Wednesday, September 9, 2020
जल,जमीन,जंगल की लड़ाई
छत्तीसगढ़ में दो दशक से आदिवासी और नक्सली सरकार से जल,जंगल और जमीन की लड़ाई लड़ रहे हैं। पेशा कानून का क्रिन्यावन नहीं होने से आदिवासी अपनी जमीन के लिए राजस्व संहिता की धाराओं में ही उलझा हुआ है। वहीं प्रदेश में कांग्रेस के 31 आदिवासी विधायक हैं, फिर भी आदिवासी समाज फटा पोस्टर ही है।
0 रमेश कुमार ‘‘रिपु’’
आजादी के सात दशक के बाद भी छत्तीसगढ़,मध्यप्रदेश,ओड़िसा और झारखंड का आदिवासी जल,जंगल और जमीन की लड़ाई लड़ रहा है। छत्तीसगढ़ में दो दशक से नक्सली सरकार के खिलाफ लड़ रहा है। जाहिर सी बात है कि नक्सली बना आदिवासी सरकार की नीतियों से संतुष्ट नहीं है। हैरानी वाली बात है कि छत्तीसगढ़ में प्रदेश की 90 विधान सभा सीटों में 10 अनुसूचित जाति और 29 अनुसूचित जन जाति और सामान्य सीटें 51 है। कांग्रेस के पास सभी 29 सीटें अनुसूचित जन जाति की है। इसके अलावा उसके दो और आदिवासी विधायक हैं,जो सामान्य सीट से जीतकर आए हैं। यानी कांग्रेस में 31 विधायक आदिवासी हंै। जबकि बीजेपी में प्रदेश अध्यक्ष विष्णुदेव साय आदिवासी हैं। रामविचार नेताम अनुसूचित जन जाति के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। पूर्व सांसद विक्रम उसेंडी कहते हैं, जल,जंगल और जमीन का मुद्दा आदिवासियों के लिए उनकी अस्मिता से जुड़ा मुद्दा है। जिसका भाजपा पूरा सम्मान करती है’’। सच्चाई ठीक इसके उलट है। पर्यावरण की हत्या का ठेका हर पार्टी उद्योगपतियों को देती आई है। जिसका विरोध आदिवासी समाज करता आया है। बैलाडीला की खदान और पच्चीस हजार पेड़ काटने का ठेका भी भूपेश सरकार ने गौतम अडानी को दिया था। जिसका सभी ने विरोध किया था। समस्या यथावत है।
सब जगह नाराजगी एक सा
आदिवासी क्षेत्रों में कुटीर और लघु उद्योगों को बढ़ावा देकर आदिवासियों को आत्म निर्भर बनाया जा सकता है। जबकि आदिवासी इलाकों में खनन को लेकर आदिवासियों और सरकार के बीच संघर्ष होता रहता है। छत्तीसगढ़ के बैलाडीला इलाके में लौह अयस्क की खुदाई या फिर ओडिशा के सुंदरगढ़ इलाके में आदिवासियों की नाराजगी एक जैसा ही है।
मजबूर करती है सरकार
सरकार किसी भी पार्टी की हो वो आदिवासियों को उजड़ने के लिए मजबूर करती आई है। आदिवासी विरोध करते है ंतो उनके खिलाफ झूठे प्रकरण भी कायम कर उन्हें डराया जाता है। मार्च 2011 में छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के ताड़मेटला, मोरपल्ली और तिम्मापुर में आदिवासियों के 252 घर जला दिए गए थे। सीबीआइ की जांच रिपोर्ट में इसका खुलासा भी हुआ। फर्जी मुठभेड़ों में आदिवासियों की हत्या कर नक्सली करार दिए जाने की घटनाएं आम हैं। पिछले करीब 20 वर्षों से आदिवासी समाज से कोई भी नेता सामने आकर सरकार की नीतियों का खुलकर विरोध नहीं किया। छत्तीसगढ़, झारखंड और ओडिशा जैसे राज्य नक्सल समस्या के कारण विकास से दूर हैं। आदिवासियों की संस्कृति और उनकी परंपराओं को सहेजते हुए विकास करना होगा। नक्सली घटनाओं के पीछे की सोच को बदलनी होगी। किसी एक घटना के लिए गांव के सभी आदिवासियों को नक्सल समर्थक मान लेना गलत है। रमन सरकार के समय तत्कालीन बस्तर आई जी एस.आर कल्लूरी ने ऐसा खूब किया। छत्तीसगढ़ में एनीमिया और कुपोषण के मामले 53 फीसदी से ज्यादा है। आदिवासी बहुल राज्यों में समस्याएं अनेक हैं। इनके समाधान के लिए जन चेतना के साथ राजनैतिक बदलाव और सत्ता में उनकी भागीदारी भी बढ़ानी होगी।
किसने क्या किया
छत्तीसगढ़ में पन्द्रह वर्षो तक बीजेपी की सरकार थी। डाॅ रमन सिंह कुल बजट का 35 फीसदी आदिवासी क्षेत्रों के विकास में खर्च किया। प्रदेश के सभी 27 जिलों में युवाओं के कौशल उन्नयन के लिए लाईवलीहुड कॉलेजों की स्थापना की। इनमें से अधिकांश कॉलेज आदिवासी जिलों में संचालित है। बस्तर एजेकुशन हब बना। आदिवासियों को चावल,नमक और चना देने के साथ चरणपादुका भी दी। वहीं भूपेश सरकार ने चुनाव से पहले लोहंडीगुड़ा के आदिवासियों से वायदा किया था कि उनकी सरकार बनी तो उनकी जमीन उन्हें लौटा देंगे। 2008 में इस क्षेत्र में टाटा का स्टील प्लांट लगना था। सरकार ने 1707 वनवासियों से करीब 4200 एकड़ जमीन अधिग्रहित की। ज्यादातर वनवासियों को उनकी जमीन का मुआवजा भी दे दिया गया,लेकिन विरोध के चलते प्लांट नहीं लगा। कांग्रेस सरकार ने जमीन का मुआवजा भी वनवासियों के पास ही छोड़ दिया गया है। बघेल सरकार ने लॉकडाउन में वनवासियों से महुआ की खरीदी 17 की बजाए 30 रुपए में करने का फैसला लिया है। इस फैसले से 40 लाख आदिवासियों को फायदा पहुँचने की उम्मीद है। तेन्दूपत्ता के बोनस की राशि 2500 रूपये से 4000 रूपये की। प्रदेश के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों विशेषकर बस्तर अंचल के अनुसूचित जनजाति वर्ग के रहवासियों के खिलाफ दर्ज प्रकरणों की समीक्षा कर सरकार ने 215 प्रकरण वापस लिए।
आदिवासियों की प्रमुख मांगें
अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायत विस्तार अधिनियम 1996 बनाया गया है। जिसे पेसा कानून कहा जाता है। पेसा कानून का क्रियान्वयन तत्काल किया जाये। इसलिए कि, आदिवासी अपनी खोई हुई जमीन का केस भू.राजस्व संहिता की धारा 170 क के तहत जीत जाता है लेकिन, राजनीतिक दबाव की वजह से उसे कब्जा नहीं मिलता। प्रकरण को राजस्व मंडल एवं कोर्ट में उलझा दिया जाता है। राज्य सरकार इन प्रकरणों में आदिवासी वर्ग का प्रतिरक्षण नहीं करती। बोधघाट परियोजना पर रोक लगाई जाए। सलवा जुडूम से विस्थापित आदिवासियों को एक कमेटी बनाकर तत्काल सीमांत प्रदेशों से वापस लाकर बसाया जाए। अंगार मोती देवी स्थल, गंगरेल का स्थायी पट्टा गोंड़ समाज के नाम पर जारी किया जाये। अनुसूचित क्षेत्रों कोयला,लोहा,बॉक्साइट, चूना पत्थर इत्यादि कच्चा माल खदानों से निकाला जा रहा है और इन मिनरलो का 25ः रॉयल्टी प्रभावित आदिवासी परिवारों को दिया जाये।
सरकार श्वेत पत्र जारी करे
भाजपा विधायक एवं पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने कहा यदि आदिवासियों के बीमा, बोनस, लाभांश छात्रवृत्ति के मामले में सरकार सही है, तो मीडिया व जनता के सामने श्वेतपत्र जारी कर दस्तावेज प्रस्तुत करे। सरकार बीमा का नवीनीकरण,तेंदूपत्ता संग्राहक आदिवासी परिवार को दो सीजन का बोनस 597 करोड़ रूपये,आदिवासियों की सहकारी समितियों को लाभांश का 432 करोड़ वितरित क्यों नहीं किया गया। जाहिर सी बात है कि सरकार झूठ बोल रही है। सरकार उन जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई जिन्होंने आदिवासी परिवारों के साथ अन्याय किया है।
वाह वाही न लूटे भूपेश सरकार
छजका के प्रदेश अध्यक्ष अमित जोगी कहते है, भूपेश सरकार अपने आप को आदिवासियों का हितैषी कहती है तो बताए, बस्तर के आदिवासियों के आराध्य नंदराज पर्वत में हजारों पेड़ों को काटकर उसपर विराजमान पिट्टोर मेटा देवी के मंदिर को ध्वस्त करके, लोहे की खदान चालू करने के फैसले को अभी तक निरस्त क्यों नहीं किया। आदिवासियों की जमीन पर बने 10000 करोड़ की लागत के नगरनार इस्पात संयंत्र, जिसपर बस्तर के नौजवानों का प्रथम अधिकार है,की नीलामी करने के एकपक्षीय फैसलों का भूपेश सरकार ने विरोध नहंी किया है। जबकि पोलावरम और इचंपल्ली बाँधों के निर्माण से सुकमा और बीजापुर जिले के लाखों आदिवासी बेघर और बरबाद हो जाएंगे। आदिवासी बाहुल्य सरगुजा, रायगढ़ और कोरबा में पेसा कानून के अंतर्गत बिना ग्रामसभा की अनुमति प्राप्त किए,निजी कम्पनियों को भूपेश सरकार ने 24 कोयला और बॉक्साइट खदाने चालू करने की अनुमति दे दी। आदिवासियों के आर्थिक विकास की बात करने वाली भूपेश सरकार ने एक भी वृहद वनोपज आधारित उद्योग की योजना नहीं बनायी। आदिम जाति कल्याण विभाग को शिक्षा विभाग में विलय पूर्व सरकार ने किया था, जिसका कांग्रेस ने विपक्ष में रहते हुए पुरजोर विरोध किया था,भूपेश सरकार ने अभी तक उसे बदलने का आदेश नहीं दिया।
आदिवासी विकास विरोधी नहीं
सर्व आदिवासी समाज बैलाडीला क्षेत्रीय अध्यक्ष राजकुमार आयामी ने कहा, पूरा बस्तर संभाग पांचवी अनुसूचित क्षेत्र होने के बाद भी सरकार द्वारा संविधान में हमारे लिए दिए गए अधिकारों का उल्लंघन करते हुए फर्जी ग्राम सभाएं कर हमारे जल, जंगल, जमीन उद्योगपतियो को दे रही है। आदिवासी समाज विकास विरोधी नहीं है लेकिन, सरकारें विकास के नाम पर आदिवासियों की आजीविकाएं छीनती हैं। उद्योग या खनन के लिए सरकार जमीन के बदले एकमुश्त राशि ही क्यों देती है। दंतेवाड़ा जिला मुख्यालय से 65 किलोमीटर की दूरी पर धुर नक्सल प्रभावित ग्राम पंचायत गुमियापाल में विश्व आदिवासी दिवस पर संयुक्त पंचायत जनसंघर्ष समिति के अध्यक्ष नंदराम कुंजाम ने कहा नंदराज पहाड़ में अडानी कंपनी की लड़ाई हो या आलनार में, सरकार की कोशिश को कामयाब नहीं होने देंगे। चाहे हमें अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए जान देनी पड़ी’’।
बहरहाल कुछ योजनाओं का मोह दिखाकर सरकार आदिवासियों का शोषण करती आई है। यही वजह है कि आदिवासी समाज आज भी फटा पोस्टर है।
कोविड से मात खाते भूपेश
कोविड 19 में एकदम से उछाल आने और विपक्ष के हमले से विवश होकर भूपेश सरकार को लाॅक डाउन की घोषणा करनी पड़ी। प्रदेश सरकार ने तबाही के वाइरस को गंभीरता से नहीं लिया, यही वजह है कि आज हर विभाग में कोरोना के मरीज हैं। मंत्री के घर से लेकर मंत्रालय तक कोरोना पहुंच गया है। क्या मुख्यमंत्री भूपेश बघेल दे पाएंगे इस महामारी को मात?
