Thursday, February 17, 2022

स्त्री-पुरुष के संबंधों की नई भंगिमा

            



0 श्रीमती अंजू मिश्रा
बदलती जीवन शैली और बदलती मान्यताओं की वजह से प्यार की दुनिया में मुहब्बत के अफसाने भी बदल गए हैं। पति-पत्नी के बीच रिश्तों में खटास और नई पीढ़ी के मन में भावनाओं का रंग भी बदल गया है। अब मुहब्बत की जुबां बदल गई है, मगर मन से मुहब्बत की कशिश नहीं गई है। स्त्री-पुरुष के संबंधों को ‘इश्क की हरी पत्तियांँ’’ में बहुत गहराई से वरिष्ठ पत्रकार रमेश कुमार ‘रिपु’ ने उकेरा है। संग्रह की पन्द्रह कहानियांँ में स्त्री पात्र बोल्ड और वर्जना रहित हैं। क्यों कि वे मेट्रो सिटी की हैं,मगर संवेदनशील हैं। यह किताब स्त्री-पुरुष के रिश्तों की नई भंगिमा का कैनवास है। कहानी स्त्री विमर्श के दायरे में है,साथ ही उच्च मध्यमवर्गीय परिवार में स्त्री-पुरुष के संबंधों की प्रेम संवेदना जीवन के प्रति प्रतिबद्ध है। यह कहानी संग्रह मूल्यांकन के लिए चुनौती से कम नहीं है।  
पहली कहानी ‘कितनी दूरियां’ में दर्द मन की तलहटी में पढ़ते-पढ़ते जन्म ले लेता है। और उस दर्द का अंत तब होता है,जब कहानी खत्म होती है। सवाल यह है,कि मन की भावनाओं से देह की कितनी दूरियाँं होती हैं..? इतनी,जैसे होंठ से लिपस्टिक। पांँवों से पायल और फूल से खुशबू! अपने से सात साल बड़ी मुस्लिम लड़की को हिन्दू लड़का उसे रिझाने,प्यार के प्रति उसकी सोच को बदलने के साथ,उसकी ज़िन्दगी को बदल देने के लिए जो कवायद करता है, वो काबिले तारीफ है। साझा संस्कृति की यह कहानी बताती है,स्त्री को मन से ताकतवर होना चाहिए।
‘एक कतरा मुहब्बत’ भावनात्मक कहानी है। युवा बेटी मांँ से किये गये वायदे पर,अपने पिता की पूर्व प्रेमिका को उनसे मिलवाती है। कहानी के कुछ संवाद दिल में जगह बना लेते हैं। ‘बहुत लोग जिन्दगी में लघुकथा की तरह आते हैं और जब जाते हैं, तो उपन्यास की दास्तांँ छोड़ जाते हैं।’ जब भी पत्नी से झगड़ा होता है,मर्दो को अपने पहले प्यार की बड़ी याद आती है।’’
‘राइट परसन,इश्क में खजुराहो होना,ज़िन्दगी की बैलेंस शीट,दूसरी मुहब्बत आदि कहानियों को पढ़ने से ऐसा लगता है,मानो कामदेव ने कागज पर संवाद लिखे हों। ‘बेशर्म दिल’ऊंचे ख्वाब की वजह से लीव इन रिलेशन शिप वाली लड़कियों की जिन्दगी में ऐसा वक्त आता है,जब उनके पास सिर्फ तन्हाई रह जाती है। अपने ब्वाॅय फ्रेंड को अपनी सहेली के पास भेज देती है। ताकि उसकी सहेली का दिल उस पर आ जाये और वह किसी और पर डोरे डाल सके। ‘मचलती लहर’ इश्क की दुनिया के रहस्मयी संसार की कथा है। जहांँ महबूबा चाहती है, कि उसके पति का मर्डर, उसका प्रेमी कर दे,फिर सुकून से मुहब्बत की शैपेन प्रेमी के साथ पी सकें। यह एक थ्रीलर कहानी है। जिसमें रोमांच गजब का है।   
‘दूसरी मुहब्बत’ जैसी औरत समय रहते खुद को नहीं बदलती, तो उनके दाम्पत्य जीवन में इश्क़ का रंग बेनूर हो जाता है। ‘मन का सावन’ दरकती वफ़ाओं के दंश की ऐसी कहानी है,जिसमें युवती को कैंसर होने पर उसका भ्रम टूटता है,कि उसका पति उस पर अपनी जान लुटाता है। बेस्ट फ्रेंड उसका इलाज कराता है। तब उसे माँ की बातों पर यकीं होता है, कि बेस्ट फ्रेंड लाइफ पाटर्नर हों,तो जिन्दगी में शिकायत का मौका नहीं मिलता।
‘प्यार का रेशमी धागा’दिलों में बढ़ते दरार की अनोखी कहानी है। सवाल यह है, कि यदि पति बदल जाये तो पत्नी को कितना बदल जाना चाहिए। कहानी को समझने के लिए कहानी के अंदर उतरना पड़ेगा। लेखक ने कहानी के लिए जो भाषा रची है,वह पति और पत्नी की भावनाओ को स्पर्श कराता है। ‘इश्क की हरी पत्तियांँ’ में एक नपुंसक पति अपनी पत्नी को अंधेरे में रख कर पराई स्त्री में दिलचस्पी लेता है। एक औरत दूसरी औरत को माँ बनने के लिए जो रास्ता सुझाती है,वह पुरुष सत्ता के समक्ष यक्ष प्रश्न है। कोख औरत की है, तो उसकी कोख में किसका बच्चा पलेगा, क्या यह फैसला लेने का हक उसे नहीं मिलना चाहिए..?  
गाँव की मासूम लड़की को शातिर युवक अभिनेत्री बनवा देने का सब्ज बाग दिखाकर उसे मुंबई में लाकर न्यूड माॅडल बना देता है। संयोग से उसका सामना अपने प्रेमी से न्यूड माॅडल के रूप में होता है।‘‘ मुहब्बत में कुछ सांसे जिंदा लाश हो जाती हैं। और ऐसी लाशों की गिनती कभी इंसानों में नहीं होती।’’ समय और सभ्यता के उजाड़ को दर्शाता है ‘फिर रोये रंग’। रंगो की भाषा में संवाद,दिल में उतर जाते हैं। मुहब्बत है तो दुनिया है। मंगर एक सच यह भी है,कि मुहब्बत न होती, तो कुछ भी न होता।
हर कहानी अलग-अलग मूड की है। इसकी लिखावट और बुनावट ऐसी है,कि पाठक को पूरी कहानी पढ़ने के लिए विवश कर देती हैं। कहानी की भाषा और शिल्प उन पाठकों को ज्यादा पसंद आयेगी,जो नई भाषा के दीवाने हैं।
लेखक- रमेश कुमार ‘रिपु’
कीमत - 228 रुपये
प्रकाशक - प्रलेक प्रकाशन मुंबई
 
 

 
 

Thursday, November 25, 2021

रहस्य के लिफ़ाफे़ में झीरम कांड

  







