Sunday, April 18, 2021

वामपंथ और दक्षिणपंथ में भेद नहीं

                   
    
मध्यप्रदेश के विधान सभा अध्यक्ष गिरीश गौतम कहते हैं विंध्य प्रदेश बनाना या फिर मऊँगंज को जिला बनाना हमारा विषय नहीं है। यह सरकार का विषय है। यदि जनता चाहती है तो हम उसका विरोध भी नहीं करेंगे। मेरे डीएनए में कामरेड है। बावजूद इसके वाम से दक्षिणपंथ की ओर झुकाव से जन सेवा का धर्म नहीं बदल जाएगा। किसी के बनी रेखा को काटकर अपनी रेखा बनाने में विश्वास नहीं रखता और अपने आप को विंध्य का शेर की बजाय विंध्य का पुत्र कहलाना ज्यादा अच्छा मानता हँू। उनसे  बातचीत किये है  0 रमेश कुमार ’रिपु’





ने उसके प्रमुख अंश-
0 आपका कहना था कि, वाम से दक्षिण पंथी इसलिए हुआ कि श्रीनिवास तिवारी को हराना था। बड़ा मंच चाहिए था। क्या अब वाम आपके लिए कोई मायने रखता है?
00 वो बात पुरानी हो गई। राजनीतिक व्यक्ति को मंच अपने लिए नहीं चाहिए। जन कल्याण के काम के लिए स्वाभाविक तौर पर मंच की जरूरत होती है। मैं समझता हूँ बीजेपी से बेहतर मंच और कोई नहीं है। वाम मोर्चा का जहांँ तक सवाल है,कामरेड मेरे डीएनए में है। इसलिए उसे अलग करके नहीं देखना चाहिए।
0 वाम से दक्षिण में विचलन आश्चर्यजनक नहीं है?
00 वाम से दक्षिण में विचलन जरा भी आश्चर्यजनक नहीं है। कोई भी सिद्धांत होगा अंतोगत्वा समाज के लिए ही काम करेगा। वाम पंथ हो या फिर दक्षिण पंथ,दोनों कभी नहीं कहते कि टाटा बिरला के लिए काम करो। देश बहुत बड़ा है। मैं समझता हूँ कि वामपंथी सामाजिक परिदृश्य को नहंी समझ पाए। उन्हांेने धर्म को धर्म की तरह देखा, उसके मर्म को नहंी समझा। उदाहरण बतौर,कुंभ का आयोजन धर्म है लेकिन, बगैर आमंत्रण के लोगों का वहांँ पहुंचना यह धर्म का मर्म है। वामदल मजदूर और गरीबों की बात करता है। दीनदयाल अंत्योदय की बात करते हैं। ऐसी स्थिति में फर्क कहांँ है। अंत्योदय में भी अंंितम छोर पर खड़े व्यक्ति के उत्थान और प्रगति की बात करते हैं। सबका साथ,सबका विकास की धारणा को लेकर चलना चाहिए।
0 कामरेड स्पीकर और नवाचारी स्पीकर दो नाम से आप को लोग जानने लगे हैं। दोनों में कौन सा संबोधन आपके दिल को छूता है।
00 मेरे में कामरेड है। कामरेड को कोई ब्रांड नहीं है। यह अंग्रेजी का शब्द है। जिसका मतलब साथी होता है। सबका साथ,सबका विकास की धारणा को लेकर आगे चलेंगे। सदन अच्छे से चले। मार्शल का इस्तेमाल न करना पड़े।  सदन की गरिमा बनी रहे। इसलिए कुछ नये नियम बनाए हैं। प्रथम बार निर्वाचित विधायकों को सवाल करने का पहले मौका दिया जाएगा। वरीयता और प्रशिक्षण के साथ सदन की गरिमा बनी रहे इसलिए भाषा के संस्कार पर विशेष ध्यान देने को कहा है। अति उत्साह में असंसदीय भाषा का इस्तेमाल से बचें। राजनीति की गरिमा सदन में बनी रहेगी तो बाहर भी उसका मूल्य है। सदन के अंदर झूठा,फेकू,बंटाधार,मामू आदि असंसदीय भाषा सुनने को अब नहंी मिलेगी।
0 आम लोगों की धारणा है कि, अब विंध्य प्रदेश बन जाएगा। कुछ नही ंतो मऊगंज जिला बन ही जाएगा। आप किसे प्राथमिकता देंगे?
00 विंध्य प्रदेश बनाना और मऊगंज को जिला बनाना दोनों हमारा विषय नहीं है। यह सरकार का काम  है। जनता चाहेगी तो विंध्य प्रदेश बन जाएगा और मऊगंज जिला भी बन जाएगा। जनता जो चाहती है, हम उसके खिलाफ नहीं जायेंगे।
0 विंध्य के लोगों की आम धारणा है कि माननीय गिरीश जी कुछ अलग हटकर हैं। तो क्या यह मान लिया जाए कि, श्रीनिवास तिवारी की रेखा को काटकर वो अपनी बड़ी रेखा बनाएंगे?
00 मैं उस सिद्धांत को मानता हूँ, किसी की रेखा को काटकर अपनी रेखा को बड़ी नहीं करना है। न ही किसी दूसरे की रेखा का फालो करूंगा। अपनी रेखा अपने कर्मों से खुद बनाऊंगा। मुझे पद मिला है, तो अपने दायित्वों को पूरा करने के लिए मिला है। मैं अपने लिए अपने को चुनौती मानता हूँ। वक्त और जनता पर यह फैसला छोड़ता हूँॅॅू कि वह खुद मूल्यांकन कर, तय करे कि किसकी रेखा बड़ी है।
0 विंध्य में एक परंपरा है जो बडे पद पर पहुँच जाता है उसे विंध्य का शेर कहते हैं। विंध्य का सूरज आदि ऐसे संबोधन से लाद दिया जाता है। आप को ऐसे संबांेधन से अब तक नवाजा गया या नहीं?
00 मैं अपने आप को विंध्य की धरती का बेटा मानता हॅू। विंध्य का शेर जैसे विंध्या का सूरज आदि संबोधन मुझ पर सूट नहीं करता। मैं विंध्य का शेर होना भी नहीं चाहता।
0 श्री निवास तिवारी ने विंध्य की जनता को संजय गांधी अस्पताल दिये। आप विंध्य को क्या देना चाहंेगे?
00 विंध्य में यह देखने का मिला है कि, यहांँ कैंसर के मरीज बहुत हैं। तंबाखू के सेवन की वजह से कैंसर के मरीजों का पता तब चलता है जब,चैथे या फिर अंतिम स्टेज पर मरीज पहँुंच जाता है। हमने सभी माननीय विधायकों से आग्रह  किया है कि, वे सरकार पर दबाव बनाएं और यहाँं एक रिसर्च सेंटर खोला जाए। ताकि यहां के लोगों को अपने इलाज के लिए बाहर न जाना पड़े।
0 देवतलाब विधान सभा क्षेत्र को क्या देना चाहेंगे?
00 हमारी इच्छा है कि पर्यटन के क्षेत्र में देवतलाब का नाम हो। साथ ही यह प्रयास रहेगा कि, देवतलाब नगर पंचायत के साथ तहसील बन जाए। ताकि जनता को इसका लाभ मिल सके।
0 श्रीनिवास तिवारी के समय सत्ता का एक ही केन्द्र था, जिसे अमहिया सरकार कहते थे। क्या यह मान लिया जाए कि, विंध्य के स्पीकर की परंपरा का निर्वाह होगा या फिर आप दूसरी पार्टी से हैं, तो कुछ और होगा?
00 मंै ऐसी परंपरा पर विश्वास नहीं करता। यदि सत्ता का केन्द्र एक जगह करना होता, तो सारे विधायकों को अपने पास बुलाता। किसी भी विधायक या फिर सांसद से मिलने उनके निवास नहीं जाता।
0 हर राजनीतिक व्यक्ति का एक मुकाम होता है। क्या आपको लगता है कि आप की सियासी यात्रा पूरी हो गई?
00 विधान सभा अध्यक्ष बन जाना ही मेरी राजनीति का मुकाम नहीं है। मंै इसे पड़ाव मानता हॅू। राजनीतिक व्यक्ति की यात्रा सतत चलती रहती है। तब तक, जब तक वो चल सकता है। मेरा मानना है कि हर राजनीतिक व्यक्ति को सदैव जिज्ञासु और विद्यार्थी की भूमिका में रहना चाहिए। ताकि उसे सीखने का मौका मिलता रहे। अपनी राजनीतक यात्रा में भटक न सके।

 

छत्तीसगढ़ में हुए बड़े नरसंहार




छत्तीसगढ़ में कई नरसंहार अब तक हो चुके हैं। पहला नरसंहार 8 अक्टूबर 1998 को हुआ था। माओवादियों ने तर्रेम इलाके से गुजर रही पुलिस जवानों से भरी लॉरी और ठीक पीछे चल रही जीप को लैंड माइंस से उड़ा दिया था। इस हादसे में अठारह जवान शहीद हुए थे।  
23 मार्च नरायणपुर
बस्तर के नारायणपुर में 23 मार्च को नक्सलियों के विस्फोट से, एक बस में बैठकर अपने कैंप की ओर से लौट रहे 25 जवानों में से 5 जवान शहीद हो गये। सुकमा. 21 मार्च 2020
सुकमा जिले के चिंतागुफा इलाके में डीआरजी और एसटीएफ जवान सर्चिंग पर थे। एलमागुंडा के आसपास नक्सलियों के मौजूद होने की सूचना मिली थी। कोरजागुड़ा पहाड़ी के पास छिपे नक्सलियों ने चारों ओर से जवानों पर गोलियों की बौछार कर दी। जिससे 17 जवान शहीद हो गए थे।  
श्यामगिरी. 9 अप्रैल 2019
दंतेवाड़ा में 2019 के लोकसभा चुनाव में मतदान से ठीक पहले नक्सलियों ने चुनाव प्रचार के लिए जा रहे भाजपा विधायक भीमा मंडावी की कार पर हमला किया था। इस हमले में बीजेपी विधायक भीमा मंडावी के अलावा उनके चार सुरक्षा कर्मी भी मारे गए थे।
दुर्गपाल. 24 अप्रैल 2017
सुकमा जिले के दुर्रपाल के पास नक्सलियों द्वारा घात लगाकर किए गए हमले में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के 25 जवान उस समय मारे गए थे। जब वे सड़क निर्माण में सुरक्षा के बीच खाना खा रहे थे।
दरभा. 25 मई 2013
बस्तर के दरभा घाटी में हुए माओवादी हमले में आदिवासी नेता महेंद्र कर्मा कांग्रेस पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष नंद कुमार पटेलए पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल समेत 30 लोग मारे गए थे।
धोड़ाई. 29 जून 2010
नारायणपुर जिले के धोड़ाई में सीआरपीएफ के जवानों पर माओवादियों के हमले में पुलिस के 27 जवान मारे गए।
दंतेवाड़ा. 17 मई 2010
एक यात्री बस में सवार हो कर दंतेवाड़ा से सुकमा जा रहे सुरक्षाबल के जवानों पर माओवादियों ने बारूदी सुरंग लगा कर हमला किया था। जिसमें 12 विशेष पुलिस अधिकारी समेत 36 लोग मारे गए थे।
ताड़मेटला. 6 अप्रैल 2010
बस्तर के ताड़मेटला में सीआरपीएफ के जवान सर्चिंग से लौट कर आराम कर रहे थे। जहां   माओवादियों के बारुदी सुरंग में 76 जवान एक साथ शहीद हुए थे।
मदनवाड़ा. 12 जुलाई 2009
राजनांदगांव के मानपुर इलाके में माओवादियों के हमले की सूचना पा कर पहुंचे पुलिस अधीक्षक विनोद कुमार चैबे समेत 29 पुलिसकर्मियों पर माओवादियों ने हमला बोला और उनकी हत्या कर दी थी।
उरपलमेटा. 9 जुलाई 2007
एर्राबोर के उरपलमेटा में सीआरपीएफ और जिला पुलिस का बल माओवादियों की तलाश कर के वापस बेस कैंप लौट रहा था। इस दल पर माओवादियों ने हमला कर दिया था। जिसमें 23 पुलिसकर्मी मारे गए।
रानीबोदली. 15 मार्च 2007
बीजापुर के रानीबोदली में पुलिस के एक कैंप पर आधी रात को नक्सलियों ने हमला किया था। भारी गोलीबारी की। कैंप को बाहर से आग लगा दिया। इस हमले में पुलिस के 55 जवान मारे गए थे।
 

