Saturday, May 25, 2024

संघ से पंगा सस्ता या महंगा,

 


सांस्कृतिक ताकत से सियासी मशीन में तब्दील संघ के क्या बुरे दिन आने वाले हैं? अब बीजेपी को संघ की जरूरत नहीं है कहकर जे.पी.नड्डा ने केवल  चौकाया ही नहीं है,बल्कि संकेत दे दिया है, कि पार्टी में अब आदेश नागपुर का नहीं, गुजरात लाॅबी का चलेगा। चार जून को बीजेपी को बहुमत नहीं मिला तो संघ प्रमुख गुजरात लाॅबी को दर्शक दीर्घा में बिठा देंगे और परिणाम उल्टा हुआ तो संघ का वजूद मोदी खत्म कर देंगे।  

-- रमेश कुमार ‘रिपु’
क्या वाकई में मोदी की बीजेपी बदल गयी है! उसकी चाल। उसका चेहरा। उसका चरित्र। और शुचिता अब 2014 जैसी नहीं है। इसीलिए अब बीजेपी को संघ की जरूरत नहीं। क्या वाकई में अकेले अपने दम पर बीजेपी इतनी मजबूत हो गयी है,कि उसे संघ की जरूरत नहीं है। इसीलिए बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी.नड्डा ने संघ और बीजेपी में अंतर क्या है,इंडियन एक्सप्रेस को दिये गये साक्षात्कार में देश को बताया। अटल बिहारी बजापेयी के समय बीजेपी को चलाने के लिए संघ की जरूरत थी। क्यों कि उस समय बीजेपी कम सक्षम और छोटी पार्टी हुआ करती थी। आज बीजेपी पहले से अधिक सक्षम है। बीजेपी अपने आप को चलाती है। बीजेपी के नेता अपने कर्तव्य और भूमिकाएं निभाते हैं। संघ एक सास्कृतिक और समाजिक संगठन है। जबकि बीजेपी राजनीतिक पार्टी है। संघ वैचारिक तौर पर काम करता है।हम अपने मामलों को अपने तरीके से संभालते हैं। और राजनीतिक दलों को यही करना चाहिए।

नागपुर के फैसले नहीं चलेंगे-सवाल यह है,कि ऐसा क्या हो गया इन दस सालों में,कि संघ की शाखा से निकली बीजेपी को आज संघ की जरूरत नहीं है।नड्डा ने संघ से पंगा लिया या फिर उन्हें कहा गया,कि संघ को बता दो ‘किंग ऑफ बीजेपी मोदी’ का दौर है। जिसमें बीजेपी को किसी के सहारे की जरूरत नहीं है।नड्डा के बयान पर न अमित शाह कुछ बोले औरे न ही मोदी का कोई बयान आया है। इसका सीधा मतलब है,कि अभी तक जो फैसले नागपुर से लिए जाते थे,वो अब बीजेपी के लिए दिल्ली से लिए जाएंगे।यानी कह सकते हैं,कि कभी डिफरेंट विथ अदर्स का घमंड करने वाली बीजेपी ‘पार्टी विद डिफरेंस’ बन गयी। क्या यह मान लिया जाए कि सांस्कृतिक ताकत से सियासी मशीन में तब्दील संघ के बुरे दिन आने वाले हैं? अब बीजेपी को संघ की जरूरत नहीं है कहकर जे.पी.नड्डा ने केवल चौकाया ही नहीं है,बल्कि संकेत दे दिया है कि पार्टी में अब आदेश नागपुर का नहीं गुजरात लाॅबी का चलेगा। चार जून को बीजेपी को बहुमत नहीं मिला तो संघ प्रमुख गुजरात लाॅबी को दर्शक दीर्घा में बिठा देंगे और परिणाम उल्टा हुआ तो संघ का वजूद मोदी खत्म कर देंगे।  

मोदी और मोहन में संवादहीनता - नड्डा के बयान से एक बात साफ है,कि मोदी और मोहन भागवत के बीच मधुर संबंध नहीं हैं। उनके बीच संवाद ठप है। जबकि अभी दो चरण के मतदान होने हैं। यू.पी.महाराष्ट्र ही नहीं,पूरे देश में इस बार संघ ने अपने हाथ खड़े कर लिए हैं। उसने बीजेपी को इस बार के चुनाव में कोई सहयोग नहीं किया। संघ की मदद से बीजेपी को हर चुनाव में दस से पन्द्रह फीसदी वोट का फायदा हो जाया करता था।इस बार संघ की चुप्पी साध लेने की वजह से राहुल गांधी दावा कर रहे हैं,कि मोदी चार जून को पी.एम.नहीं रहेंगे। चार जून को कौन पी.एम.रहेगा या देश को नया पीएम मिलता है,सब कुछ सियासी पर्दे के अंदर है। लेकिन नड्डा के बयान से बीजेपी के अंदर ही हांडी खदबदाने लगी है। शिवराज सिंह चौहान,योगी आदित्यनाथ,नितिन गडकरी,वसुंधरा राजे सिधिया,डाॅ रमन सिंह,राजनाथ और मुख्तार अंसारी आदि की निगाहें चार जून पर टिकी है। यदि बीजेपी को बहुमत नहीं मिला तो मोदी की वजह से जो हाशिये में डाल दिये गये हैं,वो सारे मोदी की सियासी रेखा को मिटाने आगे आ जाएंगे।

दो विचारधारायें जन्मी - सन् 1925 में गठित संघ भाजपा की कमान अपने हाथ में रखने के मकसद से हर प्रदेश में संगठन मंत्री का पद देकर अपना एक प्रतिनिधि भेजता आया है। यही संगठन मंत्री धीरे-धीरे माल कमाने वाले नेताओं के रूप में भाजपा को चलाने लगे। तभी से संघ में राजनीति को लेकर दो विचारधाराएं आकार लेने लगी। संघ के लोग बीजेपी में आकर विलासी जीवन जीने लगे। ऐसे लोग वापस संघ में जाना नहीं चाहते।मोदी इस पर लगाम लगाना चाहते हैं। देखा जाए तो संघ स्वयं अपने गठन के सिद्धातों से दूर होता चला गया है। भाजपाइयों और सत्ता लोलुपता वालों पर संघ नकेल नहीं लगाता है। संघ का बीजेपी में पकड़ कमजोर करना चाहते हैं मोदी।पार्टी में कई नेता संगठन से बड़े बनने की कोशिश पहले भी करते आए हैं। यूपी में कल्याण सिंह,राजस्थान में वसुंधरा राजे सिंधिया,कर्नाटक में येदुरप्पा,मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह,नागपुर में नितिन गडकरी आदि। मोदी मानते हैं कि ऐसे लोगों की वजह से पार्टी को नुकसान होता है। मोदी अपनी शर्त पर काम करते हैं। मोदी की खिलाफत जो करता है,उसे वो किनारे करने में जरा भी देर नहीं करते। संजय जोशी का मामला सभी जानते हैं।
बीजेपी पर संघ का दबदबा रहा है। चाहे चुनाव के दौरान उम्मीदवारों का चयन हो या फिर भाजपा के शीर्ष नेता को बदलने का।मोदी अपनी जिद की करते रहे। मोहन भागवत के अति करीबी नितिन गडकरी से उनका कई विभाग छीन लिया। उनके खिलाफ कार्रवाई करना चाहते थे। सीएजी की रिपोर्ट के बाद एनएचएआई अधिकारी अरेस्ट किये गए। नितिन गडकरी को भी अरेस्ट करके मोदी अपने रास्ते से हटाना चाहते थे।लेकिन मोहन भागवत के दखल पर चुप हो गये। संघ चूंकि शाखाओं पर आधारित संगठन है।जो गांव से लेकर शहर तक फैला हुआ है। इन्हीं से निकल कर बीजेपी के नेता आते हैं। अब शाखाएं सिमट गयी तो बीजेपी के कार्य कर्ता बनने लगे। इससे इंकार नहीं है,कि सत्ता सुख की गोद में बैठने वाले संघ के लोग भाजपा पर निर्भर हैं।

बीजेपी से बड़े मोदी - सन् 1977 में जन संघ का जनता पार्टी में विलय हो गया था। जनता पार्टी छिन्न भिन्न हो गयी थी। तब जनसंघ की नीतियों की कोख से बीजेपी का जन्म हुआ। अटल बिहारी बाजपेयी जैसे शब्दों के जादूगर की अगुआई में बीजेपी ने चलना शुरू किया और सत्ता के मंजिल तक पहुंची। मोदी ने अटल की बीजेपी को एक नयी ऊंचाई तक पहुंचाया। देश की सबसे बड़ी पार्टी बनाया। राममंदिर बनाया। धारा 370 खत्म किया। तीन तालाक खत्म किया। कांग्रेस से लड़ते-लड़ते बीजेपी बीजेपी का कांग्रेसी करण हुआ। जो कुछ बचा था,उसे मोदी ने पूरा कर दिया। जिन कांग्रेसियों को भ्रष्ट नेता कहा जाता था,उन सभी को मोदी ने ई.डी.सीबीआइ और आइ.टी का डर दिखाकर बीजेपी में शामिल कर लिया। आज मोदी बीजेपी से भी बड़े बन गए है।

