Sunday, June 16, 2019

अमीर धरती,गरीब लोग

 
       अमीर धरती,गरीब लोग
छत्तीसगढ़ की धरती में कीमती रत्नों का भंडार है। बावजूद इसके यहां का अदिवासी गरीब और बेहाल है। सरकार आदिवासियों को उजाड़कर उनकी जमीन पर कब्जा कर ली। लेकिन रत्नों से लदी इस धरती की हिफाजत नहीं कर पा रही है। पायलीखंड की हीरा खदान और बेहराडीह,कोदोमाली से सरकार की तिजोरी तो नहीं भरी लेकिन,तस्करों की चांदी है।

0 रमेश कुमार ‘‘रिपु‘‘
                                
प्यारे सिंह बताते हैं अलेक्जेन्ड्राइट उनकी जिन्दगी के लिए अभिशाप बन गया। जमीन का पट्टा होने के बाद भी खेती नहीं कर सकते थे। एक दिन कुछ अफसर आए और बोले तुम्हारे जमीन में अरबों रूपए का पत्थर है,जमीन सरकार को दे दो। तुम दोनों भाइयों को खदान की रखवाली के लिए चैकीदार बना देंगे। जमीन तुम्हें अब नहंीं मिलेगी, इसलिए 12 हजार रूपए रख लो। कुछ दिनों तक खदान का गार्ड बनाने के बाद हटा दिए। एक फूटी कौड़ी भी नहीं दिए। अरबों की जमीन से प्यारे सिंह खदेड़ दिए गए और अब फिर रहे हैं मारे मारे। जमीन भी गई और दो वक्त की रोटी भी छिन गई।
हीरा ले लो,रहने को जमीन दे दो
नैन सिंह नेताम के खेत में हीरे तो निकले लेकिन इनकी जिन्दगी मंे केवल दर्द ही दर्द हंै। कुरेदने पर बताते हैं, बचपन में एक दिन दादी ने कहा था कि अपने खेत में सोना नहीं, हीरा है। यह हीरा हमें हर लिया। कहीं का नहीं छोड़ा। हमारी खड़ी फसल को बड़ी बेरहमी से काट दिया गया। अफसर बोले,यहां फिर दिखे तो तुम्हारी टांगे तोड़ देंगे। बाहरी लोगांे का तो बाल बांका तक नहीं हुआ। हमारे खेत की मिट्टी  भर कर ट्रकों से ले गए। वे ऐश कर रहे हैं। नैन सिंह नेताम घने जंगल के बीच पायलीखंड के उस हीरे की भंडार की मालिक है जिसे तस्कर लूट कर ले गए। नैन सिंह के साथ ज्यादती करने वाली सरकार को हीरा का एक टुकड़ा भी नहीं मिला। नैन सिंह अब बड़े किसानों के यहां मजदूरी करते हैं। आज भी छोटी सी झोपड़ी में रहती हैं। नैन सिंह की मां कहती हैं कि खेत को ऐसा खोदा कि किसी काम का नहीं रह गया है। हमें पैसा नहीं चाहिए,बस जमीन का कहीं टुकड़ा दे दें ताकि बेटा,बहू को कहीं आसरा मिल जाए सिर छुपाने को।
प्यारे सिंह और नैन सिंह की इस कहानी में छत्तीसगढ़ के मैनपुर-देवभोग इलाके के लोगों के दर्द के साथ  विडंबना छिपी है। इस इलाके के लोगों की जिन्दगी में खुशियों की बहार नहीं आ सकी क्यों कि सरकार ने इस दिशा में कोई स्पष्ट योजना नहीं बना सकी। यही वजह है कि इस संपदा पर तस्करों की गिद्ध नजर गड़ी हुई है। जमीनों की अवैध खुदाई कर भारी मुनाफा अपनी जेबों भर रहे हैं और गांव वालों को नाम मात्र की मजूदरी देते आ रहे हैं। इसके चलते उपेक्षा,हताशा और शोषण की तस्वीर से निजात इस क्षेत्र को नहीं मिल पा रहा है।
ऐसे हुई तस्करी की दस्तक
देवभोग के गांव लाटापारा जहां रक्तमणि(गारनेट) का भंडार है। यहां के लोग अजनबी चेहरोें को शक की निगाहों से देखते हैं। इस गांव के देवानंद कश्यप,रामधनी और भानुमति,दुलारी कहती हैं,‘‘सरकार ठीक से काम करती तो गांव के बहुत से लोग सिर्फ गारनेट बेचकर ही अपनी गरीबी दूर कर लेते। लोगों को जंगल के कंद मूल खाने की नौबत नहीं आती। यहां के लोगों से मिलने के बाद पायलीखंड गांव की ओर रवाना हुआ। गौरतलब है कि कौटिल्य के अर्थशास्त्र के आधार पर भूगर्भ शास्त्री टी.एल.वाकर ने 1900 में एक सर्वे किया था। उनके अनुसार यहां हीरे के अलावा अन्य रत्नों के भंडार की संभावना है। वाकर के बाद ओड़िसा राज्य के प्रसिद्ध भूवैज्ञानिक विश्वनाथ ने भी इन्द्रावन क्षेत्र में फैले रत्न भंडार पर एक रिपोर्ट तैयार की थी। ऐसा कहा जाता है कि 1986-89 के बीच उनकी रिपोर्ट की नकल कीमती पत्थरों के सौदागरों ने हासिल कर ली थी। उसके बाद ही इलाके में तस्करी क शुरूआत हुई। पायलीखंड ऐसा इलाका है जहां हीरे की चाह में दूर से लोग खींचे चले आते हैं। जांगड़ा गांव से होकर पायलीखंड पहुंचना पड़ता है। इन्द्रावन यहां की प्रमुख नदी है। इसे पार करने के बाद खदान तक पहुंचा जा सकता है।
सुरक्षा भगवान भरोसे
हीरा खदान की सुरक्षा सन् 2009 तक पुलिस के जवानों ने की। एक दिन यह खबर फैली कि नक्सली इधर आ रहे हैं। पुलिस बल इसलिए हटा लिया गया कि कहीं वे हथियार न लूट लें। गांव के लोगों का कहना है कि यह सब साजिश थी,ताकि अवैध खनन किया जा सके। छह वर्ष पहले हीरा खदान में 50 हेक्टेयर क्षेत्र को कटीले तारों से घेरा गया था। अब कटीले तार नहीं दिखते। संरक्षित क्षेत्र में कोई भी आ जा सकता है। खनिज विभाग के पास फंड नहीं होने की वजह से कटीले तार दोबार नहीं लगाया गया।     गरियाबंद जिले में पायलीखंड के अलावा बेहराडीह,कोदोमाली में भी हीरे मिलने की वजह से जगह जगह सैकड़ों की तादाद में गड्ढे बन गए है। 
इस तरह हुआ सर्वे
गरियाबंद और देवभोग में रत्न भंडार के सर्वे के लिए वैज्ञानिकों की एक टीम बनी। भौमिक एवं खनिज कर्म संचालनालय के भू वैज्ञानिक दत्ता माईणकर, जयंत कुमार पसीने,दिनेश वर्मा,विजय कुमार सक्सेना,संजय खरे, पी.के.पदमवार, हरविंदर पाल और आर.आर.विसेन ने दो वर्षो में सर्वे कर पता लगाया कि किन किन क्षेत्रों मंे कीमती रत्न हैं। इन वैज्ञानिकों ने मैनपुर ब्लाक के बेहराडीह, कोसममुरा, कोदोमाली, पायलीखंड, जांगड़ा, बाजीघाट और बस्तर क्षेत्र में तोकापाल,भेजीपदर में किंबरलाइट मिलने की पुष्टि की। ज्यादातर पहले हीरा मिलता है,उसके बाद किंबरलाइट चट्टान लेकिन, कभी कभी पहले किंबरलाइट चट्टान उसके बाद हीरा मिलता है।
हीरे की निविदा पर राजनीतिक ग्रहण    (फोटो दिग्गी राजा और अजीत जोगी की बाॅक्स में मैटर)
छत्तीसगढ़ में हीरा मिलने की पुष्टि होने के बाद मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्गविजय सिंह ने 1992  में निविदा आमंत्रित की। दिग्गी राजा ने डी-बियर्स कंपनी को मंजूरी दे दी। प्रोस्पेक्टिंग लायसेंस (पीएल)   के लिए केन्द्र की देवगौड़ा सरकार को पत्र भेज दिया गया। इस बीच कांग्रेस नेता अजीत जोगी ने मुख्यमंत्री दिग्गी राजा पर 50 करोड़ की रिश्वत लेने का आरोप लगाया और इसकी शिकायत सोनिया गांधी से की। आरोपों के साक्ष्य के बतौर अजीत जोगी ने कहा,‘‘डी बियर्स के निमंत्रण पर दिग्विजय सिंह,प्रदेश के तत्कालीन सचिव शरदचंन्द्र बेहार, खनिज सचिव एस. लक्ष्मीकृष्णन के साथ दक्षिण अफ्रीका के प्रवास पर गए हुए थे। इस प्रवास का पूरा खर्चा कंपनी ने उठाया है। हीरा खनन पर राजनीति होने से अनुबंध समाप्त कर दिया गया। 12 मार्च 1998 को एक बार फिर निविदा निकाली गई। जिसमें चार कंपनियां नेशनल मिनरल डेवलमेंट कार्पोरेशन,डी बियर्स, रियो टिंटो और बी विजय कुमार ने मैनपुर ब्लाक के  डी-7 ब्लाक के लिए निविदा भरी। बी विजय कुमार की निविदा मंजूर होने पर भाजपा सांसद रमेश बैस का अरोप था कि बगैर सर्वेक्षण के हीरों की कटिंग-पालिश का काम करने वाले ट्रेडर्स को काम दिया गया है। इसके अलावा यह भी आरोप लगा कि जिन खदानों का ठेका मंजूर किया गया है वहां सिर्फ हीरा ही नहीं अन्य कीमती धातुएं जैसे कोरडंम,गारनेट,स्पाटिक आदि मिलती हैं। इस मामले पर सरकार और बी विजय कुमार के बीच कोई अनुबंध नहीं हुआ कि आखिर इसका लाभ किसे मिलेगा। केन्द्र से सन् 2000 में प्रोस्पेक्ंिटग लायसेंस बी. विजय कुमार को मिल गया। छत्तीसगढ़ राज्य इसी वर्ष बनने पर अजीत जोगी मुख्यमंत्री बने। कंपनी को प्रदेश के खनिज विभाग ने क्षेत्र के सर्वे में गफलतबाजी करने आरोप लगाकर नोटिस थमा दिया। बी.विजय कुमार को लगा कि हाथ से काम छिन जाएगा तो उन्होंने बिलासपुर हाई कोर्ट में मामला दायर किया। 2008 से यह मामला दिल्ली ट्रिब्यूनल मिनिस्ट्री आफ माइंस के पास विचाराधीन है। वहीं मुख्यमंत्री डाॅ रमन सिंह कहते हैं,खदान के बारे में किसी भी तरह का निर्णय लेने के पहले फैसला तो देखना ही पड़ेगा‘‘।
तस्करों को खुली आजादी
पायलीखंड अब भी लोग आते हैं हीरे की तलाश में। चैकाने वाली बात है कि खदान में सुरक्षा के नाम पर सीमेंट की दो जर्जर खंभे हैं,जबकि दूसरा गेट टूटा हुआ है। हीरा निकालने के लिए कोई भी तस्कर खदान में आ जा सकता है। उसकी किस्मत में हीरा है तो आसनी से मिल जाएगा। बारिश में इन्द्रावती नदी में बाढ़ आ जाने से गांव कट जाता है। जिससे पुलिस की पहुंच से यह गांव दूर हो जाता है। जिला खनिज अधिकारी एस.के.मारवा कहते हैं,‘‘1991 के सर्वेक्षण में यहां 3 हजार कैरेट के हीरे की संभावना जताई गई थी। कुछ प्रशासनिक कारणों की वजह से खुदाई का मामला आगे नहीं बढ़ सका। ओड़िसा सीमा पर बसा वन ग्राम पायलखंडी और सेदमुड़ा दोनों स्थानों पर दुलर्भ कीमती रत्न अलेक्जेंड्राइट मिलता है। यह क्षेत्र पर्वतों से घिरा हुआ है। रेल मार्ग यहां नहीं है। मैनपुर ब्लाक में पायलखंडी और सेंदमूड़ा देवभोग ब्लाॅक में आता है। मैनपुर में उच्च कोटि के सागौन के जंगल हैं,जबकि देवभोग चावल के लिए प्रसिद्ध है।
गांव की तस्वीर नहीं बदली
सेंदमुड़ा की धरती में अलेक्टजेंड्राइट पत्थर होने की जानकारी मिली तो तस्करों का काफिला आने लगा। सरकार ने भी लोगों की जमीन छीन ली लेकिन इस गांव की तकदीर नहंीं बदली। खनिज विभाग के सेवा निवृत क्षेत्रीय अधिकारी एन.के चद्राकर कहते हैं,1987 में यहां कीमती पत्थर अलेक्टजेंड्राइट के होने की पुष्टि हुई थी। 1992 मंे इस पूरे क्षेत्र को पुलिस कस्टडी में लेकर मध्यप्रदेश खनिज विभाग को सौंप दिया गया। देवभोग जनपद उपाध्यक्ष देशबंधु नायक कहते हैं,‘‘खनिज विभाग के अधीन होने की वजह से पहले पांच साल तक यहां अवैध खनन होता रहा। 1992 में विभाग की देख रेख में उत्खनन का काम शुरू हुआ। कितने पत्थर निकाले और कितना बताए, कोई नहीं जानता। गांव वाले नहीं जानते कि इस पत्थर की क्या उपयोगिता है,कितना कीमती है। इसलिए गांव वालों को इसका कोई फायदा नहीं हुआ।
खनन पर रोक लगी
केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के निर्देश पर 20 फरवरी 2009 को उदंती-सीतानदी अभ्यारण्य को टाइगर रिजर्व का दर्जा दिया गया है। 851 वर्ग किलोमीटर कोर जोन है। पायलीखंड की हीरा खदान भी इसी जोन के तहत आती है। वन्य जीव कानून के तहत टाइगर की सुरक्षा को देखते हुए मंत्रालय ने खनन पर रोक लगा दी है। जबकि यहां का हीरा पन्ना की तरह है। बावजूद इसके तस्कर यहां आते हैं। पायलखंडी में नैन सिंह के खेत की तस्वीर सब कुछ कह देती है कि तस्कर जमीन को पोला अब भी हीरे की तलाश में कर रहे हैं। हीरे के लिए पानी की जरूरत अधिक पड़ती है। तस्कर स्थानीय मजदूरों के जरिए मिट्टी खुदवाते हैं। उसके बाद उसे बोरे में भरकर साइकिल के जरिए नदी तक ले जाते हैं। मजदूर घनी जाली में मिट्टी को डालकर उसे धोते हैं। मिट्टी बह जाती है। जाली में कंकर रह जाता है। जिसे सूखाकर या फिर प्लास्टिक की चादर में फैलाकर उसे चावल की तरह बीना जाता है। सूरज की रोशनी में चमकने वाला पत्थर हीरा होता है। मजदूरों को एक हीरा तलाशने में दो से तीन सौ रूपए मिलता है।
रत्नों का अकूत भंडार
गरियाबंद के देवभोग,सरगुजा के सफा, बीजापुर के भोपालपट्टनम और जशपुर के कुनकुरी, वनखेता एवं दीवानपुर में पारदर्शी हीरा पाया जाता है। गरियाबंद जिले के पायलीखंड,जागड़ा,बेहराडीह,कोदेमाली और बाजाघाटी में हीरे की किबंरलाइट है। बस्तर के तोकापालव, भेजरीपदर और जशपुर के फरसबहार, मैनी नदी, सारंगगढ़, पिथौरा, बेहराडीह, कंाकेर-केशकाल,नारायणपुर,छोटा डोंगर,तोकापाल में भी हीरा पाया जाता है। उथली खदान होने की वजह से तस्कर इसका फायदा उठा रहे हैं। इसके अलावा प्रदेश के कई अन्य जिलों में भी रत्नों के भंडार है। बीजापुर जिले के भोपालपट्टनम में कोरन्डम (माणिक और नीलम) दबे हैं। सुकमा जिले के सोन कुकानार और गरियाबंद के केदूबाय गांव में माणिक पाए गए हैं। गरियाबंद के गोहेकला,धूप कोट,लाटापारा और केदूबाय में रक्तमणि के भंडार मिले हैं। इसके अलावा बीजापुर के कुचनुर और सरगुजा के बिशनपुर में भी इसके भंडार मिले हैं।
पांचवी सबसे बड़ी खदान!
दुनिया भर में हीरे की 22 खदाने हैं। यदि मैनपुर ब्लाक के तहत पायलीखंड की खदान शुरू होती है तो यह विश्व की पांचवा सबसे बड़ा खदान होगी। इस खदान से छत्तीसगढ़ सरकार को सालाना करीब 10 हजार करोड़ का मुनाफा हो सकता है। यह खदान 50 हेक्टेयर क्षेत्र में फैली है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि यहां साउथ आफ्रिका की खदानों जैसे ही हीरे हैं। नई राजधानी में जेम्स एंड ज्वेलरी पार्क शुरू होने से हर व्यक्ति के लाभान्वित होने की उम्मीद है। रोजगार बढ़ने से लोगों की आमदनी और लाइफस्टाइल तो बेहतर होगी हीए भारी.भरकम राजस्व से प्रदेश में डेवलपमेंट की नई तस्वीर भी उभर सकती है। दरसअल छत्तीसगढ़ सरकार पिछले वर्ष सोनाखान की नीलामी की है। इससे संभावना है कि अब जल्द ही यहां माइनिंग शुरू हो जाएगी। सोनाखान के शुरू होने पर मैनपुर के हीरा खदान को भी हरी झंडी मिलने की उम्मीद बढ़ गई है। यदि ऐसा होता है तो मैनपुर देश का इकलौता हीरा खदान बन जाएगा। यहां करीब 1 लाख कैरेट हीरा मिलने का अनुमान है।
नए बाजार की संभावनाएं
सोनाखान में सोने और पायलीखंड में हीरा खदानों की पुष्टि होने के बाद सूरत और मुंबई की तर्ज पर ही सराफा की नई इंडस्ट्रीज के लिए छत्तीसगढ़ सरकार ने नई कवायद शुरू कर दी है। छत्तीसगढ़ राज्य औद्योगिक विकास निगम सीएसआईडीसी और एक निजी कंपनी रामकी समूह के बीच एक एमओयू हुआ है। इसके तहत कंपनी 3 हजार करोड़ रुपए का निवेश कर नया रायपुर में रत्न एवं आभूषण उद्योग, हर्बल और औषधीय पार्क तथा खाद्य प्रसंस्करण पार्क बनाएगी। इसमें सबसे महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट जेम्स एंड ज्वेलरी पार्क का है। इसके लिए नया रायपुर में जमीन आवंटित कर दी गई थी लेकिन मामला अब तक ठंडा ही था। सोने के खान की नीलामी ने इस पार्क की संभावनाओं में नई जान फूंकी है।







  छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से 230 किलोमीटर दूर एक गांव सेंदमुड़ा है। आज से तीस साल पहले इस गांव में प्यारे सिंह और प्यारेलाल नाम के दो भाई रहते थे। इनके पास दो एकड़ खेत था। जिसमें धान उगाया करते थे। प्यारे सिंह को हल चलाते वक्त एक चमकीला पत्थर मिला। उसे  उलट पलट कर देखा। कुछ समझ में नहीं आया तो घर ले आए। बच्चों को खेलने के लिए दे दिया। गांव के बच्चे इसे कंचा बनाकर खेलने लगे। प्यारे सिंह को यह पता नहीं था कि जिस पत्थर को वे बच्चों को खेलने के लिए दिए हैं वह कीमती पत्थर अलेक्जेन्ड्राइट है। जो कृत्रिम रोशनी में रंग बदलता है। धीरे,धीरे इस क्षेत्र में दूसरे गांव के खेतों में भी यह पत्थर निकलने लगा। बात गांव से बाहर शहर तक पहुंची तो जौहरी आने लगे। जौहरी बच्चों को चाकलेट,बिस्कुट देकर पत्थर ले लेते थे। फिर कुछ रूपए दिए जाने लगे। धीरे,धीरे गांव वालों को भी यह बात समझ में आने लगी कि पत्थर असाधारण नहीं है। धीरे,धीरे इस पत्थर की कीमत मिलने लगी।

काठ के घोड़े पर छाॅलीवुड

            काठ के घोड़े पर छाॅलीवुड
छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद से अब तक करीब दो से अधिक फिल्में बनीं लेकिन, बाॅक्स आफिस पर गिनती की ही फिल्में धमाल मचा सकीं। सवाल यह है कि 50 करोड़ से अधिक खर्च होने के बाद भी छत्तीसगढ़ी फिल्में अन्य भाषाओं की फिल्मों की तरह क्यों नहीं चमकीं। जबकि छत्तीसगढ़ के कई कलाकर बड़े पर्दे पर जौहर बिखेर रहे हैं।

0 रमेश कुमार ‘‘रिपु‘‘





    छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद से अब तक डेढ़ सौ से अधिक फिल्में बनीं लेकिन, बाॅक्स आफिस पर गिनती की ही फिल्में धमाल मचा सकीं। सवाल यह है कि आखिर छत्तीसगढ़ी बोली की फिल्में लगातार पिट क्यों रही हैं। जबकि भोजपुरी,बंगाली और मराठी फिल्में ना केवल जल्वा बिखेर रही हैं बल्कि बाॅक्स आॅफिस पर रिकार्ड भी बना रही हैं। छत्तीसगढ़ी फिल्म निर्माता और निर्देशकों की शिकायत है कि सरकार नहीं चाहती है कि छाॅलीवुड भी चमके। यहां के कलाकार रंगीन पर्दे पर अपनी कला का जौहर बिखरते हुए छत्तीसगढ़ का नाम रौशन करें। देखा जाए तो छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद से अब तक डेढ़ सौ से भी अधिक फिल्में बन चुकी हैं। इन दिनों छाॅलीवुड बचाओ‘ की आवाज तेज हुई है। माना जा रहा है कि मल्टीप्लेक्स आने की वजह से यह उद्योग दम तोड़ने लगा है। हालांकि भाजपा और कांग्रेस दोनों ने पिछले चुनाव में अपने घोषणा पत्र में दावा किया था कि सरकार बनी तो छत्तीसगढ़ी फिल्म विकास बोर्ड का गठन किया जाएगा। छत्तीसगढ़ राज्य बने डेढ़ दशक के बाद भी इस दिशा में सरकार ने सार्थक पहल नहीं की। निर्माता निर्देशक सतीश जैन कहते हैं,‘‘ सरकार को लगता है कि फिल्म विकास बोर्ड का गठन होने के बाद लोकप्रिय कलाकारों के राजनीति में आने से वे चुनौती बन सकते हैं‘‘।
छत्तीसगढ़ी फिल्मों के प्रमुख कलाकार पद्म श्री अनुज शर्मा कहते हैं,‘‘राज्य में अब मात्र 50-60 थियेटर बचे हैं। राजधानी में कई थियेटर टूट गए। मल्टीप्लेक्स का दौर आ गया हे। मध्य छत्तीसगढ़ में ही छत्तीसगढ़ी बोली बोली जाती है। ऐसा नहीं है कि छत्तीसगढ़ी फिल्में बाॅलीवुड की फिल्मों की तरह नहीं बनती। ग्लैमर का तड़का,आइटम साॅंग,मारधाड़,ड्रामा,मधुर धुन और सुन्दर दृश्यों से छत्तीसगढ़ी फिल्में भी लदी होती हैं बावजूद इसके, निर्माता निर्देशकांे की यह शिकायत है कि छत्तीसगढ़ के लोग ही फिल्में देखने छविगृह नहीं जाते। इस वजह से छत्तीसगढ़ी फिल्में बेबस हैं बाॅक्स आॅफिस पर रिकार्ड बनाने के लिए‘‘।़ बावजूद इसके छत्तीसगढ़ बोली की कई फिल्मों ने रिकार्ड भी बनाया है। मोर छइंया भुइंया,टूरा रिक्शा वाला,बीए फस्ट ईयर, मितान 420, महूं दिवाना, तहूं दीवानी, राजा छत्तीसगढ़िया, दूलाफा डू कुछ ऐसी फिल्में हैं जिन्हें दर्शक मिले और लोगों के बीच चर्चा में भी रहीं। ऐसी स्थिति में यह कहना गलत होगा कि छत्तीसगढ़ी फिल्में लोग देखने नहीं जाते। वहीं इससे इंकार भी नहीं है कि फिल्मों को लेकर दर्शकों का नजरिया बदला है। राजधानी रायपुर में पांच दशक पहले 14 छविगृह थे आज गिनती के ही बचे हैं। छविगृह टूट कर काम्पलेक्स में तब्दील हो गए हैं। फिल्मी दर्शक कौशलेश तिवारी कहते हैं,‘‘ छत्तीसगढ़ी भाषा में फिल्में बन रही हैं,बंद नहीं होंगी। दिक्कत यह है कि छत्तीसगढ़ी फिल्मों को टाॅकीज नहीं मिल रहे हैं। श्याम,अमरदीप और प्रभात टाॅकीज में से किसी एक छविग्रृह में छत्तीसगढ़ फिल्में लगती है। जबकि सभी छविगृहों में लगनी चाहिए‘‘।
सरकार सब्सिडी देः योगेश
छत्तीसगढ़ फिल्म एसोसियेशन के पूर्व अध्यक्ष योगेश अग्रवाल कहते हैं,‘‘दरअसल ग्रामीण इलाके में छविगृह नहीं है,जबकि साउथ के हर गांव में टाॅकीजें हैं। सिनेमा हाल जिला से पंचायत स्तर तक खुलना चाहिए। सरकार से हमारा आग्रह है कि वे हमें सब्सिडी दे और टैक्स में छूट दे ताकि हमारे लोग टाॅकीज खोल सकें। फिल्म विकास बोर्ड अब बन जाने की उम्मीद है। कलाकारों से सुझाव मांगा गया है। कलाकार चाहते हैं कि उनका बीमा होना चाहिए। छत्तीसगढ़ फिल्म उद्योग में करीब पांच हजार लोगों को रोजगार मिला हुआ है। सरकार से मदद मिलने के बाद रोजगार के और रास्ते इजाद होंगे। प्रदेश छोटा है। ढाई करोड़ की आबादी है। ज्यादातर लोग हिन्दी बोलते हैं। बावजूद इसके हमारे यहां अब पहले से अच्छी फिल्में बनने लगी हैं,मुंबई के कलाकार भी छत्तीसगढ़ी फिल्में में काम करने लगे हैं। इससे इंकार नहीं है कि   छत्तीसगढ़ी फिल्मों का भविष्य उज्जवल है‘‘।
ज्यादा फिल्मीकरण ठीक नहीं
हिट फिल्म मेकर सतीष जैन कहते हैं,फिल्में ऐसी होनी चाहिए जो लोगों का मनोरंजन करे। दर्शकों को पसंद आए। ज्यादा फिल्मीकरण कर देने से फिल्में पिट जाती हैं। भोजपुरी और मराठी फिल्मों को ओपनिंग मिलती है लेकिन छत्तीसगढ़ी फिल्मों को नहीं। छत्तीसगढ़ी फिल्मों के सबसे बड़ा स्टार अनुज हैं लेकिन, उनकी भी फिल्मों को ओपनिंग नहीं मिलती। कोई अपनी टाॅकीज में छत्तीसगढ़ी फिल्म तभी लगायेगा जब फिल्म अच्छी हो। अच्छी फिल्में बनाने वालों की कमी है। फिल्म विकास निगम बना देने से छत्तीसगढ़ी फिल्मों को कोई लाभ नहीं मिलने वाला। सरकार के प्रभाव वाले और आयोग के लोगों का ही भला होगा। 
करोड़ों रूपए दांव पर
छत्तीसगढ़ी फिल्में ‘‘कहि देबे संदेश‘‘ और ‘घर द्वार‘ को छोड़ दें तो राज्य बनने के बाद ‘‘मोर छइंया भुइंया के बाद से लगातार फिल्में बनती आ रही हैं। छाॅलीवुड जिंदा रहे इसलिए लोग फिल्में बना रहे हैं। 16 साल बाद भी छत्तीसगढ़ी फिल्म इंडस्ट्री मजबूती से खड़ी नहीं हो पाई है। जबकि बाॅलीवुड और टीवी धारावाहिक के कई स्थापित कलाकारों को लेकर फिल्में बनाई गईं और बन भी रही हैं। बावजूद इसके कामयाब फिल्में गिनती की हैं। अब तक छाॅलीवुड में 50 करोड़ से अधिक पूंजी लग चुकी हैं और करोड़ों रूपए अभी भी दांव पर हैं।
कम बजट का प्रयोग फेल
छत्तीसगढ़ के फिल्म मेकर्स को लगता है कि फिल्मों का ग्लैमर लोगों को अपनी ओर खींचता है। इसलिए नए कलाकारों को लेकर कम बजट में आसानी से फिल्म बनाई जा सकती हैं। लेकिन यह प्रयोग लगातर फेल हो रहा है। अच्छे कलाकार और अच्छी पटकथा नहीं होने की वजह से फिल्में अपनी लागत नहीं निकाल पा रही हैं। आम दर्शकों का कहना है कि जब फिल्म ही देखना है तो फिर बाॅलीवुड की फिल्में क्यों न देखें। टिकट का पैसा तो उतना ही लगना है। दरअसल फिल्म निर्माता बनने की चाह में लोग अपना पैसा छाॅलीवुड में लगा तो रहे हैं, लेकिन दर्शकों को पर्दे तक खींचने वाली फिल्में नहीं बना पा रहे हैं।   छत्तीसगढ़ी फिल्म बनाने वाले अब भोजपुरी या फिर हिन्दी फिल्मों की ओर रूख कर लिए हैं। जाहिर सी बात है कि छत्तीसगढ़ी फिल्मों को विकसित होने में अभी वक्त लगेगा।
सरकार का सहयोग जरूरी
छत्तीसगढ़ी फिल्म के निर्माता और निर्देशक मनोज वर्मा भी छत्तीसगढ़ी फिल्म की जगह स्थानीय कलाकारों को लेकर ‘पिपली लाइव’ तर्ज पर एक हिन्दी फिल्म बना रहे हैं। इनका कहना है छत्तीसगढ़ी फिल्म से ही मै पैदा हुआ हॅू, इसलिए इसे नहीं छोड़ सकता। दरअसल बाहर निकलना जरूरी था। आखिर कब तक कुंए में रहोगे। छत्तीसगढ़ी फिल्मों को सरकार का सहयोग नहीं मिल रहा है। जहां दर्शक हैं, वहां टाॅकीज नहीं हैं,जहां टाॅकीज है, वहां दर्शक नहीं है। निर्माता आखिर कब तक अपने घर का पैसा लगायेगा। दीगर भाषाओं की फिल्मों के लिए 20 सेंटर एक साथ मिला जाते हैं लेकिन छत्तीसगढ़ी फिल्मों के साथ ऐसा नहीं है। बुद्धिजीवी वर्ग छत्तीसगढ़ी फिल्म देखता नहीं और दूसरों को भी देखने से मना करता है। 50 दिन छत्तीसगढ़ी फिल्म के चलने पर ही पैसा वसूल होगा। लेकिन मुश्किल से 10 थियेटर में चलती हैं, वह भी एक सप्ताह चल जाए बहुत है। सरकार का जब तक सहयोग और सब्सिडी नहीं मिलेगी छाॅलीवुड डायलसिस पर रहेगा। यहां के कलाकारों मंे समर्पण की भावना है जिसकी वजह से छत्तीसगढ़ी फिल्में बन रही हैं। मेरी अगली फिल्म बक्शी जी के उपन्यास पर आधारित है। ’’भूलन कांदा‘‘। जिसमें चार गाने छत्तीसगढ़ी में और अन्य गाने हिन्दी में है। फिल्म में गांव का व्यक्ति शहर में आकर भीा छत्तीसगढ़ी भाषा बोलता है। गांव की मिट्टी का आदमी हूं,अपनी मिट्टी को कैसे भूल सकता हॅूं। ‘‘महूं दिवाना,तहूं दिवानी‘‘ फिल्म को यू ट्यूब पर दो लाख लोग देख चुके हैं। हर रोज मुझे 50 फोन आते हैं और फिल्म की बड़ी तारीफ करते हैं। इंटरनेट पर फिल्म देखी जाएगी तो उससे निर्माता निर्देशक को कुछ नहीं मिलेगा। लोग छविगृह जाएं और मनोरंजन करें‘‘।
फिल्म को दर्शक चाहिए
फिल्म निर्माता चन्द्रशेखर चैहान कहते हैं,‘‘ फिल्में बनाने मात्र से छाॅलीवुड का कल्याण नहीं होगा। जरूरी है कि उसे दर्शक मिलें। 16 साल से फिल्में बन रही हैं। जाहिर सी बात है कि फिल्में बनना बंद नहीं होगा, इसलिए कि लोगों में जुनून है। फिर भी छत्तीसगढ़ी भाषा के प्रति लोगों में लगाव होना जरूरी है। दर्शकों के मनांेरजंन को ध्यान में रखकर जब तक फिल्में नहंीं बनेंगी वो टाॅकीज में ज्यादा दिन नहीं चलेंगी।   भोजपुरी,मराठी और बंगाली आदि भाषाओं में फिल्में बन रहीं हैं और चल भी रही हैं,इसलिए कि सरकार का उन्हें सहयोग मिल रहा है।
छत्तीसगढ़ी फिल्में माॅल में भी चलें
फिल्म अभिनेत्री तान्या तिवारी कहती हैं,छत्तीसगढ़ी फिल्मों के लिए दर्शक के साथ सेंटर का अभाव है। पटकथा और निर्देशन अच्छा होने पर ही फिल्में चलती हैं। छत्तीसगढ़ी फिल्मों के प्रचार प्रसार से अधिक जरूरी है इस भाषा का प्रचार। सरकार को चाहिए कि माॅल में चलने वाली फिल्मों के लिए ऐसी व्यवस्था करे कि चार शो में एक शो छत्तीसगढ़ी फिल्म का हो। फिल्में लगातार फ्लाप होती हैं तो माहौल पर असर पड़ता है। फिर भी लगातार फिल्में बनती रहेंगी तो सुधार होगा। छत्तीसगढ़ी फिल्मों में सबसे बड़ी खामी यह है कि भूमिका के अनुसार कलाकारों का चयन नहीं किया जाता। रूपए बचाने के चक्कर में नए कलाकारों को ले लिया जाता है। नए कलाकारों को यदि अवसर ही देना है तो उन्हें ऐसे कलाकारों के साथ काम करने का अवसर दें जिनके साथ वे अपने आप को समायोजित कर सकें और पात्र को पर्दे पर जीवंत बना सकें। नए कलाकारों को उम्दा तरीके से लाॅच किया जाना चाहिए। चैकानी वाली बात यह भी है कि जो निर्माता हैं वहीं फिल्म का हीरो भी बन जाता है। वह ही तय करता है कि फिल्म में कौन नायिका होगी और कौन कौन कलाकार। जबकि फिल्म की पटकथा के अनुसार कलाकारों का चयन होना चाहिए‘‘।

