Tuesday, August 31, 2021

दर्द की नई तहरीर..



मयंक पांडेय की ‘पलायन पीड़ा प्रेरणा’आम आदमी के दर्द को नए तरीके से रेखांकित करती है। इसमें कोरोना काल की पचास जीवंत कथाएं हैं। किताब की कथा पाठक को झकझोर देती है। हर कथा के दर्द में एक सवाल है। जो कहते हैं 70 साल में कुछ नहीं हुआ। उन्होंने छह साल में आम आदमी को ऐसा दर्द क्यों दे दिया, जो 70 साल के दर्द से भी बहुत ज्यादा है। लोग घरों में कैद थे, मगर सरकार चल रही थी। लोग भूखे प्यासे थे। पैरों में जिन्दगी का दर्द लेकर सड़कों पर चल रहे थे। मगर, सरकार एसी कमरे में थी। आदमी के दर्द की व्याख्या बहुत मुश्किल है।

हर दर्द और छटपटाहट की वजह सिर्फ गरीबी नहीं होती। कंधो पर पुत्र की लाश ढोने वाले आज के हरिश्चन्द्र से सरकार ने कभी नहीं पूछा कि,उसके पेट की भूख कैसी है। आज भी अस्पतालों में पैसा दिये बगैर अपने परिजनों का शव नहीं मिलता। जिस बेटी के लिए माॅ अपनी कई रातों की नींद उढ़ा कर बड़ी की हो और जब उसकी शादी की बारी आए तो उसे कन्यादान करने का सौभाग्य न मिले। ऐसी ही एक माॅ सोनिया की ममता का दर्द कितना बड़ा है,सरकार की व्यवस्था नहीं जानती। सोनिया की बेटी का कन्यादान साजिद ने किया।ऐसी कई भावनात्मक कथाओं का हलफनामा है पलायन,पीड़ा प्रेरणा।

जिन्दगी को जीने के लिए कई दर्दो को संभाल कर रखना पड़ता है। लेकिन उन दर्दो को कैसे संभाल के रखेंगे, जो असंवेदनशील सरकार से मिले हैं। व्यवस्था से मिले हैं। कोरोना काल की पचास जीवंत कथाएं पिछले साल की हैं,लेकिन इस साल भी वो दर्द हमारी पलकों पर हैं। आॅसू सूखे नहीं हैं। कोई भी सरकार नहीं जानती आम आदमी के दर्द के आॅसू कैसे होते हैं।

अपने पिता को गुरूग्राम से 13 वर्षीय ज्योति दरभंगा तक साइकिल से लेकर आई। मात्र एक हजार रूपये उसके पास थे। लेकिन उसके मैनेजमेंट की तारीफ करनी पड़ेगी। उसने सेंकेड हैंड की साइकिल 12 सौ रूपये में ली। पाँंच सौ रूपये दी और शेष राशि उधारी कर दी। सात सौ रूपये में घर तक सफर की। महिलाएं गहने को बहुत मानती है। लेकिन संकट से निपटने में उनका योगदान हमेशा सराहनीय रहे हैं। पुर्णे में सात मजदूरों का परिवार था। पैसे खत्म हो गए। घर लौटने के लिए सबकी महिलाओं ने अपने गहने बेचकर बाइक खरीदने की सलाह दी। इसके बाद सात मोटर साइकिल पर 18 लोगों ने सफर शुरू किया।

देश में कोरोना ने कई सांसों को दर्द से जीतना सीखाया। लाॅकडाउन की वजह से दर्द और परेशानियां सिर्फ मजदूरों की पलकों पर ही आकार नहीं ली। बल्कि, घर में रहने वाले भी विषम परिस्थियों का सामना किये। सरकार ने किसी के पास विकल्प नहीं छोड़ा। आज भी स्थिति वही है। सिर्फ राजनीतिक तस्वीरें बदली है। चुनाव होने के बाद, एक बार फिर देश लाॅकडाउन की गिरफ्त हो जाए, तो कैसी हैरानी?

मयंक ने कोरोना की कोख से जन्मी कथाओं को जीवंत कर दिया है। साथ ही कहानियों से जुड़ी कई जानकारियों का भी समावेश किया है। इसलिए किताब उबाऊ नहीं है।। किताब में मजदूरों के पलायन के दर्दो को तरजीह ज्यादा दी गई है। दरअसल मजदूर वर्ग ही लाॅकडाउन के वक्त मीडिया के केन्द्र में था। सरकार थाली और घंटी बजवाती रही। आपदा से कैसे संघर्ष करें,इसके उपाय नहीं बताई। मजदूर इस देश की रीढ़ हैं। उद्योग धंधो की शिराओं में बहने वाला लहू है। किताब तीन खंडों में है। एक पलायन दूसरा पीड़ा और तीसरा प्रेरणा।

इस किताब से पता चलता है कि देश में परेशानियों से लड़ने की हिम्मत किस तरह लोगों ने दिखाई। तकलीफ और परेशानी की गठरी ढोने वालों की मदद किस तरह लोगों ने की। जीवन का मूल्य तभी है, जब हम किसी की मदद कर सकें। यह किताब हर किसी को पढ़नी चाहिए। इससे आम आदमी को विषम परिस्थितियों में जीने का हौसला और हिम्मत मिलती है। साथ ही मन में इंसानियत की भावनाएं किस तरह आकार लेती है उससे रूबरू होने को मिलता है। किताब की कथा वस्तु बांधे रहती है। यह किताब इस कोराना के दूसरे कहर में भी अपनी पहचान बनाये रखेगा,ऐसी उम्मीद है।

किताब - पलायन पीड़ा प्रेरणा
लेखक - मयंक पांण्डेय
कीमत - 250 रूपये
प्रकाशक - प्रलेक प्रकाशन,मुंबई
@ रमेश कुमार "रिपु"
 

मन से हर कोई है मंटो..



