Friday, December 18, 2020

लोन वर्राटू,फर्जी कांसेप्ट

   
बस्तर का दंतेवाड़ा और सुकमा जिला को पुलिस ने इनामी नक्सलियों का केन्द्र बना दिया है। जबकि दंतेवाड़ा की डेढ़ सौ पंचायतों में केवल बीस पंचायतें ही रेड जोन में है। भरमार बंदूक के साथ सरेंडर करने वाले नक्सली को भी पुलिस लाखों का इनामी बना देती है। नक्सली सभी वर्दी में होते में हैं। लेकिन दंतेवाडा में पांच सौ नक्सलियों के सरेंडर का लक्ष्य पूरा करने बनियान पहने ग्रामीणों को भी पुलिस नक्सली बता रही है। नक्सलवाद के इतिहास में लोन वर्राटू को फर्जी परिकल्पना कहा जा रहा है।


0 रमेश कुमार ‘‘रिपु’’
                   भूपेश सरकार ने नक्सलियों के आगे घुटने टेक दी है। नक्सलवाद पर इस सरकार ने राजनीति की है। जिसके दुष्परिणाम हम सभी को आने वाले समय मे भुगतने होंगे। राज्य सभा सदस्य सरोज पांडे के इस बयान के बाद देखा जा रहा है कि सरकार ने नक्सलियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए अपने घुटने सीधे क्या किये, बस्तर पुलिस ने दंतेवाड़ा जिला को इनामी नक्सलियों का ठिकाना बना दिया। इस जिले में डेढ़ सौ पंचायतें हैं। जिसमें केवल बीस पंचायतें ही रेड जोन में हैं। करीब 30 पंचायतें ग्रे एरिया कहलाती हैं। जहां सुरक्षाबल और माओवादी, दोनों ग्रामीणों के सम्पर्क में रहते हैं। बची हुई 100 पंचायतें ग्रीन क्षेत्र हैं, जहां राज्य पुलिस और प्रशासन का पूर्ण अधिकार है। लेकिन देखा जा रहा है कि बस्तर पुलिस ने इनामी नक्सलियों के सरेंडर की झड़ी लगा दी है। दंतेवाड़ा पुलिस को साल के अंत तक पांँच सौ नक्सलियों के सरेंडर का लक्ष्य दिया गया है। दंतेवाड़ा एस.पी अभिषेक पल्लव कहते हैं, हमने 1600 ग्रामीणों के नक्सली बनने की पहचान कर ली   है। इनमें करीब 200 सशस्त्र लड़ाके हैं। नक्सली बनने ग्रामीणों को लोन वर्राटू के जरिये सरेंडर करने की मुहिम को अंजाम दिया जा रहा है। लोन वर्राटू अभियान के तहत अब तक 56 ईनामी 208 नक्सलियों ने सरेंडर किया है।’’
इनामी नक्सली बनाने की कहानी
अपने ढाई साल के कार्यकाल में कल्लूरी नक्सलियों के आत्म समर्पण का रिकार्ड बनाए, लेकिन सरकार की समिति ने पाया कि केन्द्रीय गृहमंत्रालय के तय मानको के अनुसार केवल तीन फीसदी ही आत्मसमर्पण सही थे,बाकी सब फर्जी थे। नक्सलियों के सरेंडर की संख्या बढ़ाने की प्रक्रिया एक बार फिर देखी जा रही है।  इसलिए कि भरमार बंदूक जिसके पास है, वो एक लाख का इनामी नक्सली कैसे हो सकता है। भरमार बंदूक से चिड़िया तक नहीं मरती। दंतेवाड़ा एस.पी डॉ अभिषेक पल्लव ने बताया कि भांसी झिरका के जंगल मे सर्चिंग पर निकले जवानों के सामने भरमार के साथ माओवादी राजेन्द्र तेलाम जो कि डीएकेएमएस अध्यक्ष था ने सरेंडर किया। रेलवे संपति को नुकसान पहुंचाने, माओवादी विचारधारा का प्रचार करन,े नक्सलियों को राशन पहुंचान,े सहित अन्य काम करता था। इनामी नक्सली बनाने की कहानी बड़ी आसानी से पुलिस गढ़ने लगी है। जगदलपुर के पत्रकारों का कहना हैं, बस्तर आई जी. पी. सुन्दराज दूसरा कल्लूरी बनना चाहते हैं। यही वजह है कि लोन वर्राटू के फर्जी परिकल्पना की आड़ में भारी संख्या में ग्रामीणों को नक्सली बताकर सरेंडर कराने की मुहिम शुरू किया गया है।
