Friday, March 1, 2013

मै अंधेरों के सौदागरों का.....

 मै अंधेरों के सौदागरों का दोस्त बन जाता
तो फिर चराग-ए-दिल लेकर किधर जाता

गेहूं के दानें को मिट्टी में गाड़ दिया बच्चा
यदि उससे खेलते रहता तो वो बिखर जाता

नदी हॅू,समुंदर से मिल के समुंदर हो गया
अगर तालाब का पानी होता तो मर जाता

सियासत के आईने में भला मै कैसे संवरता
जिन्दगी का आईना होता तो संवर जाता

खौलता पानी हॅू,मगर आग बुझा सकता हॅू
अगर सोना होता तो आग में निखर जाता

          0  रमेश कुमार ‘रिपु‘

Friday, December 28, 2012

चित्रकूट का बदल गया चित्र

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 मालेगांव और समझौता एक्सप्रेस में बम ब्लास्ट का आरोपी चित्रकूट स्थित ब्रम्हकुंड आश्रम में रामलखन महाराज के नाम पर भगवा चोला पहनकर पिछले डेढ़ साल से रह रहा था। उसके पकड़े जाने से यह बात साफ हो गई है कि धार्मिक नगरी चित्रकूट का चरित्र अब बदल गया है।क्यों कि अब यहां संत,महात्मा शंख,त्रिशूल की जगह बंदूकों के साथ रहते है।
           चित्रकूट का चरित्र और उसका चित्र अब बदल गया है। कभी यहां के घाटों पर संतों और महात्माओं का हुजूम देखने को मिलता था। साथ ही शंख,की आवाज कानों में भक्ति का रस घोलती थी। संतों और महात्माओं को त्रिशूल के साथ देखकर मन धार्मिक हो जाता था। अब उस चित्रकूट की फिजा बदल गई है। भगवा लिबास में ज्यादातर संत, महात्मा महलनुमा मठों में रहते हैं। पैदल नहीं लग्जरी गाड़ियांे में चलते हैं। त्रिशूल की जगह उनके हाथों में लाइसेंसी बंदूकें उनकी खास पहचान बन गई है। कई संत तो बंदूक लेकर ही अपने काफिले के साथ निकलते है। अध्यात्म के गलियारे में गूगल की महक के साथ गांजे का धुआं तैर रहा है। दबे पांव घुसे ऐश्वर्य,वैभव और विलास ने भक्त, भगवान और अध्यात्म के तारों को छिन्न-भिन्न कर दिया है। और इसी का फायदा यहां आकर उठाते हैं आतंकवादी,खूनी,डकैत और अनेक अपराधी। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है मालेगांव और समझौता एक्सप्रेस में बम ब्लास्ट का आरोपी राधे सिंह। जो यहां पिछले डेढ़ साल से ब्रम्हकुंड आश्रम में रामलखन महाराज के नाम से भगवा चोला पहनकर रह रहा था। किसी को अपने आचरण से उसने एहसास ही नहीं होने दिया कि वो आतंकवादी है। वो चित्रकूट आया अपनी आत्मा और विचार को शुद्ध करने, ऐसा नहीं है। वो चित्रकूट को अपने छुपने की सबसे महफूज जगह मानकर आया था। ऐसा चित्रकूट के लोगों का विश्वास है कि, कोई भी व्यक्ति यहां आता है राम की मर्जी से और जाता भी है तो उनकी ही मर्जी से। यह बात सुनने में अजीब लग सकती है। लेकिन धन सिंह पर यह बात सत्य प्रतीत होती है।
