Thursday, March 9, 2023

सीट बेल्ट बांध लें,चुनावी मौसम बदलने वाला है

"अगले साल दस राज्यों में चुनाव है। गुजरात चुनाव के बाद से आम आदमी पार्टी ने अपनी ओर सबका ध्यान खींचा है। सियासी गलियारों में सवाल उठने लगा है,आप किसे करेगी हाॅफ। क्या आप की वजह से चुनावी मौसम बदलेगा? किस पार्टी को अपनी सीट बेल्ट बांध लेनी चाहिए..?" 0 रमेश कुमार ‘रिपु’ गुजरात चुनाव से सियासियों को यह एहसास हो गया,कि आम आदमी पार्टी अब क्या चीज है? गुजरात में असंभव को भी संभव कर दिया। दो राज्यों में आप की सरकार। अब दिल्ली में भी आम आदमी पार्टी का मेयर,यानी एमसीडी में कब्जा। अगले साल मेघालय,छत्तीसगढ़, कर्नाटक,राजस्थान,मध्यप्रदेश और राजस्थान में चुनाव है। गुजरात चुनाव के बाद से आम आदमी पार्टी ने अपनी ओर सबका ध्यान खींचा है। सियासी गलियारों में सवाल उठने लगा है,आप किसे करेगी हाॅफ। क्या आप की वजह से चुनावी मौसम बदलेगा? किस पार्टी को अपनी सीट बेल्ट बांध लेनी चाहिए? अगले साल होने वाले दस राज्यों के चुनाव में सबका ध्यान मध्यप्रदेश,राजस्थान और छत्तीसगढ़ में है। मध्यप्रदेश में बीजेपी एंटीइन्कमबेसी के संक्रमण से गुजर रही है। जबकि है सत्ता में। लेकिन संशय में है। किसी को कुछ सूझ नहीं रहा है। अंदर ही अंदर खामोशी है। शांति है,पर सब अशांत हैं। कांग्रेस के खेमे में तोड़ फोड़ कर उसने सरकार बना ली,मगर चुनाव में जनता उसे सत्ता सौपेंगी कि नहीं,बीजेपी के नेता दुविधा में हैं। गुजरात में पूरा मंत्रीमंडल बदल दिया गया था। मुख्यमंत्री भी। साथ ही 103 नए चेहरों को टिकट दिया गया। क्या यहाँ भी आप की वजह से ऐसा हो सकता है,या फिर ऐसा करना पड़ेगा। आंतरिक सर्वे और इंटेलीजेंस की रिपोर्ट ने बीजेपी हाईकमान का बी.पी.बढ़ा दिया है। उसे भी लगता है,एंटी इनकम्बेंसी की वजह से बीजेपी को बड़ा नुकसान होने का अंदेशा है। मध्यप्रदेश में भी शिवराज सरकार की बड़ी सर्जरी करके ही एंटी इन्कमबेंसी कम की जा सकती है। करीब 67 विधायकों के टिकट काटने की योजना है। ताकि आम आदमी पार्टी कांग्रेस के लिए भष्मासुर साबित हो सके। वहीं बीजेपी के सामने अगामी चुनाव में कई सियासी कंटक है । सिंधिया गुट के बाद आज भी कांग्रेस में 95 विधायक हैं। बीजेपी को ज्योतिरादित्य सिंधिया गुट को भी टिकट देना होगा। जाहिर है टिकट वितरण में संतुलन बनाना बीजेपी के लिए मुश्किल होगा। संतुलन तभी बनेगा,जब सीनियर विधायकों की टिकट कटेगी। बीजेपी और कांग्रेस से नाराज लोगों को टिकट देने आप कांउटर खोल कर बैठ जाएगी। ऐसे में सबसे ज्यादा बवाल बीजेपी में मचेगा। और आम आदमी पार्टी की वजह से नुकसान बीजेपी को होगा। ऐसा हुआ तो चुनाव का मौसम बदल जाएगा। सीट बेल्ट बांधने की बारी बीजेपी की है। आप से कांग्रेस का संगठन ज्यादा मजबूत होने से उसे खतरे का अंदेशा कम है। बीजेपी नेता मानते हैं कि,गुजरात जैसी मध्यप्रदेश की सियासी स्थिति नहीं है। यहांँ का वोटर भी वैसा नहीं है। लेकिन बरसों से बीजेपी में जो विधायक हैं,वर्तमान में मंत्री भी हैं। चुनाव प्रचार में या फिर लोकसभा चुनाव में उन्हें लगाया जा सकता है। देखा जाए तो बीजेपी में आठ बार से विधायक हैं गोपाल भार्गव। सात बार से विधायक हैं विजय शाह,गौरीशंकर बिसेन और कर्ण सिंह वहीं छह बार से विधायकों में जगदीश देवड़ा,नरोत्तम मिश्रा,बिसाहूलाल सिंह,पारस जैन,रामपाल सिंह और गोपीलाल जाटव हैं। पांच बार से विधायक कमल पटेल,प्रेम सिंह पटेल,तुलसी सिलावट,मीना सिंह,जय सिंह मरावी,सीतासरण शर्मा,नागेन्द्र सिंह। चौदह ऐसे विधायक हैं,जो चार बार से विधायक हैं। 28 विधायक तीन बार से है। दो बार के 36 विधायक हैं और पहली बार विधान सभा पहुंचने वाले 30 विधायक हैं। जाहिर सी बात है उन मंत्रियों और विधायकों की टिकट कट सकती है जिन्हें नगरीय निकाय चुनाव और पंचायत चुनाव में बीजेपी के जिताने का दायित्व दिया गया था,लेकिन सफल नहीं हो सके। वैसे आप के पास कोई सियासी सिद्धांत नहीं। सिवाय रेवड़ी नीति के। यह रेवड़ी नीति का जादू किन राज्यों की जनता पर चलेगा,खुद आप भी नहीं जानती। लेकिन गुजरात चुनाव में उसकी वजह से कांग्रेस 77 सीट से फिसल कर 17 सीट पर आ गई। क्या मध्यप्रदेश में भी ऐसा हो सकता है? क्या वाकई कांग्रेस का विकल्प आप बन सकती है या फिर उसे बीजेपी का भी विकल्प बतौर जनता देखती है? शहरी अबादी का मध्यम वर्ग का तबका आप की रेवड़ी नीति से प्रभावित है। यह वोटर कांग्रेस और बीजेपी दोनों को वोट करता आया है। वो बंटेगा। आप उसी वोटर पर फोकस करेगी,जिन्हें कांग्रेस और बीजेपी करती है। उसकी नजर ओबीसी,एस.सी.और एस.टी.. वोटरों पर है । सन् 2018 के विधान सभा चुनाव में आप को मात्र 2.54 लाख वोट मिले थे। जबकि नगरीय निकाय और पंचायती चुनाव में उसे सात फीसदी वोट मिले। यदि वो विधान सभा चुनाव में पन्द्रह फीसदी वोट झटक लेती है तो बीजेपी और कांग्रेस दोनों का नुकसान होगा। प्रदेश में आम आदमी पार्टी का सिंगरौली में मेयर है। जबकि इसे शिवराज सिंह चैहान सिंगापुर बनाने का वायदा किए थे। यहाँ आप के पांँच पार्षद हैं। यानी सिंगरौली जिले की विधान सभा में आप का दखल रहेगा। आप ने नगरीय निकाय चुनाव में पार्षद के लिए 1500 उम्मीदवारों को टिकट दिया था। जिसमें 51 प्रत्याशी चुनाव जीते। आप के 86 पार्षद प्रत्याशी दूसरे नम्बर पर थे। मेयर चुनाव में ग्वालियर से रूचि गुप्ता ने 45 हजार से अधिक वोट पाई थीं। वहीं सिंगरौली, उमरिया, कटनी, छतरपुर, टीकमगढ़, राजगढ़, शाजापुर,रतलाम,ग्वालियर के डबरा,श्योपुर,छिंदवाड़ा में पार्टी के पार्षद चुनकर आए हैं। तो क्या यह मान लिया जाए, कि 2018 के चुनाव में कांग्रेस जिन 26 सीटों पर सात हजार से भी कम वोटों से जीती है, गुजरात जैसी स्थिति बनने पर कांग्रेस को पचास से अधिक सीटों का नुकसान होगा। दिल्ली से लगे ग्वालियर चंबल में दस विधान सभा आते हैं। आदिवासी रिजर्व सीटों पर आप का जयस(जय आदिवासी युवा शक्ति) से तालमेल है। ऐसे में कांग्रेस की दस सीटों का परिणाम प्रभावित हो सकता है। 2018 के चुनाव में आदिवासी की 47 सीट में 30 सीटें बीजेपी जीती थी। इस बार यह सीट घट सकती है। विधान सभा चुनाव में बीजेपी और कांग्रेस के बागी उम्मीदवारों की वजह से उसका वोट प्रतिशत पन्द्रह फीसदी हुआ तो चुनाव का मौसम बदल जाएगा। छत्तीसगढ़ में आप एक बूथ पर दस युथ की रणनीत पर काम कर रही है। आप के कार्यकर्ता घर घर जा कर जानकारियांँ एकत्र कर रहे हैं। 2018 के चुनाव में कांग्रेस सात सीटों पर तीसरे नम्बर पर थी। 19 सीटों पर उसका मंथन चल रहा है। कांग्रेस के 71 विधायक हैं। आप उनके लिए भी दरवाजे खोल रखी है जो बीजेपी,कांग्रेस और जोगी कांग्रेस से टिकट नहीं पाएंगे। छत्तीसगढ़ में आप के लिए खोने के लिए कुछ नहीं है। लेकिन आप से सियासी नुकसान अन्य दलों को होगा,क्यों कि आप भी इस वक्त राष्ट्रीय पार्टी है।