कैसे कैसे इनामी नक्सली
तीन लाख का इनामी नक्सली सोमडू जो कि राइफल के साथ सरेंडर किया। पुलिस उसे दरभा डिविजन दलम सुरक्षा का प्लाटून सेक्शन डिप्टी कमांडर बता रही है। जबकि वह नक्सली नेता मंगतू के कहने पर बड़ेगुडरा के सुरेश से आठ लाख रूपये लेकर रायपुर आया था। एक अनजान व्यक्ति ने उसे एके 47 का कारतूस,वर्दी और स्टेशनरी दिया। सामान लेकर वह दंतेवाड़ा आ गया। मंगतू ने उसे रायपुर से सामान लाने को कहा था। मौका पाकर वह पुलिस के समक्ष सरेंडर कर दिया। सोमडू वेट्टी का कहना है वह ए.के.47 लेकर कुछ दिनों तक डिवीजन मेंबर चैतू विनोद देवा, जगदीश, जयलाल आदि की सुरक्षा में लगा रहा और मौका लगते ही समर्पण कर दिया। इसके अलावा एटेपाल निवासी व छोटेगुडरा पंचायत जनमिलिशिया सदस्य बामन उर्फ डेंगा यादव, नहाड़ी ककाड़ी पंचायत जनमिलिशिया सदस्य देवा मड़कम, डुवालीकरका चेतना नाट्य मंडली सदस्य लक्ष्मण और स्कूलपारा निवासी चेतना नाट्य मंडली सदस्य कुमारी मड़कम बोज्जो ने आत्मसमर्पण किया। पुलिस के अनुसार ये सभी सड़क काटने आईईडी प्लांट करने नक्सलियों की मीटिंग के लिए ग्रामीणों को बुलाने का काम करते थे।
गृह मंत्री की शिकायत
गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू कहते हैं केन्द्र सरकार छत्तीसग के साथ दोहरा बरताव करती है। नक्सलवाद की गंभीर समस्या छत्तीसगढ़ में है, बावजूद इसके पुलिस आधुनिकीकरण बजट में कटोती कर दी है।   2013-14 में प्रदेश का पुलिस आधुनिकीकरण बजट 56 करोड़ रुपए था, जो 2020-21 में 20 करोड़ रह गया है। वित्तीय वर्ष 2019-20 में भी हमने 20 करोड़ का प्रस्ताव दिया था,लेकिन राज्य को मिले मात्र 9.7 करोड़ रुपए। वहीं बिहार को 27.6 करोड़, ओडिशा को 15.6 करोड़ रूपये, उत्तर प्रदेश को 63.19 और महाराष्ट्र को 47 करोड़ रुपए दिए गए।  
गृह वापसी की अपील
बस्तर पुलिस लोन वर्राटू के जरिये हर जिले में गृह वापसी के तहत आत्म समर्पण की अपील कर रही है। नक्सल विरोधी अभियान का नेतृत्व कर रहे बस्तर रेंज के आईजी सुंदरराज पी ने कहते हैं लोन वर्राटू कार्यक्रम सरकार और पुलिस की एक विशेष अभियान है। जिसके तहत गुमराह होकर नक्सली बने ग्रामीण अपने घरों को वापस आएं और सरकार की मदद से नई जिंदगी शुरू कर सकें। लोन वर्राटू के तहत सरेंडर करने की नीति में यह नहीं है कि आत्मसमर्पित माओवादी रोजगार के लिए पुलिस में ही भर्ती हो,जैसा की पहले था। अब उनके लिए इच्छानुसार रोजगार की सुविधा दी जा रही है,बैंक लोन की व्यवस्था भी अन्य विभागों से मिलकर की गई है। लोन वर्राटू के शुरुआती परिणाम काफी पॉजिटिव हैं।’’दंतेवाड़ा एस.पी अभिषेक पल्लव कहते हैं,दंतेवाड़ा पहला जिला है,जहां 35-40 नक्सल प्रभावित जिलों में सर्वे कर नक्सलियों की पहचान की गई है। इस अभियान के तहत सरेंडर करने वाले नक्सलियों को पहले की तरह 10 हजार रुपए त्वरित राहत के रूप में दिया जाता है इसके बाद उनके रोजगार की व्यवस्था स्व सहायता समूह बनाकर की जाएगी।’’