लड़नी अब होगी लड़ाई

            
                   

दस दिनों में 27 जवानों के नरसंहार ने साबित कर दिया कि नरम उपाय नाकाम हो गए हैं। नक्सलियों के खिलाफ लड़ाई लड़नी ही होगी। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल असम में वोट की राजनीति करते रहे और राज्य में नक्सली मौत का तांडव। सवाल यह है कि नक्सलियों से बातचीत का रास्ता खोलना चाहिए या फिर नक्सलवाद खात्मे के लिए हंट नहीं,हंटर चाहिए।  


0 रमेश कुमार ’रिपु’
            मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ढाई साल से दावा कर रहे हैं कि, माओवाद कमजोर हो गया हैं। नक्सली अपनी अंतिम लड़ाई लड़ रहे हैं। जबकि मार्च 2020 में नक्सलियों के जाल में फंसकर 17 जवान शहीद हुए थे। 2021 में 23 मार्च को नरायणपुर में पांच जवान शहीद होने पर कहा था कि,जवानों की शहादत बेकार नहीं जायेगी। 3 अप्रैल 2021 को माओवादियों ने बीजापुर जिले के तर्रेम, सिलगेर के टेकलगुड़म और जोनागुड़ा में एंबुश लगाकर 23 जवानों की जानें ले ली। झीरम कांड की तरह नक्सलियों ने बर्बरता का परिचय दिया। जोनागुड़ा में शहीद सुरक्षा कर्मी की नक्सलियों ने हाथ काट कर ले गए। बीजापुर का यह नरसंहार अपने पीछे कई सवाल छोड़ गया है। अब तक छत्तीसगढ़ में 1301 जवान शहीद हो चुके हैं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि, क्या नक्सलियों से बातचीत का रास्ता खोला जाना चाहिए या फिर ग्रीन हंट नहीं, हंटर चाहिए। अथवा सेना का उपयोग करना चाहिए। नक्सलवाद के खत्मे के लिए केन्द्र सरकार ने अतिरिक्त पांच बटालियन दी। तो क्या यह मान लिया जाए कि, आॅपरेशन में कोताही बरती जा रही है? नक्सलियों के इस नरसंहार से सवाल यह उठता है कि कांग्रेस नेता राजबब्बर राजीव गांधी कांग्रेस भवन में 2018 में कहा था कि, नक्सली क्रांतिकारी हैं। वे क्रांति करने निकले हैं। कोई उन्हें रोके नहीं।’ तो क्या मान लिया जाये कि, भूपेश सरकार ने नक्सलियों पर नकेल न लगे, इसलिए अपने घोषणा पत्र को दरकिनार कर अब तक नक्सली नीति नहीं बनाई?
माओ की संवेदनात्मक चाल
गृहमंत्री अमित शाह ने कहा कि, जवानों की शहादत का बदला लिया जाएगा। इस पर नक्सलियों की केंद्रीय कमेटी के प्रवक्ता अभय ने कहा कि जवानों की मौत के लिए केंद्र, राज्य सरकार और नार्थ ब्लॉक जिम्मेदार है। गृहमंत्री बताएं किस किस से बदला लेंगे। विभिन्न मुठभेड़ों में शहीद जवानों के परिजनों के प्रति संवेदना जताते हुए कहा, संगठन की लड़ाई जवानों से नहीं है। सरकार की ओर से हथियार उठाने की वजह से संगठन को उनसे लड़ना पड़ता है। जाहिर है कि, नक्सली लीडर अब संवेदनात्मक बातें करके सारा दोष सरकार पर मड़ना चाहते हैं। वहीं जम्मू-कश्मीर निवासी कोबरा बटालियन के जवान राकेश्वर सिंह मनहास को नक्सली लीडर हिड़मा अपने साथ ले गया है। ऐसा समझा जा रहा है कि, हिड़मा इस जवान को छोड़ने के लिए सरकार के सामने अपनी कोई मांग रख सकता है।  
कई सवाल उठ रहे हैं
गृहमंत्री अमित शाह ने इस हादसे की जांच के आदेश दिये हैं। बात साफ है कि सुरक्षा बल से इस बार भी चूक हुई है। फोर्स के बड़े अफसरों की प्लानिंग एग्जीक्यूशन ग्रांउड रिपोर्ट और इंटेलिजेंस की लापरवाही से यह नरसंहार हुआ है। जोनागुड़ा का क्षेत्र गुरिल्ला युद्ध के लिए जाना जाता है। कोबरा बटालियन इसमें माहिर है। ऐसे में यह हादिसा कैसे हो गया? हिड़मा की बटालियन नंम्बर एक आधुनिक हाथियारों से लैंस रहती है,जानकर भी हमले से पहले उसके व्यूह से कैसे बचना है,इसकी प्लानिंग क्यों नहीं की गई? झीरम कांड का मास्टर माइंड हिड़मा ने अपने होने की सूचना पुलिस तक फैलाई। पुलिस न अपने मुखबिरों से पता करने की कोशिश क्यों नहीं की? क्या हिड़मा के खिलाफ आॅपरेशन की जानकारी मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को थी? फौज के अफसर और पुलिस तक किसने खबर पहुंचाई कि नक्सली कमांडर हिड़मा भारी संख्या में नक्सली टेकलगुड़म और जोनागुड़ा में हैं? हैरानी वाली बात है कि सीआरपीएफ,कोबरा बाटालियन,पुलिस का खुफिया तंत्र और इंटेलिजेंस आदि को पता क्यों नहीं चला कि, करीब 700 नक्सली किसी बड़े हादसे की तैयारी कर रहे हैं?
हिड़मा पर 25 लाख का इनाम
इस नरसंहार का मास्टर माइंड मंडावी हिड़मा उर्फ इदमुल पोडियाम भीमा पर 25 लाख रूपये का इनाम है। हिड़मा सुकमा जिलेे के जगरगुडा इलाके के पुडअती गांव का निवासी है। इसकी दो शादी हुई है। इसकी दोनों पत्नियां नक्सली हैं। तीन भाई हैं। मांडवी देवा और मांडवी टुल्ला गांव में खेती करती हैं। तीसरा भाई मांडवी नंदा गांव में नक्सलियों का पढ़ाता है। बहन हिड़मा दोरनपाल में रहती है।
आॅपरेशन की कमांड नलिनी क्यों
इस नरसंहार के लिए पूरी तरह भूपेश सरकार और नक्सल आॅपरेशन के आई.जी नलिनी प्रभात अपनी जवाबदेही से मुक्त नहीं हो सकते। गृह मंत्रालय की राममोहन कमेटी ने ताड़मेटला कांड के लिए  नक्सल आॅपरेशन के आई.जी. नलिनी प्रभात, तत्कालीन सीआरपीएफ के आई जी रमेश चन्द्र,62 बटालियन के कमांडर ए. के. बिष्ट और इंस्पेक्टर संजीव बागड़े दोषी ठहराया था। बावजूद इसके नक्सल आॅपरेशन का दायित्व नलिनी प्रभात का सौंपा जाना अश्चर्य जनक है। ताड़मेटला कांड की जांच कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार नक्सलियों के पास सीआरपीएफ का वायरलेस सेट था। इससे उन्हें फोर्स के मूवमेंट की पूरी जानकारी मिल रही थी। इसी के जरिए उन्हें फोर्स के चिंतलनार कैंप वापस लौटने की तारीख रास्ता और समय पता चल गया था। ऐसे ही 3 अप्रैल 2021 को बीजापुर के जोनागुड़ा में नक्सलियों ने सुनियोजित जानकारी देकर फोर्स को फंसाया। नक्सलियों ने अपनी लोकेशन खबरियों के हाथ अधिकारियों तक पहुंचाई। इसके बाद अधिकारियों ने जवानों को जोनागुड़ा पहुंचने के निर्देश दे दिए।
नक्सलियों ने दो चालें चली
नारायणपुर जिले में 23 मार्च 2021 को आईईडी ब्लास्ट कर पांच जवानों की जानें ली ली थी। पुलिस के पास खूफिया जानकारी थी कि, नक्सली 2021 में कोई बड़ा हमला करेंगे। इसलिए दो हजार जवान आॅपरेशन में भेजे गए थे। जबकि इसके पहले 17 मार्च को नक्सलियों ने विज्ञप्ति जारी कर कहा था कि, वे जनता की भलाई के लिए छत्तीसगढ़ सरकार से बातचीत के लिए तैयार हैं। उन्होंने बातचीत के लिए तीन शर्तें भी रखी थीं। इनमें सशस्त्र बलों को हटाने, माओवादी संगठनों पर लगे प्रतिबंध हटाने और जेल में बंद उनके नेताओं की बिना शर्त रिहाई शामिल थीं। सरकार ने अपनी ओर से निःशर्त समझौता वार्ता की बात कही। कांग्रेस नेता छविन्द्र कर्मा दो माह पहले से कह रहे थे कि, नक्सली जब खामोश रहते हैं, तो वो कोई योजना पर काम कर रहे होते हैं।’’   
एंबुश को तोड़ नहीं पाए
सीआरपीएफ के सेकंड इन कमांड आॅफिसर संदीप कहते हंै,‘‘नक्सली लीडर हिड़मा और सुजाता ने एक बड़े हादिसे की प्लानिंग किये थे। सभी जवान बहादुरी से लड़े। आॅपरेशन करके जवान लौट रहे थे तभी नक्सलियों ने हमला बोला। जवानों के हर मूवमेंट की जानकारी गांव के लोग और महिलाएं नक्सलियों को दे रहे थे।’’ हैरानी वाली बात है कि,नक्सली कमांडर हिड़मा आॅपरेशन के लिए बीजापुर के तर्रेम से 760, उसूर से 200 पामेड से 195 सुकमा 483 एवं नरसापुर से 420 का बल रवाना  हुआ था। सीआरपीएफ डीआरजी जिला पुलिस बल और कोबरा बटालियन के जवानों की ज्वाइन पार्टी सर्चिंग पर निकली थी। सुरक्षा बलों ने पहले पामेड़ इलाके में नक्सलियों के खिलाफ बड़ा ऑपरेशन प्लान किया था। लेकिन इसके बाद सुकमा,बीजापुर की सीमा पर जोनागुड़ा के पास बड़ी संख्या में नक्सलियों की मौजूदगी की जानकारी मिलने के बाद पामेड़ की जगह बीजापुर में ऑपरेशन लांच किया गया। 3 अप्रैल की दोपहर सील गिर के जंगल में घात लगाए 700 नक्सलियों ने पुलिस पार्टी को पहले भीतर तक आने दिया। तीनों से ओर उनके एंबुश में घेरने के बाद अचानक हमला कर दिया। पहला एंबुश पहाड़ी के पास लगाया गया। दूसरा जुन्ना गुड़ा गाँव में जबकि आगे करीब दो किलोमीटर पर तीसरा एंबुश लगाया था। कहां से और कैसे एंबुश तोड़ना है किसी को समझ में नहीं आया। वहीं बस्तर आई. जी. पी. सुदंरराज ने बताया कि अभी तक 9 नक्सलियों के मारे जाने की सूचना है। जबकि 15 से ज्यादा घायल हैं। राष्ट्रीय विशेष सुरक्षा सलाहकार विजय कुमार भी पिछले 10 दिनों से बस्तर में। उन्हें विशेष रूप से बस्तर में नक्सलवाद के खात्मे के लिए तैनात किया गया है। उनके रहते दो नक्सली वारदात हो गई।
झोपड़ियों से गोली बरसी
माओवदियों ने तीन तरफ से हमले का जाल बिछाया और जवान उसकी चलाकी को समझ नहीं पाए। जोनागुड़ा में नक्सलियों ने झोपड़ियों में घात लगाकर हमला किया। टेकलगुड़ा गांव में करीब 30 घर हैं,सभी को नक्सलियों ने खाली कराया और यहां से छिपकर हमला किये। दोनों जगह जवानों की लाशें बिछी रही। खून फैला हुआ था। पेड़ों पर गोलियों के निशान थे। तीन घंटे तक जवानों और नक्सलियों के बीच मुठभेड़ चली। घायल जवानों को पास से गोली मारी और बम से हमला किया।
बहरहाल कब तक बस्तर नक्सलियों के बारूद से दहलता रहेगा? कश्मीर की तरह छत्तीसगढ़ के नक्सलवाद को भी राष्ट्रीय मामला समझना जरूरी हो गया है। कैसे शांति स्थापित होगी छत्तीसगढ़ में इस दिशा में अब विचार करना जरूरी है।
 

