Wednesday, September 9, 2020
जल,जमीन,जंगल की लड़ाई
छत्तीसगढ़ में दो दशक से आदिवासी और नक्सली सरकार से जल,जंगल और जमीन की लड़ाई लड़ रहे हैं। पेशा कानून का क्रिन्यावन नहीं होने से आदिवासी अपनी जमीन के लिए राजस्व संहिता की धाराओं में ही उलझा हुआ है। वहीं प्रदेश में कांग्रेस के 31 आदिवासी विधायक हैं, फिर भी आदिवासी समाज फटा पोस्टर ही है।
0 रमेश कुमार ‘‘रिपु’’
आजादी के सात दशक के बाद भी छत्तीसगढ़,मध्यप्रदेश,ओड़िसा और झारखंड का आदिवासी जल,जंगल और जमीन की लड़ाई लड़ रहा है। छत्तीसगढ़ में दो दशक से नक्सली सरकार के खिलाफ लड़ रहा है। जाहिर सी बात है कि नक्सली बना आदिवासी सरकार की नीतियों से संतुष्ट नहीं है। हैरानी वाली बात है कि छत्तीसगढ़ में प्रदेश की 90 विधान सभा सीटों में 10 अनुसूचित जाति और 29 अनुसूचित जन जाति और सामान्य सीटें 51 है। कांग्रेस के पास सभी 29 सीटें अनुसूचित जन जाति की है। इसके अलावा उसके दो और आदिवासी विधायक हैं,जो सामान्य सीट से जीतकर आए हैं। यानी कांग्रेस में 31 विधायक आदिवासी हंै। जबकि बीजेपी में प्रदेश अध्यक्ष विष्णुदेव साय आदिवासी हैं। रामविचार नेताम अनुसूचित जन जाति के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। पूर्व सांसद विक्रम उसेंडी कहते हैं, जल,जंगल और जमीन का मुद्दा आदिवासियों के लिए उनकी अस्मिता से जुड़ा मुद्दा है। जिसका भाजपा पूरा सम्मान करती है’’। सच्चाई ठीक इसके उलट है। पर्यावरण की हत्या का ठेका हर पार्टी उद्योगपतियों को देती आई है। जिसका विरोध आदिवासी समाज करता आया है। बैलाडीला की खदान और पच्चीस हजार पेड़ काटने का ठेका भी भूपेश सरकार ने गौतम अडानी को दिया था। जिसका सभी ने विरोध किया था। समस्या यथावत है।
सब जगह नाराजगी एक सा
आदिवासी क्षेत्रों में कुटीर और लघु उद्योगों को बढ़ावा देकर आदिवासियों को आत्म निर्भर बनाया जा सकता है। जबकि आदिवासी इलाकों में खनन को लेकर आदिवासियों और सरकार के बीच संघर्ष होता रहता है। छत्तीसगढ़ के बैलाडीला इलाके में लौह अयस्क की खुदाई या फिर ओडिशा के सुंदरगढ़ इलाके में आदिवासियों की नाराजगी एक जैसा ही है।
मजबूर करती है सरकार
सरकार किसी भी पार्टी की हो वो आदिवासियों को उजड़ने के लिए मजबूर करती आई है। आदिवासी विरोध करते है ंतो उनके खिलाफ झूठे प्रकरण भी कायम कर उन्हें डराया जाता है। मार्च 2011 में छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के ताड़मेटला, मोरपल्ली और तिम्मापुर में आदिवासियों के 252 घर जला दिए गए थे। सीबीआइ की जांच रिपोर्ट में इसका खुलासा भी हुआ। फर्जी मुठभेड़ों में आदिवासियों की हत्या कर नक्सली करार दिए जाने की घटनाएं आम हैं। पिछले करीब 20 वर्षों से आदिवासी समाज से कोई भी नेता सामने आकर सरकार की नीतियों का खुलकर विरोध नहीं किया। छत्तीसगढ़, झारखंड और ओडिशा जैसे राज्य नक्सल समस्या के कारण विकास से दूर हैं। आदिवासियों की संस्कृति और उनकी परंपराओं को सहेजते हुए विकास करना होगा। नक्सली घटनाओं के पीछे की सोच को बदलनी होगी। किसी एक घटना के लिए गांव के सभी आदिवासियों को नक्सल समर्थक मान लेना गलत है। रमन सरकार के समय तत्कालीन बस्तर आई जी एस.आर कल्लूरी ने ऐसा खूब किया। छत्तीसगढ़ में एनीमिया और कुपोषण के मामले 53 फीसदी से ज्यादा है। आदिवासी बहुल राज्यों में समस्याएं अनेक हैं। इनके समाधान के लिए जन चेतना के साथ राजनैतिक बदलाव और सत्ता में उनकी भागीदारी भी बढ़ानी होगी।
