन्द्रबाबू नायडू को जेल में डाल दिया गया था।उनके खिलाफ जीएसटी, इंटेलिजेंस,आईटी,ईडी सहित कई एजेसियां इसकी जांच कर रही हैं।

गुजरात लाॅबी की मजबूरी - लोकसभा चुनाव के समय मोदी ने नितिश को मंच में साझा नहीं किया था। उनका सियासी अपमान खूब किये थे। क्या वो अब जब मोदी की जरूरत बने हुए है,उनके साथ जाएंगे? चंद्राबाबू नायडू और मोदी की विचार धारा में भिन्नता है। यही स्थिति नितिश की है। दोनों सेक्यूलर हैं। मोदी इस बार चुनाव में खुले मंच से मुस्लिमों की खिलाफत किये हैं। वो टोपी पहनते नहीं। उन्हें मुसलमानों का वोट चाहिए नहीं। वो जातीय गणना के खिलाफ है। मुस्लिम आरक्षण के खिलाफ हैं। ऐसे में ये दोनों नेता क्या मोदी को प्रधान मंत्री की शपथ आसनी से ले लेने देंगे। यदि ले भी लिये, तो कितने दिन मोदी प्रधान मंत्री की कुर्सी में रहेंगे? सबसे बड़ा सवाल यह है, कि गुजरात लाॅबी से जिसने भी हाथ मिलाया,उसका सियासी वजूद खत्म हो गया। या खत्म करने में कोई कमी नहीं की गुजरात लाॅबी ने। ऐसा कोई भी नहीं है,जिसे गुजरात लाॅबी ने ठगा न हो। उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री कुर्सी से हटा दिया। उनकी पार्टी तोड़ दी। उनका सियासी सिंबल छीन लिया। शरद पवार के साथ भी यही हुआ। उनकी पार्टी तोड़ दी। अजीत पवार को ही असली एनसीपी बना दिया। नवीन पटनायक की आज जो सियासी हालत हुई,वो गुजरात लाॅबी की वजह से हुई। मोदी ने केजरीवाल और हेमंत सोरेन को जेल भेज दिया। इंडिया गठबंधन में ऐसा कोई सियासी दल नहीं है,जो मोदी से प्रताड़ित न हो। ऐसे में इंडिया गठबंधन वाले मोदी का साथ देंगे,इसमे संदेह है। बीजेपी केा इतनी सीट नहीं मिली कि मोदी प्रधान मंत्री अकेले अपने दम पर बन सके। मोदी की सोच और विचारधारा नायडू और नितिश सेे मेल नहीं खाती। ऐसी स्थिति में स्पष्ट है कि नितिश उप प्रधान मंत्री अथवा गृहमंत्री के पद के साथ ही बिहार में जेडीयू का मुख्यमंत्री बने, इसकी मांग कर सकते हैं। यदि ऐसा हो भी गया तो मोदी को अपनी विचार धारा और लीडर शिप से अलग जाकर हर दिन नायडू और नितिश को फोन करके,उनका सियासी हाल चाल पूछना पड़ेगा। यानी आज के सियासी हालात में नितिश और नायडू किंग मेकर की भूमिका में है।  
संघ की पसंद बदल गयी तो..- मौजूदा सियासी हालात मोदी के पक्ष में नहीं। यदि बात नहीं बनी तो संघ मोदी को किनारे कर नीतिन गडकरी को आगे कर सकता है। वैसे भी मोहन भागवत और मोदी में पिछले छह माह से कुछ ज्यादा ही छत्तीस का सियासी रिश्ता हो गया है। नागपुर में मोदी से मोहन भागवत और गडकरी बुलाने के बावजूद नहीं मिले। यह बात मोदी को बुरी लगी। और वो वहां से आने के बाद नड्डा के जरिये कहलवा दिये कि अब बीजेपी को संघ की जरूरत नहीं है। बीजेपी बड़ी पार्टी हो गयी है। बीजेपी अटल के दौर से आगे निकल गयी है। लेकिन चुनाव परिणाम बता रहे हैं,कि मोदी की बीजेपी,अटल की तरह हो गयी है। उसे भी सियासी बैसाखी की जरूरत पड़ गयी है।मोदी चट मंगनी पट व्याह चाहते हैं। ताकि संघ को मौका न मिले। मोदी की बैठक में अमितशाह,राजनाथ सिंह और जेपी नड्डा ही थे। गडकरी नहीं थी। मोदी फटाफट सरकार बन जाए,इसके फिराक में है। छोटे- छोटे राज्यों की पार्टी का समर्थन लेना मोदी की विवशता रहेगी। मेघालय, नागालैण्ड,मिजोरम,मणिपुर आदि राज्य की पार्टियों से अमितशाह और मोदी बात कर रहे हैं। यदि ये इंडिया गठबंधन के साथ चले गए तो मोदी के बुरे दिन आ जाएंगे। राफेल कांड,जस्टिस रोया की हत्या कांड,पीएम फंड घोटाला, इलेक्टोरल बांड,अडानी को बेची गयी संपत्तियां,उद्योगपतियों के माफ किये कर्ज आदि मामले उठेगें। वैसे इडिया गठबंधन ने दो टुक कह दिया है कि डीएमके के लिए दरवाजे खुले हैं।

बैसाखी टूटने का संशय - केन्द्र में अबकी बार मोदी या फिर बीजेपी की नहीं बल्कि एनडीए की सरकार होगी। लेकिन बैसाखियों के सहारे चलने वाली सरकार के प्रधानमंत्री नरेन्द मोदी पहले की तरह ताकतवर नहीं रहेंगे। नितिश के पास बहुत विकल्प हैं। चंन्द्रबाबू नायडू और नितिश की विचारधारा मोदी से मेल नहीं खाती। इसलिए हमेशा संशय बना रहेगा सरकार के गिरने का। फ्लोर टेस्ट में मोदी को विश्वास मत हासिल करना होगा। अपना लोक सभा अध्यक्ष बनाना मोदी को इस बार कठिन हो सकता है। इतना ही नहीं रेड कारपोरेट पर मोदी को अपनी बैसाखी देने वालों का रेट ज्यादा रहेगा। वैसे भी नितिश ने छह माह पहले ही कह दिया था, कि जो 2014 में आए हैं,वो 2024 में नहीं आएंगे। यानी कह सकते हैं कि अबकी बार मोदी को प्रधान मंत्री बनने के लिए नायडू,नितिश और मोहन भागवत तीनों की जरूरत है। तेजस्वी यादव की बात को दरकिनार नहीं किया जा सकता कि चचा चार जून के बाद कोई बड़ा फैसला ले सकते हैं।