     सुबह चित्रकूट के आश्रमों में 17 दिसंबर को सनसनी फैल गई,जब नेशनल इंवेस्टीगेशन एजेंसी की गिरफ्त में आया मालेगांव और समझौता एक्सप्रेस में बम ब्लास्ट का आरोपी धन सिंह उर्फ रामलखन दास महाराज। यह आतंकवादी चित्रकूट में ब्रम्हकुण्ड के पास त्यागी बाबा की  कुटिया में रह रहा था। 32 वर्षीय धन सिंह उर्फ रामलखन दास महाराज, पुत्र शिव सिंह निवासी हातौद इंदौर का,नयागांव थाना पुलिस की मदद से नेशनल इंवेस्टीगेशन एजेंसी (एनआईए) अफसरों ने उसे गिरफतार किया। पूछताछ में आरोपी ने बताया कि वह पूर्व में पकड़े गए आरोपी राजेन्द्र चौधरी उर्फ लक्ष्मणदास महाराज निवासी देवालपुर और इंदौर के ही रामजी व अमित के साथ मालेगांव में रैकी करता था। मोटर साइकिल के जरिए उसने एक्सप्लोसिव प्लांट किया था। पुलिस के अनुसार आरोपी धन सिंह और उसके साथियों का हाथ हैदराबाद, जयपुर, जम्मू तथा इंदौर में हुए बम धमाकों में भी है।
      मालेगांव ब्लास्ट के दौरान धन सिंह और राजेन्द्र के साथ इंदौर के ही रामजी उर्फ रामचन्द्र, अमित हकला उर्फ प्रिंस साथ थे। चारों ने वहां वारदात के बाद अलग-अलग हो गये। मालेगांव ब्लास्ट के आरोपी धन सिंह उर्फ रामलखन दास महाराज ने बताया कि राजेन्द्र उर्फ लक्ष्मणदास मास्टर माइंड था। जिसके इशारे पर रैली और एक्सप्लोसिव प्लांटेशन किया जाता था। आरोपी धन सिंह ने एनआईए को पूछताछ में यह भी बताया कि मालेगांव धमाके के बाद वह वापस अपने गांव हातौद चला आया। कुछ दिनों बाद पुलिस से बचते हुए वह ओेंकारेश्वर पहुंच गया। जहां करीब डेढ़ साल रहा। वहीं बातों ही बातों में पता चला कि   छुपने की सबसे महफूज जगह चित्रकूट है, इसलिए ओंकारेश्वर से चित्रकूट चला आया। आरोपी धन सिंह को नयागांव थाना में पदस्थ उप निरीक्षक सतीश तिवारी, प्रधान आरक्षक सुधीर त्रिवेदी, आरक्षक आशीष दुबे और सैनिक चंदिका प्रसाद ने पकड़ने के बाद नेशनल इंवेस्टीगेशन एजेंसी (एनआईए) अधिकारी महेश लाड़ा, एएसपी श्री नेगी और इंस्पेक्टर बिजेन्दर सिंह के सुपुर्द करते हुए उसकी धारकुण्डी से गिरफ्तारी दिखाई।   18 दिसंबर को धमाके के आरोपी धन सिंह उर्फ रामलखन दास महाराज को जिला अस्पताल में मेडिकल जांच के बाद प्रथम श्रेणी न्यायिक दण्डाधिकारी मो. अरसद के न्यायालय में पेश किया गया।एनआईए के पुलिस अधीक्षक प्रेम सिंह बिष्ट कहते हैं, हमारी टीम के सामने ऐसी कोई बात नहीं आई जिससे यह कहा जा सके कि आरोपी आरएसएस से जुड़ा था। चित्रकूट से पकड़ा गया धन सिंह मालेगांव-समझौता एक्सप्रेस में हुए ब्लास्ट का आरोपी है। उसे यहां से ट्रांजिट रिमाण्ड पर  मुम्बई ले जा रहे हैं।