सआदत हसन मंटो का अंदाजे बयां सबसे जुदा था। वे इंसानी कमजोरियों से वाकिफ़ थे। उनके अफ़साने के क़िरदार समाज के हैं। यही वजह है कि अवार्गियां, शरारतें, बदमाशियांँ, हरामीपन और निर्लजता से जुदा नहीं हैं उनके किरदार। जिस जमाने में उन्होंने ठंडा गोश्त लिखा था, उस समय समाज इतना बेशर्म नहीं था। काली सलवार या कहे बू’ और खोल दे’ जैसी कहानियों से आज का साहित्य भरा हुआ है। इंडिया टुडे पत्रिका,जो अपने आप को देश की धड़कन कहती है, बकायदा हर साल सेक्स अंक निकालता है। स्त्री और पुरूष के संबंधों को मंटो ने जो देखा वही लिखा। उन दिनों भी स्त्री-पुरूष की फैंटेसी आज से अलग नहीं थी। बस,बेपर्दा नहीं थी।
आज के इराॅटिक ‘ठंडा गोश्त’ और बू" से जुदा नहीं हैं। हैरानी वाली बात है कि इस कहानी को अश्लील कहा गया। जबकि कहानी के नायक को इंसान बनने की बहुत बड़ी सजा से गुजरना पड़ता है। इसर सिंह और कुलवंत के शारीरिक संबंध का जिक्र जिस तरह किया गया है,वह कहानी की जरूरत है। यह कहानी पुरानी मान्यताओं से पर्दा हटाती है। उसके पौरूष का प्रभावशाली बताने के लिए यह तो बताना ही पड़ेगा कि वो पहले कैसेे था। मंटो कहते हैं, इस कहानी का मामला अदालत पहुंँच कर मेरा भुरकस निकाल दिया।
‘खोल दो’ कहानी झकझोर देती है। बेटी के दुपट्टे को बड़ी हिफाजत से रखने वाला पिता स्ट्रेचर में लाश सी पड़ी बेटी को देखकर कहता है कि मैं इसका पिता हूँ। डाॅक्टर कहता है कि खिड़कियाँ खोल दो। दंगाइयों ने इतनी बार बलात्कार करते हैं कि बेजान सकीना 'खोल दो’ सुनती है तो वह अपनी सलवार नीचे कर देती है। बावजूद इसके पिता के मन में खुशी की इक लहर है कि उसकी बेटी जिंदा है। दरअसल यह कहानी बताती है कि बलात्कार के बाद भी जीवन समाप्त नहीं होता। अवसाद में जाने की बजाय फिर से जीने की हिम्मत करें।
सच तो यह है कि आज भी हर लेखक मन से थोड़ा थोड़ा मंटो हैं। उनकी कहानी में काली सलवार,बू और धुंआ किसी न किसी रूप में मौजूद हैं। ’बू‘ कहानी जैसी तन्हाई से केवल मर्द ही नहीं, महिलाएं भी उकताती हैं। यह अलग बात है कि कहानी बू 'पर तो डिफेंस ऑफ इंडिया रूल्स के तहत भी मुकदमा चला।
मेरा मानना है कि मंटो को बदनाम करने वालों की लाॅबी दरअसल मंटो को बदनाम नहीं, बल्कि मशहूर करने के लिए उन्हें कोर्ट तक घसीटा।
बहरहाल ‘काली सलवार’ और ‘बू’ पर चलाये गये मुकदमों में जहां मंटो को बरी किया गया वहीं ‘धुआं’ को लेकर उनकी पहले गिरफ्तारी और जमानत फिर बाद में मुकदमे के फैसले के दौरान दो सौ रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई। मंटो होना इतना आसान नहीं है।
@ रमेश कुमार "रिपु"


 

नए लिबास में व्यंग्य..



समकालीन व्यंग्य के स्वरूप से अलग हटकर नये लिबास में सेवा राम त्रिपाठी का व्यंग्य संग्रह ‘‘हाॅ,हम राजनीति नहीं कर रहे’’ हैं। पठनीय कृति है। नेशनल हाइवे की तरह लम्बे राजनीतिक चरित्र के दोगलेपन, बाजारवाद, धर्म समाज, पुलिस, शिक्षा जगत,विकृत संस्कृति,सरकारी व्यवस्था आदि पर तीखी मिर्ची सी कटाक्ष है। साथ ही सामाजिक मूल्यों की बातों का लहजा भी तीखा है। राजनीति के समूचे कोणों का सामाजिक जीवन पर किस तरह का असर है, उसके बारे में यत्र तत्र दिलचस्प कटाक्ष है। जाहिर सी बात है कि आम भारतीय जीवन में पुर्नविचार की जरूरत है।
राजनीति और समाज की उन पक्षों पर व्यंग्य किया गया है,जिसमें सुधार की जरूरत है। सामाजिक चिंताओं के बीच हर रचना आम व्यक्ति को अगाह भी करती है। जैसा कि ‘टांग अड़ाने का सुख’ क्या है, वही जानता है, जो इसमें निपुर्ण है। हर छोटे-बड़े काम में अपनी टांग अड़ाने के लिए मानो दफ्तर के लोग कसम खाये हुए हैं। बिना नेग लिए कोई भी अच्छा काम नहीं करेंगे। बहुत लोग अड़गे बाजी को हाजमा चूरन की तरह इस्तेमाल करते हैं। इस किताब में कुल 29 व्यंग्य रचनायें हैं।