0 रमेश कुमार ‘‘रिपु‘‘
छत्तीसगढ़ में कोविड-19 के मामलों में खतरनाक रूप से बढ़ोतरी होने पर विपक्ष ने मीडिया में सवाल किया,‘‘क्या भूपेश सरकार राजधानी रायपुर को भोपाल या इंदौर बनाना चाहती है’’। ऐसा सवाल विपक्ष इसलिए किया कि लाॅक डाउन के वक्त यहां मुश्किल से 11 कोरोना के मरीज थे। जिसमें दस ठीक हो गए थे। इसके बाद लाॅक डाउन, अनलाॅक होने पर भी कोरोना को लेकर हालात बिगड़े नहीं थे। कोरबा के कटघोरा तहसील में कोराना बम फूटने पर, स्थिति नियंत्रण में है, सरकार का यही दावा था। अब कोविड 19 पांव पांव चलकर, गांव गांव पहुंच गया। इस वक्त प्रदेश में करीब 6 हजार कोरोना के मरीज हैं। माना जा रहा है कि यह संख्या अगस्त तक दस हजार के करीब पहुंच जाएगी। अब तक 30 मौतें हो गई है। सवाल यह है कि महामारी कोविड- 19 के कहर की दूसरी लहर जानलेवा कैसे हो गई।
लापरवाही
कोरोना को लेकर सरकार और प्रशासन गंभीर नहीं थे। वरना बिलासपुर सेंट्रल जेल में 21 जुलाई को 9 कैदी संक्रमित न मिलते। प्रदेश के गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू के बंगले के दो कर्मचारी कोरोना पॉजिटिव पाए गए। दोनों ही कर्मचारी महिला हैं। गृहमंत्री के बंगले में मेड का काम करती थीं। एसआईबी के डीआईजी के संक्रमित मिलने के बाद, पुराने पुलिस मुख्यालय को सील कर दिया गया है। हाईकोर्ट के दो कर्मचारी कोरोना संक्रमित मिले। डाॅक्टर और नर्से संक्रमित मिली। स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंह देव ने कहा कि कोराना टेस्ट की वजह से कोविड 19 के मरीजों की संख्या बढ़ रही है। यानी वे चाहते हैं कि कोविंड 19 का पॉजिटिव रिपोर्ट आने पर आंकड़े न बताए जाएं। सवाल यह है कि ऐसा करने से क्या समस्या का हल हो जाएगा? रायपुर कोराना का हाॅट स्पाॅट बना तो प्रदेश के 10 जिलों में 22 जुलाई से 28 जुलाई तक का पूर्ण लॉकडाउन किया गया है। वहीं अन्य जिलों में भी आंशिक छूट देने के साथ सख्ती बढ़ा दी गई है।
पहले से अधिक सख्ती
इस बार पुलिस मोहल्लों और गलियों में दोगुनी फोर्स से नजर रख रही है। पकड़े गए लोगों को प्रतिबंधात्मक धाराओं में मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जाएगा। बाहर निकलने का पुख्ता कारण नहीं बताने वालों की गाड़ी जब्त कर कोर्ट में पेश की जाएगी। शासन के आदेश के उल्लंघन पर धारा 188 का केस दर्ज करेंगे। गलियों में ड्रोन से नजर रखा जा रहा है। जरूरी समझा गया तो लाॅक डाउन बढ़ाया जा सकता है। रोजाना 5000 से अधिक टेस्टिंग किया जा रहा है, जिसे बढ़ाकर अब 10 हजार करने का लक्ष्य रखा गया है। लॉक डाउन का अधिकार जिला प्रशासन को दिया गया है, कोरोना को नियंत्रित करने का। कोविड-19 के बढ़ते कदम की वजह से मंत्रालय व संचालनालय के सभी दफ्तर भी बंद है। रायपुर में 2 सौ से ज्यादा और बीरगांव में 40 से ज्यादा इलाकों को कंटेनमेंट जोन घोषित किया गया है।
सरकार दोषीः साय
एक तरफ भूपेश सरकार केन्द्र सरकार से पैसा नहीं मिलने का रोना रो रही है,दूसरी ओर हर विभाग के बजट में तीस फीसदी की कटौती कर दी है। बावजूद इसके 15 संसदीय सचिव और निगम मंडल में खाली पड़े 32 पद भरने के साथ ही अपने चार सलाहकारों को कैबिनेट मंत्री का दर्जा देकर खर्चा को बढ़ाया। कोरोना में सोशल डिस्टेसिंग की बात सरकार करती रही, दूसरी ओर राजनीतिक कार्यक्रमों में भीड़ एकत्र करती रही। जबकि शादी व्याह में 20 लोगों से अधिक शामिल होने की इजाजत नहीं है। जनता पूछ रही है, राजनीतिक कार्यक्रम में भीड़ पर नकेल क्यों नहीं? प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष विष्णुदेव साय ने कहा, मुख्यमंत्री भूपेश बघेल सरकार राजनीतिक नियुक्तियां करने में मस्त है, जबकि प्रदेश की जनता कोरोना के बढ़ते संक्रमण के चलते त्रस्त है। कोरोना के नाम पर पैसों की कमी का रोना रोती सरकार सियासी नौटंकियों में सरकारी धन पानी की तरह बहा रही है। वहीं कोरोना वॉरियर्स सफाई कर्मियों का वेतन काटकर उन्हें भी हताश करके उनका मनोबल तोड़ने का काम कर रही है। कोरोना की जांच के लिए टेक्नीशियन और एनएमए आदि रिक्त पदों की भर्ती दिसंबर में हो जाती तो आज कोरोना के खिलाफ लड़ाई में आसानी होती।
कोरोना में रायपुर टाॅप पर
राजधानी रायपुर को मुख्यमंत्री सुरक्षित नहीं कर पाए। आज राजधानी रायपुर कोरोना में टाॅप पर है। 22 जुलाई को प्रदेश में 268 और रायपुर में 84 कोरोना के मरीज मिले। भाठागांव में कोरोना से मरी महिला के संपर्क में आने से 24 लोगों को संक्रमण हुआ। पिछले दस दिनों में कोराना के 1800 मरीज मिले। अभी तक 5731 संक्रमित मरीज मिल चुके हैं। इनमें 30 मरीजों की मौत हो गई। हॉटस्पॉट बन चुके रायपुर में 1494 मामले मिले हैं। इनमें से 10 की मौत हो गई है। हालांकि प्रदेश में 4114 मरीजों के स्वस्थ होने के बाद उन्हें अस्पताल से छुट्टी भी दी गई है। शराब बेचने वाली सरकार ने ध्यान नहीं दिया कि शराब बिकवाने वाली प्लेसमंट कंपनी के कर्मियों ने तमाम बैरीकेट्स उखाड़ दिए हैं। अब शराब दुकानें कोरोना संक्रमण का अड्डा बन गई हैं।
संक्रमण का नया हमला
छत्तीसगढ़ में अब कोरोना के गंभीर लक्षणों वाले मरीज सामने आने लगे हैं। इन मरीजों को ऑक्सीजन और वेंटीलेटर की भी जरूरत पड़ रही है। डॉ भीमराव अंबेडकर मेकाहारा के मेडिसिन विभाग के एच.ओ.डी डॉ आरके पांडा ने बताया कि अब मरीजों में कोरोना के साथ डायरिया, न्यूरोजिकल साइड इफेक्ट, हार्ट और यूरिन की समस्या भी आ रही है। एक माह पहते तक माइल्ड केस आ रहे थे। उनमें कोई समस्या नहीं थी। अब 30 से 35 केस ऐसे आए हैं, जो गंभीर लक्षण वाले हैं। यह पता चला कि है कि जिन मरीजों को ऑक्सीजन की जरूरत पड़ी है, उनको लंग्स फेफड़े में फाइब्रोसिस यानी चकत्ते हो सकते हैं। बार,बार लंग्स में इंफेक्शन होने से निमोनिया होगा।
प्रमुख खामियां
कंटेनमेंट जोन में लोगों को उनके घरों तक जरूरी सामान न पहुंचाए जाने से बाजारों में भीड़ होने लगी। टेस्ट नतीजे अब भी दो दिन से पहले नहीं मिल रहे हैं। कोविड का टेस्ट पाॅजिटिव आए बिना किसी व्यक्ति को अस्पताल में दाखिला नहीं किया जाता। क्वारंटीन सेंटरों में रह रहे बहुतों से लोगों ने साफ सफाई में कमी,खाना ठीक नहीं,अव्यस्था और खाने के लिए पैसे लिये जाने की शिकायत की है। ज्यादादर अस्पतालों में 25 फीसदी डाॅक्टर और नर्से बीमार हैं या क्वारंटीन में हैं। जिससे स्वास्थ्यकर्मियों की कमी पड़ गई है। समय पर सरकार ने भर्ती का आदेश निकाला नहीं। राज्य सरकार अतिरिक्त स्टाफ उपलब्ध कराने में नाकाम हो गई है। पहले जैसी सख्ती भी नहीं होने की वजह से, कोरोना मरीज बढ़े हैं। सरकार बड़े सरकारी अस्पतालों में एक डिप्टी कलेक्टर नियुक्त करे, ताकि वह प्रत्येक बेड के लिए एक यूनीक कोड तय करे और मरीज के डिस्चार्ज की नीति पर नजर रखे। बहरहाल ऐसी सभावना है कि इस बार की सख्ती से सरकार कोरोना विस्फोट की स्थिति को नियंत्रित कर ले।
Wednesday, August 12, 2020
‘राम भक्त’बनी‘कांग्रेस’
अयोध्या में राम मंदिर के भूमिपूजन से कांग्रेस बैक फुट में आ गई है। अपनी सियासी लाज बचाने कांग्रेस राम भक्त बन गई है। कमलनाथ ने हनुमान चालीसा का पाठ अपने घर में कराया वहीं भूपेश बघेल ने राम वन गमन पथ को पर्यटन के रूप में विकसित करने और माता कौशल्या की जन्म भूमि चंदखुरी में भव्य मंदिर बनाने की घोषणा की। सवाल है कि राम भक्त बनी कांग्रेस को क्या इसका सियासी लाभ मिल पाएगा?
