Wednesday, July 19, 2023

पुष्पराज तुरुप कितना कारगर...

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0 रमेश कुमार 'रिपु" रियासत नहीं रही। मगर,बघेली जनता के लिए अब भी पुष्पराज सिंह महाराज हैं। वैसे लोकतंत्र में जनता ही महाराज है।वहीं रंग बदलती सियासत के दौर में भी सुर्खियों में रहने की सियासत करने में पुष्पराज सिंह माहिर हैं। कांग्रेस में थे तब भी और नहीं थे,तब भी। पुष्पराज सिंह एक बार फिर भाजपा में आ गए हैँ । कांग्रेस के कईयों को लगता है कि वे सेमरिया या फिर गुढ़ विधान सभा से चुनाव लडेंगें। जबकि ऐसा नहीं है। बीजेपी ने बहुत सोच समझ कर पुष्पराज सिंह को प्रोडेक्ट कर रही है। पुष्पराज सिंह पर इस बार जिम्मा है बीजेपी को आठों विधान सभा की सीट दिलाना। बीजेपी उनका पूरा राजनीतिक फायदा उठाना चाहती है। बीजेपी के लिए और उनके लिए भी, यह एक सुनहरा मौका है। सुनहरी कामयाबी का जिम्मा. सन् 2023 के विधान सभा चुनाव में पुष्पराज सिंह के सक्रिय होने से चुनाव बेहद रोचक हो जाएगा। वहीं बीजेपी एंटीइन्कम्बैसी से गुजर रही है। रीवा की आठों विधान सभा के लिए पुष्पराज सिंह पर बीजेपी दांव खेलने जा रही है। सवाल यह है कि बीजेपी को बढ़त मिलेगी या फिर भगवा छतरी कम जगह ही तन पाएगी। बीजेपी के लिए पुष्पराज सिंह कितना तुरुप कारगर होगें,इस पर आकलन कांग्रेस में होने लगा हैं। बीजेपी की रणनीति के मुताबिक पुष्पराज सिंह आठों विधान सभा में बीजेपी के लिए वोट मांगेंगे। सीटों के संभावित नुकसान को यदि पुष्पराज सिंह कम करने में कामयाब हो गए,तो लोकसभा की टिकट उनकी तय है। विधान सभा चुनाव के परिणाम ही बताएंगे कि पुष्पराज सिंह कितने कामयाब सियासी खिलाड़ी हैं। रीवा जिला महाराजमय होता है या फिर कमलनाथमय,यह हर कोई देखना चाहता है। कैसा और कहां होगा असर.. रिमही जनता आज भी पुष्पराज सिंह को महाराज कहती है। ग्रामीण क्षेत्रों में उनकी पकड़, सियासी उम्मीद से ज्यादा है। पुष्पराज सिंह को न तो नागेन्द्र सिंह,न ही राजेन्द्र शुक्ला और न ही जनार्दन मिश्रा नकार सकते हैं। शिवराज सिंह चौहान को भी पता है कि रीवा में कोई कार्ड चल सकता है तो वो है पुष्पराज सिंह। उनके खुलकर बीजेपी के लिए वोट मांगने से भगवा राजनीति का तापमान बढ सकता है। उनकी हाजिर जवाबी,सभी जाति के वोटरों से सीधा जुड़ाव, और कांग्रेस का हर नेता उनके कद की इज्जत करता है। चूंकि कांग्रेस में मंत्री रहे हैं,कांग्रेस की राजनीति की है। ऐसे में कांग्रेस के पाले से अल्पसंख्यक ओबीसी,एससी,एसटी वोटर को खींचना होगा। अल्पसंख्यक वोटर रीवा में करीब 25 हजार है। इन वोटरों के बीच उनका आकर्षण है। युवाओं और महिलाओं के बीच उनकी अपनी लोकप्रियता है। पुष्पराज का गणराज्य.. पुष्पराज को बीजेपी विधान सभा चुनाव नहीं लड़ाएगी। ऐसे में उनका विरोध किसी भी विधान सभा में नहीं होगा। पुष्पराज सिंह को रीवा जिले की जनता के लिए नया एजेंडा तय करना होगा। साथ ही विराट सोच के साथ, सियासी पिच पर उतरना होगा। सवाल यह है कि जिला ग्रामीण कांग्रेस अध्यक्ष राजेन्द्र शर्मा और शहर कांग्रेस अध्यक्ष लखनलाल खंडेलवाला क्या पुष्पराज सिंह के किसी बयान का विरोध करेंगे? क्यों कि दोनों का इनसे साहब सलाम का सियासी रिश्ता बरसों से है। राजेन्द्र शर्मा क्या श्रीयुत श्रीनिवास तिवारी की भूमिका में पुष्पराज के सामने आ सकेंगे? राजेन्द्र शुक्ला को घेरने के लिए कांग्रेस के पास बहुत सारी बातें हैं। लेकिन पुष्पराज सिंह के खिलाफ बोलने के लिए कुछ भी नहीं है। बीजेपी का हो या फिर कांग्रेस का अथवा बसपा का कोई भी नेता महाराज के बायें चलने की सियासत कम से कम सामने से करने की हिम्मत नहीं करता। क्या इतने भर से पुष्पराज सिंह भगवा छतरी रीवा की आठों विधान सभा में तान लेंगे? ंइजीनियर राजेन्द्र शर्मा कहते हैं,कांग्रेस चार सीट सीधे -सीधे जीत रही है। लेकिन जनता में बदलाव का जो जोश देखने को मिल रहा है उससे कह सकते हैं कि आठों सीट कांग्रेस के हाथ में होगी। गौरतलब है सुन्दर लाल तिवारी ने 2018 के चुनाव में कहा था,कि हम सात सीट जीतेंगे। अमहिया काग्रेस ने जो राजनीति 2018 में की थी,यदि वही की, तो पुष्पराज सिंह का सियासी कद 2023 के चुनाव में बढ़कर मोदी और अमितशाह के साथ खड़े होने की हो जाएगी। दो ठाकुर आमने- सामने होंगे.. विंध्य में कुंवर अर्जुन सिंह को जो सम्मान मिलता था,उनके चलते अजय सिंह राहुल को भी मिलता है। पुष्पराज सिंह बीजेपी के लिए ठाकुरों से वोट मांगेगे और अजय सिंह राहुल कांग्रेस के लिए। ठाकुर राजनीति का टकराव सिर्फ रीवा ही नहीं, पूरे रीवा संभाग की सीटों पर असर डालेगी। अजय सिंह राहुल मोदी और शिवराज के वादे और भ्रष्टाचार का लेखा- जोखा रखेंगे तो पुष्पराज सिंह मोदी के कामकाज की बातें करेंगे। लाड़ली बहना और संविदा कर्मियों के अलावा शिवराज सरकार की योजनाओं की बातें करेंगे, मोदी को ईमानदार और मेहनती होने की बात करेंगे। लेकिन पुष्पराज सिंह को इसका भी जवाब देना होगा कि अल्पसंख्यक बीजेपी के दौर में अपने आप को डरा महसूस क्यों कर रहा है? मैराथन मैन.. सवाल यह है कि पुष्पराज सिंह मैराथन मैन बन पाएंगे या फिर भगवा तिलक और गमछा लेकर घूमते रह जाएंगे। जिले की राजनीति से पुष्पराज सिंह पन्द्रह सालों से कटे हुए हैं। नया वोटर उन्हें पहचानता भी नहीं। युवा लड़के और लड़कियों के बीच उनका अपना कोई जनाधार नहीं है। वो प्रियंका,राहुल गांधी और मोदी को जानता है। उनके पास ऐसा क्या है, जो नयी सदी के युवाओं को रिझा सकें। उन्हें मना सकें कि बीजेपी को वोट देना ही हितकर है। नई नस्ल की वोट की फसल को काटने के लिए रीवा जिले के लिए क्या अलग से घोषणा पत्र लेकर उनके पास पहुंचेंगे। जबकि कई कांग्रेसी पुष्पराज सिंह को किचन सियासी कहते हैं। पुष्पराज सिंह महाराज छवि से बाहर कितना निकल पाएंगे,शायद वो खुद भी नहीं जानते। उनके साथ कई ऐसे विवाद भी हैं। जिन्हें बीजेपी ने कभी खोला था चुनाव में। वही विवाद कांग्रेस ने खोला तो पुष्पराज सिंह के लिए संकट खड़ा हो जाएगा। बहरहाल पुष्पराज सिंह अपनी सियासत की नई पारी एक बार फिर से बीजेपी में खेलने जा रहे हैं। सच तो यह है कि बीजेपी के लिए और उनके लिए भी, यह एक मौका है।

