Wednesday, September 9, 2020

गोठान बना गायों की कब्रगाह

       
 








भूपेश सरकार गोठानों के जरिये गोधन योजना को आर्थिक संबल में तब्दील करने का दावा करती है। जबकि गोबर खरीदने की प्रक्रिया सतत नहीं है। 30 जून से रोका छेकी योजना बंद कर दी गई। ऐसे में गोठान का कोई औचित्य नहीं। वहीं एक गोठान में 50 गायों की मौत ने सरकार के गोठान की पोल खोल दी है। क्या सरकार ऐसे ही गोठान के दम पर ग्रामीण अर्थव्यस्था को मजबूत करेगी?  
0 रमेश तिवारी ‘‘रिपु’’
                     छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल 20 जुलाई की सुबह नौ बजे दुर्ग जिले के नवागांव से आए चार चरवाहों से 48 किलो गोबर अपने सरकारी प्रांगण में खरीद कर, उन्हें 96 रूपये का भुगतान कर दिया। उस गोबर को मुख्यमंत्री ने जय छत्तीसगढ़ महिला स्वयं सहायता समूह को दे दिया। जिसका उपयोग वर्मी कंपोस्ट बनाने में किया जाएगा। दरअसल, ऐसा इसलिए किया गया ताकि, देश को भी पता चले कि मुख्यमंत्री गोधन न्याय योजना के प्रति सजग हैं। वे मुख्यमंत्री निवास में भी गोबर लाने वालों से गोबर खरीदते हैं। गोधन न्याय योजना की शुरूआत सरकार ने बड़े जोर शोर से की। चार लाख किलो गोबर खरीदने के बाद सरकार चुप हो गई। कई दिनों तक गोबर खरीदी की योजना ठप रही। पशु पालकों के शोर मचाने पर सरकार फिर गोबर खरीदने लगी है। कांग्रेस सरकार दावा कर रही है कि, हर पंचायत में गोठान बनाएं जाएंगे। प्रथम चरण में 2400 से ज्यादा पंचायतों में गोठान और 15 एकड़ में चारागाह बनाए गये हैं। पशु किसी का भी हो, गोबर पर चरवाहे का हक होगा। छत्तीसगढ़ में 11630 ग्राम पंचायतें हैं। गोवंश से प्राप्त गोबर को गोठान समितियों में बेचा जाएगा। चरवाहा खुद गोबर लाकर बेचता है, तो उसे दो रूपये प्रति किलो के हिसाब से भुगतान होगा। 
योजना को वाट लग गई
मुख्यमंत्री भूपेश बघेल कहते हैं,‘‘राजीव गांधी किसान न्याय योजना के तहत किसानों को समर्थन मूूल्य की राशि दी गई और गोधन न्याय योजना,उसी दिशा में उठाया गया कदम हैं। इन निर्णयों से गांवों की अर्थव्यवस्था को ताकत मिलेगी। किसानों के साथ कांग्रेस सरकार सच्चा न्याय कर रही है। किसान उनकी प्राथमिकता में पहले नम्बर पर हैं’’। लेकिन एक सच यह भी है कि,राजनांदगांव जिले में किसानों को सोयाबीन के जो बीज दिए गए, वो अंकुरित नहीं हुए। भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष विष्णुदेव साय ने कहा कि मवेशियों की मौत से यह स्पष्ट हो चला है कि नरवा.गरुवा.घुरवा.बारी का नारा देने और गौधन न्याय योजना का ढोल पीटने वाली प्रदेश की नाकारा कांग्रेस सरकार गौठानों की कोई पुख्ता इंतजाम तक नहीं कर पा रही है। और जिन पर गौठानों के संचालन का जिम्मा थोप दिया गया है, वे भी कुछ कर पाने में खुद को असहाय हैं। गौधन की मौतों का यह सिलसिला प्रदेश सरकार के लिए काफी महंगा पड़ेगा। गौठान बने नहीं हैं जो बने हैं उनमें चारा.पानी तक का कोई इंतजाम नहीं है। गौठानों की बदइंतजामी.बदहाली का जमीनी सच से यह प्रदेश रू.ब.रू हो चुका है और मेड़पार बाजार की यह घटना प्रदेश सरकार के नाकारेपन की इंतिहा दर्शाने वाली है। बीजेपी के प्रवक्ता सच्चिदानंद उपासने कहते हैं,गोबर खरीदने का पैसा सरकार के पास है नहीं,पंचायत और मनरेगा के पैसे से चार दिन गोबर खरीदेंगे, उसके बाद गोधन की बात करना बंद कर देंगे। मै समझता हूं गोठान और गोबर खरीदी की योजना कांग्रेस शासन का सबसे बड़ा घोटाला होगा। ग्राम मेड़पार बाजार के जर्जर गोठान में 50 से ज्यादा गायों की दम घुटने से मौत हो गई। सवाल यह है कि क्या ऐसा ही, गोठान हर जगह बने हैं। कांग्रेस का गोठान गायों की मौत का स्मारक बन गया है’’।
गोठान बना मौत का कब्रगाह
तखतपुर विधानसभा के हिर्री थाना अंतर्गत ग्राम मेड़पार बाजार में 50 से ज्यादा गायों की दम घुटने से मौत हो गई। गौठान को पुराने जर्जर भवन में पंचायत की ओर से अस्थाई रूप से बनाया गया है। वहीं बने एक कमरे में गंदगी के बीच गायों को बंद कर रखा गया था। बदबू फैली, तो 26 जुलाई की सुबह ग्रामीणों को इसका पता चलने के बाद हंगामा शुरू हो गया है। विपक्ष इसे गोहत्या कह रहा है,वहीं सत्ता पक्ष लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की बात कह रहा है। गोठान में केवल गाय मरी हैं,यह कहना पर्याप्त नहीं हे। सच तो यह है कि सरकारी योजनाओं के साथ मानवीय संवदेनाएं भी मरी हैं। सवाल यह भी है कि, ग्राम पंचायत मेड़पार के जिस सचिव सरपंच और जनपद सदस्य के खिलाफ लापरवाही का प्रकरण कायम किया गया है। उन्हें क्या योजना के संबंध में कोई प्रशिक्षण दिया गया था? यदि नहीं,तो यह अफसरशाही की गलती है।