‘राम प्यारे जी परम प्रसन्न हुए’ से सीख मिलती है,कि कलयुग में प्रसन्न रहने के लिए जरूरी है,कि आम व्यक्ति राम प्यारे जैसा हो। उसके चरित्र का निधन होना जरूरी है। झूठ बोलने का दौरा पड़ना जरूरी है। ‘पेड़ लग रहे हैं’ में एक सवाल छोड़ा गया है, कि जिस तरह वॄक्षारोपण के विज्ञापन होते हैं,उसी तरह मरे पेड़ों का फोटो खीच कर राष्ट्रीय स्तर पर शर्म क्यों नहीं मनाया जाता। समाज में कितने प्रकार के लोग है जो अपना रंग जमाने में लगे रहते हैं उसका चिट्ठा है‘मुद्रायें रंग जमाने की’। गिरगिट की तरह नेता रंग बदलते हैं। यह गिरगिट का सीधा अपमान है। इसलिए कि उसके पास सीमित रंग है,जबकि नेताओं के पास रंगों की फैक्ट्री है।
‘प्रजातंत्र ठेके पर’ में यह बताया गया है, कि हर व्यक्ति ठेके के महत्व को अब जान गया है। ठेका लेना एक राष्ट्रीय कार्यक्रम है। इसका प्रजातंत्र की कार्यशाला से सीधा सरोकार है। यानी देश में हर चीज ठेके पर है। देश में बिखरी समस्याओं के बारे में आम आदमी यही कहता है ‘मेरे सोचने से क्या होगा’।क्यों कि घर का जनतंत्र झेलने में लोहे के चने चबाने पड़ते हैं। वैसे घर के जनतंत्र के चावल से देश के जनतंत्र की हांडी की तासीर को परखा जा सकता है। ‘रागे हुजूर की महत्ता अद्भुत है। इसमें इतनी ताकत है, कि तीनों लोक, चौदह भुवनों तक सुयश पाने का सुख है। रागे हुजूर का महत्व समझने वाले वैताल को भी अपने पाले में कर सकते हैं। ‘हाॅ हम राजनीति नहीं कर रहे’ यह उस व्यवस्था और समाज की गांठ खोलती है,जहांँ लोग अपनी राजनीति को छिपाते हैं। जैसा कि आरएसएस कहता है, कि वह राजनीति नहीं करता। लेकिन वह कभी नहीं बताया कि भाजपा और अन्य इकाइयों से उसके रिश्ते क्या हैं? आदर्श व्यवस्था की वकालत करने वालों के दोहरे चरित्र के अंदर के सच को यह किताब में साफ-साफ दिखाती है।
‘मन की गांठों का गणित जिन्दगी की ज्यामितति से अलग है। पटाने की पटखनी से हर कोई चित हो जाता है। दीनानाथ के विकास की कला को हर किसी को समझना चाहिए। ‘इमेज है तो लाइफ है’भावनात्मक रचना है। हर किसी को लगता है कि समाज में इमेज नहीं तो लाइफ नहीं। पुलिस,सत्ता पक्ष,विपक्ष हर किसी को अपने इमेज की चिंता है, पर गरीब को नहीं। ‘चुनाव यानी ठेंगा’ एक सच की बानगी है। चुनाव ठेंगा दिखाने के लिए जीते जाते हैं। वोटर भी अब प्रत्याशी के वायदे पर भरोसा नहीं करता,वह भी दूसरे को वोट देकर ठेंगा दिखाने लगा है। ‘पीएचडी का मारा’ की सच्चाई यह है कि विभागाध्यक्ष बनाने का नहीं बल्कि, खुद के उल्लू बन जाने का धंधा है। ‘कुलपति बनने का दिल करता है’ आज की राजनीतिक सच्चाई की बानगी है। सत्ता तक पहुंच है, तो आपका भी मन कुलपति बनने की सोच सकता है।
कहीं -कहीं व्यंग्य संवाद शैली में शहरी भाषा के साथ ही देहाती पुट भी है। धरती के प्रेत‘ शीर्षक की रचना पढ़ते वक्त लगता है, कि लेख है। इसलिए कि धरती में नाना प्रकार के जिंदा प्रेत हैं। जिनसे हर वर्ग त्रस्त है। खासकर पटवारी और पुलिस से। पटवारी किसानों की नींदें उड़ाये रखने का ठेका ले रखे हैं। किसान इसकी शिकायत तहसीलदार से करता है। वे कहते हैं,तुम्हें गांव में नहीं रहना है! पटवारी से बैर बिसाहते हो। उस पर मेरा भी वश नहीं चलता। जाहिर सी बात है, कि पटवारी नये जमाने का नई सभ्यता का रिफाइण्ड प्रेत हैं। समाज में प्रेतों का उत्पादन लार्ज स्केल पर हो गया है।
मंत्री जी रोज आया करें, गर्व से कहो हम नकलची हैं,मूल्यांकन जारी है,ये पीछे पड़ जाने वाले,खाने पचाने की सस्कृति आदि रचनायें हमारे रोजमर्रा की जिन्दगी के दिलचस्प खुलासे करती हैं। व्यवस्था के चेहरे से खुलकर नकाब उतार कर लेखक ने अंदर का सच दिखाया है। मानवीय सरोकार के पक्ष के साथ यह किताब चालू व्यंग्य से अलहदा हैं। किताब की हर रचना में कुछ अंश ऐसे भी हैं कि पाठक पढ़ते -पढ़ते कोट करने से अपने आप को नहीं रोक सकता।
लेखक - सेवाराम त्रिपाठी
प्रकाशक -कलमकार मंच
कीमत- 150रुपये
@रमेश कुमार "रिपु"