बीजेपी का नया वोट बैंक - बीजेपी ने संघ के हिन्दुत्ववादी ऐजेंडे से बाहर जाकर सोशल इंजीनियरिंग का एक नया वोट बैंक तैयार कर लिया है। इसलिए नड्डा ने कहा,कि अब भाजपा की मथुरा और काशी के विवादित स्थलों पर मंदिर बनाने की कोई योजना नहीं है। जबकि मोहन भागवत चाहते हैं,केन्द्र में हिन्दूवादी सरकार रहे।और भारत,हिन्दू राष्ट्र बने। चूंकि 2025 में संघ अपना शताब्दी वर्ष मनाने जा रहा है। लेकिन मोदी अपनी राह चुनने का फैसला किया है। सन् 2014 में मोदी जब पी.एम.बने वो संघ कार्यालय नहीं गए। जबकि मोहन ने कहा था,यह जीत किसी एक व्यक्ति की नहीं,इसमें लाखों करोड़ों संघ के लोगों का भी योगदान है। सन् 2015 में दिल्ली में मध्यप्रदेश सरकार के मध्याचंल भवन में केन्द्र सरकार के मंत्रियों की तीन दिन तक संघ प्रमुख ने एक -एक करके तलब किया था। भाजपा पर अपने नियंत्रण का प्रदर्शन किया था। मोदी को भी जाना पड़ा था। इसके बाद फिर ऐसी बैठक नहीं हुई। मोदी को यह अच्छा नहीं लगा। उसके बाद से गुजरात लाॅबी ने संघ को तवज्जो देना बंद कर दिया। राम मंदिर उद्घाटन के समय भी मोदी ने मोहन भागवत को पूजा स्थल पर बिठाने की बजाए दर्शक दिर्घा में बिठा दिया था। तत्कालीन सर संघ संचालक गुरु गोलवलकर ने भारतीय जनसंध की स्थापना के बाद 1951 में कहा था,जब तक इसकी जरूरत होगी चलाएंगे। वर्ना बंद कर देंगे। यानी पार्टी को यह अंदेशा था, आगे चलकर इसे बंद करना ही पड़ेगा। और मोदी इसी दिशा में अपना कदम बढ़ा दिये है।
मोदी मोदी कहना होगा - जे.पी.नड्डा के बयान के जरिये गुजरात लाॅबी ने यह संकेत दे दिया है कि बीजेपी में रहना है तो मोदी मोदी कहना होगा। जो लोग दावा कर रहे थे, कि भाजपा में व्यक्ति नहीं संगठन बड़ा है। उन्हें जे.पी.नड्डा के बयान से समझ लेना चाहिए।यह अलग बात है कि पीएम मोदी तमिलनाडु,उत्तराखंड के बाद महाराष्ट्र चुनाव प्रचार करने गए।दूसरे चरण के प्रचार के लिए वर्धा आकर नागपुर में जान बुझकर विश्राम किया। उनसे संघ और बीजेपी के छोटे पदाधिकारी और कार्यकर्ता राजभवन में मिलने गए। मगर नितिन गडकरी और मोहन भागवन नहीं मिले। दोनों का उनसे न मिलना मोदी को नागवार गुजरा। इस घटना का सियासी धमाका होना ही था। और दो चरणों के बकाए चुनाव से पहले जो धमाका गुजरात लाॅबी ने जेपी नड्डा के जरिए किया उससे पूरी बीजेपी स्तब्ध है। चार जून को मोदी का रथ नहीं रूका तो मोहन भागवत चाहकर भी मोदी की जगह किसी और को पी.एम.का दायित्व दे पाएंगे,इसमें संदेह है। वैसे पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का संघ सरकार्यवाह होसबोले से बंद कमरे में एक घंटे बात करना और भैयाजी जोशी से चालीस मिनट तक बातें करना, कई सियासी संदेहों को जन्म देता है। जाहिर सी बात है शिवराज को मुख्यमंत्री नहीं बनाए जाने से गुजरात लाॅबी से वो नाराज हैं। वसुंधरा राजे सिधिया भी चार जून के चुनाव परिणाम का इंतजार कर रही है। वसुंधरा राजे सिंधिया सन् 2014 और 2019 में सक्रिय थी,तब बीजेपी को 25 में से 25 सीट राजस्थान में मिली थी। लेकिन इस बार करीब 18 सीटें मिलने का दावा किया जा रहा है। चुनाव परिणाम से पहले वसुंधरा राजे सिंधिया का संघ के ऑफिस और राजभवन पहुंचने से सियासी हलचलें तेज हो गयी हैं। वहीं अमितशाह दावा कर रहे हैं 380 सीटों पर हुए चुनाव में बीजेपी को 270 सीट मिल रही है। वहीं चुनाव आयोग जो बीजेपी के लिए चुनाव लड़ रहा है,उसने हर राज्य में वोट प्रतिशत बढ़ा कर विपक्ष को संशय में डाल दिया है। पिछली बार सीपीएम को कुल एक करोड़ सात लाख वोट मिले थे। चुनाव आयोग ने चार चरण के चुनाव के बाद इतना ही वोट बढ़ा दिया है। ऐसे में बीजेपी का रथ फंसता है या दिल्ली तक पहुंचता है,सबकी निगाहें टिकी है।

फिर संघ किसे आगे करेगा - मोहन भागवत वैसे भी चुनाव से पहले कह चुके हैं,कि केवल मोदी और हिन्दुत्व के भरोसे चुनाव नहीं जीता जा सकता।यदि बीजेपी को बहुमत नहीं मिला तो संघ नितिन गडकरी को आगे कर सकता है। और इसका समर्थन योगी,शिवराज,वसुंधरा राजे सिंधिया,डाॅ रमन सिंह आदि करने से पीछे नहीं हटेंगे। मोदी और सघ के बीच तलवार अब खिंच गयी है। देखना यह होगा,कि आधुनिक और राजनीतिक रूप से असरकारी संगठन चार जून के बाद कितना मजबूत है। देश प्रेम की नयी आभा क्या रग दिखाती है।

Tuesday, May 21, 2024

दो लड़कों ने यू.पी.में बीजेपी की बाजी पलट दी

  



''मोदी-शाह के अभेद्य चुनावी कवच की दरारों को यू.पी.में अखिलेश और राहुल की जोड़ी ने उघाड़ दिया है।  चुनावी मतदान का प्रतिशत और मतदाताओं में बीजेपी विरोधी रूझान ने मोदी-अमितशाह को सियासी फलक से नीचे ला दिया है। फैलती भाजपा को अब खतरा महसूस होने लगा है। सवाल यह है कि दलित,पिछड़ा वर्ग और मुस्लिम वर्ग क्या मोदी का रथ यूपी में ही रोक देगा?

-रमेश कुमार ‘रिपु’
क्या उत्तर प्रदेश में खाक से उठ खड़ी होगी अबकी बार कांग्रेस! पिछले दो चुनाव में कांग्रेस को झन्नाटेदार हार के पराजय का मुंह देखना पड़ा था। बेल की तरह फैल चुकी बीजेपी से एनडीए के सहयोगी दलों का मोहभंग होने के बाद मोदी विरोधी दलों का गठबंधन कमल को नोचने लगेगें,इसकी कल्पना मोदी-अमितशाह कभी नहीं किये थे।अबकी बार यूपी की सियासी जमीन से कमल को जड़ से उखाड़ने के लिए राहुल और अखिलेश ने जो रणनीति अपनाई है,उससे बीजेपी के तंबू में सनाका खिंच गया है।इसलिए कि यूपी में जो सियासी हवा चल रही है,उसे रोकने की काट गुजरात लाॅबी के पास नहीं है। यह बात अब तक के हुए चुनाव ने साफ कर दिया। मोदी का रथ यू.पी.से दिल्ली जा पाएगा,इसमें संदेह गहरा गया है। सन् 2014 में मोदी की जो लहर थी,वैसी लहर सन् 2019 में नहीं थी। बावजूद इसके 65 सीट बीजेपी पा गयी थी।  अबकी बार न लहर है। और न ही हवा है।यही वजह है कि मोदी-शाह के अभेद्य चुनावी कवच की दरारों को यू.पी.में अखिलेश और राहुल की जोड़ी ने उघाड़ दिया है। चुनावी मतदान का प्रतिशत और मतदाताओं में बीजेपी विरोधी रूझान ने मोदी-अमितशाह को सियासी फलक से नीचे ला दिया है। फैलती भाजपा को अब खतरा महसूस होने लगा है। सवाल यह है कि दलित,पिछड़ा वर्ग और मुस्लिम वर्ग क्या मोदी का रथ यूपी में ही रोक देगा?

गुजरात लाॅबी का भरेासा टूटा - वैसे गुजरात लाॅबी को पूरा भरोसा था,कि राहुल गांधी के जातिगत जनगणना और आरक्षण का मुद्दा राम मंदिर की लहर में उड़ जाएगा। अखिलेश के अगड़े- पिछड़े की की राजनीति जो राम को लाए हैं,उन्हें लाएंगे के नारे में नहीं ठहरेगा। लेकिन गुजरात लाॅबी को हवा तक नहीं लगी कि इंडिया गठबंधन वाले चुनाव को संविधान बचाने की लड़ाई से जोड़,कर बीजेपी की पसली को चोटिल कर देंगे। दलित,अति दलित,पिछड़ा और अति पिछड़ा वर्ग में संविधान बचाने की बात ने इतना असर डाला, कि अंबेडकर जयंती में गांव-गांव में बैठक कर बीजेपी के खिलाफ हवा बना दी।इसका असर यह हुआ,कि जो दलित,अति दलित और पिछड़ा वर्ग बीजेपी का वोटर था,वो सपा या फिर कांग्रेस को वोट कर दिया। चार चरणों के चुनाव में अचानक मतदाताओं के बदलते रूख को गुजरात लाॅबी नहीं भांप पाई। आगे के चुनाव में बीजेपी कामयाबी का कोई सियासी रास्ता नहीं ढूंढ सकी, तो उसे भारी नुकसान का सामना करना पड़ सकता है। क्यों कि अखिलेश और राहुल गांधी मोदी और अमित शाह के बयानों से वोटर प्रभावित न हो इसका तत्काल जवाब मंच से देने लगे हैं।

बाजी पलटने की रणनीति - बीजेपी और मायावाती का जो बेस वोटर था,उसमें जागरूकता आई। उसे यकीन हो गया, कि बसपा की सरकार बन नहीं सकती। इसलिए कुर्मी, कुशवाहा, कटियार, वर्मा, मौर्य, पटेल,       चौहान,साकेत,मुसलमान वोटर सायकिल पर बैठने लगा। 'हाथ' से हाथ मिलाने लगा। बीजेपी आश्वस्त थी,कि राम मंदिर बनने के बाद यूपी में 75 सीट आएगी। दूसरे चरण के चुनाव से मोदी के चाणक्य अमितशाह को रिपोर्ट मिली कि अंबेडकर जयंती पर सारे दलित और पिछड़ा वर्ग गांव गांव बैठक कर तय किया है कि यदि बीजेपी की सरकार आई तो संविधान बदल देगी। बाबा साहब अंबेडकर की प्रतिष्ठा का सवाल है। और वो सबके सब बीजेपी की बाजी को पलटने में लग गए।