शिवराज ने जनता भरोसा खो दिए हैंः राहुल

सर्वे में बीजेपी पच्चपन सीट पा रही है रीवा। पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह राहुल ने कहा कि दस बारह साल पहले शिवराज सिहं चौहान जो कहते थे तो उनकी बातों पर जनता भरोसा करती थी। लेकिन अब वो जनता का भरोसा खो दिए हैं। यही वजह कि बीजेपी के हर सर्वे में उसकी सीट कम होते जा रही है। लाड़ली बहना योजना का लाभ मिलने की बजाए, बीजेपी को नुकसान हो गया है। वीकेन न्यूज से एक चर्चा के दौरान मध्यप्रदेश के पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह
ने यह बात कही। उन्होनें कहा कि जनवरी में बीजेपी ने आंतरिक सर्वे कराया था। जिसमें उसे सौ सीट मिल रही थी। इसके बाद मई के सर्वे में उसे 65 सीट मिल रही थी। लगातर सीट घटने पर शिवराज सिंह ने सोचा कि महिलाओं को किसी बहाने अपनी ओर खींचा जाए तो शायद एंटीइन्कम्बैसी कम हो जाए। वो लाड़ली बहना योजना ले आए। उसके बाद के सर्वे में बीजेपी की दस सीट और कम हो गयी है। ऐसा लगता है कि सदन में इस बार बीजेपी मजबूत विपक्ष की हैसियत में भी नहीं रहेगी। ▪️राहुल की टीम सर्वे कर रही.. एक सवाल के जवाब में उन्होने ने कहा कि पूरे प्रदेश में राहुल गांधी की टीम सर्वे कर रही है। जो उम्मीदवार उनके सर्वे में जीत रहा है, उसे टिकट दिया जाएगा। यह कोई मायने नहीं रखता कि जिला कांग्रेस अध्यक्ष या फिर शहर कांग्रेस अध्यक्ष ने पैनल में किसी का नाम दिया है या नहीं। ▪️अल्पसंख्यक को टिकट मिलेगा.. दिग्विजय सिंह का कहना है कि अल्पसंख्यक नेताओं को टिकट कांग्रेस नहीं देगी। उन्हें टिकट देने से बीजेपी चुनाव जीत जाती है, सवाल पर उन्होंने कहा कि मुझे नहीं पता दिग्विजय सिंह यह बात किस संदर्भ में कही। लेकिन मेरा मानना है अल्पसंख्यक नेताओं को भी टिकट दी जाएगी। ▪️पुष्पराज चैथे नम्बर पर.. पुष्पराज सिंह सपा से लोकसभा से चुनाव लड़े थे, तो 85 हजार वोट पाए थे। इस बार कांग्रेस से बीजेपी में आ गए हैं। हर विधान सभा में महाराज होने के नाते दस से पन्द्रह हजार उनके वोट है। यह वोट बीजेपी में चले गए तो कांग्रेस को नुकसान हो सकता है, सवाल पर अजय सिंह राहुल ने कहा कि राजनीति की हवा हमेशा एक सी नहीं होती। पुष्पराज सिंह उस समय चौथे नम्बर पर थे। इस बार भी वो चौथे नम्बर पर ही रहेंगे। ▪️आदिवासी बीजेपी से खफा.. आदिवासी वोटर को लुभाने बीजेपी जी जान से जुटी है। आदिवासी वोटर को लुभाने अमितशाह शहडोल संभाग का दौरा कर चुके हैं। शिवराज भी इस बार अधिक से अधिक सीट जीतना चाहते हैं। क्या इसलिए राहुल गांधी ब्योहारी आ रहे हैं? आदिवासी वोटर बीजेपी के हाथ से छिटक गया है। इसी से समझ सकते हैं कि बीजेपी 2018 के चुनाव में आदिवासी की 47 सीट में 31 सीट कांग्रेसी जीती। बीजेपी को सिर्फ 16 सीट मिली। 2003 के चुनाव में सोनिया गांधी व्यौहारी आई थीं। इस बार शिवराज कुछ भी कर लें आदिवासी सीट वो महाकौशल,और विंध्य में भी कम ही पाएंगे। आदिवासी वोटर उनसे बेहद नाराज है। ▪️बीजेपी को बीजेपी हाराएगी.. एक समय कहा जाता था कि कांग्रेस ही कांग्रेस को हराती थी है। इस बार भी यह कहावत क्या जिंदा रहेगी। नेता प्रतिपक्ष ने हंसते हुए कहा इस बार जनता कहेगी कि भाजपा ही भाजपा को हराती है। इस बार विंध्य क्षेत्र में जिस तरह जनता शिवराज सरकार से नाराज है उससे यही लगता है कि 20-22 सीट कांग्रेस को मिलेगी। वी केन न्यूज के नेशनल हेड रमेश कुमार द्धारा सर्वे में बीजेपी पच्चपन सीट पा रही है रीवा। पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह राहुल ने कहा कि दस बारह साल पहले शिवराज सिहं चौहान जो कहते थे तो उनकी बातों पर जनता भरोसा करती थी। लेकिन अब वो जनता का भरोसा खो दिए हैं। यही वजह कि बीजेपी के हर सर्वे में उसकी सीट कम होते जा रही है। लाड़ली बहना योजना का लाभ मिलने की बजाए, बीजेपी को नुकसान हो गया है। वीकेन न्यूज से एक चर्चा के दौरान मध्यप्रदेश के पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह राहुल ने यह बात कही। उन्होनें कहा कि जनवरी में बीजेपी ने आंतरिक सर्वे कराया था। जिसमें उसे सौ सीट मिल रही थी। इसके बाद मई के सर्वे में उसे 65 सीट मिल रही थी। लगातर सीट घटने पर शिवराज सिंह ने सोचा कि महिलाओं को किसी बहाने अपनी ओर खींचा जाए तो शायद एंटीइन्कम्बैसी कम हो जाए। वो लाड़ली बहना योजना ले आए। उसके बाद के सर्वे में बीजेपी की दस सीट और कम हो गयी है। ऐसा लगता है कि सदन में इस बार बीजेपी मजबूत विपक्ष की हैसियत में भी नहीं रहेगी। ▪️राहुल की टीम सर्वे कर रही.. एक सवाल के जवाब में उन्होने ने कहा कि पूरे प्रदेश में राहुल गांधी की टीम सर्वे कर रही है। जो उम्मीदवार उनके सर्वे में जीत रहा है, उसे टिकट दिया जाएगा। यह कोई मायने नहीं रखता कि जिला कांग्रेस अध्यक्ष या फिर शहर कांग्रेस अध्यक्ष ने पैनल में किसी का नाम दिया है या नहीं। ▪️अल्पसंख्यक को टिकट मिलेगा.. दिग्विजय सिंह का कहना है कि अल्पसंख्यक नेताओं को टिकट कांग्रेस नहीं देगी। उन्हें टिकट देने से बीजेपी चुनाव जीत जाती है, सवाल पर उन्होंने कहा कि मुझे नहीं पता दिग्विजय सिंह यह बात किस संदर्भ में कही। लेकिन मेरा मानना है अल्पसंख्यक नेताओं को भी टिकट दी जाएगी। ▪️पुष्पराज चैथे नम्बर पर.. पुष्पराज सिंह सपा से लोकसभा से चुनाव लड़े थे, तो 85 हजार वोट पाए थे। इस बार कांग्रेस से बीजेपी में आ गए हैं। हर विधान सभा में महाराज होने के नाते दस से पन्द्रह हजार उनके वोट है। यह वोट बीजेपी में चले गए तो कांग्रेस को नुकसान हो सकता है, सवाल पर अजय सिंह राहुल ने कहा कि राजनीति की हवा हमेशा एक सी नहीं होती। पुष्पराज सिंह उस समय चौथे नम्बर पर थे। इस बार भी वो चौथे नम्बर पर ही रहेंगे। ▪️आदिवासी बीजेपी से खफा.. आदिवासी वोटर को लुभाने बीजेपी जी जान से जुटी है। आदिवासी वोटर को लुभाने अमितशाह शहडोल संभाग का दौरा कर चुके हैं। शिवराज भी इस बार अधिक से अधिक सीट जीतना चाहते हैं। क्या इसलिए राहुल गांधी ब्योहारी आ रहे हैं? आदिवासी वोटर बीजेपी के हाथ से छिटक गया है। इसी से समझ सकते हैं कि बीजेपी 2018 के चुनाव में आदिवासी की 47 सीट में 31 सीट कांग्रेसी जीती। बीजेपी को सिर्फ 16 सीट मिली। 2003 के चुनाव में सोनिया गांधी व्यौहारी आई थीं। इस बार शिवराज कुछ भी कर लें आदिवासी सीट वो महाकौशल,और विंध्य में भी कम ही पाएंगे। आदिवासी वोटर उनसे बेहद नाराज है। ▪️बीजेपी को बीजेपी हाराएगी.. एक समय कहा जाता था कि कांग्रेस ही कांग्रेस को हराती थी है। इस बार भी यह कहावत क्या जिंदा रहेगी। नेता प्रतिपक्ष ने हंसते हुए कहा इस बार जनता कहेगी कि भाजपा ही भाजपा को हराती है। इस बार विंध्य क्षेत्र में जिस तरह जनता शिवराज सरकार से नाराज है उससे यही लगता है कि 20-22 सीट कांग्रेस को मिलेगी।

