फेक न्यूज की आड़ में भूपेश सरकार ने मीडिया को नियंत्रित करने अपने लोगों को सदस्य बनाकर मॉनिटरिंग कमेटी गठित की है। बगैर कानून बने पुलिस और जनसंपर्क फेक न्यूज की आड़ में मीडिया के खिलाफ कार्रवाई करेगा। यानी मीडिया के गले में इमरजेंसी का फंदा डाल दी है सरकार।
0 रमेश कुमार ‘‘रिपु‘‘
छत्तीसगढ़ की भूपेश बघेल सरकार केन्द्रीय आयकर विभाग के छापे से बौखला कर अब सीधे मीडिया पर लगाम लगाने के लिए अघोषित इमरजेंसी लगा दी है। सत्ता के करीबी रहने वालों को मॉनिटरिंग कमेटी का सदस्य बनाकर चैथे स्तंभ का गला घोटने का फैसला कर लिया है। चैंकाने वाली बात यह है कि भूपेश सरकार ने फेक न्यूज के खिलाफ कार्रवाई के लिए विधान सभा में कोई प्रस्ताव नहीं लाई। न ही चर्चा कराई। और न ही कोई कानून बनाया है। ऐसे में सवाल यह है कि किस आधार पर जनसंपर्क विभाग और पुलिस फेक न्यूज है, कहकर कार्रवाई करेगी? गठित की गई कमेटी में कोई जज भी नहीं है। ऐसे में जनसंपर्क विभाग और पुलिस किस आधार पर तय करेंगे कि सोशल मीडिया में या फिर अखबार में छपने वाली खबर फेक न्यूज है? जबकि कायदे से पत्रकारों से और प्रेस कांउसिल से इसकी रायशुमारी ली जानी चाहिए। जाहिर सी बात है कि भूपेश बघेल सरकार एक तरीके से प्रदेश में अघोषित इमरजेंसी मीडिया के लिए लगा दी है। अब सरकार के काम काज की,प्रशासन की खामियां और भ्रष्टाचार की खबर छापना मुश्किल हो जायेगा। सरकार ऐसी खबरों को फेक न्यूज करार दे देगी। ऐसे में सवाल यह उठता है कि प्रदेश में पत्रकार सुरक्षा कानून का क्या कोई औचित्य रह जायेगा? एक तरीके से यह मीडिया के खिलाफ आपातकाल ही है। इससे मीडिया को नुकसान होगा ही, साथ ही जनता का भी मीडिया पर भरोसा उठ जायेगा। भूपेश सरकार चाहती है कि मीडिया में उसकी केवल तारीफ ही छपे। जैसा कि नरवा,घुरवा और बाड़ी मुख्यमंत्री का ड्रीम प्रोजेक्ट है। लेकिन यह प्रोजेक्ट भ्रष्टाचार का शिकार हो गया है। जाहिर है कि मीडिया में इस तरह की खबरें छापने वाले की खैर नहीं।
सरकार कहेगी फेक न्यूज है
कांग्रेस प्रशासन में जब केवल दूरदर्शन या आकाशवाणी पर समाचार आते थे। तब वे सरकारी भोंपू ही हुआ करते थे। लोग आंख बंद कर विश्वास भी करते थे। उनके पास और कोई साधन नहीं था। लेकिन आज के समय में जब सोशल मीडिया इतना मजबूत है, ऐसे समय इस तरह का कदम उठाना तानाशाही का एक अलग रूप है। बेहतर हो कि इसे प्रेस ट्रस्ट को सौंपा जाए। वरना फेक न्यूज इनके विरुद्ध बोलने वाली हर न्यूज होगी।
इंदिरा की इमरजेंसी से प्रभावित
छत्तीसगढ़ जर्नलिस्ट यूनियन के प्रदेश उपाध्यक्ष अमित मिश्रा कहते हैं,‘‘छत्तीसगढ़ की सरकार भी इंदिरा गांधी की इमरजेंसी से प्रभावित है, ऐसा जान पड़ता है। सोशल मीडिया में सच लिखने वाले पत्रकारों को सलाखों के पीछे डालने की सरकार की नीति हैरान करने वाली है। पत्रकारिता की कटोरी में एक नया तूफान सरकार ने डाल दिया है। इसका खामियाजा सरकार को अभी शायद ना दिखे, लेकिन आने वाले 4 साल के बाद सरकार का जो चेहरा बनेगा, वह कल्पना से परे होगा। इसलिए कि पत्रकारिता के गले पर जिस तरह इमरजेंसी का चाकू लगाया जा रहा है, वह ना तो राज्य सरकार के हित में है और ना ही प्रदेश की जनता के हित में है’।
इंदिरा की राह पर भूपेश
कायदे से पत्रकारिता से जुड़े जितने भी माध्यम हैं, उस पर सरकार का नियंत्रण नहीं होना चाहिए। यदि ऐसा होगा तो फिर लोग किस मुंह से कहेंगे कि चैथा स्तंभ स्वतंत्र है। जाहिर सी बात है कि अब छत्तीसगढ़ में सच लिखना और सच बोलना, दोनों अपराध है। स्व. इंदिरा गांधी ने देश में इमरजेंसी लगा कर मीडिया को अपने नियंत्रण में लिया था। इमरजेंसी से देश में अराजकता का माहौल था। जिसे आज भी लोग नहीं भूले हैं। पत्रकारिता पर इमरजेंसी लगी हुई थी। सरकार के खिलाफ या फिर सरकार की बुराई रत्ती भर अखबार में छापना प्रतिबंधित था। यही काम भूपेश सरकार कर रही है।
