Friday, December 18, 2020

सलीके से उठाए सवाल

          





समकालीन व्यंग्य के  एक  महत्वपूर्ण हस्ताक्षर  गिरीश पंकज अपने नए व्यंग्य संग्रह राजनीति का आईपीएल‘‘ के जरिये बड़े सलीके से सवाल उठाते हैं। उनके व्यंग्य के किरदार या फिर विषय समाज के अक्स हैं। इस  संग्रह में  छत्तीस व्यंग्य रचनाएं हैं। इनका हर व्यंग्य समाज के अंतर्विरोधों की बानगी है। यही वजह है कि वह सीधे दिमाग पर छा जाता है। कई सारे व्यंग्य कथानक शैली में होने की वजह सेए ऐसा लगता है कि कोई कहानी है। इनके व्यंग्य की खासियत यह है कि बोलचाल की भाषा में है। इसलिए पढ़ते वक्त पाठक को लगता है कि वो स्वयं एक किरदार है। यह लेखक की अपनी खूबी और शैली है। बोलचाल की भाषा में व्यंग्य के संस्कार हर आदमी में देखा गया है। और उसे पकड़ने की कला में माहिर हैंए गिरीश पंकज। जैसा कि संग्रह का पहला व्यंग्य ष्ष्कूकुर वाली माॅर्डन फेमिली। कुत्ते पालना आजकल फैशन है। स्टेटस सिंबल है। एक कुत्ते का नाम राॅकी दूसरे का डाॅगी। अपने को माॅर्डन बताने के लिए लोग अंग्रेजी प्रेमी होते जा रहे हैं। विदेशी नस्ल के कुत्तों को पालनेएघुमाने और उसके साथ घूमने वाली महिलाएं और माॅर्डन लड़कियों के चोचले पर लेखक ने करारा तंज कसा है। यह व्यंग्य सलीके से सवाल छोडता है कि कुकुर घुमाने के बहाने अंग प्रदर्शन करना ही क्या माॅर्डन होने की निशानी है। आधुनिकता के नाम पर पतन की बारीक रेखा तक भी व्यंग्यकार की दृष्टि जाती है।
उपवास का लजीज मीनूष् शीर्षक का व्यंग्य जनता के हितों के बहाने भूख हड़ताल पर बैठने वाले नेताओं का कच्चा चिट्ठा है। भूख हड़ताल पर बैठने वाले नेता अपनी भूख शांत करने के तरीके किस तरह निकाल लेते हैंए वह बताया गया है। यहांँ भी एक सवाल है किए जब नेताओं को अपनी भूख की चिंता पहले हैए तो वो भूख हड़ताल पर बैठने का नाटक क्यों करते हैं।बहुत बड्डे समाज सेवी रचना में व्यंग्यकार ने बताया कि समाज सेवा का नशा के नाम पर लोग क्या.क्या करते हैं। ऐसे समाज सेवी होते कौन हैं। शराब बेचने वाले सच्चे समाज सेवी, खुद को कहते हैं। और वो भी इन्हें सच्चे समाज सेवी बताते हैंए जिन्हें ये चंदा देते हैं। समाज में यत्र.तत्र. सर्वत्र फैले दोगले चरित्र को रेखांकित करती है यह रचना।
किताब का नाम राजनीति का आईपीएल है। जाहिर है कि ज्यादातर व्यंग्य रचना राजनीति से जुड़ी हुई हैं। राजनीतिक व्यक्तियों की छोटी.छोटी हरकतों को व्यंग्य रचना का विषय बनाया गया है। राजनीतिक जीवन में इतनी विसंगतियां पसरी हैं कि कोई भी व्यंग्यकार राजनीति पर व्यंग्य किए बगैर रह नहीं सकता। फिर चाहे परसाई हों या शरद जोशी। राजनीति पर व्यंग्य करने की एक लंबी परंपरा है, मगर त्रासदी यह है  कि सैकड़ों व्यंग्य लिखे जाने के बावजूद  राजनीति की दुम टेढ़ी की टेढ़ी है। हादसे में होने वाली मौत पर नेताओं के उदासीन या असंगत किस्म के बयानों  से, अकसर आम आदमी गुस्से से भर जाता है। उनकी हंँसी के क्या कहने‘‘ शीर्षक की रचना में सवाल है कि क्या नेताओं को आम आदमी की समस्याओं को हँस कर टालना चाहिए? राजनीति के मसखरे चरित्र पर यह व्यंग्य गंभीर विमर्श की गुंजाइश पैदा करता है।
स्वच्छता अभियान की आड़ में झाड़ू लगाना भी एक कला है। शीर्षक की रचना बताती है कि देश में नेता किस तरह झाड़ू लगा रहे हैं। यह एक ऐसा पाखंड है जो खुलेआम किया जा रहा है। यही कारण है कि जैसे.जैसे झाड़ू  लगती है वैसे.वैसे व गंदगी भी बढ़ती जाती है। फोटो खिंचाने के लिए झाड़ू लगाना और देश की अर्थव्यवस्था पर झाड़ू मारनाए वाकय में सबसे बड़ी कला है। सवाल यह है कि ऐसी कला आम आदमी कब सीखेगा। इस संग्रह में व्यंग्य के शीर्षक ही बता देते हैं कि वो किसकी बात करते हैं। व्यंग्य के शीर्षक ही पाठक को रचना पढ़ने पर बाध्य कर देते हैं। सभी व्यंग्य एक तरह से पाॅकेट.बम हैं, जो विसंगतियों को विस्फोट के साथ नष्ट करने की कोशिश करते हैं।
 जिस तरह क्रिकेट के आईपीएल में खिलाड़ी बिकते हैं,ठीक उसी तरह विधायक और सांसद की बोली आफ द रिकार्ड लगती है। लोकतंत्र का आईपीएल बरसो से चला आ रहा है। इसमें एक नेता कहता हैए हमें अभी कुछ वर्षो के लिए लीज पर लिया गया है। राजनीति में विधायकों को दूसरे दल के लोग लीज पर ही लेते हैं। यह रचना मध्यप्रदेश की राजनीति के पहले लिखी गई है। लेकिन इसे पढ़ने पर लगता है कि लेखक ने इसकी स्क्रिप्ट पहले ही लिख दी थी। सवाल यह है कि वोटर को खरीद कर नेता विधायक बनता है ऐसे में बाद में उसका बिकना क्या गलत है, लोकतंत्र के बाजार में बिकने वालों के अलग अलग रेट तय हैं। इसलिए राजनीति का आईपीएल कभी बंद नहीं होगा।
कुल मिलाकर इस संग्रह की तमाम  व्यंग्य रचनाएं अपने समय की अराजक घटनाओं का एक तरह से कोलाज ही है जिसे पढ़कर हम सत्य से वाकिफ तो होते हैं बेचैन भी होते हैं, मगर मूकदर्शक बनकर ही रह जाते हैं।  फिर भी व्यंग्य की सार्थकता यही है कि, वह पाठक को बेचैन तो करता है। यह बचैनी ही भविष्य के वैचारिक परिवर्तन का माध्यम बन सकती है।
▪ राजनीति का आईपीएल .- गिरीश पंकज
किताब गंज प्रकाशन, 195 रूपये
0 रमेश कुमार ‘‘रिपु’’
    
 

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