 
 









गी ड़ाई
दस दिनों में 27 जवानों के नरसंहार ने साबित कर दिया कि नरम उपाय नाकाम हो गए हैं। नक्सलियों के खिलाफ लड़ाई लड़नी ही होगी। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल असम में वोट की राजनीति करते रहे और राज्य में नक्सली मौत का तांडव। सवाल यह है कि नक्सलियों से बातचीत का रास्ता खोलना चाहिए या फिर नक्सलवाद खात्मे के लिए हंट नहीं,हंटर चाहिए।  
0 रमेश कुमार ’रिपु’
            मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ढाई साल से दावा कर रहे हैं कि, माओवाद कमजोर हो गया हैं। नक्सली अपनी अंतिम लड़ाई लड़ रहे हैं। जबकि मार्च 2020 में नक्सलियों के जाल में फंसकर 17 जवान शहीद हुए थे। 2021 में 23 मार्च को नरायणपुर में पांच जवान शहीद होने पर कहा था कि,जवानों की शहादत बेकार नहीं जायेगी। 3 अप्रैल 2021 को माओवादियों ने बीजापुर जिले के तर्रेम, सिलगेर के टेकलगुड़म और जोनागुड़ा में एंबुश लगाकर 23 जवानों की जानें ले ली। झीरम कांड की तरह नक्सलियों ने बर्बरता का परिचय दिया। जोनागुड़ा में शहीद सुरक्षा कर्मी की नक्सलियों ने हाथ काट कर ले गए। बीजापुर का यह नरसंहार अपने पीछे कई सवाल छोड़ गया है। अब तक छत्तीसगढ़ में 1301 जवान शहीद हो चुके हैं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि, क्या नक्सलियों से बातचीत का रास्ता खोला जाना चाहिए या फिर ग्रीन हंट नहीं, हंटर चाहिए। अथवा सेना का उपयोग करना चाहिए। नक्सलवाद के खत्मे के लिए केन्द्र सरकार ने अतिरिक्त पांच बटालियन दी। तो क्या यह मान लिया जाए कि, आॅपरेशन में कोताही बरती जा रही है? नक्सलियों के इस नरसंहार से सवाल यह उठता है कि कांग्रेस नेता राजबब्बर राजीव गांधी कांग्रेस भवन में 2018 में कहा था कि, नक्सली क्रांतिकारी हैं। वे क्रांति करने निकले हैं। कोई उन्हें रोके नहीं।’ तो क्या मान लिया जाये कि, भूपेश सरकार ने नक्सलियों पर नकेल न लगे, इसलिए अपने घोषणा पत्र को दरकिनार कर अब तक नक्सली नीति नहीं बनाई?
माओ की संवेदनात्मक चाल
गृहमंत्री अमित शाह ने कहा कि, जवानों की शहादत का बदला लिया जाएगा। इस पर नक्सलियों की केंद्रीय कमेटी के प्रवक्ता अभय ने कहा कि जवानों की मौत के लिए केंद्र, राज्य सरकार और नार्थ ब्लॉक जिम्मेदार है। गृहमंत्री बताएं किस किस से बदला लेंगे। विभिन्न मुठभेड़ों में शहीद जवानों के परिजनों के प्रति संवेदना जताते हुए कहा, संगठन की लड़ाई जवानों से नहीं है। सरकार की ओर से हथियार उठाने की वजह से संगठन को उनसे लड़ना पड़ता है। जाहिर है कि, नक्सली लीडर अब संवेदनात्मक बातें करके सारा दोष सरकार पर मड़ना चाहते हैं। वहीं जम्मू-कश्मीर निवासी कोबरा बटालियन के जवान राकेश्वर सिंह मनहास को नक्सली लीडर हिड़मा अपने साथ ले गया है। ऐसा समझा जा रहा है कि, हिड़मा इस जवान को छोड़ने के लिए सरकार के सामने अपनी कोई मांग रख सकता है।  
कई सवाल उठ रहे हैं
गृहमंत्री अमित शाह ने इस हादसे की जांच के आदेश दिये हैं। बात साफ है कि सुरक्षा बल से इस बार भी चूक हुई है। फोर्स के बड़े अफसरों की प्लानिंग एग्जीक्यूशन ग्रांउड रिपोर्ट और इंटेलिजेंस की लापरवाही से यह नरसंहार हुआ है। जोनागुड़ा का क्षेत्र गुरिल्ला युद्ध के लिए जाना जाता है। कोबरा बटालियन इसमें माहिर है। ऐसे में यह हादिसा कैसे हो गया? हिड़मा की बटालियन नंम्बर एक आधुनिक हाथियारों से लैंस रहती है,जानकर भी हमले से पहले उसके व्यूह से कैसे बचना है,इसकी प्लानिंग क्यों नहीं की गई? झीरम कांड का मास्टर माइंड हिड़मा ने अपने होने की सूचना पुलिस तक फैलाई। पुलिस न अपने मुखबिरों से पता करने की कोशिश क्यों नहीं की? क्या हिड़मा के खिलाफ आॅपरेशन की जानकारी मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को थी? फौज के अफसर और पुलिस तक किसने खबर पहुंचाई कि नक्सली कमांडर हिड़मा भारी संख्या में नक्सली टेकलगुड़म और जोनागुड़ा में हैं? हैरानी वाली बात है कि सीआरपीएफ,कोबरा बाटालियन,पुलिस का खुफिया तंत्र और इंटेलिजेंस आदि को पता क्यों नहीं चला कि, करीब 700 नक्सली किसी बड़े हादसे की तैयारी कर रहे हैं?
हिड़मा पर 25 लाख का इनाम
इस नरसंहार का मास्टर माइंड मंडावी हिड़मा उर्फ इदमुल पोडियाम भीमा पर 25 लाख रूपये का इनाम है। हिड़मा सुकमा जिलेे के जगरगुडा इलाके के पुडअती गांव का निवासी है। इसकी दो शादी हुई है। इसकी दोनों पत्नियां नक्सली हैं। तीन भाई हैं। मांडवी देवा और मांडवी टुल्ला गांव में खेती करती हैं। तीसरा भाई मांडवी नंदा गांव में नक्सलियों का पढ़ाता है। बहन हिड़मा दोरनपाल में रहती है।
आॅपरेशन की कमांड नलिनी क्यों
इस नरसंहार के लिए पूरी तरह भूपेश सरकार और नक्सल आॅपरेशन के आई.जी नलिनी प्रभात अपनी जवाबदेही से मुक्त नहीं हो सकते। गृह मंत्रालय की राममोहन कमेटी ने ताड़मेटला कांड के लिए  नक्सल आॅपरेशन के आई.जी. नलिनी प्रभात, तत्कालीन सीआरपीएफ के आई जी रमेश चन्द्र,62 बटालियन के कमांडर ए. के. बिष्ट और इंस्पेक्टर संजीव बागड़े दोषी ठहराया था। बावजूद इसके नक्सल आॅपरेशन का दायित्व नलिनी प्रभात का सौंपा जाना अश्चर्य जनक है। ताड़मेटला कांड की जांच कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार नक्सलियों के पास सीआरपीएफ का वायरलेस सेट था। इससे उन्हें फोर्स के मूवमेंट की पूरी जानकारी मिल रही थी। इसी के जरिए उन्हें फोर्स के चिंतलनार कैंप वापस लौटने की तारीख रास्ता और समय पता चल गया था। ऐसे ही 3 अप्रैल 2021 को बीजापुर के जोनागुड़ा में नक्सलियों ने सुनियोजित जानकारी देकर फोर्स को फंसाया। नक्सलियों ने अपनी लोकेशन खबरियों के हाथ अधिकारियों तक पहुंचाई। इसके बाद अधिकारियों ने जवानों को जोनागुड़ा पहुंचने के निर्देश दे दिए।
नक्सलियों ने दो चालें चली
नारायणपुर जिले में 23 मार्च 2021 को आईईडी ब्लास्ट कर पांच जवानों की जानें ली ली थी। पुलिस के पास खूफिया जानकारी थी कि, नक्सली 2021 में कोई बड़ा हमला करेंगे। इसलिए दो हजार जवान आॅपरेशन में भेजे गए थे। जबकि इसके पहले 17 मार्च को नक्सलियों ने विज्ञप्ति जारी कर कहा था कि, वे जनता की भलाई के लिए छत्तीसगढ़ सरकार से बातचीत के लिए तैयार हैं। उन्होंने बातचीत के लिए तीन शर्तें भी रखी थीं। इनमें सशस्त्र बलों को हटाने, माओवादी संगठनों पर लगे प्रतिबंध हटाने और जेल में बंद उनके नेताओं की बिना शर्त रिहाई शामिल थीं। सरकार ने अपनी ओर से निःशर्त समझौता वार्ता की बात कही। कांग्रेस नेता छविन्द्र कर्मा दो माह पहले से कह रहे थे कि, नक्सली जब खामोश रहते हैं, तो वो कोई योजना पर काम कर रहे होते हैं।’’   
एंबुश को तोड़ नहीं पाए
सीआरपीएफ के सेकंड इन कमांड आॅफिसर संदीप कहते हंै,‘‘नक्सली लीडर हिड़मा और सुजाता ने एक बड़े हादिसे की प्लानिंग किये थे। सभी जवान बहादुरी से लड़े। आॅपरेशन करके जवान लौट रहे थे तभी नक्सलियों ने हमला बोला। जवानों के हर मूवमेंट की जानकारी गांव के लोग और महिलाएं नक्सलियों को दे रहे थे।’’ हैरानी वाली बात है कि,नक्सली कमांडर हिड़मा आॅपरेशन के लिए बीजापुर के तर्रेम से 760, उसूर से 200 पामेड से 195 सुकमा 483 एवं नरसापुर से 420 का बल रवाना  हुआ था। सीआरपीएफ डीआरजी जिला पुलिस बल और कोबरा बटालियन के जवानों की ज्वाइन पार्टी सर्चिंग पर निकली थी। सुरक्षा बलों ने पहले पामेड़ इलाके में नक्सलियों के खिलाफ बड़ा ऑपरेशन प्लान किया था। लेकिन इसके बाद सुकमा,बीजापुर की सीमा पर जोनागुड़ा के पास बड़ी संख्या में नक्सलियों की मौजूदगी की जानकारी मिलने के बाद पामेड़ की जगह बीजापुर में ऑपरेशन लांच किया गया। 3 अप्रैल की दोपहर सील गिर के जंगल में घात लगाए 700 नक्सलियों ने पुलिस पार्टी को पहले भीतर तक आने दिया। तीनों से ओर उनके एंबुश में घेरने के बाद अचानक हमला कर दिया। पहला एंबुश पहाड़ी के पास लगाया गया। दूसरा जुन्ना गुड़ा गाँव में जबकि आगे करीब दो किलोमीटर पर तीसरा एंबुश लगाया था। कहां से और कैसे एंबुश तोड़ना है किसी को समझ में नहीं आया। वहीं बस्तर आई. जी. पी. सुदंरराज ने बताया कि अभी तक 9 नक्सलियों के मारे जाने की सूचना है। जबकि 15 से ज्यादा घायल हैं। राष्ट्रीय विशेष सुरक्षा सलाहकार विजय कुमार भी पिछले 10 दिनों से बस्तर में। उन्हें विशेष रूप से बस्तर में नक्सलवाद के खात्मे के लिए तैनात किया गया है। उनके रहते दो नक्सली वारदात हो गई।
झोपड़ियों से गोली बरसी
माओवदियों ने तीन तरफ से हमले का जाल बिछाया और जवान उसकी चलाकी को समझ नहीं पाए। जोनागुड़ा में नक्सलियों ने झोपड़ियों में घात लगाकर हमला किया। टेकलगुड़ा गांव में करीब 30 घर हैं,सभी को नक्सलियों ने खाली कराया और यहां से छिपकर हमला किये। दोनों जगह जवानों की लाशें बिछी रही। खून फैला हुआ था। पेड़ों पर गोलियों के निशान थे। तीन घंटे तक जवानों और नक्सलियों के बीच मुठभेड़ चली। घायल जवानों को पास से गोली मारी और बम से हमला किया।
बहरहाल कब तक बस्तर नक्सलियों के बारूद से दहलता रहेगा? कश्मीर की तरह छत्तीसगढ़ के नक्सलवाद को भी राष्ट्रीय मामला समझना जरूरी हो गया है। कैसे शांति स्थापित होगी छत्तीसगढ़ में इस दिशा में अब विचार करना जरूरी है।
 