मोदी से मुस्लिम खफा - प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ने हिन्दू कार्ड भी खेला। उन्होंने हिदुओं को सावधान करते हुए कहा,कांग्रेस की सरकार आई तो वो राम मंदिर में बाबरी ताला लगा देगी। लेकिन मोदी की बातों का कोई असर नहीं दिखा। केन्द्रीय गृहमंत्री,यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह सहित बीजेपी कई मंत्रियों ने कांग्रेस के घोषणा पत्र को कटघरे में रखा। सबने जोर शोर से मंच पर कहा,कि कांग्रेस की सरकार आई तो देश में सरिया कानून लागू हो जाएगा। महिलाओं के मंगल सूत्र छीन लिए जाएंगे। जिनके पास दो घर उसमें एक घर लेकर अल्पसंख्यकों को दे दिया जाएगा। यहां तक एक से ज्यादा कार होने पर उसे ले लिया जाएगा। जबकि कांग्रेस के घोषणा पत्र में ऐसा कहीं नहीं लिखा था। बीजेपी के केन्द्रीय मंत्रियों के झूठ से भी बीजेपी के पक्ष में हवा नहीं बनी। लेकिन यूपी के 21.26 फीसदी मुस्लिम वोटर मोदी से नाराज हो गया। बागपत में 27 फीसदी,अमेठी में 20 फीसदी, अलीगढ़ में 19 फीसदी,गोंडा में 19.6,लखीमपुरी खीर में20 फीसदी,लखनऊ में21.46 फीसदी,पीलीभीत में 24.11 फीसदी,सिद्धार्थ नगर में 29.33 महाराजगंज में 17.48 फीसदी और मुरादाबाद,रामपुर में 50.8 फीसदी,मजफ्फर नगर में 41 फीसदी,बिजनौर में 43 फीसदी,अमरोहा में 41 फीसदी,बलरामपुर में38.51 इसके अलावा बरेली, बहराइच, संभल,हापुड़ आदि जिलों के मुस्लिमों को मोदी ने नाराज कर दिया।। यूपी के 75 जिलों में मुस्लिम वोटर की संख्या इतनी है कि वो किसी भी पार्टी की हार जीत की दिशा बदल सकते हैं। काशी के तीस लाख मुस्लिम वोटर इस बार मोदी को वोट करेंगे इसमें संदेह है।  

राम मंदिर मुद्दा नहीं बना - बीजेपी राम मंदिर को मुद्दा नहीं बना सकी। सन् 2014 के चुनाव में रायबरेली ही विपक्ष के पास था। बीजेपी 2024 के चुनाव में इस सीट को जीतना चाहती है। अदिति सिंह लखनऊ में प्रचार कर रही हैं। मगर वो अयोध्या, और अमेठी नहीं गयी। संजय सिंह अमित शाह से मिलने के बाद भी निष्क्रिय दिखाई दे रहे हैं। राजा भैया ने बकायदा अपने समर्थकों को कह दिया है,जो प्रत्याशी आपको बेहतर लगे उसका प्रचार करें और वोट दें। उनके समर्थक और वोटर समझ गए कि राज भैया किसे वोट करने को कह रहे हैं। कौशाम्बी बीजेपी की सीट फंस गयी है। पांचवे चरण की 14 सीट में 13 सीट बीजेपी के पास है। इसमें सात सीटों में कोंटे का टक्कर है। लोकसभा की 14 सीटों में विधान सभा की कुल 71 सीटें आती है। जिसमें 45 सीट बीजेपी के पास है।  
यूपी मे नरेटिव बदलता रहा- उत्तर प्रदेश में गेरूआई राजनीति की पताका उम्मीद से कम लहरा रही है। उसकी वजह यह है कि योगी आदित्यनाथ ने हाथ खींच लिया है। क्यों कि उन्हें पता है कि अमितशाह लोकसभा चुनाव के बाद उन्हें सी.एम.पद से हटा देगे। यूपी में नरेटिव बदलता जा रहा है। अमेठी में जो कह रहे थे,कि राहुल गांधी के चुनाव नहीं लड़ने से स्मृति इरानी को वाॅक ओवर मिल गया,अब वही आकलन कर रहे हैं,कि किशोरी लाल शर्मा कितने लाख से स्मृति को हराएंगे। बीजेपी के खिलाफ बाजी पलटने का सबब बीजेपी के नेता हैं। जनवरी मे जो उत्साह बना था,उसी उत्साह में मोदी ने कहा था कि अबकी बार चार सौ पार।अनंत हेगड़े,अरूण गोविल,लल्लू सिंह और ज्योति मिरधा ने कहा,संविधान बदलने के लिए मोदी को चाहिए चार सौ के पार सीट। इस बात को इंडिया ने लपक लिया। और अपने हर मंच पर संविधान बदलने की बात जोर-शोर से कहने लगे। उसका असर यह हुआ कि बीजेपी का वोटर उनके हाथ से फिसल गया। बीजेपी को लगा,राहुल गांधी की बातों को वोटर गंभीरता से लेता नहीं। अखिलेश यादव पांच साल तक निष्क्रिय रहे,इसलिए राम मंदिर की लहर में उनकी बात दब जाएगी।
अखिलेश की सोशल इंजीनियरिंग - अखिलेश यादव ने सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूले के तहत टिकट बांटा। दस कुर्मी,आठ मौर्य,पांच कश्यप,पांच निषाद,और अपने परिवार को छोड़कर किसी यादव को टिकट दिया नहीं।मेरठ,फैजाबाद की सामान्य सीट पर भी उन्होने दलित को टिकट दिया। उसका नतीजा यह रहा है कि दलित,पिछड़ा वर्ग और मुस्लमान वोटर सपा और कांग्रेस को जा रहा है। बीस फीसदी दलित,दस फीसदी ओबीसी और पन्द्रह फीसदी मुस्लिम वोटर इंडिया गठबंधन को जा रहा है यानी 45 फीसदी वोट पा रहे हैं। ठाकुर और ब्राम्हण वोटर को जोड़ दें तो यह प्रतिशत और ज्यादा हो जाता है। राजपूत भी बीजेपी से नाराज है। करणी सेना भी यूपी में सक्रिय हो गयी है बीजेपी के खिलाफ। ऐसे में बीजेपी का फिसलना ही था।
बीजेपी की साख पर संकट - बीजेपी ने देश को बड़ा करने का सपना दिखाया। दूसरी ओर देश को कर्ज में डूबाते गए। देश पर मोदी  के दस साल के कार्यकाल में 272 लाख करोड़ रुपए का कर्ज है। खाद्यान योजना बिल कांग्रेस ने लाया था। आज मोदी सरकार देश में 85 करोड़ गरीब जनता को पांच किलो का अनाज दे रही है। राहुल ने कहा,हमारी सरकार आएगी तो दस किलो देंगे।वहीं हर गरीब महिला को लखपति बनाएंगे। हर पार्टी का अपना अपना घोषणा पत्र है। बीजेपी को मात देने इंडिया गठबंधन ने विशेष रणनीति बनाई। हर दिन कोई न कोई पार्टी देश में बीजेपी के खिलाफ पहले प्रेस कांफ्रेस करती है,उसके बाद चुनाव प्रचार।धर्म आधारित राजनीति बीजेपी करने की योजना बनाई थी, लेकिन  कामयाब नहीं होने से बीजेपी की साख पर संकट गहरा गया है। मोदी ने देश से पचास दिन मांगे थे।अब दस साल बाद यूपी का बेरोजगार वोटर उनके काम काज पर आंकलन करने लगा है। बेरोजगारी,मंहगाई,संविधान बदलने, आरक्षण,और जातिगत जनगणना कि बात करके  यूपी में दो सियासी लड़के  बीजेपी की चुनावी बाजी पलट दिये हैं ।

Monday, May 20, 2024

अबकी बार अल्पमत सरकार




"अबकी बार मोदी बनाम जनता का चुनाव है। विपक्ष का दावा है कि बीजेपी को बहुमत नहीं मिल रहा है। चार सौ पार का नारा महौल बनाने का था। इससे इंकार नहीं है कि सभी राज्यों में बीजेपी को नुकसान हो रहा है। बावजूद इसके बीजेपी बड़ी पार्टी बनकर उभरेगी।"

-- रमेश कुमार ‘रिपु’
 विपक्षी खेमें में जश्न है। सभी क्षेत्रीय पार्टियों के क्षत्रप दावा करने लगे हैं, कि बीजेपी को बहुमत नहीं मिल रहा है। जैसा कि राहुल गांधी कह रहे हैं,लिख कर ले लो,चार जून को मोदी प्रधान मंत्री नहीं बनने वाले। वो इस्तीफा देंगे। बीजेपी 180 सीट से ज्यादा नहीं पाएगी।ममता बनर्जी का दावा कर रही हैं कि इंडिया गठबंधन को 295 से 315 सीट मिल रही है। वहीं अखिलेश का कहना है,बीजेपी 140 सीट पर सिमट जाएगी। अमित शाह अभी भी कह रहे हैं,चार सौ के पार बीजेपी जा रही है। चार चरणों के मतदान के बाद इंडिया गठबंधन आत्मविश्वास से लबलब हो गया। सबके दावे दमदार हैं। किसकी जीत और किसकी हार होेगी, 4 जून को पता चलेगा। लेकिन चार चरणों के चुनाव की हवा बता रही है, कि सभी राज्यों में बीजेपी को नुकसान हो रहा है। बावजूद इसके बीजेपी बड़ी पार्टी बनकर उभरेगी।

विपक्ष के दावे का सच चार जून को पता चलेगा। लेकिन इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि हर राज्यों के क्षत्रपों के खिलाफ बीजेपी का कार्यकर्ता ,पदाधिकारी और उसका कैडर उस तरह खड़ा नहीं दिख रहा,जिस तरह वो 2014 और 2019 में खड़ा था। जाहिर सी बात है कि जिन क्षत्रपों के दम पर बीजेपी 2019 में 303 सीट पाई थी। और अपने सहयोगियों के साथ मिलाकर 352 सीटें पाई थी। इस बार का चुनाव मोदी बनाम जनता का हो जाने की वजह से मोदी के पक्ष में वो लहर  कहीं नहीं दिखी। सन् 2019 में चौथे चरण के चुनाव में बीजेपी 96 में से 42 सीट जीती थी। 11 सीट इंडिया गठबंधन के खाते में गयी थी। वहीं 35 ऐसी सीटें थी,जो किसी भी गठबंधन का हिस्सा नहीं थे। 2019 के चुनाव जैसा 2024 का चुनाव नहीं है। तब बीजेपी 379 सीट में 206 और एनडीए को 234 सीट मिली थी। कांग्रेस को 43,यूपीए को 84 अन्य के खाते में 61 सीट आई थी।

कांग्रेस का डर दिखाती रही - बीजेपी यह मानकर चल रही थी,कि 2024 के चुनाव में इंडिया गठबंधन एनडीए से बहुत दूर रहेगा। जबकि यू.पी.,बिहार,राजस्थान,गुजरात,मध्यप्रदेश,छत्तीसगढ़ और झारखंड हिन्दी बेल्ट वाले राज्यों में भी बीजेपी को भारी नुकसान हो रहा है। यही वजह है कि छोटे-छोटे शहर में मोदी रोड शो कर रहे हैं। जाहिर सी बात है कि उनमें हताशा है। चुनाव का मुकाबला करीबी नहीं रहा। बल्कि बहुत अंतर से बीजेपी के सत्ता से बाहर होने का अंदेशा बढ़ गया है। इसका असर शेयर बाजार में भी पड़ा है। लगातार गिर रहा है। मोदी दस साल से देश को कांग्रेस से डराते आ रहे हैं। जबकि सत्ता में बेजीपी है। इस चुनाव में भी जनता को अंधेरे में रखने का काम मोदी ने किया। जनता से झूठ बोले। कांग्रेस के घोंषणा पत्र में जो बात नहीं थी,उसे जनता के बीच जाकर हिन्दू-मुस्लिम की राजनीति कर हिन्दुओं को डराने की कोशिश की। वोटों का धुव्रीकरण करने का प्रयास किया। कांग्रेस सत्ता में आई तो महिलाओं के मंगल सूत्र छीन कर मुस्लिमो को दे देगी। कांग्रेस के घोंषणा पत्र में मुस्लिम लीग की छाया है। कांग्रेस सत्ता में आई तो मुस्लिमों का आरक्षण बढ़ा देगी। लेकिन मतदाता न डरा और न ही बदला।