जस्टिस प्रशांत मिश्रा आयोग की रिपोर्ट को देखे बगैर आख़िर वो कौन सी वजह है,जिसके चलते भूपेश सरकार ने दो सदस्यीय न्यायिक आयोग का गठन कर दिया। क्या भूपेश सरकार किसी को बचाना चाहती है? एनआइए की रिपोर्ट को कांग्रेस पहले ही नकार चुकी है। ऐसे में सवाल यह है कि एक ही मामले की तीन जांच से झीरम कांड का सच क्या है,कैसे पता चलेगा?
0 रमेश कुमार ‘रिपु’
झीरम कांड की जांच का मामला एक बार फिर सुर्खियों में है। जस्टिस प्रशांत मिश्रा आयोग की रिपोर्ट को भूपेश सरकार देखे बगैर दो सदस्यीय न्यायिक आयोग का गठन कर विपक्ष को हमला करने का मौका दे दिया। एनआइए की रिपोर्ट को भूपेश सरकार पहले ही नकार चुकी है। भूपेश सरकार का आरोप है, कि रमन सरकार के समय के नोडल अधिकारी जांँच में रोड़ा अटकाने का काम किया था। एनआइए झीरम कांड के राजनीतिक षडयंत्र के पहलू की जांच नहीं कर रही थी। इसलिए आई.जी. विवेकानंद सिन्हा के नेतृत्व में 10 सदस्यों वाली एसआइटी टीम बनाई गई। टीम में विषय विशेषज्ञों को भी शामिल किया गया और पहली बैठक पीएचक्यू रायपुर में हुई। इसके बाद कोई बैठक या जाँच अब तक नहीं हुई है।  
झीरम कांड के आठ बरस बाद जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की अगुवाई वाले आयोग ने छः नवम्बर को राज्यपाल अनुसूईया उइके को जांच आयोग के सचिव और छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार संतोष कुमार तिवारी ने सौंपी। यह रिपोर्ट 10 खंडों में है। रिपोर्ट के अंदर क्या बातें लिखी है,कोई नहीं जानता। जैसा कि राज्यपाल सुश्री अनुसुइया उइके कहती हैं, चीफ जस्टिस प्रशांत मिश्रा की ओर से उन्हें दी गई रिपोर्ट पर कानूनी राय लेने के बाद राज्य शासन को भेज दिया है। रिपोर्ट में क्या है, यह तो जस्टिस मिश्रा ही बता सकते हैं।’’  
गौरतलब है,कि 28 मई 2013 को जस्टिस प्रशांत मिश्रा की अगुवाई में जांच कमेटी बनी। उस दौरान 3 महीने में रिपोर्ट देने कहा गया, लेकिन तय सीमा में जांच नहीं हो पाई। बीस बार तारीख बढ़ाई गई। जांच आयोग ने 23 सितंबर 2021 को राज्य सरकार को पत्र लिखकर मांग की आयोग का कार्यकाल बढ़ाया जाए। अचानक 6 नवंबर 2021 को आयोग ने अपनी रिपोर्ट राज्यपाल को दी।  
झीरम कांड मामले में एनआइए ने कहा था,‘‘नक्सली अपना आतंक फैलाने के लिए, इस तरह की वारदातें करते रहते हैं।़ राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआइए) ने अपनी रिपोर्ट में हमले के लिए कांग्रेस नेताओं को ही जिम्मेदार ठहराया है। कांग्रेस ने रिपोर्ट को झूठ का पुलंदा करार देते हुए कहा,जब तक मामले की जांच सीबीआइ से नहीं होगी, मामले का पर्दाफाश नहीं होगा। सरकार के दबाव में एनआइए जांँच डायरी की रिपोर्ट बदलती रही है। एनआइए की रिपोर्ट में कहा गया है कि परिवर्तन यात्रा के दौरान कांग्रेस नेताओं पर हमला,सरकार को दहशत में डालने और सरकार को उखाड़ फेंकने की साजिश का हिस्सा था।
एनआइए ने सच छिपाया
स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंह देव ने कहा,एनआइए ने विशेष अदालत में दायर आरोप पत्र में विवादस्पद मुद्दों को शामिल नहीं किया है। खासकर कंाग्रेस की परिवर्तन यात्रा के ठीक पहले मुख्यमंत्री डाॅ रमन सिंह की विकास यात्रा बस्तर से गुजरी थी। माओवादी यदि सरकार को अस्थिर करना चाहते थे, तो हमला विकास यात्रा पर करते। एनआइए ने इस मामले मे केवल 9 लोगों की ही गिरफ्तार क्यों कर पाई? शेष 25 फरार क्यों हैं? किसने नक्सलियों को सूचना दी थी कि परिवर्तन यात्रा में महेन्द्र कर्मा शामिल हैं। गिरफ्तार व्यक्तियों के हमले का उल्लेख क्यों नहीं है। झीरम मामले में इतनी बड़ी चूक कैसे हो गई एनआइए की रिपोर्ट में इसका उल्लेख नहीं है।
गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले में सन् 25 मई 2013 में झीरम घाटी में नक्सली हमला हुआ था। जिसमें 27 कांग्रेसियों समेत 31 लोगों की नक्सलियों ने हत्या कर दी थी। कांग्रेस को शक है कि, इस हमले के पीछे कोई राजनैतिक कनेक्शन जरूर है। झीरम कांड की जाँंच केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 27 मई 2013 को एनआइए को सौंप दी थी। एनआइए ने अपनी जाँंच में 88 नक्सलियों के कैडर को संलिप्त पाया था। एनआइए ने 24 सितंबर 2014 को इस मामले में 9 लोगों के खिलाफ़ चार्जशीट दाखि़ल की। 28 सितंबर 2015 को सप्लीमेंट्री चार्जशीट में 30 लोगों को शामिल किया गया था।
प्रदेश के गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू और कृषि मंत्री रविंद्र चैबे ने 13 नवम्बर 2021 को मीडिया से कहा,प्रदेश के सबसे बड़े नक्सल हमले की जांच के टॉप सीक्रेट दस्तावेजों को लेकर अफ़सरों ने लापरवाही बरती है। जांच रिपोर्ट जब राज्यपाल के दफ़्तर से मुख्यमंत्री कार्यालय पहुंची तो लिफाफ़ा खुला हुआ था। इससे रिपोर्ट के लीक होने की आशंका को बल मिलता है। खुले लिफाफ़े की रिपोर्ट को लौटा दिया गया। बाद में सीलबंद लिफाफ़े में दस्तावेज़ भेजे गए।
तो क्या मंत्री का नाम है..
