चन्द्रकांता जी की संकलित कहानियां में ,नूराबाई और गीताश्री की बलम कलकत्ता में औरत की बेबसी,सामाजिक चिंता,उसके मन के तहखाने के अंधेरे और उसकी दर्द की तहरीर कैसी है,देख रहा था। इन दोनों लेखिकाओं की स्त्री विमर्श की नब्ज को टटोलने पर उम्र और समय की धड़कन में भारी अंतर है। चन्द्रकांता जी की यह कहानी 2000 के पहले की जान पड़ती है और गीताश्री की बलम कलकत्ता साल दो साल पहले की। कहानी की भाषा चन्द्रकांता जी की ज्यादा सधी और पठनीय है। वहीं गीताश्री की कहानी की भाषा, आम बोलचाल की है। इनकी कहानी में पत्रकारिता की भाषा का पुट झलकता है।
इन दो लेखिकाओं की कहानी में एक आम औरत है। गरीब है। दूसरों के घरों में झाडू- पोंछा करती है। दोनों कहानी की नायिका की एक बेटी है। आदमी शराबी है। चन्द्रकांता जी की कहानी की नायिका अपनी बेटी को गंदी करने पर अपने देवर की हत्या कर देती है। गीताश्री की कहानी की नायिका भी अपने पति की पीड़ा सहती है,मगर वो नये जमाने की गरीब है। फिर भी नूराबाई और उसमें बहुत अंतर नहीं है। चूंकि नये जमाने की गरीब महिला है, इसलिए उसमें अपना भला किसमें है,उस पथ को चुनने की समझ है। अपने शराबी पति को छोड़ कर अपनी बेटी के होेने वाले पति के साथ कलकत्ता चले जाना बेहतर समझती है।
सवाल यह है,कि अजादी के बाद पढ़ी- लिखी फर्राटेदार अंग्रेेजी बोलने वाली लेखिकाओं ने महिलाओं को कहानी में इतना कमजोर क्यों बताती आ रही हैं? प्रेम चंद के दौर की महिलायें कब की मर गई हैं। हर गरीब महिला का पति शराबी ही क्यों है? वो दूसरों के यहां झाड़ू -पोछा करेगी,और उसका पति शराब पीने के लिए अपनी पत्नी का पैसा छीन लेगा। उस पर बुरी नजर कईयों की रहेगी। क्या ऐसी ही कहानियों से स्त्री विमर्श का पक्ष मजबूत होगा?
ऐसी कहानियाँ क्यों नहीं लिखती,जैसा मंच पर लेखिकायें बोलती हैं। झाडू- पोछा करने वाली गरीब महिला को अपने जैसा क्यों नहीं बताती। शराबी पति को छोड़ क्यों नहीं देती। एक तरफ पितृसत्ता को गरियाती हैं। लेकिन अपनी कहानी की नायिकाओं की सोच नहीं बदलती? सोच बदलें, तो देश बदले। आधी दुनिया का ढांचा बदले। ऐसा लगता है, कि गरीबी की बेबसी पर लिखने से ज्यादा प्रशंसा मिलती है। वहीं सरकार मानती है, कि गरीबी अब वैसी नहीं है,जैसे प्रेमचंद के जमाने में थी।
आखिर कब तक कहानियों में गरीब महिला की बेबेसी,को ओर उसे दोयम दर्जे का दिखाया जायेगा! यह चलन बंद होना चाहिए। सलीम-जावेद की कहानियों में एक मुस्लिम पात्र जरूर होगा। वह बहुत ही इनायत मन का होगा। ब्राम्हण और बनिया कमीने होंगे। जबकि वास्तविक जीवन में इसके विपरीत है।
अखबार की खबरें बताती हैं, कि गरीब महिला जिससे इश्क करती है,उसका पति शराबी और निकम्मा होने पर वह किसी और से प्यार करके उसके साथ भाग जाती है या फिर अपने पति को प्रेमी के साथ मिलकर रास्ते से हटा देती है। इश्क के रंगों के साथ गरीबी का भी रंग बदला है। महिलायें रूढ़ नैतिकता की दीवार गिराने में अब आगे-आगे हैं। लक्ष्मण रेखा को पार करके अपनी एक अलग पहचान बनाना चाहती हैं। गीताश्री के जैसी कहानियांँ स्त्री को पुरुष के साथ खड़ा होने से रोकती हैं। स्त्री-पुरुष के दाम्पत्य जीवन की आकांक्षाओं के विपरीत तस्वीर बनाती हैं, ऐसी कहानियां। गरीबी में भी स्त्री और पुरुष के बीच प्रेम का सम्पूर्ण प्रतिदान एक दूसरे के प्रति होना ही स्त्री विमर्श की सार्थकता है। स्त्री जाति की पूरी अस्मिता के बारे में नई लेखिकाओं को सोचना चाहिए। स्त्री विमर्श की तीसरी आँख
से आधी दुनिया को देखने का आगाज कब होगा..!
से आधी दुनिया को देखने का आगाज कब होगा..!
@रमेश कुमार "रिपु"


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