क्या भूल जाएंगे - नितिश क्या इस बात को भूल जाएंगे  मोदी उनकी पार्टी को तोड़ कर बीजेपी की सरकार बिहार में बनाने जा रहे थे। उनके लोगों को गुजरात लाॅबी अपने पक्ष में कर लिया था। नितिश को भनक लग गयी और वो राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव से हाथ मिलाकर मुख्यमंत्री बन गए। नितिश मोदी को सबक सिखाने ममता बनर्जी,उद्धव ठाकरे,केजरी वाल,अखिलेश यादव सहित अन्य 28 दलों को एक मंच पर लाए। इंडिया की नीव की नितिश ने ही रखी थी। यह अलग बात है कि बीते जनवरी में पाला बदल कर फिर एनडीए में शामिल हो गए। जाहिर है कि उनके लोग यानी उनकी पार्टी के सारे विधायक मोदी के साथ जाने के पक्ष में नहीं है। नितिश सेक्यूलर विचारधारा के समर्थक है। लल्लन सिंह और विजेन्द्र प्रसाद का कहना कि नितिश मोदी के साथ न जाए।
 चन्द्रबाबू नायडू को आठ माह पहले स्किल डेवलपमेंट घोटाले (कोशल विकास मामला) पुलिस ने हिरासत में ले लिया था। दो महीने तक जेल में थे। आंध्र प्रदेश सरकार ने स्किल डेवलपमेंट एक्सीलेंस सेंटर की स्थापना के लिए सीमेेंस और डिजाइन टेक के साथ 3356 करोड़ रुपए का समझौता किया था।समझौते के मुताबिक टेक कंपनी को इस प्रोजेक्ट में 90 फीसदी हिस्सेदारी वहन करनी थी। लेकिन यह बात आगे नहीं बढ़ी। आंध्र प्रदेश सरकार ने अपने हिस्से की हिस्सेदारी 371 करोड़ रुपए जारी कर दिया था। आंध्र की सीआईडी ने कौशल विकास के लिए जारी फंड को दुरूप्रयोग का आरोप लगाते हुए कहा था,सीमेंसे प्रोजेक्ट की लागत को बढ़ा चढ़ाकर 3300 करोड़ रुपए कर दिया था। पुलिस का कहना था, कि इस प्रोजेक्ट की वास्तविक लागत 58 करोड़ रुपए थी। जीएसटी, इंटेलिजेंस,आईटी,ईडी सहित कई एजेसियां इसकी जांच कर रही हैं। मोदी के समक्ष नायडू भी कई शर्ते रख सकते हैं।
एक समय नितिश और नायडू दोनों मोदी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोले हुए थे। दोनों सियासत के मजे उस्ताद हैं। यानी अब मोदी अपनी मनमानी नहीं कर पाएंगे। सत्ता में जिनकी भागेदारी रहेगी,यदि उनकी नहीं सुनी गयी, तो हाथ खींच कर सरकार गिरा भी सकते हैं।  
ममता दोनों एन से करेंगी बात - इंडिया गठबंधन का कहना है कि एनडीए घटक दलों के भी दरवाजे खुल हैं। वैसे शरद पवार नितिश और चंद्रबाबू नायडू से बातें कर रहे हैं। ममता बनर्जी को राहुल गांधी कहेगे कि वो नायडू और नितिश से बातें करें। इसलिए कि ममता बनर्जी की इन दोनों नेताओं से पटती है। जयराम  रमेश ने चंन्द्रबाबू नायडू को 2014 में तत्कालीन प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह के उस वायदे को याद दिलाया जिसमें आन्ध्र प्रदेश को पांच साल तक स्पेशल स्टेटस देने की बात कही गयी थी। उन्होंने ट्वीट किया, जिसमें चंन्द्र बाबू नायडू यह कह रहे हैं,कि सभी नेता मोदी से बेहतर हैं। चन्द्रबाबू नायडू ने कहाथा,कि आन्ध्र प्रदेश को स्पेशल स्टेटस नहीं मिलने की वजह से उन्होंने बीजेपी को छोड़कर कांग्रेस का हाथ पकड़ लिया था।
एक सच ऐसा भी - सुबह सबेरे के 18 मई के अंक में मैंने लिखा था कि अबकी बार अल्पमत सरकार। उसमें जिन बातों का जिक्र किया था, वो सारी बातें सटीक रही। बहरहाल केन्द्र में नयी सरकार के गठन तक नित्य कई बयान चौकाने वाले आएंगे। जैसा कि जेडीयू के एलएलसी अनवर खालिद ने कहा कि नितिश से बेहतर प्रधान मंत्री और कौन हो सकता है? वहीं आम आदमी पार्टी के नेता गोपाल राय ने नितिश और चन्द्र बाबू नायडू से सही फैसला लेने की अपील की है। नितिश के 12 सांसद और चन्द्र बाबू नायडू के 16 सांसद मोदी के साथ नहीं जाते हैं तो एनडीए 264 पर आ जाएगी। अकेले बीजपी की 240 सीट है। यानी उसे 32 सीट और चाहिए। इंडिया गठबंधन के पास 234 सीट है। बैठक में इंडिया गठबंधन फैसला करेगा कि वो विपक्ष में बैठेगा या फिर कोई खेला करना चाहिए।

 

Monday, June 3, 2024

बीजेपी के बीमार होने पर कौन होंगे सियासी डाॅक्टर




"मोदी बनाम अन्य का मुकाबला अबकी बार दिलचस्प रहा। सवाल यह है कि बीजेपी को बहुमत नहीं मिलने पर वो बीमार हो गयी तो उसके इलाज के लिए किस- किस दल के नेता डाॅक्टर की भूमिका में होंगे।क्यों कि बीजेपी की हर राज्य में सीटें कम हो रही है। गुजरात लाॅबी आखिर करेगी क्या?