संस्कृति विभाग के निदेशक आशुतोष मिश्रा कहते हैं,‘‘छत्तीसगढ़ी फिल्में चलें और छाॅलीवुड ंिजंदा रहे, ऐसी सरकार की भी मंशा है। छत्तीसगढ़ी फिल्म विकास बोर्ड के लिए काफी काम हो चुके हैं। ड्राफ्ट आदि तैयार हो गया है। संस्कृति विभाग कलाकारों को प्रोत्साहन देते आया है। उम्मीद है आने वाले समय में और भी अच्छे काम इस दिशा में होेंगे और छाॅलीवुड से जुड़े कालाकारों को लाभ मिलेगा। हाल ही में सलहाकार समिति की बैठक बुलाई गई थी। विचार किया जा रहा है कि बोर्ड क्या काम करेगा। अगली बैठक में संभवतः कुछ ठोस नतीजे आने की उम्मीद है‘‘।
फिल्मों की सफलता के लिए आज बड़े बजट की फिल्म का टेंªड चल निकला है। ऐसा भी नहीं है कि छत्तीसगढ़ी फिल्म के निर्माताओं ने भव्य फिल्में नहीं बनाई। लेकिन भव्य फिल्मों का टेंªंड ‘झन भूलो मां बाप ला‘‘ फिल्म से खत्म हो गया। छोटे बजट की फिल्मों का दौर आया। इस दौर में कुछ फिल्में चली तो फिर छोटे बजट की फिल्मों की बाढ़ आ गई। नतीजा दर्शकों ने नकारना शुरू कर दिया। फिल्म राजा छत्तीसगढ़िया,और मया को दर्शकांे का अच्छा प्यार मिला। लेकिन कम बजट की फिल्मों में उम्दा कलाकार और पटकथा लेखक अच्छे नहीं होने से फिल्में दम तोड़ने लगीं। जाहिर है कि छत्तीसगढ़ी फिल्मों के लिए आगे, अभी और कठिन डगर है।


Saturday, June 15, 2019

नहीं चलेगी बदलापुर की राजनीति: डाॅ रमन

 नहीं चलेगी बदलापुर की राजनीति: डाॅ रमन
छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री और बीजेपी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डाॅ रमन सिंह कहते हैं कि बीजेपी की इतनी बड़ी जीत मोदी और राष्ट्र भक्तों की है। भूपेश बघेल राष्ट्रीय नेता बनने का ख्वाब देख रहे थे। जबकि वे अपने ही विधान सभा के बूथ को नहीं बचा सके। प्रदेश में बदलापुर की राजनीति नहीं चल सकती। कांग्रेस की झूठ में पड़कर जनता उसे विधान सभा में वोट कर दिया था,लेकिन लोकसभा में उसने राष्ट्रवाद को मजबूत करने वाली पार्टी बीजेपी को वोट किया। डाॅ रमन सिंह से    रमेश कुमार ‘‘रिपु’’      हुई बातचीत के प्रमुख अंश 

0 प्रदेश में बीजेपी की सरकार नहीं होने के बाद भी, कांग्रेससे अधिक सीट लोकसभा में बीजेपी को मिलने की वजह आप क्या मानते हैं।
00 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के झूठे वादे के चक्कर में पड़कर लोगों ने वोट दिया था लेकिन, ये अब भ्रम टूट गया है। छत्तीसगढ़ के संदर्भ में हमने यह विश्वास व्यक्त किया था की राज्य की जनता एग्जिट पोल से भी बेहतर समर्थन दे चुकी है और परिणाम आने पर यह बात सत्य साबित हुई है। एग्जिट पोल से ही यह संकेत मिल गए थे कि छत्तीसगढ़ सहित देश की जनता ने मोदी जी के नेतृत्व में स्वाभिमानी सरकार चुनी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में यह भारत की जीत है। भारत के जनता की जीत है।
0 क्या भूपेश बघेल सरकार के बदलापुर राजनीति का भी कोई असर था?
00 बदलापुर की सरकार वाली मानसिकता छत्तीसगढ़ में नहीं चल सकती। देश नये युग में प्रवेश कर रहा है। नया इतिहास रचा गया है। यह दूसरा अवसर है जब किसी पार्टी को अपने बूते सरकार बनाने का अवसर जनता ने दिया। जनता झूठ के सब्ज बाग दिखाने वाली पार्टी को पसंद नहीं करती। कंाग्रेस के एक वरिष्ठ मंत्री ने कहा था यदि हम सात सीट नहीं जीते तो हमें समीक्षा करना पड़ेगा। अब कांग्रेस को समीक्षा करनी चाहिए कि वे पांच महीने पहले विधान सभा में 68 सीट जीते थे। लोकसभा चुनाव में भाजपा 66 विधान सभा सीटों में बढ़त कैसे बना ली।
0 भाजपा की इतनी बड़ी जीत को आप किस रूप में लेते  है।
00 बीजेपी की इतनी बड़ी जीत मोदी और राष्ट्र भक्तों की है। भूपेश बघेल प्रधान मंत्री को आइना भेजे थे। अब एक बार उस आइने में अपना चेहरा देख लें। प्रधान मंत्री को किये ट्वीट की भाषा देखिये, लिखा, अरे प्रधान मंत्री जी रिजल्ट का इंतजार कर लेते। अभी से झोला उठाकर चल दिये। झोला उठाकर जाने की जरूरत अब उन्हें है।
0 भूपेश बघेल इस चुनाव में कई स्थानों में कांग्रेस का प्रचार करके राष्ट्रीय नेता बन गये। कुछ कहेंगे।
00 हंसते हुए कहा, प्रदेश समेत देश के दूसरे हिस्से में जहां,जहां भूपेश बघेल के पांव पड़े, वहां कांग्रेस की लुटिया डूब गई। अमेठी में राहुल को जीता नहीं पाए। भोपाल में दिग्विजय के साथ भी यही हुआ। लखनऊ गए और वहां भी हार मिली। जबलपुर में भी कांग्रेस हार गई। छत्तीसगढ़ में सबसे बड़ी हार दुर्ग से हुई, जो खुद सीएम का गढ़ है। भूपेश बघेल की अपनी बूथ में विधानसभा में कांग्रेस चुनाव हार गई। भूपेश बघेल राष्ट्रीय स्तर के नेता बनने का ख्वाव देख रहे थे। 5 महीने के इनके कार्यकाल को छत्तीसगढ़ की जनता ने नकार दिया है।
0 राज्य में प्रदेश के सांसदों की क्या भूमिका रहेगी।
00 राज्य के विकास के लिए छत्तीसगढ़ के सांसदों की अहम भूमिका होगी। उम्मीद है इतनी बड़ी जीत में यहां से किसी को मंत्री बनाया जा सकता है। उसका लाभ प्रदेश को मिलेगा। सांसद यहां के लिये नेशनल हाइवे और रेलवे के प्रोजेक्ट को स्वीकृत कराने का प्रयास करेंगे। ताकि प्रदेश को इसका लाभ मिल सके।

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‘हाथ’ में खिला ‘कमल’

   