राम वाले अच्छे दिन भी लाते - महाराष्ट्र में अबकी बार बीजेपी के प्रति लहर 2019 जैसी नहीं है। राम को जो लाए है,उन्हें ही लाना है। ऐसे नारों के जवाब में वोटर कह रहा है,जो राम को लाए हैं,वो अच्छे दिन भी लाते। दो करोड़ नौकरी भी देते। महंगाई कम करते। बेरोजगारी दूर करते। किसानों की आय दोगुना करते। गैस सिलेंडर चार सौ रुपए में देते। सिर्फ राम लाने से काम नहीं चलेगा। मंदिर बनने से पहले भी राम सबके मन में थे,आज भी हैं। दरअसल ,देश के वोटर की मानसिकता बदल गयी है। वो क्या सोचने लगा है औरंगाबाद लोकसभा सीट से समझा जा सकता है। औरंगाबाद कभी मराठा आंदोलन का केन्द्र था। 1988 में मराठा एंटी मुस्लिम में तब्दील हो गया था। औरंगाबाद मुस्लिम बाहुल सीट है। यहां एआईएमआईएम की पार्टी के इम्तियाज जलील को जनता वोट करती आई है। लेकिन इस बार ऐसा नहीं है। उद्धव ठाकरे की पार्टी से चुनाव लड़ रहे चन्द्रकांत खैरे को मुस्लिमों ने वोट किया। उनका कहना है,इम्तियाज जलील हमारी जाति बिरादरी के हैं। लेकिन इस बार उद्धव ठाकरे को वोट करेंगे तो राहुल को जाएगा। उनका हाथ मजबूत होगा। एकनाथ शिंदे ने संदीपन भुमरे को उतारा है। औरंगाबाद सीट को अविभाजित शिवसेना ने 1989 के बाद से छह बार जीता है। एकनाथ शिंदे की शिवसेना और उद्धव ठाकरे की शिवसेना के उम्मीदवार आमने-सामने हैं। पूरे महाराष्ट्र की 48 सीट में 13 सीट पर उद्धव ठाकरे के उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे हैं। यह चुनाव बतायेगा,असली शिवसेना कौन है। चुनाव की हवा बता रही है,उद्धव ठाकरे महाराष्ट्र में किंग मेकर हैं। जिस मोदी ने उद्धव ठाकरे की कुर्सी छीन ली। पार्टी का सिम्बल छीन लिया। उसके प्रति जनता में सैम्पैथी बेहद ज्यादा है। शरद पवार,उद्धव ठाकरे और राहुल गांधी की जोड़ी मोदी पर भारी पड़ रही है। इस बार तीनों की जोड़ी की वजह से बीजेपी को 48 में से 12-15 सीट ही मिलती दिख रही है। उसकी वजह यह है कि बीजेपी बंटी हुई है। पूरे महाराष्ट्र में दूसरी पार्टी से बीजेपी में आने वालों की वजह से बीजेपी का जमीनी कार्यकर्ता घर बैठ गया है। यह स्थिति हर राज्य की है। संघ और बीजेपी के पुराने लोग नाराज हैं। जमीनी कार्यकर्ता कह रहे हैं,दो आदमी बीजेपी को नहीं चलाएंगे। बाहरी पार्टी से आए उम्मीदवारों को लेकर पार्टी में भारी असंतोष है। इन्ही वजहों से किसी भी राज्य में बीजेपी 2019 में जितनी सीट पाई थी, उतनी उसे नहीं मिल रही है।

यू.पी.में बीजेपी पिछड़ रही - देश में सबसे बड़ी आबादी वाला राज्य उत्तर प्रदेश राजनीति में धुरी की भूमिका निभाता है। क्यों कि यहां लोकसभा की 80 सीटें हैं। अब तक 14 प्रधानमंत्री में से नौ इसी राज्य ने दिये। इस बार यू.पी बदला हुआ है। यहां वोट का प्रतिशत सात फीसदी कम है। जबकि दो फीसदी कम मतदान होने पर सरकार बदल जाती है। यही ट्रेंड अगले तीन चरण के चुनाव में रहा तो बीजेपी की सीट 2019 से भी कम हो जाएगी। माना जा रहा है बीजेपी को अधिकतम 45- 48 सीट मिल रही है।
कहावत है,जिसने जीता यू.पी.उसने संभाला देश। इस बार हालात बीजेपी के पक्ष में नहीं। योगी की चल नहीं रही है। मिशन 75 का लक्ष्य करने अमितशाह ने राजा भैया को बुलाया। कौशाम्बी,जौनपुर और प्रतापगढ़ में ठाकुर राजा भैया की ही सुनते हैं। धनजंय सिह बीजेपी के लिए काम करने को तैयार हो गए हैं,मगर राजा भैया न्यूटल हो गए हैं। जाहिर है प्रतापगढ़ में बीजेपी ही हवा टाइट हो गयी है। यूपी में 41 सीट के चुनाव होने हैं। यूपी में दलित और मुसलमान बीजेपी के खिलाफ चला गया है। यू.पी. का दलित कह रहा है,संविधान को बचाना है। बाबा साहब अंबेडकर की इज्जत का सवाल है। बूथ से ऐसे लोगों को भगाया जा रहा है। छोटे दुकानादार,किसान,और युवा परेशान हैं। उन्हें लगता था,मोदी महंगाई कम कर देंगे, बेरोजगारी कम कर देंगे,पर ऐसा हुआ नहीं।

विपक्ष बिखरा नहीं - सन् 2019 की तरह विपक्ष बिखरा नहीं है। उन्नाव, कानपुर, अकबरपुर, सीतापुर, मथुरा, सम्भल, बरेली, सीकरी, आगरा, मैनपुरी, फिरोजाबाद, बदायूं, एटा,आंवला, और हाथरस आदि ऐसे स्थान हैं,जहां मतदाताओं ने सत्ता बदलने का मन बना लिया है। राजनीति के ठेकेदारों के हाथ से यह चुनाव निकल गया। विधान सभा चुनाव में गाजीपुर की सात सीट में बीजेपी के पास एक भी नहीं। आजमगढ़ की दस सीट में भी यही हाल रहा। अयोध्या की चार सीट में दो सीट है बीजेपी के पास,बलिया की सात सीट में सिर्फ दो सीट बीजेपी जीती थी। ऐसे दर्जनों विधान सभा में बीजेपी की सीट है नहीं या फिर बहुत कम है। जाहिर सी बात है कि बीजेपी सीट लाएगी कहां से।
पश्चिम बंगाल में अमितशाह 42 में से 35 सीट जीतने का लक्ष्य रखा है। यहां ममता का एंटी वोट जो था,वो पिछली बार बीजेपी में गया। इस बार सीपीएम और कांग्रेस में जा रहा है। 2019 में बीजेपी को 18 सीट मिली थी,जो इस बार घटकर 15 होने की आशंका है। बिहार में चार फेस के चुनाव में जेडीयू की स्थिति ठीक नहीं है। अगड़ा बनाम पिछड़ा की यहां लड़ाई है। कुर्मी,यादव,मुस्लिम बीजेपी को वोट नहीं कर रह है। इसी से समझा जा सकता है कि नीतिश के दाये हाथ लल्लन सिंह चुनाव हार रहे हैं। मोदी का रथ बिहार में भी फंस गया है। नीतिश एक बार फिर पलटी मार सकते हैं। मध्यप्रदेश,छत्तीसगढ़ में इंडिया को चार सीटें मिलनें की संभावना है। दक्षिण में सिर्फ कर्नाटक में 10-12 सीट बीजेपी को मिल सकती है। बाकी अन्य राज्यों में संभावना नहीं है। दिल्ली और हरियाणा में 1-2 सीट से ज्यादा नहीं पा रही है। यानी विपक्ष की साझेदारी सियासी ताकत के आगे एनडीए अबकी कमजोर हो गया।

जनता में नाराजगी -एनडीए के प्रति वोटरों में नाराजगी है। वोटर मानता है,कि मोदी अमीर के समर्थक हैं। वे फिरकापरस्त और अल्पसंख्यक विरोधी हैं। वे दूसरों पर अपना रोब-दाब चलाते हैं। वे सामूहिक नेतृत्व में यकीन नहीं करते। वो जुमलेबाज हैं। वे किसान विरोधी हैं। वे बड़े मुद्दों पर खामोश रहते हैं। नोटबंदी करके मोदी ने छोटे धंधे चौपट कर दिये। काला धन नहीं आया। उनकी फैसले से रोजगार घटा और किसान परेशान हुए। चीजों की कीमतों में बढ़ोतरी पर लगाम लगाने में मोदी असफल हुए। किसानों की खुदकुशी के साथ कृषि संकट,मोदी की नाकामियों की फेहरिस्त में सबसे आगे है।

 

Saturday, April 27, 2024

घोंषणा पत्र पर भड़के,मंगल सूत्र में अटके

 "सब भटक रहे हैं। भाजपा समेत समूचा विपक्ष। बीजेपी अपने मेनिफोस्टो में महंगाई और बेरोजगारी की जगह सपने दिखा रही है। उसे यकीन था कि 2014 से ज्यादा बड़ी जीत उसे मिलेगी। लेकिन पहले चरण के वोट ट्रेंड ने बीजेपी की धुकधुकी बढ़ा दी, मोदी कांग्रेस के घोषणा पत्र में मुस्लिम लीग की छाया बता कर भड़के और मंगल सूत्र में आकर अटके। बावजूइ इसके दूसरे चरण में भी वोट का ट्रेंड नहीं बदला। आगे भी यही स्थिति रही तो बीजेपी दो सौ सीट से नीचे जा सकती है।


