Monday, November 15, 2021

तिकड़म बाजों पर कटाक्ष

 ▪️तिकड़म बाजों पर कटाक्ष..

हिन्दी के अखबारों और पत्रिकाओं में व्यंग्य आज की ज़रूरत बन गए हैं। इसलिए इन्हें नज़र अंदाज़ करना या फिर हाशिए पर रखना घाटे का सौदा है। "पुरस्कार की उठावनी" व्यंग्य संग्रह की रचनाएं विभिन्न कालों में क्षेत्रीय और राष्ट्रीय अख़बारों में लिखे गए हैं। रचनाएं हास्य व्यंग्य शैली में स्थान,घटना और परिस्थिति के सापेक्ष हैं। बावजूद इसके कई रचनाओं को पढ़ने पर ध्यान घटना की ओर चला जाता है। कोरोना काॅल में लिखी गई रचना हो या  राजनीतिक,मानवीय संवेदनाएं और नैतिक मूल्यों के तिकड़म बाजों पर, हास्य अंदाज़ में तीखा कटाक्ष है।


'पुरस्कार की उठावनी' अरविंद तिवारी की चालीस रचनाओं का नया संग्रह है। ब्रिटिश जमाने के अच्छे पुलों को भ्रष्टाचार के लिए जर्जर बताने की जिस भाषा का इस्तेमाल इंजीनियर करते हैं,वो नेताओं को भी मात देते हैं। विधायक निधी की वाट कैसे लगती है पुल की तीन कथाएं बताती है। फिसड्डी होना बेहद अपमान जनक है, मगर एक पायदान ऊपर चढ़ जाने पर सुशासन के गदगद होने का सुख है ‘लास्ट बट वन‘। बेसिर पैर की कविता लिखने वाले कवियों पर कटाक्ष है ‘कवि की छत का पेड़’। आने वाले समय में बिजली उपभोक्ताओं की ज़्यादती से इंजीनियर अपने आप को कैसे बचाएंगे, उसे जान सकते हैं, बिजली विभाग का इंटरव्यूह रचना से।


रचनाओं में सहज टिपपणियों के बीच कई सूक्ति वाक्य उभरे हैं,‘‘जैसे वर्चुअल कार्यक्रम और इंस्पेक्टर मातादीन में, लोग आन लाइन का जिक्र ऐसे करते हैं, मानो लोक सेवा आयोग के चयन में पहले स्थान पर आये हैं। कोरोना काल की लव स्टोरी में, पचास हजार रुपए तोला वाला सोना खो जाए, तो नींद वाला सोना भी हराम हो जाता है। प्राइवेट रिजाॅर्ट के सरकारी मच्छर-जब पत्नी को पता चला कि मच्छर तक ब्लैकमेल के काम आ सकते हैं, तो उसे अपने पति पर गर्व हुआ। उसे उम्मीद हो गई कि किसी न किसी दिन उसके भरतार मंत्री जरूर बनेंगे। सरकार भी बड़े हवाई अड्डे को खलिस पब्लिक को लीज पर दे देती है और खुद जालू काका की तरह छोटे-छोटे अड्डो के विकास में जुट जाती है। एनसीआर का कटखना कुत्ता में मोहल्ला क्लीनिक को छोड़ों बड़े-बड़े कारपोरेट अस्पतालों में भी कुत्ते का रैबीज उपलब्ध नहीं है। आम आदमी कुत्ते में आर्ट नहीं देखता,पराली का जलना भी उसके लिए आर्ट नहीं है।


पुरस्कार की उठावनी निश्चिय तौर पर राष्ट्रीय मुद्दा है। पुरस्कारों की गरीबी उतनी अपमानजनक नहीं होती,जितना अपमान मित्रों के बार-बार इस गरीबी का जिक्र करने पर होता है। वरिष्ठ लेखक उस भारतीय भाषा की तरह हैं,जिसे आठवीं अनुसूची में स्थान अभी तक नहीं मिला। साहित्य जगत में पुरस्कार के लिए तरह-तरह की टांग खिंचाई की जाती है। जितने लेखक नहीं हैं, उतने नाम के पुरस्कार हैं। कोई पुरस्कार की बात करे तो बड़ी नम्रता से मित्र कह देते हैं, कि आप तो पुरस्कार से ऊपर उठ चुके हैं। यानी उसके यहां पुरस्कार की उठावनी हो चुकी है। छोटी राशि का सम्मान पाने वाले लेखकों पर करारा कटाक्ष है। पैसे वाली पार्टी का हो गया लेखक बनने के फायदे का अच्छा विश्लेषण है। संग्रह में सात व्यंग्य रचनाएं कारोना से जुड़ी हैं,लेकिन सभी की तासीर अलग-अलग है।


समाज के विभिन्न स्याह पक्षों,और व्यवस्थाओं के अलावा रोज की जिन्दगी पर सारी रचनाएं आईना दिखाती है। कुछ रचनाओं के शीर्षक सब कुछ अंदर की कथा को बयान कर देते हैं। जैसे-साहित्य की सीबीआई और ईडी,वह खुद कोरोना कैरियर हो गए,लोकतंत्र का सूचकांक,फागुन में कल्लो भाभी की पाती,नये साल की पहली मिसकाॅल,कुंए की मुंडेर पर मेढ़कआदि अलग-अलग ऊहापोहों से गुजरती रचनाओं की कई तस्वीरें हैं।


संग्रह के शीर्षक से यही लगता है कि अरविंद तिवारी किसी पुरस्कार के हक़दार हैं,लेकिन उनके समकालीन मित्रों ने उनके पुरस्कार की उठावनी कर दिये हैं। ऐसे तिकड़मी मित्रों पर उनकी यह किताब गहरा कटाक्ष करती है। बहरहाल हास्य रहित इस व्यंग्य संग्रह की मारक क्षमता राफैल जैसी है। सामान्य व्यंग्य रचनाओं से हटकर तीखी-मसालेदार पठनीय रचना है।

किताब - पुरस्कार की उठावनी

लेखक - अरविंद तिवारी

प्रकाशक - इंडिया नेटबुक्स प्राइवेट लिमिटेड

मूल्य - 250 रुपए

@रमेश कुमार ‘रिपु’


