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भावुकता और नैतिकता से गुजरती गिरीश पंकज की कहानियांँ को पढ़ना गहन अनुभूति से गुजरने जैसा है। कहानी संग्रह ‘काॅल गर्ल की बेटी’ पाठक के अंतर्मन को झकझोर देती है। इस किताब का नाम ‘काॅल गर्ल की बेटी’ होने से आम पाठक के मन में किताब को लेकर कई संदेह हो सकते हैं। लेकिन ‘काॅल गर्ल की बैटी‘ में एक माॅ के संघर्ष की कथा है। 'काॅल गर्ल'न केवल अपना सपना पूरा करती है बल्कि, अपनी बेटी को ऊॅचे मुकाम तक पहुँचाती है। कहानी बताती है, कि इच्छा शक्ति से बड़ी, कोई दूसरी ताकत नहीं होती।
सग्रह में 25 कहानियाॅं है। सभी कहानियों में नैतिकता, इंसानियत, अपनत्व, सांस्कृतिक मूल्य और मर्यादा का संदेश है। जो आदमी को इंसान बनाने का मार्ग प्रशस्त करते हैं। कहानियों की भाषा घुमावदार नहीं है। हर कहानी अपनी बात सहज और सीधे तरीके से कहती है। इन कहानियों में 21 वीं सदी के छल,प्रपंच और अपने स्वार्थ के लिए नैतिक मूल्यों को दरकिनार करने की भयावहता का अक्स कई परतों में देखने को मिलता है। नये दौर में आज की पीढ़ी की मनोवृति पर चोट करते हुए और समाज में नैतिकता की क्षीण होती भूमिका पर कई कहानियों में रोष देखा गया है। ‘ज्ञान का पिटारा’ से पता चलता है, कि नेताओं के कथनी और करनी में कितना अंतर होता है। समाज में सांस्कृतिक पतन के लिए यही दोषी हैं। बच्चों को शिक्षा प्रद फिल्म बनाने की बात संस्कृति विभाग करता है। मगर रिश्वत के वह किसी को बजट नहीं देता।
‘स्वप्न भंग’ व्यंग्य शैली में है। सियासी व्यक्ति को कुर्सी मिलने पर सेवाराम से मिठाई लाल बनने की कथा है। यह लोकतंत्रीय व्यवस्था पर कटाक्ष है। ‘मै यही रहूॅंगा’ एक भावनात्मक कहानी है। खुदगर्ज बेटों की कभी बुराई पिता नहीं करते। वहीं बड़ा पैकेज पाने वाले बेटे कभी पलट कर नहीं देखते, कि उनके माता-पिता किस हाल में हैं। बुजुर्ग अभिभावकों के मन की पीड़ा और उनके भाव को कहानी में चित्रित किया गया है।
गिरीश पंकज की कहानियांँ संवेदनाओं की भट्टी में तपी हुई हैं। इसीलिए विविध भावबोध हैं। ‘देवता’ कहानी में इंसानियत के लय और ताल की भावनाएं है। दोस्ती में खटास हमेशा पैसे से आती है। यदि दो लोगों में एक का मन साफ हो, तो किसी न किसी मोड़ पर सामने वाले का मन भी बदल जाता है।
बूढ़ों का गाँव’ संग्रह की यह कहानी मन को छू लेती है। गाँव को नजर लगती नहीं,बल्कि लगाने वाले आते हैं। विकास के सपने दिखाना और जमीन के बदले मुआवजा का लालच देकर रिश्ते में अलगाववाद का बीज हर गांँव में बोया जा रहा है। नई और पुरानी पीढ़ी के बीच कैसे तनाव की सड़कें बनती है, बताती है कहानी।
बेटी मेरा अभिमान है,कहना बड़ा सहज है। लेकिन टी.वी में रेप की घटनायें किसी भी मांँ की मनोदशा पर विपरीत असर डालते हैं। बेटी होने का डर, क्या होता है सिर्फ माॅ समझती है। एक माॅं क्यों नहीं चाहती बेटी, उसके डर को उकेरा गया है ‘नहीं चाहिए बेटी में’।
सेवा आश्रम’ में एक संदेश है। पढ़ाई-लिखाई का तभी महत्व है जब उसका सदुपयोग समाज की भलाई में किया जाये। एक कुष्ठ रोगी स्वयं ठीक होने के बाद अपने गाॅव में दूसरों के उपचार के लिए सेवाश्रम खोलता है।
‘नया बनवारी,सबला,बुराई का अंत,असली वारिस,कानून का कमाल,आजादी आदि कहानियाँ लोगों की भावनाओं को जाहिर करते हुए एक दूसरे से जोड़ती हैं। सभी कहानियों में अलग-अलग पृष्ठभूमि के पात्र हैं। गिरीश पंकज की कहानियों के केन्द्र में समाज में फैली विसंगतियों की वजह के साथ ही,उसके निदान की ओर इशारा भी करती हैं। कहानियों में मनुष्य की प्रवृतियों के हर पहलू पर चिंता जताई गई है। कहानियों के पात्र और उनकी परिस्थितियांँ सहज और सरल है,उनकी भीतरी जटिलताओं को उभारने का ईमानदार प्रयत्न किया गया है। यह कहानी संग्रह समाज में नकारात्मक सोच और विचार के वे लोग,जो नैतिकता और इंसानियत को नहीं मानते, उन्हें सचेत करती है, कि समाज के नैतिक मूल्यों की अनदेखी करेंगे तो उसका अंजाम विस्फोटक होगा। किताब में प्रूफ की गलतियांँ खटकती है। नैतिकता और सामाजिक मूल्यों को तरजीह देने वाले पाठकों को यह किताब पसन्द आएगी।
लेखक- गिरीश पंकज
प्रकाशक-इंडिया नेट बुक्स
कीमत -250 रुपये
@रमेश कुमार "रिपु"

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