0 रमेश कुमार ‘‘रिपु’’
इन दिनों सियासत में भी सबसे बड़ा राम भक्त होने की होड़ है। क्यों कि राम नाम जितना हिन्दू आस्था का प्रतीक है, उतना ही अब राजनीतिक आस्था का प्रतीक हो गया है। राम के अस्तित्व को सुप्रीम कोर्ट में नकाराने वाली कांग्रेस को यह बात समझ में आ गई है कि गोस्वामी तुलसी दास सही कह गये थे कि, कालयुग में राम का नाम ही वैतरणी पार लगाएगा। कांग्रेस इसे कुछ ज्यादा ही गंभीरता से ले ली। कांग्रेसी राम भक्त बन गये, इस आशा से कि उनकी सियासी वैतरणी पार लग जाएगी।
दरअसल कांग्रेस को लगता है कि बीजेपी राममंदिर निर्माण को मध्यप्रदेश के उपचुनाव, बिहार और पश्चिम बंगाल के चुनाव में कैश करेगी। इसलिए वह साफ्ट हिन्दुत्व कार्ड खेलने का मन बना ली। अयोध्या में प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी की मौजूदगी में होने वाले भूमि पूजन के कार्यक्रम से पहले कमलनाथ ने घर पर राम दरबार सजा लिया। कांग्रेस कार्यकत्र्ताओं से आव्हान किया कि वे हुनमान चालीसा का पाठ करें। और प्रदेश के विकास और कोरोना से मुक्ति की कामना करें। वहीं छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने राम वन गमन पथ को पर्यटन के रूप में विकसित करने और माता कौशल्या की जन्म भूमि चंदखुरी में भव्य मंदिर बनाने की घोषणा की। रामवनगमन पथ की डिजाइन को उन्होंने स्वीकृति दे दी। अगस्त के अंतिम सप्ताह से काम भी शुरू हो जाएगा। छत्तीसगढ़ के लोगों की मान्यता है कि राम का ननिहाल रायपुर से 25 किलोमीटर दूर चंदखुरी में है। राम से जुड़ी हर ऐतिहासिक स्थलों को भूपेश सरकार कैश करने में जुट गई है।
नाथ क्यों बनें राम भक्त
मध्यप्रदेश में 27 सीटों में उपचुनाव होने हैं। मध्य प्रदेश की 27 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव होना है। इनमें 16 सीटें ग्वालियर-चंबल क्षेत्र की भी हैं। जहां राममंदिर मुद्दा असर डालता रहा है। इन क्षेत्रों में जातिगत समीकरण पहले पायदान पर रहता है। कमलनाथ ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतने के लिए तमाम चालें चल रहे हैं। राम मंदिर निर्माण से जुड़ी कमलनाथ की बयानबाजी और हनुमान चालीसा के पाठ का आयोजन भी, इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। कमलनाथ ने कहा कि,‘हिन्दुओं की आस्था का सवाल है। इसलिए हम सभी को राम मंदिर के निर्माण का स्वागत करना चाहिए’’। अपने इस बयान से वे यही बताना चाहिते हैं कि कांग्रेस अब हिन्दू हो गई है। दरअसल चुनाव में मात खाने से बचने के लिए कांग्रेस राम भक्त बन रही है। विनायक दामोदर सावरकर ने कहा था कि, आने वाले समय में कांग्रेसवादी कोट पर जनेऊ पहनकर संघ के सिद्धातों का प्रचार करने के लिए बाध्य हो जाएंगे’’। उनकी बात आज सच लगी है। हर कांग्रेस जनऊधारी बन रहा है।
कांग्रेस के लिए चुनौती है बीजेपी
राजधानी रायपुर में संसदीय सचिव और विधायक विकास उपाध्याय एक लाख दिया बांटा। इसके साथ ही सबसे अपील की कि एक दीप भगवान राम के नाम पर अपने घर में जलायें। उन्होंने युगवार्ता से कहा कि भाजपा ने धर्म के नाम पर जो मार्केटिंग की है, उसे रोकना कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। छत्तीसगढ़ भगवान राम का ननिहाल है। जो उत्साह अयोध्या में है,वही छत्तीसगढ़ में है। राम मंदिर बनने जा रहा है,तो पहला हक कांग्रेस का है। राजीव गांधी ने ही राम मंदिर के निर्माण का मार्ग प्रशस्त किये थे’’। इस पर पूर्व कृषि मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने कहा,यह खुशी की बात है कि, जो लोग राम के अस्तित्व को नकार रहे थे। कोर्ट में राम मंदिर की सुनवाई की तारीख को आगे बढ़ाते रहे,वो आज राम नाम का दीप जला रहे हैं’’।
साफ्ट हिन्दू का कार्ड
सियासत के केन्द्र में अयोध्या करीब पांच सौ सालों से है। राम मंदिर की आधार शिला रखे जाने सेे कांग्रेस की आंख खुली कि, राम मंदिर का विरोध करके सियासी नैया पार नहीं लगा सकते। लगातार कांगे्रस को मात मिलने से राहुल गांधी साफ्ट हिन्दुत्व का कार्ड खेलने के लिए ही मंदिर जाने की रणनीति अपनाई। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी राहुल गांधी मंदिरों मे माथा टेका। कमलनाथ ने मध्यप्रदेश में सत्ता वापसी के लिए बरसों पुराने बीजेपी के राम वनगमन पथ निर्माण के मुद्दे को कांग्रेस के संकल्प पत्र में शामिल किया था। सरकार बनने पर इस पर काम भी शुरू हुआ था। बीजेपी और संघ के गौवंश प्रेम के मुद्दे को भुनाने में भी कमलनाथ पीछे नहीं रहे थे। लोकसभा चुनाव से पहले कमलनाथ सरकार ने एक हजार गौ शालाएं खोलने का निर्णय लिया। इसमें एक लाख निराश्रित गांे वंश की देख रेख और 40 लाख मानव दिवसों का निर्माण शामिल था। इसके पहले कोई भी शासकीय गो शाला नहीं खोली गई थी। गोरक्षा के नाम पर हिंसा करने वालों को होगी पांच साल की जेल, साथ ही भारी जुर्माना भी तय किया था।
कांग्रेस हुई राम भक्त
राम नाम जितना हिन्दू आस्था का प्रतीक है,उतना ही अब राजनीतिक आस्था का प्रतीक हो गया है। कहीं राम का ननिहाल खोज लिया गया है, कहीं वनगमन के चिन्ह। मिथ और इतिहास का एक अजीब सा चाट तैयार कर रही है कांग्रेस। देश में शांति सद्धभाव चाहने वाले,धर्म के नाम पर फसाद करने वालों से अब खुश होंगे। इसलिए कि अब राम के नाम पर दंगा फसाद नहीं होगा’’। अयोध्या में रामलला के मंदिर का भूमि पूजन होने पर प्रियंका गांधी ने ट्विट किया कि, सरलता, साहस,संयम, त्याग, वचनबद्धता, दीनबंधु राम नाम का सार है। राम सबमें है,राम सबके साथ है। भगवान राम और माता सीता के संदेश और उनकी कृपा के साथ रामलला के मंदिर के भूमिपूजन का कार्यक्रम राष्ट्रीय एकता बंधुत्व और सांस्कृतिक समागम का अवसर बने‘‘। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल प्रदेश में हिन्दुत्व का अगवा बनने की चाह में राम का ननिहाल ढूंढ लिये। राजधानी रायपुर से 25 किलोमीटर दूर चंदखुरी में प्राचीन कौशल्या मंदिर के सौन्दर्यीकरण के लिए 15 करोड़ और रामवनगमन पथ को चिन्हित कर उसे पर्यटन स्थल बनाने 137.54 करोड़ रूपये देने की घोषणा की। पहले चरण के लिए रामवनगमन पथ के 9 जगहों को चिन्हित किया गया है, वहीं दूसरे चरण में 43 स्थलों को वहां की मान्यता और भगवान राम के कार्यों के आधार पर विकसित किया जाएगा। जाहिर सी बात है कि वो 2023 के विधान सभा चुनाव में हिन्दू वोटरों को साधने की रणनीति को अंजाम देने में लगे हैं।
राम के मिशन पर भूपेश
छत्तीसगढ़ सरकार राम से जुड़ी निशानियों को संवारने में जुट गई है। रामेश्वर में लंका कूच से पहले राम ने शिवलिंग स्थापित किए थे,उसी तरह उन्होंने छत्तीसगढ़ के रामपाल में भी शिवलिंग स्थापित कर आराधना की थी। रामपाल बस्तर जिले में स्थित है। रामपाल के बाद सुकमा जिले के रामाराम में भूदेवी की आराधना की थी। अब दोनों स्थानों को सरकार अपने नये पर्यटन सर्किट में शामिल कर रही है। कोरिया से सुकमा तक रामवनगमन पथ राम मय होगा। कार्य योजना में तीर्थ एवं पर्यटनों स्थलों के द्वार से लेकर लैंप पोस्ट और बैंच तक के सौंदर्यीकरण का विशेष ध्यान रखा गया है। श्रद्धालुओं एवं पर्यटकों को पग,पग पर, भगवान श्रीराम के दर्शन होंगे। राम वन गमन पथ के मुख्य मार्ग सहित उप मार्गों की कुल लम्बाई लगभग 2260 किलोमीटर है। इस मार्ग के किनारे संकेतक, तीर्थ स्थलों एवं पर्यटनों की जानकारी सहित भगवान श्रीराम के वनवास से जुड़ी कथाएं देखने और सुनने को मिलेंगी। लगभग 1400 किलोमीटर सड़कों के दोनों ओर विभिन्न प्रजातियों के पौधों का रोपण किया जाएगा। पर्यटकों की सुविधाओं का विशेष ध्यान दिया गया है।
बहरहाल,सवाल यह है कि सियासत में अचानक कांग्रेस का राम भक्त बन जाने से क्या उसे राम पर आस्था रखने वाले माफ कर उनकी सियासी नैया पार लगा देंगे? जबकि भारतीय जनमानस कभी भी धर्म की खिलाफत सहन नहीं करता। खासकर इस काल में, जब लोग राममय हो रहे हैं। रामनीति और राजनीति में भेद है। आज यदि गजानंद माधव मुक्तिबोध होते तो वो आज कांग्रेसियों से जरूर पूछते.पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है?