अपनी कहानी जैसे

 ▪️अपनी कहानी जैसी


मन्नू भंडारी बिलकुल अपनी कहानी जैसी थीं। जैसे उनकी कहानियों के पात्र शोर नहीं मचाते थे,नारे बाजी के हिमायती नहीं हैं,मूल्यों के प्रति सजग हैं और एक समग्र नजरिया रखते हैं,वैसी ही मन्नू भंडारी सारी जिन्दगी रहीं। कहानियों में नये तेवर,नये स्वाद और आडम्बर से परे के लिए हमेशा मन्नू जी जानी जायेंगी। राजेन्द्र यादव ने स्त्री विमर्श का जो स्वरूप हिन्दी जगत को दिया उससे अलहदा है मन्नू भंडारी की कहानियों की दुनिया में नारी। आज हिन्दी जगत में स्त्री लेखन को लेकर नारीवाद और अस्मिता विमर्श का बोलबाला है,लेकिन मन्नू भंडारी की कहानियांें में वो ग्लैमर और शोर-शराबा नहीं है। दरअसल उन्होंने जैसा जीवन जिया वैसी ही कहानियां गढ़ी। मन्नू जी अपनी कहानियों के जरिये हिन्दी जगत के पाठकों को हमेशा याद आयेंगी।

Sunday, October 24, 2021

कांग्रेसियों के बीच छिड़ी है जंग

      