किसने क्या किया
छत्तीसगढ़ में पन्द्रह वर्षो तक बीजेपी की सरकार थी। डाॅ रमन सिंह कुल बजट का 35 फीसदी आदिवासी क्षेत्रों के विकास में खर्च किया। प्रदेश के सभी 27 जिलों में युवाओं के कौशल उन्नयन के लिए लाईवलीहुड कॉलेजों की स्थापना की। इनमें से अधिकांश कॉलेज आदिवासी जिलों में संचालित है। बस्तर एजेकुशन हब बना। आदिवासियों को चावल,नमक और चना देने के साथ चरणपादुका भी दी। वहीं भूपेश सरकार ने चुनाव से पहले लोहंडीगुड़ा के आदिवासियों से वायदा किया था कि उनकी सरकार बनी तो उनकी जमीन उन्हें लौटा देंगे। 2008 में इस क्षेत्र में टाटा का स्टील प्लांट लगना था। सरकार ने 1707 वनवासियों से करीब 4200 एकड़ जमीन अधिग्रहित की। ज्यादातर वनवासियों को उनकी जमीन का मुआवजा भी दे दिया गया,लेकिन विरोध के चलते प्लांट नहीं लगा। कांग्रेस सरकार ने जमीन का मुआवजा भी वनवासियों के पास ही छोड़ दिया गया है। बघेल सरकार ने लॉकडाउन में वनवासियों से महुआ की खरीदी 17 की बजाए 30 रुपए में करने का फैसला लिया है। इस फैसले से 40 लाख आदिवासियों को फायदा पहुँचने की उम्मीद है। तेन्दूपत्ता के बोनस की राशि 2500 रूपये से 4000 रूपये की। प्रदेश के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों विशेषकर बस्तर अंचल के अनुसूचित जनजाति वर्ग के रहवासियों के खिलाफ दर्ज प्रकरणों की समीक्षा कर सरकार ने 215 प्रकरण वापस लिए।
आदिवासियों की प्रमुख मांगें
अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायत विस्तार अधिनियम 1996 बनाया गया है। जिसे पेसा कानून कहा जाता है। पेसा कानून का क्रियान्वयन तत्काल किया जाये। इसलिए कि, आदिवासी अपनी खोई हुई जमीन का केस भू.राजस्व संहिता की धारा 170 क के तहत जीत जाता है लेकिन, राजनीतिक दबाव की वजह से उसे कब्जा नहीं मिलता। प्रकरण को राजस्व मंडल एवं कोर्ट में उलझा दिया जाता है। राज्य सरकार इन प्रकरणों में आदिवासी वर्ग का प्रतिरक्षण नहीं करती। बोधघाट परियोजना पर रोक लगाई जाए। सलवा जुडूम से विस्थापित आदिवासियों को एक कमेटी बनाकर तत्काल सीमांत प्रदेशों से वापस लाकर बसाया जाए। अंगार मोती देवी स्थल, गंगरेल का स्थायी पट्टा गोंड़ समाज के नाम पर जारी किया जाये। अनुसूचित क्षेत्रों कोयला,लोहा,बॉक्साइट, चूना पत्थर इत्यादि कच्चा माल खदानों से निकाला जा रहा है और इन मिनरलो का 25ः रॉयल्टी प्रभावित आदिवासी परिवारों को दिया जाये।
सरकार श्वेत पत्र जारी करे