हाई कोर्ट के अधिवक्ता राजेन्द्र तिवारी राजू कहते हैं,न्यायिक जांच आयोग की रिपोर्ट सरकार को कायदे से देखना था। उसके बाद जांच अधूरी है,कहते हुए दो सदस्यीय जांच आयोग का गठन करती तो विपक्ष भी आरोप लगाने की हिम्मत न दिखाता। अब इससे ऐसा लगता है,कि कांग्रेस सरकार अपने किसी मंत्री को बचाना चाहती है।
झीरम कांड की नये सिरे से जांच अब आयोग के अध्यक्ष माननीय न्यायमूर्ति सतीश के.अग्निहोत्री और सदस्य माननीय जी.मिनहाजुद्दीन पूर्व न्यायाधीश उच्च न्यायालय बिलासपुर करेंगे। आयोग झीरम कांड की जांच कर 6 महीने में राज्य सरकार को रिपोर्ट देगा। यह रिपोर्ट कांग्रेस सरकार के रहते आने के बाद प्रदेश की सियासत में एक बार फिर हंगामा होने से इंकार नहीं किया जा सकता।
जस्टिस प्रशांत मिश्रा अपनी रिपोर्ट राज्यपाल को तभी दिये होंगे,जब उनकी जांच में किसी मंत्री का नाम सामने आया होगा। जैसा कि बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष विष्णुदेव साय ने कहा, नए जांच आयोग के गठन की घोषणा से स्पष्ट है,कि प्रदेश सरकार अपने एक मंत्री की संलिप्तता को लेकर विचलित है। वह मंत्री और उनके नक्सली कनेक्शन के बेनकाब होने से डरी हुई है। अब प्रदेश सरकार और मुख्यमंत्री को बताना चाहिए, कि झीरम हत्याकांड का सर्वाधिक लाभ किस राजनीतिक नेता को होना था और हुआ। यह भी स्पष्ट होना चाहिए, कि इस मामले पर एक पुलिस के चश्मदीद मुखबिर से मिलने बिलासपुर कौन गया था? क्यों गया था? और किसने भेजा था? यह मुखबिर बाद में बागी क्यों हो गया था? कांग्रेस झीरम मामले में एक नए आयोग की चर्चा कर सियासी शोशेबाजी का प्रदर्शन कर रही हैं।’’  
नक्सलियों ने किसे जाने दिया
आठ बरसो में झीरम कांड पर कई तरह के सियासी बयान आए।  सियासी दलों के दाँंव-पेंच के चलते झीरम कांँड की जांँच एक सियासी टी.वी.शो बन कर रह गया है। सवाल यह है,परिवर्तन यात्रा का रूट किसने बदला और किसकी वजह से परिवर्तन यात्रा निकाली गई? उस परिवर्तन यात्रा में कौन बीच में ही,यात्रा छोड़कर चला गया। नक्सलियों ने किसे जाने दिया। इंटेलिजेंस बार-बार कह रहा था झीरम में नक्सली एकत्र हो रहे हैं। उधर जाना ठीक नहीं है। फिर भी उस रूट पर परिवर्तन यात्रा किसके कहने पर निकाली गई? ऐसे कई सवालों का जवाब भी प्रदेश की जनता जानना चाहती है। लेकिन जिस तरह सियासी द्वंद मचा हुआ है,उससे सही तथ्य सामने आने में संदेह है।
भाजपा प्रवक्ता सच्चिदानंद उपासने कहते हैं,‘‘ झीरम के मामले में जेब में सबूत लिए घूमने की बात प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के नाते मौजूदा मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कही थी। सालों बीत जाने के बाद भी, अब तक सबूत पेश नहीं करने वाले प्रदेश के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल पर साक्ष्य छिपाने का मुकदमा चलाया जाना चाहिए। कांग्रेस के नेता कभी अपने मुख्यमंत्री पर भी तो दबाव बनाते कि,वे सबूत पेश करके झीरम की जाँच को अंजाम तक पहुँचने में सहयोग करते। इस मामले की जांच का जिम्मा कांग्रेस नीत यूपीए की केंद्र सरकार ने सन् 2013 में सौंपा था।’’।’’
जांच से भूपेश नाखुश
मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का आरोप है,कि आखिर भारत सरकार किस तथ्य को छिपाना चाहती हैं। न्यायिक जांँच आयोग ने षड्यंत्र की जांँच नहीं की। इसके अलावा कांग्रेस ने जो आठ बिन्दु तय किये थे,उसे जस्टिस प्रशांत मिश्रा आयोग ने अपनी जांँच में शामिल नहीं किये। गवाही के लिए कुछ लोगों को बुलाया गया कुछ ने गवाही नहीं दी। साथ ही उन्होंने सवाल किया, कि क्या नाम पूछ-पूछ कर मारा गया? क्या ये राजनीतिक षड्यंत्र हैं? हमने आयोग को कई बिंदुओं पर पत्र लिखा,   कि नंद कुमार पटेल, महेंद्र कर्मा को सुरक्षा व्यवस्था क्यों नहीं दी गई?’’  
मुख्यमंत्री एनआइए की कार्यप्रणाली से संतुष्ट नहीं होकर उस पर सवालिया निशान लगाते हुए 21 नवम्बर 2020 को कहा,‘‘ एनआइए ने झीरम घाटी में जो षंडयंत्र हुआ है,उसके बारे में कोई जांँच नहीं की। पकड़े गये नक्सलियों से और आत्मसमर्पित नक्सलियों से बयान नहीं लिया। रमन्ना, गुडसा उसेंडी, गजराला, अशोक और दूसरे नक्सलियों के बारे में, बाद में कई सबूत मिले। फिर भी एनआइए ने किसी भी चार्जशीट में,इनको शामिल नहीं किया।   फूलदेवी नेताम सहित झीरम में घटना स्थल पर उपस्थित साथियों के भी बयान एनआइए ने नहीं लिया।   
एफआईआर दर्ज हुआ
उदय मुदलियार के पुत्र जितेन्द्र मुदलियार का आरोप है,कि एनआइए ने किसी भी पीड़ित पक्ष से चर्चा नहीं की है। झीरम से सुकमा जाने वाला रास्ता स्टेट हाईवे है। स्टेट हाइवे में दोनों तरफ इतनी बड़ी संख्या में नक्सली तभी एकत्र हो सकते हैं,जब सुरक्षा व्यवस्था को नज़र अंदाज किया जाएगा। हैरानी वाली बात यह है कि,कार्यक्रम की सूचना सभी को थी। ऐसे में सुरक्षा व्यवस्था नहीं किया जाना,सबसे बड़ा सवाल है।’’
बहरहाल झीरम कांड का 25 लाख का इनामी नक्सली विनोद की कोरोना की वजह से 13 जुलाई 2021 को मौत हो गई है। नक्सलियों की बर्बरता ख़बर बनी लेकिन, बनी क्यों, इस सच पर सियासी धूल की परत इतनी मोटी हो गई है कि,शायद ही कभी हटेगी। झीरम कांड का राज रहस्य बनकर रह जायेगा।
 