कांग्रेस की हर शाख पर कालिदास बैठे हुए हैं। यही वजह है कि कांग्रेस की सत्ताई शाख बढ़ने की वजाय कांग्रेस के कालिदास उसे काटते जा रहे हैं। जिन राज्यों में कांग्रेस की सत्ता है भी,उन राज्यों में अपने अधिकारों और राजनीतिक लाभ के लिए कांग्रेसियों में घमासन मचा हुआ है।    
 0 रमेश कुमार ‘‘रिपु’’
                 छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सरकार केे आधे सफर के बाद कांग्रेसी आपस में ही विरोधाभास की छवि पेश कर रहे हैं। इसकी वजह है ढाई साल बाद मुख्यमंत्री कौन? कांग्रेसी दो खेमे में बंट गए हैं। एक गुट चाहता है, कि भूपेश बघेल ही मुख्यमंत्री रहें और दूसरे गुट की मंशा है कि हाई कमान अपने वायदे के मुताबिक अब टी.एस.सिंह देव ‘बाबा’को राज्य का नया मुख्यमंत्री घोषित कर दे। कांग्रेस और कांग्रेसी दोनों दुविधा में हैं। मुख्यमंत्री के खेला में जिन कांग्रेसियों के बीच 63 का सियासी रिश्ता था, वो अब 36 में तब्दील हो रहा है। 
अंदरूनी लड़ाई में चार माह का वक्त जाया हो गया। जबकि सरकार को उन मोर्चे पर लड़ना चाहिए,जो विकास के रास्ते में रुकावट बन रहे हैं। अभी तक कांग्रेस के अंदर आल इज वेल की स्थिति थी। लेकिन जून माह से नये मुख्यमंत्री की सुगबुगाहट के साथ ही दिल्ली तक की दौड़ शुरू हो गई। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और उनके समर्थक स्वास्थ्य मंत्री टी.एस सिंह देव को बायें करने की सियासी गोटियाँ बिछाते आए हैं। जैसा कि विधायक बृहस्पती ने कुछ दिनों पूर्व यह कह कर सनसनी फैला दी थी कि टी.एस सिंह देव उन पर जान लेवा हमला कराए। इस आरोप से टी.एस सिंहदेव क्षुब्ध होकर कहा,जब तक उनके खिलाफ लगे आरोप के दाग नहीं मिट जाते,वो विधान सभा में नहीं आयेंगे।  इसके बाद से कांग्रेस के अंदर सियासी द्वंद का तंबुरावादन शुरू हो गया। अब गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू ने भी कह दिया,कि एक बार जो मुख्यमंत्री बन जाता है,वह अंत तक रहता है। यू.पी. में लखीमपुर कांड में भूपेश बघेल का प्रियंका गांधी के साथ खड़े रहना और मृतक के परिजनों के परवारों को 50-50 लाख रुपए देने की घोंषणा करके अपने विरोधियों को संकेत दे दिये हैं,कि वे दस जनपथ के साथ हैं।  
मुख्य मंत्री भूपेश बघेल के समर्थन में दो दफा दर्जनों विधायक दिल्ली हो आए हैं। कांग्रेस हाई कमान किसी से भी नहीं मिला। वहीं टी.एस सिंह देव को अब भी भरोसा है,कि कांग्रेस हाईकमान सियासी समझौते के मुताबिक उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंप देगा। मुख्यमंत्री को लेकर सियासी उठापटक के बीच कांग्रेस के अंदर आस्तीन खींचने की सियासत का शो शुरू हो गया है। विधायक बृहस्पती के नेतृत्व में प्रदेश के दर्जन भर कांग्रेसी विधायक शिक्षा मंत्री प्रेम सिंह टेकाम के खिलाफ मोर्चा खोल दिये हैं। विधायकों का आरोप है, कि शिक्षा मंत्री का स्टाफ ट्रांसफर और पोस्टिंग का धंधा चला रहे हैं। दबाव के बाद जशपुर के डीईओ. एस. एन. पंडा को निलंबित कर दिया गया है। दरअसल प्रेम सिंह टेकाम स्वास्थ्य मंत्री के समर्थक हैं। दूसरा गुट पूरी कोशिश में है कि प्रेम सिंह को मंत्री पद से हटा दिया जाए।
दो सौ कांग्रेसियों का इस्तीफा
छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले के कोपरा पंचायत के चार जिला महामंत्री दो ब्लॉक महामंत्री समेत 200 कार्यकर्ताओं ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया है। इस मामले पर जिला अध्यक्ष भाव सिंह साहू ने कहा,इस मामले में भाजपा और आरएसएस का षड्यंत्र है। राजिम के कांग्रेस विधायक अमितेश शुक्ल पर आरोप है,कि पंचायत स्तर पर भ्रष्टाचार करने वाली कोपरा पंचायत की महिला सरपंच डाली साहू का साथ विधायक दे रहे हैं। क्यों कि विधायक पर पंचायत स्तर पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं। वहीं राजिम के पूर्व विधायक संतोष उपाध्याय ने कांग्रेस जिलाध्यक्ष भावसिंह साहू को अपरिपक्व बताते हुए उन्हें विधायक से स्थिति स्पष्ट करवाने की सलाह दी है। ग्रामीणों का आरोप है कि सरपंच डाली साहू ने बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार किया है। गौरतलब है कि कोपरा जिले की सबसे बड़ी ग्राम पंचायत है। इसे कांग्रेस का गढ़ माना जाता है। बड़ी संख्या में कांग्रेस कार्यकर्ताओं का इस्तीफा देना भूपेश बघेल के लिए चुनौती है।
बैठक में भूपेश को बुलावा नहीं
प्रदेश कांग्रेस की बैठक राजीव भवन में थी,लेकिन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को नहीं बुलाया गया। बैठक में वे डेढ़ घंटे बाद पहंुचे। नाराज होकर कहा,मुझे जब बुलाया ही नहीं जायेगा तो पता कैसे चलेगा कि कौन नाराज है। बैठक में प्रदेश कांग्रेस प्रभारी पी.एल पुनिया भी थे। बैठक में कार्यकत्र्ताओं की शिकायत थी, कि पदाधिकारी और सरकार के मंत्री,अधिकारी उनकी बात नहीं सुनते। एक पदाधिकारी ने यहांँ तक कह दिया कि हमें तो आप तक पहुंचने के लिए कोई जरिया ही नहीं है। एक पदाधिकारी ने ढाई-ढाई साल मुख्यमंत्री की चर्चा से जनता में कांग्रेस की इमेज खराब होने की बात की। इस पर मुख्यमंत्री ने नाराजगी जताई। बैठक से उनके बाहर निकलने पर मीडिया के सवाल पर उन्होंने कहा,इसका जवाब प्रदेश अध्यक्ष और प्रदेश प्रभारी देंगे। कांग्रेस विधायकों का मंत्रियों के खिलाफ बयान दिये जाने और बार-बार दिल्ली जाने पर संगठन ने इनके खिलाफ कार्रवाई से इंकार कर दिया है। क्यों कि संगठन भी समझ रहा हैं कि कार्रवाई किये जाने से कांग्रेस कें अंदर की लड़ाई सड़क पर आ जायेगी।
नया मुख्यमंत्री मिला तो..
सियासी सवाल ये है कि छत्तीसगढ़ को नया मुख्यमंत्री मिलने पर कांग्रेस के अंदर क्या-क्या हो सकता है? क्या भूपेश बघेल के समर्थित विधायक कांग्रेस से इस्तीफा दे देंगे? भूपेश बघेल स्वयं इस्तीफा दे देंगे? संगठन और निगम मंडल में भूपेश के समर्थित लोग क्या अपने-अपने पद से इस्तीफा देंगे। टी.एस सिंह देव संगठन से लेकर विभिन्न आयोग में क्या अपने लोगों को जगह देंगे? चर्चा है कि जिस तरह टी.एस सिंह देव को मुख्यमंत्री सत्ताई ताकत से उन्हें बायें करते गये हैं,वही तरीका टी.एस सिंह देव भी भूपेश बघेल के साथ कर सकते हैं? सवाल ये है कि ऐसा होने पर क्या कांग्रेस राज्य में बीजेपी को शिकस्त दे पाएगी? क्या हाई कमान ओबीसी की जगह सवर्ण को मुख्यमंत्री की कमान देकर श्यामा,वोरा और अर्जुन सिंह के दौर की सियासत को दोहराएगी? ऐसे कई सवाल हैं जिनके जवाब राज्य की कांग्रेस भी नहीं जानती।
कांग्रेस फंस गई..