 
 

Wednesday, March 3, 2021

पत्रकारों को जान के लाले

 











बस्तर में पत्रकारिता कभी भी आसान नहीं रही।पत्रकारांे को पुलिस के खिलाफ लिखने पर पुलिस नक्सलियों का मुखबिर बताकर जेल में डाल देती है और पुलिस का साथ देने पर नक्सली अपना दुश्मन समझ लेते है। यहां पत्रकरिता विकलांग हो गई है।  


0 रमेश कुमार ‘रिपु’
             छत्तीसगढ़ में उस पार्टी की सरकार है,जिसके नेता राजबब्बर ने कांग्रेस भवन में कहा था कि,नक्सली क्रांतिकारी हैं। वे क्रांति के लिए निकले हैं। कोई उन्हें रोके नहीं। सवाल यह है कि, नक्सली किस तरह के क्रांतिकारी हैं,जो जन अदालत लगाकर पत्रकारों को सजा देने की बात कर रहे है। प्रेस नोट जारी कर पत्रकार गणेश मिश्रा,लीलाधर राठी, बीबीसी के पूर्व पत्रकार शुभ्रांशु चैधरी, पी विजय, और फारूख अली को चेतावनी दी हैं। जबकि बस्तर में एक लाख के करीब फोर्स के जवान हैं। और भूपेश सरकार कहती है कि,नक्सली कमजोर हुए हैं। यदि नक्सली कमजोर हुए हैं,तो आम आदिवासी और पत्रकारों को नक्सली धमकी देने की हिमाकत कैसे कर लिए? पत्रकारों का संगठन सुकमा,बिजापुर और जगदलपुर मुख्यालय में धरना प्रदर्शन कर नक्सलियों का विरोध किया है। सरकार की चुप्पी हैरान करती है। बस्तर आईजी पी सुन्दरराज कहते हैं, इस पूरे मामले को पुलिस ने गंभीरता से लिया है। पुलिस माओवादियों के प्रेस नोट की जांच कर रही है। पत्रकारों और समाजसेवी सहित सभी नागरिकों के सुरक्षा की जिम्मेदारी पुलिस की है। किसे कितनी सुरक्षा दी जाएगी, इस बात को हम सार्वजनिक नहीं कर सकते। वहीं प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष विष्णु देव साय कहते हैं,सरकार झूठ बोलाती है कि नक्सलवाद कमजोर हुआ है। उनके हौसले बढ़े हैं। अब पत्रकार उनके निशाने पर है।’’
नक्सलियों के पत्र का जांँच करायेंगे। पुलिस अपने स्तर पर नक्सलवाद के खात्मे के लिए काम कर रही है।’’जाहिर सी बात है कि पत्रकारों की जान की कोई कीमत पुलिस नहीं मानती।
गौरतलब है कि दक्षिण सब जोनल ब्यूरो की ओर से 9 और 12 फरवरी को बीजापुर में प्रेस नोट जारी करते हुए पत्रकारों और कार्पोरेट घराने के लोगों को चेतावनी दी थी कि, भ्रष्टाचारियों और कॉरपोरेट घरानों के लोगों को जन अदालत लगाकर सजा दी जाएगी। 13 फरवरी को दंतेवाड़ा में नक्सलियों ने पत्रकारों के खिलाफ पर्चे भी फेंके। इसके बाद नक्सलियों की तरफ से 15 फरवरी को जारी विज्ञप्ति में सुकमा के पत्रकार लीलाधर राठी व बीजापुर के पत्रकार गणेश मिश्रा को जन अदालत में दंडित करने की चेतावनी देते हुए कहा कि ये कार्पोरेट घरानों के दलाल है। इस घटना की प्रदेश भर के पत्रकारों ने निंदा की है। इसके बाद 17 फरवरी को नक्सलियों का एक पत्र फिर मीडिया के पास आया जिसमें पत्रकारों को आंदोलन नहीं करने की सलाह देते हुए मामले पर चर्चा करने की बात कही। पत्र में लिखा कि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सरकार यहां के प्राकृतिक संसाधनों को कारर्पोरेट घराने के हाथों में सौपने भूअर्जन पुनर्वास व्यवस्थापना कानून 2019 को लाया। जनता को बेदखल करने खदाने और बांधे शुरू करने के लिए समझौता किया। नया कैम्प और खदान खोलने का जनता लगातार विरोध कर रही है। फासीवादी सलवा जुड़ूम,शांति सेना,अग्नि सेना जैसी संस्थाओं के नेता फारूख अली जैसे गुंडों को शोषक वर्ग ने सम्मानित किया। पत्रकार और समाजसेवीं इसका विरोध करें,नहीं तो अंजाम भुगतने तैयार रहें।
पत्रकार गणेश मिश्रा कहते हैं,उनका कार्पोरेट घरानों से कोई ताल्लूक नहीं है। वे विशुद्ध रूप से पत्रकार हैं। लीलाधर राठी कई साल से बीजापुर में किराए के घर में रहते हैं। बरसों से वे ग्रामीण लोगों की आवाज उठाते आ रहे हैं। बात सारकेगुड़ा की हो या एड़समेटा की,उन्होंने निष्पक्ष होकर मसले को कवर किया। लीलाधर राठी कहते हैं,कभी ऐसा काम नहीं किया कि नक्सली नाराज हो जाएं। सुकमा में राठी मार्ट नाम से एक दुकान खोली है,उसमें सभी महिलाएं वर्कर हैं। उनकी पत्नी दुकान की मालकिन हैं। दुकान में काम करने वाली सभी महिलाएं निर्धन हैं। गौरतलब है कि 26 जनवरी को दस लोगों को मार्ट की ओर से सम्मानित किया गया था। चर्चा है कि, सम्मानित जिन्हें किया गया उसमें कुछ लोग सलवा जुड़ूम के समर्थक थे। नक्सली इसीलिए नाराज हैं। सुकमा के पत्रकार लीलाधर राठी एक बार जब माओवादियों ने सब इंस्पेक्टर प्रकाश सोनी को बंधक बना लिया था। जनअदालत से वे लंबी सुनवाई के बाद प्रकाश सोनी को सकुशन रिहा करा लाए थे। बस्तर में शांति स्थापित करने की दिशा में प्रयासरत बीबीसी के पूर्व पत्रकार शुभ्रांशु चैधरी कहते हैं,ं मोबाइल और रेडियो के माध्यम से बस्तर के अंदरूनी इलाकों में लोगों से संवाद स्थापित कर रहे हैं। आदिवासी महिलाओं के लिए सैनेटरी पैड के इस्तेमाल को बढ़ावा देने की पहल को गति दे रहे हैं। ताकि महिलाओं में जागरूकता आए।
नक्सलियों के खिलाफ हुए प्रदर्शन
बीजापुर में 14 फरवरी को नक्सलियों के पर्चे फेंकने के बाद बीजापुर में पत्रकारों ने बैठक की। 16 फरवरी से 22 फरवरी तक धरना,प्रदर्शन कर नक्सलियों का विरोध कर निंदा प्रस्ताव पारित किया। 15 फरवरी को जगदलपुर में सामाजिक संगठनों ने इसके विरोध में नक्सलियों का पुतला दहन किया। 16 फरवरी को पत्रकारों ने दंतेवाड़ा में बाइक रैली निकालकर नक्सलियों के फरमान का विरोध किया। बाइक रैली कंगाल से निकाली गई है। 16 फरवरी को पत्रकारों ने माओ के गढ़ गंगालूर में एक रैली और सभा की। नक्सलियों ने बीजापुर और सुकमा के पत्रकार को जान से मारने की धमकी का विरोध करते हुए जवाब मांगा। 18 फरवरी को कुछ पत्रकार गंगालूर से 10 किलोमीटर आगे नक्सलियों की मांद में घुसे। नक्सली स्मारक के सामने नक्सल विज्ञप्ति का उन्होंने विरोध जताया। 18 फरवरी को पत्रकारों ने बुरगुम गांव में धरना,प्रदर्शन किया। सामाजिक कार्यकर्ता सोनी सोरी ने पत्रकारों के प्रदर्शन का समर्थन किया। जगदलपुर पत्रकार संघ अध्यक्ष एस करीमुद्दीन ने कहा,कि नक्सली जल्द सामने आएं और स्थिति को स्पष्ट करें। इसलिए कि परिवार परेशान है।
पहले भी पत्रकार मारे गए
नक्सलियों के निशाने पर पहली बार पत्रकार नहीं आए हैं। इसके पहले बीजापुर जिले के साईं रेड्डी और बस्तर जिले के नेमीचंद जैन को माओवादियों ने अपना निशाना बनाया है। इन दोनों मृत पत्रकारों के खिलाफ कोई पर्चा जारी नहीं किया गया था। ऐसा पहली बार हुआ है, जब पत्र में बीजापुर के गणेश मिश्रा, सुकमा के लीलाधर राठी बीबीसी के पूर्व पत्रकार शुभ्रांशु चैधरी के साथ माओवादियों के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाले कोंटा के पी. विजय और सुकमा के फारूख अली का नाम शामिल है।  
माओवादियों के जारी पर्चे के जवाब में समाज सेवी फारूख अली ने कहा,नक्सली पीएलजीए सप्ताह के नाम पर निर्दोष ग्रामीणों की जान लेते हैं और अपने आप को क्रांति का दूत कहते हैं। बस्तर से आदिवासी संस्कृति खत्म करना चाहते हैं। बंदूक की नोक पर न केवल लोगों में डर पैदा करना चाहते हैं बल्कि, इसी के दम पर सत्ता हासिल करना चाहते हैं। बस्तर के लोग कभी उनके सपने को पूरा नहीं होने देंगे।
दक्षिण बस्तर पत्रकार संघ अध्यक्ष बप्पी राय कहते हैं,छत्तीसगढ़ के बस्तर में पत्रकारिता बेहद चुनौतीपूर्ण है। जब सरकार और नक्सलियों के बीच कोई वार्ता करनी होती है,तब बस्तर के पत्रकार ही सरकार की मदद करते हैं। बस्तर के पत्रकारों के माध्यम से ही कई बार निर्दोषों को नक्सलियों के कब्जे से छुड़ाया गया है। इतना ही नहीं,बस्तर संभाग के सभी नक्सल प्रभावित जिलों के पत्रकार जब कोई बड़ा नक्सली हमला होता है, तो पत्रकार के रूप में नहीं बल्कि, मददगार बनकर खड़े हो जाते हैं। जान जोखिम में डालकर अंदरूनी इलाकों से खबर लेकर आते है। जिसके बाद वही खबर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय खबर बनती है।’’
बाहरहाल बस्तर में पत्रकारिता इतनी आसान नहीं है। पुलिस के खिलाफ लिखने पर पुलिस नक्सलियों का मुखबिर बताकर पत्रकारों को जेल में डाल देती है और पुलिस का साथ देने परा नक्सली जन अदालत में फैसला करने की बात कहते हैं। यहां पत्रकारिता विकलांग हो गई है,कहें तो गलत नहीं होगा। देखना यह है कि सरकार और पुलिस, पत्रकारों की सुरक्षा माओवादियों से किस तरह करती है।
 