Wednesday, July 15, 2020
गोबर के बहाने हिन्दुओं पर दांव
सियासी फायदे के लिए भूपेश सरकार डेढ़ रूपये किलो गोबर खरीद रही है। ताकि वह हिन्दू वोटरों को रिझा सके। गाय पर राजनीति करने ‘रोका छेकी’ अभियान शुरू की। लेकिन हैवी ट्रैफिक वाली सड़कों पर पूरे प्रदेश में मवेशियों का राज है। विपक्ष का मानना है कि लालू प्रसाद यादव के चारा घोटाला की तरह, गोबर खरीदी में भी घोटाला करने की तैयारी कर रही है कांग्रेस।
0 रमेश तिवारी ‘‘रिपु’’
राजनीति से अर्थशास्त्र को संचालित करने के मकसद से भूपेश सरकार ने नरवा, गरवा,घुरवा और बारी के बाद अब डेढ़ रूपये किलो गोबर खरीद रही है। ताकि हिन्दू वोटरों को रिझा सके। मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह ने चुटकी लेते हुए कहा,’’राज्य में ठीक से धान तो खरीद नहीं सके, अब गोबर खरीदने जा रहे हैं’’। सियासी फायदे के लिए गांव की राजनीति पर जोर दे रही कांग्रेस ने प्रदेश में 2800 गोठान बनाने का फैसला किया है। जिसमें 2240 गोठान बन गये हैं,ऐसा सरकार का दावा है। जबकि प्रदेश के कई गोठान सिर्फ फोटो सेशन के लिए बनाए गये हैं। प्रदेश में कुल पांच हजार गांवों में गौठानों को तैयार किया जा रहा है, ताकि लगभग साढ़े चार लाख लोगों को रोजगार मिल सके। सी.एम भूपेश बघेल ने पशु पालकों को अपने पशुओं को बांध कर रखने को कहा, ताकि उन्हें गोबर मिल सके और उन्हें बेचकर आर्थिक लाभ प्राप्त कर सकें। गोबर खरीदी से लेकर उसके वित्तीय प्रबंधन एवं वर्मी कम्पोस्ट के उत्पादन से लेकर उसके विक्रय तक की प्रक्रिया पर काम किया जा रहा है। गौठानों को आजीविका केन्द्र के रूप में विकसित कर रहे हैं’’।
गांव की ओर सरकार
सियासी फायदे के लिए भूपेश सरकार ने गांव की ओर रूख किया है। अपनी सूट बूट वाली छवि बदली है। गांव पर दांव लगाने एक लाख करोड़ से अधिक का बजट पास किया गया है। बजट में किसानों का हित सर्वोपरि बताते हुए 17 लाख 34 हजार किसानों का ऋण माफ किया गया है। राजीव गांधी न्याय योजना के तहत किसानों को धान के समर्थन मूल्य की पहली किश्त की राशि दी गई है, जो कि1492 करोड़ रूपये है। दूसरी किश्त 20 अगस्त को किसानों के खाते में पहुंच जाएगी। इस योजना के तहत 5100 करोड़ रूपये का प्रावधान बजट में किया गया है। वहीं किसान सड़कों पर न उतरें इसलिए सरकार ने खाद,बीज और उपकरण खरीदने के लिए बिना ब्याज के कर्ज देने के लिए 4600 करोड़ रूपये का प्रावधान किया। इस साल नाबार्ड ने भी छत्तीसगढ़ के लिए 1150 करोड़ की अतिरिक्त कर्ज सीमा मंजूर की है। राज्य में अब तक खरीफ के लिए 7.65 लाख किसानों ने 2721 करोड़ का कर्ज लिया है। खरीफ फसलों के लिए सहकारिता के माध्यम से कुल 6.35 मीट्रिक टन रासायनिक खाद के भंडारण का लक्ष्य रखा गया है। 26 जून तक सहकारी समितियों में 5.77 लाख मीट्रिक् टन खाद का भंडारण किया जा चुका है। जो कि कुल लक्ष्य का 90.81 प्रतिशत है। इसी तरह लक्ष्य का 71 फीसदी खाद का वितरण किया जा चुका है।
आदिवासियों की बात मानी
तेंन्दू पत्ता बोनस की राशि ढाई हजार से बढ़ाकर चार हजार रूपये की गई है। लेकिन राशि नहीं मिलने पर बीजापुर जिले में तेंदूपत्ता के नकद भुगतान को लेकर हजारों आदिवासियों ने 29 जून को कलेक्ट्रेट पहुंच कर अनिश्चितकालीन धरने पर बैठने की घोषणा की, तो जिला प्रशासन सकते में आ गया। जिला प्रशासन ने उच्च स्तरीय अधिकारियों को सूचना दी। बात सी.एम तक पहुंची। ग्रामीणों ने चेक से भुगतान लेने से मना कर दिया। दूसरे दिन सी.एम भूपेश बघेल ने नक्सल प्रभावित सुकमा, दंतेवाड़ा और बीजापुर वनमंडल के तेंदूपत्ता संग्राहकों को पारिश्रमिक की राशि का नगद भुगतान करने की स्वीकृति दी है। जाहिर सी बात है कि मुख्यमंत्री आदिवासियों को नाराज नहीं करना चाहते। इसलिए कि आदिवासियों की वजह से बस्तर की सभी 12 सीटें कांग्रेस के पास है।
कांग्रेस हिन्दूत्व की ओर
छत्तीसगढ़ सरकार ने गोधन न्याय योजना लांॅच की, तो प्रदेश में गोबर पॉलिटिक्स शुरू हो गई है। पूर्व पंचायत मंत्री अजय चंद्राकर ने ट्वीट कर योजना पर सवाल उठाते हुए गोबर को राजकीय प्रतीक चिन्ह बनाने का सुझाव दे दिया। कांग्रेस ने पलटवार करते हुए, चंद्रकार सहित अन्य बीजेपी नेताओं को दिमाग में भरे गोबर को, इस योजना के तहत बेचकर आर्थिक लाभ कमाने को कह। चन्द्राकर के खिलाफ धारा 124क एवं 188 के तहत कांग्रेस कार्यकत्र्ताओं ने मामला दर्ज कराया। राजकीय चिन्ह की तुलना गोबर से किए जाने पर उनका निवार्चन रद्द करने की शिकायत छत्तीसगढ़ निर्वाचन आयोग से की।
कृषि को प्रोत्साहन
केन्द्र सरकार ने किसानों की आय को 2022 तक दोगुना करने की बात कही है। वहीं प्रदेश सरकार कृषि आधिरित बजट पेश कर ग्रामीण छत्तीसगढ़ में हलचल पैदा करना चाहती है। लेकिन कोराना की वजह से बजट में 30 फीसदी की कटौती की गई है। जाहिर सी बात है कि कुछ योजनाएं अधर में रहेगी। वैसे सरकार ने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में 366 करोड़, राष्ट्रीय कृषि विकास योजना में 370 करोड़, एकीकृत बागवानी मिशन में 205 करोड़, जैविक खेती मिशन के लिए 20 करोड़, वाटरशेड प्रबंधन कार्यक्रम में 200 करोड़ एवं प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना में 110 करोड़ का प्रावधान किया है। कृषक जीवन ज्योति योजना के तहत 5 एच.पी. तक के कृषि पंपों को निःशुल्क विद्युत प्रदाय के लिये 2 हजार 300 करोड़ रूपये का प्रावधान किया गया है। बेमेतरा,जशपुर, धमतरी, अर्जुन्दा, जिला बालोद में उद्यानिकी महाविद्यालय तथा लोरमी में कृषि महाविद्यालय की स्थापना के लिए नवीन मद में 5 करोड़ का प्रावधान है। वहीं इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर में खाद्य प्रौद्योगिकी की स्थापना की जायेगी। कृषि मंत्री रविन्द्र चैबे कहते हैं,‘‘ कृषि क्षेत्र में रोजगार की संभावनाएं उत्पादन क्षेत्र से कहीं ज्यादा है। इसलिए बजट में रोजगार की समस्या को हल करने कृषि खर्च को बढ़ाया गया है’’।
सबसे बढ़िया,कृषि पर दांव
बहरहाल रोजगार सृजन के तहत मनरेगा के जरिए रोजगार बढ़ायें। फाइलों में 14 लाख लोगों को रोजगार देने की बात की जा रही है। ये आंकड़े केवल किताबी नहीं होना चाहिए। कृषि में रोजगार सृजन की क्षमता उत्पादन क्षेत्र से ज्यादा है। यदि कोई सरकार रोजगार की समस्या को हल करने की दिशा में आगे बढ़ती है, तो कृषि पर दांव लगाना सबसे बढ़िया उपाय है।
फोटो - 1 गोठान में गायें
2 गोबर पर नजर
3 बीजापुर जिले में तेंदूपत्ता के भुगतान को लेकर हजारों आदिवासियों ने प्रदर्शन किया
ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी- मरकाम
प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष मोहन मरकाम कहते हैं नरवा,घुरवा और बाड़ी योजना से हमारी सरकार ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करना चाहती है। गोबर खरीदने की योजना से कृषि जगत में नायाब तब्दीली आएगी। रासायनिक खाद से प्रदूषण प्रदूषित होता ही है, साथ ही सेहत पर बुरा असर पड़ता है। उनसे हुई बातचीत के प्रमुख अंश -
0 गोबर खरीदी की योजना से क्या यह मान लिया जाए कि कांग्रेस अब हिन्दू होने लगी है?