प्ंांजाब में मुख्यमंत्री की कुर्सी से कैप्टन अमरिंदर सिंह को हटाने में नवजोत सिद्धू ने हाई वोल्टेज ड्रामा कर पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा। सिद्धू को यकीन था, कांग्रेस हाईकमान उन्हें मुख्यमंत्री बना देगा। लेकिन दांव उल्टा पड़ गया। चरणजीत सिंह चन्नी के मुख्यमंत्री बनने के बाद सिद्धू ने 28 सितम्बर को एक और गेम खेला। पंजाब कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष पद से इस्तीफा ट्वीट करके,कांग्रेस की मुश्किले बढ़ाई। उनके दोे समर्थक कैबिनेट मंत्री रजिया सुल्तान और परगट सिंह ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। सिद्धू नाराज थे, कि मुख्यमंत्री ने मंत्रिमंडल में विवादास्पद विधायक और शराब कारोबारी राणा गुरजीत सिंह को क्यों शामिल किया। पंजाब का मामला अभी शांत हो गया है,कहना मुश्किल है। पंजाब में फरवरी 2022 को चुनाव है। पंजाब में जिस तरह ‘पंजा’ लड़ाने का खेल चल रहा है,उससे जाहिर है कि कांग्रेस आलाकमान ने पंजाब के सत्ताई जहाज के कैप्टन को हटाकर कांग्रेसियों को दुविधा में डाल दिया है। सवाल ये है, कि सिद्धू कब तक कांग्रेस में रहंेगे? कैप्टन कब तक चुप रहेंगे? क्या वो चुनाव मंे कांग्रेस का साथ देंगे? क्या चरणजीत सिंह चन्नी पंजाब में कांग्रेस को जीता लेंगे? क्या कांग्रेस सिद्धू को आगे करके चुनाव लड़ेगी? या फिर कैप्टन अमरिंदर सिंह चुनाव से पहले कोई पार्टी बनायेंगे? पंजाब कांग्रेस में कालिदास कौन है,विपक्ष बखूबी जानता है। मगर कांग्रेस हाईकमान चुप है। बहरहाल कांग्रेस के अंदर जो सियासी द्वंद मचा हुआ है,उसका हल हाईकमान को ढूंढना होगा।
 सिद्धू और चन्नी में खटास
सीएम चन्नी और सिद्धू के बीच खटास बढ़ती जा रही है। सिद्धू लगातार उनकी सरकार पर हमले कर रहे हैं। कभी डीजीपी और एडवोकेट जनरल की नियुक्ति के बहाने तो कभी हाईकमान के एजेंडे के बहाने। माना जा रहा है कि इसी के चलते चन्नी की कैप्टन से मुलाकात की जमीन तैयार हुई। कांग्रेस को उम्मीद थी कि कैप्टन अमरिंदर को हटा देने से पंजाब में सब ठीक हो जाएगा। पंजाब प्रभारी हरीश रावत ने यह कहकर सनसनी फैला दी कि पंजाब चुनाव प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के नेतृत्व में लड़ा जाएगा। इससे चन्नी सहित अनेक लोगों के कान खड़े हो गए। पंजाब में नई कैबिनेट के शपथ लेने के बाद अब पार्टी हाईकमान का पूरा फोकस साढ़े चार महीने बाद होने वाले विधानसभा चुनाव पर है। चुनाव से पहले सिद्धू को संगठन मजबूत करने की हिदायतें दी जा सकती हैं।
कांग्रेस को अनाथ कर दिया
मध्यप्रदेश में कांग्रेस के हाथ से सत्ता जाने के पीछे कांग्रेसी दबी जुबान से कमनाथ और दिग्विजय सिंह को दोषी ठहरा रहे हैं। इन दोनों ने ज्योतिरादित्य सिंधिया को कांग्रेस की सत्ताई आभा से दूर रखने जो जाल बुना, उसमें कांग्रेस सरकार फंस कर धड़ाम हो गई। ज्योतिरादित्य सिंधिया को न प्रदेश अध्यक्ष और न ही राज्य सभा भेजने के लिए दोनों नेता तैयार थे। इन्ही की वजह से वो अपनी गुना सीट हार गए। ज्योतिरादित्य सिंधिया बीजेपी से हाथ मिलाकर कांग्रेस का पंजा मरोड़ दिए। आज प्रदेश में कांग्रेस के 95 विधायक हैं,लेकिन प्रदेश में कांग्रेस की हलचल शून्य है। कमलनाथ की वजह से अरूण यादव नाराज है। खंडवा लोकसभा सीट से वे चुनाव लड़ना चाहते थे। टिकट नहीं मिलने पर उनके अंदर का विरोध छलक पड़ा,फसल मैं तैयार करता हूूँ और काटता कोई और है।’’ विंध्य क्षेत्र से यदि कांग्रेस को सीट मिलती तो कांग्रेस की सरकार न जाती,ऐसा कहकर कमलनाथ ने अजय सिंह राहुल को नाराज कर दिये हैं।
रीवा जिले का प्रभारी राकेश चैधरी को बना देने पर राहुल के नाराज होने पर राजा पटेरिया को बनाया गया। गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा के घर में राहुल का डीनर करना और उनके बर्थ डे पर कैलाश विजयवर्गीय का जाकर उन्हें बुके देने के बाद यह समझा जाने लगा कि राहुल किसी भी दिन बीजेपी में जा सकते हैं। प्रदेश में एक लोकसभा और तीन विधान सभा के लिए उपचुनाव होने जा रहे हैं। इस चुनाव के परिणाम स्पष्ट करंेगे कि कांग्रेस कितनी सक्रिय है और कमलनाथ को कितना पसंद किया जा रहा है। वैसे प्रदेश मंे कांग्रेस सत्ता जाने के बाद भी कई गुटों में बंटी हुई है।
राजस्थान में पंजाब सा झगड़ा
राजस्थान में कांग्रेस के अंदर पायलट और गहलोत खेमे में 2018 से लड़ाई चल रही है। पायलट खेमा बार-बार मुख्यमंत्री बदलने की मांग करता आया है। पिछले दिनों अशोक गहलोत के ओ.एस.डी लोकेश शर्मा ने एक ट्वीट किया था। जिसे पंजाब की राजनीतिक घटनाक्रम से जोड़ कर देखा गया था। गहलोत के ओएसडी के ट्वीट पर सचिन पायलट के कई समर्थकों ने भी प्रतिक्रिया देते हुए हमला बोला। सतपाल सिंह नाम के एक पायलट समर्थक ने कमेंट में लिखा राजस्थान में बड़े फेरबदल की जरूरत है और आलाकमान करेगा। आप के नेताजी गहलोत के नेतृत्व में हम चुनाव नहीं जीत सकते हैं, आपको भी मालूम है। गहलोत सरकार ने वादा किया था कि किसानों का सम्पूर्ण कर्जा माफ करने और युवाओं को बेरोजगारी भत्ता देंगे। सब उल्टा हो रहा है। भ्रष्टाचार से लोग परेशान हैं।  
मौजूदा पीसीसी अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा से विधायक और नेता नाराज हैं। एक गुट चाहता है,सचिन पायलट को फिर अध्यक्ष बना दिया जाए। डोटासरा राज्य सरकार में शिक्षामंत्री होने के साथ ही सी.एम के खेमे के हैं। वहीं कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य रघुवीर मीणा और राज्य के कृषि मंत्री लालचंद कटारिया के नाम की भी चर्चा है।   
गहलोत के समर्थक आकोदिया का दावा है कि सचिन पायलट के सारे विधायक गहलोत के पाले मे आ गए हैं। 2018 में उनके गुट के 21 विधायक जीतकर आए थे। अब पायलट के पास मुश्किल से सात-आठ विधायक होंगे। मंत्रियों में भी आपसी खींचतान है। गत तीन जून 2021 को कैबिनेट बैठक के दौरान शांति धारीवाल और गोविंद डोटासरा आपस मे भिड़ गए। शांति धारीवाल ने डोटासरा से यहां तक कह दिया कि जो बिगाड़ना है बिगाड़ लेना मैंने बहुत अध्यक्ष देखे हैं।  
बहरहाल पिछले पचास वर्षो से कांग्रेस तमिलनाडु की सत्ता से बाहर है। 42 वर्षो से पश्चिम बंगाल की। 30 वर्षो से उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का मुख्यमंत्री नहंी है। 29 वर्षो से वह बिहार में और 24 वर्षो से गुजरात की सत्ता से बाहर है 19 वर्षो से ओड़िसा में कांग्रेस की सरकार बनी नहीं। 15 वर्षो से मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सरकार नहीं है। छत्तीसगढ़ में 15 वर्षो बाद उसकी सरकार बनी। महाराष्ट्र और असम उसका गढ़ माना जाता था,वो भी हाथ से निकल गया है। इन सबकी वजह है कांग्रेसियों में 36 का रिश्ता होना।
 