Monday, June 12, 2023

पटरी पर मौत रोकने की सबसे बड़ी चुनौती

"बुलेट ट्रेन का सपना दिखाने वाली सरकार के सामने चुनौती है पटरी पर मौत रोकना। अब तक सिर्फ साठ ट्रेनों में ही कवच सिस्टम है। उद्योगपतियों का ग्यारह लाख करोड़ रुपए कर्ज माफ कर देने वाली सरकार कवच सिस्टम के लिए चौतीस हजार करोड़ रुपए खर्च कर दे तो देश में बालासोर जैसी दुर्घटना की पुनरावृति नहीं होगी। जबकि दो लाख करोड़ रुपए से ज्यादा उद्योगपति लेकर देश से भाग गए।" 0 रमेश कुमार ‘रिपु’ दो जून को ओड़िसा में जिस ट्रैक पर रेल हादसे में 278 लोगों की जानें गयी अब उसी ट्रैक पर फिर से रेलगाड़ियां चलनी शुरू हो गयी। प्रधान मंत्री ने कहा कि गुनहगार बख्शे नहीं जाएंगे। वहीं रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा कि ओडिशा ट्रिपल ट्रेन हादसा इलेक्ट्रॉनिक इंटरलॉकिंग और सिग्नल सिस्टम की समस्या की वजह से हुआ है। शाम को कहा रेलवे बोर्ड ने रेल हादसे की सीबीआई जांच की सिफारिश की है। रेलवे बोर्ड की सदस्य जया वर्मा सिन्हा ने कहा कि साजिश की संभावना से इनकार नहीं किया गया है। जब सब पता है तो फिर सीबीआई जांच क्यों? जाहिर सी बात है लोगों का ध्यान बांटने के लिए ऐसा किया गया है ताकि इस्तीफे की बात न उठे। सवाल यह है कि देश के प्रधान मंत्री वंदेमातरम ट्रेन को हरी झंडी दिखाते आए हैं। देश में करीब पन्द्रह वंदेमातरम ट्रेन अलग-अलग रूट पर चल रही हैं। इस ट्रेन का किराया अन्य ट्रेनो की तुलना में पाँच गुना ज्यादा है। यात्री सफर इस उम्मीद से करता है कि वह सुरक्षित अपने घर पहुंच जाएगा। लेकिन बालासोर की रेल दुर्घटना ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। सरकार की गलती से अथवा अनदेखी से रेल दुर्घटना होने पर क्यों ने सरकार को कटघरे पर खड़ा किया जाए। इसलिए भी कि प्रधान मंत्री सारे मंत्रालय के जवाबदारी लेते हैं तो फिर रेल दुर्घटना की क्यों नहीं? इस हादसे की जिम्मेदारी कौन लेगा? अब न अटल जी का और न ही नेहरू का दौर है। कैग की रिपोर्ट की अनदेखी - मोदी सरकार यदि कैग की रिपोर्ट को अमल में लाती तो बालासोर हादसा होता नहीं। रेल्वे बजट में 2023-24 के लिए ढाई लाख करोड़ रुपए का प्रावधान है। लेकिन इस हादसे ने सबका ध्यान रेल मंत्री अश्विनी के 2022 के उस बयान की ओर खींचा है,जिसमें उन्होंने कहा था, रेल कवच एक ऑटोमैटिक ट्रेन प्रोटेक्शन सिस्टम है। इसे ट्रेन कोलिजन अवॉइडेंस सिस्टम कहते हैं। इंजन और पटरियों में लगे इस डिवाइस की मदद से रेल दुर्घटनाएं रोकी जा सकती है। कोरोमंडल एक्सप्रेस और बेंगलुरु-हावड़ा सुपरफास्ट ट्रेनों के इंजन में कवच लगा होता तो इस हादसे को टाला जा सकता था। देश में करीब एक लाख पन्द्रह हजार किलोमीटर रेल पटरियांँ है। प्रति किलोमीटर कवच सिस्टम पर तीस लाख रुपए खर्चा आएगा। यानी देश में कवच सिस्टम पर चौतीस हजार करोड़ रुपए का खर्चा आएगा। लोगों की जिन्दगी के नजरिये से देखा जाए तो यह बहुत बड़ी राशि नहीं है। बुलेट ट्रेन का सपना दिखाने वाली सरकार के सामने चुनौती है पटरी पर मौत रोकना। अब तक सिर्फ साठ ट्रेनों में ही कवच सिस्टम है। उद्योगपतियों का ग्यारह लाख करोड़ रुपए कर्ज माफ कर देने वाली सरकार कवच सिस्टम के लिए चौतीस हजार करोड़ रुपए खर्च कर दे तो देश में बालासोर जैसी दुर्घटना की पुनरावृति नहीं होगी। जबकि दो लाख करोड़ रुपए से ज्यादा उद्योगपति लेकर देश से भाग गए। कोंकण रेलवे के इंजीनियरों ने रेल हादसे रोकने के लिए रक्षा कवच विकसित किया था। सन् 2011 में मनमोहन सरकार के समय लगाने की शुरूआत हो गयी थी। इसे हर रेल नेटवर्क पर लगाने की योजना है। लेकिन काम की गति कछुवा गति जैसी है। सरकार ने अनदेखी की - दिसंबर 2022 में कैग ने अपनी रिपोर्ट में रेलवे की व्यवस्था में खामियों की ओर सरकार का ध्यान खींचा था। अप्रैल 2017 से मार्च 2021 के बीच चार सालों में 16 जोनल रेलवे में 1129 डिरेलमेंट की घटनाएं हुईं। यानी हर साल लगभग 282 डिरेलमेंट हुए। इसमें करीब 3296 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ था। जाहिर है कि ट्रैक का निरीक्षण नहीं होने से डिरेलमेंट होगा। रिपोर्ट कहती है 422 डिरेलमेंट इंजीनियरिंग विभाग की लापरवाही से हुए। 171 मामलों में ट्रैक के मैंटिनेंस में कमी डिरेलमेंट की वजह रही। वहीं मैकेनिकल डिपार्टमेंट की लापरवाही से 182 डिरेलमेंट हुए। 156 मामलों में निर्धारित ट्रैक पैरामीटर के नियमों का पालन नहीं होने से डिरेलमेंट हुआ। 154 डिरेलमेंट में लोको पायलट की खराब ड्राइविंग और ओवर स्पीडिंग मुख्य वजहें रहीं। 37 फीसदी मामलों में कोच में खराबी और पहियों का गलत निर्माण से डिरेलमेंट हुआ। करीब चार सौ मामलों में खराब डिब्बों और खराब पहिए दुर्घटना की वजह बने हैं। सरकार के रेल बजट में पुराने डिब्बे और पहिए के मेंटिनेस का जिक्र सिर्फ संसद के पटल पर होता है। यानी जमीनी हकीकत कुछ और है। 275 डिरेलमेंट ऑपरेटिंग डिपार्टमेंट की लापरवाही के चलते हुए। दरअसल रेलवे विभाग की ओर से ट्रैक मेनटेनेंस धीरे- धीरे कम होता गया। जांच होने से क्या - बलासोर रेल दुर्घटना की जांच सीबाआई के करने से क्या होगा? 278 लोगों की जान वापस आने से रही। दरअसल जनता का गुस्सा कम करने के लिए सरकार रेल हादसे की जांच के आदेश देती है। कुछ दिनों बाद लोग भूल जाते है। फाइल बंद हो जाती है। जैसा कि सन 2016 में कानपुर में रेल दुर्घटना में 150 लोगों की मौत पर प्रधान मंत्री ने साजिश की आशंका के चलते एनआई को जांच करने आदेश दिया था । दो साल बाद एनआईए ने फाइल बंद कर दी। चार्जशीट दायर करने से इंकार कर दिया। सरकार को लगता है मुआवजा दे देने से लोगों को न्याय मिल जाता है। लोग संतुष्ट हो जाते हैं। जबकि सरकार मरने वाले परिवार की तकलीफ के बारे में कुछ भी नहीं सोचती। कई बार ऐसा भी होता है कि परिजन को उनका अपना शव नहीं मिलता। ऐसी स्थिति में उन्हें न क्लेम मिलता है और न ही नौकरी मिलती है। दो हजार करोड़ की कटौती - बहुत लोगों को यह भी नहीं पता कि रेल मंत्री रहे नीतीश कुमार ने खराब पट्टिरियों के लिए विशेष सुरक्षा फंड बनाया था। बड़े पैमाने पर पुरानी और जर्जर पटरियों की जगह नई पटरियां लगाने का काम किया गया। लेकिन मोदी सरकार ने 2018 में इस पर किए गए 9607 करोड़ रुपये के खर्च में दो साल बाद दो हजार करोड़ रुपये की कटौती कर दी। यानी राष्ट्रीय रेल संरक्षा कोष में 79 प्रतिशत फंडिंग कम की गई। रेल पटरी नवीकरण कार्यों की राशि में भारी गिरावट भी रेल दुर्घटना की भी वजह है। कईयों ने इस्तीफा दिया- राजनीति में अब नैतिकता खत्म हो गयी है। लाल बहादुर शास्त्री 1958 में रेल मंत्री थे। आन्ध्र प्रदेश के महबूबनगर में एक रेल हादसा में 112 लोगों की मौत हो गयी थी। उन्होंने इस्तीफा पी.एम नेहरू को दे दिया था। उनका इस्तीफा नेहरू नहीं स्वीकारे। इसके बाद तमिलनाडु के अरियालुर में 144 लोगों की मौत पर नेहरू को लालबहादुर शास्त्री ने अपना इस्तीफा भेज दिया था। नीतीश कुमार ने भी 1990 में असम में गैसल ट्रेन दुर्घटना की जवाबदारी लेते हुए इस्तीफा दे दिया था। तब 290 लोगों की मौत हुई थी। ममता बनर्जी ने सन् 2000 में दो ट्रेन की दुर्घटना में इस्तीफा दे दिया था। अटल जी ने उनका इस्तीफा नहीं स्वीकारे थे। एनडीए सरकार में रेल मंत्री रहे सुरेश प्रभु ने 2017 में दो रेल हादसे पर इस्तीफा दे दिया था। पीएम मोदी ने नहीं स्वीकारा।