विपक्ष को तोड़ने मोदी की नायाब रणनीति

"ईडी,आइटी और सीबीआइ की चाकू से विपक्ष की आर्थिक पाइप लाइन को चुनाव से पहले मोदी ने काटने का इंतजाम किया है। ताकि 350 से ज्यादा के लक्ष्य के तहत मुश्किल वाली 160 सीट में भी भगवा छतरी तन सके।" 0 रमेश
कुमार ‘रिपु’ बीजेपी के लिए 2024 का चुनाव जीतना ज्यादा महत्वपूर्ण है। ताकि वह इंदिरा गांधी के दस साल तक पी.एम.रहने का रिकार्ड तोड़ सके। इसके लिए मोदी सरकार ने ईडी,आइटी और सीबीआइ की चाकू से विपक्ष की आर्थिक पाइप लाइन को चुनाव से पहले काटना शुरू कर दिया है। ताकि 350 से ज्यादा के लक्ष्य के तहत मुश्किल वाली 160 सीट में भी भगवा छतरी तन सके। वैसे नौ राज्यों का चुनाव भाजपा के लिए 2024 के आम चुनाव का सेमीफाइनल है। दूसरी और कांग्रेस के लिए खुद को पुर्नजीवित करने का आखिरी मौका। लेकिन बीजेपी ने चुनाव से पहले जो रणनीति बनाई है,उसने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा है। छत्तीसगढ़ में छठवीं बार ई.डी ने छापा मारा है। विपक्ष को जहांँ से आर्थिक हेमोग्लोबिन मिल रहा है,उस नस को ई.डी,आइ.टी. और सी.बी.आइ. के ब्लेड से सत्ता पक्ष काट देना चाहता है। ताकि विपक्ष आर्थिक रूप से विकलांग हो जाए। यह बात छत्तीसगढ़ में ईडी की कार्रवाई से स्पष्ट है। छठवीं बार ई.डी.- छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल जब-जब दूसरे राज्य का चुनावी प्रभारी बने,ईडी ने छापा मारा। झारखंड,असम,उत्तर प्रदेश,उत्तराखंड या फिर हिमाचल प्रदेश का चुनाव प्रभारी बनाए गए थे,तब भी ईडी ने राज्य में छापा मारा। अब छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में 24 फरवरी से कांग्रेस का राष्ट्रीय अधिवेशन होने जा रहा है। उससे पहले ई.डी ने छापा मारा। वैसे कांग्रेस के लिए भूपेश बघेल एटीएम हैं। इसलिए सत्ता पक्ष के लिए किरकिरी बने हुए हैं। चूंकि राजनीति पैसे से चलती है। पैसे पर पलती है। ऐसे में कांग्रेस की राजनीति को तोड़ने के लिए पैसे की आवाजाही रोकना जरूरी है। या फिर ईडी,आइटी और सीबीआइ का इतना दबाव बनाओ,कि दीगर पार्टी के लोग बीजेपी में शामिल हो जाएं। प्रवर्तन निदेशालय ने कांग्रेस प्रवक्ता आर.पी सिंह,विनोद तिवारी,कांग्रेस कोषाध्यक्ष रामगोपाल अग्रवाल,खनिज विकास निगम के अध्यक्ष गिरीश देवांगन और भिलाई विधायक देवेंद्र यादव के घर पर छापा मारा। निखिल चंद्राकर कारोबारी सूर्यकांत तिवारी का कर्मचारी है। इनके पास से डायरियां बरामद हुई हैं। जिसमें लेनदेन का ब्यौरा है। लेव्ही घोटाला - यह माना जा रहा है कि पांच करोड़ की उगाही की गई है,जो कि लेव्ही घोटाला है। उसकी पूछताछ के लिए ई.डी.ने छापा मारा है। हर टन कोयले पर पच्चीस रुपए वसूला जाता है। वैसे ईडी ने कइयों को गिरफ्तार किया है। सौम्या चैरसिया जो कि सुपर सीएम कही जाती हैं,वो इस वक्त जेल में है। ईडी ने छत्तीसगढ़ में हुए 540 करोड़ रुपए के भ्रष्टाचार में 277 करोड़ रुपए का लिखित हिसाब दिया है। वहीं कांग्रेस का कहना है,कांग्रेस अधिवेशन को डिस्टर्ब करने की ये साजिश है। ई.डी,आइ.टी.चुप्प-मोदी की लोकप्रियता की राह में देश की चरमराती आर्थिक व्यवस्था,बड़ती महंगाई और बेरोजगारी रोड़े बन सकते है। वहीं मोदी के सियासी कामयाबी की बात करें तो 2018 और 2021 के बीच हुए 23 राज्यों के चुनाव में भाजपा केवल त्रिपुरा में सीधे चुनाव जीती। सन् 2022 के चुनाव में वह गुजरात,उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में चुनाव जीती। बाकी अन्य राज्यों में वह गठबंधन की राजनीति की। लेकिन हिमाचल में हार गई। दिल्ली के एमसीडी चुनाव में भी बीजेपी दूसरे नम्बर पर थी। बीजेपी 2023 में होने वाले हर चुनाव को जीतना चाहती है। मोदी सरकार विपक्षी एकता की रस्सी को ईडी,आइटी और सीबीआइ के चाकू से काट देना चाहती है। मगर, उसकी राह में रोड़े भी हैं। जो कंटक बन सकते हैं। बीजेपी चाहती है कि विपक्ष 2024 में रहे,लेकिन ताकतवर न रहे। और जो विपक्षी पार्टी ताकतवर बनने की कोशिश करें उनके पीछे ई.डी.,आइ.टी,और सीबीआइ लगा दो। अडानी मामले में देश का ध्यान बांटने सत्ता पक्ष ने पूरी ताकत लगा दी। एक ही दिन में आम लोगों का शेयर बाजार में दस लाख करोड़ रुपए स्वाहा हो गया। कारपोरेट का पैसा किस-किस मद में लगा है,किस-किस राजनीतिक पार्टी को पैसा मनीलाॅड्रिग के तहत कितना दिया गया,इसका खुलासा न हो जाए,इसके लिए न आइटी और न ही ईडी हरकत में आई। अडानी कांड ने यह बता दिया कि कैसे कारपोरेट काम करता है। उनके लिए नियम कायदे बदल दिए गए। लेकिन सदन में राहुल ने अडानी के मामले में जो भी पूछा उन सवालों का जवाब पी.एम. ने नहीं दिया। बल्कि संसद की कार्यवाही से उनकी बातों को हटा दिया गया। महाराष्ट्र में विपक्ष की आर्थिक पाइप लाइन को पहले शिंदे के जरिए कट किया गया। फिर शिवसेना बागी के हवाले कर दिया गया। अब चुनाव आयोग ने शिवसेना का दफ्तर और सिंबल सब कुछ बागी के हवाले कर दिया। एनसीपी,कांग्रेस 2014 और 2019 में शिवसेना और बीजेपी गठबंधन के आगे नहीं टिक पाए। उद्धव के सामने कई विकट समस्या है। क्यों कि सामने बीएमसी का चुनाव है। मगर,सुप्रीम कोर्ट अभी सुनवाई कोे तैयार नहीं है। नोटिस की फ़ास - मोदी सरकार लोकसभा चुनाव से पहले वो सारे विपक्षी जिनसे बीजेपी को नुकसान हो सकता है,उन सभी के गले में ईडी,आइ.टी और सीबीआइ का सांप डाल देना चाहती है। जैसा कि पश्चिम बंगाल में ई.डी. ने 27 राजनीतिक लोगों को नोटिस दिया है। आइटी ने 715 और सीबीआइ ने 115 लोगों को। केरल में 51 लोगो को ई.डी की नोटिस मिली है। 290 आइटी और 48 सीबीआइ के रडार में है।महाराष्ट्र में एनसीपी और कांग्रेस को मिलाकर 15 लोगों को ईडी की नोटिस दी गई है। 415 आइटी और 98 लोग सीबीआइ के निशाने पर हैं। छत्तीसगढ़ में 17 राजनीतिक लोगों को ईडी की नोटिस। आइटी की नोटिस 392 राजनीतिक लोगों को और 62 सीबीआइ के रडार पर हैं।तेलंगाना राज्य जिस पर केन्द्र सरकार की नजर है। यहां ईडी की नोटिस 19 राजनीतिक लोगों को,944 आई.टी और सीबीआइ के रडार पर 69 लोग हैं। पंजाब में 27 लोगों को ईडी,908 को आइटी और 51 लोगों को सीबीआइ की नोटिस दी गई है। उत्तर प्रदेश में 17 राजनीतिक लोगों को ईडी,490 को आइटी और 37 लोगों को सीबीआई की नोटिस दी गई है। राजस्थान में 16 लोगों को ई.डी जिसमें गहलोत के भाई भी शामिल है,1112 लोगों को आइटी और 86 लोगों को सीबीआई की नोटिस दी गई है। बात यहीं खत्म नहीं हो जाती। बिहार में आरजेडी जब तक नीतिश के साथ हैं,तब तक ईडी की फाइल तेजस्वी के खिलाफ नहीं खुलेगी। और सीबीआइ की फाइल लालू के खिलाफ नहीं खुलेगी। देश की अर्थव्यवस्था बेहद कमजोर हो गई है। महंगाई चरम पर है और बेरोजगारी से लोग परेशान है। लेकिन विपक्ष इसकी बात न संसद में और न मीडिया में कर सके,इसलिए ईडी,सीबीआइ और आइटी के जरिए सत्ता पक्ष 2024 के चुनाव को प्रभावित करना चाहती है।