0 रमेश कुमार ‘रिपु’
 लोकतंत्र की तस्वीर बदलने वाली है। सोशल मीडिया में यही शोर है। वैसे मोदी बनाम अन्य का मुकाबला अबकी बार दिलचस्प रहा। सवाल यह है कि बीजेपी को बहुमत नहीं मिलने पर वो बीमार हो गयी तो उसके इलाज के लिए किस- किस दल के नेता डाॅक्टर की भूमिका में होंगे?क्यों कि बीजेपी की हर राज्य में सीटें कम हो रही है। ऐसे में गुजरात लाॅबी करेगी क्या?मोदी ने एएनआई को दिये गये साक्षात्कार में कहा कि हिन्दुस्तान में हमारे सभी राजनीतिक दलों के नेताओं के साथ दोस्ती है। लोकतंत्र में दुश्मनी नहीं,दोस्ती ही होती है। जाहिर है कि उनके मन में संदेह है। एक डर है। घबराहट है। मोदी का रथ यू.पी में ही फंस गया तो धक्का देने कौन आगे आएगा?  क्यो  कि अबकी बार विपक्ष बीजेपी के वोट बैंक में सेंध लगाने में कामयाब रहा। मतदान का रूझान देखकर इडिया गठबंधन उत्साहित है।
अपनी अपनी रणनीति - नरेन्द्र मोदी तीसरी बार चुनाव के सिकंदर नहीं बने तो बीजेपी के पंडाल में भगदड़ मच सकती है।   गुजरात लाॅबी की नजर है कि नवीन पटनायक कमजोर हो तो उन्हें फांस लिया जाए। विधान सभा चुनाव से पता चलेगा कि ओड़िसा की राजनीति की दशा और दिशा। वैसे सीताराम येचूरी से नवीन पटनायक कह चुके हैँ कि मोदी पर भरोसा नहीं किया जा सकता। जो लोग न्यूटल हैं,उन्हें बीजेपी के पंडाल में लाने हर सियासी प्रयास होंगे। मसलन बसपा,बीजद,वाईएसआर कांग्रेस, बीआरएस आदि। इन सब के बीच तेजस्वी यादव कह रहे हैं पिछड़ों की राजनीति को बचाने और अपनी पार्टी को बचाने नितिश कोई बड़ा फैसला ले सकते हैं। नितिश एक बार फिर पलटी मार सकते हैं। सरकार बनाने के लिए राहुल गांधी इंडिया गठबंधन के 28 दलों की बैठक एक जून को कर रहे हैं। इसमें शरद पवार,अखिलेश यादव,उद्धव ठाकरे,केजरीवाल आदि इस बैठक में बताएंगे उनकी पार्टी को कितनी सीटें मिल सकती है। सवाल यह भी आएगा,कि यदि बहुमत नहीं मिला तो कौन नवीन पटनायक को लाएगा। एक दो सीट अकाली दल को मिला तो कौन उनसे मिलेगा।ममता बनर्जी कह ही चुकी हैं,कि वो इंडिया गठबंधन का हिस्सा बनना पसंद करेंगी। आंन्ध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री जगन रेड्डी और तेलंगाना के पूर्व मुख्यमंत्री के.सी.आर. दोनों न्यूटल है।लेकिन केसीआर ये नहीं भूले हैं,कि मोदी की वजह से उनकी बेटी कविता जेल में है। ये किसका साथ देंगे। चन्द्रबाबू नायडू किसका साथ जाएंगे। इस पर भी बात होगी। सरकार बनाने के लिए एक तरफ बीजेपी की चाणक्य मंत्रणा हेागी तो दूसरी ओर इंडिया गठबंधन की अपनी रणनाीति होगी।

गुजरात लाॅबी को संशय - इस समय सोशल मीडिया में चर्चा है कि अपने बूते पर बीजेपी की सरकार नहीं बन रही। हर राज्यों में उसकी सीट घट रही है। सवाल है,कि घट रही सीट की पूर्ति किस राज्य में होगी? यूपी, बिहार, मध्यप्रदेश, राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र को मिलाकर कुल 248 सीट होती है। सन् 2019 बीजेपी अपने सहयोगी दलों की मदद से 215 सीट जीती थी। लेकिन जिन सहयोगी दलों के बूते बीजेपी सत्ता की सीढ़ी चढ़ी थी,वो उससे अलग हो गए हैं। यूपी,महाराष्ट्र,और बिहार सबसे अधिक सीट वाले राज्य हैं। इन राज्यों में बीजेपी के खिलाफ खेला होने पर बीजेपी बीमार हो सकती है। गुजरात लाॅबी को सरकार को लेकर संशय में है। दुविधा है। यदि चुनाव पलटा तो किसके हाथ में होगी सत्ता। संघ की भी नजर 4 जून की चुनाव परिणाम पर है, यदि सरकार नहीं बनी तो संघ नितिन गडकरी को आगे कर सकता है.एक जून को अंतिम चुनाव है। मोदी एक जून को खुद पर फोकस कराने के लिए वे कन्याकुमारी में 48 घंटे का ध्यान कर रहे हैं। ये भी वोट पाने का हथकंडा है। पिछले एक पखवाड़े से अस्थिर सरकार के अंदेशे में शेयर बाजार गिर रहा है। सोने-चांदी की कीमतें बढ़ रही है।

निगाहें नितिश पर - चुनाव परिणाम से पहले आज तक के राजनीतिक विश्लेषक प्रदीप गुप्ता का दावा है 2019 जैसी बीजेपी की स्थिति है। प्रशांत किशोर कह रहे हैं 303 सीट बीजेपी कोे मिलेगी। वहीं एबीपी न्यूज के यशवंत देशमुख कह रहे हैं,बीजेपी की सरकार बनेगी। जबकि योगेन्द्र यादव कह रहे हैं बीजेपी को 240-250 सीट मिलेगी। चूंकि इस बार हर राज्यों के क्षत्रप 2019 की तुलना में कहीं अधिक मजबूत हैं। वो बीजेपी से सीटें छीन रहे हैं। महाराष्ट्र में गुजराती और मराठी अस्मिता का सवाल है। वहीं बिहार में मोदी से पूरे चुनाव में नितिश नाराज रहे । मोदी ने उनके साथ मंच साझा नहीं किया। नितिश धर्म निरपेक्षता और सामाजिकता की बात की। जबकि मोदी ने चुनाव में जाति धर्म को ले आए। जेडीयू का वोटर बीजेपी में शिफ्ट हुआ नहीं। यदि नितिश इस बार 16सीट में 10-12 सीट जीत गए और बीजेपी को बहुमत के लिए इतनी ही सीट की जरूरत पड़ने पर क्या वो पलटी मार सकते हैं? उनका कहना था,जो 2014 में आए हैं,वो 2024 में नहीं आएंगे। जैसा कि तेजस्वी ने कहा कि चार जून को चचा कोई बड़ा फैसला लेंगे। वैसे जेडीयू में दो खेमें हैं। लल्लन सिह और विजेन्द्र यादव आरजेडी के साथ जाना चाहेंगे। कुछ लोग बीजेपी के पक्षधर हैं। जबकि सामाजवादी विचारधारा वालों का जेडीयू में बहुमत है। नितिश को जरा भी संदेह हुआ कि उनकी पार्टी को खत्म करने की साजिश हो रही है तो वो पाला बदल देंगे।