-- रमेश कुमार ‘रिपु’
क्या आखिरी अश्वमेघ है। किराए की भाजपा का। हर राज्यों में कांग्रेस से भाजपा में आने वालों की भीड़ दिखी।इनके भरोसे भाजपा अपनी सेहत सुधारने का सपना पाल ली है। लेकिन पहले चरण की वोटिंग के ट्रेंड ने जय हो कि जगह,भय हो का माहौल बना दिया है। पहले चरण के 102 सीटों में भाजपा सिर्फ 42-46 सीट पा रही है। ऐसा सियासी आकलन है देश का। वोट का ट्रेण्ड बदलने के लिए मोदी ने भाषण का ट्रेंड ही बदल दिया। कांग्रेस के मेनिफेस्टो में मुस्लिम लीग की छाया बता कर भड़के। और मंगल सूत्र में आकर अटके। मुद्दे के लिए भटकती भाजपा एक बार फिर हिन्दू-मुस्लिम के चौराहे पर आ गयी। सब भटक रहे हैं। भाजपा समेत समूचा विपक्ष। बीजेपी अपने मेनिफोस्टो में महंगाई और बेरोजगारी की जगह सपने दिखा रही है। उसे यकीन था कि 2014 से ज्यादा बड़ी जीत उसे मिलेगी। लेकिन पहले चरण के वोट ट्रेंड ने बीजेपी की धुकधुकी बढ़ा दी है। दूसरे चरण में भी वोट का ट्रेंड नहीं बदला। आगे भी यही स्थिति रही तो पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक की बात सच हो सकती है, कि बीजेपी दो सौ सीट से नीचे रहेगी। यदि ऐसा हुआ तो बीजेपी के लीडर मोदी नहीं रहेंगी।  

धर्म के खेत पर राजनीति..
मोदी को भरोसा था कि हिन्दू-मुस्लिम राजनीति के पासे पौ बारह ही पड़ंगे। इसलिए सत्ता के हंसिये से वोट की फसल काटने के लिए राजनीति को धर्म के खेत पर खसीट लाए। कांग्रेस को अर्बन नक्सली कह दिया। कांग्रेस सत्ता में आई तो हिन्दू बहनों के मंगल सूत्र तक छीन लेगी। कांग्रेस लोगों की कमाई ज्यादा बच्चों वालों में बांट देगी। अल्पसंख्यक घुसपैठिए हैं। आतंकवादी हैं। कांग्रेस की सोच माओवादियों और कम्युनिस्टों की है। आपकी संपत्ति पर कांग्रेस अपना पंजा मारना चाहती है। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने कहा, कि हमारे मेनिफोस्टो में विरासत टैक्स का कहीं जिक्र नहीं है। प्रधान मंत्री असत्यमेय जयते का प्रतीक हैं। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने कांग्रेस के मेनिफेस्टों को समझाने मोदी से समय मांगा। सवाल यह है, कि अल्पसंख्यक घुसपैठिए हैं तो कितने पकड़े गए। कितने के खिलाफ कार्रवाई हुई।
दूसरे चरण मे वोट में भी मोदी की कही बातों के बावजूद वोट का ट्रेंड नहीं बदला। विपक्ष उत्साहित है कि मतदाताओं ने सत्ता परिवर्तन का संकेत दे दिया है। यूपी की आठ सीट पर हुए चुनाव में मेरठ,बागपत, मथुरा,अमरोहा,अलीगढ़ की सीट बीजेपी की फंस गयी है। किसानो को बीजेपी ने निराश किया। वादे पूरे नहीं हुए। ऐसा वहां के वोटर कह रहे हैं। दूसरे चरण में 66.12 फीसदी वोट पड़े हैं। मध्यप्रदेश की होशंगाबाद को छोड़कर सभी जगह वोट पिछली बार की तुलना में कम हुए है। रीवा में दस फीसदी वोट कम पड़े हैं। दूसरे चरण के वोट के आधार पर यह माना जा रहा है कि बीजेपी और इंडिया दोनों को मतदाताओं ने तवज्जो दिया। अब तक के 190 सीट में इंडिया गठबंधन को फायदा ज्यादा होने के संकेत हैं।

किसने  छीने मंगल सूत्र..
मंगल सूत्र वाले बयान पर सोशल मीडिया पर प्रधान मंत्री के प्रति गुस्सा ज्यादा देखने को मिला है। वहीं   प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी के मंगल सूत्र वाले बयान पर प्रियंका गांधी ने कहा,मेरी मां ने अपना मंगल सूत्र देश के नाम कुर्बान कर दिया। युद्ध के  दौरान मेरी दादी इंदिरा गांधी ने अपने गहने देश को समर्पित किये। कांग्रेस ने आज तक किसी मां -बहनों के मंगल सूत्र नहीं छीने। सवाल यह है कि क्या भाजपा अवसान पर है। उसका यह संक्रमण काल है। इसलिए मोदी ने धार्मिक ध्रुवीकरण के लिए चुनाव में हर बार की तरह फिर हिन्दू,मुस्लिम की फसल काटना चाहते हैं। अंधेरे में लाठी भांज रही है भाजपा। किसान आंदोलन में 700 किसानों की मौत हुई। चीन के बार्डर पर गढ़वाल में कई सैनिक शहीद हुए। पोलवामा कांड में समय पर हवाई जहाज मोदी उपलब्ध करा देते तो हमारे कई भारतीय सैनिक शहीद न होते। क्या उन शहीद लोगों की विधवाओं के मंगल सूत्र का ध्यान मोदी को नहीं है। आखिर इतने सारे शहीदों की पत्नियों के मंगल सूत्र, किसकी वजह से बिना धागे के हो गए?क्या इन सवालों का जवाब बीजेपी के पास है?

बीजेपी के पेट में दर्द क्यों उठा..
भाजपा अपने आप को हिन्दू की पार्टी कहती है। कांग्रेस यदि मुस्लिमों की पक्षधर है,तो विवाद क्यों? सबकी राजनीति के अपने अपने तरीके हैं। फिर भी हर चुनाव में भाजपा यह कह कर हिन्दुओं को क्यों डराती है कि आज हिन्दू खतरे में है। देश का प्रधान मंत्री हिन्दू है। गृहमंत्री हिन्दू है। राज्य के मुख्यमंत्री हिन्दू हैं। फिर भी देश का हिन्दू खतरे में है। यदि हिन्दू खतरे में है तो इसके लिए मुठ्ठी भर अल्पसंख्यक दोषी हैं या फिर देश की सरकार! वोट डालने से पहले एक बार मनन जरूर करें।

देश पर 272 लाख करोड़ का कर्ज..
दस साल की भाजपाई सत्ता में देश का आर्थिक ढांचा चरमरा गया है। देश पर 272 लाख करोड़ का कर्ज है। सरकार ने कई उद्योगपतियों के कर्जे माफ कर दिये तो बैक डूब गए। ताले लग गए। ग्यारह लाख करोड़ रुपए से ज्यादा उद्योग पतियों के माफ किये गए। इलेक्टोरल बांड ने भाजपा की ईमानदारी छवि पर कालिख पोत दी। देश के छोटे से लेकर बड़े उद्योगपतियों को ईडी का डर दिखाकर उनसे चंदा लिया। बदले में उद्योगपतियों ने अपने- अपने उत्पादों की कीमत चार गुना बढ़ा दिया। बाजार में महंगाई का बूम आ गया। आम आदमी समझ ही नहीं पाया कि महंगाई अचानक से बढ़ कैसे गयी। सुप्रीम कोर्ट के दखल से देश के सामने न खाऊंगा और न खाने दूंगा कहने वालों की सच्चाई समाने आई। क्या नेहरू बोले कर गए थे बीजेपी को कि इलेक्टोरल बांड के जरिए चंदा एकत्र करना। कश्मीर से अब भी 370 हटी नहीं। केवल संशोधन किया गया है। ताकि अडानी जमीन खरीद सकें।

राम मंदिर बनने से क्या हो जाएगा..
राम मंदिर से रोटी नहीं मिलने वाली। राम केवल आस्था है। विश्वास है। भरोसा है। राम का मंदिर नहीं बना था, तब क्या देश नहीं चल रहा था। लोकतंत्र जिंदा नहीं था। भारत नहीं था। राम के लिए मंदिर बनाए हैं तो राम जैसा आचरण भी दिखाएं। तानाशाह क्यों बनते हैं? राम मंदिर बन जाने पर देश में क्या अंतर आ गया या आ जाएगा? जय किसकी और भय किसका होगा,अबकि चुनाव में। यह बात की बात है। मगर सवाल यह है,कि भाजपा अपने ही राज्यपाल के यहां सीबीआइ इसलिए भेज दे कि वो मोदी सरकार की बखिया उधेड़ने लगे हैं, तो जाहिर सी बात है कि दाल में कुछ काला नहीं,पूरी की पूरी दाल काली है।  

भाजपा ने यह भी कहा था..
भाजपा के मेनिफेस्टों में 2047 तक का सपना दिखाया गया है। महंगाई,बेरोजगारी, की कोई बात नहीं। जुमले से तालियां बजती है। सपने दिखाने से भूख नहीं मरती। एक वो भी सपना था, 2022 तक किसानों की आय दोगुनी हो जाएगी। गंगा साफ हो जाएगी। दो करोड़ नौकरी दी जाएगी। पेट्रोल चालीस रुपए लीटर मिलेगा। डाॅलर जमीन सूंघने लगेगा। रुपया डाॅलर से ऊपर होगा। चार सौ रुपए का गैस सिलेंडर किस राज्य में मिल रहा है? ऐसे कई सवाल हैं,जिनके जवाब इस चुनाव में अधूरे हैं।बुजुर्गो को रेल यात्रा में जो सुविधाएं मिलती थी,बंद कर देने से रेल मंत्रालय फायदे में चलने लगा क्या? छत्तीसगढ़ से होकर चलने वाली 6200 ट्रेनें क्यों बंद कर दी गयी। पी.एम.ने भी नहीं बताया। आयुष्मान योजना का लाभ मरीजों को निजी अस्पताल में नहीं मिलता। दवाइयां बाहर से मरीजों को खरीदना पड़ता है। मरीजों को जल्द से जल्द निजी अस्पताल के लोग डिस्चार्ज कर देते हैं। उनका इलाज सही तरीके से नहीं होता। पांच लाख तक के इलाज कराने की यह योजना कैसी है,सांसदों को भी पता करना चाहिए।

हैरान मत होना..
सियासी मुजरा खूब चल रहा है। हर दल में। सबसे अधिक डरी हुई है बीजेपी। तीसरी बार सियासी अश्वमेघ यज्ञ में आहूति मतदाता किसे दे रहा है। राम तीसरी बार सत्ता की कमान दिलाएंगे या नहीं। हिन्दुओं को बीजेपी फिर डरा रही है। क्या वाकई हिन्दू खतरे में है। क्या मतदाता मान रहा है कि ईडी,सीबीआइ और आई टी की कार्रवाई गलत है। देश को जैसा प्रधानमंत्री चाहिए,उसे वैसा मिला है। तीसरी बार बीजेपी आई तो संविधान बदल दिया जाएगा। इस बात को अशिक्षित लोग क्या समझ रहे हैं।रिक्शे वाले को,पान ठेला वाले को,सब्जी बेचने वाले को,सड़कों के किनारे चाट बेचने वाले को क्यों लगता है, फिर मोदी आएगा। ईवीएम पर देश के कितने लोगों को भरोसा है। चार सौ पार बीजेपी आएगी या फिर उसे 272 के भी लाले पड़ेंगे। दूसरे चरण के चुनाव से पहले बीजेपी मंगल सूत्र का मुद्दा गढ़ ली। तीसरे चरण के चुनाव में पुलवामा कांड जैसा कोई कांड हो जाए तो हैरान नहीं होना। क्यों कि अब देश में चुनाव मुद्दों पर नहीं, हिन्दू खतरे में है बता कर लड़ा जाएगा,जब तक देश में अल्पसंख्यक रहेंगे और पाकिस्तान रहेगा।