Wednesday, December 21, 2022

बेशर्म रंग कहाँ देखा दुनिया वालों ने..

.. दीपिका ने रचनात्मक कला केे जरिए केसरिया बिकनी पहनकर थिरकते हुए देश को बताया,कि केसरिया बेशर्म रंग है। यानी कि केसरिया समर्थक और केसरिया पार्टी की सरकार भी बेशर्म है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर विभिन्न माध्यमों से हिन्दू धर्म और संस्कृति को निशाना बनाने की यह सोची समझी साजिश है। 0 रमेश कुमार ‘रिपु’ फारसी का शब्द है रंग। जिसका अर्थ मिजाज और हाल-चाल होता है। लेकिन रंग जब सियासी हो जाए या फिर मजहबी,तो रंग के मायने बदल जाते हैं। उनकी तासीर बदल जाती है। फिर रंग का रंग,देखते बनता है। दुनिया वालों ने कई रंग देखे हैं। फूट के रंग। प्यार के रंग। दंगे का रंग। मगर,फिल्मी दुनिया ने एक नए रग से परिचय कराया है। बेशर्म रंग। आदमी बेशर्म होता है। सुना है। लेकिन बेशर्म रंग कहाँ देखा है दुनिया वालों नें गीत के बोल पर दीपिका पादुकोंण को केसरिया बिकनी में थिरकते देख कर दर्शकों के होश उड़ गए। उनके जेहन पर सवालों की बौछारें भी पड़ी। क्यों कि अभी तक हिन्दू यही जानता है,कि केसरिया आस्था,शौर्य,और गौरव का प्रतीक है। और हरा रंग इस्लाम की आस्था से जुड़ा है। जाहिर सी बात है,हर रंग कुछ कहता है। बशर्ते रंग की जुबां को समझें।  ‘पठान’ फिल्म के ट्रेलर को देखकर लोगों ने फिल्म को नकार दिया था। कहा गया,कि यह फिल्म हॉलीवुड मूवी वॉर और मार्वल्स की कॉपी है। लेकिन दीपिका पादुकोंण ने केसरिया रंग की बिकनी पहनकर जिस अंदाज में थिरकी है,वह दर्शकों के साथ सियासी जगत का भी ध्यान अपनी ओर खींचा है। पठान फिल्म के बेशर्म रंग के गाने को यूट्यूब पर अब तक छह करोड़ से अधिक लोग देख चुके हैं। दीपिका ने रचनात्मक कला केे जरिए केसरिया बिकनी पहनकर थिरकते हुए देश को बताया,कि केसरिया बेशर्म रंग है। यानी कि केसरिया समर्थक और केसरिया पार्टी की सरकार भी बेशर्म है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर विभिन्न माध्यमों से हिन्दू धर्म और संस्कृति को निशाना बनाने की यह सोची समझी साजिश है। मध्यप्रदेश, राजस्थान, बिहार, उत्तरप्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात और महाराष्ट्र में पठान फिल्म का विरोध हो रहा हैं। बिहार के मुजफ्फरपुर में शाहरुख खान और दीपिका पादुकोण सहित पांँच लोगों पर धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाने और अश्लीलता फैलाने के आरोप में केस दर्ज किया गया है। उत्तरप्रदेश के मथुरा में अखिल भारत हिंदू महासभा संगठन के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष दिनेश शर्मा कहते हैं,फिल्म में भगवा कपड़े पहन कर सनातन धर्म को कमजोर दिखाने की साजिश की गई है। हिंदू महासभा कोर्ट से इस फिल्म पर बैन लगाने की मांग करेंगी। भगवा जैसे पवित्र रंग का प्रयोग बिकिनी के लिए करना स्वीकार नहीं किया जाएगा। गुजरात में विश्व हिन्दू परिषद और बजरंग दल ने पहले ही कह दिया है,कि पठान फिल्म का यह गाना बॉलीवुड की विकृत हिंदू विरोधी मानसिकता को दिखाता है। भगवा बिकनी के दृश्यों के साथ फिल्म को गुजरात में रिलीज नहीं होने देंगे। मध्यप्रदेश के गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा कहते हैं,दीपिका पादुकोण टुकड़े-टुकड़े गैंग की स्लीपर सेल है। ऐसे लोग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर देश धर्म संस्कृति का उपहास,रचनात्कता कला और फिल्म के जरि कर रहे हें। फिल्म पठान दोषों से भरी है,और जहरीले मानसिकता पर आधारित है। अगर गाने के बोल और वेशभूषा में बदलाव नहीं किया गया तो विचार करेंगे कि मध्यप्रदेश में फिल्म को रिलीज करना है या नहीं। हरे रंग की बिकनी में भी दीपिका होती तो शायद विरोध न होता। लेकिन ऐसा नहीं किया गया। बीजेपी नेता जयभान सिंह पवैया ने कहा,जिस फिल्म का नाम पठान है। शाहरूख खान हीरो है,उस फिल्म में दीपिका को हरे रंग की चिंदियों से सजा देते। कोलकाता इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में शाहरूख ने कहा,सीट बेल्ट बांध लें,मौसम बदलने वाला है। दुनिया चाहे कुछ भी कर ले। मैं और आप जितने भी पॉजिटिव लोग हैं, सब जिंदा हैं। शाहरुख का इशारा सोशल मीडिया पर फिल्म को ट्रोल करने वालों की तरफ था। सियासत में भी मौसम बदलेगा,कि नहीं,कोेई नहीं जानता। लेकिन हिमाचल प्रदेश का चुनाव कांग्रेस के जीतने पर टुकड़े-टुकड़े गैंग के लोगों को लगता है 2024 में सियासी मौसम बदलेगा।  अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बोलने के लिए शाहरूख और अमिताभ बच्चन ने उस राज्य को चुना,जहाँ कुछ माह पहले तक दंगे ने लोगों का जीना मुहाल कर दिया था। वैसे देश में कितनी भी बड़ी घटना हो जाए, ये दोनों कलाकार नहीं बोलते। शाहरूख का बेटा आर्यन ड्रग्स मामले में अंदर था,तब भी मौन थे। बच्चन परिवार का गांधी परिवार से कैसे ताल्लुकात रहे हैं,सारा देश जानता है। पनामा पेपर्स में इनका नाम है। यानी नम्बर दो का पैसा इनका विदेश में जमा है। संसद में जया बच्चन ने पनाम पेपर्स का जिक्र हुआ तो खिसिया कर बोली,मैं बीजेपी को श्राप देती हूँ। यह कभी सरकार में न आए। अमिताभ बच्चन एक लम्बे समय तक मुलायम सिंह यादव की पार्टी के ब्रांड एम्बेस्डर थे। बोफोर्स में इनका नाम उछला। अजिताभ बच्चन और अमिताभ बच्चन का साथ अमर सिंह न देते,तो जेल जाने से न बचते। आज ये अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता खतरे में है,कह रहे हैं।  दरअसल भारत जोड़ो यात्रा और हिमाचल प्रदेश के चुनाव परिणाम के बाद टुकड़े-टुकड़े वाली गैंग यह बताने में लगी है,कि देश में कुछ भी अच्छा नहीं हो रहा है। हरिवंश राय बच्चन और अमृता प्रीतम दोनों ऐसे साहित्यकार थे,जिन्होंने खुलकर इमरजेंसी का समर्थन किया था। इससे सहज अंदाजा लगाया जा सकता है,कि अमिताभ बच्चन अपने पिता की खींची लाइन से बाहर कैसे जा सकते हैं। वैसे अमिताभ बच्चन अवसरवादी अभिेनेता हैं। जब तक मुलायम सिंह यादव के साथ थे,उनकी पार्टी का प्रचार किया। कभी समाजवादी पार्टी की नीतियों पर ऊंगली नहीं उठाई। अब ममता बनर्जी की पार्टी की ओर इनका झुकाव है। इसीलिए पश्चिम बंगाल पहुंँच गए। ममता बनर्जी ने अमिताभ बच्चन को भारत रत्न देने की वकालत कर दी तो इन्होंने भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं है कह दिए।  यह देश तन से सिर जुदा के नारे को अभी भूला नहीं है। टुकड़े गैग को लगता है,चुनाव नजदीक है। देश में हवा बनाया जाना जरूरी है। इसलिए सेंसर बोर्ड के आड़ में ये सरकार को घेर कर यह बताने में लगे हैं,कि हमारे खिलाफ षडंयत्र किया जा रहा है। सियासी टेबल और सोशल मीडिया पर केसरिया बिकनी से बवाल मचा हुआ है। यूजर्स लिखते हैं, टुकड़े टुकड़े गैंग की समर्थक दीपिका पादुकोंण और कर भी क्या सकती है। भगवा रंग किस धर्म के लोगों का प्रतीक है,मुस्लिम भी जानते हैं। फिल्म का बायकॉट करने वालों का मानना है,कि भगवा जैसे पवित्र रंग का प्रयोग बिकिनी के लिए करना स्वीकार्य नहीं है।पठान फिल्म 25 जनवरी को रिलीज होगी। इससे पहले लाल सिंह चड्ढा,रक्षाबंधन और ब्रह्मास्त्र फिल्म का बायकॉट करने की भी मांग की गई थी।