 

Tuesday, July 27, 2021

बस्तरियों को लुभाने रस्साकशी

 
सिलगेर कांड से आदिवासी और नक्सली दोनों नाराज हैं। और इसका फायदा विपक्ष उठाना चाहता है। चूंकि बस्तर में धर्मातरण जोरों पर है। ऐसे में संघ के अनुकूल नंेतृत्व मिलने पर वह बीजेपी के लिए संगठन को सक्रिय कर सकता। जिससे कांग्रेस को नुकसान हो सकता है। वैसे बीजेपी की एंटी इनकमबैसी के चलते कांग्रेस की सरकार बनी थी। सवाल यह है कि बस्तर का नराज आदिवासी क्या दोबारा कांग्रेस को पूरी बारह सीट देगा?


0 रमेश कुमार ‘रिपु’
बस्तर में अभी तक अर्थशास्त्र का गठबंधन राजनीति की दिशा तय करता आया है। लेकिन कोरोना की वजह से उद्योग धंधे बंद होने की वजह से नक्सलियों के आर्थिक स्त्रोत बंद हो गए हैं। इस वजह से नक्सली कमजोर हो गए हैं। कोई नेतृत्व नहीं होने की वजह से  नक्सली अब नई राजनीति पर उतारू हो गए हैं। सरकार को घेरने की राजनीति शुरू कर दिये हैं। वैसे माओवादियों के एजेंडे में न तो कांग्रेस है और न ही गैर कांग्रेसी सरकारें। उनके एजेंडे में पूरा छत्तीसगढ़ है।   
सिलगेर कांड की आड़ में नक्सलियों ने आदिवासियों को आगे करके भूपेश सरकार को सकते में डाल में दिया हैं। कांग्रेस नहीं चाहती,कि आदिवासी उनसे छिटक जायें। आदिवासियों को रिझाने के लिए मुख्यमंत्री भूपेश बघेल नेे आबकारी और उद्योग मंत्री कवासी लखमा को बस्तर, दंतेवाड़ा, नारायणपुर, बीजापुर और कोण्डागांव का प्रभारी मंत्री बना दिये हैं। लखमा इसी क्षेत्र में सुकमा जिले के कोंटा से विधायक हैं। सुकमा का प्रभार पीएचई मंत्री गुरु रुद्र कुमार को दिया गया है। जबकि उत्तर बस्तर यानी कांकेर का प्रभारी महिला एवं बाल विकास मंत्री अनिला भेंडिया के जिम्मे होगा। इससे पहले आदिवासी विकास मंत्री डॉ. प्रेम साय सिंह बस्तर के प्रभारी थे। कांकेर,नारायणपुर और कोण्डागांव पीएचई मंत्री गुरु रुद्र कुमार के प्रभार में था। वहीं बीजापुर, दंतेवाड़ा और सुकमा जिले के प्रभारी राजस्व मंत्री जय सिंह अग्रवाल को बनाया गया था। चर्चा है कि यह बदलाव बस्तर क्षेत्र में आदिवासियों में सरकार और कांग्रेस के प्रति बढ़ती नाराजगी को देखते हुए लिया गया है।
कांग्रेस को लगता है कि आदिवासी नेता के रूप में कवासी लखमा कांग्रेस की खाली जगह को भर सकते हैं। कवासी लखमा ऐसे आदिवासी नेता हैं,जो आदिवासियों के बीच लोकप्रिय हैं। बीजेपी को बलीराम कश्यप के निधन के बाद कोई नेता नहीं मिला जो बलीराम कश्यप की जगह ले सके। झीरम कांड मंे कांग्रेस की बड़े नेताओं की लीडरी ही खत्म हो गई थी।
बस्तर में नक्सलियों के कमजोर होने से राजनीति भी शून्य हो गई है। लेकिन सिलगेर कांड से एक बार फिर बस्तर सुर्खियों में है। चूंंिक कांग्रेस अपने दम पर बस्तर की बारह सीट नहीं पाई है। बीजेपी के पन्द्रह साल से सत्ता में रहने से उसके एंटी इनकमबैसी का लाभ कांग्रेस को मिला। संघ डाॅ रमन सिंह से नाराज चल रहा था। उसने हाथ खींच लिया। संगठनात्मक ढांचा कमजोर हो गया। चंूकि डाॅ रमन सिंह बार-बार दोहराते थे, कि उनकी सरकार बनी तो 2022 तक नक्सलवाद खत्म कर देंगे। नक्सलियों को भी लगा डाॅ रमन सिंह की सरकार आई तो उनका वजूद खतरे में पड़ जायेगा। राजीव भवन में कांग्रेस नेता राजबब्बर का बयान नक्सलियों पर जादू कर दिया। नक्सली क्रांतिकारी हैं। वो क्रांति करने निकले हैं,उन्हें कोई रोके नहीं। बस्तर की सभी सीटें कांग्रेस के हाथ में सौंप दी।
नक्सली जैसा चाह रहे थे, वैसा कांग्रेस की सरकार में हुआ नहीं। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल आदिवासियो को रिझाने के लिए कहा, कि सरकार आदिवासियों को पट्टा देना चाहती है,ेलेकिन नक्सली नहीं चाहते कि ऐसा हो। इस पर नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक ने कहा,सरकार बताये कितने आदिवासियों को सरकारा पट्ट देना चाहती है। नक्सलियों की आड़ में सरकार आदिवासियों के हितों की अनदेखी न करे।’’
मुख्य मंत्री के बयान और सिलगेर कांड ने आदिवासियों और नक्सलियों दोनों को नाराज कर दिया है। अब सर्व समाज के अध्यक्ष अरविंद नेताम ने कहा,कांग्रेस सरकार ने आदिवासियों का भरोसा खो दिया है। जब तक सिलगेर मामले का समाधान नहीं निकलेगा, आंदोलन जारी रहेगा। सिलगेर कांड के विरोध में आंदोलन प्रदेश में जितना लंबा खिंचेगा कांग्रेस की छवि और राजनीतिक शाख पर उतना ही बट्टा लगेगा। अन्य संभाग में भी कांग्रेस को सियासी नुकसान का अंदेशा बढ़ेगा।  
धर्मांतरण के खतरे
बस्तर में धर्मांतरण जोरो से चल रहा है। ईसाई मिशनरी पूरी तरह सक्रिय है। संघ के अनुकूल लीडर मिलने पर वह धर्मांतरण के खिलाफ खड़ा होकर बीजेपी को खड़ा कर सकता है। इससे बस्तर में कांग्रेस को बहुत बड़ा राजनीतिक नुकसान होने का अंदेशा है। धर्मांतरण के खिलाफ संघ के खड़े होने पर होने वाले सियासी क्षति से बचने कांग्रेस ने आदिवासी नेत्री सोनी सोरी को अपने पक्ष में करने कवासी लखमा को उसके घर भेज दिया। प्रभारी मंत्री कवासी लखमा देशी अंदाज में सभी के बीच बैठकर खाना खाया और सल्फी भी पी। ऐसा इसलिए किया गया ताकि आदिवासियों को लगे सरकार उनके साथ है। और सर्व समाज आंदोलन रद्द कर दे।   
कांग्रेस में नहीं जाऊँगीः सोनी
सियासी गलियारों में चर्चा है कि सोनी सोरी को कांग्रेस में शामिल करने के लिए कवासी को उनके घर भेजा गया। कांग्रेस सोनी सोरी पर विधान सभा चुनाव में दांव लगाना चाहती है। वहीं स्थानीय कांग्रेसियों की चिंता बढ़ा गई है। हालांकि सोनी सोरी ने इस दावत को राजनीति से परे, पारिवारिक बताया।  
बस्तरियेे पछता रहेः शर्मा
बस्तरिये हमारे हैं का दावा कांग्रेस कर रही है,वहीं बीेजेपी के बस्तर प्रभारी शिवरतन शर्मा कहते हैं,जनता कांग्रेस से त्रस्त हो गई है। बस्तर क्षेत्र में एक भी विकास कार्य नहीं हुए हैं। बस्तर सांसद दीपक बैज ने अपनी नाक कटवा ली है। लोगों को मूलभूत सुविधा दिला पाए। 2023 के चुनाव में बीजेपी बस्तर संभाग की सभी सीटें जीतेगी। बस्तरियों को पछतावा है, कि वो कांग्रेस को चुनकर गलत किये।
बस्तरियों की राय है,सोनी सोरी के घर में कवासी जमीन पर बैठकर पत्तल में भोजन करके आदिवासियों को खुश नहीं कर सकते। मुख्यमंत्री बताएं कि उनकी पुलिस कब तक आदिवसियों को नक्सली कहकर गोली मारती रहेगी। सिलगेर कांड के मामले को यदि नजर अंदाज कर देंगे,तो आगे चलकर बस्तर में और कई सिलगेर कांड होंगे। क्यों कि अब तक बस्तर में 36 कैंप पेसा कानून के खिलाफ बने हैं। नौ कैंप और बनना है। यानी पुलिस की गोली में फिर किसी आदिवासी का नाम लिखा होगा। पूर्व केंद्रीय मंत्री अरविंद नेताम ने कहा, आदिवासियों को लेकर सरकार की क्या मंशा है,वो जाहिर करे। आदिवासियो के साथ जमीन पर बैठकर खाने की राजनीति बंद करे।’’
बहरहाल बस्तर की बारह सीट को लेकर सत्ताई रस्साकशी का खेल कब तक चलेगा,बस्तरिये भी नहीं जानते।
 
 
   
 













बस्तर में अब भी अंधा युग

   
नक्सल प्रभावित बस्तर के सिलगेर में आदिवासी अपनी जमीन पर सुरक्षा बलों के बने कैंप का विरोध किया तो उन्हें गोली मार दी गई। मृतकों का नाम नहीं जानने वाली पुलिस ने उन्हें नक्सली बताकर विवाद खड़ा कर दिया। अब सर्व समाज की नाराजगी के चलते विवाद सरकार के गले की फांस बन गया है। प्रदेश भर में सरकार के खिलाफ आंदोलन की चेतावनी से कांग्रेस को आदिवासी वोट बैंक खिसकने की चिंता हो रही है। 