राजतंत्रवाला है यह दिमाग
रायपुर के वरिष्ठ पत्रकार गिरीश पंकज कहते हैं,‘‘ फेक न्यूज हर हालत में रुकनी चाहिए। लेकिन इसके लिए नियम प्रेस काउंसिल या फिर मीडिया का कोई बड़ा संगठन बनाए। एडिटर गिल्ड या पत्रकार संघ बनाए। लेकिन जब राज्य सरकार कोई कमेटी बनाएगी, तो वह पूर्वाग्रह से ग्रस्त ही रहेगी। वह निष्पक्ष नहीं हो सकती। सवाल यह है कि कोई सरकार कैसे तय करेगी कि यह फेक न्यूज है। सरकार के काले कारनामों पर कोई खबर आएगी, तो सरकार कह सकती है यह तो फेक है। दरअसल समय,समय पर कुछ सरकारें ऐसी हरकतें करती रही हैं, जिससे उनके चरित्र पर संदेह होने लगता है। बातें तो लोकतंत्र की कही जाती है लेकिन अंदर.ही,अंदर एक राजतंत्रवाला दिमाग काम करता रहता है। यह एक खतरनाक स्थिति है’’।
गौरतलब है कि चालीस साल पहले बिहार प्रेस बिल लाया गया था। तब उसका देशभर के पत्रकार संगठनों ने पुरजोर विरोध किया था। रायपुर में भी आंदोलन किया गया था। वैसे वर्तमान राज्य सरकार भी मीडिया के दमन का एक रास्ता बना रही है, तो इसका भी पुरजोर विरोध यहां के पत्रकार करने की बात करते है। देखना है कि मॉनिटरिंग कमेटी किस तरह से काम करती है। वैसे नक्सल जिलों में लगभग हर पत्रकार के खिलाफ मुकदमा दर्ज है।
सरकार की चेतावनी
छत्तीसगढ़ शासन की राज्य स्तरीय मॉनिटरिंग सेल की बैठक पुलिस महानिरीक्षक आनंद छाबड़ा की अध्यक्षता में 5 मार्च को हुई। इसमें सदस्य के रूप में पुलिस अधीक्षक आरिफ शेख, जिला शासकीय अधिवक्ता के.के शुक्ला, पत्रकार रश्मि, अभिषेक मिश्रा तथा आवेश तिवारी और संयुक्त सचिव जनसम्पर्क उमेश मिश्र उपस्थित थे। मॉनिटरिंग सेल का कहना है, एनआरसी,हाल में ही आयकर के छापे और कोल घोटाले से जुड़ी खबरें झूठी थी। सोशल मीडिया के साथ प्रिंट मीडिया को ऐसी खबरों के प्रकाशन, प्रसारण, अग्रेषण से बचने के लिए चेतावनी जारी की गई है। इसकी जद में व्हाट्सएप समूह के एडमिन, मीडिया हाउस के संचालक और सम्पादक आयेंगे। आवश्यकतानुसार माॅनीटरिंग सेल आपराधिक प्रकरण भी दर्ज करेगा।
एक पत्रकार ने कहा, छत्तीसगढ़ सरकार को सत्य खबरों पर भी वैधानिक कार्रवाई नहीं किये जाने की गारंटी देने का वादा करना होगा। वर्ना लोकतंत्र और चैथे स्तंभ की स्वतंत्रता बरकार रखने में जुटे पत्रकारों का गला घोंटने में सत्ताधारी दल और सरकार कोई कसर बाकि नहीं छोड़ेगी’’।
यह अघोषित सेंसरशिप है
भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष विक्रम उसेंडी ने कहा, प्रदेश सरकार अब फेक न्यूज की मॉनीटरिंग के बहाने अपने हितों पर चोट पहुंचाने वाली हर सूचना व सामग्रियों को फेक न्यूज या अफवाह बताकर संपादकों.संचालकों के खिलाफ कार्रवाई करेगी। दरअसल सरकार अघोषित सेंसरशिप लादकर अलोकतांत्रिक आचरण प्रस्तुत करने पर आमादा हैं। आयकर छापों में मिले दस्तावेजों और सम्पत्तियों की जांच चल रही है, ऐसे में सरकार किस आधार पर दावा कर रही है कि आयकर छापों में कुछ नहीं मिला है। आयकर विभाग ने 150 करोड़ की नाजायज संपत्ति मिलने की बात कहकर भूपेश सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया है। सरकार नहीं चाहती कि अब दोबारा ऐसा हो’’।
प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भी जनता की आवाज को दबाने की कोशिश की थी। आज तक उसके कारण कांग्रेस का इतिहास कलंकित है। लगता है बिहार प्रेस बिल की तरह इसके भी विरोध के लिए पत्रकारों को सड़कों पर उतरना पड़ेगा।
















