भाजपा विधायक एवं पूर्व मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने कहा यदि आदिवासियों के बीमा, बोनस, लाभांश छात्रवृत्ति के मामले में सरकार सही है, तो मीडिया व जनता के सामने श्वेतपत्र जारी कर दस्तावेज प्रस्तुत करे। सरकार बीमा का नवीनीकरण,तेंदूपत्ता संग्राहक आदिवासी परिवार को दो सीजन का बोनस 597 करोड़ रूपये,आदिवासियों की सहकारी समितियों को लाभांश का 432 करोड़ वितरित क्यों नहीं किया गया। जाहिर सी बात है कि सरकार झूठ बोल रही है। सरकार उन जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई जिन्होंने आदिवासी परिवारों के साथ अन्याय किया है।
वाह वाही न लूटे भूपेश सरकार
छजका के प्रदेश अध्यक्ष अमित जोगी कहते है, भूपेश सरकार अपने आप को आदिवासियों का हितैषी कहती है तो बताए, बस्तर के आदिवासियों के आराध्य नंदराज पर्वत में हजारों पेड़ों को काटकर उसपर विराजमान पिट्टोर मेटा देवी के मंदिर को ध्वस्त करके, लोहे की खदान चालू करने के फैसले को अभी तक निरस्त क्यों नहीं किया। आदिवासियों की जमीन पर बने 10000 करोड़ की लागत के नगरनार इस्पात संयंत्र, जिसपर बस्तर के नौजवानों का प्रथम अधिकार है,की नीलामी करने के एकपक्षीय फैसलों का भूपेश सरकार ने विरोध नहंी किया है। जबकि पोलावरम और इचंपल्ली बाँधों के निर्माण से सुकमा और बीजापुर जिले के लाखों आदिवासी बेघर और बरबाद हो जाएंगे। आदिवासी बाहुल्य सरगुजा, रायगढ़ और कोरबा में पेसा कानून के अंतर्गत बिना ग्रामसभा की अनुमति प्राप्त किए,निजी कम्पनियों को भूपेश सरकार ने 24 कोयला और बॉक्साइट खदाने चालू करने की अनुमति दे दी। आदिवासियों के आर्थिक विकास की बात करने वाली भूपेश सरकार ने एक भी वृहद वनोपज आधारित उद्योग की योजना नहीं बनायी। आदिम जाति कल्याण विभाग को शिक्षा विभाग में विलय पूर्व सरकार ने किया था, जिसका कांग्रेस ने विपक्ष में रहते हुए पुरजोर विरोध किया था,भूपेश सरकार ने अभी तक उसे बदलने का आदेश नहीं दिया।
आदिवासी विकास विरोधी नहीं
सर्व आदिवासी समाज बैलाडीला क्षेत्रीय अध्यक्ष राजकुमार आयामी ने कहा, पूरा बस्तर संभाग पांचवी अनुसूचित क्षेत्र होने के बाद भी सरकार द्वारा संविधान में हमारे लिए दिए गए अधिकारों का उल्लंघन करते हुए फर्जी ग्राम सभाएं कर हमारे जल, जंगल, जमीन उद्योगपतियो को दे रही है। आदिवासी समाज विकास विरोधी नहीं है लेकिन, सरकारें विकास के नाम पर आदिवासियों की आजीविकाएं छीनती हैं। उद्योग या खनन के लिए सरकार जमीन के बदले एकमुश्त राशि ही क्यों देती है। दंतेवाड़ा जिला मुख्यालय से 65 किलोमीटर की दूरी पर धुर नक्सल प्रभावित ग्राम पंचायत गुमियापाल में विश्व आदिवासी दिवस पर संयुक्त पंचायत जनसंघर्ष समिति के अध्यक्ष नंदराम कुंजाम ने कहा नंदराज पहाड़ में अडानी कंपनी की लड़ाई हो या आलनार में, सरकार की कोशिश को कामयाब नहीं होने देंगे। चाहे हमें अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए जान देनी पड़ी’’।
बहरहाल कुछ योजनाओं का मोह दिखाकर सरकार आदिवासियों का शोषण करती आई है। यही वजह है कि आदिवासी समाज आज भी फटा पोस्टर है।
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