00 बात हिन्दू और मुस्लिम की नहीं है। छत्तीसगढ़ कृषि बाहुल राज्य है। भूपेश बघेल की सरकार चाहती है कि लोग रासायनिक खाद की जगह आर्गेनिक खाद का इस्तेमाल करें। ताकि पर्यावरण में सुधार हो और लोगों कीे सेहत अच्छी बने। पशुपालक से खरीदे गए गोबर से सरकार वर्मी कम्पोस्ट बनाने का काम करेगी। इसके लिए सरकार ने गोधन न्याय योजना बनाई है। पहले चरण में 2240 गोठानों को जोड़ा जाएगा। गोबर की खाद बनाने में स्वसहायता समूहों की मदद ली जाएगी। फिर सहकारी समितियों के माध्यम से इसका विक्रय किया जाएगा।
0 गोबर खरीदी पर विपक्ष की नाराजगी की वजह आप क्या मानते हंै।
00 विपक्ष हमेशा से हर चीज में धर्म की राजनीति करते आया है। गाय,गोबर और राम वन गमन का मुद्दा अब इनके हाथ से निकल गया है। सरकार में आने के बाद हमारी पार्टी चाहती है कि, ग्रामीण किसान गोबर खाद को अहमियत दंे। लेकिन विपक्ष गोबर की राजनीति करने पर आमादा है। इसे राज्यकीय चिन्ह घोषित करने की वकालत करते हैं। गोबर पर धार्मिक भावनाएं भड़काने और समुदाय को बांटने की राजनीति कर रहे हैं।
0 क्या यह मान लिया जाए कि कांग्रेस गोठान,गोबर,और किसान के जरिये गांव की ओर अपना रूख कर ली है।
00 छत्तीसगढ़ का गौरवशाली इतिहास रहा है। गांव में हमारी संस्कृति बसती है। यहां की ग्रामीण अर्थव्यवस्था और मजबूत हो, इसलिए भूपेश बघेल की सरकार ने नरवा,गरवा,घुरवा और बाड़ी को प्राथमिकता दे रही है। ताकि अधिक से अधिक लोगों को रोजगार मिल सके।
0 गाय,गोबर,किसान के जरिये, क्या कांग्रेस अभी से 2023 में होने वाले विधान सभा चुनाव की तैयारी कर रही है।
00 चुनाव आते जाते रहते हैं। हमें सरकार में रह कर काम करने का मौका मिला है। प्रदेश में कांग्रेस सरकार बेहतर काम करना चाहती है। एक पहचान बनाना चाहती है। हम चाहते हैं,यहां का किसान समृद्ध हो। यहां के गांव जैविक खाद को अपना कर,पर्यावरण की रक्षा में मिसाल बनें। सरकार की योजनाओं से ग्रामीण छत्तीसगढ़ में हलचल है। प्रदेश सरकार किसानों की सरकार है। इसका प्रमाण है 19 लाख से अधिक किसानों के कर्जे माफ करना। राजीव गांधी न्याय योजना के तहत प्रदेश के सभी किसानों को समर्थन मूल्य के बोनस की पहली किस्त दी गई है। धीरे धीरे सभी किस्तें मिल जाएगी। तेन्दूंपत्ता की बोनस राशि ढाई हजार से बढ़कार चार हजार किया गया है।
0 जोगी की पार्टी को 12 फीसदी वोट मिले थे। वर्तमाान में जिस तरह कांग्रेस राजनीति के रास्ते पर चल रही है, उससे वह कितने फिसदी वोट जोगी की पार्टी को अपने पक्ष में कर सकती है? 00 चुनाव आते जाते रहते हैं। जोगी जी हमारी पार्टी से प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री थे। उनके जैसा नेता अब उनकी पार्टी में कोई नहीं है। अब उनकी पार्टी में खलबली है। उनके पदाधिकारी और कार्यकत्र्ता कांग्रेस में आ रहे हैं। मुझे नहीं लगता कि, अगले चुनाव में जोगी की पार्टी चुनाव लड़ने की स्थिति में रहेगी।
0 बीजेपी के नए अध्यक्ष विष्णुदेव साय हैं। क्या आपको लगता है 15 सीट से बढ़कर बीेजेपी 40 सीट से ऊपर पा जाएगी।
00 मुझे नहीं लगता कि विष्णु देव साय के नेतृत्व में बीजेपी कोई करिश्मा कर पाएगी। बीजेपी को आदिवासी वोटर नकार दिया है। 2013 के चुनाव में हमारे पास आदिवासी की 18 सीटें थी। अब 29 सीट में 28 सीट है। आदिवासी वोटर बीजेपी की ओर झुकेगा,ऐसा नहीं लगता।
हिन्दुओं को धोखा दे रही कांग्रेस- साय
बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष विष्णुदेव साय कहते हैं, कांग्रेस सरकार का सारा काम थ्योरी पर है,प्रेक्टिकल में कुछ भी नहीं। गोबर खरीदी योजना के नाम कांग्रेस हिन्दुओं को धोखा दे रही है। हिन्दुओं को भरमाने का प्रयास कर रही है। इनके नेता तो कोट के ऊपर से जनऊ पहनते हैं। प्रदेश में काम काज नहीं, गुंडाराज है। उनसे हुई बातचीत के प्रमुख अंश -
0 क्या ऐसा नहीं लगता कि डेढ़ रूपये किलो गोबर खरीदने वाली कांग्रेस अब हिन्दू होने लगी है?
00 कांग्रेस ने नरवा, गरवा,घुरवा और बाड़ी से अपनी राजनीति की शुरूआत की। कांग्रेस सरकार की योजनाएं थ्योरी में अच्छी लगती है लेकिन, प्रेक्टिकल में कहीं कुछ भी नहीं है। मवेशी मर रहे हैं। ऐसी कोई सड़क नहीं है, जहां गायें बैठी न मिले। इनका रोका छेका अभियान पूरे प्रदेश में फेल है। पंचायत के पास पैसा नहीं है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था छिन्न भिन्न हो गई है। हमें लगता है, ये लालू प्रसाद यादव के चारा घोटाला की तरह, गोबर घोटाला की तैयारी में हैं। अलग से बजट है नहीं। रोजगार गारंटी, ,मनरेगा,और पंचायत के पैसा को लगा रहे हैं।
0 नरवा, गरवा,घुरवा और बारी के जरिए ग्रामीण अर्थव्यस्था को मजबूत कर रहे हैं,ऐसा सरकार कहती है। आप क्या मानते हैं।
00 कंडा भी बन जाएगा। गोबर गैस लग जायेगा। बकरी के लिए बंबूल भी लग जाएगा। लेकिन, जब तक बंबूल तैयार होगा, तब तक पता नहीं, इनकी सरकार रहेगी भी कि नहीं। नरवा,गरवा,घुरवा और बारी से ग्रामीण अर्थव्यवस्था सुधरेगी या फिर कांग्रेस की अर्थव्यवस्था सुधरेगी? डेढ़ साल में प्रेक्टिकल की बजाए, थ्योरी वाली योजना ज्यादा लाई है कांग्रेस।
0 कांग्रेस की इस प्रक्रिया पर विपक्ष ऐसा क्यों कह रहा है कि सरकार के दिमाग में गोबर भरा है।
00 यह एक सामान्य सी बात है। लेकिन सरकार में बैठे लोगों को लगता है, विपक्ष सही कह दिया है। उन्हें बुरा लग गया। हमारी पार्टी के पूर्व मंत्री अजय चन्द्राकर के खिलाफ कांग्रेस के लोगों ने एफआईआर दर्ज करा दिया है। जबकि प्रधान मंत्री के खिलाफ युवा कांग्रेस मोर्चा के पदाधिकारी,इनका आईटी सेल चैबीस घंटे सोशल मीडिया में अनर्गल बातें कहते रहता है। हमारी पार्टी ने तो एफआईआर दर्ज नहीं कराया। पी.एम सिर्फ बीजेपी के नहीं,पूरे देश के हैं। कांग्रेसियों को यह सोचना चाहिए।
0 प्रदेश सरकार गोठान यानी कि गाय,गोबर,और किसान के जरिये ऐसा नहीं लगता कि अब वह गांव की राजनीति करने को अमादा है।
00 इन्हें गाय की चिंता नहंी है। इनकी सरकार बनते ही मवेशी बाजार खुल गये। यहां की गायें झारखंड के रास्ते से बंगाल के बूचड़ खाने भेजी जा रही हैं। प्रदेश में रमन सरकार थी, तो गायों की तस्करी पर रोक थी। बूढ़ी गायों को रास्ते में ही ट्रक से उतार देतें हैं, उन्हें मरने के लिए। गांव की राजनीति करते, तो अच्छा रहता है। पूरे प्रदेश में गंुडाराज है। बिहार के रेत माफियाओं को बोलबाला है। रायगढ़ जिले के सारंगढ़ टिमरलगा क्षेत्र में अवैध खनन की सूचना पर प्रशिक्षु आईएएस अधिकारी मयंक चतुर्वेदी अपनी टीम के साथ पहुंचे थे। जहां खनन माफिया ने उनकी कार को जेसीबी से कुचल कर कथित तौर पर हत्या करने की कोशिश की। धमतरी और बलौदाबाजर में हमारे कार्यकत्र्ताओं के खिलाफ मामला दर्ज किया गया।
00 गाय,गोबर,किसान के जरिये, क्या कांग्रेस अभी से 2023 में होने वाले विधान सभा चुनाव की तैयारी कर रही है?