   ‘हाथ’ में खिला ‘कमल
विधान सभा चुनाव में सियासत का सिंकदर बनकर उभरे भूपेश बघेल लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के हाथों में हार का तंबुरा कैसे थमा दिये? क्या एसआइटी की चाबुक चलाने की सियासी प्रक्रिया जनता को पसंद नहीं आई। न्यूनतम आय गारंटी योजना को दरकिनार कर जनता ने कांग्रेस के हाथ में क्यों कमल खिला दिया? कांग्रेस की किसान कर्ज माफी रणनीति के बावजूद उसका वोट बैंक बढ़ा क्यों नहीं? ऐसे सवालों का जवाब ढूंढती यह रिपोर्ट।

0 रमेश कुमार ‘‘रिपु’’
                       ’’गढ़बो नया छत्तीसगढ़‘‘। यही नारा है भूपेश बघेल की सरकार का। सवाल यह है कि यह नारा आकार क्यों नहीं ले पाया लोकसभा चुनाव तक?लोकसभा चुनाव के चार महीने पहले 68 विधान सभा जीतने वाली कंाग्रेस 66 विधान सभा चुनाव कैसे हार गई? भूपेश सरकार का दावा है कि सत्ता में आने के दसवें दिन ही प्रदेश के 3 लाख 57 हजार किसानों के कर्ज माफ कर दिये गये। किसानों के खाते में 1248 करोड़ डालने के बाद भी आखिर कांग्रेस लोकसभा चुनाव में चारों खाने चित क्यों हो गई?भूपेश बधेल विधान सभा चुनाव में सियासत का सिंकदर बनकर उभरे थे, फिर ऐसा क्या हुआ कि लोकसभा चुनाव में वे कांग्रेसियों के हाथों में हार का तंबुरा दे दिये। जबकि चुनाव से पहले सरकार का दावा था कि 11 सीट जीतेंगे। कांग्रेस के हाथ में जीत की लकीर आखिर भूपेश बघेल लोकसभा में क्यों नहीं बना सके। जबकि प्रदेश में उनकी सरकार है। चूक गये या धोखा खा गये। बड़े दांव का खिलाड़ी बनने का दावा तो ताम्रध्वज साहू और टीएस सिंह देव भी किये थे। सी.एम बनने की चाह थी। चरणदास महंत भी इसी दौड़ में शामिल थे। वे एक नई रेस जीत गये हैं। टी.एस सिंह देव यहां तक कह दिये थे कि प्रदेश में कांग्रेस कम से कम सात सीट नहीं जीतती है तो,यह कांग्रेस की हार है। यह हार कांग्रेस की है या फिर भूपेश बघेल सरकार की अथवा कांग्रेस के कार्यकत्र्ताओं की? आखिर हारा कौन? भूपेश बघेल तो अभी तक नहीं कहे कि उनके नेतृत्व में कांग्रेस हारी है। जबकि राहुल गांधी ने कांग्रेस की हार की जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा की पेशकश भी की। यह अलग बात है कि उनका इस्तीफा कार्यसमिति मंजूर नहीं करेगी। लेकिन राहुल गांधी ने ऐसा करके एक संदेश तो दे ही दिये क्षत्रपों को कि हार की जवाबदारी स्वीकार कर इस्तीफा दो। उनके सियासी संकेत को क्या कोई नहीं समझा?
नाराज किया किसने..
कांग्रेस की नाव सत्ताई समुंदर में है। हार का मंथन करती है तो विरोध का जहर ही निकलना है। और कांग्रेस के क्षत्रप नहीं चाहेंगें कि ऐसा हो। वजह सब जानते हंै। कांग्रेस की हर शाख पर कालिदास बैठे हैं। ऐसे में क्या यह मान लिया जाये कि कार्यकत्र्ताओं की नाराजगी से कांग्रेस हारी। गौरतलब है कि विधान सभा चुनाव भाजपा हारी थी तो पूर्व प्रदेश भाजपा अध्यक्ष धरमलाल कौशिक और डाॅ रमन सिंह ने हार का ठीकरा भाजपा कार्यकत्र्ताओं पर फोड़ा। इस बयान पर भाजपा दो फाक हो गई थी। सवाल यह है कि कांग्रेस के कार्यकत्र्ताओं को नाराज किया किसने। प्रदेश कांगे्रस प्रभारी पीएल पुनिया को यह जानना चाहिए। संगठन की कमान तो भूपेश बघेल के हाथ में है।
कांग्रेस के समक्ष यक्ष प्रश्न
कांग्रेस के समक्ष यक्ष प्रश्न है कि कार्यकत्र्ताओं को निगम मंडल के पद देने और अपने विधायकों को नाराज कर देने से पी.एल पुनिया नगरीय निकाय और पंचायत चुनाव कांग्रेस को जीता लेंगे,या फिर भूपेश बघेल की सरकार? वैसे राजीव भवन में हर दिन एक मंत्री कार्यकत्र्ताओं के साथ बैठक कर जानने का प्रयास करेगें कि उनकी नाराजगी की वजह क्या है? वजह जानने से पहले निगम मंडल में उन्हें ओहदा देने की बात चांैकाती है। जबकि कांग्रेस को तो यह जानना चाहिए कि किसान उससे छिटका कैसे। जनता उसे नजर अंदाज क्यों की। नगरीय निकाय और पंचायत चुनाव में जनता का रूख क्या लोकसभा जैसा है। यदि ऐसा है तो जाहिर है कि भूपेश बघेल सराकर से जनता नाराज है। और वो अपना जिला सरकार का दायित्व कांग्रेस को नहीं,भाजपा को दे सकती है।
भाजपा की जड़ हरी हुई
सियासी सवाल कई हैं, पर जवाब कांग्रेस के पास नहीं,भाजपा के पास है। जैसा कि भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डाॅ रमन सिंह कहते हैं,‘‘बदलापुर की राजनीति प्रदेश में न चली है और न ही चलती है’’। भाजपा की जड़े लोकसभा चुनाव के परिणाम से एक बार फिर हरी हो गई’’। लोकसभा चुनाव के परिणाम बताते हैं कि कांग्रेस का वोट बैंक खिसक गया है। जबकि किसानों के दम पर प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनी। किसानों के कर्जा माफी की घोषणा से कांग्रेस को लाभ तो मिला लेकिन, मोदी के राष्ट्रवाद ने भूपेश सरकार के काम काज की बखिया उधेड़ दी। जाहिर सी बात है कि भूपेश सरकार का काम काज जनता के अनुकूल नहीं था। सुर्खियों की राजनीति के लिए पूर्व सरकार के कामकाजों की जांच के लिए नई सरकार एसआइटी की चाबुक घूमाती रही। और जनता ने मोदी पर दांव लगा दिया। दरअसल भाजपा की चुनावी रणनीति पूरी तरह मोदी ब्रांड पर केन्द्रित थी। प्रदेश में डाॅ रमन सिंह ने भूपेश बघेल को मात दे दिये। अभी तक प्रदेश की जनता लोकसभा चुनाव में उसे ही वोट करती आई है जिसकी प्रदेश में सरकार रहती है। भूपेश बघेल आकलन इसी आधार पर कर रहे थे,और उन्हें भरोसा था कि कांग्रेस की हथेली में 11 नहीं तो दस सीट आ जायेगी। लेकिन इस बार इस ट्रेंड को जनता ने बदल दिया। भूपेश बघेल ही नहीं,डाॅ रमन सिंह को भी हैरत में जनता ने डाल दिया।  जबकि भूपेश बघेल की सरकार ने 15000 शिक्षकों,1345 सहायक प्रोफेसरों और 61 खेल अधिकारियों की भर्ती की भी घोषणा की,हालांकि राज्य की बेरोजगारी के अनुसार यह पर्याप्त नहीं है। इससे बेरोजगारी दूर नहीं होगी। जनता को यह एहसास कराने की पहल सरकार ने की कि जनता के लिए वो दरवाजे खोल रही है। पर भूपेश सरकार के जादुई पिटारे से जो निकला उससे जनता खुश नहीं हुई।
बढ़ सकता है सियासी घाटा
अब सामने जिला पंचायत और निकाय चुनाव हैं। कांग्रेस का वोट बैंक खिसक गया है। किसान नाराज है। किसानों का बिजली बिल आधा कर देने का दावा सरकार कर रही है, वहीं बस्तर,धमतरी और राजनांदगावं के किसानों को खाद नहीं मिल रही है। मुख्यमंत्री के समक्ष आने वाले समय में एक नहीं कई चुनौतियां हैं। बेरोजगारों को रोजगार और बेरोजगारी भत्ता भी। किसानों को खाद नहीं मिलने पर सवाल यह है कि सरकार किसानों को रिझायगी कैसे। वैसे भी किसान सरकार के कर्ज माफी की रणनीति से खुश नहीं है। दो लाख कर्ज माफ किया गया है, जबकि चुनाव से पहले कांग्रेस का कहना था कि सत्ता में आते ही दस दिनों में किसानों के सारे कर्जे माफ कर दिये जायेंगे। सत्ता मिली तो कर्ज की अवधि और सीमा सरकार तय कर दी। जाहिर सी बात है डाॅ रमन सिंह की सरकार ने किसानों के मूड को समझ नहीं सकी और भूपेश सरकार किसानों को रिझा नहीं सकी। जिससे कांग्रेस को राजनीतिक घाटा हुआ। सियासी घाटा बढ़ने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता।
ये तो सियासी बहाना है
लोकसभा चुनाव ने राजनीतिक समीकरण बिगाड़ दिया है। खासकर कांग्रेस का। कांगे्रस को अपनी दशा और राजनीतिक दिशा बदलनी होगी। दुर्ग लोकसभा उसके हाथ से छिटक जाना इस बात का संकेत है। इस जिले से मुख्यमंत्री और गृहमंत्री दोनों आते हैं। कांग्रेस बाजी जीतने में असफल हो गई। आखिर वजह क्या है? कांग्रेस के एक विधायक ने कहा कार्यकत्र्ताओं की नाराजगी की वजह से कांग्रेस को दो सीट लोकसभा में मिली। तर्क में दम नहीं है। चरणदास महंत यह कह सकते हैं। इसलिए कि कोरबा और कांकेर में तो ऐसा नहीं हुआ। हैरत वाली बात है कि दुर्ग में मुख्यमंत्री और गृहमंत्री के बावजूद कार्यकत्र्ता नाराज क्यों हुए। क्या कांग्रेस सत्ता में आने के बाद अपने कार्यकत्र्ताओं को भूल गई। कांग्रेस का संगठनात्मक ढाचा ढीला हो गया। जबकि संगठन की कमान भूपेश बघेल के हाथ में रही। यदि इस बात से कांग्रेसी सहमत नहीं हैं तो, कांग्रेस विधान सभा चुनाव अपने कार्यकत्र्ताओं के दम पर नहीं जीती? जनता ने उसे डाॅ रमन सिंह सरकार की जगह एक मौका दिया है। पन्द्रह साल बहुत हो गया,बदलाव की चाह में सरकार बदली। लेकिन केन्द्र की मोदी सरकार उसकी पहली प्राथमिकता रही इसलिए उसने बीजेपी को नौ सीट दे दी। कंाग्रेस वहां जीती जहां,उसके लिए जीत आसान थी।
शीर्ष नेतृत्व पर नजर
कांग्रेस के पंडाल में एक सियासी बाजीगर के रूप में चरणदास महंत उभरे। शीर्ष नेतृत्व में यदि परिवर्तन होता है,जिस तरह स्व.इंदिरा गांधी ने 1970 और 1977 में अपने सिपहसालारों को पार्टी का अध्यक्ष बनाया,राहुल गांधी भी वैसा कर सकते है। ऐसे में मुमकिन है कि प्रदेश के मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष भी बदले जा सकते हैं। यानी कांग्रेस में पंडाल में टकराव का चिमटा बजने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता। नगरीय निकाय चुनाव और पंचायत चुनाव भूपेश बघेल की राजनीति का भविष्य तय करेंगे। यदि इन चुनावों में भी हाथ में कमल खिल गया तो एक बात साफ है कि प्रदेश मंे कांग्रेस की राजनीति का भविष्य मोदी ही लिखेंगे। जैसा कि वे ममता बनर्जी को कह चुके हैं कि दीदी आपके 40 विधायक भाजपा के साथ हैं’’। बहरहाल कांग्रेस का नेतृत्व भाजपा की जड़ों के बीच है। कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी पी.एल पुनिया भी शीर्ष नेतृत्व के निशाने पर है। पी.एल पुनिया यू.पी के प्रभारी रहते कांग्रेस को डूबा चुका हैं। प्रदेश मंे कांगे्रस की सरकार है,लेकिन पुनिया और भूपेश से वो सारे विधायक बायें चल रहे हैं जो मंत्री बनने की लाइन में थे। राजनीति हमेशा संभावनाओं पर चलती है। कांगे्रस में बगावत नई सियासत की कथा लिख सकती है।
 भूपेश पर संदेह
कांग्रेस के एक वरिष्ठ विधायक जिन्हें मंत्री नहीं बनाया गया है,वे खासे नाराज हैं। सवाल करते हुए कहा, चुनाव से पहले भूपेश बघेल 11 सीट जीतने का दावा कर रहे थे। उनके समर्थक भी कह रहे थे कि किसानों का कर्जा माफ कर दिया गया है। धान की कीमत 2500 रूपये प्रति क्विंटल हो गया है। किसानों का बिजली बिल हाफ कर दिया गया है। इतना सब किया गया है तो फिर कांग्रेस को 11 सीटे मिली क्यों नहीं?यानी केवल मुंह से ही सब कुछ हुआ। यही वजह है कि जनता ने कांग्रेस को बाहर का रास्ता दिखा दिया। ऐसे में भूपेश बघेल को हार की जवाबदारी लेते हुए इस्तीफा दे देना चाहिए’’। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष विक्रम उसेंडी कहते हैं,’’प्रदेश की जनता ने नये भारत के निर्माण के लिए मोदी के हाथ को मजबूत किया। कांग्रेस केवल झूठ का गुब्बारा फूलाती रही। मोदी जी ने पांच सालों में गांव की गरीब महिलाएं,गरीब किसानों के लिए जितना किया,उतना कांग्रेस की सरकारों ने कभी नहंीं किया’’।
एक सच ऐसा भी
प्रदेश के करीब 34 लाख किसान हर साल लगभग 7 हजार कारोड़ कर्ज लेते हंै। 10 लाख किसानों पर अभी भी करीब 15 हजार करोड़ कर्ज बकाया है। 10 हजार करोड़ तो बीते दो साल का बकाया है। दरअसल फसल बीमा का लाभ किसी भी सरकार में किसानों को मिला नहीं। इसलिए किसान कर्जदार हुए। कृषि विभाग के आंकड़ों के मुताबिक प्रदेश में 34 लाख किसानों में से करीब 1.51 लाख ने ही फसल बीमा कराया। इनमें से आधे राजनांदगांव जिले से हैं। बस्तर के 7 जिलों में से सुकमा, नारायणपुर और बीजापुर में दो.दो किसानों ने ही बीमा कराया। बस्तर में किसानों ने फसल बीमा नहीं कराया। बस्तर के किसानों ने चना, गेंहूं, अलसी, सरसों, तिवरा और आलू की फसल ली पर बीमा नहीं कराया। किसानों के साथ सरकार का रवैया हितकर नहीं है। यही वजह है कि राज्य में वर्ष 2015 से 30 जून 2017 तक कुल 11826 आत्महत्या के प्रकरण दर्ज किए गए हैं। जिसमें 1271 किसानों ने तथा 10,555 अन्य व्यक्तियों ने आत्महत्या की है। इस अवधि में राज्य के सूरजपुर जिले में 198 किसानों ने, बलौदाबाजार जिले में 181 किसानों ने, बालोद जिले में 170 किसानों ने, महासमुंद जिले में 153 किसानों ने तथा बलरामपुर जिले में 138 किसानों ने आत्महत्या की। किसानों की मांग है कि उन पर लगातार बढ़ते कर्ज का सरकारें उपाय करें। उनकी फसलों का उचित मूल्य मिले। किसानों पर लदे कर्ज माफ किए जाएं। किसानों की फसलों का बीमा हो और सिंचाई,बीज आदि की सुविधाएं को सुगम बनाया जाए।
कब कर्ज होगा माफ
दुर्ग के किसान संजय साहू कहते हैं हाथ में सत्ता आ जाये इसके लिए कांग्रेस ने किसानों के साथ छल किया। मध्य प्रदेश में 31 मार्च 2018 तक के किसानों के कर्जें माफ किए गए हैं, वहीं दूसरी ओर छत्तीसगढ़ में 30 नवंबर 2018 तक का कर्ज माफ किया गया है। कांग्रेस ने किसानो के साथ कर्ज माफी पर राजनीति कर गई। किसानों के सिर्फ अल्पकालीन कृषि ऋण ही माफ किये गये हैं। यह सिर्फ 6100 करोड़ रुपए का कर्ज है’’। दरअसल खेतों की जमीन की निराई,गुड़ाई जैसे काम के लिए किसान अल्पकालीन कर्ज लेता हैं। जो 20,30 हजार रुपये का होता है। दीर्घकालीन और फसल ऋण माफ नहीं किये गये। इसलिए कि दोनों तरह के कर्ज का दायरा कहीं ज्यादा बड़ा और गंभीर है। दीर्घकालीन कर्ज में किसान कृषि उपकरण, टैक्टर.ट्रॉली, हार्वेस्टर कल.पुजे आर्दि खरीदते हैं। जिसे 3 से 5 साल या उससे अधिक अवधि में चुकाना होता है। फसल कर्ज की अवधि बुवाई से कटाई तक की होती है। इसका इस्तेमाल बुवाई के दौरान बीज, फर्टिलाइजर, और दवा आदि खरीदने के लिए होता है। इस कर्ज की वसूली फसल बेचने के दौरान कर ली जाती है।
क्या चाहते हैं किसान
किसान अब मांग रहे कर रहे हैं कि कर्ज माफी मतलब पूरे कर्ज की माफी है। जिसमें दीर्घकालीन और फसल लोन भी शामिल हो। अधिकतर किसान कृषि लोन के मामले में ही डिफॉल्टर हैं क्योंकि कभी बारिश अधिक होने, तो कभी सूखा पड़ने से फसल को नुकसान होता है। जिससे कर्ज नहीं चुका पाते। चुनाव के समय कांग्रेस के घोषणा पर किसानों को भरोसा हुआ कि उनके सिर पर जो कर्ज है वह माफ हो जायेगा। लेकिन कांग्रेस ने कर्जमाफी के आदेश में नियम व शर्तें लगा दी। उससे किसान ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। सरकार ने 16.50 लाख किसानों को 6100 करोड़ कर्ज माफ करने का वादा किया था। हुआ आधा भी नहीं। 3.57 लाख किसानों के खाते में 1248 करोड़ रुपये डाले गये हैं। किसानों के साथ कांग्रेस सरकार ने धोखा किया तो जनता ने कांग्रेस के साथ। उसका न केवल वोट बैंक खिसक गया बल्कि किसान नाराज हैं। कंाग्रेस की न्यूनतम गारंटी योजना को जनता ने कर्ज माफी योजना की तरह ही लिया। जबकि मोदी न किसानों को हर साल 6 हजार रूपये देने की घोषणा की। उसकी पहली किस्त यानी 2018 की चुनाव से पहले सबके खाते में आ गई। जाहिर सी बात है कि मोदी के दीर्घ अवधि के सुधार पर जनता ने भरोसा किया।