   

 

आदिवासियों पर नजरे इनायत

           




  
बरसों से उपक्षित आदिवासी इस समय राजनीति के केन्द्र में है। इसलिए कि विधान सभा की 47 और लोकसभा की 6 सीटें आरक्षित हैं। केन्द्र सरकार आदिवासियों को रिझाने दो सौ करोड़ रुपए से जनजातीय नायकों की स्मृतियांँ संजोने संग्राहलय बनायेगी। कांग्रेस आदिवासियों में अपना जनाधार बचाने के लिए जूझ रही है, तो भाजपा उसे झपटने के लिए जाल बुन रही है।
0 रमेश कुमार ‘रिपु’
            जबलपुर में 18 सितम्बर को केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने ऐलान किया कि केन्द्र सरकार ने आदिवासी नेताओं के सम्मान में देश भर में 200 करोड़ रुपए की लागत से नौ संग्राहलय बनवायेगी,जिनमें एक मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा में होगा। यह संग्रहालय शंकर और रघुनाथ शाह पर केन्द्रित होगा। प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष वी.डी.शर्मा कहते हंैं,हमारी सरकार आदिवासियों के उत्थान के लिए प्रतिबद्ध है। उन्हें समाज की मुख्यधारा में लाना चाहते हैं। हमारी सरकार आदिवासियों के नायकों के इतिहास से सबको परिचति कराने के लिए संग्राहलय बनाने कदम उठाया है।’’ 
केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह अपनी इस घोंषिणा के जरिए मध्यप्रदेश ही नहीं, देश भर के आदिवासियों को रिझाना चाहते हैं। क्यों कि मध्यप्रदेश में करीब दो करोड़ जनजातीय आबादी है। यानी राज्य की कुल आबादी में इनकी हिस्सेदारी करीबन 21 फीसदी है। राजनीतिक नजरिये से देखें तो प्रदेश की 230 विधान सीटों में से 47 सीटें अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए आरक्षित है। वहीं लोकसभा की 29 सीटों में छह सीट अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित है।
दरअसल 2013 के चुनाव में बीजेपी को 47 सीट में 30 सीटें मिली थीा। और उसकी सरकार बनी थी। लेकिन 2018 के चुनाव में कांग्रेस ने अनुसूचित जनजाति के लोगों को विश्वास दिलाया, कि उनका हित सिर्फ कांग्रेस सरकार में ही है। और कांग्रेस को 47 में 30 सीटें मिलने से बाजी पलट गई। कांग्रेस की सरकार बन गई। यह अलग बात है कि कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया की सियासी लड़ाई में कांग्रेस की सरकार धड़ाम हो गई। शिवराज सिंह पुनः मुख्यमंत्री बन गए। भविष्य की राजनीति को ध्यान में रखकर  राष्ट्रीय नेतृत्व ने आदिवासियों को साधने के लिए घोंषणा की,ताकि आदिवासी वोटर छिटकें नहीं,और बीजेपी को मिलने वाली सीटों का नुकसान न हो।
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान ने एस.टी वोटरों को रिझाने की दिशा में राज्य में पेसा पंचायत अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार कानून 1996  लागू करने की घोषणा की। राज्य के आदिवासी बहुल 89 विकासखंडों के करीब 24 लाख परिवार जहाँं उचित मूल्य की दुकानें नहीं हैं,उन्हें साप्ताहिक हाटों से राशन उपलब्ध कराया जायेगा। स्थानीय लोगों से गाड़ियाँं 26000 रुपये प्रति माह की दर पर किराये पर ली जाएंगी। साथ ही छिंदवाड़ा विश्वविद्यालय का नाम राजा शंकरशाह के नाम पर रखा जाएगा। बिरसा मुंडा जयंती को जनजातीय गौरव दिवस के रूप में मनाया जायेगा। यह घोंषणा पार्टी के नफे नुकसान को ध्यान मे ंरखकर किया गया है।  
प्रदेश में एस.टी की तीन सीटों पर हो रहे उपचुनाव के मद्देनजर ऐसे मुद्दे अधिक मायने रखते हैं। सरकार आदिवासियों को लुभाने ऐसी घोंषणा की है। वहीं मुख्यमंत्री शिवराज सिह चैहान ने अनुसूचित क्षेत्रों में ग्रामसभाओं को अधिक स्वायतता देने के लिए एक नई पहल की है। अब आदिवासी गैर लकड़ी वन उपज से आय का एक प्रतिशत अपने पास रख सकेंगे साथ ही छोटे मोटे विवाद का निपटारा खुद ही कर सकेंगे। अनुसूचित क्षेत्रों तक पंचायत का विस्तार सरकार करना चाहती है। गत फरवरी में राज्य सरकार ने राज्य के आदिवासी संस्थान,आदिम जाति कल्याण विभाग,पंचायत एंव ग्रामीण कल्याण विभाग और वन विभाग के सदस्यों की एक कमेटी गठित की है। ये सभी अनुसूचित क्षेत्र में रहने वालों के हितों का ध्यान रखेंगे।
पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ कहते हैं, शिवराज सिंह चैहान घोंषणा करने में माहिर हैं। अपने 16 साल के कार्यकाल में 16 हजार से भी अधिक घोंषणाएं कर चुके हैं। जमीन पर उनकी घोंषणाएं दिखती नहीं। प्रदेश की जनता को घोंषणा नहीं काम चाहिए। आदिवासियों का हित हो हम भी चाहते हैं,लेकिन मुझे नहीं लगता कि उनकी यह घोंषणा भी पूरी हो सकेगी।’’
सूत्रों का कहना है,राज्य की नौकरशाही मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान की इस घोंषणा के पक्ष में नहीं है। क्यों कि राज्य के खजाने पर सीधे बोझ पड़ेगा। राज्य मंें करीब 12000- 15000 करोड़ रुपए की गैर लकड़ी वनोपज होती है। गैर लकड़ी वनोपज में तेंदूपत्ता भी शामिल है। यदि इसे ग्राम सभा के हवाले कर दिया जायेगा तो सरकार को सीधे भारी राजस्व घाटा होगा। फिर सियासी सरंक्षण देना भी कठिन हो जाएगा। हर बरस सरकार वेतन और बोनस देती है,वो कहां से लाएगी। इस दिशा में कुछ भी नहीं सोचा गया है।   
गौरतलब है कि मध्यप्रदेश में पेसा कानून का पालन पूरी तरह नहीं किया जाता है। भूमि अधिग्रहण,जल निकायों से संबंधित प्रबंधन लागू हैं। लेकिन वन विभाग के कानून की वजह से टकराव होने पर पेसा कानून कमजोर पड़ जाता है। यानी मध्यप्रदेश में पेसा कानून को अधिक मजबूत बनाने के नियम बनाने हैं। ताकि पेसा कानून की खिलाफत करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जा सके। पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिह राहुल कहते हैं,‘‘प्रदेश में बीजेपी की सरकार 15 सालों तक रही फिर भी पेसा कानून लागू क्यों नहीं हुआ,जनता को बताना चाहिए। केवल घोंषणाओं से कुछ नहीं होता।’’
दरअसल 2018 के विधान सभा चुनाव में आदिवासी क्षेत्रों में बीजेपी का जनाधार खिसक गया था। आदिवासी क्षेत्रों में जनाधार वापस पाने के लिए बीजेपी का आदिवासियों के प्रति मोह जाग गया है। जय आदिवासी युवा शक्ति (जेएवाइएस) और पुनरूत्थान वादी गोंडवाना गणतंत्र पार्टी(जीजीपी) जैसी आदिवासी इकाइयांें की वजह से बीजेपी को डर है कि वह अपनी राजनीतिक जमीन खो देगी। क्यों कि जेएवाइएस पश्चिमी मध्यप्रदेश में एक शक्तिशाली राजनीतिक पार्टी के रूप में अपनी जमीन तैयार की है। बीजेपी की नजर पूर्वी मध्यप्रदेश और महाकौशल में अपनी आदिवासी राजनीतिक जमीन को वापस पाना चाहती है। बीजेपी की नजर में जेएवाइएस कांग्रेस की टीम है। जेएवाइएस के सदस्य डाॅ हीरालाल अलावा ने कांग्रेस की टिकट पर 2018 के चुनाव में धार जिले के मनावर सीट जीते थे। वहीं कांग्रेस जीजीपी को बीजेपी की बी टीम मानती है।
जय आदिवासी युवा शक्ति संगठन के नेता हीरालाल अलावा ने कहा,वोटों का खिसकना 15 साल के बीजेपी के लंबे शासन के खिलाफ आदिवासी मतदाताओं के गुस्से को दिखाता है। जिसने आदिवासियों को सिर्फ वोटों के लिए दबाया और शोषण किया। इस सरकार ने व्यापारियों को उनकी वन भूमि बेच दी।  
गौरतलब है कि 15-20 साल पहले की तुलना में आदिवासी मतदाता अब अपने अधिकारों को लेकर अधिक जागरूक हैं। गोंडवाना गणतंत्र पार्टी का गठन 16 साल पहले आदिवासियों को उनकी पहचान दिलाने किया गया था। ये पार्टी गोंड मतदाताओं के बीच काफी प्रभावशाली है। पिछले विधानसभा चुनावों में मालवा क्षेत्र में भील आदिवासी नेतृत्व का उदय हुआ। जय आदिवासी युवा शक्ति जेएवाईएस का गठन हुआ। जीजीपी और जेएवाईएस के अस्तित्व में आने से पहले पारंपरिक पार्टियाँ मौजूद थीं। हाल के वर्षों में आदिवासी लोगों ने नीतिगत मतदान के विपरीत सामान्य तौर पर सामूहिक रूप से मतदान किया।
मध्य प्रदेश की कुल 29 संसदीय सीटों में से आदिवासी समूह शहडोल,मंडला, धार,रतलाम, खरगोन और बेतूल सहित कम से कम छह सीटों पर बेहद प्रभाव डालते हैं, जो अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित हैं। इन सीटों के अलावा वे कई अन्य सीटों जैसे, बालाघाट, छिंदवाड़ा और खंडवा जैसी सीटों पर भी परिणामों को प्रभावित कर सकते हैं। जीजीपी के अमन सिंह पोर्ते कहते हैं,लोग दिन प्रति दिन जागरुक होते जा रहे हैं। यह महत्वपूर्ण है कि हमारा आंदोलन रंग ला रहा है।’’
बहरहाल पिछले कुछ माह से कांग्रेस प्रदेश में आदिवासियों पर हो रहे हमलों का मुद्दा उठाती रही है। नीमच में एक आदिवासी को आठ लोगों ने मिलकर मारा, फिर गाड़ी में बांधकर उसे खींचा। जिससे उसकी मौत हो गई। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के मुताबिक आदिवासियों के खिलाफ अत्याचारों में 25 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। 2020 में 2401 मामले दर्ज हुए, जबकि 2019 में 1922 मामले दर्ज हुए। सच यह है कि राजनीतिक दलों को आदिवासियों के कल्याण और हितों की चिंता है,तो चुनावी नफा-नुकसान को नजर अंदाज करके आगे आना चाहिए।
 