00 कांग्रेस जानती है, वो अगला चुनाव नहीं जीत सकती। इसलिए धार्मिक भावनाओं के जरिये हिन्दुओं के साथ धोखा कर रही है। उन्हें भरमाने का प्रयास कर रही है। जबकि यह सभी जानते हैं कि इनके नेता अपने को हिन्दू साबित करने के लिए कोट के ऊपर जनऊ पहनते हैं। उन्हें यह भी नहीं पता कि जनऊ अंदर पहना जाता है।
Saturday, July 11, 2020
पड़ गए बीज टूट,फूट के
स्वास्थ्य एंव पंचायत मंत्री टी.एस.सिंहदेव ने एक चैनल में यह कहकर सनसनी फैला दी कि,यदि किसानों को अंतर की राशि अगली फसल से पहले नहीं मिली, तो इस्तीफा दे दूंगा। मुख्य मंत्री के रवैये से वे क्षुब्ध थे। उनके ट्वीट और बयान से माना जा रहा है कि कांग्रेस की दीवार में दरार पड़ गई है।
0 रमेश कुमार ‘‘रिपु’’
एक ट्वीट ने बता दिया कि कांग्रेस की दीवार में दरार पड़ गई है। ट्वीट स्वास्थ्य मंत्री टी.एस. सिंह देव का था। उन्होंने ट्वीट किया कि सभी बेरोजगार, शिक्षा कर्मियों, विद्या मितान, प्रेरकों एवं अन्य युवाओं की पीड़ा से मैं बहुत दुखी और शर्मिंदा हूँ’’। दरअसल 29 जून को बेरोजगार युवक हरदेव सिन्हा बेरोजगारी से परेशान होकर मुख्यमंत्री निवास के सामने खुद पर पेट्रोल डालकर आग लगा लिया था। युवक मुख्यमंत्री के समक्ष अपनी परेशानी रखना चाहता था। लेकिन सुरक्षा कर्मियों ने उसे भीतर नहीं जाने दिया। गौरतलब है कि कांग्रेस के घोषणा पत्र में था कि कांग्रेस सरकार बनने पर बेरोजगारों को ढाई हजार रूपये महीना बेरोजगारी भत्ता देंगे।
छत्तीसगढ़ सरकार में कैबिनेट मंत्री टीएस सिंहदेव अपनी ही सरकार से खुश नहीं है। यह कयास इस वजह से लगाया जा रहा है कि ट्वीटर पर प्रदेश के बेरोजगारों के प्रति चिंता व्यक्त की। इसके बाद 30 जून को एक टी.वी. चैनल में सभी नागरिकों के सामने लिखित और मौखिक रूप से कहा कि यदि अगली फसल से पहले 2500 रुपए सरकार के वादे के मुताबिक धान के बदले, मिलने वाला मूल्य प्रति क्विंटल, किसानों का नहीं मिला, तो मेरा इस्तीफा स्वीकार कर लेना। जाहिर सी बात है कि उनका इशारा मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की ओर था। उनके इस सियासी बयान सेे बखेड़ा खड़ा होना ही था। और यही हुआ एक जुलाई को। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने टी.एस सिंह देव को राज्य सरकार का पक्ष रखने के लिए अधिकृत प्रवक्ता के पद से हटा कर, कृषि मंत्री रविन्द्र चैबे और वन मंत्री मोहम्मद अकबर को नियुक्त कर दिया। सरकार की तरफ से कहा गया कि ऐसा पत्रकारों की मांग पर किया गया है। कांग्रेस के मीडिया प्रभारी शैलष त्रिवेदी ने इस मामले में कहा,‘‘ मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की तरफ से दो मंत्रियों को सरकार का अधिकृत प्रवक्ता इसलिए नियुक्ति किया गया है,ताकि सरकार की तरफ से दी जाने वाली जानकारियों में विविधता ना रहे और जनता के बीच किसी भी विषय पर स्पष्ट जानकारी पहुंचे’’।
अब सियासी रिश्ता 36 का
टीएस सिंह देव के बयान से यह तो साफ हो गया कि कांग्रेस में आल इज वेल नहीं है। भूपेश और टीएस सिंह देव के बीच 36 का सियासी रिश्ता है,न कि 63 का। उनके बयान ने सरकार के सामने मुश्किलें खड़ी कर दी है। वहीं विपक्ष इस पर चुटकी ले रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री डाॅक्टर रमन सिंह ने कहा है,‘‘ टी.एस. सिंहदेव के इस्तीफे की पेशकश कांग्रेस सरकार की चलाचली की बेला का अलार्म है। राज्य सरकार की दगाबाजी, वादाखिलाफी और सियासी नौटंकियों का एक न एक दिन यही हश्र होना था। भाजपा लगातार जिन मुद्दों पर सरकार की आलोचना कर रही है, सिंहदेव के इस्तीफे की पेशकश से उस पर मुहर लग रही है। सरकार में दूसरे नंबर की हैसियत रखने वाले मंत्री टी. एस. सिंहदेव की यह पेशकश सरकार के राजनीतिक चरित्र के ताबूत की पहली और आखिरी कील साबित होगी। सरकार ने न किसानों के साथ न्याय किया, न शराबबंदी का वादा निभाया और न ही प्रदेश के शिक्षित बेरोजगारों के लिए रोजगार के कोई अवसर बाकी रखे। बेरोजगार युवकों को प्रदेश की भूपेश सरकार ने इस कदर हताशा के गर्त में धकेल दिया है कि वे अब आत्मदाह तक करने जैसा कदम उठाने को मजबूर हो रहे हैं। यह सरकार के लिए चुल्लूभर पानी में शर्म से डूब जाने वाली स्थिति है’’।
एक साल भर्ती रूकी हुई है
प्रदेश में करीब सवा साल से शिक्षक भर्ती प्रक्रिया अटकी हुई है। इसको लेकर अभ्यर्थी काफी नाराज हैं और लगातार प्रदर्शन भी करते रहे हैं। शिक्षक भर्ती का विज्ञापन पिछले साल 9 मार्च 2019 को जारी हुआ था। इसके अंतर्गत व्याख्याता, शिक्षक सहायक, शिक्षक विज्ञान सहायक, शिक्षक विज्ञान प्रयोगशाला के कुल 14580 पदों पर भर्ती होनी है। सवा साल में सिर्फ परीक्षा के परिणाम ही घोषित हुए हैं। करीब 4 माह पहले सत्यापन कार्य शुरू हुआ, लेकिन वह भी काफी धीमी गति से चल रहा है। 14 माह बाद भी ना तो व्याख्याता और ना ही किसी भी शिक्षक और सहायक शिक्षक संवर्ग की प्रथम पात्र,अपात्र की सूची जारी हुई है। कंाग्रेस के घोषणा पत्र में शराब बंदी,बेरोजगारों को भत्ता,एक लाख सरकारी पदों पर भर्ती, मुफ्त इलाज की सुविधाएं, आंगनबाड़ी केंद्रों में शिक्षा का बंदोबस्त,स्वामीनाथन कमेटी की कई सिफारिशों को लागू करने की बात कही गई है।
सियासत शुरू
टी.एस.सिंहदेव के बयान और ट्वीट पर बीजेपी अध्यक्ष विष्णुदेव साय ने कहा कि टी.एस.सिंहदेव का शर्मिदा होना उचित है। उनमें अभी नैतिकता है, इसलिए सरकार में जो देखा, वह उन्होंने कहा। सरकार तो नाकाम है। घोंषणा पत्र में किये गये वायदे पूरे करने में मुकर रही है’’। नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक ने कहा,‘‘टीएस सिंहदेव ने किसानों के साथ हुए अन्याय के खिलाफ आवाज उठाकर सरकार को सबक सिखाने का जो संकल्प व्यक्त किया है, भाजपा उसका स्वागत करती है। महिला स्व.सहायता समूहों के कर्ज माफ करने का वादा तक अब सरकार के एजेंडे में कहीं नजर नहीं आ रहा है। पूर्व कलेक्टर एंव भाजपा नेता ओपी चैधरी ने अपने ट्वीट में लिखा, धन्यवाद! आपने शर्मिंदा होने की संवेदनशीलता कम से कम दिखाई। भारतीय संविधान में कैबिनेट के सामूहिक उत्तरदायित्व का सिद्धांत है। कैबिनेट के किसी सदस्य का बयान, पूरे कैबिनेट और सरकार का बयान होता है।
बायें करने की राजनीति
भूपेश सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती है, उसे मिला प्रचंड जनादेश। उनसे जनता की उम्मीदें बहुत है। जिन पर खरा उतरना भूपेश सरकार के लिए बेहद कठिन काम है। वे अपने मंत्रिमंडल के सदस्यों का विश्वास खो रहे हैं। टी.एस.सिंह देव कहने को स्वास्थ्य एवं पचायत मंत्री हैं लेकिन,मुख्यमंत्री पिछले कई माह से उन्हें बायें करते आ रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग की बैठक में मुख्यमंत्री ने उन्हें बताया तक नहीं,जबकि वे रायपुर में ही थे। मुख्यमंत्री निवास से सिंहदेव का निवास मुश्किल से दो सौ मीटर है। कोरोनाकाल के समय भी उनसे राय लेना उचित नहीं समझा। जब टी.एस. सिह देव से पूछा गया कि स्वास्थ्य विभाग की बैठक में क्यों नहीं गये,उनका जवाब था कि, उन्हें स्वास्थ्य विभाग के बैठक की जानकारी नहीं थी। सचिव की जवाबदारी थी,पर उन्होंने भी जरूरी नहीं समझा बताना। मंत्रियों के विभाग बंटवारे के समय टी.एस सिंह देव वित्त विभाग चाहते थे,लेकिन मुख्यमंत्री ने उसे अपने पास रखा। गोबर खरीदी योजना समिति में सिंहदेव का नाम है। वाणिज्यिक विभाग सिंह देव के पास है,लेकिन विभाग ने इन्हें बताया तक नहीं और एक कोयला व्यापारी के यहां जी.एस.टी.मामले पर छापा पड़ गया।
कांग्रेस का जवाब
टी.एस सिंह देव के इस्तीफे के बयान पर कांग्रेस दुविधा में है कि मिडिया को क्या जवाब दें। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए मंत्री अमर जीत भगत ने कहा, किसी और के बयान पर मैं कुछ नहीं कह सकता। लेकिन एक बात साफ करना चाहूंगा कि घोषणा पत्र पांच सालों के लिए होता है। अभी तो सरकार को मात्र डेढ़ साल हुए हैं। कांग्रेस प्रवक्ता आनंद शुक्ला ने कहा कि भाजपा कांग्रेस की सरकार पर सवाल उठाने से पहले अपने 15 साल के कार्यकाल को याद करे।
क्या करेंगे सिंहदेव