0 रमेश कुमार ‘रिपु’
              अब भी बस्तर आदिवासियो के लिए अंधा युग है। पेसा कानून के मुताबिक ग्राम सभा की अनुमति के बगैर कैंपों का निर्माण नहीं किया जा सकता। लेकिन पिछले एक बरस में तीस से अधिक सुरक्षा बल के लिए आदिवासियों की जमीन पर कैंप बनाए गए हैं। वहीं कृषि मंत्री रविन्द्र चैबे ने कहा, अभी नौ और सीआरपीएफ के कैंपों के निर्माण होंगे। यानी आदिवासियों की जमीन पर जबरिया कब्जा किए जाएंगे और फिर विवाद होगा। आदिवासी अपनी जमीन पर कैंप बनाए जाने के खिलाफ प्रदर्शन किया तो उन्हें गोली मार दी गई। इतना ही नहीं, पुलिस को मृतकों को नाम पता नहीं होने के बाद, उन्हें नक्सली घोषित कर दी। जिससे मामला गरमा गया है। अब सरकार की सांस फूलने लगी। 28 दिनांे तक चले ग्रामीण आदिवासियों के प्रदर्शन को कुचलने कई बार पुलिस ने लाठी चार्ज किया। सर्व समाज के दखल देने पर सरकार को एहसास हुआ कि ऐसे में बस्तर की 12 सीट जो उनके पास है उसमें नुकसान हो सकता है। वैसे सरकार और सर्व समाज की वार्ता से कोई हल नहीं निकला। 
गौर तलब है कि भूपेश सरकार ने सिलगेर विवाद की जांच के लिए सांसद दीपक बैज की अध्यक्षता में नौ सदस्यीय कमेटी गठित की। लेकिन कमेटी में बीजेपी और अन्य पार्टी के किसी भी सदस्य को शामिल नहीं किया गया। कमेटी की जांच रिपोर्ट सरकार ने उजागर नहीं की। सरकार की ओर से गोलीकांड के जिम्मेदारों पर कार्रवाई होता न देखकर, बस्तर के अलग-अलग हिस्सों में आंदोलन फिर से शुरू हो गया है।  
सर्व आदिवासी समाज के अध्यक्ष सोहन पोटाई की अगुवाई में मुख्यमंत्री निवास पर प्रतिनिधियों ने मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के समक्ष नक्सल समस्या और नक्सली बताकर आम आदिवासियों को प्रताड़ित किए जाने का मुद्दा उठाया। सरकार नक्सलियों से बातचीत शुरू करे अथवा उन्हें बातचीत के लिए अधिकृत करे। हम सभी उनके नेताओं से बातचीत करेंगे। पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से शुरू हुआ नक्सलवाद खत्म हो गया। आंध्र-तेलंगाना में खत्म हो गया,तो छत्तीसगढ़ में यह समस्या खत्म क्यों नहीं हो रही है?
मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कहा, उनकी सरकार शांति और विकास के लिए कटिबद्ध है। वे हर उस व्यक्ति से चर्चा करने के लिए तैयार हैं,जो भारत के संविधान में आस्था रखता है।’’ वहीं सर्व आदिवासी समाज के अध्यक्ष सोहन पोटाई ने कहा,मुख्यमंत्री के साथ बातचीत के बाद भी कोई हल नहीं निकाला।  ऐसे में हम 19 जुलाई से आंदोलन के फैसले पर कायम हैं। प्रत्येक ब्लॉक में आदिवासी समाज के लोग सड़क पर उतर कर अपनी बात रखेंगे। यह सरकार की आर्थिक नाकाबंदी होगी।  
गौरतलब है कि बीजापुर और सुकमा जिले की सीमा से लगा सिलगेर गाँव में सुरक्षा बल के कैंप बनने का ग्रामीणों ने 12 मई को विरोध करते हुए धरना दिया। ग्रामीणों की मानें तो कैंप के निर्माण के लिए ग्राम सभा का आयोजन नहीं किया गया। पुलिस ने 17 मई को विरोध को कुचलने के लिए लाठी चार्ज किया। इसके बाद बगैर किसी सूचना के गोली मार दी। पुलिस की गोली से चुटवाही निवासी कवासी भगत, गुडेम के सुग्गा मुरली और तिम्मापुर के भीमा उईका की घटनास्थल पर ही मौत हो गई। एक गर्भवती महिला की बाद में मौत हो गई। दर्जनों लोग घायल हैं। सुरक्षा बलों ने आठ अन्य आदिवासियों को अवैध रूप से अपनी हिरासत में ले लिया था। हालांकि अब इन्हें सुरक्षा घेरा तोड़ा,और कैंप पर हमला करने के आरोप में जेल भेजा जा चुका है।
पुलिस का कहना है कि 17 मई की फायरिंग में मारे गए तीनों लोग माओवादी संगठन से जुड़े हुए थे। सुकमा एस.पी. के एल धु्रव कहते हैं,माओवादियों के बहकावे में आदिवासी किसान सुरक्षाबल के कैंप का विरोध कर रहे हैं। बस्तर के आई.जी पुलिस सुंदरराज पी का कहना है,पुलिस कैंप के कारण माओवादियों का अस्तित्व खतरे में पड़ रहा है। इसलिए वो गाँव वालों को दबाव डालकर कैंप का विरोध करा रहे हैं।
हालाँकि पुलिस के दावे के उलट गोली कांड की जाँच के लिए पहुँचे समाजिक कार्यकत्र्ता सोनी सोरी,पूर्व विधायक मनीष कुंजाम का दावा है, कि मारे गये सभी तीन लोग और गोली कांड में घायल लगभग दो दर्जन लोगों में से कोई भी माओवादी नहीं था। पुलिस ने अकारण ही गोली चलाई। प्रदर्शनकारी किसान थे। पुलिस की गोली नक्सलियो को ही क्यों लगी? जबकि सभी निहत्थे थे। पुलिस को संयम रखना चाहिए था न कि गोली चलानी थी।  
नक्सलियों को मुआवजा क्यों
सवाल यह है कि मृतकों का नाम पुलिस नहीं जानती फिर कैसे उन्हें नक्सली घोषित कर दी। यदि वे नक्सली थे तो भूपेश सरकार ने 23 मई को दस-दस हजार रुपए मुआवजा क्यों दी? मृतक के परिजनों ने मुआवजा राशि यह कहकर लौटा दिया,कि मृतक नक्सली थे तो फिर आर्थिक मदद क्यों दी जा रही है। अब सुरक्षा बल और भूपेश सरकार शक के दायरे में है। सामाजिक कार्यकत्र्ता सोनी सोरी कहती हैं,घटना के दिन कुछ आदिवासी गायब थे,जिन्हें स्थानीय लोगों के दबाव में सामने लाया गया,ताकि पुलिस बाद में उन्हें नक्सली बताकर एनकाउंटर न कर दे।   
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
छत्तीसगढ़ पीयूसीएल के अध्यक्ष डिग्री प्रसाद चैहान ने कहा, हम मांग करते हैं कि सुरक्षाबलो ंके खिलाफ हत्या का मामला दर्ज हो। सुप्रीम कोर्ट ने पीयूसीएल बनाम महाराष्ट्र राज्य के मामले में वर्ष 2014 में यह निर्णय दिया है,कि मुठभेड़ों के मामलों में पीड़ितों की ओर से भी एक काउन्टर एफआईआर पुलिस अर्धसैनिक बलों और दोषी अधिकारियों के खिलाफ अनिवार्य रूप से दर्ज होनी चाहिए। यह गोलीकांड बस्तर में  ग्रामीणों के विरुद्ध हिंसा और मानवाधिकारों पर सुरक्षा बलों की हमले की वारदातों की कड़ी का एक हिस्सा है। जिसका तुरंत राजनैतिक समाधान ढूंढने की जरूरत है।  