Wednesday, April 3, 2024

अबकि बार मोदी को 272 के भी लाले



 इंडिया गठबंधन लोकतंत्र बचाओ की बात कर रहा है। बीजेपी चार सौ के पार का नारा लगा रही है। जबकि 106 सीट पर वह कमजोर है। 36 फीसदी वोट पाने वाली बीजेपी 62 फीसदी वोट वाली पार्टी को शिकस्त देने हर ढीले सियासी पेंच को कस रही है। वहीं विपक्ष के सर्वे में बीजेपी को 186 सीट मिल रही है। यानी यह चुनाव मुद्दों पर हुआ तो मोदी के लिए सहज नहीं होगा।
 





रमेश कुमार ‘रिपु’
 भाजपा का दांव सबसे ऊंचा है। उसे तीसरी बार सत्ता की कमान चाहिए। इसलिए उसने एक नया नारा गढ़ कर अपने समर्थकों का मनोबल ऊंचा किया है। अबकि बार चार सौ के पार। जबकि बीजेपी के आंतरिक सर्वे में वह 106 सीटों पर कमजोर है। और सौ ऐसी सीटें है,जहां जीतना उसके लिए टेढ़ी खीर है। मोदी कहते हैं बीजेपी 370 के पार रहेगी। अमितशाह ने कहा सवा तीन सौ सीट बीजेपी को मिलेगी। जीत का विश्वास लेकर मोदी चुनावी समर में उतर रहे हैं। सीट अधिक से अधिक पाने बीजेपी हर सियासी पेंच को कस रही है। इसी लिए बीजेपी ऐसी पार्टियों से हाथ मिला रही है,जिसे पार्टी के लोग पसंद नहीं कर रहे हैं। राज ठाकरे के समर्थकों ने यूपी और बिहार के लोगों के साथ मुंबई में जो जुल्म ढाए थे,उसे कोई भूला नहीं है। ऐसी पार्टी के साथ गठबंधन करने पर क्या यूपी,बिहार वाले वोट करेंगे? महाराष्ट्र में बीजेपी एकनाथ शिंदे के भरोसे 48 सीट में अबकि बार, 41 सीट पाने से रही। इसलिए अब बीजेपी के साथ उद्धव ठाकरे नहीं हैं। महाराष्ट्र में शिवसेना ने 18 सीट और एनसीपी ने 4 सीट 2019 में जीती थी। अबकि बार बीजेपी की सीट आधी होने के आसार हैं। पश्चिम बंगाल की 42 सीट में उसे 2019 में 18 सीट मिली थी। सीएए के जरिए उसकी सीट बढ़ेगी,ऐसा उसे भरोसा है। जबकि माना जा रहा है इस बार बीजेपी 10 सीट से ज्यादा नहीं पा रही है। पंजाब में कांग्रेस 13 सीट में आठ सीट जीती थी,आम आदमी पार्टी एक सीट। अकाली दल 2 और बीजेपी 2 सीट जीती थी। बीजेपी और अकाली दल फिर एक साथ हो गए है। संभावना है एक दो सीट मिल सकती है। दिल्ली की सातों सीट बीजेपी के खाते में गयी थी। इस बार कांग्रेस और आम आदमी पार्टी में समझौता हो गया है। तीन सीट पर कांग्रेस और चार सीट पर आम आदमी पार्टी चुनाव लड़ेगी । केजरीवाल को मोदी जेल भेजकर अच्छा नहीं किये हैं। केजरीवाल आंदोलन से निकला व्यक्ति है। दिल्ली में बीजेपी दो सीट पा जाए यही बहुत है।

जदयू को वजूद बचाने के लाले..
बिहार की 40 सीट में बीजेपी को नीतीश के साथ 39 सीट मिली थी। लेकिन पश्चिमी और पूर्वी बिहार में एनडीए की स्थिति पहले जैसी नहीं है। नीतीश से पूरा बिहार नाराज है। इस बार बिहार में जदयू को अपना वजूद बचाने के लाले पड़ने के आसार हैं। कोयरी,कुर्मी,अन्य पिछड़ा वर्ग, और मुस्लिम वोटर नीतीश से नाराज है। पूर्णिया में 39.47 फीसदी मुस्लिम और हिन्दू 60.94 फीसदी हैं। अररिया में मुस्लिम 42.95 और हिन्दू 56.68 फीसदी हैं। किशनगंज में मुस्लिम 67.98 और हिन्दू 31.43 फीसदी हैं।कटियार में44.47 फीसदी मुस्लिम और 54.85 फीसदी हिन्दू हैं। बिहार में मजहबी आंकआंकड़ा हिन्दू 82.69,मुस्लिम 16.87,ईसाई 0.12 और सिक्ख 0.02 फीसदी हैं। महागठबंधन के साथ यादव 83 फीसदी और एनडीए के साथ 13 फीसदी हैं। कुर्मी महागठबंधन के साथ 62 फीसदी और एनडीए के साथ 31 फीसदी। कोयरी 27 फीसदी एनडीए के साथ और महागठबंधन के साथ 41 फीसदी। मुस्लिम महागठबंधन के साथ 78 फीसदी और एनडीए के साथ 04 फीसदी। जाहिर सी बात है कि नीतीश के पाला बदलने से एनडीए को कोई खास बढ़त मिलती नहीं दिख रही है। समीकरण में सेंधमारी के लिए बीजेपी सीमांचल में तैयारी कर रही है। लेकिन उसे सफलता मिलते नहीं दिख रहा है। कहा जा रहा है,कि पलटू पाॅलिक्क्सि इस बार बीजेपी और जदयू दोनों को ले डूबेगा।

बीजेपी के साथ खेला होगा..
कर्नाटक की 28 सीट में 25 सीट पर बीजेपी जीती थी। एक-एक सीट कांग्रेस,जेडीएस और निर्दलीय को 2019 में मिली थी। लेकिन अब वहां कांग्रेस की सरकार है। यहां बीजेपी विधान सभा बहुत बुरी तरह हार चुकी है। जाहिर सी बात है,कि कर्नाटक उसके लिए कंटक साबित होगा। शिवकुमार चाणक्य की भूमिका में हैं। मोदी को अबकि 5-6 सीट के भी लाले हैं। दस राज्यों की कुल सीट 254 होती है। 2019 जैसी स्थिति अब बीजेपी के साथ नहीं है। यानी इन राज्यों में ही खेला हो गया तो कैसे चार सौ के पार एनडीए जाएगा। आन्ध्र प्रदेश की 25 सीट में वायएसआर 23 सीट और टीडीपी को 03 सीट मिली थी। कांग्रेस और बीजेपी को एक भी सीट नहीं। जगन रेड्डी की हर बात मोदी मानते हुए उनसे हाथ मिला। ताकि आन्ध्र में बीजेपी खाता खोल सके। ओड़िशा के नवीन पटनायक से भी हाथ मिला लिया है। ओड़िसा की 21 सीट में 12 सीट बीजेडी,8 बीजेपी और एक सीट कांग्रेस को 2019 में मिली थी। तेलंगाना के के. सी. आर. से भी समझौता कर लिया। यहां 17 सीट है। जिसमें चार सीट बीजेपी को 2019 में मिली थी। नौ सीट टीआरएस को। तीन सीट कांग्रेस को। एक सीट ओवैसी की पार्टी को। झारखंड में बीजेपी 14 में 12 सीट पाई थी। 2024 में सभी सीट जीतती यदि वो हेमंत सोरेन केा जेल न भेजती। उन्हें जेल भेजकर वो अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली। यहां उसे छह सीट से ज्यादा मिलने की संभावना नहीं है। यूपी में मुख्तार अंसारी की मौत के बाद बनारस में मोदी को इस बार रिकार्ड वोट नहीं मिलेगा। उनका वोट प्रतिशत गिरेगा। जिस तरह यू.पी. में योगी कर रहे हैं,उससे बीजेपी की सीट बढ़ने की बजाए घटेगी। अबकि बार 50-55 सीट ही बीजेपी को मिलेगी।

जीती सीट बीजेपी को बचाना होगा..
बीजेपी 2014 में 427 सीट पर चुनाव लड़ी थी,तब 282 सीट जीती थी। 2019 के चुनाव में 436 सीट पर चुनाव लड़ी और 303 सीट जीती। तब उसके साथ कई पार्टियां साथ थी। इस बार बीजेपी को 475 या फिर 500 सीटों पर चुनाव लड़ना होगा,तभी चार सौ पार की बात की जा सकती है। वैसी बीजेपी को अपनी जीती हुई सीट को बचाना बहुत टेढ़ी खीर है।यूपी,मध्यप्रदेश,गुजरात,और राजस्थान में अब पहले जैसी बात नहीं है। तीन सौ पार हो जाए यही बहुत बड़ी बात है। राम लला के उद्घाटन पर मोदी को हीरो हीरोइन लाना पड़ता है। मोदी सरकार ने वादे खूब किये,मगर जमीनी धरातल पर काम कम हुए हैं। बीजेपी वाले कहते हैं,मोदी को तीसरी बार पी.एम.बनाओ ताकि भारत विश्व गुरु बने सके। भारत पहले भी विश्व गुरु रहा है। देश की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है। देश पर 272 लाख करोड़ रुपए का कर्ज है। वहीं बीजेपी के अंदर दूसरे दल से आए लोगों को टिकट मिलने सेे अंतरद्वंद बढ़ गया है।
जुमले की बारिश कब तक
मध्यप्रदेश की 29 सीट में सिर्फ एक सीट कांग्रेस जीती थी। छत्तीसगढ़ की 11 सीट में दो सीट कांग्रेस को मिली थी। राजस्थान की 25 सीटों में 24 बीजेपी और एक सीट सहयोगी पार्टी लोकतांत्रिक पार्टी जीती। इन राज्यों में कांग्रेस और बीजेपी के बीच सीधी चुनावी लड़ाई है। इस बार इन राज्यों में बीजेपी सीट घट सकती है। लेकिन चुनाव से पहले बीजेपी ऐसा महौल बनाने में लगी है,कि विपक्ष चुनाव से पहले ही मैदान छोड़ दे। वैसे बीजेपी पूरे पांच साल चुनाव ही लड़ती है। जबकि विपक्ष आखिरी साल के छह माह चुनाव की तैयारी करती है। सवाल यह है कि दस साल के बीजेपी के सामने एंटीइन्कमबैसी भी है। पुलवामा कांड, बाला कोट, अच्छे दिन दूर क्यों है।,इलेक्टोरल बांड कांड,सरकारी एजेंसी का दुरूप्रयोग,अपने दस साल के काम काज पर श्वेत पत्र संसद में प्रस्तुत करना चाहिए,वो पुरानी सरकार के खिलाफ श्वेत पत्र पेश करते हैं। 2014 से पहले देश का क्या हाल था,यह बताना देश को हैरान करता है। सवाल यह है कि देश को भरमाने से क्या वोट मिल सकता है? गंगा साफ हो गयी। महंगाई कम हो गयी। दो करोड़ हर साल रोजगार मिलने लगा। काला धन आ गया। करेप्ट नेताओं का पैसा गरीबों में बांट देंगे। सब के जेब में 15 लाख रुपए आ गये। पश्चिम बंगाल के मनरेगा के 21 लाख मजदूरों का मजदूरी तीन साल से रोक रखा है। क्या वो मिल गया। सहारा का पैसा गरीबों को मिलने लगा? अमितशाह के पांच हजार करोड़ बांटने की बात जुमला साबित हुई। महिला आरक्षण बिल लाए क्यों? सवाल यह है कि जुमलों की बारिश आखिर कब तक?