  


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Thursday, June 13, 2019

राख में दबी प्रदूषण की चिंगारी

      

 राख में दबी प्रदूषण की चिंगारी

  छत्तीसगढ़ में काला सोना की अधिकता के चलते बिजली सयंत्रों की बाढ़ आ गई है। बिजली घरों से हर साल दो करोड़ सात लाख मीट्रिक टन राखड़ निकलती है। 30 फीसदी भी इसका इस्तेमाल नहीं होता। निर्देशों के बावजूद फ्लाई ऐश के निबटान की कोई योजना नहीं है। जबकि इस प्रदूषण से टी.बी,अस्थमा,दमा जैसी गंभीर बीमारियों से जिन्दगी राख हो रही हैं। पाॅवर हब के चलते जिन्दगी के ढेर पर आ बैठी है। 
 0 रमेश कुमार ‘‘रिपु‘‘
                      छत्तीसगढ़ की ऊर्जाधानी कोरबा, को अब आम लोग राखधानी कहने लगे है। एक ओर यहां के लोग विकास की कीमत अदा कर रहे हैं,तो दूसरी ओर कोयला की वजह से यहां बिजली सयंत्र की बाढ़ आ गई है। यही स्थिति रायगढ़ और राजधानी रायपुर के सिलतरा की है। छोटे बड़े मिलाकर एक सैकड़ा के करीब बिजली सयंत्र है। लगभग जितनी भी स्टील फैक्ट्रियां है, सबके अपने अपने बिजली सयंत्र हैं। बिजली सयंत्र के आस पास जितने भी गांव हैं, वहां एक भी मवेशी स्वस्थ्य नहीं दिखेंगे। कोरबा के 30 वर्षीय अमर साहू कहते हैं,‘‘दो वर्ष दो गाय खरीद कर लाये थे। कुछ दिनों में उनकी गायें बीमार रहने लगीें। डाॅक्टरों से पता चला कि नदी,तालाब,का प्रदूषित पानी पीने से गायों के पेट में राख जमा हो रही है। कुछ दिनों बाद अमर की दोनों गायें मर गईं। यह तो जानवरों का हाल है। यहां के लेागों का हाल और भी बुरा है। बिजलीघरों से निकली कोयले की राख आसपास की नदियों और जलाशयों को बना रही जहरीली। इस प्रदूषण से टी.बी,अस्थमा,दमा जैसी गंभीर बीमारियों से जिन्दगी राख हो रही हैं।   फिर भी सरकार में बैठे जवाबदार लोग समस्या को नजर अंदाज कर रहे हैं। निर्देशों के बावजूद फ्लाई ऐश के निबटान की कोई योजना नहीं। छत्तीसगढ़ में बढ़ते उद्योगों की वजह से जल प्रदूषण और वायु प्रदूषण को लेकर सरकार पर जब दबाव बढ़ा तो वर्ष 2012 में उद्योग व पर्यावरण मंत्री राजेश मूणत विधान सभा में कहा, प्रदेश में उद्योगों से निकलने वाले फ्लाई ऐश के उपयोग के लिए सरकार कार्य योजना बना रही है। ताकि लोगों को प्रदूषण में राहत मिल सके’’। लेकिन ऐसी कोई व्यवस्था आज तक नहीं हो सकी।
हर दसवां व्यक्ति राख से पीड़ित
एसीबी इंडिया लि.कंपनी पावर प्लांट चाकाबुरा गांव में स्थित है। इस बिजली संयत्र से करीब तीन सौ मीटर की दूरी पर राख का ढेर है। आस पास बस्तियां हैं। खेत हैं। राख के ढेर को दबाने के लिए मिट्टी का इस्तेमाल किया जाता है। ताकि गिर कर फैले नहीं। लेकिन हवा चलती है तो राख उढ़ के घरों के अंदर और आंगन में बिछ जाती हैं। फूलझड़,रंजना,तिवरता और चैतमा गांव तक राखड़ का प्रतिकूल असर दिखाई देता है। पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी कहते है कि कोरबा और रायगढ़ सबसे अधिक प्रदूषित शहर हंै। प्रदूषण रोकने के लिए जो मापदंड तय हैं, उसे अमल में नहीं लाया जाता है। जाहिर सी बात है कि सिस्टम फेल हो गया है। कोरबा,जांजगीर,रायगढ़ में फ्लाई ऐश की वजह से राख हो रही है जिन्दगी। पाॅवर की अंधी दौड़ लोगों के फेफड़ों को खोखला कर रही है‘‘। बिजली घर के जहरीले राख के कण टीबी का कहर बनकर टूटे हैं। यही वजह है कि कोरबा और रायगढ़ में हर दसवा व्यक्ति राख के प्रदूषण का शिकार है।
कोरबा में कहर
कोरबा के पुरेनाखार गांव के पांचवी के छात्र विनय कहते हैं, पावर प्लांट से निकलने वाली राख से उसे बुखार होता है। गांव का पानी खराब हो गया है। सांस लेने में तकलीफ होती है। यहां तक कि खाने में भी राखड़ ही होता है। विनय की थाली में मौजूद राख उस 2.7 करोड़ टन राख का महज एक चुटकी भर ही है, जो साल भर में कोरबा में मौजूद बड़े 14 ताप बिजलीघर पैदा करते हैं। कटघोरा ब्लॉक का पुरेनाखार एनटीपीसी और छत्तीसगढ़ पावर की ऐश डाइक से एकदम सटा हुआ गांव है। ऐश डाइक से बमुश्किल 200 मीटर दूर मौजूद गांव के प्राइमरी स्कूल की प्रभारी प्रिसिंपल भुनेश्वरी देवी बताती हैं।र्राख की वजह से यहां के लोगों खासकर बच्चों में पेट दर्द, खांसी और चमड़ी से संबंधित कई तरह की बीमारियां हो रही हैं। पिछले 7 साल से पढ़ाने आने की वजह से मैं भी कई बीमारियों का शिकार हो गयी हूं। इस उडन राख ने इलाके की खेती भी चैपट कर दी है। सीपीसीबी(केन्द्रीय प्रदूषण बोर्ड) के आंकड़े बताते हैं कि कोरबा देश के पांच सबसे प्रदूषित औद्योगिक क्षेत्रों में शामिल हैं। पर्यावरण मंत्रालय की 2014.15 की सालाना रिपोर्ट में भी कोरबा को देश में तीसरा सबसे नाजुक रूप से प्रदूषित क्षेत्र बताया गया है। इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे दिनेश कुशवाहा कहते हैं, यहां राख के तालाब देखकर लोगों को हैरानी हो सकती है। पर यहां जिन्दगी मुश्किल हो गई है।
राख के पहाड़
कोरबा से गेवरा,लक्ष्मणपुर,कुसुमुडा या फिर दीपिका जाने के रास्ते में राख के पहाड़ पड़ते हैं। ये ऐसे पहाड़ हैं कि बारिश के पानी में घुल कर नदी नाले से होते हुए खेतों तक पहुंचते हैं। राखड़ की इतनी अधिकता है कि आस पास के खेतों पर भी इसका असर पड़ा है। खेतों की उर्वरक क्षमता मर गई है। नियम तो कहता है कि जहां भी कोयला की राख फेंकी जाए वहां वृक्षारोपड़ किए जाएं। लेकिन ऐसा कहीं भी नहीं है। केवल बोर्ड जगह जगह लगाए गए हैं। फ्लाई ऐश से बने पहाड़ों में वृक्षारोपण नहीं किया गया है। कोरबा रेल्वे स्टेशन से रेल्वे फाटक तक आने के बाद दीपिका नगर पंचायत तक जाने के रास्ते में यानी दस किलोमीटर तक किनारे किनारे कोयले की राख के पहाड़ हैं। कोरबा हो या फिर रायगढ़ दोनों जिलों में बिजली सयंत्रों के आस पास कोयला की राख कई सवाल खड़े करती है कि क्या प्रदूषण विभाग और पर्यावरण कानून भी राख के पहाड़ की ढेर में कहीं दब गया है? इसलिए कि हर बिजली सयंत्र के पास राखड़ का ढेर है। एसीबी इंडिया लि.कंपनी के जनरल मैनेजर संजय मालवीय कहते हैं,‘‘ हमारे बिजली सयंत्र में कोयला के जलने पर प्रदूषण न फैले इसकी व्यवस्था है। चिमनी से काला धुुंआ नहीं निकलता है। इलेक्ट्रो स्टेटिक प्रैसिपिटेटर की व्यवस्था है। राख के निष्पादन के सवाल पर उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया।
कानून को ठेंगा
केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण मंडल ने 5 फरवरी 2014 को एक आदेश जारी किया था कि 17 प्रकार के प्रदूषणकारी उद्योगों में प्रदूषण को नियंत्रित एवं निगरानी करने के लिए 31 मार्च 2015 तक आॅनलाइन स्टैक इमिशन सिस्टम स्थापित कर लें। लेकिन जिले में मात्र 46 और प्रदेश में 133 औद्योगिक संस्थानों ने ही यह सिस्टम लगाया है। प्रदेश के 563 संस्थानों ने इसे नहीं लगाया। दरअसल इस सिस्टम के जरिए उद्योगों में चिमनी से निकलने वाले धुंए आदि राज्य प्रदूषण नियंत्रण मंडल के सर्वर पर आॅनलाइन करना था। केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण मंडल के अनुसार 17 प्रकार के उद्योग हैं जो प्रदूषण फैलाते हैं। मसलन स्टील प्लांट,पाॅवर प्लांट,सीमेंट प्लांट,डाईइंटरमीडिएट,पेस्टीसाइड,पेट्रोकेमिकल,बड़े विद्युत संयंत्र,जिंक, कापर, पेपर पलंट, आॅयल रिफायनरी, डिस्टलरी,शक्कर,चमड़ा आदि उद्योग। इन उद्योगों में आॅन लाइन स्टैक मानीटरिंग तथा एम्बीएंट एयर क्वालिटी मानीटरिंग सिस्टम लगाया जाना था। प्रदेश में 188 ऐसे उद्योग हैं जहां से खतरनाक कचरा प्रतिदिन लगभग 54900 टन निकलता है।
तीस फीसदी राख का उपयोग