पंचायत के लोगों को पता नहीं
’’गाय की आत्म कथा’’ के लेखक गिरीश पंकज कहते है,‘‘पंचायत के लोगों को शायद ये भान नहीं था कि छोटे से हाल में इतने सारे पशुओं को रखने से, उनके गोबर और मूत्र से अमोनिया गैस निकलेगी। बंद कमरे में आक्सीजन की कमी होगी। जिससे मवेशियों का दम घुट सकता है। सरकारी योजनाओं का दम इसी तरह घुटता है। सरकार बड़े जोर,शोर से कोई योजना लाती है, किन्तु उसे क्रियान्वित करने वाली सरकारी मशीनरी को इस बारे में ना तो कोई प्रशिक्षण दिया जाता है, ना ही संवदेनशील किया जाता है। सरकार के आदेश को सिर आंखों पर रखने वाली सरकारी मशीनरी एजेंसी किस तरह काम करती है,यह मेड़पार की घटना से साफ हो गया’’।
सरकार की सफाई
राज्य शासन ने एक बयान जारी कर बताया कि, मेड़पार गांव में पशुओं की मौत की खबर का, रोका छेका अभियान से कोई संबंध नहीं है। राज्य में रोका छेका अभियान 30 जून को समाप्त हो गया है। रोका छेका अभियान के तहत जानवरों से फसलों को बचाने के लिए,उन्हें खुले वातावरण में गौठान में रखे जाने के निर्देश दिए गए थे। इस घटना में स्थानीय व्यक्तियों ने पशुओं को एक भवन में बंद कर के रख दिया। यह ग्राम पंचायत द्वारा निर्मित गोठान नहीं था। यह व्यवस्था गोठान की मूल परिकल्पना के  विपरीत है। सवाल यह है कि, फसलों को आवारा पशुओं से बचाने और सड़कों पर होनी वाली दुर्घटनाओं को रोकने रोका छेका अभियान अचानक बंद क्यों कर दिया गया? यदि बंद कर दिया गया है, तो गोठान का क्या औचित्य?इसका जवाब सरकार अभी तक नहीं दी है।
हवा हवाई है योजनाएं
सरकार का दावा है कि, प्रदेश में प्रथम चरण में 2800 गोठान बनने हैं, जिसमें 2240 गोठान बन गये हैं। गोबर एकत्र होने के बाद गोठान समितियां इसे नगरीय निकायों को भेजेंगी, जो इसको वर्मी कंपोस्ट, गार्डन पावडर गोबर दीया,गोबर धूपबत्ती आदि बनाया जाएगा। रोका छेकी योजना 30 जून से सरकार ने बंद कर दिया है,ऐसी स्थिति में पांच हजार गोठान किस मकसद के लिए बनाए जायेंगे? गोठान में कौन से मवेशी रखे जाएंगे? गोठान में मवेशी होंने पर ही, स्वसहायता समूह उनसे गोबर लेगी और खाद बनाएगी। क्या यह मान लिया जाए कि सरकार की योजनाएं केवल फाइलों में संचालित होंगी? रोका,छेका योजना के बाद, गोधन न्याय योजना की शुरुआत हरेली के दिन बड़ी धूमधाम से की गई। सरकार ने अपनी इस योजना को नरवा, गरवा, घुरवा, बाड़ी के साथ जोड़ते हुए, उम्मीद जाहिर की कि, इसमें सभी का सहयोग मिलेगा। सवाल यह है कि, जब पशुओं को लाभकारी व्यवसाय के साथ जोड़ा गया है, तो फिर अवारा पशुओं को क्यों घूमने दिया जा रहा है? इससे इंकार नहीं है कि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की महत्वाकांक्षी गोधन न्याय योजना, ग्रामीण अर्थव्यस्था को मजबूत कर सकती है। लेकिन यह दुर्भाग्य है कि, सरकार योजना बना लेती है लेकिन,उसके क्रियान्वन की अच्छी प्रक्रिया को अंजाम नहीं दे पा रही है।  
गोवंश की हत्या हुई है
जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ के प्रदेशाध्यक्ष अमित जोगी ने मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को ट्वीट कर कहा कि गोबर बेचने की उत्सुकता में अपने सिर गौहत्या का पाप न लें। बारिश में गोबर ज्यादा इकट्ठा करने की कोशिश में गोवंश को बगल के खुले स्थान पर न रखकर बंद कमरे में ठूंस कर रखा गया। घुटन से 55 गोवंश की मौत हो गई। मृत गायों में तकरीबन 10 गाय गर्भवती थीं। सभी गोवंश निजी और पालतू थे। बहरहाल यह गोधन न्याय योजना और मुख्यमंत्री का ड्रीम प्रोजेक्ट गोठान कितना लाभदायी है, यह तो दूसरे चरण से पता चलेगा। प्रथम चरण ने इसकी सफलता पर कई संदेह पैदा कर दिये हैं।
 
 

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