 

Tuesday, October 12, 2021

अलग बुनावट की कथा..



नये दौर के मिजाज की कहानी है ‘बलम कलकत्ता’। इसलिए वैचारिक विमर्श के साथ स्त्री विमर्श की गुनगुनी धूप स्पर्श करती हैं। गीताश्री की पन्द्रह कहानियों का यह संग्रह औरत की दुनिया की हर दहलीज से ताअरूफ कराती है। कहानियों के मुताबिक आधी दुनिया में इश्क़,मुहब्बत,सेक्स,चाहत और बेवफाई की तहरीरें बदली नहीं है। यानी स्त्री की सारी समस्या का हल,सिर्फ पुरूषों के पास है। कहानी के किरदार नैतिकतावादी लिहाफ से दूर हैं। क्यों कि कहानी के किरदार महानगर के घरों से निकलते हैं। हर कथा की बुनावट अलग किस्म की है। इस वजह से कहानी के जूड़े में सवालों के बेशुमार फूल भी हैं।
संग्रह की तीन कहानियों का मजमूं एक ही है। भंगिमा और तासीर अलहदा है।‘‘अदृश्य पंखों वाली लड़की’’ में लेखिका युवा मन को शादी से पहले लीव इन रिलेशन में रहने के लिए प्रेरित करती हैं। ताकि शादी से पहले लड़का और लड़की एक दूसरे को जान लें। एक नई संस्कृति को जन्म देती है यह कहानी। लेखिका के मुताबिक औरत का वजूद रासायनिक पदार्थ है,जो पुरूष से मिलकर ही अपने को बदल सकती है। सवाल यह है, ऐसा जीवन जीने वाली औरतें फिर यह क्यों कहती हैं,कि पुरूष प्रेम नहीं,सिर्फ सेक्स चाहते हैं?
‘‘जैसे बनजारे का घर’ के मुताबिक आँखों के रास्ते से दिल तक पहुँचने के लिए लीव इन में रहना उम्दा तरीका है।‘‘मन बंधा हुआ है और जाल में नहीं हूँ’’ कहानी में एक सीख है। आॅफिस में पुरूषों के संग काम करने वाली लड़कियांँ लीव इन में रहने के दौरान अपने प्यार को बचाने के लिए शक की हवा को जिन्दगी में आने न दें। तीनों कहानियों के संवाद में कशिश है। रोमानियत है। भाषा चिरौंजी सी मुलायम और महुए सी नशीली है।
‘‘उनकी महफिल से हम उठ तो आए’भावनात्मक कहानी है। मांँ का मन बदल जाने पर घर परिवार को भी बदलना पड़ता है। तेजाब से जली एक लड़की में मांँ को अपनी बेटी का अक्स नजर आने पर वह उसे अपना बहू मान लेती है। इस कहानी का शीर्षक कुछ और होना चाहिए था।‘‘ बाबूजी का बक्सा और गुनाहों का इन बाॅक्स’’कहानी में प्रवाह है, मगर अस्पष्ट है। सातवे दशक की बेबस और वेदना से भरी औरत की कहानी है ‘बलम कलकत्ता पहुंच गए ना’। अब ऐसी औरतें कहीं नहीं दिखती।
महानगरों में औरत और मर्द के बीच बनते और बिगड़ते रिश्ते के बीच सोहानी हवा के झोके की तरह‘‘वो’’का आना एक आम बात है। कई बार जिन्दगी में बड़ें रोमांचक हादसे होते हैं,खासकर प्यार को लेकर। जो कहते हैं,मुझे कभी इश्क नहीं हो सकता। बरसों बाद जब वो अपने साथी से मिलते हैं,तो मन अनायास उसकी ओर झुकने लगता है। वक़्त और परिस्थितियांँ आदमी को बदल देती है,'सोलो ट्रेवलर’यही एहसास दिलाता है। ‘‘उदास पानी में हंँसी की परछाइयांँ’’ कथा में समझदार औरतें अपने रिश्ते से खुश नहीं होने के बाद भी जल्दी अपना रिश्ता खत्म करने की नहीं सोचतीं। कोई दूसरा हाथ बढ़ाए तो भी। किसी का साथ भले उदास पानी में हंँसी परछाई सी क्यों न हो। किसी को अपना बनाना है तो उसकी पसंद को जानें और उसे पूरा करने की कोशिश करें। देखना एक दिन वो तुम्हारा हो जाएगा,‘एक तरफ उसका घर’ कहानी यही कहती है।
औरत और पुरूषों के बीच संबंधों की नई बुनावट को जानने और समझने की चाह रखने वालों के लिए ‘बलम कलकत्ता’ कथा शिल्प के स्तर से अच्छी है। वहीं प्रूफ की गलतियांँ, खीर में कंकड़ सी हैं।
किताब - बलम कलकत्ता
लेखिका - गीताश्री
प्रकाशक - प्रलेक प्रकाशन,मुंबई
@ रमेश कुमार "रिपु"

