समकालीन व्यंग्य के स्वरूप से अलग हटकर नये लिबास में सेवा राम त्रिपाठी का व्यंग्य संग्रह ‘‘हाॅ,हम राजनीति नहीं कर रहे’’ हैं। पठनीय कृति है। नेशनल हाइवे की तरह लम्बे राजनीतिक चरित्र के दोगलेपन, बाजारवाद, धर्म समाज, पुलिस, शिक्षा जगत,विकृत संस्कृति,सरकारी व्यवस्था आदि पर तीखी मिर्ची सी कटाक्ष है। साथ ही सामाजिक मूल्यों की बातों का लहजा भी तीखा है। राजनीति के समूचे कोणों का सामाजिक जीवन पर किस तरह का असर है, उसके बारे में यत्र तत्र दिलचस्प कटाक्ष है। जाहिर सी बात है कि आम भारतीय जीवन में पुर्नविचार की जरूरत है।
राजनीति और समाज की उन पक्षों पर व्यंग्य किया गया है,जिसमें सुधार की जरूरत है। सामाजिक चिंताओं के बीच हर रचना आम व्यक्ति को अगाह भी करती है। जैसा कि ‘टांग अड़ाने का सुख’ क्या है, वही जानता है, जो इसमें निपुर्ण है। हर छोटे-बड़े काम में अपनी टांग अड़ाने के लिए मानो दफ्तर के लोग कसम खाये हुए हैं। बिना नेग लिए कोई भी अच्छा काम नहीं करेंगे। बहुत लोग अड़गे बाजी को हाजमा चूरन की तरह इस्तेमाल करते हैं। इस किताब में कुल 29 व्यंग्य रचनायें हैं।
‘राम प्यारे जी परम प्रसन्न हुए’ से सीख मिलती है,कि कलयुग में प्रसन्न रहने के लिए जरूरी है,कि आम व्यक्ति राम प्यारे जैसा हो। उसके चरित्र का निधन होना जरूरी है। झूठ बोलने का दौरा पड़ना जरूरी है। ‘पेड़ लग रहे हैं’ में एक सवाल छोड़ा गया है, कि जिस तरह वॄक्षारोपण के विज्ञापन होते हैं,उसी तरह मरे पेड़ों का फोटो खीच कर राष्ट्रीय स्तर पर शर्म क्यों नहीं मनाया जाता। समाज में कितने प्रकार के लोग है जो अपना रंग जमाने में लगे रहते हैं उसका चिट्ठा है‘मुद्रायें रंग जमाने की’। गिरगिट की तरह नेता रंग बदलते हैं। यह गिरगिट का सीधा अपमान है। इसलिए कि उसके पास सीमित रंग है,जबकि नेताओं के पास रंगों की फैक्ट्री है।
‘प्रजातंत्र ठेके पर’ में यह बताया गया है, कि हर व्यक्ति ठेके के महत्व को अब जान गया है। ठेका लेना एक राष्ट्रीय कार्यक्रम है। इसका प्रजातंत्र की कार्यशाला से सीधा सरोकार है। यानी देश में हर चीज ठेके पर है। देश में बिखरी समस्याओं के बारे में आम आदमी यही कहता है ‘मेरे सोचने से क्या होगा’।क्यों कि घर का जनतंत्र झेलने में लोहे के चने चबाने पड़ते हैं। वैसे घर के जनतंत्र के चावल से देश के जनतंत्र की हांडी की तासीर को परखा जा सकता है। ‘रागे हुजूर की महत्ता अद्भुत है। इसमें इतनी ताकत है, कि तीनों लोक, चौदह भुवनों तक सुयश पाने का सुख है। रागे हुजूर का महत्व समझने वाले वैताल को भी अपने पाले में कर सकते हैं। ‘हाॅ हम राजनीति नहीं कर रहे’ यह उस व्यवस्था और समाज की गांठ खोलती है,जहांँ लोग अपनी राजनीति को छिपाते हैं। जैसा कि आरएसएस कहता है, कि वह राजनीति नहीं करता। लेकिन वह कभी नहीं बताया कि भाजपा और अन्य इकाइयों से उसके रिश्ते क्या हैं? आदर्श व्यवस्था की वकालत करने वालों के दोहरे चरित्र के अंदर के सच को यह किताब में साफ-साफ दिखाती है।
‘मन की गांठों का गणित जिन्दगी की ज्यामितति से अलग है। पटाने की पटखनी से हर कोई चित हो जाता है। दीनानाथ के विकास की कला को हर किसी को समझना चाहिए। ‘इमेज है तो लाइफ है’भावनात्मक रचना है। हर किसी को लगता है कि समाज में इमेज नहीं तो लाइफ नहीं। पुलिस,सत्ता पक्ष,विपक्ष हर किसी को अपने इमेज की चिंता है, पर गरीब को नहीं। ‘चुनाव यानी ठेंगा’ एक सच की बानगी है। चुनाव ठेंगा दिखाने के लिए जीते जाते हैं। वोटर भी अब प्रत्याशी के वायदे पर भरोसा नहीं करता,वह भी दूसरे को वोट देकर ठेंगा दिखाने लगा है। ‘पीएचडी का मारा’ की सच्चाई यह है कि विभागाध्यक्ष बनाने का नहीं बल्कि, खुद के उल्लू बन जाने का धंधा है। ‘कुलपति बनने का दिल करता है’ आज की राजनीतिक सच्चाई की बानगी है। सत्ता तक पहुंच है, तो आपका भी मन कुलपति बनने की सोच सकता है।
कहीं -कहीं व्यंग्य संवाद शैली में शहरी भाषा के साथ ही देहाती पुट भी है। धरती के प्रेत‘ शीर्षक की रचना पढ़ते वक्त लगता है, कि लेख है। इसलिए कि धरती में नाना प्रकार के जिंदा प्रेत हैं। जिनसे हर वर्ग त्रस्त है। खासकर पटवारी और पुलिस से। पटवारी किसानों की नींदें उड़ाये रखने का ठेका ले रखे हैं। किसान इसकी शिकायत तहसीलदार से करता है। वे कहते हैं,तुम्हें गांव में नहीं रहना है! पटवारी से बैर बिसाहते हो। उस पर मेरा भी वश नहीं चलता। जाहिर सी बात है, कि पटवारी नये जमाने का नई सभ्यता का रिफाइण्ड प्रेत हैं। समाज में प्रेतों का उत्पादन लार्ज स्केल पर हो गया है।
मंत्री जी रोज आया करें, गर्व से कहो हम नकलची हैं,मूल्यांकन जारी है,ये पीछे पड़ जाने वाले,खाने पचाने की सस्कृति आदि रचनायें हमारे रोजमर्रा की जिन्दगी के दिलचस्प खुलासे करती हैं। व्यवस्था के चेहरे से खुलकर नकाब उतार कर लेखक ने अंदर का सच दिखाया है। मानवीय सरोकार के पक्ष के साथ यह किताब चालू व्यंग्य से अलहदा हैं। किताब की हर रचना में कुछ अंश ऐसे भी हैं कि पाठक पढ़ते -पढ़ते कोट करने से अपने आप को नहीं रोक सकता।
लेखक - सेवाराम त्रिपाठी
प्रकाशक -कलमकार मंच
कीमत- 150रुपये
@रमेश कुमार "रिपु"

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