प्रदर्शनकारियांे ने रखी मांग
मामले की जांच सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज करें। जांच कमेटी में अनुसूचित और गैर आदिवासी शामिल किए जाएं। सिलगेर से पुलिस कैंप को हटाया जाए। मृतकों की स्मृति में जो स्मारक बनाए गए हैं वे न तोड़े जाएं। गोलीबारी करने वाले जवानों के खिलाफ मामला दर्ज कर उनकी गिरफ्तारी की जाए। कैंप का प्रस्ताव पास करने वाली ग्राम सभा की जांच हो।
फिर गोली क्यों मारी
प्रदर्शनकारी आदिवासियों का कहना है,यदि सरकार वाकई हमारा विकास चाहती है तो उसे आंगनबाड़ी, स्कूल,अस्पताल, हैंडपंप आदि की सुविधाएं उपलब्ध कराए। सरकार उद्योगपतियों को लाभ पहुचाने के लिए सड़क बनवा रही है। उसकी सुरक्षा के लिए ही पुलिस कैंप स्थापित किए जा रहे हैं। हमें हमारी जमीन से बेदखल करने के लिए कैंप क्यों बनाया गया? गौरतलब है कि सिलगेर पंचायत के तीन गाँवों के अलावा आस-पास के कम से कम 40 गाँवों के लोग केंद्रीय रिजर्व पुलिस फोर्स सीआरपीएफ की 153वीं बटालियन के कैंप के खिलाफ सड़कों पर  उतरेे। प्रदर्शनकारियों में शामिल अरलमपल्ली गांव के सोडी दुला कहते हैं कैंप हमारे भले के लिए बनाया गया है,तो आदिवासियों को गोली क्यों मारी। सड़के जितनी चैड़ी बनाई जा रही है, आदिवासियों के किस काम की।
बिलासपुर हाईकोर्ट की अधिवक्ता अक्षरा अमित कहती हैं बस्तर में यह रटा-रटाया जवाब है,कि गोली मारो और माओवादी बता दो। माओवादी बता देने के बाद सभ्य समाज की ओर से भी कोई सवाल नहीं पूछा जाता और आदिवासी किसान की मौत को,माओवादी की मौत मान कर चुप्पी साध ली जाती है।
सुकमा में मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी रहे प्रभाकर ग्वाल का आरोप है कि सुरक्षा बल अक्सर ही बेकसूर और गरीब आदिवासियों को प्रताड़ित करते हैं। इसके लिए वे उनके विरुद्ध झूठे प्रकरण तक कायम करने से नहीं चूकते। छत्तीसगढ़ की जेलें ऐसे बेकसूर आदिवासियों से भरी पड़ी हैं। सालों से उनके प्रकरणों में कोई प्रगति नहीं हुई है। बहरहाल बस्तर में सुरक्षाबलों की मौजूदगी वहांँ के स्थानीय निवासियों की रक्षा नहीं कर रही। पूर्व के कई मामलों की जांच के लिए आयोग बने पर नतीजा धरातल पर नहीं दिखा।
बहरहाल सिलगेर में सीआरपीएफ कैम्प के विरोध का अनसुलझा विवाद कांग्रेस को भारी पड़ सकता है। सर्व आदिवासी समाज सिलगेर में हुई गोलीबारी और घटना के बाद सरकार की प्रतिक्रिया से काफी नाराज है। इस समय बस्तर की सभी 12 सीटों पर कांग्रेस का कब्जा है,लेकिन कांगेस को भी लगने लगा है कि यदि आदिवासी समाज नाराज हो गया तो कांग्रेस के लिए चुनाव में नुकसान हो सकता। गौरतलब है कि भाजपा के शासनकाल में सारकेगुड़ा में ऐसा ही हुआ था। पुलिस ने पंडुम त्यौहार मना रहे गांव वालों को मार डाला। बाद में नक्सली बता दिया। जांच में पुलिस वाले दोषी पाए गए लेकिन किसी को सजा नहीं हुई। जिसका सियासी खामियाजा बीजेपी को उठाना पड़ा। सर्व आदिवासी समाज के कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष बी.एस रावटे ने कहा,सिलगेर कांड पर न्याय नहीं मिलने से भड़का सर्व आदिवासी समाज 19 जुलाई से प्रदेश भर में आंदोलन शुरू करने जा रहा है। प्रदर्शन का पहला चरण 9 अगस्त आदिवासी दिवस तक चलेगा। सरकार ने बात नहीं मानी तो यह आंदोलन लंबा खिंचेगा।
इन दर्दों का कोई मरहम नहीं
बस्तर में सुरक्षाबलों पर आदिवासियों के घर जलाने, बलात्कार और हत्या के आरोप कई बार लगे। जांच आयोग गठित हुए पर दर्द कम नहीं हुए।
0 वर्ष 2012 में 28-29 जून की दरम्यानी रात सारकेगुडा में हुई मुठभेड़ में सुरक्षा बलों ने 17 नक्सलियों के मारे जाने का दावा किया था। मारे जाने वालों में सात नाबालिग भी शामिल थे। स्थानीय आदिवासियों का आरोप था,कि बीज पंडूम त्योहार मनाने के लिए आयोजित बैठक में सुरक्षाबलों द्वारा अकारण निर्दोष ग्रामीणों की हत्या की गई है।  
0 वर्ष 2013 में 17-18 मई की दरम्यानी रात को एड़समेटा में हुई मुठभेड़ में आठ नक्सली जिसमें तीन नाबालिग भी थे, के मारे जाने का दावा सुरक्षाबल ने किया था। ग्रामीणों के विरोध पर बयान बदलते हुए सुरक्षाबलों द्वारा क्रॉस फायरिंग में इनकी मौत की बात कही। इस घटना की जांँच तीन मई 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को सौपीं। प्रकरण न्यायालय में अभी विचाराधीन है।
0 12 दिसंबर 2017 की रात तिम्मापुर में बने सीआरपीएफ कैंप पर नक्सली हमले का दावा सुरक्षाबलों ने किया था। इस मुठभेड़ में नंदू पुनेम नामक युवक मारा गया। जबकि पुनेम कैंप के जवानों के साथ क्रिकेट खेलता था।
0 सितंबर 2016 में सीआरपीएफ ने कहा बुरगुम के जंगलों में दो छात्रों की मौत नक्सली मुठभेड़ में हुई। जबकि गाँव वालों का अरोप है,कि परिवार में हुई मौत की सूचना देने बारसूर इलाके से आए सोनाकु और बिज्नो नाम के दोनों लड़कों को पुलिस उस वक्त उठा ले गई,जब वे अपने रिश्तेदार की झोपड़ी में सो रहे थे।
 0 जनवरी 2019 गमपुर में हुई एक मुठभेड़ में सुरक्षा बल ने भीमा और सुखमती को नक्सली बताकर मार डाला था।स्थानीय लोगों का आरोप था नाबालिग सुखमती की हत्या के पहले उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया था।
सुरक्षाबलों की कार्यप्रणाली का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है,कि वर्ष 2012 में सुकमा जिले के ताड़मेटला में 160, तिम्मापुर में 59, और मोरपल्ली में 33 घरों को जला दिया गया था। अक्टूबर 2016 में सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत चार्जशीट में सीबीआई ने यह माना कि मोरपल्ली गांव के माड़वी सुला तथा पुलनपाड़ गांव के बड़से भीमा और मनु यादव की हत्या की गई। मोरपल्ली गांव में ताड़मेटला की एक महिला के साथ बलात्कार की पुष्टि भी सीबीआई ने की थी।   
 