Wednesday, May 17, 2023

हिन्दुत्व की चुनावी लड़ाई बीजेपी के काम नहीं आई

कर्नाटक में हिन्दुत्व की चुनावी लड़ाई मोदी के काम नहीं आई। इसी के साथ बीजेपी के लिए दक्षिण का प्रवेश द्वार बंद हो गया। इसी साल तीन राज्यों में होने वाले चुनाव से बेहिसाब बेचैनी बीजेपी के लिए बढ़ गयी। मोदी और अमितशाह को चुनाव के बड़े रणनीतिकार बताया जाता था लेकिन ंपजाब हिमाचल प्रदेश के बाद कर्नाटक में हार से स्पष्ट है कि मोदी का सियासी बाजार में रेट गिर गया है । 0 रमेश कुमार ‘रिपु’ लोकतंत्र में हर बार चुनाव में एक ही कार्ड काम नहीं करता। बीजेपी को लगता है कि हिन्दुत्व कार्ड उसके जीत के लिए ट्रंप कार्ड है। कर्नाटक चुनाव में मोदी ने बजरंगदल को बजरंग बली से जोड़कर चुनाव को हिन्दुत्व का रंग देने पूरी ताकत लगा दी। प्रदेश भर में बीजेपी हनुमान चालीसा पढ़ने लगी। मोदी ने पच्चीस किलोमीटर का रोड शो भी किया। लेकिन चुनाव परिणाम यही बताता है कि मोदी और अमित शाह का सियासी बाजार में रेट गिर गया है। मोदी की छवि के दम पर बीजेपी अब ढाई घर नहीं चल सकती। पजाब हिमाचल प्रदेश हारने के बाद कर्नाटक जिसे दक्षिण का सियासी द्वार कहा जाता है, वो बीजेपी के लिए बंद हो गया है। बीजेपी का पश्चिम बंगाल से भी बदतर प्रदर्शन था कर्नाटक में। पश्विम बंगाल में अस्सी सीट और कर्नाटक में 64 सीट पाकर कमजोर विपक्ष की भूमिका में बीजेपी रहेगी। यह कह सकते हैं कि मोदी के नारे की हवा अब निकलने लगी है। कांग्रेस मुक्त भारत की। छह माह बाद तेलंगाना में चुनाव होना है। वहां बीजेपी वैसे ही कमजोर है। क्या यह मान लिया जाए कि मोदी की लीडरशिप कर्नाटक में नहीं चली। डबल इंजन सिर्फ दिल्ली में काम करता है। वो और उनकी सरकार कर्नाटक में फेल हो गए। इस बार बीजेपी अपने चुनावी बयान से मतदाताओं को ज्यादा नाराज किया। जैसा कि विजयनगर में मोदी ने कहा आज हनुमान जी की इस पवित्र भूमि को नमन करना मेरा बहुत बड़ा सौभाग्य है और दुर्भाग्य देखिए। मैं आज जब यहां हनुमान जी को नमन करने आया हूं उसी समय कांग्रेस पार्टी ने अपने मेनिफेस्टो में बजरंगबली को ताले में बंद करने का निर्णय लिया है। कांग्रेस पार्टी को प्रभु श्री राम से भी तकलीफ होती थी और अब जय बजरंगबली बोलने वालों से भी तकलीफ हो रही है। मोदी धार्मिक धु्रवीकरण करने की कोशिश की। उन्हें उम्मीद थी इससे भगवा छतरी तन जाएगी। भ्रष्टाचार - मोदी हर आम सभा में यही कहते रहे कि सारे भ्रष्टाचारी विपक्ष एक हो गए है। लेकिन वे अपने मुख्यमंत्री के भ्रष्टाचार की अनदेखी किए। बीजेपी की हार के कारणों में एक कारण यह भी था। कांग्रेस ने शुरुआत से ही भाजपा के खिलाफ 40 फीसदी कमीशन लेने वाली सरकार को प्रचारित किया। एस.ईश्वरप्पा को भ्रष्टाचार के मुद्दे पर मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था और बीजेपी के एक विधायक को जेल जाना पड़ा था। राज्य के ठेकेदार संघ ने इसकी शिकायत पी.एम मोदी से भी की थी। लेकिन शिकायत को उन्होंने तरजीह नहीं दी। चुनाव में काग्रेस ने इसे मुद्दा बनाकर बीजेपी के गले की फांस बना दिया। सियासी समीकरण - बीजेपी जिनके दम पर चुनाव जीतने का दम भर रही थी,उन्हें ही ठीक से नहंी जोड़ पाई। बीजेपी अपने कोर वोट बैंक लिंगायत समुदाय को अपने पास न रख सकी और न ही दलित आदिवासी ओबीसी और वोक्कालिंग समुदायों का भरोसा बन सकी। दूसरी ओर कांग्रेस मुसलमानों दलितों और ओबीसी के अलावा लिंगायत समुदाय के वोट बैंक में सेंध लगाने में सफल रही है। पुराना मौसूर वोक्कालिंगा का गढ़ है। यहां जेडीएस मजबूत है यही माना जा रहा था। क्यों कि पिछले दफा 58 सीटों में सबसे अधिक 24 सीट जेडीएस को,कांग्रेस को 18 और बीजेपी को 15 सीट मिली थी। इस बार पासा बदल गया। बोम्मई सरकार ने चुनाव से पहले मुसलमानों के लिए चार फीसदी कोटा समाप्त कर दिया था। जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने आगामी सरकार तक यथावत बनाए रखने का आदेश दिया। जाहिर है मुसलमानों ने बीजेपी को नकार दिया। धु्रवीकरण काम नहीं आया - कर्नाटक में एक साल से बीजेपी नेता हलाला हिजाब से लेकर अजान तक का मुद्दा उठा रहे हैं। हिजाब टीपू सुल्तान कम्युनल वॉयलेंस और करप्शन. कर्नाटक का पूरा चुनाव इन्हीं मुद्दों के इर्द.गिर्द रहा। उडुपी जहां से हिजाब विवाद शुरू हुआ। मेलकोटे जहां टीपू सुल्तान के आदेश पर 800 ब्राह्मणों की हत्या का दावा किया जाता है। श्रीरंगपटना जहां की जामिया मस्जिद के बारे में दावा है कि इसे टीपू सुल्तान ने हनुमान मंदिर तोड़कर बनवाया था। रामनगर जिसे दक्षिण की अयोध्या कहा जाता है बीजेपी सरकार ने यहां भव्य राम मंदिर बनाने का वादा किया। इसके अलावा वोक्कालिंगा वोटरों को साधने के लिए मोदी ने बेंगलूरु के संस्थापक कैपेगौड़ा की एयरपोर्ट के सामने 108 फीट की प्रतिमा का लोकार्पण किया था। वोक्कालिंगा के धर्म गुरू निर्मलानंद स्वामी से अमितशाह की भेंट को बीजेपी सियासी फायदा से जोड़ ली। इस जाति का आरक्ष्ण दो फीसदी बढ़ा दिया गया है। बावजूद इसके धु्रवीकरण काम नहीं आया। दिग्गज नेताओं को किनारे किया - बीजेपी ने भले ही येदियुरप्पा की जगह बसवराज बोम्मई को मुख्यमंत्री बनाया हो लेकिन सी.एम की कुर्सी पर रहने के बावजूद बोम्मई का कोई खास प्रभाव नहीं पड़ा। जबकि कांग्रेस के पास डी.के शिवकुमार और सिद्धारमैया जैसे मजबूत चेहरे थे। बोम्मई को आगे खड़ा करना भाजपा को महंगा पड़ा। कर्नाटक में बीजेपी को खड़ा करने में अहम भूमिका निभाने वाले पूर्व मुख्यमंत्री बी.एस येदियुरप्पा को बीजपी ने साइड में कर दिया। चुनाव प्रचार की कमान वोक्कालिंगा के केन्द्रीय मंत्री शोभा करंदलाजे के पास थी। पूर्व मुख्यमंत्री जगदीश शेट्टार और पूर्व डिप्टी सीएम लक्ष्मण सावदी को भाजपा ने टिकट नहीं दिया। जबकि दोनों नेता कांग्रेस में शामिल हो गए और मैदान में उतर गए। येदियुरप्पा, शेट्टार, सावदी तीनों ही लिंगायत समुदाय के बड़े नेता माने जाते हैं। जिन्हें नजर अंदाज करना बीजेपी के हित में नहीं था। सत्ता विरोधी लहर - कांग्रेस सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार के सवाल पर बोम्मई सरकार को घेरी। चालीस फीसदी कमीशन की सरकार का स्लोगन देकर कांग्रेस ने बीजेपी के नाक में दम लगा दिया। भारत जोड़ो यात्रा में राहुल गांधी लंबे समय तक कर्नाटक में ही रहे। इसका प्रभाव जनता में काफी देखा गया है। कांग्रेस अघ्यक्ष मल्ल्किार्जुन खड़गे दलित वोटरों को लुभाने में लगे हैं। प्रदेश अध्यक्ष डी.के. शिवाकुमार खुद वोक्कालिंगा जाति से हैं और सिद्धरमैया पिछड़ी जाति कोरुबा से है। दोनों ने मतभेद भुलाकर कांग्रेस का प्रचार किया। राज्य में सत्ता विरोधी लहर चली जिसे बीजेपी नियंत्रित नहंी कर सकी। बहरहाल कर्नाटक में हिन्दुत्व की चुनावी लड़ाई मोदी के काम नहीं आई। इसी के साथ
लिए दक्षिण का प्रवेश द्वार बंद हो गया। इसी साल तीन राज्यों में होने वाले चुनाव से बेहिसाब बेचैनी बीजेपी के लिए बढ़ गयी। मोदी और अमितशाह को चुनाव के बड़े रणनीतिकार बताया जाता था लेकिन ंपजाब हिमाचल प्रदेश के बाद कर्नाटक में हार से स्पष्ट है कि मोदी का सियासी बाजार में रेट गिर गया है ।