क्षत्रपों की राजनीति बुरे दौर में - मोदी ने ज्यादातर दलों के घर ईडी,सीबीआइ और आइटी भेजकर परेशान किया। यानी मोदी के समय राज्यों के क्षत्रपों की राजनीति बुरे दौर में थी। उत्तराखंड,गोवा,कर्नाटक,मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र की राजनीति को विपक्ष भूला नहीं है। राहुल जिस आरोप के बूते खड़े रहे पूरे चुनाव में,उसनेे विपक्ष को ताकत दिया है। हिम्मत दिया है। माना जा रहा है कि राहुल गांधी भारत जोड़ो यात्रा और न्याय यात्रा के साथ न्याय गारंटी न लाते तो वोटर का नजरिया न बदलता। वैसे भी मोदी के शासन में 651 योजनाओं को पैसा लाभार्थियों तक गया नहीं।

बीजेपी की रफ्तार धीमी हुई - देश की राजनीति में तीन नेताओं ने अपनी रेखाएं खींच दी है। अखिलेश यादव,उद्धव ठाकरे और तेजस्वी यादव। इन तीन नेताओं की वजह से बीजेपी और एनडीए की रफ्तार धीमी हुई है। मोदी ने उद्धव ठाकरे की पार्टी तोड़ दी। उनकी सरकार गिरा दी। उनकी पार्टी का सिंबल छीन लिया। ऐसे में मोदी का साथ उद्धव नहीं देंगे।शरद पवार चार जून के बाद अपनी पार्टी का विलय कांग्रेस में कर देंगे। कांग्रेस यह मानकर चल रही है कि उसे 100-120 सीट मिल रही है।

बीजेपी की हार की वजह - बीजेपी की सरकार नहीं बनने की वजह स्वयं बीजेपी के नेता चार जून के बाद गिनाने लगेंगे। लेकिन देखा जाए तो बीजेपी के नेताओं से कई गंभीर चूक हुई है। मसलन बीजेपी राम मंदिर को लेकर अति आत्मविश्वास में आ गयी। राम मंदिर मुद्दा नहीं बना तो वो कांग्रेस के घोषण पत्र में मुस्लिम लीग की छाया बताकर वोटरों को मोदी ने दिगभ्रमित किया। पूरे चुनाव को हिन्दू- मुस्लिम में बदलने की कोशिश किया। चुनाव का ध्रुवीकरण  करने की कोशिश की गयी लेकिन सफल नहीं हुए। हिन्दू को डराने कीे कोशिश किया। मोदी ने इस चुनाव में भाषा का संस्कार भूल गए। मुजरा तक आ गए। इस बार पुलवामा कांड जैसा कुछ नहीं हुआ। इस वजह से बीजेपी को राष्ट्र भक्ति का वोट नहीं मिला। विपक्ष जनहित के मुद्दों को आधार बनाया। संविधान बचाने की बात से लेकर बेरोजगारी और महंगाई को मुद्दा बनाया।
बहरहाल मोदी को शिकस्त देने मोदी विरोधी दल इस चुनाव में लामबंद हुए हैं। और अपनी ताकत की नुमाइश भी किये हैं।वहीं मोदी की छवि को इस चुनाव में उनके बयान से जबरदस्त धक्का लगा है। हिलोरें मारता विपक्ष का आत्मविश्वास बीजेपी के चार सौ पार के नारे के बीच लोकतंत्र की एक नयी तस्वीर बनाने आतुर है।

 

Saturday, May 25, 2024

संघ से पंगा सस्ता या महंगा,

 


सांस्कृतिक ताकत से सियासी मशीन में तब्दील संघ के क्या बुरे दिन आने वाले हैं? अब बीजेपी को संघ की जरूरत नहीं है कहकर जे.पी.नड्डा ने केवल  चौकाया ही नहीं है,बल्कि संकेत दे दिया है, कि पार्टी में अब आदेश नागपुर का नहीं, गुजरात लाॅबी का चलेगा। चार जून को बीजेपी को बहुमत नहीं मिला तो संघ प्रमुख गुजरात लाॅबी को दर्शक दीर्घा में बिठा देंगे और परिणाम उल्टा हुआ तो संघ का वजूद मोदी खत्म कर देंगे।  

-- रमेश कुमार ‘रिपु’
क्या वाकई में मोदी की बीजेपी बदल गयी है! उसकी चाल। उसका चेहरा। उसका चरित्र। और शुचिता अब 2014 जैसी नहीं है। इसीलिए अब बीजेपी को संघ की जरूरत नहीं। क्या वाकई में अकेले अपने दम पर बीजेपी इतनी मजबूत हो गयी है,कि उसे संघ की जरूरत नहीं है। इसीलिए बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी.नड्डा ने संघ और बीजेपी में अंतर क्या है,इंडियन एक्सप्रेस को दिये गये साक्षात्कार में देश को बताया। अटल बिहारी बजापेयी के समय बीजेपी को चलाने के लिए संघ की जरूरत थी। क्यों कि उस समय बीजेपी कम सक्षम और छोटी पार्टी हुआ करती थी। आज बीजेपी पहले से अधिक सक्षम है। बीजेपी अपने आप को चलाती है। बीजेपी के नेता अपने कर्तव्य और भूमिकाएं निभाते हैं। संघ एक सास्कृतिक और समाजिक संगठन है। जबकि बीजेपी राजनीतिक पार्टी है। संघ वैचारिक तौर पर काम करता है।हम अपने मामलों को अपने तरीके से संभालते हैं। और राजनीतिक दलों को यही करना चाहिए।