 













Sunday, May 16, 2021

मन से हर कोई है मंटो

 ▪️मन से हर कोई है मंटो..

सआदत हसन मंटो का अंदाजे बयां सबसे जुदा था। वे इंसानी कमजोरियों से वाकिफ़ थे। उनके अफ़साने के क़िरदार समाज के हैं। यही वजह है कि अवार्गियां, शरारतें, बदमाशियांँ, हरामीपन और निर्लजता से जुदा नहीं हैं उनके किरदार। जिस जमाने में उन्होंने ठंडा गोश्त लिखा था, उस समय समाज इतना बेशर्म नहीं था। काली सलवार या कहे बू’ और खोल दे’ जैसी कहानियों से आज का साहित्य भरा हुआ है। इंडिया टुडे पत्रिका,जो अपने आप को देश की धड़कन कहती है, बकायदा हर साल सेक्स अंक निकालता है। स्त्री और पुरूष के संबंधों को मंटो ने जो देखा वही लिखा। उन दिनों भी स्त्री-पुरूष की फैंटेसी आज से अलग नहीं थी। बस,बेपर्दा नहीं थी।


आज के इराॅटिक ‘ठंडा गोश्त’ और बू" से जुदा नहीं हैं। हैरानी वाली बात है कि इस कहानी को अश्लील कहा गया। जबकि कहानी के नायक को इंसान बनने की बहुत बड़ी सजा से गुजरना पड़ता है। इसर सिंह और कुलवंत के शारीरिक संबंध का जिक्र जिस तरह किया गया है,वह कहानी की जरूरत है। यह कहानी पुरानी मान्यताओं से पर्दा हटाती है। उसके पौरूष का प्रभावशाली बताने के लिए यह तो बताना ही पड़ेगा कि वो पहले कैसेे था। मंटो कहते हैं, इस कहानी का मामला अदालत पहुंँच कर मेरा भुरकस निकाल दिया।


‘खोल दो’ कहानी झकझोर देती है। बेटी के दुपट्टे को बड़ी हिफाजत से रखने वाला पिता स्ट्रेचर में लाश सी पड़ी बेटी को देखकर कहता है कि मैं इसका पिता हूँ। डाॅक्टर कहता है कि खिड़कियाँ खोल दो। दंगाइयों ने इतनी बार बलात्कार करते हैं कि बेजान सकीना 'खोल दो’ सुनती है तो वह अपनी सलवार नीचे कर देती है। बावजूद इसके पिता के मन में खुशी की इक लहर है कि उसकी बेटी जिंदा है। दरअसल यह कहानी बताती है कि बलात्कार के बाद भी जीवन समाप्त नहीं होता। अवसाद में जाने की बजाय फिर से जीने की हिम्मत करें।


सच तो यह है कि आज भी हर लेखक मन से थोड़ा थोड़ा मंटो हैं। उनकी कहानी में काली सलवार,बू और धुंआ किसी न किसी रूप में मौजूद हैं। ’बू‘ कहानी जैसी तन्हाई से केवल मर्द ही नहीं, महिलाएं भी उकताती हैं। यह अलग बात है कि कहानी बू 'पर तो डिफेंस ऑफ इंडिया रूल्स के तहत भी मुकदमा चला।


मेरा मानना है कि मंटो को बदनाम करने वालों की लाॅबी दरअसल मंटो को बदनाम नहीं, बल्कि मशहूर करने के लिए उन्हें कोर्ट तक घसीटा। 


 बहरहाल ‘काली सलवार’ और ‘बू’ पर चलाये गये मुकदमों में जहां मंटो को बरी किया गया वहीं ‘धुआं’ को लेकर उनकी पहले गिरफ्तारी और जमानत फिर बाद में मुकदमे के फैसले के दौरान दो सौ रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई। मंटो होना इतना आसान नहीं है।

@ रमेश कुमार "रिपु"


Saturday, May 15, 2021

लाल गलियारे में कोरोना





जिस लाल गलियारे में आज तक पुलिस नहीं पहुंँच सकी वहाँं कोविड वायरस ने दस्तक देकर खलबली मचा दिया है। मौत की महामारी के डर से संगठन छोड़ कर नौ नक्सली भाग गए। कई इनामी नक्सलियों की जानें चली गई और कई जान बचाने सरेंडर कर रहे हैं। सवाल यह है कि,क्या कोरोना के भय से लाल गलियारा खाली हो जाएगा?