अधर्मी बाबाओं की नगरी
 चित्रकूट के मठ व आश्रमों में साधु के भेष में पनाह पाने वालों में धन सिंह उर्फ बाबा रामलखनदास उर्फ स्वामी पहला शख्स नहीं है। अपराध जगत से जुड़े ऐसे लोगों की लंबी सूची है। जो कानून व्यवस्था की आंखों में धूल झोककर यहां रहते आये हैं। कुख्यात व चर्चित अय्याश बाबा इच्छाधारी को पूरा देश अभी तक नहीं भूला है। लगभग पांच साल पहले निर्माेही अखाड़े से भी दिल्ली की एसटीएफ ने एक अपराधी को दबोचा था। यहां ऐसे दर्जनों साधु-संत महंत हैं, जिनके पास वैध-अवैध हथियार है। चित्रकूट सबसे अधिक शर्मिदा किया इच्छाधारी बाबा ने। चमरौंहा गांव निवासी राजीव रंजन द्विवेदी उर्फ शिवा द्विवेदी उर्फ भीमानंद उर्फ इच्छाधारी बाबा ने राष्ट्रीय स्तर पर एक ऐसी घिनौनी छाप बनाई जिससे संत समाज और चित्रकूट धाम दोनों ही अपमानित हुए हैं। चित्रकूट जिले के मानिकपुर कस्बे से 23 किलोमीटर दूर स्थित चमरौंहा गांव में इच्छाधारी बाबा का अपना साम्राज्य था। बाबा के पिता का कहना है कि तीन बार हाई स्कूल में फेल होने के बाद उनका बेटा शिवा द्विवेदी घर से भागकर आगरा चला गया। वहां के एक होटल में वेटर का काम करता था। 1997 में पहली बार भीमानंद ग्रेटर नोएडा पुलिस द्वारा सेक्स रैकेट में पकड़ा गया। चित्रकूट जिले के इस गांव से 500 मीटर पहले नदी तट के किनारे इच्छाधारी ने 2009 में 5 एकड़ जमीन खरीदी जिसके भूमिपूजन में दिल्ली और बम्बई की बार बालाएं भी बुलाई गईं थीं। इस आयोजन में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन ग्रामीण विकास मंत्री दद्दू प्रसाद,दस्यु साम्राट ददुआ का पुत्र व तत्कालीन जिला पंचायत अध्यक्ष वीर सिंह और कई तेंदूपत्ता व्यापारियों ने शिरकत की थी। बाबा की इस जमीन पर तत्कालीन कलेक्टर हृदेश कुमार ने बाबा से खुश होकर महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना की राशि से 1500 पेड़ लगवा दिए थे। जहां वतर्मान में इच्छाधारी ने तीन मंजिला साई आश्रम मंदिर बनवाया है। वर्ष 2010 में दिल्ली पुलिस ने इस अधर्मी बाबा को सेक्स रैकेट चलाने के आरोप में गिरफ्तार किया तो धाािर्मक नगरी चित्रकूट के माथे पर भी बदनामी के छीटे पड़े। समाजशास्त्री डा. महेश शुक्ला कहते हैं,चित्रकूट के महात्माओं के बीच अब प्रतिद्वंदिता बढ़ गई है।यह प्रतिद्वंदिता ज्ञान की नहीं बल्कि बाहुबल, जनबल व धनबल की है। यही वजह है कि चित्रकूट के तकरीबन हर आश्रम में त्रिशूल व शंख मिले या न मिले लेकिन दीवारों पर बंदूकें जरूर टंगी नजर आ जाएंगी।