नागपुर के फैसले नहीं चलेंगे-सवाल यह है,कि ऐसा क्या हो गया इन दस सालों में,कि संघ की शाखा से निकली बीजेपी को आज संघ की जरूरत नहीं है।नड्डा ने संघ से पंगा लिया या फिर उन्हें कहा गया,कि संघ को बता दो ‘किंग ऑफ बीजेपी मोदी’ का दौर है। जिसमें बीजेपी को किसी के सहारे की जरूरत नहीं है।नड्डा के बयान पर न अमित शाह कुछ बोले औरे न ही मोदी का कोई बयान आया है। इसका सीधा मतलब है,कि अभी तक जो फैसले नागपुर से लिए जाते थे,वो अब बीजेपी के लिए दिल्ली से लिए जाएंगे।यानी कह सकते हैं,कि कभी डिफरेंट विथ अदर्स का घमंड करने वाली बीजेपी ‘पार्टी विद डिफरेंस’ बन गयी। क्या यह मान लिया जाए कि सांस्कृतिक ताकत से सियासी मशीन में तब्दील संघ के बुरे दिन आने वाले हैं? अब बीजेपी को संघ की जरूरत नहीं है कहकर जे.पी.नड्डा ने केवल चौकाया ही नहीं है,बल्कि संकेत दे दिया है कि पार्टी में अब आदेश नागपुर का नहीं गुजरात लाॅबी का चलेगा। चार जून को बीजेपी को बहुमत नहीं मिला तो संघ प्रमुख गुजरात लाॅबी को दर्शक दीर्घा में बिठा देंगे और परिणाम उल्टा हुआ तो संघ का वजूद मोदी खत्म कर देंगे।  

मोदी और मोहन में संवादहीनता - नड्डा के बयान से एक बात साफ है,कि मोदी और मोहन भागवत के बीच मधुर संबंध नहीं हैं। उनके बीच संवाद ठप है। जबकि अभी दो चरण के मतदान होने हैं। यू.पी.महाराष्ट्र ही नहीं,पूरे देश में इस बार संघ ने अपने हाथ खड़े कर लिए हैं। उसने बीजेपी को इस बार के चुनाव में कोई सहयोग नहीं किया। संघ की मदद से बीजेपी को हर चुनाव में दस से पन्द्रह फीसदी वोट का फायदा हो जाया करता था।इस बार संघ की चुप्पी साध लेने की वजह से राहुल गांधी दावा कर रहे हैं,कि मोदी चार जून को पी.एम.नहीं रहेंगे। चार जून को कौन पी.एम.रहेगा या देश को नया पीएम मिलता है,सब कुछ सियासी पर्दे के अंदर है। लेकिन नड्डा के बयान से बीजेपी के अंदर ही हांडी खदबदाने लगी है। शिवराज सिंह चौहान,योगी आदित्यनाथ,नितिन गडकरी,वसुंधरा राजे सिधिया,डाॅ रमन सिंह,राजनाथ और मुख्तार अंसारी आदि की निगाहें चार जून पर टिकी है। यदि बीजेपी को बहुमत नहीं मिला तो मोदी की वजह से जो हाशिये में डाल दिये गये हैं,वो सारे मोदी की सियासी रेखा को मिटाने आगे आ जाएंगे।

दो विचारधारायें जन्मी - सन् 1925 में गठित संघ भाजपा की कमान अपने हाथ में रखने के मकसद से हर प्रदेश में संगठन मंत्री का पद देकर अपना एक प्रतिनिधि भेजता आया है। यही संगठन मंत्री धीरे-धीरे माल कमाने वाले नेताओं के रूप में भाजपा को चलाने लगे। तभी से संघ में राजनीति को लेकर दो विचारधाराएं आकार लेने लगी। संघ के लोग बीजेपी में आकर विलासी जीवन जीने लगे। ऐसे लोग वापस संघ में जाना नहीं चाहते।मोदी इस पर लगाम लगाना चाहते हैं। देखा जाए तो संघ स्वयं अपने गठन के सिद्धातों से दूर होता चला गया है। भाजपाइयों और सत्ता लोलुपता वालों पर संघ नकेल नहीं लगाता है। संघ का बीजेपी में पकड़ कमजोर करना चाहते हैं मोदी।पार्टी में कई नेता संगठन से बड़े बनने की कोशिश पहले भी करते आए हैं। यूपी में कल्याण सिंह,राजस्थान में वसुंधरा राजे सिंधिया,कर्नाटक में येदुरप्पा,मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह,नागपुर में नितिन गडकरी आदि। मोदी मानते हैं कि ऐसे लोगों की वजह से पार्टी को नुकसान होता है। मोदी अपनी शर्त पर काम करते हैं। मोदी की खिलाफत जो करता है,उसे वो किनारे करने में जरा भी देर नहीं करते। संजय जोशी का मामला सभी जानते हैं।
बीजेपी पर संघ का दबदबा रहा है। चाहे चुनाव के दौरान उम्मीदवारों का चयन हो या फिर भाजपा के शीर्ष नेता को बदलने का।मोदी अपनी जिद की करते रहे। मोहन भागवत के अति करीबी नितिन गडकरी से उनका कई विभाग छीन लिया। उनके खिलाफ कार्रवाई करना चाहते थे। सीएजी की रिपोर्ट के बाद एनएचएआई अधिकारी अरेस्ट किये गए। नितिन गडकरी को भी अरेस्ट करके मोदी अपने रास्ते से हटाना चाहते थे।लेकिन मोहन भागवत के दखल पर चुप हो गये। संघ चूंकि शाखाओं पर आधारित संगठन है।जो गांव से लेकर शहर तक फैला हुआ है। इन्हीं से निकल कर बीजेपी के नेता आते हैं। अब शाखाएं सिमट गयी तो बीजेपी के कार्य कर्ता बनने लगे। इससे इंकार नहीं है,कि सत्ता सुख की गोद में बैठने वाले संघ के लोग भाजपा पर निर्भर हैं।

बीजेपी से बड़े मोदी - सन् 1977 में जन संघ का जनता पार्टी में विलय हो गया था। जनता पार्टी छिन्न भिन्न हो गयी थी। तब जनसंघ की नीतियों की कोख से बीजेपी का जन्म हुआ। अटल बिहारी बाजपेयी जैसे शब्दों के जादूगर की अगुआई में बीजेपी ने चलना शुरू किया और सत्ता के मंजिल तक पहुंची। मोदी ने अटल की बीजेपी को एक नयी ऊंचाई तक पहुंचाया। देश की सबसे बड़ी पार्टी बनाया। राममंदिर बनाया। धारा 370 खत्म किया। तीन तालाक खत्म किया। कांग्रेस से लड़ते-लड़ते बीजेपी बीजेपी का कांग्रेसी करण हुआ। जो कुछ बचा था,उसे मोदी ने पूरा कर दिया। जिन कांग्रेसियों को भ्रष्ट नेता कहा जाता था,उन सभी को मोदी ने ई.डी.सीबीआइ और आइ.टी का डर दिखाकर बीजेपी में शामिल कर लिया। आज मोदी बीजेपी से भी बड़े बन गए है।