 
 
 
 
 


 

Tuesday, February 23, 2021

सरकार और माओ दोनों भटक गए हैं

 
       

छत्तीसगढ़ में माओवादी हैं,तो सुरक्षा बल है। सुरक्षा बल है,तो सोनी सोरी की आवाज़ है। जो वर्दी से उभरने वाली दरिंदगी के खिलाफ गूंजती है। सोनी सोरी मानती है कि, फोर्स के दम पर नक्सलवाद खत्म नहीं होगा। पाँच बटालियन और मिलने से महिलाओ के साथ अनाचार बढ़ेगा। लोन वार्रंाटू सिर्फ पैसा और प्रमोशन पाने, पुलिस का काॅसेप्ट है। इससे नक्सलवाद कमजोर नहीं होगा। नक्सलवाद  पर इस तरह की तमाम बातें सोनी सोरी से की। प्रस्तुत है उनसे हुई बातचीत के प्रमुख अंश - 


0 रमेश कुमार ‘‘रिपु’’
0 छत्तीसगढ में नक्सली हिंसा बढ़ने की वजह क्या मानती हैं?
00 छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद से आदिवासियों के साथ ज्यादा अत्याचार होने लगा है। पेसा कानून की बात की जाती है लेकिन, उसे अमल में नहीं लाया जाता है। ग्राम सभा होनी चाहिए। पर होती नहीं। मैं मानती हूूॅ कि, सीआरपीएफ के कई कैंप लगे हैं,नक्सलियों से मुक्ति के लिए। सवाल यह उठता है,जब कैंप लगे हैं,तो फिर आदिवासियों के साथ जुल्म,अत्याचार क्यों होता है। महिलाओं के साथ अनाचार क्यों होता है? आदिवासियों को नक्सली बताकर बार बार जेल क्यों भेजा जाता है? सरकार सोचती है कि,ऐसा करने से नक्सलवाद खत्म हो जाएगा, तो गलत सोचती है। आदिवासी परेशान होकर कहता है, जब झूठे तरीके से नक्सली बताकर जेल में डाला जा रहा है,तो नक्सली ही बन जाते हैं।
0 क्या आप मानती हैं कि, जब तक पुलिस निर्दोष आदिवासियों केा नक्सली बताकर गोली मारती रहेगी या फिर जेल में डालती रहेगी, नक्सलवाद खत्म नहीं होगा।
00पुलिस बल के जरिये सरकार जो कर रही है,उससे नक्सलवाद खत्म नहीं हो सकता। लड़ाई यहांँ जल,जमीन और जंगल की है। न कि नक्सलियों की लड़ाई है। सरकार की नीतियाँं आदिवासियो के हित में नहीं है। सरकार पेसा कानून को अमल में तो लाए। महिलाओं के साथ होने वाले अनाचार और जुल्म को रोकने क्या कर रही है,यह तो बताये। आदिवासियों को नक्सली बताकर गोली मारने का सिलसिला थमेगा नहीं,ऐसे में नक्सलावाद कैसे खत्म होगा?
0 बस्तर के आई जी रहे एस.आर.पी कल्लूरी की वजह से नक्सलवाद मे कमी आई या फिर नक्सलवाद और बढ़ा?
00 कल्लूरी के पहले भी नक्सलवाद था और अब भी है। बल्कि पहले से अधिक है। जब तक आदिवासियों के पक्ष में सरकार खड़ी नहीं होगी,नक्सलवाद खत्म नहीं हो सकता। कोरोना काल के मार्च महीने में 17 डीआरजी के जवान शहीद हुए। सरकार कहती है,नक्सलवाद कमजोर हो रहा है,यह सिर्फ अखबारों में दिखता है। सच्चाई यह है कि, नक्सलवाद पहले से और बढ़ा है। बस्तर में आदिवासी नक्सलियों के मुखबिर के शक में मार दिये जाते है। नक्सली भी पुलिस के मुखबिर के आरोप में आदिवासियों को मार देते हंै। नक्सली मरने की जगह, आदिवासी पहले भी मरते थे। आज भी मर रहे हैं।
0 क्या आपको लगता है कि, नक्सली अपने मकसद से भटक गये हैं।
00 आदिवासियों के लिए सरकार बड़ी बड़ी बाते करती है,लेकिन करती क्या है? जब से होश संभाली हूूॅ, देख रही हॅू कि निर्दोष आदिवासी ही पिस रहा है। सरकार और माओ दोनों भटक गए हैं। दोनों अपने मकसद के विपरीत चल रहे हैं।
0 कांग्रेस सरकार और बीजेपी सरकार, दोनों में से किसे मानती है कि नक्सलवाद के खिलाफ उनका काम अच्छा है?
00 बीजेपी हो या फिर कांग्रेस, दोनों नक्सलवाद से निपटने मे असफल है। बीजेपी के समय सलवा जुड़ूम से आदिवासियों को जो जख्म मिले,उसे भुलाया नहीं जा सकता। नक्सल समस्या के लिए कांग्रेस ने अपने घोंषणा पत्र मे जो बातें कहीं थी, लगता है उसे भूल गई है। नक्सल नीति बनाने की बात की थी। दो साल बाद भी नहीं बनी।
0 क्या आप माानती हैं कि, नक्सली क्रांतिकारी हैं। वे क्रांति करने निकले हैं।
00 बंदूक से लड़ाई करने वालों को क्रांतिकारी कैसे कह सकते हैं। माओ की गोली हो या फिर पुलिस की,दोनों से इंसान मरते है। मानवता मरती आई है। आदिवासी मरते हैं। विचारों से जो क्रांति लाए, उसे ही क्रांतिकारी कहेंगे।
0 लोन वार्रंाटू को, क्या पुलिस का सही कांस्पेट है मानती हैं?
00 लोन वार्राटू पूरी तरह फजी कांस्पेट है। हैरानी वाली बात है कि,दंतेवाड़ा जिले में 400 माओवादी सरेंडर करते है फिर भी चार,चार एनकांउटर होता है। आखिर क्यों? दरअसल सरेंडर करने वाले किसान हैं, आदिवासी हैं। जब एक जिले में इतने माओवादी सरेंडर कर रहे है, तो सोचने वाली बात है कि पूरे बस्तर में आखिर कितने नक्सली होंगे? दंतेवाड़ा नक्सल मुक्त क्यों नहीं होता? पिछले दिनों राज्यपाल मेडम से यही सवाल की। उनके पास कोई जवाब नहीं था। जल,जमीन और जंगल उद्योगपतियों को देकर, सरकार जल,जमीन और जंगल की हत्या करा रही है।    
0 केन्द्र सरकार ने पाँंच बटालियन और दी है बस्तर को। इससे आदिवासियों का भला होगा क्या?
00 पाँच बटालियन देने से कैंप और बन जायेंगे। जब जब फोर्स की संख्या बढ़ी है, महिलाओं के साथ होने वाले अनाचार में इजाफा ही हुआ है। यहांँ माओवादियों से पत्रकार सुरक्षित नहीं है। आम आदमी सुरक्षित नहीं है। खुलेआम पत्रकारों को माओवादी धमका रहे हैं। सरकार दावे के साथ नहीं कह सकती कि वह लोगों को माओ से सुरक्षा मुहैया करा सकती है। हजारों कैप लगा लें,नक्सलवाद खत्म नहीं होगा। बातचीत करनी चाहिए।
0 पुलिस फजी मुकदमे क्यों बनाती है?
00 पुलिस आदिवासियों के खिलाफ फर्जी मुकदमे दर्ज कर उन्हें नक्सली बताती है, अपने नाम के लिए। अपने प्रमोशन के लिए। पैसे का खेल है। गाँव से किसानों,ग्रामीण आदिवासियों को पकड़ कर लाते हैं और उन्हें एक लाख, दो लाख का इनामी नक्सली बताते है। मार देने पर दस लाख का इनामी नक्सली हो जाता है। कोई आदिवासी विरोध करता है, तो उसे यूपीए कानून के तहत कार्रवाई का डर दिखाया जाता है। अपना स्टेटस बढ़ाने के लिए पुलिस फर्जी मुकदमेे गढ़ती है। बस्तर में हजारों लोगों के खिलाफ फर्जी मुकदमे दर्ज कर पुलिस उन्हें जेल में डाल दी। निर्मलक्का और उसके पति चन्द्रशेखर रेड्डी को नक्सली बताकर जेल में डाल दिया गया था। उसका पति पहले ही छूट गया था। लेकिन, निर्मलक्का 12 साल बाद निर्दोष जेल से छूटी। सवाल यह है कि, वह नक्सली थी, तो बाइज्जत बरी कैसे हो गई।
0 पुलिस वाले आदिवासी महिलाओं के साथ अनाचार करके,उन्हें माओवादी बताकर गोली क्यों मार देते है या फिर जेल में क्यों डाल देते हैं?
00 पुलिस आदिवासी महिलाओं के साथ रेप करती है। फिर उसे माओवादी बताकर गोली मार देती है, ताकि देशवासियों की उसके प्रति सहानुभूति न रहे। महिला को माओवादी बताकर, खुद का बचाव करती है पुलिस।  
0 नक्सलवाद खत्म कैसे होगा?
00 सरकार को चाहिए कि,वह बातचीत का रास्ता अपनाए। बातचीत उन आदिवासियों के साथ करे, जो दिन रात पुलिस के बीच रहता है। माओवादियों का सामना करता है। उसकी समस्या किससे है। उसकी समस्या क्या है? उसे सरकार समझे। फर्जी तरीके से नक्सली बताकर जेल में डाल देने वालों से बात करे। जल,जमीन और जंगल पर कब्जा करने वालों को, रोकने वालों से बातें करें। आदिवासियों की समस्या को जब तक दूर करने की सरकार नहीं सोचेगी,नक्सलवाद खत्म नहीं होने वाला। माओवादियों से बात करने के लिए भूपेश सरकार ने मना कर दिया है। वे कहते हैं, पहले नक्सली हथियार छोड़ें। ऐसे में कैसे बात होगी। बस्तर के जंगलों के भीतर जो रहते हैं, उनसे पूछें कि, उन्हें कैसा विकास चाहिए। गोली और लाठी से उनकी आवाज दबा दी जाती है। बातचीत से निश्चय ही नक्सलवाद खत्म होगा।
0 पुलिस की आंँखों में सोनी सोरी क्यों खटकती है?
00 सोनी सोरी खटकेगी क्यों नहीं। आदिवासी भाई बहनों के सुख दुख में उनके साथ खड़ी रहती है। उन पर होने वाले जुल्म,अत्याचार और बहनों के साथ होने वाली रेप की घटनाओं के खिलाफ कंधे से कंधा मिलाकर पुलिस की ज्यादती का विरोध करती है। उनके आँसुओं को अपना आंँसू समझती है। मेरी नस नस वाकिफ है, पुलिस के जुल्म से। मेरे ऊपर कैमिकल्स अटैक हुआ,मेरे गुप्तांग में कंकर पत्थर डाले गये,मारपीट की गई। मैं पुलिस के हर हथकंडे को जान गई हूॅ। पुलिस को लगता है कि, मैं आदिवासियों की नहीं, माओवादियों की मदद करती हूूॅ। जबकि ऐसा नहीं है। माओवादियों के साथ न थी और न रहूंगी। कुछ पुलिस वाले मुझे इज्जत भी देते हैं। उन्हें लगता है कि, मेरी लड़ाई आदिवासी भाई और बहनों के लिए है।  
 
