मयंक पांडेय की ‘पलायन पीड़ा प्रेरणा’आम आदमी के दर्द को नए तरीके से रेखांकित करती है। इसमें कोरोना काल की पचास जीवंत कथाएं हैं। किताब की कथा पाठक को झकझोर देती है। हर कथा के दर्द में एक सवाल है। जो कहते हैं 70 साल में कुछ नहीं हुआ। उन्होंने छह साल में आम आदमी को ऐसा दर्द क्यों दे दिया, जो 70 साल के दर्द से भी बहुत ज्यादा है। लोग घरों में कैद थे, मगर सरकार चल रही थी। लोग भूखे प्यासे थे। पैरों में जिन्दगी का दर्द लेकर सड़कों पर चल रहे थे। मगर, सरकार एसी कमरे में थी। आदमी के दर्द की व्याख्या बहुत मुश्किल है।
हर दर्द और छटपटाहट की वजह सिर्फ गरीबी नहीं होती। कंधो पर पुत्र की लाश ढोने वाले आज के हरिश्चन्द्र से सरकार ने कभी नहीं पूछा कि,उसके पेट की भूख कैसी है। आज भी अस्पतालों में पैसा दिये बगैर अपने परिजनों का शव नहीं मिलता। जिस बेटी के लिए माॅ अपनी कई रातों की नींद उढ़ा कर बड़ी की हो और जब उसकी शादी की बारी आए तो उसे कन्यादान करने का सौभाग्य न मिले। ऐसी ही एक माॅ सोनिया की ममता का दर्द कितना बड़ा है,सरकार की व्यवस्था नहीं जानती। सोनिया की बेटी का कन्यादान साजिद ने किया।ऐसी कई भावनात्मक कथाओं का हलफनामा है पलायन,पीड़ा प्रेरणा।
जिन्दगी को जीने के लिए कई दर्दो को संभाल कर रखना पड़ता है। लेकिन उन दर्दो को कैसे संभाल के रखेंगे, जो असंवेदनशील सरकार से मिले हैं। व्यवस्था से मिले हैं। कोरोना काल की पचास जीवंत कथाएं पिछले साल की हैं,लेकिन इस साल भी वो दर्द हमारी पलकों पर हैं। आॅसू सूखे नहीं हैं। कोई भी सरकार नहीं जानती आम आदमी के दर्द के आॅसू कैसे होते हैं।
अपने पिता को गुरूग्राम से 13 वर्षीय ज्योति दरभंगा तक साइकिल से लेकर आई। मात्र एक हजार रूपये उसके पास थे। लेकिन उसके मैनेजमेंट की तारीफ करनी पड़ेगी। उसने सेंकेड हैंड की साइकिल 12 सौ रूपये में ली। पाँंच सौ रूपये दी और शेष राशि उधारी कर दी। सात सौ रूपये में घर तक सफर की। महिलाएं गहने को बहुत मानती है। लेकिन संकट से निपटने में उनका योगदान हमेशा सराहनीय रहे हैं। पुर्णे में सात मजदूरों का परिवार था। पैसे खत्म हो गए। घर लौटने के लिए सबकी महिलाओं ने अपने गहने बेचकर बाइक खरीदने की सलाह दी। इसके बाद सात मोटर साइकिल पर 18 लोगों ने सफर शुरू किया।
देश में कोरोना ने कई सांसों को दर्द से जीतना सीखाया। लाॅकडाउन की वजह से दर्द और परेशानियां सिर्फ मजदूरों की पलकों पर ही आकार नहीं ली। बल्कि, घर में रहने वाले भी विषम परिस्थियों का सामना किये। सरकार ने किसी के पास विकल्प नहीं छोड़ा। आज भी स्थिति वही है। सिर्फ राजनीतिक तस्वीरें बदली है। चुनाव होने के बाद, एक बार फिर देश लाॅकडाउन की गिरफ्त हो जाए, तो कैसी हैरानी?
मयंक ने कोरोना की कोख से जन्मी कथाओं को जीवंत कर दिया है। साथ ही कहानियों से जुड़ी कई जानकारियों का भी समावेश किया है। इसलिए किताब उबाऊ नहीं है।। किताब में मजदूरों के पलायन के दर्दो को तरजीह ज्यादा दी गई है। दरअसल मजदूर वर्ग ही लाॅकडाउन के वक्त मीडिया के केन्द्र में था। सरकार थाली और घंटी बजवाती रही। आपदा से कैसे संघर्ष करें,इसके उपाय नहीं बताई। मजदूर इस देश की रीढ़ हैं। उद्योग धंधो की शिराओं में बहने वाला लहू है। किताब तीन खंडों में है। एक पलायन दूसरा पीड़ा और तीसरा प्रेरणा।
इस किताब से पता चलता है कि देश में परेशानियों से लड़ने की हिम्मत किस तरह लोगों ने दिखाई। तकलीफ और परेशानी की गठरी ढोने वालों की मदद किस तरह लोगों ने की। जीवन का मूल्य तभी है, जब हम किसी की मदद कर सकें। यह किताब हर किसी को पढ़नी चाहिए। इससे आम आदमी को विषम परिस्थितियों में जीने का हौसला और हिम्मत मिलती है। साथ ही मन में इंसानियत की भावनाएं किस तरह आकार लेती है उससे रूबरू होने को मिलता है। किताब की कथा वस्तु बांधे रहती है। यह किताब इस कोराना के दूसरे कहर में भी अपनी पहचान बनाये रखेगा,ऐसी उम्मीद है।
किताब - पलायन पीड़ा प्रेरणा
लेखक - मयंक पांण्डेय
कीमत - 250 रूपये
प्रकाशक - प्रलेक प्रकाशन,मुंबई
@ रमेश कुमार "रिपु"

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