 

Saturday, September 11, 2021

राजेन्द्र की सियासत का बी प्लान



🍙रीवा में बीजेपी ओबीसी प्रत्याशी देगी
🍙जनार्दन सेमरिया से चुनाव लड़ेंगे
🍙राजेन्द्र की टिकट फंस गई

रीवा। राजेन्द्र शुक्ला अभी से अपनी सियासत के बी प्लान को अंजाम देने में जुट गये हैं। बीजेपी चूंकि ओबीसी को तरजीह देने की सियासत में लगी है। ऐसी स्थिति में राजेन्द्र जानते हैं, अगली दफा रीवा विधान सभा से उन्हें टिकट नहीं मिलेगी। वोटर की संख्या के अनुसार रीवा में अगले विधान सभा चुनाव तक ओबीसी यानी मुस्लिम वोटरों की संख्या 27 हजार हो जाएगी। जाहिर है कि रीवा से मुस्लिम दावेदार खड़े होंगे। पटेल उम्मीदवार अभी से तैयारी कर रहे हैं। राजेन्द्र लोकसभा चुनाव लड़ने की चर्चा गत माह संघ के एक पदाधिकारी से की है।(जो कि मेरे मित्र हैं)। वे चाहते हैं कि सेमरिया विधान सभा से जनार्दन चुनाव लड़ें।

राजेन्द्र शुक्ला इस समय अपनी सुरक्षित सीट के लिए गुणा भाग करने में लगे हैं। गत माह वे सघ के एक पदाधिकारी से मिले। उन्हें अपनी सियासत का बी प्लान बताया। उनके अनुसार जनार्दन मिश्रा को सेमरिया विधान सभा से चुनाव लड़ा दिया जाए। यदि जीत गये तो ठीक। हारने पर उनका लोकसभा का दावा कट जायेगा। जो व्यक्ति विधान सभा चुनाव नहीं जीत सका, वो लोकसभा चुनाव कैसे जीत सकता है!

🍙अजय अभी से तैयारी में
रीवा में बीजेपी अध्यक्ष अजय सिंह पटेल हैं। जो कि राजेन्द्र की पसंद के नहीं है। राजेन्द्र अपनी पूरी ताकत लगा दिये थे, कि अजय सिंह पटेल बीजेपी के जिला अध्यक्ष न  बनें। वे जानते हैं अजय उनकी सियासत की राह में कंटक हैं। वे रीवा विधान सभा चुनाव लड़ने की अपनी गोटी अभी से बिछाने लगे हैं। विधान सभा नहीं तो लोकसभा की टिकट चाहिए ही। ऐसे में राजेन्द्र और जनार्दन दोनों की राह में अजय सबसे बड़े कंटक हैं। जर्नादन को हटाने सिंधियों ने राजेन्द्र को सलाह दी है। समदड़िया इस बार उनके चुनाव का सारा मैनेेजमेंट देखेगा। जनार्दन अपनी सीट कैसे बचायेंगे,उनकी सियासत भी नहीं जानती। वैसे जनार्दन अभी तक राजेन्द्र को बड़ा महत्व देते आये हैं। लेकिन राजेन्द्र कभी भी उन्हें तरजीह नहीं दिये। यानी अगले चुनाव तक राजेन्द्र और जनार्दन में 63 नहीं 36 का सियासी रिश्ता बन जायेगा।

🍙बस कुछ दिन और..
रीवा विधान सभा पर सबकी नजर है। बीजेपी के कई विधायक और नेता राजेन्द्र की राजनीति को  खत्म करने का जाल बुनने लगे हैं। नरोत्तम मिश्रा वैसे भी राजेन्द्र को पसंद नहीं करते। वे उनकी राजनीति को खत्म करने के लिए ही गिरीश गौतम को विधान सभा अध्यक्ष बनाने में अपनी हर कोशिश को अंजाम दिया। जब तक शिवराज हैं, तभी तक राजेन्द्र बिना मंत्री के मंत्री की भूमिका का शो चला रहे हैं। वैसे शिवराज का हटना सौ फीसदी तय है।