    
 

 

सियासी हेंगर में टंगे आदिवासी



सवाल यह है कि क्या बीजेपी आदिवासियों की शुभ चिंतक हैं या फिर शिवराज आदिवासियों को सिर्फ खुश करने वाली भाषा का इस्तेमाल करते हैं। क्यों कि उनके राज्य में आदिवासियों और दलितों पर होने वाले अपराध कम होने की बजाय बढ़ते जा रहे हैं। आज प्रदेश का आदिवासी सियासी हेंगर में टंगा हुआ है।
0  रमेश कुमार ‘‘रिपु’’
मध्यप्रदेश में रैगावं विधान सभा चुनाव हारने के बाद बीजेपी को यह बात समझ में आ गई कि पंचायत चुनाव जीतना है तो आदिवासी और दलित वोट बैंक पर ध्यान देना जरूरी है। आदिवासियों को लुभाने वह बीरसा मुडा जंयती को प्रदेश में अवकाश घोंषित कर दिया। सवाल यह है कि क्या बीजेपी आदिवासियों की शुभ चिंतक हैं या फिर शिवराज आदिवासियों को सिर्फ खुश करने वाली भाषा का इस्तेमाल करते हैं। क्यों कि उनके राज्य में आदिवासियों और दलितों पर होने वाले अपराध कम होने की बजाय बढ़ते जा रहे हैं। आज प्रदेश का आदिवासी सियासी हेंगर में टंगा हुआ है।
पिछले कुछ माह से कांग्रेस प्रदेश में आदिवासियों पर हो रहे हमलों का मुद्दा उठाती रही है। नीमच में एक आदिवासी को आठ लोगों ने मिलकर मारा, फिर गाड़ी में बांधकर उसे खींचा। जिससे उसकी मौत हो गई। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के मुताबिक आदिवासियों के खिलाफ अत्याचारों में 25 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। 2020 में 2401 मामले दर्ज हुए, जबकि 2019 में 1922 मामले दर्ज हुए।
अमितशाह का ट्रंप कार्ड
केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने आदिवासियों को रिझाने जबलपुर में 18 सितम्बर को ऐलान किया कि केन्द्र सरकार ने आदिवासी नेताओं के सम्मान में देश भर में 200 करोड़ रुपए की लागत से नौ संग्राहलय बनवायेगी,जिनमें एक मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा में होगा। यह संग्रहालय शंकर और रघुनाथ शाह पर केन्द्रित होगा। प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष वी.डी.शर्मा कहते हंैं,हमारी सरकार आदिवासियों के उत्थान के लिए प्रतिबद्ध है। उन्हें समाज की मुख्यधारा में लाना चाहते हैं। हमारी सरकार आदिवासियों के नायकों के इतिहास से सबको परिचति कराने के लिए संग्राहलय बनाने कदम उठाया है।’’
प्रदेश में दो करोड़ जनजातीय
केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह अपनी इस घोंषिणा के जरिए मध्यप्रदेश ही नहीं, देश भर के आदिवासियों को रिझाना चाहते हैं। क्यों कि मध्यप्रदेश में करीब दो करोड़ जनजातीय आबादी है। यानी राज्य की कुल आबादी में इनकी हिस्सेदारी करीबन 21 फीसदी है। राजनीतिक नजरिये से देखें तो प्रदेश की 230 विधान सीटों में से 47 सीटें अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए आरक्षित है। वहीं लोकसभा की 29 सीटों में छह सीट अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित है।
सीटों का गणित समझें
दरअसल 2013 के चुनाव में बीजेपी को 47 सीट में 30 सीटें मिली थीा। और उसकी सरकार बनी थी। लेकिन 2018 के चुनाव में कांग्रेस ने अनुसूचित जनजाति के लोगों को विश्वास दिलाया, कि उनका हित सिर्फ कांग्रेस सरकार में ही है। और कांग्रेस को 47 में 30 सीटें मिलने से बाजी पलट गई। कांग्रेस की सरकार बन गई। यह अलग बात है कि कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया की सियासी लड़ाई में कांग्रेस की सरकार धड़ाम हो गई। शिवराज सिंह पुनः मुख्यमंत्री बन गए।
शिवराज सिंह ने अब तक 16 हजार घोंषणा कर चुके हैं। जमीन पर सब नदारद हैं। उन्हों ने कहा,आदिवासी गैर लकड़ी वन उपज से आय का एक प्रतिशत अपने पास रख सकेंगे साथ ही छोटे मोटे विवाद का निपटारा खुद ही कर सकेंगे। अनुसूचित क्षेत्रों तक पंचायत का विस्तार सरकार करना चाहती है।
नौकरशाही नाराज
राज्य की नौकरशाही मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान की इस घोंषणा के पक्ष में नहीं है। क्यों कि राज्य के खजाने पर सीधे बोझ पड़ेगा। राज्य मंें करीब 12000- 15000 करोड़ रुपए की गैर लकड़ी वनोपज होती है। गैर लकड़ी वनोपज में तेंदूपत्ता भी शामिल है। यदि इसे ग्राम सभा के हवाले कर दिया जायेगा तो सरकार को सीधे भारी राजस्व घाटा होगा। फिर सियासी सरंक्षण देना भी कठिन हो जाएगा। हर बरस सरकार वेतन और बोनस देती है,वो कहां से लाएगी। इस दिशा में कुछ भी नहीं सोचा गया है।
बहरहाल राजनीतिक दलों को आदिवासियों के कल्याण और हितों की चिंता नहीं है,वो केवल चुनावी नफा-नुकसान को देखकर बाते करते हैं। जैसा  विधायक संजय पाठक कहते हैं घोषणाओं और योजनाओ से वोट नहीं मिलते। आदिवासी अब समझदार हो गये हैं।





 

Monday, November 15, 2021

तिकड़म बाजों पर कटाक्ष

 ▪️तिकड़म बाजों पर कटाक्ष..

हिन्दी के अखबारों और पत्रिकाओं में व्यंग्य आज की ज़रूरत बन गए हैं। इसलिए इन्हें नज़र अंदाज़ करना या फिर हाशिए पर रखना घाटे का सौदा है। "पुरस्कार की उठावनी" व्यंग्य संग्रह की रचनाएं विभिन्न कालों में क्षेत्रीय और राष्ट्रीय अख़बारों में लिखे गए हैं। रचनाएं हास्य व्यंग्य शैली में स्थान,घटना और परिस्थिति के सापेक्ष हैं। बावजूद इसके कई रचनाओं को पढ़ने पर ध्यान घटना की ओर चला जाता है। कोरोना काॅल में लिखी गई रचना हो या  राजनीतिक,मानवीय संवेदनाएं और नैतिक मूल्यों के तिकड़म बाजों पर, हास्य अंदाज़ में तीखा कटाक्ष है।


'पुरस्कार की उठावनी' अरविंद तिवारी की चालीस रचनाओं का नया संग्रह है। ब्रिटिश जमाने के अच्छे पुलों को भ्रष्टाचार के लिए जर्जर बताने की जिस भाषा का इस्तेमाल इंजीनियर करते हैं,वो नेताओं को भी मात देते हैं। विधायक निधी की वाट कैसे लगती है पुल की तीन कथाएं बताती है। फिसड्डी होना बेहद अपमान जनक है, मगर एक पायदान ऊपर चढ़ जाने पर सुशासन के गदगद होने का सुख है ‘लास्ट बट वन‘। बेसिर पैर की कविता लिखने वाले कवियों पर कटाक्ष है ‘कवि की छत का पेड़’। आने वाले समय में बिजली उपभोक्ताओं की ज़्यादती से इंजीनियर अपने आप को कैसे बचाएंगे, उसे जान सकते हैं, बिजली विभाग का इंटरव्यूह रचना से।


रचनाओं में सहज टिपपणियों के बीच कई सूक्ति वाक्य उभरे हैं,‘‘जैसे वर्चुअल कार्यक्रम और इंस्पेक्टर मातादीन में, लोग आन लाइन का जिक्र ऐसे करते हैं, मानो लोक सेवा आयोग के चयन में पहले स्थान पर आये हैं। कोरोना काल की लव स्टोरी में, पचास हजार रुपए तोला वाला सोना खो जाए, तो नींद वाला सोना भी हराम हो जाता है। प्राइवेट रिजाॅर्ट के सरकारी मच्छर-जब पत्नी को पता चला कि मच्छर तक ब्लैकमेल के काम आ सकते हैं, तो उसे अपने पति पर गर्व हुआ। उसे उम्मीद हो गई कि किसी न किसी दिन उसके भरतार मंत्री जरूर बनेंगे। सरकार भी बड़े हवाई अड्डे को खलिस पब्लिक को लीज पर दे देती है और खुद जालू काका की तरह छोटे-छोटे अड्डो के विकास में जुट जाती है। एनसीआर का कटखना कुत्ता में मोहल्ला क्लीनिक को छोड़ों बड़े-बड़े कारपोरेट अस्पतालों में भी कुत्ते का रैबीज उपलब्ध नहीं है। आम आदमी कुत्ते में आर्ट नहीं देखता,पराली का जलना भी उसके लिए आर्ट नहीं है।


पुरस्कार की उठावनी निश्चिय तौर पर राष्ट्रीय मुद्दा है। पुरस्कारों की गरीबी उतनी अपमानजनक नहीं होती,जितना अपमान मित्रों के बार-बार इस गरीबी का जिक्र करने पर होता है। वरिष्ठ लेखक उस भारतीय भाषा की तरह हैं,जिसे आठवीं अनुसूची में स्थान अभी तक नहीं मिला। साहित्य जगत में पुरस्कार के लिए तरह-तरह की टांग खिंचाई की जाती है। जितने लेखक नहीं हैं, उतने नाम के पुरस्कार हैं। कोई पुरस्कार की बात करे तो बड़ी नम्रता से मित्र कह देते हैं, कि आप तो पुरस्कार से ऊपर उठ चुके हैं। यानी उसके यहां पुरस्कार की उठावनी हो चुकी है। छोटी राशि का सम्मान पाने वाले लेखकों पर करारा कटाक्ष है। पैसे वाली पार्टी का हो गया लेखक बनने के फायदे का अच्छा विश्लेषण है। संग्रह में सात व्यंग्य रचनाएं कारोना से जुड़ी हैं,लेकिन सभी की तासीर अलग-अलग है।