Monday, December 12, 2022

देश में कौन सा माॅडल चलेगा चुनाव में







तीन राज्य। तीन चुनाव। तीन पार्टियाँ। तीन परिणाम। ऐसे में सवाल यह है,कि अगले चुनाव में कौन सा माॅडल चलेगा। गुजरात, दिल्ली या फिर हिमाचल का। गुजरात में मोदी मैजिक चला। मगर दिल्ली और हिमाचल में मोदी बेअसर रहे। हिमाचल प्रदेश में ‘हाथ’ ने कमल नोचे। आप ने दिल्ली में ‘कमल’ पर झाड़ू मार दिया। 

0 रमेश कुमार ‘रिपु’



तीन राज्यों में तीन तरह के चुनाव हुए। परिणाम भी तीन तरह के आए। गुजरात में मोदी मैजिक से कांग्रेस बाहर हो गई। और आप पांँच सीट पाकर राष्ट्रीय पार्टी बन गई। हिमाचल प्रदेश में बीजेपी की हार से राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी.नड्डा की प्रतिष्ठा धुमिल हुई। संभावना है, कि जनवरी के बाद अब ये अध्यक्ष नहीं रहेंगे। दिल्ली में एम.सी.डी.चुनाव में आप ने ‘कमल’ पर झाड़ू मार दिया। बीजेपी के भ्रष्ट पार्षदों का सियासी लाभ 'आप' को मिला। वहीं हिमाचल प्रदेश में आप के 68 प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गई। गुजरात में मोदी मैजिक चला। मगर दिल्ली और हिमाचल में मोदी बेअसर रहे। हिमाचल प्रदेश में ‘हाथ’ ने कमल नोचे। आप ने दिल्ली में ‘कमल’ पर झाड़ू मार दिया। जबकि दिल्ली के एमसीडी चुनाव में बीजेपी ने मोदी के पोस्टर बैनर का खूब इस्तेमाल किया था ।

गुजरात विधान सभा चुनाव में बीजेपी, कांग्रेस और आप तीनों ने रिकार्ड बनाया। आप ने कांग्रेस को बीस सीटों पर सीधे नुकसान पहुंँचाया। आप को 13 फीसदी और कांग्रेस को 28 फीसदी वोट मिले। आप के चुनावी समर में न होने पर उसे 41 फीसदी वोट मिलते। सन् 2017 केे चुनाव में कांग्रेस इतना ही वोट पाकर 77 सीट पाई थी। इस बार राहुल गांधी सिर्फ दो चुनावी सभा को संबोधित किया,जबकि 2017 के चुनाव में 30 रैलियांँ की थी। तब कांग्रेस को 77 सीटें मिली थी। मोदी पिछली दफा 34 रैली किये थे। तब 99 सीट बीेजेपी को मिली थी। इस बार 31 रैली और अहमदाबाद में सबसे लंबा 54 किलोमीटर का रोड शो किया। बीजेपी को 156 सीट मिली। वहीं आम आदमी पार्टी के सुप्रीमों केजरीवाल ने 19 रैली की। बीजेपी ने एंटीइन्कम्बेंसी को पलटने का भी रिकार्ड बनाया। चुनाव से 14 माह पहले मुख्यमंत्री सहित सूबे के 22 मंत्रियों को बदल दिया। टिकट वितरण में 182 में 103 नए चेहरो को टिकट दिया। पांँच मंत्री और 38 विधायको के टिकट काट दिये। जाहिर सी बात है,कि बीजेपी इस फार्मूले को मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में अपनाएगी। खबर है,कि बीजेपी राजस्थान में अपने 71 विधायकों में 40 विधायकों की टिकट काटेगी और करीब सौ नए उम्मीदवारों को टिकट देगी।

