केन्द्र की योजनाओं में खामियाँ बताकर प्रदेश में लागू नहीं करने के लिए भूपेश सरकार केन्द्र से भिड़ने के लिए हमेशा आस्तीन चढ़ाए रखने की सियासत को तरजीह देती आई है। जबकि केन्द्र सरकार टकराव के मूड में नहीं है। यही वजह है कि केन्द्र सरकार ने कई बार छत्तीसगढ़ सरकार को पुरस्कार से नवाजा भी।
0 रमेश कुमार ‘‘रिपु’’
छत्तीसगढ़ में भारी बहुमत की कांग्रेस सरकार होने की वजह से केन्द्र की ज्यादातर योजनाएं और नीतियों की खिलाफत भूपेश सरकार करते आई है। ऐसा करने के पीछे एक मात्र मकसद सुर्खियो ंमें रहना और जनता को यह बताना कि केन्द्र की योजनाएं प्रदेशवासियों के हित में नहीं है। जबकि केन्द्र सरकार ने भूपेश सरकार को कई बार पुरस्कारों से नवाजा भी है। हमेशा आस्तीन चढ़ाने की सियासत करने वाले मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने केंद्र सरकार के नए कृषि श्रम और उपभोक्ता कानूनों को छत्तीसगढ़ में लागू करने से इंकार कर दिया है। केंद्रीय कानूनों को रोकने के लिए राज्य सरकार नया कानून बनाएगी। कृषि मंत्री रविंद्र चैबे की अध्यक्षता में 13 अक्टूबर को हुई मंत्रिमंडलीय की बैठक में फैसला लिया कि राज्य के हितों की रक्षा के लिए संविधान के दायरे में रहकर विधि सम्मत कानून बनाया जाएगा। इसके लिए विधान सभा का विशेष सत्र भी बुलाया गया। मुख्य मंत्री भूपेश बघेल ने कहा,केंद्र के कानून से पूंजीपति ही कृषि उपज के मूल्यों को नियंत्रित करेंगे।’’
समर्थन मूल्य पर किसानों से धान खरीदी मामले में भी भूपेश सरकार तनातनी में थी। वह प्रति क्विंटल धान 2500 रूपये में खरीदने की बात अपने घोंषणा पत्र में कांग्रेस कही थी। केन्द्र सरकार ने कहा 1865 रूपये की दर से धान लेगी। भूपेश सरकार ने राजीव गांधी किसान न्याय योजना के माध्यम से किसानों को अंतर राशि दी। अब तक किसानों के खाते में 4500 करोड़ रुपए अंतर की राशि पहुंच चुकी है।
बरदाने पर विवाद
धान खरीदी में बरदाने के मामले को लेकर केन्द और राज्य सरकार आमने सामने हैं। कृषि मंत्री रविन्द्र चैबे ने कहा,चालू खरीफ वर्ष में राज्य में 20 लाख से अधिक किसानों से प्रति एकड़ 15 किवंटल धान की खरीदी करने 4 लाख 75 हजार गठान बोरा की आवश्यकता है। जिसकी पूर्ति के लिए राज्य सरकार ने 3 लाख 50 हजार गठान जुट कमिश्नर कोलकाता से मांगे थे। शेष 1 लाख 25 हजार गठान पुराना बोरा मिलर्स एवं पीडीएस का उपयोग करने की योजना बनाई गई। लेकिन केन्द्र सरकार ने गठानों की संख्या में कटौती कर 1 लाख 43 हजार गठान बोरा देने का आदेश 9 अक्टूबर 2020 को जारी किया है। यह छत्तीसगढ़ के किसानों के साथ अन्याय है।’’
धान खरीदी मामले में भी प्रदेश सरकार के आरोप छजका के प्रदेश अध्यक्ष अमित जोगी ने कहा,एक तरफ मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल जी बिहार जाकर धान की लुआई हो जाने की बात स्वीकार करते हैं। जबकि प्रदेश में एक दिसंबर से धान खरीदा जाएगा। केन्ंद्र सरकार केंद्र कितना और किन शर्तों में धान खरीदेगा, निर्धारित नहीं हुआ है। हफ्ते में दो बार में दो हजार करोड़ रूपये कर्ज लेने वाली सरकार के पास किसानों से धान खरीदने के लिए फूटी कौड़ी नहंी है। कांग्रेस सरकार को 15 नवम्बर से ही किसानों की धान खरीदी करनी चाहिए ताकि किसान दिवाला नहीं दिवाली माना सके।
प्रदेश भाजपा अध्यक्ष विष्णु देव साय ने कहा कि कृषि मंत्री झूठ बोल रहे हैं। कांग्रेस शासित पंजाब में बारदाने की कोई शिकायत नहीं है। वहां रिकार्ड खरीदी हो रही है। राज्य की राशन दुकानों से अब तक सवा दो करोड़ बारदाने वापस नहीं बुलाए गए हैं। राज्य सरकार नहीं चाहती कि किसानों का पूरा धान खरीदा जाए। इसलिए बहाना बना रही है।
कृषि नीति के खिलाफ प्रदर्शन
मोदी सरकार के कृषि विरोधी कानूनों के खिलाफ प्रदेश में छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के बैनर तले 25 से ज्यादा संगठन एकजुट होकर प्रदेश भर में केन्द्र की कृषिनीति को किसान विरोधी बताया। छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के संयोजक आलोक शुक्ला और छत्तीसगढ़ किसान सभा के प्रदेश अध्यक्ष संजय पराते ने कहा, समर्थन मूल्य पर सरकार यदि धान नहीं खरीदेगी, तो कालांतर में गरीबों को एक और दो रुपये की दर से चावल,गेहूं नहीं मिलेगा। सार्वजनिक वितरण प्रणाली पंगु हो जाएगी। इन कानूनों का असर सहकारिता के क्षेत्र की बर्बादी के रूप में भी नजर आएगा।