सवाल यह है कि क्या मध्यप्रदेश की तरह छत्तीसगढ़ में भी हो सकता है? वैसे संभावनाओं पर राजनीति चलती है। गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू मुख्यमंत्री से एक समय नाराज चल रहे थे। लेकिन उन्होने चुप्पी साध ली है,अगली रणनीति उनकी भी चैकाने वाली हो सकती है। कांग्रेस के अंदर का एक सच यह है कि ढाई साल भूपेश और ढाई साल टी.एस.सिंह देव मुख्यमंत्री रहेंगे। तो दोनों तरफ से बाजी पलटने की कवायद हो सकती है। कांग्रेस के एक गुट का कहना है, अगामी एक साल के अंदर मुख्यमंत्री ऐसा कुछ कर सकते हैं कि, सिंहदेव स्वयं कांग्रेस छोड़ देंगे या फिर इस्तीफा दे देंगे। ऐसी स्थिति में वे अपने साथ कितने विधायक ले जाते हैं,अभी कुछ कहा नहीं जा सकता। वैसे मुख्यमंत्री उन्हें बायें करने की सियासी प्रक्रिया शुरू कर दिये है। इसकी जानकारी राहुल गांधी को है। बीच में टी.एस सिंह देव दिल्ली गये थे,अपनी बात रखने। दोनों के बीच क्या बातें हुई, बाहर नहीं आई। बहरहाल कांग्रेस के अंदर बायें चलने की जो राजनीति चल रही है, उसका अंत कहां जाकर होगा, न तो कांग्रेस को पता है, और न ही दस जनपथ को।
Tuesday, June 30, 2020
अध्यक्ष बदलने की सियासत
कांग्रेस की बांह मरोड़ने और बीजेपी को नई ताकत के साथ खड़ा करने के मकसद से विष्णुदेव साय को तीसरी बार अध्यक्ष बनाया गया है। उनके अध्यक्ष बनने से डाॅ रमन सिंह राजनीतिक रूप से और मजबूत हुए।
0 रमेश तिवारी ’’रिपु’’
छत्तीसगढ़ में कांग्रेस और बीजेपी की राजनीति में अब तक एक समानता थी। दोनों दलों में नेतृत्व एक ही वर्ग के पास रहा। पहली बार बदलाव हुआ। बीजेपी से नेता प्रतिपक्ष धर्मलाल कौशिक हैं, जो ओबीसी से हैं और आदिवासी वर्ग से प्रदेश अध्यक्ष, विष्णु देव साय को बनाया गया है। वहीं कांगे्रस से पीसीसी अध्यक्ष मोहन मरकाम हैं,जो अनुसूचित जन जाति वर्ग से आते हैं। बीजेपी के अध्यक्ष इसके पहले विक्रम उसेंडी थे। विधान सभा चुनाव 2023 में है,लेकिन उससे पहले बीजेपी ने अपना अध्यक्ष बदल दिया। ऐसा इसलिए किया ताकि, नए प्रदेश अध्यक्ष को चुनाव की तैयारी के लिए पर्याप्त समय मिल जाए। चूंकि बस्तर की पूरी 12 सीटों पर कंाग्रेस का कब्जा है। बीजेपी आदिवासी कार्ड खेलकर आदिवासियों को अपनी ओर करना चाहती है। वैसे नये प्रदेश अध्यक्ष की सुगबुगाहट तभी हो गई जब शहरी निकाय चुनाव और पंचायत चुनाव में बीजेपी को उम्मीद से कम सफलता मिली। विधान सभा चुनाव के समय सत्ता विरोधी हवा के चलते बीजेपी को केवल 15 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा था। लेकिन हैरान करने वाली राजनीति का दृश्य तब देखने को मिला जब10 निगमों में महापौर और सभापति नहीं बन सके। 27 में से 20 जिलों में भाजपा जिला पंचायतों में अध्यक्ष नहीं बना सकी। रायपुर में बहुमत था,बावजूद जिला पंचायत अध्यक्ष के उम्मीदवार को सिर्फ 4 वोट मिले, जबकि सदस्य 9 थे। वहीं संगठन में कार्यकारिणी का गठन नहीं कर पाए।
पार्टी के कार्यकत्र्ताओं के बीच यह चर्चा तेज हुई कि 2023 का चुनाव जीतना है, तो नेतृत्व के लिए नया चेहरा चाहिए। ऐसा व्यक्ति चाहिए, जिसकी पकड़ा सत्ता और संगठन में हो। दुर्ग के सांसद विजय बघेल का नाम बड़ी तेजी से उछला। सोशल मीडिया में उन्हें बाधाई दिया जाने लगा। वे चार लाख वोटों से लोकसभा चुनाव जीते थे। अचानक उनका नाम अध्यक्ष पद की दौड़ से बाहर हो गया। अनुसूचित जन जाति मोर्चा के राष्ट्रीय के अध्यक्ष रामविचार नेताम भी प्रदेश अध्यक्ष बननस चाहते थे, लेकिन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से मुकाबले के लिए उन्हें फिट नहीं माना गया। वहीं डॉ रमन सिंह से उनकी पटरी नहीं बैठने की वजह से, वे दौड़ से बाहर हो गए। डाॅ रमन सिंह ने संगठन मंत्री सौदान सिंह को विष्णुदेव साय और महेश गागड़ा का नाम सुझाया। साय के नाम पर बीजेपी अध्यक्ष जे.पी नड्डा ने मुहर लगा दी। विष्णु देव साय की नियुक्ति पर बृजमोहन अग्रवाल,प्रेमप्रकाश पांडे और राममविचार नेताम आदि कुछ नेताओं ने आपत्ति की। साय की नियुक्ति पर उनके खिलाफ पार्टी का दूसरा गुट सोशल मीडिया में उनके खिलाफ कई तरह की बातें लिखा। एक कार्यकर्ता ने साय के अध्यक्ष बनने पर मुख्यमंत्री बघेल को बधाई देते हुए लिखा, भाजपा ने आपकी राह आसान कर दी।
रमन और हुए मजबूत
पूर्व मुख्यमंत्री डाॅ रमन सिंह की पहली पसंद विष्णुदेव साय थे। विष्णु देव साय रायगढ़ लोकसभा सीट से चार बार सांसद रहे। मोदी की 2014 में बनी सरकार में, वे केंद्रीय राज्य मंत्री थे। 2006 से 2010 और फिर 2014 में करीब आठ महीने के लिए प्रदेश अध्यक्ष रहे। वे दोनों बार तब अध्यक्ष बने, जब राज्य में भाजपा की सरकार थी। अब पार्टी सत्ता से बाहर है। उनकी नियुक्ति से संगठन में डाॅ रमन सिंह का दबदबा बढ़ गया। राजनीतिक रूप से वे और भी मजबूत हो गए। पूर्व मुख्यमंत्री डॉक्टर रमन सिंह ने कहा,‘‘ पंचायत से पार्लियामेंट तक का अनुभव साय के पास है। उनके अनुभव का लाभ पार्टी को मिलेगा। उनके नेतृत्व में राज्य संगठन एक मजबूत विपक्ष के रूप में स्थापित होगा। 2023 के विधान सभा चुनाव की तैयारी में मदद मिलेगी’।
बृजमोहन पिछड़ गए
नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक भी रमन सिंह की पसंद हैं। उन्होंने ही कौशिक को छत्तीसगढ़ भाजपा का अध्यक्ष बनवाया था। कौशिक को नेता प्रतिपक्ष बनाने का भी बृजमोहन समर्थकों ने विरोध किया था। नेता प्रतिपक्ष की दौड़ में बृजमोहन अग्रवाल स्वयं थे। बृजमोहन भाजपा के जमीनी नेता हैं, लेकिन 2000 में भाजपा दफ्तर में मारपीट की घटना और फिर निलंबन से वे पार्टी में पीछे चले गए। अब उन पर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से मित्रता निभाने का आरोप लग रहा है।
आदिवासी नेता का विरोध क्यों
छत्तीसगढ़ आदिवासी बाहुल क्षेत्र है। इस नजरिये से बीजेपी ने हमेशा आदिवासी नेताओं को तरजीह दी। लेकिन पूर्व मंत्री अजय चन्द्राकर और शिवरतन शर्मा के नेतृत्व में कुछ नेताओं ने आदिवासी नेताओं को ही उपकृत किये जाने के खिलाफ तगड़ी मोर्चाबंदी की। नेताओं का कहना था एनडीए सरकार में विष्णुदेव साय मंत्री थे। वर्तमान में आदिवासी नेेत्री रेणुका सिंह मंत्री हैं। नंदकुमार साय भी राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के मुखिया रहे। संगठन में भी स्व. लखीराम अग्रवाल और धरमलाल कौशिक को छोड़ कर, राज्य बनने के बाद हमेशा आदिवासी नेता को अध्यक्ष बनाया गया। राज्य संगठन में संगठन मंत्री पवन साय भी आदिवासी हैं। पहले रामप्रताप सिंह भी आदिवासी रहे हैं। रामविचार नेताम को राज्य सभा सदस्य बनाया गया। उन्हें अनुसूचित जाति मोर्चा का प्रमुख की जिम्मेदारी सौंपी गई है। ओबीसी नेताओं की नाराजगी इस बात पर है कि आदिवासी नेताओं को इतना सब कुछ देने के बाद भी विधानसभा चुनाव में बस्तर, सरगुजा में दो सीट नहीं मिल पाई और अब फिर से अध्यक्ष नियुक्ति इसी वर्ग से क्यों? दूसरे वर्ग को भी तरजीह दी जाए।
बहरहाल नये प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति से कांग्रेस में खलबली है। मरवाही विधान सभा में जोगी के निधन से उप चुनाव होना है। यह चुनाव कांग्रेस की साख का सवाल रहेगा।
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डेढ़ साल में भूपेश सरकार की साख गिर गई
डेढ़ साल में उतरने लगा खुमारः साय
बीजेपी के नये प्रदेश अध्यक्ष विष्णुदेव साय कहते हैं, डेढ़ साल में ही भूपेश सरकार की साख जनता के बीच गिर गई है। डेढ़ साल बाद भी घोषणा पत्र मे किये गये महत्वपूर्ण वायदों को पूरा नहीं किया। यही वजह है कि उन्हें झूठे सर्वे का सहारा लेना पड़ा, ‘‘नम्बर टू’’ के लिए। युगवार्ता के रमेश तिवारी‘‘रिपु’’ के साथ बातचीत के मुख्य अंश -
0 आप को केन्द्रीय नेतृत्व ने तीसरी बार अध्यक्ष बनाया है। जबकि पार्टी के अंदर आपको लेकर विरोध है। इसे लेकर आप क्या सोचते हैं।
00 मेरी नियुक्ति को लेकर किसी तरह का विवाद था,मै नहीं मानता। विवाद होता, तो मेरे अध्यक्ष बनने पर कार्यकत्र्ताओं में उत्साह न होता। पार्टी हित के लिए बीजेपी का पूरा परिवार एक है। मै इसे अपना सौभाग्य मानता हूं कि, केन्द्रीय नेतृत्व ने मुझे तीसरी बार अध्यक्ष पद से नवाजा है।
0 भूपेश सरकार के काम काज से प्रदेश की 81 फीसदी जनता खुश है। एक सर्वे रिपोर्ट ऐसा कहती है। आप की क्या राय है?
00 डेढ़ साल में ही भूपेश सरकार की साख जनता के बीच गिर गई है। हैरानी वाली बात यह है कि डेढ़ साल की सरकार को सर्वे की क्या जरूरत? यदि ये अपने घोंषणा पत्र के वायदे पूरे किये होते तो जनता बीजेपी के काम काज को याद न करती।
0 पार्टी की आगामी गतिविधियां क्या होंगी।
00 प्रदेश में 750 से अधिक वर्चुअल रैलियां करेंगे। कार्यकत्र्ताओं को बतायेंगे सरकार की खामियों को किस तरह जनता को बताना है। वाट्सअप्प के जरिये लोगों से संवाद स्थापित करेंगे। मै ने खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिखे पत्र, केंद्र सरकार की उपलब्धियां और कोविड से बचाव की जानकारी लिखे पर्चे बांटा। पूरे प्रदेश में कार्यकत्र्ता यही कर रहे हैं। हर जिले का दौरा करूंगा। हमारे पास सरकार के खिलाफ मुद्दे बहुत हैं।
0 कांग्रेस कहती है कि 15 साल में जो काम बीजेपी नहीं कर सकी, वो हमने डेढ़ साल में कर दिखाया। आप क्या मानते हैं?