गुजरात विधान सभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को बीस सीटों पर मिले वोट से जाहिर हैं,कि अगली बार गुजरात में कांग्रेस नहीं,बल्कि आप ही बीजेपी की मुख्य प्रतिद्वंदी रहेगी। इस बार आप ने विपक्ष के वोट को रेवड़ी नीति की चाकू से काट दिया। जिन वोटरों पर कांग्रेस का दावा करती है,उनमें आप ने सेंध मारी। आदिवासी की 33 सीटों में आप को एक सीट,कांग्रेस को तीन और बीजेपी को 26 सीट मिली।  

आप ने जातीय राजनीति के पंडाल में सेंध लगाकर कांग्रेस को बाहर कर दिया। महुआ सीट में बीजेपी को 49 फीसदी,कांग्रेस को 29 और आप को 21 फीसदी वोट मिले। व्यारा सीट पर बीजेपी को 41 कांग्रेस को 27 और आप को भी 27 फीसदी वोट मिले। जाहिर सी बात है यदि आप चुनावी मैदान में न होती तो कांग्रेस जीत जाती। डांग सीट पर बीजेपी 47 कांग्रेस को 33 फीसदी और आप को 16 फीसदी वोट मिले। कपराड़ा सीट पर बीजेपी को 42 फीसदी वोट मिला। कांग्रेस को 27 और आप को 25 फीसदी वोट मिला। देखा जाए तो गुजरात चुनाव में कम सीट के बावजूद आप ने रिकार्ड बनाए। मसलन, चोरयासी, मंगरोल,भिलोडा,देवगढ़बोरिया,फतेहपुर,झालोद में आप दूसरे नम्बर पर हैं। कांग्रेस की 67 सीटों पर मोदी ने चुनाव प्रचार कर 54 सीटें जीत ली। पाटीदार 28 विधान सभा सीटों को प्रभावित करते हैं। पाटीदार वोटर बीजेपी पर ज्यादा भरोसा किया। इसलिए बीजेपी को 24,कांग्रेस और आप को दो-दो सीटें मिली। वहीं सौराष्ट्र में आम आदमी पार्टी की इंट्री कल को बीजेपी के लिए खतरा बन सकती है। वैसे बीजेपी में यहां 48 सीट में 39 सीट जीती है। जमजोधपुर में कांग्रेस को 15 हजार वोट मिले जबकि, आप को 71 हजार वोट मिले। गरियाधार में कांग्रेस को 15 हजार और आप को 60 हजार मत मिले। बोटाद में कांग्रेस को 19 हजार और आप को 80 हजार वोट। ये वोट बताते हैं कि कांग्रेस को अपनी जमीन बनाने में भारी मशक्कत करनी पड़ेगी।  

कांग्रेस ने गुजरात जीतने में दिलचस्पी नहीं दिखाई। जो प्रत्याशी जीते वो अपने कार्यकर्ता के दम पर जीते। यह माना जा रहा है राहुल गांधी का टारगेट लोकसभा चुनाव है। इसीलिए प्रियंका गांधी भी चुनाव प्रचार का हिस्सा नहीं बनी। यह कह सकते हैं,कि लोकसभा चुनाव से पहले एक और हार का अपयश राहुल नहीं लेना चाहते थे। सवाल यह है कि क्या 2023 में मध्यप्रदेश,राजस्थान,छत्तीसगढ़ और कर्नाटक के चुनाव में राहुल गांधी दूर रहेंगे? हिमाचल माॅडल के दम पर कांग्रेस इन राज्यों में चुनाव लड़ेगी? 

गुजरात में कांग्रेस ने किसी भी स्थानीय नेता को फ्रंट पर नहीं लाया। बीजेपी विकास और हिन्दूत्व के मुद्दे पर चुनाव लड़ी। अरविंद केजरीवाल रेवड़ी नीति पर चुनाव लड़े। बिजली बिल माफ, सरकारी अस्पतालों में मुफ्त इलाज और मुफ्त अच्छी शिक्षा आदि वायदों के दम पर कांग्रेस वोटर को दो फाड़ करने में कामयाब रहे। लेकिन गुजरात माॅडल के आगे दिल्ली माॅडल फेल हो गया। 

सवाल यह है कि तीन राज्यों के चुनाव परिणाम से क्या 2024 के ट्रेंड का अनुमान लगाया जा सकता है? वैसे संभावनाओं पर ही राजनीति चलती है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे कहते हैं, अब संपूर्ण विपक्ष को एक सियासी पंडाल के नीचे आ जाना चाहिए। हिमाचल और दिल्ली के चुनाव परिणाम से क्या यह मान लिया जाए कि मोदी का सियासी रेट गिरा है। चूंकि दीगर राज्यों में क्षत्रपों का राज्य है। बीजेपी की उनसे बनती नहीं है। उद्धव ठाकरे,नीतिश कुमार, अकाली दल, ममता बनर्जी, अखिलेश यादव,मायावती, केजरीवाल, नवीन पटनायक,हेमंत सोरेन और दक्षिण भारत के राज्य तेलंगाना में केसीआर, आंन्ध्र के वाय. एस. जगमोहन रेड्डी, तमिलनाडु के एम. के.स्टालिन आदि राज्यों के क्षत्रपों से बनती नहीं है। कर्नाटक की बोम्बई सरकार भ्रष्टाचार के लिए बदनाम है। ऐसे में 2024 का चुनाव बीजेपी के लिए टेढ़ी खीर हो सकती है। सवाल यह है कि 2022 का चुनाव जीतने वाली पार्टियों के सियासी माॅडल का ट्रेंड 2024 के चुनाव में भी दिखेगा क्या ? ऐसा होने पर त्रिशंकू संसद की आशंका ज्यादा है।

 

Sunday, November 27, 2022

सावरकर की चिट्ठी पर सियासी कोलाहल





''महाराष्ट्र में सावरकर का बड़ा सम्मान है। सावरकर की चिट्ठी के जरिये राहुल उनकी देश भक्ति पर सवाल यूंँ ही खड़े नहीं किये हैं। कई सियासी वजह है। वहीं उनके बयान पर भारत जोड़ो यात्रा में कोई बवाल होता,तो ठिकरा शिंदे की सरकार और बीजेपी पर फोड़ते। फिर गुजरात के चुनाव में उसे मुद्दा बनाया जाता।'' 

0 रमेश कुमार ‘रिपु’

एक व्यक्ति के दो चेहरे। उनका नाम है विनायक दामोदर सावरकर। बीजेपी के लिए वीर सावरकर राष्ट्र भक्त हैं। जबकि राहुल गांधी ऐसा नहीं मानते। वीर सावरकार को समझना है। जानना है। तो उन्हें दो हिस्सों में देखना होगा। अंडमान जाने के पहले के सावरकर और अंडमान से आने के बाद के सावरकर के बीच के अंतर को समझना होगा। कांग्रेस से जुड़े लोग अंडमान से पहले की पूरी अवधि की बात नहीं करते। उनके जेल जाने के बाद की गतिविधियों की बात करते हैं। वहीं बीजेपी उनके माफीनामा और उसके बाद की बातों को नजर अंदाज करके देखती है। कांग्रेस भी मानती है,जेल जाने से पहले वे क्रांतिकारी थे। जेल से आने के बाद उनका देश के प्रति और देश की आजादी के लिए आंदोलन करने वालों के प्रति दृष्टिकोंण बदल गया। वे ब्रितानी सरकार के समर्थक हो गए।

‘‘सावरकर के आलोचक मानते हैं कि सावरकर सन् 1937 में रिहा होने से लेकर सन् 1966 में अपनी मृत्यु तक महात्मा गांधी के खिलाफ माहौल बनाने के सिवा कुछ नहीं किया। उन्हें पचास साल काला पानी की सजा हुई। लेकिन दस साल ही रहे। 1923 में वे भारत हिन्दू राष्ट्र किताब लिख कर अंग्रेजों की मदद करने का मन बनाया। अंग्रेजों ने उन्हें हिन्दू महासभा को संगठित करने का अधिकार दे दिया। उनकी पेशन 60 रुपये महीना तय कर दी गई। सावरकर ने इंग्लैंड की रानी को लिखा था,कि आप हिंदुस्तान को नेपाल के राजा को दे दें। क्यों कि नेपाल का राजा सारी दुनिया के हिन्दुओं का राजा है। हिन्दू महासभा का सेशन नेपाल के राजा को सलामी देकर शुरू होता था और उनकी लम्बी आयु की कामना पर खत्म होता था।