Wednesday, May 10, 2023

कर्नाटक में चुनावी लड़ाई हिन्दुत्व पर आई

''सत्ता में आने पर बजरंग दल पर प्रतिबंध की बात कांग्रेस ने की तो बीजेपी ने इसे धर्म से जोड़ कर हिन्दुत्व की राजनीति को हवा दे रही है। बीजेपी को लगता है हनुमान चालीस का पाठ और मोदी के रोड शो से कर्नाटक में भगवा छतरी तन जाएगी। यदि कर्नाटक बीजेपी नहीं जीती तो उसे हिन्दी बेल्ट को जीतना मुश्किल होगा। 0 रमेश कुमार ‘रिपु’ लोकतंत्र में एक बयान चुनाव की दशा और दिशा बदल देते हैं। जनता की सोच बदल देते हैं। जनता में भावनात्मक लहर पैदा कर देते हैं। सत्ता में आने पर बजरंग दल पर प्रतिबंध की बात कांग्रेस ने की तो बीजेपी ने इसे धर्म से जोड़ कर हिन्दुत्व की राजनीति को हवा दे रही है। बीजेपी को लगता है, हिन्दुत्व की राजनीति से कर्नाटक में भगवा छतरी तन जाएगी। यदि कर्नाटक बीजेपी नहीं जीती तो उसे हिन्दी बेल्ट को जीतना मुश्किल होगा। वैसे अमितशाह और तमाम चैनल के सर्वे के आधार पर पार्टी मान चुकी थी, कि दक्षिण का मिशन खतरे में है। बीजेपी ने अब बजरंग दल को बजरंगबली से जोड़ कर कर्नाटक में धर्म ध्वजा के जरिए विपक्ष को तगड़ा झटका देने की मुहीम में जुट गई है। पार्टी के नेता मान रहे हैं,कि प्रदेश भर में हनुमान चालीसा का पाठ और मोदी के (28 विधान सभा में ) रोड शो से कांग्रेस बैकफुट में आ गई। ‘हाथ’ में आने वाली सत्ता के फिसल जाने के भय से कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष डी.के. शिवकुमार ने कहा,सत्ता में आने पर पूरे राज्य में हनुमान मंदिर का जीर्णोद्वार करवाएंगे और नए हनुमान मंदिर बनवाएंगे। पूर्व कानून मंत्री और कांग्रेस नेता वीरप्पा मोइली बीजेपी के हिन्दुत्व कार्ड की बढ़ती तपिश को कम करने कहा, पीएफआई और बजरंगदल जैसे संगठन को समाज में शांति भंग करते हैं। राज्य सरकार बजरंग दल को प्रतिबंधित नहीं कर सकती। बीजेपी बजरंग बाण से चालीस फीसदी वाली सरकार और अल्पसंख्यकों को आरक्षण नहीं देने जैसे मामले की हवा निकालने में लग गई है। यू.पी में अयोध्या के तर्ज पर बेंगलूरु के रामगढ़ में स्थित राम मंदिर में भव्य राम मंदिर बनाने की घोषणा कर दी। रामगढ़ में ही शोले फिल्म की शूटिंग हुई थी। रामगढ़ के आस-पास के इलाके में करीब चालीस विधान सभा आते हैं। हिन्दुत्व कार्ड का असर कितना हुआ,चुनाव परिणाम बताएंगे। चुनावी हथकंडे - कर्नाटक चुनाव जीतना बीजेपी के लिए 2024 के लोकसभा चुनाव के नजरिए से महत्वपूर्ण है। क्यों कि पिछली बार कर्नाटक ने मोदी की झोली में 25 सीटें दी थी। बीजेपी ने कर्नाटक में अपनी सत्ताई किला बचाने के लिए रेवड़ी की पोटली भी उछाली। जबकि प्रधान मंत्री रेवड़ी नीति की खिलाफत मंच से कई बार चुके हैं। सत्ता विरोधी लहर को कम करने की पूरी ऊर्जा पार्टी लगा दी है। बीजेपी एस.सी. कोटे का आरक्षण 15 फीसदी से बढ़ाकर 17 कर दिया है। और एस.टी. कोटे को 3 से बढ़ाकर सात कर दिया है। लिंगायत समाज की कुछ जातियों को आरक्षण 5 से 7 और वोक्कालिंगा समाज का 4 से 6 फीसदी कोटा बढ़ाया गया है। मोदी की छवि दांव पर - कर्नाटक चुनाव तय करेगा पी.एम.मोदी की छवि से वोटर कितना प्रभावित है। पंजाब,हिमाचल प्रदेश और नागालैंड में पी.एम की छवि का कोई खास लाभ नहीं मिला। इसलिए पार्टी कर्नाटक का चुनाव स्थानीय नेताओं के दम पर लड़ रही है। पार्टी में लिंगायत समाज के वसवराज बोम्मई सी.एम.हैं,लेकिन चुनाव प्रचार की कमान वोक्कालिंगा के केन्द्रीय मंत्री शोभा करंदलाजे के पास है। वोक्कालिंगा वोटरों को साधने के लिए बीजेपी ने बेंगलूरु के संस्थापक कैपेगौड़ा की एयरपोर्ट के सामने 108 फीट की प्रतिमा का लोकार्पण मोदी ने पिछले साल किया था। इसके अलावा वोक्कालिंगा के धर्म गुरू निर्मलानंद स्वामी से अमितशाह की कई भेंट से सियासी फायदा से जोड़ा जा रहा है। इस जाति का आरक्षण दो फीसदी बढ़ा दिया गया है। बीजेपी से नाराज - पुराना मौसूर वोक्कालिंगा का गढ़ है। यहां जेडीएस मजबूत है। पिछले दफा 58 सीटों में सबसे अधिक 24 सीट जेडीएस को,कांग्रेस को 18 और बीजेपी को 15 सीट मिली थी। मुसलमानों को पाले में लाने कांग्रेस पहले से ही प्रयासरत है। बोम्मई सरकार ने चुनाव से पहले मुसलमानों के लिए चार फीसदी कोटा समाप्त कर दिया था। जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने नौ मई तक रोक लगा दी। दरअसल अधिकांश विधान सभा में मुस्लिम वोटर 20 से 25 हजार के करीब हैं। पिछले चुनाव में कांग्रेस को 38 फीसदी वोट मिले थे,जो बीजेपी से दो फीसदी अधिक था। इसके बावजूद बीजेपी को कांग्रेस से अधिक सीट मिली थी। बीजेपी के 105 विधायक जीते थे। कर्नाटक में 224 विधान सभा में 54 लिंगायत समाज के विधायक हैं। जिसमें सर्वाधिक 37 बीजेपी के विधायक हैं। सौ सीटों पर लिंगायत वोटर प्रभावी हैं। ओल्ड कर्नाटक-मुंबई रीजन यानी अभी का कितुर कर्नाटक क्षेत्र में इसकी बहुलता है। इस क्षेत्र में बेलागवी, धारवाड़,विजयपुरा,गडग,हवेरी,बगलकोट और उत्तर कन्नड़ के सात जिले और विधान सभा की 50 सीटें आती है। कांग्रेस का वर्तमान नेतृत्व गैर लिंगायत के हाथों में है। लिंगायत इस समय बीजेपी से नाराज है। देवगौड़ा की पार्टी जेडीएस का आधार वोक्कालिंगा वोटर हैं। इस बार कुमार स्वामी यही मानकर चल रहे हैं कि किसी को बहुमत नहीं मिलने पर उनकी बल्ले-बल्ले हो सकती है। कांग्रेस की रणनीति - बीजेपी को सत्ता में आने से रोकने के लिए डी.के शिवकुमार और सिद्धरमैया की जोड़ी आपसी गुटबाजी को दरकिनार करके सीधे जनता को सरकार की नकामी गिना रहे हैं। कांग्रेस सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार के सवाल पर बोम्मई सरकार को घेर रही है। चालीस फीसदी कमीशन की सरकार का स्लोगन देकर कांग्रेस ने बीजेपी के नाक में दम लगा रखा है। भारत जोड़ो यात्रा में राहुल गांधी लंबे समय तक कर्नाटक में ही रहे। इसका प्रभाव जनता में काफी देखा गया है। कांग्रेस अघ्यक्ष मल्ल्किार्जुन खड़गे दलित वोटरों को लुभाने में लगे हैं। प्रदेश अध्यक्ष डी.के. शिवाकुमार खुद वोक्कालिंगा जाति से हैं और सिद्धरमैया पिछड़ी जाति कोरुबा से है। हिन्दुत्व पर जोर - बीजेपी ने अपने घोषणा पत्र में हिन्दुत्व पर जोर दिया है। गो हत्या प्रतिबंध कानून और जबरिया धर्म परिवर्तन कानून का सख्त बनाने का वायदा किया। बीजेपी को लगता है कि हिजाब विवाद,टीपू सूल्तान विवाद,और मुस्लिम व्यापारियों के बहिष्कार से उसे फायदा मिल सकता है। पार्टी राज्य में 2500 करोड़ रुपये से पाँच सर्किट बनाने की बात कही है। इन पांच सर्किट में तीन परशुराम सर्किट,गंगोपुरा सर्किट,और कावेरी सर्किट वाले इलाके टीपू सुल्तान,हिजाब और पीएफआई पर रोक जैसे मुद्दे हैं। वोटरों को लुभाने बीजेपी ने गरीबी रेखा के नीचे परिवार को आधा लीटर नंदिनी दूध प्रतिदिन देने का वायदा की। दरअसल कांग्रेस ने बीजेपी पर राज्य के सहकारी ब्रांड नंदनी को खत्म करने का आरोप लगाया था। हर महीने परिवार के हर सदस्य को 5 किलो बाजरा। उगादी,गणेश चतुर्थी और दीवाली पर बीपीएल परिवार को तीन मुफ्त गैस सिलेंडर, कर्नाटक ओनरशिर में संशोधन, हर वार्ड में लैब, अटल आहार केन्द्र,कर्नाटक में समान नागरिक संहिता आदि बातें हैं। बहरहाल कर्नाटक यदि बीजेपी हार गई तो उसे मध्यप्रदेश बचाने में दिक्कत जा सकती है। छत्तीसगढ़ उसके हाथ में आएगी इसकी संभावना कम है। राजस्थान में गहलोत और सचिन के सियासी जंग पर बीजेपी की राजनीति टिकी है। तेलंगाना में बीजेपी नहीं आई तो अगामी लोकसभा चुनाव चौकाने वाले होंगे।