समाज के विभिन्न स्याह पक्षों,और व्यवस्थाओं के अलावा रोज की जिन्दगी पर सारी रचनाएं आईना दिखाती है। कुछ रचनाओं के शीर्षक सब कुछ अंदर की कथा को बयान कर देते हैं। जैसे-साहित्य की सीबीआई और ईडी,वह खुद कोरोना कैरियर हो गए,लोकतंत्र का सूचकांक,फागुन में कल्लो भाभी की पाती,नये साल की पहली मिसकाॅल,कुंए की मुंडेर पर मेढ़कआदि अलग-अलग ऊहापोहों से गुजरती रचनाओं की कई तस्वीरें हैं।


संग्रह के शीर्षक से यही लगता है कि अरविंद तिवारी किसी पुरस्कार के हक़दार हैं,लेकिन उनके समकालीन मित्रों ने उनके पुरस्कार की उठावनी कर दिये हैं। ऐसे तिकड़मी मित्रों पर उनकी यह किताब गहरा कटाक्ष करती है। बहरहाल हास्य रहित इस व्यंग्य संग्रह की मारक क्षमता राफैल जैसी है। सामान्य व्यंग्य रचनाओं से हटकर तीखी-मसालेदार पठनीय रचना है।

किताब - पुरस्कार की उठावनी

लेखक - अरविंद तिवारी

प्रकाशक - इंडिया नेटबुक्स प्राइवेट लिमिटेड

मूल्य - 250 रुपए

@रमेश कुमार ‘रिपु’


अपनी कहानी जैसे

 ▪️अपनी कहानी जैसी


मन्नू भंडारी बिलकुल अपनी कहानी जैसी थीं। जैसे उनकी कहानियों के पात्र शोर नहीं मचाते थे,नारे बाजी के हिमायती नहीं हैं,मूल्यों के प्रति सजग हैं और एक समग्र नजरिया रखते हैं,वैसी ही मन्नू भंडारी सारी जिन्दगी रहीं। कहानियों में नये तेवर,नये स्वाद और आडम्बर से परे के लिए हमेशा मन्नू जी जानी जायेंगी। राजेन्द्र यादव ने स्त्री विमर्श का जो स्वरूप हिन्दी जगत को दिया उससे अलहदा है मन्नू भंडारी की कहानियों की दुनिया में नारी। आज हिन्दी जगत में स्त्री लेखन को लेकर नारीवाद और अस्मिता विमर्श का बोलबाला है,लेकिन मन्नू भंडारी की कहानियांें में वो ग्लैमर और शोर-शराबा नहीं है। दरअसल उन्होंने जैसा जीवन जिया वैसी ही कहानियां गढ़ी। मन्नू जी अपनी कहानियों के जरिये हिन्दी जगत के पाठकों को हमेशा याद आयेंगी।

Sunday, October 24, 2021

कांग्रेसियों के बीच छिड़ी है जंग

      