 










Monday, January 18, 2021

एम.पी.में पांव पसारते नक्सली

     
छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र में लाल गलियारे का विस्तार करने के बाद माओवादी मध्यप्रदेश के बालाघाट, मंडला, डिंडौरी और अमरकंटक तक अपना विस्तार करने में जुट गए हैं। नक्सली गतिविधियां बढ़ने की वजह से हॉकफोर्स का मुख्यालय बालाघाट शिफ्ट कर दिया गया है। सवाल यह है कि क्या बस्तर के माओवादियों के बढ़ते कदम रूक पाएंगे?


0 रमेश कुमार ‘‘रिपु’’
                   बस्तर के नक्सली मध्य प्रदेश में डेढ़ दशक के बाद फिर अपनी आवा जाही तेज कर दिये हंै। यह माना जा रहा है कि माओवादी अपना विस्तार करने के मक़सद हलचल तेज कर दिये हैं। बालाघाट जिले में नक्सलियों के दलम का दखल कान्हा नेशनल पार्क और उसके आगे तक बढ़ता जा रहा है। वे मंडला, डिंडोरी और अमरकंटक की तरफ पैठ बनाने में लगे हैं। कान्हा पार्क में गांँव नहीं होने से नक्सलियों का जत्था रास्ते में नाकेदारों की चैकियों में रूक कर रखे राशन पानी को चट कर जाते हैं। क्यों कि कान्हा नेशनल पार्क के अन्दर और पार्क के कई किलोमीटर दूर तक गाँव नहीं हैं। नक्सलियों को यहांँ रहने,रूकने और खाने का कोई सहारा नहीं मिलता है। इस वजह से वे लगातार मूवमेंट कर रहे हैं। वन विभाग ने इसकी रिपोर्ट पुलिस मुख्यालय और गृह विभाग को भेजी है। हालांकि वन कर्मचारियों को नक्सली किसी भी तरह का नुकसान नहीं पहुंचाते हैं। लेकिन नक्सलियों की वजह से मंडला के वन क्षेत्र में कटाई कुछ दिनों तक प्रभावित थी।  
छत्तीसगढ़ के बस्तर और महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में माओवादियों के विस्तार के बाद मध्यप्रदेश के कान्हा किसली टाइगर रिजर्व,मुकी क्षेत्र और मंडला में इनकी गतिविधियांँ देखी जा रही हैं। प्रदेश के गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा भी मानते हैं कि, माओवादियों का दायरा बढ़ने लगा है। इसलिए जनवरी,फरवरी 2021 में सीआरपीएफ की छह कंपनियां मंडला-बालाघाट में तैनात की जाएगी। इनमें 75 फीसदी लड़ाकू जवान होंगे।’’ नक्सली गतिविधियां बढ़ने की वजह से हॉकफोर्स का मुख्यालय बालाघाट शिफ्ट कर दिया गया है। जिसमें 5 दिसंबर को ही आई.पी.एस. नागेंद्र सिंह और सहायक पुलिस निरीक्षक घनश्याम मालवीय की पोस्टिंग की गई है। नवंबर 2020 में कान्हा के बफर क्षेत्र में एक नक्सली ऑपरेशन को भी अंजाम दिया जा चुका है।  
बस्तर के नक्सली मूवमेंट कर रहें
बालाघाट में माओवादियों की मूवमेंट 2019 से अचानक बढ़ गई है। इस बीच कुछ इनामी माओवादी मुठभेड़ में मारे भी गये हैं। गौरतलब है कि जुलाई 2019 की दरम्यिानी रात में लांजी क्षेत्र के पुजारी टोला में पुलिस और नक्सलियों के बीच मुठभेंड हुई थी,जिनमें एक महिला सहित दो इनामी नक्सली मारे गये थे। उसके बाद 17 सितंबर 2020 को कान्हा पार्क के बफर जोन से लगे बांधाटोला और समनापुर के जंगल से पुलिस और नक्सलियों के बीच मुठभेड़ में 12 लाख का इनामी नक्सली ओसा उर्फ बादल गिरफ्तार किया गया। 7 नवंबर 2020 को भी पुलिस ने कान्हा राष्ट्रीय उद्यान के करीब मालखेड़ी के जंगल में मुठभेड़ में एक महिला नक्सली को मार गिराया था। ये महिला नक्सली खटिया मोर्चा दलम 02 की बताई गई थी। जी.पी सिंह एडी.जी नक्सल ऑपरेशन कहते हैं,‘‘कान्हा टाइगर रिजर्व में मूवमेंट छत्तीसगढ़ बॉर्डर की तरफ से बढ़ा है। नवंबर में रिजर्व के बफर क्षेत्र में एक ऑपरेशन किया जा चुका है। सर्विलांस तेज है। अतिरिक्त फोर्स बुलवाई जा रही है। बस्तर और गढ़चिरौली में कार्रवाई जारी है, इसीलिए कुछ नक्सलियों ने मध्यप्रदेश की तरफ रूख किया है।’’
दो इनामी महिला नक्सली मारी गईं
11 दिसबर 2020 की रात्रि करीब साढे 10 बजे सुरक्षाबलों और नक्सलियों के बीच हुई मुठभेड़ मंे दो महिला नक्सली मारी गई। शोभा पति उमेश गावड़े 30 वर्ष मलाजखंड एरिया कमेटी की सक्रिय सदस्य है, जो कि गढचिरौली निवासी बताई गई है। इस पर मध्यप्रदेश सरकार ने 3 लाख रूपये,छत्तीसगढ़ में 6 लाख और महाराष्ट्र में 06 लाख सहित कुल 14 लाख इनाम घोषित था। उस पर म.प्र में 04, छत्तीसगढ़ में 11 और महाराष्ट्र में 06 अपराध दर्ज थे। दूसरी महिला नक्सली सरिता उर्फ आयते उम्र 24 वर्ष निवासी गंगालूर एरिया बस्तर क्षेत्र महाराष्ट्र मारी गई। सावित्री बस्तर की दरेकसा एरिया कमेटी की सदस्य है। इस पर मध्यप्रदेश सरकार ने 3 लाख रूपये, छत्तीसगढ़ 05 लाख रूपये और महाराष्ट्र सरकार ने 06 लाख रूपये कुल 14 लाख रूपये इनाम घोषित था। इस पर मध्यप्रदेश में 19 छत्तीसगढ़ में 01 और महाराष्ट्र में 05 अपराध दर्ज थे।      
बालाघाट में 47 ग्रामीणों की हत्या
बालाघाट जिले में पिछले तीन दशक से नक्सलियों की गतिविधियां बनी हुई है। जिनके खात्मे के लिये 08 हजार सुरक्षा बल कार्य कर रहे है। बालाघाट जिले के 160 गांँव प्रभावित है। नक्सल उन्मूलन के नाम पर केंद्र सरकार से सन् 2020 के लिए 03 करोड़ रूपये का बजट मिला। अब तक नक्सलियों ने पुलिस मुखबीरी के शक में 47 ग्रामीणों की हत्या कर चुके हैं। वहीं 37 पुलिस जवान शहीद हुए हैं। पुलिस नक्सली मुठभेड़ में  20 सक्रिय नक्सली मारे जा चुके हैं।  
कई दमल सक्रिय हैं
बालाघाट जिले में हार्डकोर नक्सलियों के तीन दलम कार्य कर रहे हैं। टाडा दलम, मलाजखंड दलम और कान्हा नेशनल पार्क में, विस्तार दलम। विस्तार दलम मुख्यालय बनाकर विस्तार कर रहा है। इसके अलावा यहां कई दलम हैं जो माहौल को खराब कर रहे हैं। इनमें मलाजखंड, टांडा दलम, कान्हा-भोरम दलम, परसवाड़ा दलम, विस्तार दलम, केबी डिवीजन, खटिया.मोर्चा दलम और देवरी दलम हैं। इन दलमों के नक्सली ग्रामीणों को भड़काने की कोशिश कर रहे हैं। बालाघाट पुलिस रेंज के आई.जी के.पी वेंकटेश्वर राव कहते हैं,‘‘बालाघाट व मंडला जिले में बस्तर के नक्सली, कबीरधाम जिले से लेकर भोरमदेव अभ्यारण्य के रास्ते अपना विस्तार करने में जुटे हैं। हालांकि पुलिस भी इन नक्सलियों के खिलाफ लगातार कार्रवाई कर रही है।’’
नब्बे के दशक में आये थे नक्सली
मध्यप्रदेश का आदिवासी बहुल जिला बालाघाट में नब्बे के दशक तक सब कुछ ठीक था। बैगा और गोंड़ जाति के लोग आदिम युग की संस्कृति में ही मस्त रहते हैं। लेकिन बालाघाट के पुलिस अधीक्षक रीना मित्रा के समय माओवादियों ने मुखबिरी के शक में एक व्यक्ति की हत्या कर दी थी। पहली बार यहांँ के लोगों ने सुना कि, नक्सलियों ने ऐसा किया है। इसके बाद लाल आतंक की आमद धीरे धीरे अंचल में बढ़ने लगी। बालाघाट में सीतापाल विस्फोट कांँड में 16 जवान शहीद हुए, तो प्रदेश में सनाका खिंच गया। तब से अब तक लाल आतंक की लकीर छोटी नहीं हुई। और यहीं से नक्सलियों की धमक और उनकी दहशत की तपिश बढ़ी। 15 सितम्बर 1999 को किरनापुर स्थित निवासगृह में दिग्विजय सिंह के कबीना मंत्री लिखीराम कावरे की हत्या करके नक्सलियों ने सरकार को चुनौती दी थी। लिखीराम कावरे की हत्या में शामिल जमुना को मार्च 2019 में छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव में मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ पुलिस ने संयुक्त कार्रवाई में मारा गया था। जमुना पर मध्यप्रदेश शासन की ओर से पांच लाख रुपये, छत्तीसगढ़ शासन ने आठ लाख रुपये और जिला गोदिंया महाराष्ट्र की पुलिस नें छह लाख रुपये और सीबीआई ने 50 हजार रुपये का इनाम रखा था।
नक्सलियों के बढ़ते कदम
बस्तर की तरह नक्सली बालाघाट जिले में उत्पात नहीं करते, लेकिन उनकी दशहत है। वर्तमान मे नक्सलियों की गतिविधियां पूर्व की तरह दक्षिण बैहर के चैरियां, एचिलौरा, राशिमेटा, सोनगुड्डा, कोरका, बोंदारी, मछुरदा, सालेटेकरी, किरनापुर, एलांजी क्षेत्र के आलीटोला, बोरबन, कलकत्ता, बोदालझोला, देवरबेली, सायर, संदूका, टेमनी, बडगुड, सतोना, रिसेवाडा, टिमकीटोला, सीतापालाआदि जगहों पर इनकी गतिविधियां देखी गई है। इसके अलावा राष्ट्रीय उद्यान कान्हा पार्क क्षेत्र के गढी, मुक्की, मलांजखंड और बैहर क्षेत्र से लगे गांव मालखेडी,समनापुर, बांधाटोला क्षेत्रो में नक्सलियों की गतिविधियों की सूचना पुलिस को लगातार मिल रही है। पुलिस का मानना है कि बस्तर की तरह बालाघाट को नक्सली अपना मुख्यालय बनाने की फिराक में है। करीब दो सैकड़ा नक्सली होने का अनुमान है। राज्य के पूर्व पुलिस महानिदेशक डीजीपी वी. के. सिंह ने कहा था कि नक्सली राज्य में अपना विस्तार कर रहे हैं। बालाघाट के साथ ही वे मंडला में सक्रिय हैं और अपना प्रभाव डिंडोरी के अलावा अमरकंटक में भी बढ़ाना चाहते हैं।’’
जाहिर सी बात है कि नक्सली दण्डकारण्य राज्य बनाने के लिए अपना दायरा बढ़ा रहे हंै। लेकिन ऐसा नहीं लगता कि नक्सलियों के बढ़ते कदम को सरकार आसानी से रोक लेगी। इसलिए कि बलाघाट के बैगा जन जातियों का उद्धार सरकार नहीं कर पाई है। नक्सली बैगा आदिवासियों का फायदा उठाने एक बार फिर मध्यप्रदेश में अपने पांँव पसार रहे हैं।
 