एक चैकाने वाली बात है कि प्रदेश के बिजली घरों से दो करोड़ सात लाख मीट्रिक टन राखड़ निकलती है। लेकिन मात्र 30 फीसदी राख का ही इस्तेमाल होना शुरू हुआ है। जबकि पश्चिम बंगाल में 80 फीसदी राखड़ का उपयोग होता है। महाराष्ट्र में 60 फीसदी और उत्तर प्रदेश में 50 फीसदी फ्लाई ऐश का इस्तेमाल होता है। जाहिर सी बात है कि अन्य राज्यों की तुलना में छत्तीसगढ़ में राखड़ की मांग कम है। बीते साल में 25 लाख 42 हजार मीट्रिक टन राखड़ सीमेंट फैक्ट्रियों में इस्तेमाल हुआ। एसीबी इंडिया लि.बिजली सयंत्र में 270 मेगावाट बिजली पैदा होती है। इस सयंत्र से हर दिन 220 ट्रक कोयले की राख निकलती है। जाहिर सी बात है कि प्रदेश की 35 अन्य बड़े बिजली सयंत्र से निकलनी वाली राखड़ हर वर्ष कुल 22 मिलियन टन से अधिक होती है। जबकि नियमानुसार शत प्रतिशत राखड़ का निष्पादन की शर्त पर ही बिजली कंपनी को क्लियरेंस मिलता है। राखड़ को कोयले की खाली खदानों में भरने का प्रावधान है। रायगढ़ और कोरबा की खदानों में पहले रेत भरने का टेंडर हुआ करता था,अब बंद हो गया है। फ्लाई ऐश दो तरह की होती है। मोटी राखड़ से तालाब या फिर गडढ्े भरे जाते है। चिकनी राख ईंट बनाने और सड़क निर्माण के काम में लायी जाती हैं। कोयला उत्पादन कंपनी एसईसीएल और बिजली उत्पादन कंपनी एनटीपीसी पर फ्लाई ऐश के उपयोग और उसके निष्पादन की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। एनजीटी राज्य सरकार को राख के मामले में कई बार फटकार लगा चुकी है। क्यों कि प्रदेश में बिजली सयंत्रों से निकलने वाली 14 मिलियन टन राखड़ का उपयोग नहीं होता। 
खेतों को नुकसान
कृषि वैज्ञानिक डाॅ. के.के.साहू कहते हैं,फ्लाई ऐश का डिस्पोजल नहीं होने के कारण मिट्टी की उर्वरक शक्ति कमजोर हो जाती हैं। इसके अलावा कोयले की राख की वजह से पौधे के स्टोमेटा ढंक जाते हैं। इससे उसका श्वसन तंत्र कमजोर होने की स्थिति मंे पौधों की वृद्धि रूक जाती है। राखड़ मिट्टी की पोरोसिटी को भी कम कर देती। रायगढ़ जिले के खरसियां क्षेत्र में कारखानों से निकले अपशिष्ट एवं फ्लाई ऐश की वजह खेतांे की उर्वरा शक्ति नष्ट हो रही है। खरसियां शहर के छपरीजंग स्थित नवीन स्कूल के पीछे शासकीय और वन भूमि में अवैध रूप से स्थानीय कारखानों से निकले अपशिष्ट एवं फ्लाई एश को अवैध रूप से डंप किया जा रहा है। 
एक दर्द आदिवासियों का
कोरबा हो या फिर रायगढ़ जिला के आदिवासियों को उद्योगपतियों ने नौकरी देने का सब्ज बाग दिखाकर उनकी जमीनें ले लीं। अच्छे दिन की चाह में आदिवासियों ने अपनी जमीनें कंपनियों को दे दी लेकिन, बदले में कंपनियों उन्हें नौकरियां दी नहीं। एसीबी इंडिया लि. कंपनी को अपनी दस एकड़ जमीन देने वाले भारत यादव,रामेश्वर यादव का परिवार कहता है,,चपरासी अथवा साफ सफाई करने की नौकरी देकर ठग लिया गया है। ऐसा यहां सभी पाॅवर प्लांट के मालिकों ने किया है। सस्ते में जमीन दे दी। कईयों का मामला कोर्ट में चल रहा है। कहीं जा नहीं सकते इसलिए पाॅवर प्लंाट के पास अपनी जमीन पर घर बना लिए। लेकिन कंपनियां अपनी पाॅवर प्लांट की राख को घर के पास डंप कर रही हैं। जिससे जीना मुहाल हो गया है‘‘। मनोज सिंह ठेकेदार के अंडर में काम करते हैं। इन्द्रजाल,विजय गोंड,फूलबाई और सविता गांेड को झाडूं पोंछा का काम मिला है, जो कि नौकरी से निकाल देने के लिए धमकाता रहता है। कुसमुंडा खदान के पासवाले पालविया गाँव के लोग विस्थापन के विरोध की लड़ाई अभी भी लड़ रहे हैं। यहां के लोगों ने बताया कि पिछले डेढ़ दशक में इन खदानों के लिए लोगों को 3-4 बार विस्थापित किया जा चुका है लेकिन उसका उचित मुआवजा अब तक नहीं मिला है।
कोयला उत्पादन में छग प्रथम
प्रदेश में 52 खदानें एसईसीएल की है। कुसमुंडा कोयला खदान 2,382 हेक्टेयर तक फैला हुआ है।   कोरबा में गेवरा माइंस,लक्ष्मणपुर,दीपिका में खुली खदानें है। जबकि बाकी मोगरा, सुरा कक्षार, डेलवारीह, बलगी औरबगदेवा में अंडर ग्राउंड खदानें हैं। सबसे बड़ी गेवरा मांइस हैं। गौरतलब है कि केन्द्र सरकार ने 2020 तक कोयले के उत्पादन को दोगुना करने का आदेश दे रखा है। ऐसी स्थिति में छत्तीसगढ़ में कोयले का उत्पादन बढ़ेगा। एक अनुमान के अनुसार यहां 52 हजार मिलियन टन से भी अधिक कोयले का भंडार है। कोरबा में 10 भूमिगत खदान हैं और दो खुली खदान है। कुसमंुडा,गेवरा,दीपिका में एक-एक खुली खदान है। रायगढ़ में एक भूमिगत खदान है और 3 खुली खदान है। 2017-18 में भूमिगत खदान से 17.086 मिलियन टन और खुली खदान से 114.239 मिलियन टन कोयला का उत्पादन हुआ। गेवरा क्षेत्र साऊथ ईस्टर्न कोलफिल्डस का सर्वाधिक कोयला उत्पादन करने वाला क्षेत्र है। गेवरा परियोजना में विश्व की आधुनिक तकनीक का प्रयोग किया जाता है। इस परियोजना में वर्ष 2017-18 में 46 मिलियन टन कोयले का उत्पादन हुआ था। 
श्वसन सबंधी बीमारियां बढ़ रही
अंबेडकर अस्पताल के श्वसन विशेषज्ञ डाॅ रविन्द्र पंडा कहते हैं,‘‘फैक्ट्री से निकलने वाला गंदा पानी, धुंआं, राखड़ और कैमिकल सीधे जल स्त्रोत को प्रभावित करते हैं। कई जगह भूमिगत संक्रमित जल में लेड की मात्रा भी पाई गई है। जल में मैग्नीशियम व सल्फेट की अधिकता से आंतों में जलन पैदा होती है। नाइट्रेट की अधिकता से बच्चों में मेटाहीमोग्लाबिनेमिया नामक बीमारी हो जाती है तथा आंतों में पहुंचकर नाइट्रोसोएमीन में बदलकर पेट का केंसर उत्पन्न कर देता है। फ्लोरीन की अधिकता से फ्लोरोसिस नामक बीमारी हो जाती है। प्रदूषित गैस कार्बन डाइअॅाक्साइड तथा सल्फर डाइआॅक्साइड जल में घुसकर जलस्रोत को अम्लीय बना देते हैं। फ्लाईऐश के कण पार्टीकुलेट मैटर के रूप में हवा तैरते हैं। इन अति सूक्ष्म कणों का व्यास 2.5 माइक्रोमीटर से भी कम होता है। इसलिए उन्हें पी.एम 2.5 कहा जाता है। जिनका व्यास 10 माइक्रोमीटर से कम होता है उन्हें पीएम 10 कहा जाता है। फलाईऐश के कणों का पी.एम 2.5 स्तर का 60 से अधिक होने पर ये सूक्ष्म कण आसानी से सांस के जरिए फेफड़ों तक पहुंच जाते हैं और खून में आॅक्सीजन की मात्रा कम कर देते हैं। सर्दी के मौसम में ब्रोंकाइटिस की आशंका अधिक रहती है। दमा बढ़ जाता है।  पाॅवर प्लांट के करीब 400 किलोमीटर के दायरे में विसर्जित फलाई ऐश में 2.5 माइक्रो ग्राम से भी कम व्यास वाले पर्टिकुलेट मैटर,सल्फर डाइआॅक्साइड, नाइट्रोजन आॅक्साइड, कार्बन मोनो आॅक्साइड कार्बन यौगिक वातावरण में जहर घोल का काम करते हैं। इससे सांस लेने में तकलीफ होती है। इस वजह से श्वसन संबंधी बीमारियां होती है। आंकड़ों के मुताबिक बीते 5 साल में राखड़ प्रभावित 10 ब्लॉकों के 14 हजार से ज्यादा लोगों में जांच के दौरान टीबी के लक्षण पाए गए।
राखड़ में खतरनाक रेडिऐशन
एनजीटी में राखड़ निष्पादन के मुद्दे पर याचिका डालने वाले लक्ष्मी चैहान कहते हैं, कोयला परिवहन के लिए प्रस्तावित रेल काॅरिडोर के तहत कोरबा और रायगढ़ में उत्सर्जित राखड़ के उपयोग को भी सुनिश्चत किया जाए। लक्ष्मी चैहान के अनुसार 3000 से 4000 एकड़ जमीन तक फ्लाई ऐश फैला पड़ा है। जिससे वातावरण विषेला हो गया है। पावर प्लांट कोयला की राख को देंगुर नाला में बहा देते हैं। यह नाला हसदेव नदी से मिलता है। फ्लाई ऐश की वजह से कई प्रकार की मछलियां जैसे मोंगराई, कोटराई, गोराई, नौरी, देवा, सिअर, झोरी, चिन्ना व पुथी अब नहीं दिखती। सिर्फ जल ही नहीं कोरबा की हवा भी प्रदूषित हो गई हैं। 
कोरबा की तरह रायगढ जिला की भी स्थिति है। ज्यादातर कोयला खदान वन क्षेत्र में है। इस वजह से 40 फीसदी वन घट गया है। खेतो में हरियाली की जगह कोयले की राख जमी हुई है। यहां कई स्थानों से निकलने वाली राख इतना ज्यादा है कि जगह जगह टीले बन गए है। जिले में करीब 31 लाख हेक्टेयर जमीन पर खेती हुआ करती थी। लेकिन राख की वजह से अब किसानों की उस जमीन पर राखड़ डंप किया जा रहा है जो इन्हें पट्टे पर मिली हुई है। एक रिपोर्ट के अनुसार य.ूपी, महाराष्ट, पश्चिम बंगाल के मुकाबले छत्तीसगढ़ राख छोड़ने में सबको पीछे छोड़ दिया है। 
 






Wednesday, June 12, 2019

पर्यावरण की हत्या का ठेका


  पर्यावरण की हत्या का ठेका
बैलाडीला की खदान और पच्चीस हजार हरे पेड़ काटने का ठेका गौतम अडानी को दिये जाने से सियासी बवाल मचा हुआ है। सरकार का दावा है कि रमन सरकार ने यह आदेश दिया था। बस्तर के आदिवासी इसका पुरजोर विरोध कर रहे हैं। वहीं पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी ठेका रद्द नहीं किये जाने पर अपनी जान देने की बात कहकर सरकार को सकते में डाल दिये हैं।