कांग्रेस की हर शाख पर कालिदास बैठे हुए हैं। यही वजह है कि कांग्रेस की सत्ताई शाख बढ़ने की वजाय कांग्रेस के कालिदास उसे काटते जा रहे हैं। जिन राज्यों में कांग्रेस की सत्ता है भी,उन राज्यों में अपने अधिकारों और राजनीतिक लाभ के लिए कांग्रेसियों में घमासन मचा हुआ है।    
 0 रमेश कुमार ‘‘रिपु’’
                 छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सरकार केे आधे सफर के बाद कांग्रेसी आपस में ही विरोधाभास की छवि पेश कर रहे हैं। इसकी वजह है ढाई साल बाद मुख्यमंत्री कौन? कांग्रेसी दो खेमे में बंट गए हैं। एक गुट चाहता है, कि भूपेश बघेल ही मुख्यमंत्री रहें और दूसरे गुट की मंशा है कि हाई कमान अपने वायदे के मुताबिक अब टी.एस.सिंह देव ‘बाबा’को राज्य का नया मुख्यमंत्री घोषित कर दे। कांग्रेस और कांग्रेसी दोनों दुविधा में हैं। मुख्यमंत्री के खेला में जिन कांग्रेसियों के बीच 63 का सियासी रिश्ता था, वो अब 36 में तब्दील हो रहा है। 
अंदरूनी लड़ाई में चार माह का वक्त जाया हो गया। जबकि सरकार को उन मोर्चे पर लड़ना चाहिए,जो विकास के रास्ते में रुकावट बन रहे हैं। अभी तक कांग्रेस के अंदर आल इज वेल की स्थिति थी। लेकिन जून माह से नये मुख्यमंत्री की सुगबुगाहट के साथ ही दिल्ली तक की दौड़ शुरू हो गई। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और उनके समर्थक स्वास्थ्य मंत्री टी.एस सिंह देव को बायें करने की सियासी गोटियाँ बिछाते आए हैं। जैसा कि विधायक बृहस्पती ने कुछ दिनों पूर्व यह कह कर सनसनी फैला दी थी कि टी.एस सिंह देव उन पर जान लेवा हमला कराए। इस आरोप से टी.एस सिंहदेव क्षुब्ध होकर कहा,जब तक उनके खिलाफ लगे आरोप के दाग नहीं मिट जाते,वो विधान सभा में नहीं आयेंगे।  इसके बाद से कांग्रेस के अंदर सियासी द्वंद का तंबुरावादन शुरू हो गया। अब गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू ने भी कह दिया,कि एक बार जो मुख्यमंत्री बन जाता है,वह अंत तक रहता है। यू.पी. में लखीमपुर कांड में भूपेश बघेल का प्रियंका गांधी के साथ खड़े रहना और मृतक के परिजनों के परवारों को 50-50 लाख रुपए देने की घोंषणा करके अपने विरोधियों को संकेत दे दिये हैं,कि वे दस जनपथ के साथ हैं।  
मुख्य मंत्री भूपेश बघेल के समर्थन में दो दफा दर्जनों विधायक दिल्ली हो आए हैं। कांग्रेस हाई कमान किसी से भी नहीं मिला। वहीं टी.एस सिंह देव को अब भी भरोसा है,कि कांग्रेस हाईकमान सियासी समझौते के मुताबिक उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंप देगा। मुख्यमंत्री को लेकर सियासी उठापटक के बीच कांग्रेस के अंदर आस्तीन खींचने की सियासत का शो शुरू हो गया है। विधायक बृहस्पती के नेतृत्व में प्रदेश के दर्जन भर कांग्रेसी विधायक शिक्षा मंत्री प्रेम सिंह टेकाम के खिलाफ मोर्चा खोल दिये हैं। विधायकों का आरोप है, कि शिक्षा मंत्री का स्टाफ ट्रांसफर और पोस्टिंग का धंधा चला रहे हैं। दबाव के बाद जशपुर के डीईओ. एस. एन. पंडा को निलंबित कर दिया गया है। दरअसल प्रेम सिंह टेकाम स्वास्थ्य मंत्री के समर्थक हैं। दूसरा गुट पूरी कोशिश में है कि प्रेम सिंह को मंत्री पद से हटा दिया जाए।
दो सौ कांग्रेसियों का इस्तीफा
छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले के कोपरा पंचायत के चार जिला महामंत्री दो ब्लॉक महामंत्री समेत 200 कार्यकर्ताओं ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया है। इस मामले पर जिला अध्यक्ष भाव सिंह साहू ने कहा,इस मामले में भाजपा और आरएसएस का षड्यंत्र है। राजिम के कांग्रेस विधायक अमितेश शुक्ल पर आरोप है,कि पंचायत स्तर पर भ्रष्टाचार करने वाली कोपरा पंचायत की महिला सरपंच डाली साहू का साथ विधायक दे रहे हैं। क्यों कि विधायक पर पंचायत स्तर पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं। वहीं राजिम के पूर्व विधायक संतोष उपाध्याय ने कांग्रेस जिलाध्यक्ष भावसिंह साहू को अपरिपक्व बताते हुए उन्हें विधायक से स्थिति स्पष्ट करवाने की सलाह दी है। ग्रामीणों का आरोप है कि सरपंच डाली साहू ने बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार किया है। गौरतलब है कि कोपरा जिले की सबसे बड़ी ग्राम पंचायत है। इसे कांग्रेस का गढ़ माना जाता है। बड़ी संख्या में कांग्रेस कार्यकर्ताओं का इस्तीफा देना भूपेश बघेल के लिए चुनौती है।
बैठक में भूपेश को बुलावा नहीं
प्रदेश कांग्रेस की बैठक राजीव भवन में थी,लेकिन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को नहीं बुलाया गया। बैठक में वे डेढ़ घंटे बाद पहंुचे। नाराज होकर कहा,मुझे जब बुलाया ही नहीं जायेगा तो पता कैसे चलेगा कि कौन नाराज है। बैठक में प्रदेश कांग्रेस प्रभारी पी.एल पुनिया भी थे। बैठक में कार्यकत्र्ताओं की शिकायत थी, कि पदाधिकारी और सरकार के मंत्री,अधिकारी उनकी बात नहीं सुनते। एक पदाधिकारी ने यहांँ तक कह दिया कि हमें तो आप तक पहुंचने के लिए कोई जरिया ही नहीं है। एक पदाधिकारी ने ढाई-ढाई साल मुख्यमंत्री की चर्चा से जनता में कांग्रेस की इमेज खराब होने की बात की। इस पर मुख्यमंत्री ने नाराजगी जताई। बैठक से उनके बाहर निकलने पर मीडिया के सवाल पर उन्होंने कहा,इसका जवाब प्रदेश अध्यक्ष और प्रदेश प्रभारी देंगे। कांग्रेस विधायकों का मंत्रियों के खिलाफ बयान दिये जाने और बार-बार दिल्ली जाने पर संगठन ने इनके खिलाफ कार्रवाई से इंकार कर दिया है। क्यों कि संगठन भी समझ रहा हैं कि कार्रवाई किये जाने से कांग्रेस कें अंदर की लड़ाई सड़क पर आ जायेगी।
नया मुख्यमंत्री मिला तो..
सियासी सवाल ये है कि छत्तीसगढ़ को नया मुख्यमंत्री मिलने पर कांग्रेस के अंदर क्या-क्या हो सकता है? क्या भूपेश बघेल के समर्थित विधायक कांग्रेस से इस्तीफा दे देंगे? भूपेश बघेल स्वयं इस्तीफा दे देंगे? संगठन और निगम मंडल में भूपेश के समर्थित लोग क्या अपने-अपने पद से इस्तीफा देंगे। टी.एस सिंह देव संगठन से लेकर विभिन्न आयोग में क्या अपने लोगों को जगह देंगे? चर्चा है कि जिस तरह टी.एस सिंह देव को मुख्यमंत्री सत्ताई ताकत से उन्हें बायें करते गये हैं,वही तरीका टी.एस सिंह देव भी भूपेश बघेल के साथ कर सकते हैं? सवाल ये है कि ऐसा होने पर क्या कांग्रेस राज्य में बीजेपी को शिकस्त दे पाएगी? क्या हाई कमान ओबीसी की जगह सवर्ण को मुख्यमंत्री की कमान देकर श्यामा,वोरा और अर्जुन सिंह के दौर की सियासत को दोहराएगी? ऐसे कई सवाल हैं जिनके जवाब राज्य की कांग्रेस भी नहीं जानती।
कांग्रेस फंस गई..