सावरकर को लेकर कांग्रेस में आज भी कई तरह का संदेह है। क्यों कि सन् 1948 में मुंबई पुलिस ने सावरकर को गांधी जी की हत्या के षड्यंत्र में शामिल होने के शक में छह दिनों बाद गिरफ्तार कर ली थी। उन्हें फरवरी 1949 में बरी किया गया। गांधी जी हत्या की जांँच कर रही है कपूर कमीशन की रिपोर्ट में सावरकर को दोष मुक्त नहीं माना गया था। सरदार वल्लभ भाई पटेल ने महात्मा गाँधी की हत्या के बाद 27 फरवरी 1948 को पंडित नेहरू को लिखे खत में कहा था,सावरकर के अधीन हिंदू महासभा है। यह एक कट्टर शाखा है। जिसने ये साजिश रची और उसे अंजाम दिया। 18 जुलाई 1948 को श्यामा प्रसाद मुखर्जी को लिखे एक खत में गाँधी की हत्या के बारे में सरदार पटेल ने कहा था,कि उन्हें मिली जानकारी इस बात की पुष्टि करती है, कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और हिन्दू महासभा की गतिविधियों के परिणाम स्वरूप देश में एक ऐसा माहौल बना था,जिसमें ये भयानक त्रासदी संभव हुई। 

जाहिर सी बात है,इन्हीं सब तथ्यों की वजह से वीर सावरकर के प्रति कांग्रेस के नेताओं की धारणा हलग हटकर है। दूसरी ओर इंदिरा गांधी ने 1966 में सावरकर के निधन पर उन्हें क्रांतिकारी कही थीं,यह भी कहा कि सावरकर ने अपने कार्यों से देश को प्रेरित किया था।’ सावरकर ने सेल्यूलर जेल में मां भारती की स्तुती में छह हजार कविताएं जेल की दीवारों में लिखी। उन्होंने कविता कोयले और पत्थर से लिखा। लिखी कविता को कंठस्थ भी कर लिया था।

सावरकर को 1910 में नासिक के कलेक्टर की हत्या में शामिल होने के आरोप में लंदन में गिरफ्तारी के बाद काला पानी की सजा मिली। सावरकर ने अंडमान की सेल्यूलर जेल में सन् 1913 और 1920 के बीच दया याचिका दायर की थी। उसमें लिखा था,सरकार अगर कृपा और दया दिखाते हुए मुझे रिहा करती है,तो मैं संवैधानिक प्रगति और अंग्रेजी सरकार के प्रति वफादारी का कट्टर समर्थक रहूँगा,जो उस प्रगति के लिए पहली शर्त है। मैं सरकार की किसी भी हैसियत से सेवा करने के लिए तैयार हूँ,जैसा मेरा रूपांतरण ईमानदार है,मुझे आशा है कि मेरा भविष्य का आचरण भी वैसा ही होगा। मुझे जेल में रखकर कुछ हासिल नहीं होगा,बल्कि रिहा करने पर उससे कहीं ज्यादा हासिल होगा। सर मैं आपका नौकर बन कर रहना चाहता हूँ।

सावरकर पर आरोप है,कि रिहाई के बाद ब्रितानी सरकार हर महीने 60 रूपए की पेंशन देती थी, इसलिए वे ब्रितानी सरकार के काम काज को अच्छा बताते थे। स्वतंत्रता आंदोलन से खुद को दूर रखा। वहीं सावरकर के प्रशंसक कहते हैं,सावरकर ने दया याचिकाएं नहीं बल्कि,आत्म.समर्पण याचिकाएं दायर की थी। उन्हें पेशन नहीं, बल्कि नजरबंदी भत्ता दिया जाता था, गुजारे के लिए । जो कि डेढ़ साल बाद दिया गया। इसलिए कि उनकी एलएलबी की डिग्री मुंबई विश्वविद्यालय ने रद्द कर दी थी। उनकी वकालत पर प्रतिबंध लग गया था। अगर उन्होंने अंग्रेजों से समझौता किया होता तो वो अपनी संपत्ति वापस मांगते। 

कांग्रेस सावरकर के जरिये बीजेपी को घेरना चाहती है। क्यों कि बीजेपी और आरएसएस सावरकर को देशभक्त के रूप में प्रचारित बरसों से कर रही है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने यह कहकर विवाद को हवा दिया,कि सावरकर को साजिश के तहत बदनाम किया गया है। उन्होंने अंग्रेजों के सामने दया याचिकाएं महात्मा गाँधी के कहने पर दायर की थी। वीर सावरकर एलएलबी थे। बौद्धिक थे। वो गांधी के कहने पर दया याचिका लिखे होंगे,ऐसा नहीं लगता। सावरकर की राजनीति किसी पार्टी के लिए नफा नुकसान का मुद्दा हो सकता है। लेकिन देश हित में जायज नहीं है। 

चूंकि महाराष्ट्र में सावरकर का बड़ा सम्मान है। सावरकर की चिट्ठी के जरिये राहुल उनकी देश भक्ति पर सवाल यूंँ ही खड़े नहीं किये हैं। कई सियासी वजह हो सकती है। वहीं उनके बयान पर भारत जोड़ो यात्रा में कोई बवाल होता,तो ठिकरा शिंदे की सरकार और बीजेपी पर फोड़ते। फिर गुजरात के चुनाव में उसे मुद्दा बनाया जाता। वैसे एक वर्ग मानता है,भारत जोड़ो यात्रा से राहुल गांधी की छवि में बदलाव आया है। वे पहले से अधिक परिपक्व जान पड़ते हैं। लेकिन सावरकर के मामले में उनकी जानकारी अधूरी है। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे का बयान गलत नहीं है,राज्य के लोग हिंदुत्व विचारक के  अपमान को बर्दाश्त नहीं करेंगे। उद्धव ठाकरे ने भी कहा सावरकर के प्रति हमारे दिल में सम्मान है। यानी सावरकर पर विवाद कोई नहीं चाहता।

 

प्यार में धोखा,साजिश और खून आता कहांँ से है..!






'अभिभावकों से डरने वाला लड़का हो या फिर शर्मिली,नाजुक,भोली छवि वाली लड़की,अब कहीं गुम हो गई है। डर फिल्म के खलनायक की तरह समाज में प्रेमियों की संख्या बढ़ी है। प्यार,में धोखा,साजिश और खून के ऐसेे मामले समाज की नींव पर प्रहार है।'

0 रमेश कुमार ‘रिपु’
इक्कीसवी सदी में मुहब्बत की एक नई पीढ़ी का उदय हुआ है। जिसने संस्कार और मर्यादा की सारी हदें पार कर फिल्मी दुनिया को एक नई पटकथा दी। देश की राजधानी दिल्ली से लगे महरौली इलाके में आफताब ने लिव इन में रहने वाली श्रद्धा के 36 टुकड़े कर अपराध की दुनिया को चौका दिया। इसी तरह देहरादून में साॅफ्टवेयर इंजीनियर राजेश गुलाटी ने अपनी पत्नी अनुपमा गुलाटी की निमर्म तरीके से 72 टुकड़े किये थे। शव के टुकड़े डीप फ्रीजर में रखा। हर दिन एक टुकड़ा पाॅलीथीन में भरकर फेक आता था। इस हत्या में हाॅलीवुड फिल्म ‘साइलेंस आॅफ दी लैंड’ का भी रोल है। इस फिल्म का हीरो भी अपनी गर्ल फ्रेंड का बड़ी बेरहमी से हत्या करता है।

लखनऊ में सूफियान अपनी 19 वर्षीय प्रेमिका निधि गुप्ता पर धर्म बदलने का दबाव बनाया। उसके मना करने पर उसे चौथी मंजिल से नीचे फेक दिया। संगम विहार में रामवीर लिव इन रिलेशन में रह रही अपनी गर्ल फ्रेंड को लोहे के राड से पीट-पीट कर हत्या कर दिया। मध्यप्रदेश के एक रिसाॅर्ट में अभिजात पाटीदार ने अपनी 22 वर्षीय प्रेमिका की गला रेतकर हत्या कर दी। उक्त घटनाओं ने कई सवाल खड़े कर दिये हैं। आखिर प्यार में धोखा,साजिश और खून आता कहाँ से है? अपनी प्रेमिका या फिर पत्नी से प्यार करने वाले अचानक डर फिल्म के खलनायक शाहरूख खान कैसे बन जाते है? 