हिन्दुस्तान बचाने वाला चुनाव..
दिल्ली के रामलीला मैदान में 25 से ज्यादा दलों ने चुनाव से पहले बड़ी रैली की। रैली में गठबंधन के 21 नेताओं ने जनसभा को संबोधित किया। राहुल गांधी ने कहा,नरेंद्र मोदी जी इस चुनाव से पहले मैच फिक्सिंग की कोशिश कर रहे है। उन्होंने हमारी टीम से दो खिलाड़ियों को अरेस्ट करके अंदर कर दिया। नरेंद्र मोदी इस चुनाव से पहले मैच फिक्सिंग की कोशिश कर रहे है। उनका 400 का नारा बिना मैच फिक्सिंग के बिना सोशल मीडिया और मीडिया पर दबाव डाले 180 से ज्यादा नहीं हो पा रहा है। कांग्रेस देश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी है। लेकिन हमारे अकाउंट्स फ्रीज करा लिए गए हैं। हमें पोस्टर छपवाने हैं,कार्यकर्ताओं को राज्यों में भेजना है,लेकिन हमारे अकाउंट्स फ्रीज हैं। ये पूरी की पूरी मैच फिक्सिंग की कोशिश की जा रही है। मेरी बात गौर से सुन लीजिए। अगर भाजपा जीती और उन्होंने संविधान को बदला तो इस पूरे देश में आग लग जाएगी। ये देश नहीं बचेगा। ये चुनाव वोट वाला चुनाव नहीं है। ये चुनाव हिंदुस्तान को बचाने वाला चुनाव है।
बहरहाल 25 से अधिक दलों की महारैली से एक बात साफ है, कि हाथ से हाथ मिल गए तो सरकार बदल जाएगी। इन नेताओं का करिश्मा मोदी की गारंटी के पांव उखाड़ सकते हैं। जनता का वोट सबसे बड़ी आदालत है। हमेशा अपनी गलती से ही सत्ता पक्ष मुंह की खाता है।

 

Sunday, March 31, 2024

भाने लगी भाजपा,‘हाथ’ का साथ छोड़ा

रमेश कुमार‘रिपु’
मतदान के पहले बीजेपी इस प्रयास में है कि अधिक से अधिक कांग्रेसियों के माथे पर गेरूआई राजनीति का गुलाल लगा कर उन्हें अपना बना लेना है। इससे जनता में यह संदेश जाएगा कि प्रदेश में विपक्ष कमजोर हो गया। वहीं कांग्रेसी कहते हैं,अब भारतीय जनता पार्टी,भारतीय जनता कांग्रेस पार्टी हो गयी है।राजनीति का यह पेशेवराना तरीका है। पार्टी को ऐसा लगता है, कि ऐसा करने से उसके मार्ग के सारे रोढ़े हट गए। तीसरी दफा बीजेपी उदय की बात अभी गांव तक, उतनी तेजी से नहीं पहुंची है। शहरी फिजा में दो तरह की बातें हैं। मोदी को रोकने वाले और मोदी को चाहने वाले। मध्यप्रदेश में बीजेपी की सरकार है। इसलिए मध्यप्रदेश की राजनीति करने वाले यह समझ रहे हैं कि आने वाला कल बीजेपी का ही है,इसलिए ऐसे लोगों के लिए विचारधारा कोई मायने नहीं रखती। उन्हें सत्ताई पार्टी के साथ रहना ज्यादा अच्छा लगता है। चूंकि प्रदेश की राजनीतिक हवा बदल रही है। बीजेपी का दावा है कि पूर्व केन्द्रीय मंत्री सुरेश पचौरी सहित 6 पूर्व विधायक,एक महापौर,207 पार्षद,सरपंच और 500 पूर्व जनप्रतिनिधियों सहित 17 हजार कांग्रेसी बीजेपी ज्वाइन कर चुके हैं। इसीलिए पूर्व गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा कहते हैं,चुनाव तक 70 हजार से एक लाख कांग्रेसी बीजेपी में शामिल हो जाएंगे।गिनीज बुक में नाम दर्ज कराएंगे। भाजपाई बनाना है कांग्रेसियों को.. सवाल यह है कि क्या थोक में कांग्रेसियों को बीजेपी के खेमें में लाने से इस बार बीजेपी 29 सीट जीत जाएगी? मध्यप्रदेश अब शिवराज के हाथ में नहीं है लेकिन, उन्होंने कर्जदार प्रदेश डाॅक्टर मोहन यादव को दिया है। मोहन यकीन दिलाने की कोशिश कर रहे हैं,कि अर्थव्यवस्था बेहतर है। प्रदेश की बागडोर सही पार्टी के हाथ में है। ग्रामीण क्षेत्र हो या फिर शहरी क्षेत्र, उसे विकास के लिए अनाथ नहीं छोड़ा जाएगा। भले उन्हें एक साल में चार नहीं,दस बार कर्ज लेना पड़े। प्रदेश पर करीब चार लाख करोड़ रुपए का कर्ज है।वहीं डिप्टी सी.एम राजेन्द्र शुक्ला रीवा की जमीन निजी हाथों को औने पौन दाम में देकर भाजपा का महाजन बन गए हैं। अभी रीवा संभाग में भाजपा ने चुनावी एजेंडे को सिर के बल खड़ा नहीं कर पाई है। लेकिन मोहन यादव मोदी की तरह हिन्दुत्व के भावनात्मक मुद्दे के उभार के जरिए वोट पाना चाहते हैं।मोहन यादव कहते हैं, हमें खुद मोदी बनना है। पारस पत्थर की तरह बनकर लोहा और दूसरी धातु को बीजेपी बनाना है। राजेन्द्र को सवालों से परहेज डिप्टी सीएम के भाषण में भिन्नता नहीं है। वो शिवराज सिंह की तरह एक ही बात हर बार दोहराते हैं। उनके भाषण रीवा संभाग से बाहर की सीमा को नहीं छूते। जबकि आज लोग यह जानना चाहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्टोरल बांड के संबंधी में जो कहा,उसका सच क्या है। क्या वाकयी में बीजेपी ने चंदा के नाम पर रिश्वत ली है। 16 हजार करोड़ रुपए जिन कंपनियों ने बीजेपी को चंदा दिया, उनके यहां ई.डी. ने छापा मारा तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई। ई.डी.चुनाव के वक्त ही सक्रिय क्यों होती है। मोदी की गारंटी महंगाई, बेरोजगारी,गिरते रुपये पर क्यों नहीं है। केन्द्रीय वित्त मंत्री का बजट जमीनी धरातल पर क्यों नहीं दिखता। प्रदेश कर्जदार प्रदेश क्यों बन रहा है। उनकी पार्टी के रीवा सांसद पर विपक्ष ने जो आरोप लगाए हैं, उसका सच जनता को क्यों नहीं बताते। क्यों जनार्दन मिश्रा ने ऐसा कोई सवाल संसद में नहीं उठाया, जिससे विंध्य न सही, रीवा की जनता का हित जुड़ा हो। आप के विकास के भूगोल में आम आदमी को जगह क्यों नहीं है? मध्यप्रेदश में 12876 स्कूलें बंद क्यों कर दी गयी। विकास के हब के साथ रीवा क्राइम का हब क्यों बन रहा है। सिंगापुर क्यों नहीं बन सका सिंगरौली। ऐसे कई सवाल हैं,जिनसे डिप्टी सीएम परहेज करते हैं। वो शिवराज सिंह चौहान से अलग नहीं है। इसीलिए बीजेपी हाईकमान की नजर में चुनावी महाजन हैं। अब देखना है कि विंध्य की कितनी सीट वो मोदी की झोली में डाल पाते हैं। अमहिया कांग्रेस भाजपा की हुई.. अमहिया में सत्ता अब भी है। कभी यहां अमहिया सरकार श्रीनिवास तिवारी की हुआ करती थी। अब राजेन्द्र शुक्ला की है। धीरे- धीरे अमहिया कांग्रेस का बीजेपी में विलय होता जा रहा है। सुन्दरलाल तिवारी के बेटे सिद्धार्थ ने इसकी शुरूआत की। बीजेपी में जाकर वो विधायक बन गए। श्रीनिवास तिवारी के पीए रमाशंकर मिश्रा उनके समर्थक और सिरमौर विधान सभा के कांग्रेस के एक दर्जन से अधिक पदाधिकारी भोपाल में वीडी शर्मा के हाथ बीजेपी की सदस्यता ली। दो अप्रैल को मुस्लिम नेता डाॅ मुजीब खान सहित और कई कांग्रेसी पदाधिकारी बीजेपी में डाॅ मोहन यादव की उपस्थिति में बीजेपी के हो जाएंगे। जाहिर सी बात है कि सेमरिया विधान सभा में कांग्रेस विधायक अभय मिश्रा ने आधी बीजेपी को कांग्रेसी बना दिया,उसी तर्ज पर डिप्टी सी.एम. कर रहे हैं। वो कौन सी तरकीब है.. सवाल यह है कि अभय मिश्रा ने जो किया क्या वो डिप्टी सीएम कर पाएंगे। जनार्दन मिश्रा को लेकर बीजेपी के अंदर जो उहापोह की स्थिति है। नाराजगी के स्वर तेज हैं,क्या उसे मद्धिम कर पाएंगे। राजेन्द्र शुक्ला उन सभी को बांए कर दिये है,जिनसे उन्हें लगता है वो उनके विधान सभा में भीतरघात कर सकते हैं। उनके सियासी कद को कतर सकते हैं। ऐसे में जनार्दन मिश्रा के लिए व्यापक पैमाने पर अपने प्रबंधकीय चुनावी पैतरे से क्या सब कुछ आल इज वेल कर लेंगे। ऐसी कौन सी तरकीब है, उनके पास जिससे वो जनार्दन मे पक्ष में हवा बनाने के साथ वोटों को मजबूत करती है,शायद अमित शाह भी नहीं जानते होंगे। उस स्थिति में जब बसपा भी चुनावी समर में है। और उनका जिलाध्यक्ष अजय सिंह पटेल उनके और जनार्दन मिश्रा के साथ नहीं है। ऐसे में पटेल वोट किसकी झोली में जाएगी स्वयं राजेन्द्र शुक्ला भी नहीं जानते। त्रिकोंणीय स्थिति बनने पर फायदा इस बार भाजपा को मिलता नहीं दिख रहा है। रीवा में विचारधारा की लड़ाई नहीं बल्कि दो व्यक्त्विों की लड़ाई है। सियासी मामले में अभय से राजेन्द्र की बराबरी भला क्या हो सकती है।लेकिन कांग्रेस भी अनाड़ी नहीं है। अच्छे दिन की चमक खोने की उसने उम्मीदें लगा रखी है।