बीजेपी का नया वोट बैंक - बीजेपी ने संघ के हिन्दुत्ववादी ऐजेंडे से बाहर जाकर सोशल इंजीनियरिंग का एक नया वोट बैंक तैयार कर लिया है। इसलिए नड्डा ने कहा,कि अब भाजपा की मथुरा और काशी के विवादित स्थलों पर मंदिर बनाने की कोई योजना नहीं है। जबकि मोहन भागवत चाहते हैं,केन्द्र में हिन्दूवादी सरकार रहे।और भारत,हिन्दू राष्ट्र बने। चूंकि 2025 में संघ अपना शताब्दी वर्ष मनाने जा रहा है। लेकिन मोदी अपनी राह चुनने का फैसला किया है। सन् 2014 में मोदी जब पी.एम.बने वो संघ कार्यालय नहीं गए। जबकि मोहन ने कहा था,यह जीत किसी एक व्यक्ति की नहीं,इसमें लाखों करोड़ों संघ के लोगों का भी योगदान है। सन् 2015 में दिल्ली में मध्यप्रदेश सरकार के मध्याचंल भवन में केन्द्र सरकार के मंत्रियों की तीन दिन तक संघ प्रमुख ने एक -एक करके तलब किया था। भाजपा पर अपने नियंत्रण का प्रदर्शन किया था। मोदी को भी जाना पड़ा था। इसके बाद फिर ऐसी बैठक नहीं हुई। मोदी को यह अच्छा नहीं लगा। उसके बाद से गुजरात लाॅबी ने संघ को तवज्जो देना बंद कर दिया। राम मंदिर उद्घाटन के समय भी मोदी ने मोहन भागवत को पूजा स्थल पर बिठाने की बजाए दर्शक दिर्घा में बिठा दिया था। तत्कालीन सर संघ संचालक गुरु गोलवलकर ने भारतीय जनसंध की स्थापना के बाद 1951 में कहा था,जब तक इसकी जरूरत होगी चलाएंगे। वर्ना बंद कर देंगे। यानी पार्टी को यह अंदेशा था, आगे चलकर इसे बंद करना ही पड़ेगा। और मोदी इसी दिशा में अपना कदम बढ़ा दिये है।
मोदी मोदी कहना होगा - जे.पी.नड्डा के बयान के जरिये गुजरात लाॅबी ने यह संकेत दे दिया है कि बीजेपी में रहना है तो मोदी मोदी कहना होगा। जो लोग दावा कर रहे थे, कि भाजपा में व्यक्ति नहीं संगठन बड़ा है। उन्हें जे.पी.नड्डा के बयान से समझ लेना चाहिए।यह अलग बात है कि पीएम मोदी तमिलनाडु,उत्तराखंड के बाद महाराष्ट्र चुनाव प्रचार करने गए।दूसरे चरण के प्रचार के लिए वर्धा आकर नागपुर में जान बुझकर विश्राम किया। उनसे संघ और बीजेपी के छोटे पदाधिकारी और कार्यकर्ता राजभवन में मिलने गए। मगर नितिन गडकरी और मोहन भागवन नहीं मिले। दोनों का उनसे न मिलना मोदी को नागवार गुजरा। इस घटना का सियासी धमाका होना ही था। और दो चरणों के बकाए चुनाव से पहले जो धमाका गुजरात लाॅबी ने जेपी नड्डा के जरिए किया उससे पूरी बीजेपी स्तब्ध है। चार जून को मोदी का रथ नहीं रूका तो मोहन भागवत चाहकर भी मोदी की जगह किसी और को पी.एम.का दायित्व दे पाएंगे,इसमें संदेह है। वैसे पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का संघ सरकार्यवाह होसबोले से बंद कमरे में एक घंटे बात करना और भैयाजी जोशी से चालीस मिनट तक बातें करना, कई सियासी संदेहों को जन्म देता है। जाहिर सी बात है शिवराज को मुख्यमंत्री नहीं बनाए जाने से गुजरात लाॅबी से वो नाराज हैं। वसुंधरा राजे सिधिया भी चार जून के चुनाव परिणाम का इंतजार कर रही है। वसुंधरा राजे सिंधिया सन् 2014 और 2019 में सक्रिय थी,तब बीजेपी को 25 में से 25 सीट राजस्थान में मिली थी। लेकिन इस बार करीब 18 सीटें मिलने का दावा किया जा रहा है। चुनाव परिणाम से पहले वसुंधरा राजे सिंधिया का संघ के ऑफिस और राजभवन पहुंचने से सियासी हलचलें तेज हो गयी हैं। वहीं अमितशाह दावा कर रहे हैं 380 सीटों पर हुए चुनाव में बीजेपी को 270 सीट मिल रही है। वहीं चुनाव आयोग जो बीजेपी के लिए चुनाव लड़ रहा है,उसने हर राज्य में वोट प्रतिशत बढ़ा कर विपक्ष को संशय में डाल दिया है। पिछली बार सीपीएम को कुल एक करोड़ सात लाख वोट मिले थे। चुनाव आयोग ने चार चरण के चुनाव के बाद इतना ही वोट बढ़ा दिया है। ऐसे में बीजेपी का रथ फंसता है या दिल्ली तक पहुंचता है,सबकी निगाहें टिकी है।

फिर संघ किसे आगे करेगा - मोहन भागवत वैसे भी चुनाव से पहले कह चुके हैं,कि केवल मोदी और हिन्दुत्व के भरोसे चुनाव नहीं जीता जा सकता।यदि बीजेपी को बहुमत नहीं मिला तो संघ नितिन गडकरी को आगे कर सकता है। और इसका समर्थन योगी,शिवराज,वसुंधरा राजे सिंधिया,डाॅ रमन सिंह आदि करने से पीछे नहीं हटेंगे। मोदी और सघ के बीच तलवार अब खिंच गयी है। देखना यह होगा,कि आधुनिक और राजनीतिक रूप से असरकारी संगठन चार जून के बाद कितना मजबूत है। देश प्रेम की नयी आभा क्या रग दिखाती है।

Tuesday, May 21, 2024

दो लड़कों ने यू.पी.में बीजेपी की बाजी पलट दी

  



''मोदी-शाह के अभेद्य चुनावी कवच की दरारों को यू.पी.में अखिलेश और राहुल की जोड़ी ने उघाड़ दिया है।  चुनावी मतदान का प्रतिशत और मतदाताओं में बीजेपी विरोधी रूझान ने मोदी-अमितशाह को सियासी फलक से नीचे ला दिया है। फैलती भाजपा को अब खतरा महसूस होने लगा है। सवाल यह है कि दलित,पिछड़ा वर्ग और मुस्लिम वर्ग क्या मोदी का रथ यूपी में ही रोक देगा?