0 रमेश कुमार ‘रिपु’
                   इन दिनों नक्सली दहशत में हैं। क्यों कि कोरोना वायरस लाल गलियारा पहुंँच कर कहर मचा रहा है। कोविड महामारी की दूसरी लहर का माओवादियों में खौफ साफ-साफ दिख रहा है। 11 मई को सुरक्षा बलों को गंगूलर इलाके में नक्सलियों के कैंप में छापेमारी के दौरान कामरेड वी.एम का एक पत्र मिला। पत्र 25 लाख की इनामी नक्सली लीडर सुजाता के नाम है। पत्र में लिखा है प्रिय कामरेड दीदी। बस्तर और दरभा डीविजन के कई नक्सली नेताओं की मौत कोरोना की वजह से हुई है और कई गंभीर रूप से बीमार हैं। नौ नक्सली भाग गए हैं। पत्र में लिखा है कि, जिंदा रहंेगे तभी क्रांतिकारी आंदोलन आगे बढ़ा सकते हैं।
जाहिर सी बात है कि नक्सली कैडर के कई नक्सली कोरोना वायरस की चपेट में हैं। पुलिस का मानना है कि करीब 100 से ज्यादा नक्सली कोरोना और फूड पॉइजनिंग की चपेट में आकर बीमार हो चुके हैं। इनमें इनामी नक्सली सुजाता, जयलाल, दिनेश सहित अन्य नक्सलियों के गंभीर होने की पुख्ता सूचना है। जिन नक्सलियों की मौत हुई है उनके नामों का खुलासा अभी नहीं हुआ है। लेकिन ये बड़े कैडर के नक्सली बताए जा रहे हैं। लाल गलियारा छोड़कर जाने वालों में सेक्शन कमांडर बुधराम, विमला, कोंटा प्लाटून से रितेश,जोगा और दरभा डिवीजन से नागेश, सुमित्रा, अनिता का नाम पत्र में है।  पत्र में यह भी लिखा है कि जो दवाइयां उपलब्ध हैं उसका असर नहीं हो रहा है।  
दक्षिण बस्तर में रूपी और दरभा डिवीजन से छह कमांडर हुंगा, देवे, गंगा, सुदरु, मुन्नी और रीना की मौत हो गई है। पुलिस का दावा है कि लाल गलियारे में सौ से ज्यादा नक्सलियों के संक्रमित होने और उनमें ए.पी.स्ट्रेन के खतरे की आशंका है। चंूकि ये इलाका आन्ध्र प्रदेश और तेलंगाना की सीमा से लगा है, नक्सली आते-जाते रहते हैं। ऐसे में नक्सलियों में कोरोना के ए.पी स्ट्रेन फैलने की आशंका भी है। अगर ऐसा है तो अंदरूनी गाँवों के ग्रामीणों के संक्रमित होने का खतरा भी बढ़ गया है। नक्सली क्टब्, राजेश, सुरेश, मनोज की स्थिति खराब बताई गई है। नक्सली मंगू भी बीमार है। सुजाता के अलावा गंगालूर एरिया कमेटी के सेक्रेटरी दिनेश की टीम से 10-15 नक्सली सदस्य कोरोना संक्रमित हैं। वहीं दरभा डिवीजन कमेटी के नक्सली सामडू और जयलाल की टीम के भी कई सदस्य कोरोना पीड़ित होने की पुख्ता सूचना है। यह सभी नक्सली बड़े कैडर के हैं। पुलिस की नाकाबंदी की वजह से दवाइयों की सप्लाई बंद है। जिससे लाल गलियारे में और ज्यादा दहशत है।
नक्सल दंपती को कोरोना
उत्तर बस्तर जिला बीजापुर परतापुर एरिया कमेटी अंतर्गत मेंढ़की एलओएस के सदस्य नक्सल दम्पती अर्जुन ताती 28 वर्ष एवं लक्ष्मी पद्दा 22 वर्ष बिगड़ते स्वास्थ्य के कारण 12 मई को संगठन छोड़कर पुलिस के सम्पर्क में आये। जाँंच में कोरोना पॉजिटिव पाये जाने पर कांकेर कोविड अस्पताल में भर्ती हैं।
 सरेंडर करें इलाज कराएंगे
दक्षिण बस्तर के तीनों जिले बीजापुर,दंतेवाड़ा,सुकुमा से तेलंगाना राज्य की सीमा लगती है। ऐसे में अब तेलंगाना पुलिस भी अलर्ट हो गई है। तेलंगाना के कोतागुड़म एस.पी सुनील दत्त ने कहा कि,दोनों राज्यों के बॉर्डर इलाके में बड़ी संख्या में नक्सलियों को कोरोना होने की खबर पुख्ता है। ग्रामीणों तक हम लगातार सूचनाएं पहुंँचा रहे हैं कि वे नक्सलियों की बैठक में शामिल न हों। वहीं डॉ अभिषेक पल्लव एस. पी. दंतेवाड़ा ने कहा,‘बरामद पत्र से यह खुलासा हुआ है कि पिछली जोनल कमेटी में कोरोना को लेकर आपस में तीखी बहस हुई थी। बड़े नक्सलियों पर भी निशाना साधते हुआ कहा गया है कि, जोनल कमेटी के सदस्य निचले कैडर तक सही जानकारी नहीं पहुंँचाते हैं। डेढ़ साल से स्थाई नेतृत्व नहीं होने से महत्वपूर्ण निर्णय नहीं हो पा रहा है। जो बीमारी के डर से संगठन छोड़ भागे हैं, सभी बड़े कैडर के इनामी नक्सली हैं। उनसे अपील है कि वे लोन वर्राटू अभियान के तहत सरंडर करंे। छत्तीसगढ़ पुलिस उनके इलाज का पूरा इंतजाम करेगी।’
कोरोना वाले नक्सली
कवर्धा में छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश के दो इनामी नक्सली दिवाकर उर्फ किशन डी.व्ही.सी सचिव भोरमदेव एरिया कमेटी और महिला देवे उर्फ लक्ष्मी एरिया कमेटी की सदस्य है। इन्हें झलमला थाना क्षेत्र और मध्यप्रदेश की सीमा से गिरफ्तार किया गया है। डी.व्ही.सी दिवाकर उर्फ किशन के विरूद्व छत्तीसगढ़ शासन द्वारा आठ लाख और मध्यप्रदेश शासन द्वारा पांँच लाख और महिला सदस्य देवे उर्फ लक्ष्मी के विरूद्व छत्तीसगढ़ शासन द्वारा दो लाख और मध्यप्रदेश शासन द्वारा दो लाख का ईनाम घोषित है। दोनों की कोरोना रिपोर्ट पाॅजिटिव आई है।
जवान की हत्या
लाल गलियारे में कारोना वायरस का कहर मचा रखा है मगर नक्सली वारदातों में कमी नहीं आ रही है। 13 मई को नक्सलियों ने ककसाड़ त्यौहार मनाने गए अबुझमाड़ के अंदरूनी गांव नेडनार में एक ग्रामीण को पुलिस का मुखबिर बताते हुए उसकी पत्नी और माँ के सामने रस्सी से बांधकर उसका गला घोंट कर हत्या कर दी।
जांच सहायक आरक्षक विट्टी भीमा एस आई.बी स्पेशल इन्वेस्टिगेशन ब्रांच में पदस्थ था, उसकी ड्यूटी दोरनापाल थाने में लगाई गई थी। 11 मई की रात जवान अपने घर पर सो रहा था। नक्सली उसे घसीटते हुए दूर ले गए। उन्होंने उसकी डंडे से बुरी तरह पिटाई की और बाद में धारदार हथियार से हत्या कर दी। जवान की पत्नी ने पुलिस को इस बात की जानकारी दी लेकिन जब तक पुलिस वहांँ पहुंँचती नक्सली वहांँ से भाग चुके थे। इसके पहले नक्सलियों में 15 अप्रैल को भेजी में दो सहायक आरक्षक धनीराम कश्यप व पुनेम हड़मा की हत्या कर दी थी।
जिला मुख्यालय कांकेर से करीब 20 किमी कि दूरी पर आमाबेड़ा जाने मार्ग के उसेली और तुमसनार के बीच में 9 मई को नक्सलियों ने एक पुल के पास बम ब्लास्ट किया था। इसके बाद 10 मई को बैनर पोस्टर के माध्यम से नक्सलियों ने इस घटना को अंजाम देने का कारण आमाबेड़ा से कांकेर पहुंँच मार्ग में सड़क निर्माण का कार्य को बताया है। वहीं जोरों पर चल रहे निर्माण कार्य को तत्काल बंद करने की बात कही है। माओवादियों ने पोस्टर में लिखा है कि यदि इसके बाद भी कार्य चालू करने पर सभी गाड़ियों को आग के हवाले कर ठेकेदार को सजा देंगे।
नक्सली दंपति का सरेंडर  .
किसकोड़ो एरिया कमेटी के डिप्टी कमांडर बुधराम उर्फ जयसिंह ने अपनी पत्नी सन्नी के साथ जिला मुख्यालय कांकेर में 10 मई को आत्मसमर्पण कर दिया। जयसिंह पर 5 लाख रुपये का और उसकी पत्नी सन्नी जो मूलतः बीजापुर जिले की  है पिछले 6 सालों से कांकेर जिले में सक्रिय थी। इस पर 2 लाख रुपये का इनाम था। एस.पी एम.आर अहिरे ने नक्सल दंपति को 10-10 हजार रूपये की सहायता राशि प्रदान करते हुए मुख्य धारा में लौटने पर स्वागत किया है। एस.पी एम.आर. अहिरे ने कहा कि नक्सलियों की साख अब सिमटती जा रही है और स्थानीय आदिवासी जो नक्सलियों के साथ चले गए थे।’’
बहरहाल कोविड की दूसरी लहर का असर इस बार लाल गलियारे में भी है। यह आशंका जताई जा रही है कि नक्सलियों को दवा और राशन नहीं मिलने पर अपनी जान बचाने के लिए लाल गलियारा छोड़ने की होड़ मच जाएगी। ऐसा हुआ, तो नक्सलवाद अपने आप कमजोर होकर खत्म हो सकता है।
                                 0 रमेश तिवारी ‘रिपु’
                                 मो. 07974304532