सियासी लड़ाई में कांग्रेस आगे,बीजेपी पीछे

स रमेश कुमार‘रिपु’ राजनीति का रंग हमेशा एक सा नहीं होता है। वो गिरगिट की तरह बदलता रहता है। संभागीय मुख्यालय रीवा में बीजेपी की पार्टी का रंग भी विधान सभा चुनाव के बाद एकदम से बदल गया है। लोकसभा में हर विधान सभा के विधायक और पूर्व महापौर को सियासी लड़ाई की मोर्चेबंदी से बीजेपी ने दूर कर दिया है। इस वजह से लोकसभा की सियासी लड़ाई में बीजेपी अभी पीछे दिख रही है। उसकी वजह कई है। बीजेपी का दावा है, कि दो अप्रैल को मुख्यमंत्री मोहन यादव के आने के बाद गेरूआई राजनीति की पताका दिखने लगेगी। अभी सियासी बैठक और कार्यक्रम में कांग्रेस आगे है। लोकसभा की
लड़ाई कांग्रेस से नीलम अभय मिश्रा के नाम की घोषणा होते ही डिप्टी सी.एम राजेन्द्र शुक्ला और अभय मिश्रा की हो गयी है। जनार्दन मिश्रा ने पूर्व पार्षदों को याद किया, मगर राजेन्द्र शुक्ला ने पूर्व महापौर को दरकिनार कर दिये हैं। जाहिर सी बात है डिप्टी सी.एम.जिस शहर में हो वहां का सियासी गिरगिट उनके अनुसार रंग नहीं बदला तो फिर कैसा पाॅवर और कैसी सियासत। दो अप्रैल को मुख्यमंत्री मोहन यादव रीवा में रहेंगे। जनार्दन मिश्रा नामांकन दाखिल करेंगे। और एक हूंकार भरेंगे,अबकि बार फिर मोदी सरकार। मोदी सरकार चार सौ के पार होगी या नहीं,यह तो मोहन यादव भी नहीं जानते। इसलिए कि कांग्रेस यदि जीतने की रणनीति के साथ चुनाव लड़ी तो वह विधान सभा चुनाव के जीत के अनुसार कम से कम सात से दस सीट जीत सकती है। जबकि कमलनाथ कह रहे है, कांग्रेस 12 सीट जीतेगी। हर वार्डो में महिलाएं घूमेंगी.. कांग्रेस की जन नेत्री कविता पांडे कहती हैं,नीलम मिश्रा के पर्चा दाखिल करने के बाद रीवा शहर के 45 वार्डो में महिला कांग्रेस नेत्रियों का प्रचार शुरू हो जाएगा। कांग्रेसी उत्साहित हैं। अभय मिश्रा के समय कांग्रेस को 52 हजार वोट मिला था और इंजीनियर राजेन्द्र शर्मा के समय कांग्रेस को 56 हजार वोट मिले। लोकसभा में कांग्रेस रीवा विधान सभा में 60 हजार ज्यादा वोट पाएगी। इस बार आठों विधान सभा में कांग्रेस का एक -एक कार्य कर्ता झूठे वायदे पर भारी साबित होगा। कांग्रेस प्रचार में आगे.. कांग्रेस की चुनावी तैयारी बताती है कि इस बार की जंग सचमुच कुरूक्षेत्र का रण होने जा रहा है।यह डिजिटल युग का युद्ध है। और इस मामले में काग्रेस सबसे आगे है। यह कह सकते हैं,कि कांग्रेस दिमाग से चुनाव लड़ रही है। कांग्रेस ग्रामीण क्षेत्र में आगे है जबकि बीजेपी पीछे है। कांग्रेस आठों विधान में बैठक कर चुकी है। ब्लाक स्तर पर उसके कई विधान सभा में कार्यक्रम हो चुके हैं। सेक्टर स्तर पर कार्यक्रम चल रहे हैं। सूचना तकनीक के इस चहचहाते दौर में कांग्रेस ज्यादा से ज्यादा मतदाताओं तक पहुंचने की कोशिश में लगी है। ग्रामीण क्षेत्र में सांसद जनार्दन मिश्रा के प्रति नाराजगी का आलम घना है। वहीं कांग्रेस उम्मीदवार नीलम अभय मिश्रा ग्रामीणों को कांग्रेस को वोट देने के लिए प्रेरित करने के लिए अभियान में जुटी हैं। जिला ग्रामीण कांग्रेस अध्यक्ष इंजीनियर राजेन्द्र शर्मा जिले भर में कांग्रेस के पक्ष में कार्यक्रम कराने और व्यक्तिगत संपर्क बना रहे हैं। आठों विधान सभा में कांग्रेस के प्रत्याशी बीजेपी को शिकस्त देने सांसद जनार्दन मिश्रा के नकारात्मक कामों का प्रचार कर रहे हैं। बीजेपी अपनी दुखती रगों की उधाड़े जाने से बचाने की चिंता कर रही है। कांग्रेस छोड़ेंगे... मुख्यमंत्री डाॅ. मोहन यादव दो अप्रैल को आएंगे। इस दिन कांग्रेस के दो बड़े नेता बीजेपी में शामिल होंगे। एक रीवा से डाॅ. मुजीब खान दूसरे सेमरिया विधान सभा से पूर्व विधान सभा प्रत्याशी। इन दोनों नेताओं के बीजेपी में जाने से बीजेपी को फायदा होगा। मुस्लिम वोटर अभी तक कांग्रेस को वोट करता आया है। इस बार बीजेपी को कर सकता है। मुसलमान हुकूमत में हिस्सेदार केवल चुनावी समझौते के जरिए बन सकता है। मुल्क की कोई भी ऐसी पार्टी नहीं है,जिसे मुसलमानों ने वोट नहीं किया हो। इसके बावजूद नतीजा शून्य रहा। मुस्लिम वोट बीजेपी को सत्ता में आने से नहीं रोक सका। असल में सेकूलर वोटों का बंटवारा ही भाजपा को सत्ता में लाने का सबब बना। सीएए से मुस्लिम नाराज हैं। कोर्ट में याचिका भी दायर है। किधर मुसलमान वोटर... एक बार फिर रीवा जिले के 27 हजार मुसलमानों में मंथन चल रहा है,कि उनके वोट किधर जाएं। यदि बीजेपी बुरी है,तो भली पार्टी कौन है? क्या राजेन्द्र शुक्ला को देखकर बीजेपी को वोट कर दें? अभय मिश्रा कहते हैं,मुसलमानों में एक नई जागृति आ रही है। वे बीजेपी के लुभावने वादे और घोंषणाओं के सुनहरे जाल में नहीं फंसना चाहते। उन्हें एक सच्चे दोस्त की तालाश है। पूर्व मेयर वीरेन्द्र गुप्ता कहते हैं,पार्टी का प्रयास है,कि मुसलमान वोट बैंक की राजनीति से बाहर निकलकर आत्म विश्वास और राष्ट्रवाद की राजनीति की मुख्यधारा में आएं। बीजेपी नहीं चाहती कि लोग उन्हें शक की नज़र से देखें। बबीता साकेत बाहर... कांग्रेस की गुड बुक में बबीता साकेत नहीं है। वो मनगवां विधान में संगठन का काम देख रहे रवि तिवारी की अक्सर खिलाफत करती फिरती है। कांग्रेस प्रत्याशी नीलम अभय मिश्रा ने फोन पर उससे बातें भी की। लेकिन वह यही कही कि वो बीजेपी में नहीं जा रही है। उसके मन में क्या चल रहा है, कोई नहीं जानता। लेकिन यह माना जा रहा है कि उसे कोई जवाबदारी देने से वो भीतरघात कर सकती है। उसके विधान सभा में कांग्रेस प्रत्याशी का गढ़,मनगवां,और लालगांव में कार्यक्रम हो चुके हैं और हो रहे हैं,लेकिन उसे खबर नहीं। कांग्रेस का कोई भी व्यक्ति उस पर भरोसा नहीं कर रहा है खासकर ब्राम्हण वोटर और कांग्रेस कार्य कर्ता । जाहिर सी बात है कि कांग्रेस लोकसभा का चुनाव दिमाग से लड़ रही है,वहीं बीजेपी मोदी के नाम पर। बीजेपी एक व्यक्ति के भरोसे सारा दांव लगाने का लोभ संवरण नहीं कर पा रही है। जबकि कांग्रेस प्रत्याशी नीलम अभय मिश्रा बीजेपी प्रत्याशी पर हमला करने में मुखर हैं। वो हर विधान सभा में बीजेपी के विधायकों को विकास,और युवाओं के रोजगार के साथ राष्ट्रीय मसले पर भी बात कर रही हैं। बीजेपी ने ईडी का डर दिखाकर कंपनियों से चंदा नहीं,रिश्वत ली। इलेक्टरोरेट बांड की सच्चाई देश के सामने आ गयी। सांसद जनार्दन मिश्रा ने अपनी जेबें भरी, रीवा की जनता की अनदेखी की। जाहिर सी बात है एक पार्टी की चमक दिख रही है,दूसरी पार्टी का अभी पता नहीं है। अभी केन न्यूज़ के नेशनल हेड रमेश कुमार 'रिपु' की रीवा से रिपोर्ट