फर्जी परिकल्पना
जानकारों का कहना है कि पुलिस चर्चा में बने रहने के लिए नक्सलवाद के खिलाफ फर्जी परिकल्पना लेकर आए दिन कोई न कोई अभियान शुरू करती है। लोन वर्राटू के जरिए नक्सलियों के नाम के पाम्पलेटस ग्राम पंचायतों में,सरकारी भवनों में और ग्रामीणों के घरों के बाहर की दीवारों में उनसे वापसी की अपील करते हुए चस्पा किये जा रहा हैं। इनामी नक्सलियों के फ्लेक्स लगाए गए हैं। इसके साथ ही सुरक्षा बलों की टीमें गांव में जाकर ग्रामीणों से भी आग्रह कर रहीं हैं कि, वे अपने साथियों को माओवाद की राह छोड़ मुख्य धारा से जुड़ने के लिए प्रेरित करें।
अभियान पारदर्शी और शांतिपूर्ण
बस्तर आई जी सुन्दरराज कहते हैं लोन वर्राटू अभियान पारदर्शी अभियान है। नक्सलियों के परिजनों के घरों में पाम्पलेट्स लगाकर उनसे पावती ली जाती है, ताकि इनामी नक्सलियों के खिलाफ कार्रवाई करने पर ग्रामीण विरोध न करें। अक्सर पुलिस पर नक्सलियों की आड़ में आम ग्रामीणों को मारने और अत्याचार के साथ बर्बरता का अरोप लगता है। ग्रामीणों को पहले से बता दिया जाता है कि, उनके यहां कौन कौन नक्सली हैं।‘‘ यह माना जा रहा है कि लोन वर्राटू को पायलट प्रोजेक्ट की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। यदि सफलता मिली तो इसे माओवादी प्रभावित अन्य जिलों मंे भी लागू किया जाएगा।  
सुर्खियों का मायाजाल
सुर्खियों में रहने के लिए पुलिस कभी गोंडवी भाषा में पोस्टर पाम्पलेट लगा कर ग्रमीणों से नक्सली बने लोगों को सरेंडर की अपील करती है। इस बार लोन वर्राटू का नाम दिया है। इसे सलवा जुड़ूम से अलग प्रचारित किया जा रहा है। सलवा जुड़ूम नक्सलियो के खिलाफ एक सशस्त्र लड़ाई थी। उसमें कोई योजना नहीं थी। नक्सलियों की विचारधारा को प्रसारित करने वाले उनके फ्रंटल संगठनों को कमजोर करने का कोई तोड़ नहीं था। जबकि लोन वर्राटू के तहत माओवादी विचारधारा को प्रोपोगेट करने वाले उनके फ्रंटल घटकों के खिलाफ कार्रवाई की जाती है। सरेंडर पॉलिसी के तहत नक्सलियों के लिए दी जाने वाली सुविधाओं की जानकारी ग्रामीणों को दी जाती है।
पुलिस का लोन वार्राटू अभियान में केवल निचले पायदान के नक्सलियों को ही सरेंडर करने की अपील की जा रही है। जबकि नक्सली लीडरों के लिए अभियान में कुछ भी नहीं है। जाहिर सी बात है कि आगे चलकर यह अभियान भी सफलता के झंडे नहीं गाढ़ सकता है। जब तक नक्सलियों के बड़े लीडरों को मुख्य धारा में शामिल करने की कोई योजना नहीं बनती लोन वार्राटू भी फर्जी परिकल्पना ही साबिता होगा। पुलिस अपनी पीठ थपथपाने के लिए पाँच सौ नक्सलियों ने सरेंडर किया,इसका रिकार्ड बना लेगी। पुलिस को कायदे से यह पता करने चाहिए कि ग्र्रामीण नक्सली बन क्यों रहे हैं। उसका समाधन क्या है। नक्सली लीडर सरेंडर कैसे करें,नक्सली छत्तीसगढ़ को गृह जिला क्यों बना रखें हैं।
 

 









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