0 रमेश कुमार ’’रिपु’’
                      चलो छत्तीसगढ़ चलो। हरे पेड़ काटना है। गौतम अडानी को बैलाडीला की खदान और 25 हजार 400 पेड़ काटने का ठेका मिला हुआ है। आप बेरोजगार युवक हैं तो आइये। एक कुल्हाड़ी हरे पेड़ों पर चलाइये। पर्यावरण की हत्या में हम आगे नहीं आयेंगे। यही कहोगे तो उससे क्या अडानी का ठेका रद्द हो जायेगा? नहीं,न। तो फिर अपनी बेरोजगारी दूर करिये कुछ दिनों के लिए। ऐसी सियासी अपील विपक्ष इन दिनों भूपेश सरकार का मजाक उड़ाने के लिए कर रहा है।
दरअसल जब तक डाॅ रमन सिंह की सरकार थी कांग्रेस चीखती रही कि विकास के नाम पर हरे पेड़ों की बलि ली जा रही है। अब कांग्रेस की सरकार बैलाडीला की 13 नम्बर की खदान का ठेका अडानी को देकर विरोध को जाल में फंस गई है। यह अलग बात है कि सरकार 7 जून से सरकार के फैसले का विरोध कर रहे आदिवासियों के एक प्रतिनिधि मंडल की चार मांगों को स्वीकार कर आंदोलन की तपिश का कम करने की सियासी चाल चली गई है। प्रभावित क्षेत्र में वनों की कटाई पर तुरंत रोक लगेगी। वर्ष 2014 के फर्जी ग्राम सभा के आरोप की जांच कराई जाएगी। क्षेत्र में संचालित कार्यों पर तत्काल रोक लगाई जावेगी। राज्य सरकार की ओर से भारत सरकार को पत्र लिख कर जन भावनाओं की जानकारी दी जाएगी।
आदिवासी गुस्से में
दंतेवाड़ा से करीब 30 किलोमीटर दूर किरंदुल में 5000 से ज्यादा आदिवासी नेशनल मिनरल डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन(एनएमडीसी) के दफ्तर के बाहर डेरा डाले हुये हैं और बैलाडिला की पहाड़ियों पर हो रहे लौह,खनन का विरोध कर रहे हैं। इस खनन से यहां नंदीराज पहाड़ी के अस्तित्व पर संकट छा गया है जिसे गोंड, धुरवा, मुरिया और भतरा समेत दर्जनों आदिवासी समूह अपना देवता मानते हैं और उसकी पूजा करते हैं। यहां दो पहाड़ हैं। नन्दराज पहाड़ के सामने का पहाड़ पिटोरमेटा देवी का पहाड़ है। दोनों पहाड़ में भरमार लोह अयस्क है। जिसके लिए ही यह सौदा हुआ है। खदान की ऊंची पहाड़ियां सदाबहार हरे भरे पेड़ो से और वनोऔषधियों से भरी हुई थी। ये आदिवासी आसपास के 50 किलोमीटर के दायरे में फैले गांवों से पैदल चलकर किंरदुल पहुंचे है।दंतेवाड़ा, बीजापुर और सुकमा के गांवों से आये लोग तेज गर्मी और बारिश के बावजूद विरोध स्थल पर डटे हुये हैं। उनका कहना है कि अपने आराध्य देवता की प्रतीक इस पहाड़ी को खनन के लिये देने को वो तैयार नहीं हैं। यह पहली बार नहीं है कि खनिजों से समृद्ध पहाड़ को खोदने की तैयारी को आदिवासियों की आस्था का सामना करना पड़ा हो। उड़ीसा में बाक्साइट से भरी नियामगिरी की पहाड़ियों को भी स्थानीय डोंगरिया कोंध आदिवासियों ने अपने आंदोलन से बचाया। नियाम राजा कोंध आदिवासियों का देवता है और सुप्रीम कोर्ट ने इनके पक्ष में फैसला दिया।
भूपेश के समक्ष समस्या
भूपेश सरकार के समक्ष विकट समस्या है। यदि केन्द्र सरकार से पैसा चाहिए तो वो इतनी हिम्मत नहीं दिखा सकती कि अडानी का ठेका रद्द कर दे। वैसे बस्तर जाने के रास्ते में लाइन से पेड़ ऐसे बिछे और कटे हैं जैसे युद्ध में लाशें बिछ जाती हैं। रमन सरकार के समय भी एक लाख पेड़ काटे जा चुके हैं। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने बैलाडीला खदान अडानी को दिए जाने के मामले में कहा कि रमन बताएं कि वे अडानी को माइंस देने के पक्ष में हैं या नहीं। उन्होंने सफाई देते हुए कहा, पिछली सरकार के जो फैसले होते हैं उसे वर्तमान सरकार के अधिकारी तब तक कैरी ऑन करते हैं जब तक कोई नया फैसला नहीं हो जाए।
पेड़ काटने की अनुमति नहीं दी
बैलाडीला पहाड़ में एनएमडीसी के खदान नम्बर 13 में खनन के खिलाफ आदिवासियों के जारी विरोध के बीच वन मंत्री मो अकबर ने दस्तावेज पेश करते हुए बताया कि वहां वृक्ष काटने की अनुमति जनवरी 2018 में तात्कालीन रमन सरकार ने दी थी। उनके खिलाफ लगाए जा रहे सभी आरोप झूठे हैं। कांग्रेस सरकार ने और राज्य वन मंत्रालय ने कोई भी अनुमति पर्यावरण को लेकर नहीं दी थी। सहमति पर्यावरण विभाग ने नहीं बल्कि, पर्यावरण संरक्षण बोर्ड ने दी थी। उन्होंने कहा कि पर्यावरण संरक्षण बोर्ड केंद्र सरकार की जल एवं वायु प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण अधिनियम के तहत गठित एक स्वायतशासी संस्था है, जिसकी कार्रवाई अलग से चलती है। बोर्ड के फैसले अलग से होते हैं। चूंकि ये एक स्वतंत्र इकाई है इसलिए इनकी बैठकों में मंत्री शामिल नहीं होते। गौरतलब है कि पूरे मामले में अजीत जोगी और रमन सिंह ने राज्य सरकार पर अडानी को पर्यावरणीय स्वीकृति देने का आरोप लगाया है। रमन सिंह कहना था कि अप्रेल में मो. अकबर के वन मंत्रालय में वहां पर खनन की पर्यावरणीय स्वीकृति दी थी।
दोहरा मापदंड क्योंः उसेंडी
बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष विक्रम उसेंडी ने कहा है कि राज्य सरकार दोहरा मापदंड अपनाकर गुमराह कर रही है। जल, जंगल और जमीन का मुद्दा आदिवासियों के लिए उनकी अस्मिता और आत्मा से जुड़ा मुद्दा है, जिसका भाजपा पूरा सम्मान व समर्थन करती है। वर्तमान सरकार इस खदान के पक्ष में नहीं थी तो अप्रैल 2019 में पर्यावरण विभाग ने अनुमति का विरोध क्यों नहीं किया। गौरतलब है कि अडानी को खदान का आवंटन बीजेपी सरकार के समय हुआ और दूसरी तरफ गिदौरी.पितौरी कोयला खदान का आवंटन राज्य सरकार के सीएसइबी को हुआ है। खनन का कार्य अडानी कंपनी को लोकसभा चुनाव के एक महीने पहले 848 रुपए प्रति टन के दर पर दिया गया है। मुख्यमंत्री बघेल यह स्पष्ट करें कि इतनी उच्च दर पर कोयला खदान का आवंटन अडानी कंपनी को क्यों किया गया। जबकि गार,े पलमा कोयला खदान बीजेपी सरकार ने लगभग 550 रुपए प्रति टन की दर से दी थी। सवाल यह है कि दोनों कोयला खदानों की दरों में इतना अंतर क्यों है।
पीछे नहीं हटेंगे:मंडावी
रमन सरकार ने पाँचवी अनुसूचित क्षेत्र को संविधान द्वारा मिले विशेष अधिकारों को दरकिनार करते हुए गौतम अडानी की कम्पनी को फायदा पहुुचाने के मकसद से आदिवासियों के जल, जंगल, जमीन को योजनाबद्ध तरीके से तहस नहस करने का खाखा तैयार किया था। अब सात जून से बीजापुर और दंतेवाड़ा जिले के पच्चीस हजार से अधिक आदिवासी विरोध में आंदोलनरत है। इस आंदोलन के समर्थन में बीजापुर विधायक और बस्तर क्षेत्र आदिवासी विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष विक्रम शाह मंडावी ने लौह आयस्क खनन के विरोध में संघर्षरत आदिवासियों से वादा किया कि हिरोली स्थित पिटोम मेटा पहाड़ में बीजापुर, दंतेवाड़ा, और सुकमा के आदिवासियों का देव स्थल है, आदिवासियों की आस्था के साथ किसी भी कंपनी को खिलवाड़ नहीं करने दिया जायेगा। इस मसले पर प्रदेश और केंद्र की सरकार से बात करेंगे। जरूरी हुआ तो वे केन्द्र सरकार के खिलाफ मोर्चा भी खोलेंगे। बस्तर के आदिवासियों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचने देंगे।
मरना पसंद करूंगा: जोगी
पूर्व मुख्यमंत्री एवं जनता कंाग्रेस छत्तीसगढ़ जे के सुप्रीमों अजीत जोगी ने कहा,’मैं मरना पसंद करूंगा लेकिन भूपेश सरकार को अड़ानी को एक फावड़ा या कुदाल चलाने की अनुमति नहीं देने दूंगा।  सरकार बनने के पहले भूपेश कहते थे कि अडानी को एक भी खदान नहीं लेने दूंगा,सरकार बनने के बाद उसी अडानी को पांच खदानें दे दी।
आस्था से खिलवाड़ मंजूर नहीं
नंदराज पहाड़ को बचाने के लिए बैलाडीला में चल रहे आदिवासियों के आंदोलन के बीच पूर्व केंद्रीय मंत्री अरविंद नेताम और नवनिर्वाचित सांसद दीपक बैज ने कहा, आदिवासियों की आस्था से खिलवाड़ सरकार और कोई भी न करे उनके लिए ठीक नहीं होगा। इसकी लड़ाई सड़क से संसद तक लड़ने में पीछे नहीं हटेंगे।
क्यों भड़कता है असंतोष
जमीन अधिग्रहण को लेकर बस्तर मे असंतोष आखिर बढ़ता क्यों है। जाहिर है कि सरकर की बेईमानी और आदिवासियों की समस्याओं को नजर अंदाज किया जाता है।  हर पार्टी की सरकार अपने राज में किसानों, ग्रामीणों और आदिवासियों को विकास की राह में अड़चन मानती आयी हैं। जमीन लेने से पहले न तो ईमानदारी से जनसुनवाई होती है और न ही भू स्वामियों को प्रोजेक्ट के बारे में पूरी जानकारी दी जाती है। इसके अलावा पर्यावरण नियमों की अनदेखी और कृषि क्षेत्र का विनाश लोगों की मुख्य शिकायत रहती है। इसीलिये जिस तरह 15 साल पहले लोहांडीगुडा में लोग जन सुनवाई के तरीके और पारदर्शिता न बरते जाने से भड़के थे, वही स्थिति किरंदुल में धरना दे रहे आदिवासियों की है। सवाल है कि दो सरकारी कंपनियों एनएमडीसी और सीएमडीसी छत्तीसगढ़ मिनरल डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन का ज्वाइंट वेंचर होने के बावजूद आखिर निजी कंपनी अडानी ग्रुप को क्यों आमंत्रित किया गया। मई 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दंतेवाड़ा के पास डिलबिली में 24000 करोड़ रुपये के अल्ट्रा मेगा स्टील प्लांट का उद्घाटन किया। जिसका अभी तक कहीं नामोनिशान नहीं है। यह स्टील प्लांट सरकारी कंपनी स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया की ओर से लगाया जाना है। लेकिन स्थानीय लोगों के विरोध के कारण इस प्रोजेक्ट को यहां नहीं लगाया जा रहा। कहा जा रहा है कि किरंदुल में भी सड़क बनाने के नाम पर करीब 1 लाख पेड़ों को काटा जायेगा, जिससे विरोध के स्वर और ऊंचे हो गए हैं।
नक्सली उठाते हैं फायदा
दंतेवाड़ा में आदिवासी अपनी जमीन और देवता के लिये हाथों में तीर,कमान और कुल्हाड़ी लेकर डटे हैं और उनके सैंकड़ों साथी जनवादी गीत गा रहे है। सरकार इस धरने पर निगरानी के लिये ड्रोन की मदद ले रही है ताकि, संघर्ष में शामिल नक्सलियों की पहचान हो सके। बंगाल के नंदीग्राम और लालगढ़ से लेकर छत्तीसगढ़ के लोहांडीगुडा और दंतेवाड़ा और उड़ीसा के नियामगिरी से लेकर आंध्र प्रदेश के पोलावरम तक माओवादियों के लिये ऐसे आंदोलन अपनी पैठ बढ़ाने के लिए मुफीद होते हैं।
वरिष्ट पत्रिकार रमेश शर्मा कहते हैं,छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल सरकार ने सत्ता में वापसी के बाद टाटा के स्टील प्लांट के लिये ली गई किसानों की जमीन लौटाने का जो काम शुरू किया, उससे विश्वास का माहौल बन सकता था और यही रास्ता बस्तर में नक्सलवाद से लड़ने की दिशा में पहला कदम हैं। लेकिन ताजा घटना बताती है कि सरकार के सामने नये सिरे से विश्वास को बहाल करने की चुनौती है, जिसमें ड्रोन के बजाय ग्रामीणों से बातचीत कहीं बड़ा हथियार होगा’’।
नाम की तख्तियां हैं,पेड़ नहीं
राजधानी रायपुर से लगभग डेढ़ सौ किलोमीटर दूर जांजगीर चांपा जिला से 25 किलोमीटर दूर पामगढ़ विकास खंड और बलौदा वन परिक्षेत्र के तहत भैसो गांव में 10 हेक्टेयर जमीन पर जिधर भी नजर दौड़ाओ तो अफसरों,नेताओं और मंत्रियों के नाम की तख्तियां नजर आती है। लेकिन यह तख्ती लगी क्यों है,पूछने पर गांव के मोहन बघेल बताते हैं, महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गांरंटी योजना के तहत यहां 11 हजार पौधे रोपे गए थे। इसका उद्घाटन मुख्यमंत्री डाॅ रमन सिंह ने पौधा रोपकर किया था। इसके लिए शासन से 17.67 लाख रूपए खर्च किया गया था। कुछ ही दिनों बाद सभी पौधे सूख गए लेकिन, अधिकारियों की लगी तख्तियां हरियर छत्तीसगढ़ का मजाक उढ़ा रही हैं। इस गांव की कथा से अलग एक कथा और भी है।
पोस्टरों में हरियर छत्तीसगढ़
सरगुजा से बस्तर तक हरे हरे पेड़ों की लाशें बिछी हुई हैं। जगदलपुर नेशनल हाइवे के किनारे सैकड़ों पेड़ काट दिए गए हैं। इसी तरह बस्तर जिले मंे माचकोट वन परिक्षेत्र केे तहत पीरिया गाव में एनएमडीसी की पानी की पाइप लाइन बिछाने के लिए सबरी से नगरनार तक 24 किलोमीटर तक के रास्ते में चार हजार पेड़ काटे गए। पूरे बस्तर संभाग में लाखों पेड़ धराशाही कर दिए गए हैं। बावजूद इसके वन मंत्री का दावा है कि हरियर छत्तीसगढ़ है हमारा। सरकार कहती है जंगलों की सुरक्षा के लिए जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है। पौधा रोपण कर जंगल बढ़ाने का प्रयास किया जाएगा। गौरतलब है कि इस साल गर्मी में बिलासपुर का तापमान 48 डिग्री सेल्सियस था। जाहिर है कि हरियर छत्तीसगढ़ सिर्फ नारों और पोस्टरों पर दिख रहा है। हरियर छत्तीसगढ़ योजना के तहत रमन सरकार के समय 9000 करोड़ रूपए का वृक्षारोपण किया गया था,बावजूद इसके जंगलों का रकबा कम होना चैकाता है। 10 साल में 250 वर्ग किलोमीटर जंगल गायब हो गए है। सरगुजा से बस्तर तक अंधाधुंध विकास के नाम पर आधे से अधिक जंगल साफ हो गए हैं।
 