 
 
 
   
 
 
 
 

 



















नक्सलवाद के पंजे में छग की गर्दन

      












नक्सलियों ने छत्तीसगढ़ को गृहराज्य बना लिया है। बस्तर का अबूझमाड़ जंगल माओवादियों की राजधानी है। राज्य के 14 जिले नक्सल प्रभावित हैं,जबकि नक्सलियों की आवाजाही 18 जिलों में है। देश के तमाम नक्सली संगठन बस्तर के दंडकारण्य जोन को ही फालो करते हैं। माओवादी छत्तीसगढ़ को दंडकारण्य राज्य बनाने जन युद्ध कर रहे हैं,वहीं मुख्यमंत्री भूपेश बघेल कहते हैं,नक्सली जब तक हथियार नहीं छोड़ेंगे, उनसे बात नहीं करेंगे। सवाल यह है कि और कितने गणतंत्र के बाद छत्तीसगढ़ नक्सलवाद के पंजे से मुक्त होगा।
0 रमेश कुमार ‘‘रिपु’’
                ‘‘नक्सली संगठन आतंरिक सुरक्षा के लिए खतरनाक हैं।’’ पूर्व प्रधान मंत्री डाॅ मनमोहन सिंह ने माओवादियों की हिंसक घटनाओं के आधार पर यह कहा था। 2010 में दंतेवाड़ा में नक्सलियों ने घात लगाकर 76 जवानों की एक ही दिन में हत्या कर दी थी। इतने जवान एक दिन में कभी भी किसी युद्ध में शहीद नहीं हुए। बावजूद इसके मुख्यमंत्री भूपेश बघेल कहते हैं,‘‘नक्सली संविधान पर विश्वास करें और हथियार छोड़े तभी बात होगी।’’जाहिर सी बात है कि नक्सली हथियार नहीं छोड़ेंगे। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल शायद भूल गये हैं कि उनकी पार्टी के कांग्रेस नेता राजबब्बर ने चुनाव के पहले कांग्रेस भवन में 4 नवम्बर 2018 को कहा था,‘‘नक्सली क्रांतिकारी हैं। वे क्रांति करने निकले हैं। उन्हें कोई रोके नहीं।’’
क्या यह मान लिया जाए कि राजब्बर नक्सलियों का हौसला आफजाई करने आए थे। ताकि नक्सली, कांग्रेसी समर्थक हो जाएं? और बस्तर की सभी 12 सीटें कांग्रेस की झोली में आ जाए। ऐसा ही हुआ। स्व. महेन्द्र कर्मा की पत्नी और काग्रेस विधायक देवती कर्मा कहती हैं,‘‘नक्सलवाद को कोई भी पार्टी खत्म नहीं कर सकती। नक्सलवाद पहले भी था,आज है, और कल भी रहेगा। वे सवाल करती हैं कि झीरम कांड में कांग्रेस के कई बड़े नेताओं की नक्सलियों ने हत्या कर दी थी। झीरम कांड में कांग्रेस का वोट प्रतिशत बढ़ा, लेकिन सरकार बीजेपी की ही क्यों बनी?
देवती कर्मा और राजबब्बर की बातों से सवाल यह है कि,क्या नक्सलियों ने बीजेपी के खिलाफ वोट कराया? डाॅ रमन सिंह कहते थे, यदि हमारी पार्टी की सरकार बनी तो 2022 तक नक्सलवाद खत्म कर देंगे।’’तो क्या यह मान लिया जाए कि नक्सली डर गए थे। और वे राजबब्बर की बातों से खुश होकर मन से कांग्रेसी हो गए हैं। इसलिए राज्य में अब उपद्रव नहीं कर रहे हैं।
क्यों बढ़ गया नक्सलवाद
भूपेश सरकार दावा कर रही है कि राज्य में 45 फीसदी नक्सली वारदात में कमी आई है। जबकि बीजेपी की राज्य सभा सदस्य सरोज पांडेय कहती हैं,राज्य सरकार ने नक्सलियों के आगे घुटने टेक दिये हैं। जिसके दुष्परिणाम हम सभी को आने वाले समय मे भुगतने होंगे।’’वर्ष 2020 में 38 नक्सली मारे गये और 28 जवान शहीद हुए हैं। 2018-20 के दौरान पुलिस ने 216 नक्सलियों को मार गिराया वहीं 966 नक्सली सरेंडर किये। जाहिर सी बात है कि ऐसा आगे भी होता रहेगा। कांग्रेस के मीडिया प्रभारी शैलेष त्रिवेदी कहते हैं,‘‘डाॅ रमन सिंह ने माओवादियों के आगे घुटने टेकने का काम किया। तभी तो दक्षिण बस्तर के 3 ब्लाकों तक सीमित माओवाद, भाजपा सरकार के 15 साल के कार्यकाल में 14 जिलों तक फैला। भाजपा नेता रामविचार नेताम ने माओवादियों को 4 लाख रूपये चंदा देकर रसीद भी दी थी। सन् 2004 की विधानसभा की कार्यवाही में इस बात पर चर्चा भी हुयी थी। कांग्रेस ने जाँच की मांँग की जिसे अस्वीकृत कर रामविचार नेताम द्वारा माओवादियों को चंदा देने की मामले को रमन सरकार ने दबाया। छत्तीसगढ़ में नक्सली हिंसा में बढ़ोत्तरी के लिये भाजपा की गलत नीतियां  जिम्मेदार थीं।’’
एक सच यह भी
राजनीतिक सच अपनी जगह है। लेकिन एक सच्चाई यह है कि नक्सलियों ने छत्तीसगढ़ को गृहराज्य बना लिया है। बस्तर का अबूझमाड़ जंगल माओवादियों की राजधानी है। दंडकारण्य केन्द्रीय लड़ाई के लिए सेंटर है। राज्य के 14 जिले नक्सल प्रभावित हैं,जबकि नक्सलियों की आवाजाही 18 जिलों में है। देश के तमाम नक्सली संगठन बस्तर के दंडकारण्य जोन को ही फालो करते हैं। नक्सलियों के अंतरराष्ट्रीय संबंध हैं। अर्बन नक्सली उनकी मदद करते हैं। माओवादी छत्तीसगढ़ को दंडकारण्य राज्य बनानो जन युद्ध कर रहे हैं। बीस साल का छत्तीसगढ़ पूछता है,लाल सलाम का आतंक, कितने चुनाव के बाद खत्म होगा?
माओवादियों का विदेशी संबंध
आन्ध्र प्रदेश के नक्सली लीडर कोसा, कामरेड अतायु और गणेश का नक्सलवाद, बस्तर के अबूझमाड़ से लेकर देश के दस राज्यों में चार दशक से लाल लावा छितरा रहा है। केन्द्र सरकार की तरह विदेश कूटनीति के लिए नक्सली अंतरराष्ट्रीय समर्थन हासिल करने के लिए 21 सितंबर 2004 से दूसरे देशों के नक्सली संगठनों से लगातार बैठकें कर रहे हैं। सन् 2006 में माओवादियों के लीडर जर्मनी की कम्युनिष्ट पार्टी एमएलजीडी और नार्वे की एकेपी के नेताओं से मिलकर बैठकें की। इस बैठक का मकसद था, आधुनिक हथियार के साथ ही समर्थन जुटाना था। आधुनिक हथियार के जरिये, वो अब सीधे लड़ाई लड़ने लगे हैं। जैसा कि 3 मई 2018 को सुरक्षाबलों और माओवादियों के बीच हुई मुठभेड़ के बाद जर्मन हेक्लर और कोच एच.के जी .3 राइफल बरामद हुई। झारखं डमें चीनी रायफल मिली। जाहिर सी बात है कि नक्सली संगठन सरकार को अपनी ताकत की ताकीद कराने विदेशी हथियार बाहर से लाते हैं। 2010 में हुए दंतेवाड़ा का नरंसहार, से लेकर मार्च 2020 तक हुए नक्सली हमले इस बात का प्रमाण है कि अब बस्तर का लाल गलियारा केन्द्रीय लड़ाई में अपने आप को कमजोर नहीं मानता।
अफीम की खेती करते हैं