Tuesday, December 18, 2012

पसंद पसंद की बात शिव को नहीं भाये प्रभात

 
   पसंद पसंद की बात
  शिव को नहीं भाये प्रभात
भोपाल,रमेश कुमार ‘रिपु‘
भाजपा ने आखिर किसके कहने पर,झा का जाप नहीं करने का निर्णय लिया? इस बात को जितनी शिद्दत से प्रभात झा समझ सकते हैं,कोई दूसरा नहीं। प्रदेश के सियासी इतिहास में खासकर भाजपा शासन में ऐसा पहली बार हुआ है जब एक मुख्यमंत्री को विवश होकर अपना वीटो पावर का इस्तेमाल करना पड़ा। खासकर,अध्यक्ष के लिए। भाजपा हाई कमान को भी शिव के तर्क और बातों को बिना किसी कुतर्क के स्वीकार करना पड़ा। अंत तक प्रभात को शिवराज पता नहीं चलने दिया कि उनकी मंशा क्या है। उद्योग मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने भी मीडिया से साफ साफ कह दिया कि प्रभात झा ही अध्यक्ष रहेंगे। इस दौड़ में कोई दूसरा शामिल नहीं। उनके ऐसा कहते ही प्रभात झा के मोबाइल पर बधाई संदेश आना शुरू हो गया। बिहारी बाबू समझ गये कि उनके जख्म में नमक छिड़कने के लिए किस तरह की मीठी राजनीति उनके साथ की गई है। एक तरफ अध्यक्ष की बधाई,दूसरी तरफ उन्हें भीड़ से अलग करके, तमाशा देखने मजा लेने वाले भीड़ में तब्दील हो रहे है। दिल्ली से मन मसोड़कर जब 13 तारीख की टेªन प्रभात ने पकड़ी और तोमर भी,दोनों अलग अलग टेªन से भोपाल पहुंचे,तभी सभी को एहसास हो गया कि पार्टी में झा का जाप अब नहीं होगा।
    भाजपा मामलों के अकेले नीति नियंता सह सरकार्यवाहक सुरेश सोनी तीन दिनों तक भोपाल के सियासी गलियारों में घूमते रहे और वो प्रभात के लिए काम करते रहे। यही बात शिवराज का पसंद नहीं आई। इसलिए भी कि सुरेश की मदद से ही प्रभात दिल्ली के रास्ते से भोपाल पहुंचे थे। ढाई साल में संगठन के ढांचे को जिस तरह बिहारी ताना बना से खड़ा किया और सरकार के समानांतर अपने आप को स्थापित किया,उससे शिव की बंद तीसरी ऑख खुल गई। शिव को प्रभात ने इस बात का एहसास करा दिया कि आप नहीं तो और सही। विधायक, जिला प्रतिनिधि,मंडल अध्यक्ष और सांसदों को घुड़की देने वाले प्रभात ने पार्टी को अपने गिरफ्त में ले लिया। प्रदेश में शिवराज की योजनायें से आम जनता के बीच बढ़ती उनकी लोकप्रियता पर धब्बा लगाने के लिए प्रभात ने पिछले साल गोपनीय चुनावी सर्वे कराया और रिपोर्ट लीक भी करवाया। रिपोर्ट थी कि आज चुनाव हो जाये तो भाजपा 135 स्थानों पर बेहद कमजोर है। यानी लाड़ली लक्ष्मी योजना के दम पर अमेरिका तक लोकप्रिय शिव को यह बताया गया कि उनकी योजना,और लोकप्रियता खोखली है। जमीनी हकीकत यह है कि प्रदेश में भाजपा की स्थिति बेहद खराब है। धैर्यवान शिवराज कुछ बोले नहीं। उनके माथे पर जरा भी शिकन नहीं आई तो प्रभात ने दूसरी चाल चली। विकास यात्रा के जरिये विधायकों की रिपोर्ट मंगवाई,जिसमें बताया गया कि प्रदेश के 65 विधायकों से जनता नाराज है। यानी इतनी सीट भाजपा के हाथ से निकल जायेगी। यह सब शिवराज को परेशान करने के लिए प्रभात ने किया। मीडिया में सुर्खियों की राजनीति के लिए प्रभात ने शिवराज को कई मामले मे निशाने पर लिया। लेकिन जब बात प्रदेश में प्रभात वर्सेस शिवराज होने लगी। आगामी मुख्यमंत्री प्रदेश के प्रभात झा। इसकी शिकायत कई बार दिल्ली जाकर शिवराज ने हाई कमान से की। प्रभात को हाई कमान ने तलब किया। लेकिन वो संगठन को सक्रिय करने की