कन्नड़ फिल्मों की नायिका मारिया सुसैराज की दोस्ती सिनर्जी एकलैब्स में काम करने वाले नीरज ग्रोबर से हो गई। नौ सेना में काम करने वाले उसके पहले ब्वाॅय फ्रेंड जेरोम को यह दोस्ती नहीं भाई। उसने दोनों को एक साथ देख लिया। तकरार के बाद जेरोम ने छुरा भोंक कर ग्रोवर की हत्या कर दी। 

शहरी भारत में भावावेश में किये जाने वाले अपराध में तेजी ने समाज को झकझोर दिया है। सन् 1990 के बाद के दशक में तलाक की संख्या में बढ़ोतरी हुई तो 21वीं सदी में स्वच्छंदता और कामूकता मे भी इजाफा हुआ। इसके पीछे एक वजह यह भी है,कि तेजी से पंजाब, दिल्ली, गुजरात, महाराष्ट्र,छत्तीसगढ़,आन्ध्र प्रदेश आदि राज्यों में शहरीकरण अधिक हुआ। और प्रेमकरण और यौन संबंधी हत्याओं की सबसे बड़ी वजह बनें। 

उभरती माॅडल और अभिनेत्री राउरकेला की रहने वाली अभिनेत्री मून दास ने अविनाश पटनायक से रिश्ते खत्म कर लिए थे। इस अपमान को अविनाश बर्दाश्त नहीं कर सका। वह मुंबई गया। प्रेमिका की माँ,और उसके मामा की हत्या कर दिया। जब मून दास फ्लैट में उसे बंद करके भाग गई,तो वह स्वयं को गोली मार लिया। 

दरअसल सामाजिक ताना बाना बदल गया है। नये इंडिया में एक नई संस्कृति ओढ़ने वाली पीढ़ी की धड़कन देश सुन रहा है। जो अपनी भौतिक,पेशागत और यौन महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए परंपरागत बंधनों को तोड़ कर लिव इन मे रहने लगा है। इसे बुरा भी नहीं मानता? देह उनके लिए उत्सव है। तू राजी, मैं राजी,फिर क्या डैडी, क्या अम्मा का मामला है। अभिभावकों के विरोध और उनकी समझाइश का कोई असर नहीं। ज्यादा बोलने पर दो टूक जवाब,यह मेरी लाइफ है। मेरी मर्जी,इसे जैसा जीऊँ। आप कौन होते हैं,मुझे मना करने वाले।
 
अभिभावकों से डरने वाला लड़का हो या फिर शर्मिली,नाजुक,भोली छवि वाली लड़की अब कहीं गुम हो गई है। भेदभाव और दुर्व्यवहार  पर महिलाओं के पलटवार को अपनी बेइज्जती समझते हैं। श्रद्धा का विरोध आफताब बर्दाश्त नहीं कर सका और उसके 36 टुकड़े कर डाला। प्यार,में धोखा,साजिश और खून के ऐसेे मामले समाज की नींव पर प्रहार है। 

बाली उमर का बुखार लड़कियों को दिमाग से सोचने नहीं देता? सिर्फ दिल से सोचती हैं। जबकि लड़के दिमाग से सोचते हैं। यही वजह है,कि ज्यादातर जवाँं उमर की मुहब्बत की कहानी खून में भीगी होती हैं? परिपक्व उमर वालों की भी मुहब्बत में धोखा,साजिश और खून है। जैसा,कि मध्यप्रदेश का एक खूनी प्रेम त्रिकोंण, जिसने आरटीआई एक्टिविस्ट शहला मसूद की जान ले ली। दो बच्चों की मांँ जाहिदा परवेज ध्रुव  नारायण को दिल बैठी या कहें उनसे व्यावसायिक रिश्ते को दैहिक रिश्ते में बदल ली। और जब उसे लगा,कि ध्रुव नारायण से शहला मसूद भी प्यार की पींगे बढ़ा रही है। उसकी वजह से उसे न केवल प्यार बल्कि, व्यावसायिक नुकसान भी है,तो उसने पेशेवर हत्यारे के जरिये उसकी हत्या करा दी। लेकिन आफताब और श्रद्धा का मामला अलहदा है। यहांँ आफताब स्वयं प्रेमी है और अपनी प्रेमिका का हत्यारा भी है।

आफताब की क्रूरता से स्पष्ट है,कि श्रद्धा के प्रति आफताब में कोई श्रद्धा नहीं थी। उसकी लाश के 36 टुकड़े करने पर उफ तक नहीं किया। आफताब ‘डर’ फिल्म के खलनायक से भी अधिक खतरनाक किस्म का प्रेमी निकला। वहीं आफताब ने कई बार श्रद्धा के साथ मारपीट किया। फिर भी श्रद्धा का झुकाव उसके प्रति कम नहीं हुआ। अभिभावक कितना भी अपने बच्चों से नाराज हों,मगर दुश्मन नहीं है। यदि वो अपने घर वालों से बात करती,तो बच सकती थी। 

भारत की यौन क्रांति का यह भयावह चेहरा है। जहाँं जुनून में लोग अपना होशो हवाश खो रहे हैं। खाने पीने की चीजों की तरह अब यौन सुख का बाजारीकरण हो गया है। दाम्पत्य जीवन के मूल्य छिन्न भिन्न हो गए हैं। सामाजिक मान्यता और मर्यादा से जकड़े संबंधों के दिन अब लद गए। गर्ल फ्रेंड और ब्वाॅय फ्रेंड रखना स्टेट्स सिंबल बन गया है। बाद में नतीजा जो भी हो।

नई पीढ़ी को इससे कोई मतलब नहीं,कि कविता में भाषा क्या करती है। मुहब्बत में गालिब की आतिश के क्या मायने हैं। सास भी कभी बहू थी सीरियल में खलनायिका मदिरा एक रात के लिए मिहिर को संबंध के लिए ललचाती है। वहीं तुलसी और पार्वती मध्यम वर्ग को नैतिकता का पाठ पढ़ाती हैं। जबकि नई पीढ़ी की बहुएं और बेटियांँ परंपरागत पतिव्रता पत्नियां अब नहीं रही। अनुपमा,इमली,जैसे धारावाहिक में नैतिकता का चोला उतारने वाले पात्र सात फेरों की पवित्रता को दागदार कर रही हैं। टी.वी.और फिल्मों की नैतिकता से भारत भले न बदले,मगर उसका दृष्टकोंण बखूबी बदला है।

 

'आरक्षण की परखनली में विवादों का भ्रूण'' '





आर्थिक रूप से संपन्न लोगों को जब गैस सिलेडर पर सब्सिडी नहीं दी जा रही है,तो फिर आरक्षण क्यों दिया जा रहा है? इसे देश के विकास में बाधक कितने चुनाव के बाद माना जाएगा। सुप्रीम कोर्ट के फैसले से इंदिरा साहनी मामले में तय की गई आरक्षण की सीमा अब खत्म हो सकती है। उच्चतम न्यायालय क्रीमी लेयर का कोटा कम करता तो आरक्षण का लाभ औरों को भी मिलता।  

0 रमेश कुमार ‘रिपु’

सुप्रीेम कोर्ट ने आरक्षण मुद्दे पर जो फैसला सुनाया है,उससे सवालों के बैंक खुल गए। वैसे यह आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों के लिए रेवड़ी ही है। यानी मोदी सरकार की नये वोट बैंक की तलाश पूरी हो गई। अब आरक्षण का कोटा पचास फीसदी से बढ़कर साठ प्रतिशत हो गया। कायदे से सुप्रीम कोर्ट को क्रीमी लेयर को मिलने वाले आरक्षण कोटे को घटाकर दस फीसदी का लाभ आर्थिक रूप से पिछड़े लोगो को देना चाहिए था। इसलिए कि अब इन्हें आरक्षण की जरूरत नहीं है। यदि ऐसा नहीं किया गया,तो देश से आरक्षण कभी खत्म नहीं होगा और आने वाले समय मे आरक्षण का कोटा सौ फीसदी तक जा सकता है। जस्टिस बेला एम. त्रिवेदी ने अपने फैसले में जायज बात कहीं,‘‘आजादी के 75 साल के बाद हमें समाज के व्यापक हित में आरक्षण की व्यवस्था पर फिर से विचार करने की जरूरत है।’’