नई कृषि नीति किसानों की फसल को मंडियों से बाहर समर्थन मूल्य से कम कीमत पर खरीदने व्यापार करने वाली कंपनियों व्यापारियों और उनके दलालों को छूट देती है। किसानों को विवाद की स्थिति में कोर्ट जाने के अधिकार पर रोक लगाती है। किसान नेताओं ने कहा कि कॉर्पोरेट गुलामी की ओर धकेलने वाले इन कृषि विरोधी कानूनों के खिलाफ देश के किसान तब तक संघर्ष करेंगे, जब तक इन्हें बदला नहीं जाता।’’
पीएम आवास योजना में रूचि नहीं
छत्तीसगढ़ सरकार केन्द्र की प्रधान मंत्री आवास योजना में भी कोई रूचि नहीं दिखा रही है। यही वजह है कि केन्द्र सरकार ने प्रदेश को राशि मुहैया नहीं कराई। प्रदेश सरकार ने 2018-19 और 2019-20 में प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत अपने हिस्से की राशि नहीं दी है। यह राशि 1554 करोड़ रुपए है। पूर्व मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह ने भूपेश बघेल को पत्र लिखकर कहा कि कांग्रेस सरकार आते ही प्रधानमंत्री आवास योजना को ग्रहण लग गया है। राज्य के हिस्से की राशि जल्द से जल्द प्रदेश सरकार जारी करे और बजट में इसका प्रावधान करें ताकि गरीबों को प्रधान मंत्री आवास मिल सके।
जल मिशन योजना का टेंडर रद्द
केन्द्र सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों को शुद्ध जल मुहैया कराने जल मिशन योजना शुरू की। बस्तर इलाके में अब भी लोग लाल पानी पीने को विवश हैं। राजनांदगांव जिले के कई गांँवों में आर्सेनिक जल है। केंद्र सरकार की मंशा है कि जल जीवन मिशन योजना के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्र के हर तबके को पेयजल मिले। हर घर में नल लग सके। लेकिन भूपेश सरकार ने इसमें भ्रष्टाचार हो रहा है कहकर जल मिशन के टेंडर को रद्द कर दिया। 13 हजार करोड़ रूपये के जल मिशन के टेंडर को रद्द किये जाने पर पीएचई ने हाई कोर्ट में कैविएट लगाकर इसका दोबारा टेंडर करने की तैयारी कर ली है। आरपी मंडल सीएस और अध्यक्ष जांच कमेटी का कहना है कि राज्य सरकार ने ठेके रद्द कर दिए हैं और मुख्यमंत्री के निर्देश पर इनकी जांच चल रही है। उससे पहले ठेके नहीं हो सकते हैं। मामले की पूरी जानकारी ली जा रही है।
हिस्से की लड़ाई हैः रमन
भूपेश सरकार का आरोप है कि इस योजना के तहत करीब 6 हजार करोड़ रुपए का ठेका राज्य की बाहर की कंपनियों को मैदानी इलाकों में दिया गया और छत्तीसगढ़ के स्थानीय ठेकेदारों को बस्तर और नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में छोटे मोटे ठेके दिए गए हैं। गौरतलब है कि रीटेंडर उस समय किया जा रहा है जब 7 हजार करोड़ रुपए के विवादित टेंडरों की जांच मुख्य सचिव की कमेटी जांच कर रही है। जांच के आदेश मुख्यमंत्री ने दिये हैं,बगैर रिपोर्ट आए टेंडर रद्द करना अनुचित है। पूर्व मुख्यमंत्री डाॅ रमन सिंह कहते हैं, केन्द्र सरकार से मिली राशि 7 हजार करोड़ रूपये की बंदरबांट में लगी प्रदेश सरकार में हर कोई अपने हिस्से के लिए लड़ रहा है। इस योजना से प्रदेश के युवाओं को रोजगार भी मिलता। प्रदेश के बाहर की लगभग 44 कंपनियों को काम दिया जाना, इस बात का प्रमाण है कि प्रदेश सरकार कमीशनखोरी और बाहरी लोगों को लाभ पहुँचाने की सौदेबाजी कर रही है। इस पूरे मामले में कहीं कोई पारदर्शिता नहीं बरती गई।
बहरहाल जल मिशन में भ्रष्टाचार हुआ है या नहीं यह तो रिपोर्ट आने पर ही पता चलेगा। इस बीच केंद्र सरकार इस मामले में शिकायतों की जाँंच के लिए दिल्ली से उच्चस्तरीय टीम भेजने की चिट्ठी राज्य शासन को दी गई है। माना जा रहा है कि इस टेंडर में कुछ शर्तें ऐसी जोड़ी गई हैं,टेंडर में वही ठेकेदार या फर्म शामिल हो सकेंगी, जो इसके पहले 10 करोड़ रुपए तक का काम कर चुकी हों। इससे पहले जाँच रिपोर्ट क्या आती है,उस पर सबकी नजर है।










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