Saturday, April 15, 2023

झूठे इतिहास का बहुत जरूरी है आपरेशन

'वामपंथी और कांग्रेसी इतिहासकारों ने इतिहास को अपने विचारों की प्रयोगशाला बना दिया। मुगल शासक
ों की क्रूरता और अत्याचार को ढकने में अपनी सारी बौद्धिकता लगा दी। मुगल बादशाहों को इतिहास में नेक दिल और अच्छा इंसान बताने की साजिश की गयी है। इतिहास का सिर्फ आॅपरेशन ही नही बल्कि,नए सिरे से लिखा जाना जरूरी है। क्यों कि पुराना इतिहास केवल झूठ का पुलिंदा है।' 0 रमेश कुमार' रिपु ' एनसीइआरटी (राष्ट्रीय शैक्षणिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद) के अधिकारियों ने इतिहास की किताबों से कुछ चीजों को हटाने का फैसला किया है। उनके इस फैसले पर विवाद हो रहा है। कायदे से पूरा इतिहास नए सिरे से लिखा जाना चाहिए। इसलिए कि वामपंथी इतिहासकारों ने झूठा इतिहास खूब लिखा है। यहां तक लिखा है कि मुगल दौर में एक भी मंदिर नहीं तोड़ा गया था। आज के दौर में कोई भी बच्चा यह मानने को तैयार नहीं है। इतिहास का अपना सच और झूठ दोनों है। देश की आजादी के 75 वर्ष बाद भी हमारे बच्चे इतिहास का झूठ क्यों पढ़ें? यानी अमृत महोत्सव के दौर में क्यों पढ़ा जाए कि अकबर महान था। जो जीता वही सिंकदर। औरंगजेब की बर्बरता को नजर अंदाज क्यों किया जाए। धर्म परिवर्तन नहीं करने पर 1704 में श्री गोविंद सिंह के दो पुत्रों, साहिबजादे जोरावर सिंह और फतेह सिंह को मुगल शासक ने ईंटों की दीवार में चुनवा दिया था। हूमायू की झूठी गाथाएं हमारे बच्चे क्यों पढ़ें? सोमनाथ का मंदिर लूटने वाले मुहम्मद गजनवी की महिमा मंडित क्यों? कारीगरों के हाथ कटवा देने वाले शाहजहां को अपनी बेगम मुमताज का बहुत बड़ा प्रेमी बताने की झूठी कहानी क्यों पढ़ी जाए? वामपंथी इतिहासकारों ने दक्षिण के राजाओं,राजवंशों का इतिहास लिखा ही नहीं। चोल राजाओं ने एक हजार साल तक राज किया था। पुराने इतिहास में मुगल दौर को ज्यादा अहमियत दी गई। जबकि मुगलों का सिर्फ तीन सौ साल का इतिहास है। प्राचीन इतिहास में मुगल दौर की जितनी भी झूठी गाथाएं हैं,उन्हें हटा कर नए सिरे से इतिहास लिखा जाना चाहिए। शाहजहां और मुमताज में नहीं था प्रेम - आज भी यही कहा जाता है कि शाहजहां ने अपनी बेगम मुमताज की याद में ताजमहल बनाया। जबकि इतिहास में ऐसा कोई तथ्य नहीं मिलता कि शाहजहां और मुमताज में कोई प्रेम था। इसके विपरीत जहांगीर और नूर जहांँ में प्रेम था। अपनी पत्नी से प्रेम करने वाला शासक प्रतिभावान कारीगरों के हाथ कटवा दे,उसे कला का संरक्षक नहीं कहा जा सकता। शाहजहां अहंकारी और अत्याचारी शासक था। मुमताज के दफनाने की तिथि का उल्लेख नहीं मिलता है। भिन्न-भिन्न तिथियांँ है। ताजमहल कब बना, इसकी कोई तारीख तय नहीं है। टेवर नियर भारत में 1641 में आया था। मुमताज की मौत के ग्यारह वर्ष बाद। तब तक ताजमहल नहीं बना था। वह ताजमहल बनते देखा है। टेवर नियर 1641 से 1668 तक भारत में था। जय सिंह का,पैतृक राजा प्रसाद ले लिया गया था और मुमताज की मौत के बाद उसे उस में दफनाया गया था। पहले मंदिर था जामा मस्जिद - दिल्ली के संदर्भ में यही बताया जाता है कि पुरानी दिल्ली की स्थापना 15वीं शताब्दी में बादशाह शाहजहाँ ने की थी। जबकि तैमूरलंग जिसने सन् 1338 ई० के क्रिसमस के दिनों में दिल्ली पर आक्रमण किया था। कत्ले आम उसने पुरानी दिल्ली में ही किये थे। पुरानी दिल्ली का प्रमुख मन्दिर तैमूरलंग के आक्रमण काल में ही मस्जिद में बदल गया था। यदि ऐसा नहीं हुआ तो हिन्दू लोग उस भवन में अपनी स्वेच्छा से एकत्र न हुए होते। आज जिसे जामा मस्जिद नाम से पुकारा जाता है वो एक हिन्दू मंदिर ही था। इतिहासकारों ने बता दिया कि इसे शाहजहां ने बनवाया था। मंदिर था निजामुद्दीन का मकबरा -दिल्ली में निजामुद्दीन का मकबरा कहलाने वाली इमारत कभी हिंदुओं का मंदिर था। इस पर पंचरत्न के पांच गुंबज हैं। आज भी पंच, पंचामृत, पंचगनी आदि के महत्व को हिन्दू जानते है। इमारत गेहुए