प्ंांजाब में मुख्यमंत्री की कुर्सी से कैप्टन अमरिंदर सिंह को हटाने में नवजोत सिद्धू ने हाई वोल्टेज ड्रामा कर पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा। सिद्धू को यकीन था, कांग्रेस हाईकमान उन्हें मुख्यमंत्री बना देगा। लेकिन दांव उल्टा पड़ गया। चरणजीत सिंह चन्नी के मुख्यमंत्री बनने के बाद सिद्धू ने 28 सितम्बर को एक और गेम खेला। पंजाब कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष पद से इस्तीफा ट्वीट करके,कांग्रेस की मुश्किले बढ़ाई। उनके दोे समर्थक कैबिनेट मंत्री रजिया सुल्तान और परगट सिंह ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। सिद्धू नाराज थे, कि मुख्यमंत्री ने मंत्रिमंडल में विवादास्पद विधायक और शराब कारोबारी राणा गुरजीत सिंह को क्यों शामिल किया। पंजाब का मामला अभी शांत हो गया है,कहना मुश्किल है। पंजाब में फरवरी 2022 को चुनाव है। पंजाब में जिस तरह ‘पंजा’ लड़ाने का खेल चल रहा है,उससे जाहिर है कि कांग्रेस आलाकमान ने पंजाब के सत्ताई जहाज के कैप्टन को हटाकर कांग्रेसियों को दुविधा में डाल दिया है। सवाल ये है, कि सिद्धू कब तक कांग्रेस में रहंेगे? कैप्टन कब तक चुप रहेंगे? क्या वो चुनाव मंे कांग्रेस का साथ देंगे? क्या चरणजीत सिंह चन्नी पंजाब में कांग्रेस को जीता लेंगे? क्या कांग्रेस सिद्धू को आगे करके चुनाव लड़ेगी? या फिर कैप्टन अमरिंदर सिंह चुनाव से पहले कोई पार्टी बनायेंगे? पंजाब कांग्रेस में कालिदास कौन है,विपक्ष बखूबी जानता है। मगर कांग्रेस हाईकमान चुप है। बहरहाल कांग्रेस के अंदर जो सियासी द्वंद मचा हुआ है,उसका हल हाईकमान को ढूंढना होगा।
 सिद्धू और चन्नी में खटास
सीएम चन्नी और सिद्धू के बीच खटास बढ़ती जा रही है। सिद्धू लगातार उनकी सरकार पर हमले कर रहे हैं। कभी डीजीपी और एडवोकेट जनरल की नियुक्ति के बहाने तो कभी हाईकमान के एजेंडे के बहाने। माना जा रहा है कि इसी के चलते चन्नी की कैप्टन से मुलाकात की जमीन तैयार हुई। कांग्रेस को उम्मीद थी कि कैप्टन अमरिंदर को हटा देने से पंजाब में सब ठीक हो जाएगा। पंजाब प्रभारी हरीश रावत ने यह कहकर सनसनी फैला दी कि पंजाब चुनाव प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के नेतृत्व में लड़ा जाएगा। इससे चन्नी सहित अनेक लोगों के कान खड़े हो गए। पंजाब में नई कैबिनेट के शपथ लेने के बाद अब पार्टी हाईकमान का पूरा फोकस साढ़े चार महीने बाद होने वाले विधानसभा चुनाव पर है। चुनाव से पहले सिद्धू को संगठन मजबूत करने की हिदायतें दी जा सकती हैं।
कांग्रेस को अनाथ कर दिया
मध्यप्रदेश में कांग्रेस के हाथ से सत्ता जाने के पीछे कांग्रेसी दबी जुबान से कमनाथ और दिग्विजय सिंह को दोषी ठहरा रहे हैं। इन दोनों ने ज्योतिरादित्य सिंधिया को कांग्रेस की सत्ताई आभा से दूर रखने जो जाल बुना, उसमें कांग्रेस सरकार फंस कर धड़ाम हो गई। ज्योतिरादित्य सिंधिया को न प्रदेश अध्यक्ष और न ही राज्य सभा भेजने के लिए दोनों नेता तैयार थे। इन्ही की वजह से वो अपनी गुना सीट हार गए। ज्योतिरादित्य सिंधिया बीजेपी से हाथ मिलाकर कांग्रेस का पंजा मरोड़ दिए। आज प्रदेश में कांग्रेस के 95 विधायक हैं,लेकिन प्रदेश में कांग्रेस की हलचल शून्य है। कमलनाथ की वजह से अरूण यादव नाराज है। खंडवा लोकसभा सीट से वे चुनाव लड़ना चाहते थे। टिकट नहीं मिलने पर उनके अंदर का विरोध छलक पड़ा,फसल मैं तैयार करता हूूँ और काटता कोई और है।’’ विंध्य क्षेत्र से यदि कांग्रेस को सीट मिलती तो कांग्रेस की सरकार न जाती,ऐसा कहकर कमलनाथ ने अजय सिंह राहुल को नाराज कर दिये हैं।
रीवा जिले का प्रभारी राकेश चैधरी को बना देने पर राहुल के नाराज होने पर राजा पटेरिया को बनाया गया। गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा के घर में राहुल का डीनर करना और उनके बर्थ डे पर कैलाश विजयवर्गीय का जाकर उन्हें बुके देने के बाद यह समझा जाने लगा कि राहुल किसी भी दिन बीजेपी में जा सकते हैं। प्रदेश में एक लोकसभा और तीन विधान सभा के लिए उपचुनाव होने जा रहे हैं। इस चुनाव के परिणाम स्पष्ट करंेगे कि कांग्रेस कितनी सक्रिय है और कमलनाथ को कितना पसंद किया जा रहा है। वैसे प्रदेश मंे कांग्रेस सत्ता जाने के बाद भी कई गुटों में बंटी हुई है।
राजस्थान में पंजाब सा झगड़ा
राजस्थान में कांग्रेस के अंदर पायलट और गहलोत खेमे में 2018 से लड़ाई चल रही है। पायलट खेमा बार-बार मुख्यमंत्री बदलने की मांग करता आया है। पिछले दिनों अशोक गहलोत के ओ.एस.डी लोकेश शर्मा ने एक ट्वीट किया था। जिसे पंजाब की राजनीतिक घटनाक्रम से जोड़ कर देखा गया था। गहलोत के ओएसडी के ट्वीट पर सचिन पायलट के कई समर्थकों ने भी प्रतिक्रिया देते हुए हमला बोला। सतपाल सिंह नाम के एक पायलट समर्थक ने कमेंट में लिखा राजस्थान में बड़े फेरबदल की जरूरत है और आलाकमान करेगा। आप के नेताजी गहलोत के नेतृत्व में हम चुनाव नहीं जीत सकते हैं, आपको भी मालूम है। गहलोत सरकार ने वादा किया था कि किसानों का सम्पूर्ण कर्जा माफ करने और युवाओं को बेरोजगारी भत्ता देंगे। सब उल्टा हो रहा है। भ्रष्टाचार से लोग परेशान हैं।  
मौजूदा पीसीसी अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा से विधायक और नेता नाराज हैं। एक गुट चाहता है,सचिन पायलट को फिर अध्यक्ष बना दिया जाए। डोटासरा राज्य सरकार में शिक्षामंत्री होने के साथ ही सी.एम के खेमे के हैं। वहीं कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य रघुवीर मीणा और राज्य के कृषि मंत्री लालचंद कटारिया के नाम की भी चर्चा है।   
गहलोत के समर्थक आकोदिया का दावा है कि सचिन पायलट के सारे विधायक गहलोत के पाले मे आ गए हैं। 2018 में उनके गुट के 21 विधायक जीतकर आए थे। अब पायलट के पास मुश्किल से सात-आठ विधायक होंगे। मंत्रियों में भी आपसी खींचतान है। गत तीन जून 2021 को कैबिनेट बैठक के दौरान शांति धारीवाल और गोविंद डोटासरा आपस मे भिड़ गए। शांति धारीवाल ने डोटासरा से यहां तक कह दिया कि जो बिगाड़ना है बिगाड़ लेना मैंने बहुत अध्यक्ष देखे हैं।  
बहरहाल पिछले पचास वर्षो से कांग्रेस तमिलनाडु की सत्ता से बाहर है। 42 वर्षो से पश्चिम बंगाल की। 30 वर्षो से उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का मुख्यमंत्री नहंी है। 29 वर्षो से वह बिहार में और 24 वर्षो से गुजरात की सत्ता से बाहर है 19 वर्षो से ओड़िसा में कांग्रेस की सरकार बनी नहीं। 15 वर्षो से मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सरकार नहीं है। छत्तीसगढ़ में 15 वर्षो बाद उसकी सरकार बनी। महाराष्ट्र और असम उसका गढ़ माना जाता था,वो भी हाथ से निकल गया है। इन सबकी वजह है कांग्रेसियों में 36 का रिश्ता होना।
 