बात कहकर, अपना बाचाव कर लेते थे। लेकिन यह कब तक चलता। भाजपा के वरिष्ठ नेताओं की लगातर अनदेखी और उन्हें तवज्जो नहीं देने की प्रभात की सियासत से कई अपमानित हुए। प्रभात के चलते भाजपा प्रदेष में रंग बदलने लगी। सुर्खियों की सियासत प्रभात करने लगे,जबकि अध्यक्ष का काम होता है,संगठन को मजबूत करना,राजनीति नहीं। अपने पौने तीन साल के कार्यकाल में झा अपने बयान और कार्यप्रणाली को लेकर विपक्ष के निशाने पर अधिक रहे। वहीं तोमर के दामन पर ऐसा कोई धब्बा नहीं लगा। विधानसभा चुनाव के मौके पर शिवराज ऐसे व्यक्ति को अपना सारथी नहीं बनाना चाहते थे,जिससे दिक्कतों का सामना करना पड़ता। इसीलिए सुरेश सोनी की तीन दिनी भोपाल यात्रा को शिवराज ने तवज्जो नहीं दिया। प्रभात को इस बात का एहसास हो गया था कि शिवराज नहीं चाहते कि मै दुबारा अध्यक्ष बनूं,इसलिए उन्होंने सुरेश सोनी को भोपाल बुलाये। यह अलग बात है कि सोनी से प्रभात नहीं मिले और न ही सोनी मिले प्रभात से। यह सब सोची समझी चाल थी। सोनी को जब यह पता चल गया कि शिव की मंशा प्रभात को लेकर अनुकूल नहीं है तो वो भी अपना वीटो पॉवर का इस्तेमाल नहीं किये। जानते थे वीटो पॉवर फिजूल होगा।  
बहरहाल मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की पसंद का अध्यक्ष तोमर के बनने पर उन्होने यूं ही नहीं कहा कि कार्यकर्ताओं में विश्वास का संचार उनका मूलमंत्र रहा है। उनके नेतृत्व में पार्टी नई ऊंचाई पर पहुंचेगी। तोमर की स्वीकार्यता को साबित करने उनके नामांकन के मौके पर पूर्व मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा और कैलाश जोशी के साथ पूर्व सांसद लक्ष्मीनारायण पांडे, सत्यनारायण जटिया जैसे वरिष्ठ नेताओं के साथ नई पीढ़ी के लोगों की मौजूदगी इस बात का संकेत है कि तीसरी बार सत्ता तक पहुंचने में सभी साथ साथ हैं।
क्यों जरूरी हुए तोमर
पार्टी का मानना है कि आगामी चुनाव जीतने के लिए हाई प्रोफाइल नहीं, लो प्रोफाइल की राजनीति करने वाले की जरूरत है। ताकि निचले स्तर के कार्यकर्ताओं तक संदेश जाये साथ ही उन्हें यह लगे भी कि उनके बीच का व्यक्ति उनका नेतृत्व कर रहा है। वैसे भी इस मेयार को छूने वाले अन्य नेताओं की अपेक्षा तोमर के मुकाबले कोई और नेता नहीं भी है। मुख्यमंत्री भी संगठन के मामले में तोमर पर ज्यादा भरोसा करते आये हैं। देखा जाये तो कई विषय ऐसे थे, जिन पर शिवराज ने प्रदेश भाजपा नेतृत्व के बजाए, तोमर से विचार विमर्श करना बेहतर समझा। शिवराज को तोमर इसलिए भी पसंद आये कि प्रदेश में पहले से स्ािापित और प्रभावशील होने के बाद भी तोमर ने कभी अपनी हदें पार नहीं की। आपसी भरोसा और तालमेल का आकर्षण उन्हें पुनः एक दूसरे के करीब ले आया। तोमर 2007 में अध्यक्ष बने तब भी केवल संगठन का ही काम देखते रहे,चुनाव के समय और सरकार बनने के बाद भी कभी शिवराज और अपने बीच यह स्थिति पैदा नहीं होने दिया कि मीडिया या फिर पार्टी के लोग कहें कि तोमर वर्सेस शिव। वहीं प्रभात झा मुख्यमंत्री को सेफ करने की रणनीति कम बनाते थे,फिर भी वो खुद को विपक्ष के निशाने से नहीं बचा  पाते थे। विवादों की सूची बेहद लंबी है उनकी विपक्ष के साथ, जो चुनाव के समय पार्टी को नुकसान पहुंचा सकते थे। शिवराज निर्विवाद व्यक्तित्व वाला अध्यक्ष चाहते थे,इसलिए झा को नापसंद किया।