रंग के पत्थर की बनी हुई है। जो हिंदू ध्वज का रंग है। अंदर एक विशाल बावड़ी है। उस के तल में हिंदू मूर्तियां पड़ी मिलेंगी। इस्लामी हमलावरों ने मंदिरों से उखाड़ कर उसमें फिकवा दी। हैरानी वाली बात है कि जब तक निजामुद्दीन थे उनका कोई महत्व नहीं था। उनके मौत के बाद महल कोई क्यों बनवाएगा? सिंकदर नहीं था महान - इतिहास में लिखा है सिंकदर महान था। उसने चाणक्य के साथी पोरस को हरा दिया। क्या पोरस महान नहीं था? यूनानी इतिहासकारों ने सिकंदर को महान बताने के लिए लिख दिया कि जो जीता वही सिंकदर। भारतीय इतिहासकार यही लिखते,जो जीता वही पोरस। सिकंदर अपने पिता की मृत्यु के पश्चात अपने सौतेले और चचेरे भाइयों का कत्ल करने के बाद मेसेडोनिया के सिंहासन पर बैठा था। अपनी महत्वाकांक्षा के कारण वह विश्व विजय को निकला। यूनान के मकदूनिया का राजा सिकंदर कभी भी महान नहीं था। यूनानी योद्धा सिकंदर एक क्रूर अत्याचारी और शराब पीने वाला व्यक्ति था। सिकंदर ने कभी भी उदारता नहीं दिखाई। प्रसिद्ध इतिहासकार एर्रियन लिखते हैं, जब बैक्ट्रिया के राजा बसूस को बंदी बनाकर लाया गया। तब सिकंदर ने उनको कोड़े लगवाए और उनका नाक-कान कटवा दिया । कुछ दिनों बाद उनकी हत्या करवा दिया। उसने अपने गुरु अरस्तू के भतीजे कलास्थनीज को मारने में संकोच नहीं किया। ऐसे व्यक्ति को महान कैसे कह सकते हैं? सच यह है कि यूनानी इतिहासकारों ने सिकंदर के बारे में झूठ लिख कर अपने महान योद्धा और देश के सम्मान को बचाया। ज्ञानी नहीं थे मौलाना आजाद - इतिहासकार ठाकुर रामसिंह शेखावत के अनुसार देश के पहले शिक्षामंत्री मौलाना आजाद को भारतीय संस्कृति का ज्ञान नहीं था। उनके एवं उनके बाद बने मुस्लिम शिक्षामंत्रियों के इशारे पर योजनाबद्ध तरीके से इतिहास में काफी फेरबदल किया गया। रामसिंह अंग्रेज इतिहास बिनसेंट स्मिथ का हवाला देते हुए कहते हैं, कि सारंगपुर विजय के बाद मुगल सिपहसालार आसफ खां ने अकबर को चिट्ठी लिखी थी कि मालवा और निमाड़ को हिन्दूविहीन कर दिया गया है। इस चिट्ठी का उल्लेख स्मिथ की पुस्तक में है। क्रूर था अकबर - अकबर के लिए पहली बार महान शब्द का संबोधन एक पुर्तगाली पादरी ने किया था। अकबर इतना क्रूर था कि आत्मसमर्पण करने वाले इस्लाम कबूल नहीं करते थे,उन्हें मौत के घाट उतार देता था। अकबर एक धूर्त बादशाह था। यह अलग बात है,कि टी.वी. और फिल्मों में अकबर और जोधाबाई के प्रेम प्रसंग दिखाए जाते हैं। जबकि हकीकत में जोधा से अकबर की शादी नहीं हुई थी। उसका भाई भारमल का बेटा भूपत उसका डोला अकबर के खेमे में छोड़ गया था। अबुल फजल ने भी एक जगह उल्लेख किया है कि जोधा को एक बार ही आगरा के महल से बाहर निकलने दिया गया। उसका भाई अकबर को बचाते हुए मारा गया था। बख्तियार के नाम रेल्वे स्टेशन -दुनिया का सबसे अधिक समृद्ध विश्वविद्यालय नालंदा की किताबों से और उसके विचारों से आपत्ति करने वाले मुगल शासक बख्तियार खिलजी ने उसे जला दिया। कई महीने तक किताबें जलती रहीं। दुनिया में इतिहास का ज्ञान रखने वाला नालंदा विश्वविद्यालय खाक हो गया। ज्ञान के दुश्मन का महिमा मंडित करने वाले का इतिहास क्यों पढ़ा जाए? नए जमाने की पीढ़ी को ऐसी शख्सियत से क्या मिलेगा। इतिहास में खलनायक वाले पात्र अनेक हैं। हैरानी की बात है बख्तियार के नाम का बख्तियारपुर रेल्वे स्टेशन अब भी है। वामपंथी और कांग्रेसी इतिहासकारों ने इतिहास को अपने विचारों की प्रयोगशाला बना दिया। मुगल शासकों की क्रूरता और अत्याचार को ढकने में अपनी सारी बौद्धिकता लगा दी। मुगल बादशाहों को इतिहास में नेक दिल और अच्छा इंसान बताने की साजिश की गयी है। क्यों कि पुराना इतिहास केवल झूठ का पुलिंदा है। मुगलिया सलतनत ने देश की संस्कृति और उसके गौरव के साथ खिलवाड़ किया। फिर भी उनकी महिमा मंडन इतिहास में है। इसलिए झूठे इतिहास का आॅपरेशन जरूरी है।

Saturday, April 1, 2023

क्या छत्तीसगढ़ के नक्सली‘कांग्रेसी’ हो गए..?