   

 

आदिवासियों पर नजरे इनायत

           




  
बरसों से उपक्षित आदिवासी इस समय राजनीति के केन्द्र में है। इसलिए कि विधान सभा की 47 और लोकसभा की 6 सीटें आरक्षित हैं। केन्द्र सरकार आदिवासियों को रिझाने दो सौ करोड़ रुपए से जनजातीय नायकों की स्मृतियांँ संजोने संग्राहलय बनायेगी। कांग्रेस आदिवासियों में अपना जनाधार बचाने के लिए जूझ रही है, तो भाजपा उसे झपटने के लिए जाल बुन रही है।
0 रमेश कुमार ‘रिपु’
            जबलपुर में 18 सितम्बर को केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने ऐलान किया कि केन्द्र सरकार ने आदिवासी नेताओं के सम्मान में देश भर में 200 करोड़ रुपए की लागत से नौ संग्राहलय बनवायेगी,जिनमें एक मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा में होगा। यह संग्रहालय शंकर और रघुनाथ शाह पर केन्द्रित होगा। प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष वी.डी.शर्मा कहते हंैं,हमारी सरकार आदिवासियों के उत्थान के लिए प्रतिबद्ध है। उन्हें समाज की मुख्यधारा में लाना चाहते हैं। हमारी सरकार आदिवासियों के नायकों के इतिहास से सबको परिचति कराने के लिए संग्राहलय बनाने कदम उठाया है।’’ 
केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह अपनी इस घोंषिणा के जरिए मध्यप्रदेश ही नहीं, देश भर के आदिवासियों को रिझाना चाहते हैं। क्यों कि मध्यप्रदेश में करीब दो करोड़ जनजातीय आबादी है। यानी राज्य की कुल आबादी में इनकी हिस्सेदारी करीबन 21 फीसदी है। राजनीतिक नजरिये से देखें तो प्रदेश की 230 विधान सीटों में से 47 सीटें अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए आरक्षित है। वहीं लोकसभा की 29 सीटों में छह सीट अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित है।
दरअसल 2013 के चुनाव में बीजेपी को 47 सीट में 30 सीटें मिली थीा। और उसकी सरकार बनी थी। लेकिन 2018 के चुनाव में कांग्रेस ने अनुसूचित जनजाति के लोगों को विश्वास दिलाया, कि उनका हित सिर्फ कांग्रेस सरकार में ही है। और कांग्रेस को 47 में 30 सीटें मिलने से बाजी पलट गई। कांग्रेस की सरकार बन गई। यह अलग बात है कि कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया की सियासी लड़ाई में कांग्रेस की सरकार धड़ाम हो गई। शिवराज सिंह पुनः मुख्यमंत्री बन गए। भविष्य की राजनीति को ध्यान में रखकर  राष्ट्रीय नेतृत्व ने आदिवासियों को साधने के लिए घोंषणा की,ताकि आदिवासी वोटर छिटकें नहीं,और बीजेपी को मिलने वाली सीटों का नुकसान न हो।
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान ने एस.टी वोटरों को रिझाने की दिशा में राज्य में पेसा पंचायत अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार कानून 1996  लागू करने की घोषणा की। राज्य के आदिवासी बहुल 89 विकासखंडों के करीब 24 लाख परिवार जहाँं उचित मूल्य की दुकानें नहीं हैं,उन्हें साप्ताहिक हाटों से राशन उपलब्ध कराया जायेगा। स्थानीय लोगों से गाड़ियाँं 26000 रुपये प्रति माह की दर पर किराये पर ली जाएंगी। साथ ही छिंदवाड़ा विश्वविद्यालय का नाम राजा शंकरशाह के नाम पर रखा जाएगा। बिरसा मुंडा जयंती को जनजातीय गौरव दिवस के रूप में मनाया जायेगा। यह घोंषणा पार्टी के नफे नुकसान को ध्यान मे ंरखकर किया गया है।  
प्रदेश में एस.टी की तीन सीटों पर हो रहे उपचुनाव के मद्देनजर ऐसे मुद्दे अधिक मायने रखते हैं। सरकार आदिवासियों को लुभाने ऐसी घोंषणा की है। वहीं मुख्यमंत्री शिवराज सिह चैहान ने अनुसूचित क्षेत्रों में ग्रामसभाओं को अधिक स्वायतता देने के लिए एक नई पहल की है। अब आदिवासी गैर लकड़ी वन उपज से आय का एक प्रतिशत अपने पास रख सकेंगे साथ ही छोटे मोटे विवाद का निपटारा खुद ही कर सकेंगे। अनुसूचित क्षेत्रों तक पंचायत का विस्तार सरकार करना चाहती है। गत फरवरी में राज्य सरकार ने राज्य के आदिवासी संस्थान,आदिम जाति कल्याण विभाग,पंचायत एंव ग्रामीण कल्याण विभाग और वन विभाग के सदस्यों की एक कमेटी गठित की है। ये सभी अनुसूचित क्षेत्र में रहने वालों के हितों का ध्यान रखेंगे।
पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ कहते हैं, शिवराज सिंह चैहान घोंषणा करने में माहिर हैं। अपने 16 साल के कार्यकाल में 16 हजार से भी अधिक घोंषणाएं कर चुके हैं। जमीन पर उनकी घोंषणाएं दिखती नहीं। प्रदेश की जनता को घोंषणा नहीं काम चाहिए। आदिवासियों का हित हो हम भी चाहते हैं,लेकिन मुझे नहीं लगता कि उनकी यह घोंषणा भी पूरी हो सकेगी।’’
सूत्रों का कहना है,राज्य की नौकरशाही मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान की इस घोंषणा के पक्ष में नहीं है। क्यों कि राज्य के खजाने पर सीधे बोझ पड़ेगा। राज्य मंें करीब 12000- 15000 करोड़ रुपए की गैर लकड़ी वनोपज होती है। गैर लकड़ी वनोपज में तेंदूपत्ता भी शामिल है। यदि इसे ग्राम सभा के हवाले कर दिया जायेगा तो सरकार को सीधे भारी राजस्व घाटा होगा। फिर सियासी सरंक्षण देना भी कठिन हो जाएगा। हर बरस सरकार वेतन और बोनस देती है,वो कहां से लाएगी। इस दिशा में कुछ भी नहीं सोचा गया है।   
गौरतलब है कि मध्यप्रदेश में पेसा कानून का पालन पूरी तरह नहीं किया जाता है। भूमि अधिग्रहण,जल निकायों से संबंधित प्रबंधन लागू हैं। लेकिन वन विभाग के कानून की वजह से टकराव होने पर पेसा कानून कमजोर पड़ जाता है। यानी मध्यप्रदेश में पेसा कानून को अधिक मजबूत बनाने के नियम बनाने हैं। ताकि पेसा कानून की खिलाफत करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जा सके। पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिह राहुल कहते हैं,‘‘प्रदेश में बीजेपी की सरकार 15 सालों तक रही फिर भी पेसा कानून लागू क्यों नहीं हुआ,जनता को बताना चाहिए। केवल घोंषणाओं से कुछ नहीं होता।’’
दरअसल 2018 के विधान सभा चुनाव में आदिवासी क्षेत्रों में बीजेपी का जनाधार खिसक गया था। आदिवासी क्षेत्रों में जनाधार वापस पाने के लिए बीजेपी का आदिवासियों के प्रति मोह जाग गया है। जय आदिवासी युवा शक्ति (जेएवाइएस) और पुनरूत्थान वादी गोंडवाना गणतंत्र पार्टी(जीजीपी) जैसी आदिवासी इकाइयांें की वजह से बीजेपी को डर है कि वह अपनी राजनीतिक जमीन खो देगी। क्यों कि जेएवाइएस पश्चिमी मध्यप्रदेश में एक शक्तिशाली राजनीतिक पार्टी के रूप में अपनी जमीन तैयार की है। बीजेपी की नजर पूर्वी मध्यप्रदेश और महाकौशल में अपनी आदिवासी राजनीतिक जमीन को वापस पाना चाहती है। बीजेपी की नजर में जेएवाइएस कांग्रेस की टीम है। जेएवाइएस के सदस्य डाॅ हीरालाल अलावा ने कांग्रेस की टिकट पर 2018 के चुनाव में धार जिले के मनावर सीट जीते थे। वहीं कांग्रेस जीजीपी को बीजेपी की बी टीम मानती है।
जय आदिवासी युवा शक्ति संगठन के नेता हीरालाल अलावा ने कहा,वोटों का खिसकना 15 साल के बीजेपी के लंबे शासन के खिलाफ आदिवासी मतदाताओं के गुस्से को दिखाता है। जिसने आदिवासियों को सिर्फ वोटों के लिए दबाया और शोषण किया। इस सरकार ने व्यापारियों को उनकी वन भूमि बेच दी।  
गौरतलब है कि 15-20 साल पहले की तुलना में आदिवासी मतदाता अब अपने अधिकारों को लेकर अधिक जागरूक हैं। गोंडवाना गणतंत्र पार्टी का गठन 16 साल पहले आदिवासियों को उनकी पहचान दिलाने किया गया था। ये पार्टी गोंड मतदाताओं के बीच काफी प्रभावशाली है। पिछले विधानसभा चुनावों में मालवा क्षेत्र में भील आदिवासी नेतृत्व का उदय हुआ। जय आदिवासी युवा शक्ति जेएवाईएस का गठन हुआ। जीजीपी और जेएवाईएस के अस्तित्व में आने से पहले पारंपरिक पार्टियाँ मौजूद थीं। हाल के वर्षों में आदिवासी लोगों ने नीतिगत मतदान के विपरीत सामान्य तौर पर सामूहिक रूप से मतदान किया।
मध्य प्रदेश की कुल 29 संसदीय सीटों में से आदिवासी समूह शहडोल,मंडला, धार,रतलाम, खरगोन और बेतूल सहित कम से कम छह सीटों पर बेहद प्रभाव डालते हैं, जो अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित हैं। इन सीटों के अलावा वे कई अन्य सीटों जैसे, बालाघाट, छिंदवाड़ा और खंडवा जैसी सीटों पर भी परिणामों को प्रभावित कर सकते हैं। जीजीपी के अमन सिंह पोर्ते कहते हैं,लोग दिन प्रति दिन जागरुक होते जा रहे हैं। यह महत्वपूर्ण है कि हमारा आंदोलन रंग ला रहा है।’’
बहरहाल पिछले कुछ माह से कांग्रेस प्रदेश में आदिवासियों पर हो रहे हमलों का मुद्दा उठाती रही है। नीमच में एक आदिवासी को आठ लोगों ने मिलकर मारा, फिर गाड़ी में बांधकर उसे खींचा। जिससे उसकी मौत हो गई। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के मुताबिक आदिवासियों के खिलाफ अत्याचारों में 25 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। 2020 में 2401 मामले दर्ज हुए, जबकि 2019 में 1922 मामले दर्ज हुए। सच यह है कि राजनीतिक दलों को आदिवासियों के कल्याण और हितों की चिंता है,तो चुनावी नफा-नुकसान को नजर अंदाज करके आगे आना चाहिए।