-रमेश कुमार ‘रिपु’
क्या उत्तर प्रदेश में खाक से उठ खड़ी होगी अबकी बार कांग्रेस! पिछले दो चुनाव में कांग्रेस को झन्नाटेदार हार के पराजय का मुंह देखना पड़ा था। बेल की तरह फैल चुकी बीजेपी से एनडीए के सहयोगी दलों का मोहभंग होने के बाद मोदी विरोधी दलों का गठबंधन कमल को नोचने लगेगें,इसकी कल्पना मोदी-अमितशाह कभी नहीं किये थे।अबकी बार यूपी की सियासी जमीन से कमल को जड़ से उखाड़ने के लिए राहुल और अखिलेश ने जो रणनीति अपनाई है,उससे बीजेपी के तंबू में सनाका खिंच गया है।इसलिए कि यूपी में जो सियासी हवा चल रही है,उसे रोकने की काट गुजरात लाॅबी के पास नहीं है। यह बात अब तक के हुए चुनाव ने साफ कर दिया। मोदी का रथ यू.पी.से दिल्ली जा पाएगा,इसमें संदेह गहरा गया है। सन् 2014 में मोदी की जो लहर थी,वैसी लहर सन् 2019 में नहीं थी। बावजूद इसके 65 सीट बीजेपी पा गयी थी।  अबकी बार न लहर है। और न ही हवा है।यही वजह है कि मोदी-शाह के अभेद्य चुनावी कवच की दरारों को यू.पी.में अखिलेश और राहुल की जोड़ी ने उघाड़ दिया है। चुनावी मतदान का प्रतिशत और मतदाताओं में बीजेपी विरोधी रूझान ने मोदी-अमितशाह को सियासी फलक से नीचे ला दिया है। फैलती भाजपा को अब खतरा महसूस होने लगा है। सवाल यह है कि दलित,पिछड़ा वर्ग और मुस्लिम वर्ग क्या मोदी का रथ यूपी में ही रोक देगा?

गुजरात लाॅबी का भरेासा टूटा - वैसे गुजरात लाॅबी को पूरा भरोसा था,कि राहुल गांधी के जातिगत जनगणना और आरक्षण का मुद्दा राम मंदिर की लहर में उड़ जाएगा। अखिलेश के अगड़े- पिछड़े की की राजनीति जो राम को लाए हैं,उन्हें लाएंगे के नारे में नहीं ठहरेगा। लेकिन गुजरात लाॅबी को हवा तक नहीं लगी कि इंडिया गठबंधन वाले चुनाव को संविधान बचाने की लड़ाई से जोड़,कर बीजेपी की पसली को चोटिल कर देंगे। दलित,अति दलित,पिछड़ा और अति पिछड़ा वर्ग में संविधान बचाने की बात ने इतना असर डाला, कि अंबेडकर जयंती में गांव-गांव में बैठक कर बीजेपी के खिलाफ हवा बना दी।इसका असर यह हुआ,कि जो दलित,अति दलित और पिछड़ा वर्ग बीजेपी का वोटर था,वो सपा या फिर कांग्रेस को वोट कर दिया। चार चरणों के चुनाव में अचानक मतदाताओं के बदलते रूख को गुजरात लाॅबी नहीं भांप पाई। आगे के चुनाव में बीजेपी कामयाबी का कोई सियासी रास्ता नहीं ढूंढ सकी, तो उसे भारी नुकसान का सामना करना पड़ सकता है। क्यों कि अखिलेश और राहुल गांधी मोदी और अमित शाह के बयानों से वोटर प्रभावित न हो इसका तत्काल जवाब मंच से देने लगे हैं।

बाजी पलटने की रणनीति - बीजेपी और मायावाती का जो बेस वोटर था,उसमें जागरूकता आई। उसे यकीन हो गया, कि बसपा की सरकार बन नहीं सकती। इसलिए कुर्मी, कुशवाहा, कटियार, वर्मा, मौर्य, पटेल,       चौहान,साकेत,मुसलमान वोटर सायकिल पर बैठने लगा। 'हाथ' से हाथ मिलाने लगा। बीजेपी आश्वस्त थी,कि राम मंदिर बनने के बाद यूपी में 75 सीट आएगी। दूसरे चरण के चुनाव से मोदी के चाणक्य अमितशाह को रिपोर्ट मिली कि अंबेडकर जयंती पर सारे दलित और पिछड़ा वर्ग गांव गांव बैठक कर तय किया है कि यदि बीजेपी की सरकार आई तो संविधान बदल देगी। बाबा साहब अंबेडकर की प्रतिष्ठा का सवाल है। और वो सबके सब बीजेपी की बाजी को पलटने में लग गए।

मोदी से मुस्लिम खफा - प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ने हिन्दू कार्ड भी खेला। उन्होंने हिदुओं को सावधान करते हुए कहा,कांग्रेस की सरकार आई तो वो राम मंदिर में बाबरी ताला लगा देगी। लेकिन मोदी की बातों का कोई असर नहीं दिखा। केन्द्रीय गृहमंत्री,यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह सहित बीजेपी कई मंत्रियों ने कांग्रेस के घोषणा पत्र को कटघरे में रखा। सबने जोर शोर से मंच पर कहा,कि कांग्रेस की सरकार आई तो देश में सरिया कानून लागू हो जाएगा। महिलाओं के मंगल सूत्र छीन लिए जाएंगे। जिनके पास दो घर उसमें एक घर लेकर अल्पसंख्यकों को दे दिया जाएगा। यहां तक एक से ज्यादा कार होने पर उसे ले लिया जाएगा। जबकि कांग्रेस के घोषणा पत्र में ऐसा कहीं नहीं लिखा था। बीजेपी के केन्द्रीय मंत्रियों के झूठ से भी बीजेपी के पक्ष में हवा नहीं बनी। लेकिन यूपी के 21.26 फीसदी मुस्लिम वोटर मोदी से नाराज हो गया। बागपत में 27 फीसदी,अमेठी में 20 फीसदी, अलीगढ़ में 19 फीसदी,गोंडा में 19.6,लखीमपुरी खीर में20 फीसदी,लखनऊ में21.46 फीसदी,पीलीभीत में 24.11 फीसदी,सिद्धार्थ नगर में 29.33 महाराजगंज में 17.48 फीसदी और मुरादाबाद,रामपुर में 50.8 फीसदी,मजफ्फर नगर में 41 फीसदी,बिजनौर में 43 फीसदी,अमरोहा में 41 फीसदी,बलरामपुर में38.51 इसके अलावा बरेली, बहराइच, संभल,हापुड़ आदि जिलों के मुस्लिमों को मोदी ने नाराज कर दिया।। यूपी के 75 जिलों में मुस्लिम वोटर की संख्या इतनी है कि वो किसी भी पार्टी की हार जीत की दिशा बदल सकते हैं। काशी के तीस लाख मुस्लिम वोटर इस बार मोदी को वोट करेंगे इसमें संदेह है।  