 

मरीज न बनें अस्पताल

    मरीज न बनें अस्पताल
आयुष्मान योजना से आगे की योजना को छत्तीसगढ़ सरकार उतारना चाहती हैं। ताकि अस्पताल मरीज न बनें। सरकार को सबके सेहत की चिंता है,इसलिए डेढ़ साल के भीतर सभी 27 जिला अस्पतालों को मल्टी स्पेशियलिटी बनाया जाएगा। आयुष्मान योजना में ऐसी कई बीमारियां है, जिनका इलाज नहीं है। और इस योजना का लाभ मरीजों को भर्ती होने के बाद मिलता है। जबकि इससे बेहतर कई योजनाएं प्रदेश में संचालित हैं। प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री टी.एस.सिंह देव से बीमार स्वास्थ्य व्यवस्था की अंतहीन पीड़ा और स्वास्थ्य को लेकर रमेश कुमार ‘‘रिपु‘‘ ने उनसे बातचीत की,जिसके प्रमुख अंश -

0 प्रदेश सरकार आयुष्मान योजना को केरल,ओड़िसा,दिल्ली सरकार की तरह क्या इसलिए बंद करना चाहती है इसलिए कि यह केन्द्र की बीजेपी सरकार की योजना है?
00 छत्तीसगढ़ में अभी आयुष्मान योजना बंद नहीं की जा रही है। बताया जा रहा है कि छत्तीसगढ़ में आयुष्मान पांच लाख रूपये तक का उपचार नहीं कर रही है। छत्तीसगढ़ सरकार के पास आयुष्मान योजना से आगे जाने की योजना है। इसे राजनीतिक रंग देकर लोग देख रहे हैं कि बीजेपी की योजना है इसलिए इसे बंद किया जा रहा है। जबकि ऐसा नहीं है। आयुष्मान योजना को देश की पांच सरकारों ने नहीं स्वीकारा। उनका कहना है कि हमारे यहां इससे बेहतर योजनायें है। प्रदेश सरकार के पास भी इससे अच्छी योजनायें हैं। संजीवनी सहायता कोष जैसी योजनाएं संचालित हैं।
0 कई जिला अस्पताल खुद बीमार हैं। उनके उपचार की दिशा में क्या करने जा रहे हैं?
00 वर्तमान में कई अस्पतालों में विशेषज्ञ चिकित्सक तो हैं लेकिन, जरुरी संसाधनों की कमी है। इसलिए प्रदेश के सभी 27 जिला अस्पतालों को मल्टी स्पेशियलिटी अस्पताल में अपग्रेड किया जाएगा। इसके अलावा सभी 6 मेडिकल कॉलेजों को सुपर स्पेशियलिटी बनाया जाएगा। इसके लिए राज्य सरकार ने तैयारी शुरू कर दी है। योजना के मुताबिक अगले डेढ़ साल में इन अस्पतालों को नई सुविधाओं से लैंस कर दिया जाएगा। ऐसा इसलिए किया जा रहा है कि ताकि स्वास्थ व्यवस्थायें दुरूस्त हो सकंे। ऐसा होने से सामुदायिक और प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र में भी मरीजों को बेहतर इलाज मिल सकेगा।   
0 आयुष्मान योजना को अन्य योजनाओं से बेहतर बताया जा रहा है। यदि ऐसा नहीं है तो फिर खामियां क्या है?
00 छत्तीसगढ़ में आयुष्मान योजना केवल 42-43 लाख नागरिकों को ही कव्हर्ड करता है। 17-18 लाख इसके दायरे में नहीं आते। जबकि सबको स्वास्थ्य सुविधा मिलनी चाहिए। यूपीए सरकार के समय प्रधान मंत्री स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत 50 हजार रूपये तक के इलाज की व्यवस्था थी। पहले 300 रूपये में स्वास्थ्य बीमा होता था, आज 11 सौ रूपये लगते है। जाहिर है कि बीमा कंपनियों के माध्यम से टैक्स पेमेंट दूसरी जगह जा रहा है। 11 सौ रूपये के प्रीमियम पर 50 हजार रूपये तक के इलाज की सुविधा है। जिसमें 60 फीसदी केन्द्र सरकार देती है और 40 फीसदी राशि राज्य सरकार। 50 हजार रूपये के उपचार में छत्तीसगढ़ सरकार ट्रस्ट माॅडल के तहत पेमेंट कर रही है। दरअसल आयुष्मान योजना के संदर्भ में कइयों को जानकारी नहीं है। इस योजना में कई खामियां है। इस योजना में मरीजों को फायदा,उसके भर्ती होने के बाद मिलता है। यानी भर्ती होने से पहले जितनी भी जांचे हैं मसलन,एक्सरे,ब्लड जांच,सोनोग्राफी आदि जांच के लिए मरीज को भर्ती से पहले खुद पेमेंट करना पड़ेगा। जाहिर सी बात है कि हर मरीज तो भर्ती नहीं होता। एक जानकारी के अनुसार 70-86 फीसदी लोग भर्ती नहीं होते। दूसरी ओर आयुष्मान योजना में ऐसी कई बीमारियां हैं, जिनका इलाज नहीं है। गेंगरीन के आॅपरेशन की व्यवस्था है, लेकिन शुगर का नहीं होगा। आयुष्मान योजना में 13 सौ बीमारी के उपचार की व्यवस्था है लेकिन, पांच लाख से ऊपर के इलाज की व्यवस्था नहीं है। 
0 तो क्या आयुष्मान योजना 13 सौ बीमारियों का इलाज जुमला है। यह केवल मन की बातें और प्रचार तक ही सीमित है?
00 एक हद तक यह जुमला ही है। आयुष्मान में 10 करोड़ परिवार को इंगित किया गया है।  50 करोड़ लोग इसके दायरे में आयेंगे। लेकिन 70 करोड़ लोगों को इसका लाभ नहीं मिलेगा। इसकी अपनी सीमा है। छत्तीसगढ़ में पचास हजार के ऊपर के उपचार में केन्द्र सरकार का कोई योगदान नहीं है। यह केवल मन की बातें और प्रचार तक आयुष्मान योजना उपस्थित है। सबको स्वास्थ्य का लाभ मिल सके और बीमार अस्पताल का भी इलाज हो सके, इसलिए छत्तीसगढ़ सरकार ने स्वास्थ्य विभाग की बेहतरी के लिए बेहतर योजनाओं पर काम कर रही है। प्रदेश की संजीवनी सहायता कोष से 30 बीमारियों का इलाज होता है। हाॅर्ट की बीमारी के लिए डेढ़ लाख,किडनी ट्रांसप्लांट के लिए तीन लाख रूपये की सहायता मिलती है।
0 क्या यह मान लिया जाये कि अयुष्मान योजना का विकल्प है सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल?
00 आयुष्मान योजना की कल्पना है निःशुल्क उपचार। लेकिन उसकी अपनी एक सीमा है। हम उस सीमा से आगे जाकर सबको स्वास्थ्य लाभ देना चाहते हैं। पांच लाख से ऊपर जाने की चुनौती है। हार्ट,लीवर आदि के ट्रांसप्लांट की व्यवस्था हो, यह चाहते हैं। सुपर स्पेशियलिटी में न्यूरो सर्जरी, न्यूरो लाजिस्ट कार्डियक नेफ्रो, सर्जरी, पीडियाट्रिक, आंतों समेत सभी बड़ी बीमारियों के विशेषज्ञ और सर्जरी की मशीनरी के साथ डाॅक्टर भी उपलब्ध रहेंगे। मल्टी स्पेशियलिटी मेडिसिन, सर्जरी पीडियाट्रिक,और हड्डी रोग विशेषज्ञ जैसी सुविधाएं उपलब्ध होंगी। प्रदेश में अभी एक मात्र सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल डीकेएस रायपुर में है। योजना के मुताबिक अगले डेढ़ साल में 6 मेडिकल कॉलेजों में मिलेगी सुपर स्पेशियलिटी सुविधा। जिला अस्पतालों में ट्राॅमा सेंटर से लेकर तमाम सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी।
0 मेडिकल काॅलेजों में मरीजों का रिकार्ड रखने को क्यों कहा गया है।
00 दरअसल मेडिकल काॅलेज में हर तरह के मरीज आते है। ओपीडी में जितने भी रजिस्ट्रेशन हो रहे हैं,उनके नाम और बीमारी की जानकारी हर हफ्ते मेडिकल कॉलेज में उपलब्ध कराई जाएगी। हर महीने इसकी समीक्षा कर यह पता लगाया जाएगा कि जिस बीमारी का उपचार प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र में हो सकता है, उसके लिए मरीज मेडिकल कॉलेज क्यों आ रहे हैं।
0 छत्तीसगढ़ में एक चिकित्सक पर 25 हजार मरीजों के उपचार का दायित्व है। ऐसी स्थिति मंे नया छत्तीसगढ़ गढ़बों का नारा कितना असरकारक है।
00 इससे इंकार नहीं है कि चिकित्सकों और विशेषज्ञों की कमी है। सभी जिलों में चिकित्सकों की भर्ती चल रही है। अभी हमारे पास मात्र 132 स्पेशलिस्ट है। जबकि 1500 चाहिए। 800 मेडिकल आॅफीसर की कमी है। 300 मेडिकल आॅफीसर के पद भरे जायेंगे। 425 पद खाली हैं। जिसमें 345 चिकित्सकों के इंटरव्यू के लिए आये हैं। इनकी पोस्टिंग के बाद 600 और मेडिकल आॅफीसर की भर्ती के इश्तिहार निकाले जायेंगे। बेहतर पैकेज दिये जायेंगे। मेडिकल काॅलेज से हर साल एक हजार चिकित्सक निकल रहे हैं। ऐसी नीतियां बनायेंगे कि हर चिकित्सक को दो साल ग्रामीण क्षेत्रों में चिकित्सकीय सेवा देना अनिवार्य है।
0 पिछले 10-15 सालों में डेढ़ हजार चिकित्सक इस्तीफा दे चुके हैं। दो हजार पद रिक्त हैं। ऐसी स्थिति में क्या सरकारी अस्पतालों को निजी हाथों में दे देना चाहिए? 
00 सवाल यह है कि क्या निजी चिकित्सक ग्रामीण क्षेत्रों में जाना पसंद करेंगे। सरकारी नौकरी हर कोई चाहता है। फिर सवाल यह है कि कोई निजी क्षेत्रों में भागकर जो चिकित्सक काम कर रहे हैं वो सरकारी आस्पताल में काम क्यों नहीं करना चाहते। यदि निजी क्षेत्र के चिकित्सक सरकारी अस्पतालों में काम करने को इच्छुक हैं तो आयें। उनका स्वागत है। सरकार उन्हें सवा लाख,दो लाख और ढाई लाख का पेकेज देने को तैयार है। आपको बता दें कि बीजापुर कैंपस में हमारे यहां के प्रतिनिधि गये। उन्होने देखा कि लखनऊ के चिकित्सक वहां काम कर रहे हैं। जब बाहर के लोग यहां काम कर सकते हैं तो फिर यहां क्यों नहीं। दक्षिण भारत के हर जिले में मेेडिकल काॅलेज हैं। एमीबीएस चिकित्सक 20-30 हजार रूपये के वेतन पर काम कर रहे हैं। चुनाव के बाद दक्षिण भारत के कैंपेस में जाकर हम ऐसे चिकित्सकों को आमंत्रित करेंगे। उन्हें वहां से अधिक पैकेज देंगे। सरकारी अस्पतालों में चिकित्सकों की कमी को इस तरह दूर करने की योजना है। जो स्पेशलिस्ट डाॅक्टर ग्रामीण क्षेत्रों में हैं उनकी पोस्टिंग जिला चिकित्सालय में की जायेगी। कांग्रेस के घोषणा पत्र में जिक्र है नर्सो की वेतन विसंगतियों को दूर करना।
0 चिकित्सा के क्षेत्र में सरकार की और क्या योजनायें हैं।
00 मिनी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पीएचसी में अभी दो का स्टाफ होता है। लेकिन इसमें दो स्टाफ और बढ़ाने पर विचार किया जा रहा है। इस तरह दो अतिरिक्त स्टॉफ के साथ इसे 24 घंटे सातों दिन खुला रखने पर विचार किया जा रहा है। पिछले साल भवनहीन अस्पतालों के लिए 900 भवन तैयार किये गये। जहां खनिज से पैसा आ रहा है,उन पैसों का इस्तेमाल वहीं पर चिकित्सा क्षेत्रों में किया जायेगा।
0 पिछले दिनों प्रधान मंत्री ने कहा छत्तीसगढ़ सरकार आयुष्मान योजना का बेहतर क्रियान्वयन नहीं कर रही है। क्या यह सच है।
00 मुझे लगता है कि नेशनल हेल्थ अथाॅरिटी को आंकड़ों की जानकारी है,लेकिन प्रधान मंत्री को नहीं है। इसलिए वे गलत बयानी कर गये छत्तीसगढ़ में। नेशनल हेल्थ अथॉरिटी द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के मुताबिक छत्तीसगढ़ आयुष्मान योजना के क्रियान्वयन पर देश में पहले नंबर पर है। छत्तीसगढ़ में एक लाख में 95 लोगों का इलाज आयुष्मान योजना के द्वारा संभव हुआ है। केंद्र सरकार की नेशनल हेल्थ अथॉरिटी द्वारा जारी किये गये आंकड़े यह बताते हैं कि दूसरे नंबर पर देश में जो राज्य है वहां एक लाख में सिर्फ 26 लोगों का इलाज आयुष्मान योजना से हो पा रहा है।