नक्सली संगठन शोषित,गरीब,आदिवासी और भूमिहीन किसानों के हक की लड़ाई की बात राजनीतिक दलों की तरह करते हैं। जबकि नक्सली संगठन का लेवी और उगाही करना एक मात्र लक्ष्य है। बस्तर में जितने भी उद्योग हैं,उनसे नक्सली पैसा लेते हैं। नौ सितंबर 2011 में बैलाडीला खदानों से लौह अयस्क ले रही बहुराष्ट्रीय कंपनी एस्सार अपनी सुरक्षा के लिए 15 लाख रूपये एक स्थानीय ठेकेदार बी.के. लाला को दो नक्सल समर्थकों को देते हुए पुलिस ने रंगे हाथों पकड़ा था। पुलिस का मानना है कि माओवादी छत्तीसगढ़ से एक हजार करोड़ रूपये से अधिक की राशि हर बरस उगाह कर आंध्र पहुंचाते हैं। नोटबंदी और कोरोना काल में उनकी उगाही का धंधा मंदा पड़ा है। दंतेवाड़ा के तत्कालीन आइ.जी एस.आर.पी. कल्लूरी ने 2010 में बीजापुर में नक्सलियों की अफीम की खेती पकड़ी थी। कल्लूरी कहते हैं, गांँजा और अफीम की खेती से भी नक्सली खासा धन जमा कर लेते हैं। खुफिया रिपोर्टों से खुलासा हुआ है कि नक्सल प्रभावित पाँंच राज्यों में नक्सली 1443 हेक्टेयर जमीन पर अफीम की खेती करते हैं। लेवी का आधा से अधिक हिस्सा मिलिट्री कमांड को जाता है। उससे हथियार खरीदे जाते हैं। सुरक्षा बलों का कहना है कि सन् 2007 में नक्सलियों ने 17.5 करोड़ रुपए खर्च कर एके.47 और राकेट लांचर खरीदे थे। इसी तरह दिसंबर 2008 में 200 ए.के.47 राइफलें खरीदीं। जाहिर सी बात है कि नक्सलियों के पास सुरक्षा बलों से लड़ने के सारे आधुनिक हथियार हैं। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल कहते हैं,छत्तीसगढ़ में ना ही ए. के. 47 बनती है और ना ही गोली के कारखाने हैं। अवैध हथियार कहाँ से और कैसे आते हैं, गृहमंत्रालय को पता करना चाहिए।’’
दण्डकारण्य राज्य की तैयारी
दंतेवाड़ा एस.पी अभिषेक पल्लव कहते हैं, बस्तर के नक्सलियों के संबंध चीन और नेपाल से हैं। वो वहांँ के नक्सली संगठन से मिलते हैं।’’दरअसल माओवादी दूर की सोच रखते हैं। वे जानते हैं कि दंडकारण्य राज्य या देश बनाने के लिए हमें विदेशी कूटनीतिक का सहारा लेना पड़ेगा। इसके लिए वे सन् 1996 में वर्कर्स पार्टी आॅफ बेल्जियम द्वारा आयोजित अंतरराष्ट्रीय परिसंवाद में हिस्सा लिए। इस परिसंवाद में 40 देशों के करीब 60 संगठनों ने हिस्सा लिया था। उस समय पीडब्लयूजी से जुड़े माओवादियों ने फिलीपीन्स के सीपीसी,जर्मनी के एमएलपीडी,पेरू के जीसीबी,तुर्की के टीकेपी,नार्वे के एकेपी के अतिरिक्त अन्य कई साम्यवादी संगठलों से संपर्क किया था। पिछले 20 वर्षो से नेपाली माओवादियों के साथ बैठकें कर रहे हैं। दंडकारण्य राज्य बनाने की तैयारी नक्सली जोर शोर से कर रहे हैं। उनकी मंशा है, पहले अपने प्रभाव वाले राज्यों में दण्डकाराण्य प्रदेश बनाने की। केन्द्र सरकार ने एमपी और छत्तीसगढ़ को पांँच-पाँच बटालियन दी है,नक्सलियों से लड़ने के लिए। आशंका है कि नक्सली गुरिल्ला युद्ध तेज कर सकते हैं। ओड़िसा में नक्सलियों की बैठक में तय किया गया है कि तमिलनाडु,कर्नाटक,गुजरात से लेकर केरल,नेपाल और बंगाल तक स्वतंत्र गलियारा बनाना। अपनी ताकत बढ़ाना। सामाजिक,जनजाति पृष्ठभूमि के लोगों को जोड़ना। वैसे भी नक्सली संगठनों ने अपना विस्तार उत्तर बिहार,पंजाब, हिमाचल, गुजरात प्रदेश तक कर चुके हैं। मध्यप्रदेश में बालाघाट से आगे बढ़ने की योजना है। इन दिनों दो सौ से ज्यादा नक्सली बालाघाट में हैं। कलकत्ता की बैठक में नेपाल से आन्ध्र तक रेड जोन बनाने का फैसला हो चुका है। यानी नक्सली आन्ध्र में एक बार फिर पैठ बनाना चाहते हैं।
संगठन में बौद्धिक महिलाएं
बस्तर में एक सैकड़ा स्थानीय गुरिल्ला दस्ता है। 70 सैन्य दल बेहद खतरनाक हैं। जिन्हें हर तरीके का प्रशिक्षण दिया गया है। नक्सली महिला दस्ते में पढ़ी लिखी महिलाओं की संख्या अधिक है। कू्ररता में ये पुरूषों से बीस हैं। झीरम कांड हो और ताड़मेटला कांड, इसका प्रमाण है। जहानाबाद जेल ब्रेक कांड करने में बस्तर की महिला नक्सलियों का हाथ था। गुरिल्ला सदस्यों की मुखिया सुजाता है,जो कि स्नातक है। पार्टी के पोलित ब्यूरो की सदस्य एम. कोटेश्वर राव की पत्नी है। बस्तर में करीब चार हजार महिलाएं गुरिल्ला की सदस्य हैं। पुलिस चैकियों की तरह अलग अलग इलाके में दलम सक्रिय हैं। दलम सैन्य कार्रवाई करते हैं। जबकि संघम जन अदालत लगाने और माओवादी एजेंडा को प्रचारित करने का काम करते हैं। इसके अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में जमीनी झगड़े,पारिवारिक विवाद,जातीय संघर्ष के अलावा वैवाहिक मुद्दों का भी निपटारा करने लगे हैं। इसके पीछे अपनी छवि को राबिन हुड की तरह पेश करना है। बस्तर में एक सैकड़ा के करीब इनामी नक्सली हैं। जिनमें एक से 20 लाख रूपये तक की इनामी महिला नक्सली भी हैं। पुलिस ने इनामी नक्सलियों के बड़े बड़े पोस्टर लगा रखे हैं। सूचित करने वालों को इनाम देने की घोषणा कर रखी है। बस्तर के बीजापुर में 17 स्कूल कई बरसों से बंद है। नक्सली इन स्कूलों में नक्सलवाद का पाठ पढ़ाते हैं।
तो छग नेपाल बन जाएगा
कभी किसी ने सोचा भी नहीं रहा होगा कि 40 हजार किलोमीटर में फैला अबूझमाढ़ माओवादियों का दण्डकारण्य बन जाएगा। सन् 1979 में सीतारमैया ने छह सदस्यों के एक दल को दंडकारण्य भेजा था। वो यहां 1990 तक रहे और दंडकारण्य को नक्सलियों को आधार क्षेत्र बनाया। सीतारमैया नक्सलियों के जत्थे को दंडकारण्य इसलिए भेजा था, ताकि ठीक से परख कर बताएं कि तेलंगाना में वारदात करने के बाद बस्तर का यह क्षेत्र आश्रय के लिए ठीक है कि नहीं। झारखंड का बूढ़ा पहाड़ जो छत्तीसगढ़,झारखंड ओर उत्तर प्रदेश की सीमाओं को छूता है। नक्सली तीनों राज्यों में आने जाने का जरिया इसी बूढ़ा पहाड़ को बना रखें है। अबूझमाढ़ नक्सलियों का मजबूत ठिकाना है और झारखंड के नक्सलियों के लिए बूढ़ा पहाड़ सुरक्षात्मक ठिकाना है। पुलिस चाहकर भी ना अबूझमाड़ में घुस पाती है और न ही बूढ़ा पहाड़ में हमला बोल सकती। बहरहाल आज माओवादियों ने छत्तीसगढ़ और झारखंड को अपना गृह राज्य बना लिया है। यह माना जा रहा है कि यदि कांग्रेस सरकार 2023 तक नक्सलवाद खत्म नहीं कर सकी, तो छत्तीसगढ़ को दूसरा नेपाल बनने से रोक पाना मुश्किल हो जाएगा।