राम मंदिर मुद्दा नहीं बना - बीजेपी राम मंदिर को मुद्दा नहीं बना सकी। सन् 2014 के चुनाव में रायबरेली ही विपक्ष के पास था। बीजेपी 2024 के चुनाव में इस सीट को जीतना चाहती है। अदिति सिंह लखनऊ में प्रचार कर रही हैं। मगर वो अयोध्या, और अमेठी नहीं गयी। संजय सिंह अमित शाह से मिलने के बाद भी निष्क्रिय दिखाई दे रहे हैं। राजा भैया ने बकायदा अपने समर्थकों को कह दिया है,जो प्रत्याशी आपको बेहतर लगे उसका प्रचार करें और वोट दें। उनके समर्थक और वोटर समझ गए कि राज भैया किसे वोट करने को कह रहे हैं। कौशाम्बी बीजेपी की सीट फंस गयी है। पांचवे चरण की 14 सीट में 13 सीट बीजेपी के पास है। इसमें सात सीटों में कोंटे का टक्कर है। लोकसभा की 14 सीटों में विधान सभा की कुल 71 सीटें आती है। जिसमें 45 सीट बीजेपी के पास है।  
यूपी मे नरेटिव बदलता रहा- उत्तर प्रदेश में गेरूआई राजनीति की पताका उम्मीद से कम लहरा रही है। उसकी वजह यह है कि योगी आदित्यनाथ ने हाथ खींच लिया है। क्यों कि उन्हें पता है कि अमितशाह लोकसभा चुनाव के बाद उन्हें सी.एम.पद से हटा देगे। यूपी में नरेटिव बदलता जा रहा है। अमेठी में जो कह रहे थे,कि राहुल गांधी के चुनाव नहीं लड़ने से स्मृति इरानी को वाॅक ओवर मिल गया,अब वही आकलन कर रहे हैं,कि किशोरी लाल शर्मा कितने लाख से स्मृति को हराएंगे। बीजेपी के खिलाफ बाजी पलटने का सबब बीजेपी के नेता हैं। जनवरी मे जो उत्साह बना था,उसी उत्साह में मोदी ने कहा था कि अबकी बार चार सौ पार।अनंत हेगड़े,अरूण गोविल,लल्लू सिंह और ज्योति मिरधा ने कहा,संविधान बदलने के लिए मोदी को चाहिए चार सौ के पार सीट। इस बात को इंडिया ने लपक लिया। और अपने हर मंच पर संविधान बदलने की बात जोर-शोर से कहने लगे। उसका असर यह हुआ कि बीजेपी का वोटर उनके हाथ से फिसल गया। बीजेपी को लगा,राहुल गांधी की बातों को वोटर गंभीरता से लेता नहीं। अखिलेश यादव पांच साल तक निष्क्रिय रहे,इसलिए राम मंदिर की लहर में उनकी बात दब जाएगी।
अखिलेश की सोशल इंजीनियरिंग - अखिलेश यादव ने सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूले के तहत टिकट बांटा। दस कुर्मी,आठ मौर्य,पांच कश्यप,पांच निषाद,और अपने परिवार को छोड़कर किसी यादव को टिकट दिया नहीं।मेरठ,फैजाबाद की सामान्य सीट पर भी उन्होने दलित को टिकट दिया। उसका नतीजा यह रहा है कि दलित,पिछड़ा वर्ग और मुस्लमान वोटर सपा और कांग्रेस को जा रहा है। बीस फीसदी दलित,दस फीसदी ओबीसी और पन्द्रह फीसदी मुस्लिम वोटर इंडिया गठबंधन को जा रहा है यानी 45 फीसदी वोट पा रहे हैं। ठाकुर और ब्राम्हण वोटर को जोड़ दें तो यह प्रतिशत और ज्यादा हो जाता है। राजपूत भी बीजेपी से नाराज है। करणी सेना भी यूपी में सक्रिय हो गयी है बीजेपी के खिलाफ। ऐसे में बीजेपी का फिसलना ही था।
बीजेपी की साख पर संकट - बीजेपी ने देश को बड़ा करने का सपना दिखाया। दूसरी ओर देश को कर्ज में डूबाते गए। देश पर मोदी  के दस साल के कार्यकाल में 272 लाख करोड़ रुपए का कर्ज है। खाद्यान योजना बिल कांग्रेस ने लाया था। आज मोदी सरकार देश में 85 करोड़ गरीब जनता को पांच किलो का अनाज दे रही है। राहुल ने कहा,हमारी सरकार आएगी तो दस किलो देंगे।वहीं हर गरीब महिला को लखपति बनाएंगे। हर पार्टी का अपना अपना घोषणा पत्र है। बीजेपी को मात देने इंडिया गठबंधन ने विशेष रणनीति बनाई। हर दिन कोई न कोई पार्टी देश में बीजेपी के खिलाफ पहले प्रेस कांफ्रेस करती है,उसके बाद चुनाव प्रचार।धर्म आधारित राजनीति बीजेपी करने की योजना बनाई थी, लेकिन  कामयाब नहीं होने से बीजेपी की साख पर संकट गहरा गया है। मोदी ने देश से पचास दिन मांगे थे।अब दस साल बाद यूपी का बेरोजगार वोटर उनके काम काज पर आंकलन करने लगा है। बेरोजगारी,मंहगाई,संविधान बदलने, आरक्षण,और जातिगत जनगणना कि बात करके  यूपी में दो सियासी लड़के  बीजेपी की चुनावी बाजी पलट दिये हैं ।