Tuesday, August 31, 2021
‘बहेलिए’ के पंजे में आधी दुनिया
कथाकार अंकिता जैन रूढ़ नैतिकता की दीवार गिराने की कोशिश की है कहानी संग्रह बहेलिए के जरिए । ‘बहेलिए’ संग्रह में नौ कहानियांँ है। कहानी में समाज के वो बहेलिए हैं,जिनसे औरत के वजूद पर चोट पहुंँचती है। ये बहेलिए सिर्फ पुरुष ही नहीं,समाज की पुरानी मान्यताएं, परंपराएं,परिवार की महिलाएँं आदि हैं। ऐसे बहेलियों की चंगुल से बचने या फिर कैद से निकलने स्त्रियां चौकाने वाली राह चुनती हैं। वहीं हर कहानी सामाजिक परिवेश की दहलीज पर एक निशान छोड़ते हुए स्त्री की सोच को भी टटोलती है।
संग्रह की कुछ कहानियों से सवाल उठता है,कि आधी दुनिया की बौद्धिक और समझदार महिलाएंँ जानते हुए भी उस रास्ते पर क्यों चलती हैं,जिसकी कोई मंजिल नहीं है। लेखिका की स्त्रियांँ जानते हुए भी ऐसे प्रेम में पड़ती हैं,जो कभी मुकम्मल नहीं हो सकता। यानी गैर वाजिब है। स्त्री विमर्श का यह आधुनिक स्वरूप नैतिकता से परे है। क्यों कि ‘मजहब’ और ‘रैना बीती जाए’ की स्त्रियांँ एक विवादित प्रेम पथ को अंगीकार करती हैं।‘मजहब’ कहानी की नायिका मनोज चौरसिया की बेटी जूली घर में विरोध के बावजूद मुस्लिम लड़के के प्यार में पड़कर उसके बच्चे की माँं बन जाती है। रूढ़ नैतिकता के खिलाफ जाकर जूली बच्चे को जन्म देने का फैसला करती है। दूसरे शहर में अपनी पहचान छिपाकर नर्स की नौकरी करती है। मगर मजहबी दंगे में जूली की बेटी गंभीर रूप से घायल हो जाती है। हिन्दू-मुस्लिम की लड़ाई जूली का पीछा नहीं छोड़ते। उसकी बेटी दंगे में गंभीर रूप से घायल हो जाती है। और वह अपनी बेटी को बचाने आॅपरेशन थियेटर में चली जाती है। सवाल यह है कि जातीय वैमनस्यता के बहेलिए सिर्फ स्त्री के लिए ही क्यों?
अंकिताजैन की स्त्रियांँ क्या रूढ़ नैतिकता की विरोधी हैं, इसलिए घर,समाज के मूल्यों के खिलाफ चलती है अपनी नई रेखा खींचने के लिए? जैसा कि ‘रैना बीती जाए’ कहानी में मीरा अपने बाॅय फ्रेंड आकाश से सम्पूर्ण समर्पण चाहती है। लीव इन रिलेशन शिप में रहते हुए उसके माँ बनने पर आकाश अपनी परेशानी बताकर शादी से इंकार कर देता है। बिन ब्याही माँ मीरा दूसरे शहर में अपने प्रेम को,अपनी माता-पिता की लाज रखते हुए विधवा,अनाथ और ससुराल वालों की परित्यकता मां बताकर नौकरी कर लेती है। एक दिन बेटा मां से अपने पिता के बारे में पूछता है। वह पिता के प्यार से उसे वंचित नहीं रखने का फैसला करती है। दरअसल दाम्पत्य संबंध आपसी समझ और आत्मीयता पर आधारित होना चाहिए। मूड के हिसाब से जो प्रेमी समर्पण और देह का इस्तेमाल करता हो, उससे समय रहते अलग हो जाना ही स्त्रियों के लिए ठीक है।
प्रायश्चित और कन्यादान’दोनों भावनात्मक कहानी है। प्रायश्चित’ में एक बिगड़ैल पिता अपनी पत्नी की मौत के बाद बेटी के लिए बदल जाता है। क्यों कि, उसकी पत्नी चाहती थी,कि उसकी बेटी खूब पढ़ लिख कर अपने पैरों पर खड़ी हो। जबकि पत्नी की मौत के पहले तक पिता बेटी की उपेक्षा करता आया था। इंटर में बेटी के टाॅप करने पर उसे उसके स्टाॅफ में जो सम्मान मिला,उस एक पल की खुशी ने उसे बदल दिया। यानी जो पिता अपनी बेटी और पत्नी के सपनों का बहेलिया था,वह ग्लानी के सागर में डूब कर अच्छा पिता बन जाता है। घर वालों के समक्ष कहता है,उसकी बेटी जहां तक पढ़ेगी उसे पढ़ाएगा,अभी शादी नहीं करेगा।
कन्यादान कहानी में परिस्थिति वश मजदूर तेली जाति का बुजुर्ग पिता अपनी जवान बेटी की शादी अधेड़ विदुर ब्राम्हण भोला से नहीं करना चाहता। दुविधा में रहता है,कैसे अपनी बेटी को सारी बात बताए। बेटी उनकी परेशानी का सच उगलवा लेती है। लाचार पिता को खुशी देने बेटी अपनी बोली लगा आती है। वहीं एक पागल की मौत’ आज की घिनौनी राजनीति के सच का आईना है। ‘बंद खिड़कियां‘ गहरे जीवन के अनुभव की कहानी है। पढ़ी लिखी बहू पुरानी मान्यताओं को ढोने वाली सास के बंधन को विवेक से तोड़ती है। बहरहाल अकिता जैन की स्त्रियों में जीवन जीने की भरपूर चाह है। हर कहानी सामाजिक परिवेश की दहलीज पर एक सवालिया निशान छोड़ते हुए स्त्री की सोच को भी टटोलती है।
लेखक - अंकिता जैन
प्रकाशक - राजपाल
कीमत - 176 रुपए
@रमेश कुमार "रिपु"
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