सिलगेर जैसी घटना की पुनरावृति चाहे जितनी बार हो, नक्सली नहीं चाहते कि छत्तीसगढ़ में बीजेपी की सरकार बने। इसलिए एक बार फिर लाल सलाम के निशाने पर भाजपाई हैं। और माओवादी कांग्रेस नेता राजबब्बर की कही बात को अमल में लाने बीजेपी नेताओं की हत्या कर क्रांतिकार बनने में लगे हैं। 0 रमेश कुमार ‘रिपु’ कांग्रेस नेता राजबब्बर ने छत्तीसगढ़ कांग्रेस भवन में 4 नवम्बर 2018 को कहा था,‘‘नक्सली क्रांतिकारी हैं। वे क्रांति करने निकले हैं। उन्हें कोई रोके नहीं।’’ तो क्या यह मान लिया जाए कि छत्तीसगढ़ में बीजेपी नेताओं की हत्या कर के नक्सली क्रांतिकारी बनना चाहते हैं। या छत्तीसगढ़ के नक्सली अपनी विचार धारा बदल लिए है। अब वे भाकपा का चोला उतार कर कांग्रेसी हो गए हैं। यह सवाल छत्तीसगढ़ में पिछले एक माह में उनके द्वारा चार भाजपा नेताओं की हत्या पर उठा है। अभी तक यही कहा जाता था कि नक्सलियों की अपनी सोच है। विचार धारा है। वे सरकार के दुश्मन हैं। वे अपनी जनताना सरकार चलाते हैं। अब वे बदल गए हैं। इसीलिए जितना उपद्रव बीजेपी के शासन मे ंकिया उतना कांग्रेस के शासन में नहीं। वे एकदम से चुप बैठ गए हैं,ऐसा भी नहीं है। वारदात करके अपने होने का एहसास कराते रहते हैं। सांसद और बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष अरूण साव ने संसद में बीजेपी नेताओं की हत्या का मामला उठाया तो प्रदेश में राजनीति गरमा गई। बीजेपी मंडल अध्यक्ष नीलकंठ ककेम की घर में घुसकर नक्सलियों ने उनकी हत्या कर दी। दूसरी घटना नारायणपुर जिले के छोटे डोंगर में बीजेपी जिला उपाध्यक्ष सागर साहू की माओवादियों ने घर में हत्या की। तीसरी घटना दंतेवाड़ा जिले के हितामेटा गांव की है। पूर्व सरपंच और बीजेपी के सक्रिय नेता रामधर अलामी की हत्या की। इसके पहले बस्तर जिले के बास्तानार इलाके में भी बीजेपी जिला महामंत्री बुधराम करटम की हत्या की। हालांकि बस्तर पुलिस ने भाजपा के जिला महामंत्री के मौत को दुर्घटना बताया है। वहीं भूपेश सरकार का दावा है राज्य में नक्सली वारदातों में भारी कमी आई है। पहले जहांँ आए दिन नक्सली वारदातें हुआ करती थी,अब थम गयी है। सवाल यह है,कि अब नक्सली नरम किसके लिए हुए हैं। राजनीतिक सवाल कई हैं। उन्हीं सवालों में एक सवाल यह है,कि भूपेश सरकार नक्सलियों पर नकेल लगाने में कामयाब हो गई है तो फिर लाल सलाम के निशाने पर बीजेपी नेता ही क्यों हैं? मुख्यमंत्री भूपेश बघेल कहते हैं,बीजेपी चाहे तो एनआइए से जांच करा ले। नक्सलियों ने अपनी रणनीति बदली है। वे पहले हमला करते थे,अब घर में जाकर हत्या करने लगे हैं। वे कमजोर हुए हैं। रिकार्ड देख सकते हैं,हमने छह सौ गांवों को नक्सली मुक्त कराया है। तीन सौ स्कूल फिर से प्रारंभ किए गए हैं। सरकार किसी भी पार्टी की हो,नक्सली बंदूक से निकली गोली,‘मौत का वारंट’ बनी। छत्तीसगढ़ के दूर अंचलों में क्रांति के नाम पर लाल गलियारे में धधक रही आग में भी दहशत की कहानी है। यह आग सरकार विरोधी है। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में माओवादी हिंसा के फैलाव को कम करने के मक़सद से सलवा जुडूम शुरू न किया गया होता, तो शायद माओवादियों के निशाने पर राजनीतिक दलों के नेता न होते। सलवा जुड़ूम ने माओवादियों को आक्रोशित कर दिया। सलवा जुडूम की वजह से 25 मई 2013 को नक्सलियों ने झीरम कांँड किया। नक्सलियों ने 32 कांग्रेसी नेताओं और कार्यकर्ताओं की बर्बरता पूर्वक हत्या की थी। यह वारदात बड़ी भयावह थी। झीरम कांँड के चार साल बाद नक्सलियों ने बीजेपी नेताओं को धमकाना शुरू कर दिया था। पुलिस के हत्थे चढ़ा तीन लाख का इनामी कुख्यात माओवादी मद्देड़ एल.जी.एस कमांडर राकेश सोढ़ी 23 जून 2017 को खुलासा किया,कि वन मंत्री महेश गागड़ा माओवादियों की हिटलिस्ट में हैं। महेश गागड़ा घोर नक्सल प्रभावित इलाके बीजापुर में रहते हैं। उन्हें मारने के लिए सेन्ट्रल कमेटी ने आदेश जारी किया था। नक्सली राकेश सोढ़ी के खुलासे पर पूर्व मुख्यमंत्री डाॅ रमन सिंह ने वन मंत्री की सुरक्षा बढ़ा दी थी। नक्सली राकेश सोढ़ी के मुताबिक माओवादियों के खिलाफ़ आॅपरेशन से सेन्ट्रल कमेटी के नेता नाराज़ हैं। ‘आॅपरेशन प्रहार’ को रोकने सेन्ट्रल कमेटी ने बीजेपी के नेताओं की हत्या की योजना बना रहे हैं।’’ नक्सली राकेश सोंढ़ी के मुताबिक मद्देड़ जिला पंचायत सदस्य और बीजेपी नेता की हत्या माओवादी कमांडर नागेश के कहने पर की गई थी। किरंदुल थाने के चोलनार में नक्सलियों ने पूर्व जनपद अध्यक्ष और कांग्रेस नेता छन्नूराम की 26 जून 2017 की रात चाकू और कुल्हाड़ी से हत्या कर दी। वे नक्सली हमले में शहीद महेंद्र कर्मा के करीबी थे। उस समय प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल ने कहा,‘‘बस्तर में कांग्रेसी सुरक्षित नहीं हैं। चुनाव आते ही कांग्रेस नेताओं की हत्या बस्तर में शुरू हो जाती है। राज्य सरकार सुरक्षा दे पाने में नाकाम है।’’ डाॅ रमन सिंह के समय नक्सलियों ने एक फ़रमान जारी किया था,कि भाजपा नेता,भाजपा छोड़ें और सरकार की तारीफ करना बंद करें अन्यथा उनकी जान की ख़ैर नहीं है। डाॅ रमन सिंह के समय भी बीजेपी के 35 लोग पार्टी से इस्तीफ़ा दे दिए थे। भाजपा के दो जिला पंचायत सदस्यों को नक्सलियों ने गोली मार दी थी। बस्तर में माओवादियों ने 2018 के चुनाव के डेढ़ साल पहले से बीजापुर से बीजेपी को खत्म करने अपने अभियान की शुरूआत कर दी थी। बीजापुर के ग्रामीण क्षेत्रों के बीजेपी नेताओं को अल्टीमेटम दिया कि वे बीजेपी छोड़ दें। भोपालपटनम के भाजपा नेता मज्जी रामसाय और बोरगुड़ा के सरपंच यालम नारायण की नक्सलियों ने हत्या कर यह बता दिया, कि उनके फ़रमान को नकारना ठीक नहीं है। इसके बाद वनमंत्री महेश गागड़ा के काफिले पर पैगड़पल्ली के निकट हुए हमले में जिला पंचायत सदस्य रमेश पुजारी को अपनी जान गंवानी पड़ी थी। महेश गागड़ा के ही करीबी भाजयुमो अध्यक्ष मुरली कृष्ण नायडू पर भी हमला किया था। मुख्यमंत्री डाॅ. रमन सिंह के लोक सुराज अभियान के दौरान 2016 में 28 अप्रैल को जब वे भोपालपटनम और तिमेड़ पहुंचे, तो दहशत के चलते क्षेत्र का कोई भी भाजपा पदाधिकारी उनसे मिलने नहीं गया था। भारतीय जनता युवा मोर्चा के बीजापुर जिला अध्यक्ष रह चुके, जगदीश कोंड्रा की नक्सलियों ने कुल्हाड़ी से 27 मार्च 2018 को हत्या कर दी थी। सिलगेर जैसी घटना की पुनरावृति चाहे जितनी बार हो, नक्सली नहीं चाहते कि छत्तीसगढ़ में बीजेपी की सरकार बने। इसलिए एक बार फिर लाल सलाम के निशाने पर भाजपाई हैं। और माओवादी कांग्रेस नेता राजबब्बर की कही बात को अमल में लाने बीजेपी नेताओं की हत्या कर क्रांतिकार बनने में लगे हैं।