🍙प्रदीप कंटक बनेंगे राजेन्द्र के
सबसे बड़ा सवाल यह है कि राजेन्द्र रीवा छोड़ेंगे या फिर कोई दूसरा विधान सभा तलाशेंगे। मऊगंज के अलावा उनके पास कोई विकल्प नहीं है। प्रदीप सिंह पटेल के बीजेपी छोड़ने की ज्यादा संभावना है। सूत्रों कहना है कि वे बीएसपी से लोकसभा चुनाव लड़ेंगे। बीजेपी में आने के बाद उन्हें कुछ भी नहीं मिला,जिसकी उन्हें अपेक्षा थी। जिले में उन्हें एक ट्रांसफार्मर के लिए धरना देना और अनशन करने के बाद भी उनकी नहीं सुनी जाने से वो नाराज है। उनके समर्थक कहते हैं, कि इसके पीछे राजेन्द्र का हाथ है। लोकसभा यदि राजेन्द्र चुनाव लड़ते हैं तो उन्हें शिकस्त देने प्रदीप बीएसपी से चुनाव लड़ेगे। वैसे भी प्रदीप इसके पहले बीएसपी के संभागीय संगठन मंत्री रह चुके हैं।
बहरहाल राजेन्द्र की सियासत का प्लान बी सामने आ जाने से एक नई सियासी रणनीति भी बनने लगी है। शेष अगली बार। 
@रमेश कुमार "रिपु"

 

हाथ से नहीं फिसली सत्ता’’






सियासत की जमीं पर आशंकाओं की उड़ती धूल के बैठते ही एक बात साफ हो गई, कि पाँच राज्यों के चुनाव होने तक भूपेश बघेल के हाथ में ही सत्ता की कमान रहेगी। वे राजनीति में अर्द्धविराम साबित नहीं होंगे।
0 रमेश तिवारी ‘रिपु’
छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सियासी टेबल पर ढाई साल बीतते ही ‘‘पंजा’’ लड़ाने की सियासत अचानक तेज हो गई। जून में मुख्यमंत्री बदलने की हवा चली। लेकिन परिवर्तन की हवा में तब्दील नहीं हुई। फिर अगस्त-सितम्बर में टी.एस सिंह देव ने परिवर्तन की बात कहकर कांगे्रस में खलबली मचा दिये। दस जनपथ इसके लिए तैयार नहीं हुआ। और इसी के साथ मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की सत्ताई सियासत अल्पविराम साबित नहीं हुई। यह अलग बात है कि उनके हाथ से सत्ता की डोर खींचने की सियासत रायपुर से दिल्ली तक दौड़ धूप करने वालों की भारी भद्द हुई।
टी.एस सिंह देव के सलाहकार उन्हें यह बात नहीं समझा सके, कि राजनीति में कोई भी वायदा वक्त के साथ बदल जाता है। राजनीति कोई बीजगणित का सवाल नहीं है, कि सूत्र से हल होता है। छत्तीसगढ़ कांग्रेस की राजनीति राजस्थान और पंजाब के सांचे में नहीं ढलेगी। इसकी वजह यह है, कि भूपेश बघेल के साथ 70 में 52 विधायक हैं। टी.एस सिंह देव अब ज्योतिरादित्य सिंधिया की भूमिका चाहकर भी नहीं निभा सकते। यह बात भूपेश के समर्थन में दिल्ली जाने वाले विधायकों की संख्या बल ने स्पष्ट कर दिया। छत्तीसगढ़ प्रभारी पी.एल पुनिया की पहली पसंद पहले से भूपेश बघेल रहे हैं। दस जनपथ भी छत्तीसगढ़ की राजनीति पर कोई फैसला लेने से पहले पीएल पुनिया की राय को नजर अंदाज नहीं कर सका। ढाई साल की सत्ताई राजनीति में भूपेश बघेल ने संगठन से लेकर दस जनपथ और मीडिया के बीच अपनी ऐसी छाप बना ली कि उस फ्रेम में दूसरा कोई फिट होता दस जनपथ को भी नहीं दिखा।
पाँंच अन्य राज्यों में गोवा,मणिपुर,पंजाब,यूपी और उत्तराखंड होने वाले चुनाव से पहले छत्तीसगढ़ की राजनीतिक नेतृत्च को दस जनपथ के बदल देने से विपक्ष को मुद्दा मिल जाता और  चुनावी औजार भी। चूंकि केन्द्र सरकार इस समय ओबीसी की राजनीति को हवा दिये हुए है। भूपेश बघेल ओबीसी नेता हैं। जाहिर सी बात है कि दस जनपथ ओबीसी नेता भूपेश बघेल के हाथ से सत्ता का हस्तांतरण सवर्ण के हाथ में करने की भूल नहीं करेगा। वैसे भी संगठन में निगम मंडल में सारे लोग भूपेश के समर्थक हैं। ऐसे में बाबा ये सोच कैसे लिए कि दस जनपथ और विधायक उन्हें मुख्यमंत्री बनाने की वकालत करेंगे!

ढाई साल में भूपेश बघेल ने न केवल राज्य में काम किये बल्कि कांग्रेस के संगठन और निगम मंडल पर अपने लोगों को बिठाकर अपनी ताकत बढ़ाई। बाबा बीच- बीच में सरकार पर चोट करने वाले बयान देकर भूपेश बघेल को परेशान करने की कोशिश किए। उसके बदले में उन्हें राजनीतिक नुकसान भी उठाना पड़ा। जिसकी सत्ता होती है,उसके आईने में पत्थर फेकने वालों को आईने की खरोच तो मिलेगी ही। बाबा काग्रेस के वरिष्ठ नेता हैं लेकिन, ढाई साल की सत्ता में वो विधायकों को अपना नहीं बना सके।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि अब बाबा क्या करेंगे? उनकी राजनीति का स्वास्थ्य ठीक रहेगा कि नहीं? मुख्य मंत्री क्या उन्हें और बाएं करेंगे? बाबा कब तक चुप रहेंगे? क्या पांच राज्यों के चुनाव के बाद बाबा फिर दस जनपथ की दौड़ लगायेंगे? हर राजनीतिक व्यक्ति की महत्वाकांक्षा होती है। बाबा भी अपने नाम के साथ मुख्यमंत्री नाम की चाह रखते हैं। हो सकता है कि पांच राज्यों के चुनाव के बाद बाबा को राष्ट्रीय महासचिव या फिर किसी राज्य का प्रभारी बना दिया जाये। बहरहाल,भूपेश की सत्ताई राजनीति की शाम नहीं हुई।