प्रमोशन में आरक्षण के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट ने अपनी कोई राय जाहिर नहीं किया है। यानी यह मोदी सरकार के पाले में है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले से यह न सोचें, कि यह आरक्षण केवल सवर्ण के लिए है। इसलिए कि कई राज्यों में जो जाति ओबीसी में है,वही दूसरे राज्य में सवर्ण है। जैसे बघेल जाति मध्यप्रदेश में सवर्ण है,लेकिन छत्तीसगढ़ राज्य में ओबीसी। यानी आर्थिक रूप से पिछड़ी जाति में मुस्लिम,ईसाई आदि कई जातियाँ आएंगी। मुस्लिमों के आर्थिक रूप से पिछड़े होने की कई रिपोर्ट है,जो उनके आरक्षण का आधार बन सकती है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले से अब आर्थिक रूप से पिछड़ापन आरक्षण का आधार बन गया। अभी तक सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ों के लिए आरक्षण की व्यवस्था थी। मोदी कहते हैं,सबका साथ,सबका विकास,यानी सबको रेवड़ी दो। ताकि सत्ता का प्याला हाथ से न छिटके। बीजेपी को उम्मीद है,कि हिमाचल और गुजरात चुनाव में आरक्षण के इस फैसले से लाभ मिलेगा। वहीं विपक्ष का कहना है, कि मोदी सरकार वाकई में दस फीसदी का लाभ जरूरत मदों को देना ही चाहती है,तो उससे पहले जातिगत जनगणना जरूरी था। इससे नागरिकों की आर्थिक और सामाजिक स्थिति का पता चलता। उन लोगों की पहचान हो जाती,जिन्हें वाकई में लाभ मिलना चाहिए। इस फैसले से ऐसा नहीं लगता, कि मोदी सरकार बहुत गंभीर थी दस फीसदी के आरक्षण को लेकर। यदि ऐसा होता तो वह रोहिणी आयोग की उन बातों को भी तरजीह देती,जिसमें बताया गया था,ओबीसी को मिलने वाले आरक्षण के तहत नब्बे फीसदी से ज्यादा नौकरियांँ इस समूह की 25 फीसदी जातियों को ही मिलती है। आयोग के मुताबिक 983 ऐसी उप जातियाँ हैं,जिन्हें आज तक नौकरी नहीं मिली। इस मामले पर सरकार को विचार करना चाहिए। वैसे सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से मोदी सरकार की नीतिगत फैसले और विचारधारा को मजबूती मिली।

अब राज्य सरकारें अपने राज्य में आरक्षण मनमाने तरीके से बढ़ाएंगे। इससे आर्थिक और कानूनी आराजकता बढ़ने की आशंका है। क्यों कि पचास फीसदी आरक्षण की सीमा रेखा पहले भी कई राज्यों में खत्म हो गई है। महाराष्ट्र में 64,हरियाणा में 60,बिहार 60,तेलंगाना 50 फीसदी से अधिक,गुजरात 50,10 फीसदी ईडब्लयूएस कोटा शामिल,राजस्थान 64, तमिलनाडु 69,झारखंड 50, और मध्यप्रदेश 73 फीसदी। जिन राज्यों में आरक्षण पचास फीसदी से ज्यादा है,वहाँ जातीय विभाजन होगा। समानता के अधिकार का नियम आरक्षण का अधिकार बन जाएगा। यह विकास की राह में रोड़ा बनेगा। तमिलनाडु में सन् 1993 के आरक्षण अधिनियम के अनुसार शिक्षा संस्थानों में प्रवेश और नौकरियों में 69 फीसदी आरक्षण दिया जाता है । वहीं जनवरी 2000 में आन्ध्र प्रदेश के राज्यपाल ने अनुसूचित क्षेत्र में स्कूली शिक्षकों की भर्ती के लिए अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवारों को सौ फीसदी  आरक्षण देने का फैसला किया था। जिसे अदालत ने असंवैधानिक कहा था। छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश ने आरक्षण की सीमाएं तोड़ दी है। 

छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री ओबीसी से आते हैं। छत्तीसगढ़ में कुल आरक्षण की सीमा 82 फीसदी हो गया है। यानी यहांँ ओपन वर्ग वाले सिर्फ 18 फीसदी लोग ही शिक्षा संस्थानों में प्रवेश पा सकते हैं। और सरकारी नौकरियों में जा सकते हैं। हालांकि बिलासपुर हाईकोर्ट ने इसे असंवैधानिक माना है। मध्यप्रदेश में दस फीसदी कोटा शामिल है,कुल 73 फीसदी आरक्षण होने पर जबलपुर हाई कोर्ट ने इस पर रोक लगा दी है। राजस्थान सरकार ने पांँच फीसदी गुर्जरों को आरक्षण देना चाहती है,लेकिन हाई कोर्ट ने रोक लगा दी है। महाराष्ट्र में मराठाओं को आरक्षण देने की बात उठी। यानी देश में आरक्षण की सीमाएं धीरे-धीरे राज्य सरकारें बढ़ा रही हैं। एक दिन सौ फीसदी हो जाएगा। संघ प्रमुख मोहन भागवत गलत नहीं कहते हैं,आरक्षण पर पुर्नविचार किया जाना चाहिए। 

सवाल यह है कि आर्थिक रूप से संपन्न लोगों को जब गैस सिलेडर पर सब्सिडी नहीं दी जा रही है,तो फिर आरक्षण क्यों दिया जा रहा है? इसे देश के विकास में बाधक कितने चुनाव के बाद माना जाएगा। दरअसल राजनीति से जाति कभी जायेेगी नहीं। आरक्षण के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद सवालों के बैंक बंद नहीं हुए। आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को दस फीसदी आरक्षण देेने सेे सरकार की नये वोट बैक की तलाश पूरी हो गई। लेकिन इस फैसले से इंदिरा साहनी मामले में तय की गई आरक्षण की सीमा रेखा मिट जाएगी। उच्चतम न्यायालय क्रीमी लेयर का कोटा कम करता तो आरक्षण का लाभ औरों को भी मिलता। 

सुप्रीम कोर्ट का आरक्षण पर जो नया फैसला आया है,उससे नया विवाद आकार ले लिया है। सरकार इनकम टैक्स में ढाई लाख की छूट देती है। लेकिन आरक्षण के लिए आठ लाख रुपये आय की सीमा तय किया है। जो कि ज्यादा है। इस दायरे में देश की नब्बे फीसदी आबादी आ जाएगी। आर्थिक मापदंड पर सवाल उठ रहे हैं। वहीं अभी तक दी जा रही है आरक्षण की व्यवस्था में ओबीसी 27 फीसदी,एससी 15 और एस.टी. 7.5 फीसदी है। और दस फीसदी ईडब्लयूएस के लोगों को आरक्षण मिला है। राज्य में हर सरकार ओबीसी का कोटा बढ़ाने की बात कर रही है। बीजेपी का सबसे बड़ा वोट बैंक ओबीसी है। जाहिर सी बात है,ओबीसी का कोटा बढ़ाए जाने पर दस फीसदी वाले इसका विरोध करेंगे और वो भी चाहेंगे कि उनका भी कोटा बढ़ाया जाए।

दरअसल राजनीति से जाति जा नहीं रही है। इसीलिए पंचायत चुनाव,नगर निगम चुनाव,विधान सभा और लोकसभा चुनाव में भी जाति के आधार पर सीटें तय की गई हैं। यानी जिस देश में संसद ही आरक्षित हो,वहांँ जातिगत आरक्षण को खत्म कर आर्थिक आरक्षण की बात होगी,सोचना भी बेमानी है।