00 अपने मुंह से अपनी तारीफ करना कांग्रेस की पुरानी आदत है। यदि प्रदेश की 81 फीसदी जनता खुश है,तो फिर डाॅक्टरों को तीन माह से वेतन क्यों नहीं मिल रहा है। राज्य के कर्मचारियों के वेतन मे कटौती क्यों की गई है। बजट तीस फीसदी कम क्यों किया गया? बेरोजगारों को भत्ता.नौकरी कुछ नहीं मिला। शराबबंदी के घोषणा पत्र पर चुनाव लड़ने वाली सरकार आज शराब क्यों बेच रही है। किसानों का कर्जा माफी भी पूरा नहीं हुआ। पिछले साल ढाई हजार रूपये प्रति क्विंटल धान किसानों से खरीदे थे। इसलिए नहीं खरीदा। समर्थन मूल्य के अंतर की राशि पहली किस्त तो दे दी, लेकिन अन्य किस्त कब देंगे, पता नहीं।
Friday, June 26, 2020
गजराज के बुरे दिन
छत्तीसगढ़ में हाथियों के बुरे दिन आ गए है। एक सप्ताह में छह हाथियों की बड़ी दर्दनाक मौत हुई। वन अमला किसी को भी नहीं बचा सका। जबकि सरकार ने हाथियों की निगरानी के लिए हर साल दो करोड़ रूपये खर्च करती है। सवाल यह है कि क्या किसान हाथियों से अपना घर,अपनी फसल और बाग बगीचे बचाने के लिए उन्हे कीटनाशक दवा खिला रहे हैं?
0 रमेश तिवारी ‘‘रिपु’’
छत्तीसगढ़ के सूरजपुर जिले में 20 माह की गर्भवती हथिनी की लिवर की बीमारी से मौत हो गई है। ऐसा सरकार की रिपोर्ट कहती है। जबकि डाॅक्टरों का कहना है कि तालाब का प्रदूषित पानी पीने की वजह से हथिनी के लिवर में इंफेक्शन हो गया था। तालाब वन विभाग ने बनवाया था। चैकाने वाली बात है कि हाथियों पर निगरानी रखने वाले भारतीय वन्य जीव संस्थान के वैज्ञानिक और अफसर कितने लापरवाह हैं कि हथिनी बीमार है, इसका पता नहीं लगा सके। जबकि सरकार सालाना 2 करोड़ रूपये हाथियों की देख रेख के लिए खर्च करती है।
सूरजपुर जिले में प्रतापपुर वनपरिक्षेत्र के गणेशपुर के जंगल में 8 जून को हाथियों की दहाड़ ग्रामीणों ने सुनी। सुबह हथिनी की लाश पड़ी थी। इसकी जानकारी वन अधिकारियों को दी गई। डॉ महेंद्र कुमार पांडेय ने पोस्टमार्टम किया। हथिनी के पेट में 20 माह का मादा बच्चा था। जिसकी गर्भ में ही मौत हो गई थी। हथिनी के लिवर में इंफेक्शन की वजह से पानी भर गया था। लीवर इंफेक्शन की वजह से उसकी मौत हो गई थी। हथिनी के लिवर में 150 सिस्ट थे। जो कि इतनी संख्या में उन्होंने किसी जानवर में नहीं देखे। पोस्टमार्टम में उसके पेट में ज्यादा चारा भी नहीं मिला। अब ऐसे में वन विभाग के उस दावे पर सवाल उठ रहे हैं, जो मॉनिटरिंग करने का दावा करता है। कायदे से सरकार और वन विभाग को तालाबों की सफाई के साथ ट्रीटमेंट कराना चाहिए ताकि, हाथियों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम न हो।
हाथी मरें सरकार का क्या
यह अकेली घटना नहंी थी। दस जून को वहां से कुछ दूरी पर ही तालाब के पास दूसरी हथिनी का शव मिला। पास ही एक बोरी कीटनाशक पड़ा हुआ था। इसके बाद 11 जून को बलरामपुर में तीसरी हथिनी का सड़ा, गला शव मिला। बताया गया है कि इसकी मौत पांच दिन पहले ही हो चुकी थी। यानी तीन दिन मे तीन और एक सप्ताह में सात हाथियों की मौत हुई। सूरजपुर में सड़क से महज 200 मीटर दूर गणेशपुर जंगल में शव पड़ा था। बदबू आने पर ग्रामीणों ने वन विभाग को इसकी सूचना दी। सूरजपुर जिले में पिछले छह माह में सात हाथियों की मौत हो चुकी है। इसमें सरगुजा संभाग के सूरजपुर जिले में 4, बलरामपुर में 2 और जशपुर में एक की मौत हुई है। ये मौत 6 माह के भीतर हुई है। वहीं पिछले 5 साल में अकेले सूरजपुर जिले में 22 हाथियों की जान जा चुकी है।
मौत की वजह अलग
तीनों हथिनियों की मौत की रिपोर्ट अलग अलग है। एक की मौत हृदयाघात, दूसरे की टाॅक्सीसिटी और तीसरे की इन्फेक्शन से हुई है। भारत सरकार के वाइल्ड लाइफ से जुड़े अधिकारियों को वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए यह रिपार्ट बता दी गई। सरकार ने मनमाफिक रिपोर्ट बना के जवाब दे दिया, लेकिन घटना स्थल पर एक बोरी कीटनाशाक क्यों पड़ा था,इसका जवाब नहंीं दिया। गौरतलब है कि कीटनाशक के पैकेट के पास हाथियों का दल खड़ा रहा। हाथियों ने कीटनाशक पैकेट और हथिनी का शव उठाने नहीं दिया। पशु चिकित्सक का आशंका है कि जहर दिया गया है। क्यों कि सूखे नाले में हथिनी के शव के सूंड से झाग निकल रहा था। वनकर्मियों के अनुसार जिस दल की दो हथिनी की मौत हुई है, यह प्यारे हाथी का दल है। बलरामपुर जिले के राजपुर रेंज के अतौरी जंगल में 6 जून को प्यारे हाथी का दल आया था। यहां से होते हुए गणेशपुर की ओर चला गया। आशंका है कि उसी दौरान हथिनी अस्वस्थ होने की कारण चलने में पिछड़ गई होगी और बाद में उसकी मौत हो गई।
करेंट से हाथी की मौत
रायगढ़ जिले के धरमजयगढ़ वन मंडल के गेरसा गांव में किसान भादो राम राठिया और बलसिंह अवैध बिजली के कनेक्शन से खेत की सिंचाई कर रहे थे। खुले तार की चपेट में आने से 16 जून को एक हाथी की मौत हो गई। दोनों किसानों को जेल भेज दिया गया है। इस क्षेत्र में कुछ दिनों से 27 हाथियों का दल पहाड़ के इलाके से कटहल खाने आते हैं। हाथी कटहल खाने आया था, करंट लगने से उसकी मौत हो गई। इसके अलावा 18 जून को एक दंतैल हाथी छाल रेंज के बेहरामार गांव में मृत मिला। देर रात भोजन की तलाश में आने की संभावना है। धरमजयगढ़ क्षेत्र में तीन दिन में यह दूसरे हाथी की मौत हुई। करेंट लगने से उसकी मौत हो गई।
कीचड़ में नन्हें हाथी की मौत
दलदल में 38 घंटे तक नन्हा हाथी फंसा था लेकिन, उसे वन विभाग नहीं निकाल सका और 12 जून को उसकी मौत हो गई। यह घटना कोरबा के कटघोरा वन परिक्षेत्र के कुल्हरिया की है। हाथी के शव का पशु चिकित्सा अधिकारी डॉ अजय तोमर, डॉ ए.के. कोसरिया व डॉ एन.के दुबे ने पोस्टमार्टम के दौरान पाया कि हाथी के एक पैर में 15 सेंटीमीटर सूजन था। जिस स्थान पर हाथी बैठा था, वह खेत है। बांगो डूबान क्षेत्र का हिस्सा होने से हमेशा यहां दलदल रहता है। घुटना मुड़ गया था, इसके बाद वह उठ ही नहीं पाया। वन विभाग के उप सचिव गणवीर ने कहा, दलदली क्षेत्र के कीचड़ में फंसी मादा हाथी को बचाने के लिए प्रभारी डी.एफ.ओ. संत ने कोई प्रयास नहीं किया। इससे शासन की छवि धूमिल हुई है। कटघोरा के प्रभारी डीएफओ डीडी संत को निलंबत कर दिया गया है। प्रधान मुख्य वन संरक्षक अतुल कुमार शुक्ला और बिलासपुर मुख्य वन संरक्षक वन्यप्राणी पी.के. केशर को कारण बताओं नोटिस जारी किया गया है।
कीचड़ में हाथी की मौत
गरियाबंद मैनपुर क्षेत्र से 21 हाथियों का दल धमतरी ब्लॉक के मोंगरी गांव से होकर गुजर रहा था। 15 जून की रात यहां हाथी का बच्चा फंस गया। ग्रामीणों की मदद से उसे निकालने की कोशिश की गई लेकिन नहीं निकाल सके। 16 जून की सुबह उसकी मौत हो गई। ग्रामीण सगनु राम नेताम ने बताया कि 7 जून से हाथी इसी इलाके में थे। सोशल मीडिया पर लोग सवाल उठा रहे हैं कि, इतने कीचड़ में तो हाथी खेलते हैं।
हाथी बेहोश हो गया
कोरबा जिले के ग्राम पंचायत गुरमा के आश्रित ग्राम कटरा डेरा के एक किसान के घर 14 जून को एक हाथी घुस आया। बेहोश होकर गिर गया। वाइल्ड लाइफ एक्सपर्ट डॉक्टर की मौजूदगी में वन विभाग के अमले और ग्रामीणों की मदद से हाथी को करवट लिटाया गया। जिससे सांस लेने में हाथी को राहत मिली। हाथी की ऊंचाई 1.9 मीटर है। अस्वस्थ हाथी का इलाज जारी है। उत्तर सिंगापुर वन क्षेत्र मगरलोड में 17 हाथियों का दल ग्राम मोहेरा, जलकुंभी, हतबंद, अमलीडीह, परसाबुड़ा, रैगाडीह, राजाडेरा के आस पास देखा गया है। गरियाबंद क्षेत्र में इन हाथियों ने उत्पात मचाकर अब मगरलोड क्षेत्र में प्रवेश कर चुके हंै। हाथियों के एक दल ने ग्राम गंजईपुर में एक आदमी को कुचलकर मार चुके है।
समिति एक माह में देगी रिपोर्ट
सरगुजा संभाग में हाथियों की मौत के मामले की जांच के लिए रिटायर्ड मुख्य वन संरक्षक के.सी बेवर्ता की अध्यक्षता में एक कमेटी र्गिठत की गई है, जो एक माह में रिपोर्ट देगी। कमेटी में वन्य प्राणी विशेषज्ञ डॉ आरपी मिश्रा, वरिष्ठ पशु चिकित्सक, वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ देवा देवांगन इस बात की जांच करेंगे कि क्या हाथियों की ऐसी मौत रोकी जा सकती थी या नहीं। वहीं पूर्व वन मंत्री महेश गागड़ा कहते हैं, तीन हाथियों की मौत पर हत्या का मामला दर्ज किया जाना चाहिए। अब तक गठित समितियां और एसआईटी ने एक भी मामले की रिपोर्ट नहीं दी। सवाल यह है कि क्या छत्तीसगढ़ हाथियों की कब्रगाह बन रहा है?
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