Tuesday, March 17, 2020

मीडिया के गले में‘इमरजेंसी’का फंदा

 
फेक न्यूज की आड़ में भूपेश सरकार ने मीडिया को नियंत्रित करने अपने लोगों को सदस्य बनाकर  मॉनिटरिंग कमेटी गठित की है। बगैर कानून बने पुलिस और जनसंपर्क फेक न्यूज की आड़ में मीडिया के खिलाफ कार्रवाई करेगा। यानी मीडिया के गले में इमरजेंसी का फंदा डाल दी है सरकार। 

0  रमेश कुमार ‘‘रिपु‘‘           
    छत्तीसगढ़ की भूपेश बघेल सरकार केन्द्रीय आयकर विभाग के छापे से बौखला कर अब सीधे मीडिया पर लगाम लगाने के लिए अघोषित इमरजेंसी लगा दी है। सत्ता के करीबी रहने वालों को मॉनिटरिंग कमेटी का सदस्य बनाकर चैथे स्तंभ का गला घोटने का फैसला कर लिया है। चैंकाने वाली बात यह है कि भूपेश सरकार ने फेक न्यूज के खिलाफ कार्रवाई के लिए विधान सभा में कोई प्रस्ताव नहीं लाई। न ही चर्चा कराई। और न ही कोई कानून बनाया है। ऐसे में सवाल यह है कि किस आधार पर जनसंपर्क विभाग और पुलिस फेक न्यूज है, कहकर कार्रवाई करेगी? गठित की गई कमेटी में कोई जज भी नहीं है। ऐसे में जनसंपर्क विभाग और पुलिस किस आधार पर तय करेंगे कि सोशल मीडिया में या फिर अखबार में छपने वाली खबर फेक न्यूज है? जबकि कायदे से पत्रकारों से और प्रेस कांउसिल से इसकी रायशुमारी ली जानी चाहिए। जाहिर सी बात है कि भूपेश बघेल सरकार एक तरीके से प्रदेश में अघोषित इमरजेंसी मीडिया के लिए लगा दी है। अब सरकार के काम काज की,प्रशासन की खामियां और भ्रष्टाचार की खबर छापना मुश्किल हो जायेगा। सरकार ऐसी खबरों को फेक न्यूज करार दे देगी। ऐसे में सवाल यह उठता है कि प्रदेश में पत्रकार सुरक्षा कानून का क्या कोई औचित्य रह जायेगा? एक तरीके से यह मीडिया के खिलाफ आपातकाल ही है। इससे मीडिया को नुकसान होगा ही, साथ ही जनता का भी मीडिया पर भरोसा उठ जायेगा। भूपेश सरकार चाहती है कि मीडिया में उसकी केवल तारीफ ही छपे। जैसा कि नरवा,घुरवा और बाड़ी मुख्यमंत्री का ड्रीम प्रोजेक्ट है। लेकिन यह प्रोजेक्ट भ्रष्टाचार का शिकार हो गया है। जाहिर है कि मीडिया में इस तरह की खबरें छापने वाले की खैर नहीं।
सरकार कहेगी फेक न्यूज है
कांग्रेस प्रशासन में जब केवल दूरदर्शन या आकाशवाणी पर समाचार आते थे। तब वे सरकारी भोंपू ही हुआ करते थे। लोग आंख बंद कर विश्वास भी करते थे। उनके पास और कोई साधन नहीं था। लेकिन आज के समय में जब सोशल मीडिया इतना मजबूत है, ऐसे समय इस तरह का कदम उठाना तानाशाही का एक अलग रूप है। बेहतर हो कि इसे प्रेस ट्रस्ट को सौंपा जाए। वरना फेक न्यूज इनके विरुद्ध बोलने वाली हर न्यूज होगी।
इंदिरा की इमरजेंसी से प्रभावित
छत्तीसगढ़ जर्नलिस्ट यूनियन के प्रदेश उपाध्यक्ष अमित मिश्रा कहते हैं,‘‘छत्तीसगढ़ की सरकार भी इंदिरा गांधी की इमरजेंसी से प्रभावित है, ऐसा जान पड़ता है। सोशल मीडिया में सच लिखने वाले पत्रकारों को सलाखों के पीछे डालने की सरकार की नीति हैरान करने वाली है। पत्रकारिता की कटोरी में एक नया तूफान सरकार ने डाल दिया है। इसका खामियाजा सरकार को अभी शायद ना दिखे, लेकिन आने वाले 4 साल के बाद सरकार का जो चेहरा बनेगा, वह कल्पना से परे होगा। इसलिए कि पत्रकारिता के गले पर जिस तरह इमरजेंसी का चाकू लगाया जा रहा है, वह ना तो राज्य सरकार के हित में है और ना ही प्रदेश की जनता के हित में है’।
इंदिरा की राह पर भूपेश
कायदे से पत्रकारिता से जुड़े जितने भी माध्यम हैं, उस पर सरकार का नियंत्रण नहीं होना चाहिए। यदि ऐसा होगा तो फिर लोग किस मुंह से कहेंगे कि चैथा स्तंभ स्वतंत्र है। जाहिर सी बात है कि अब छत्तीसगढ़ में सच लिखना और सच बोलना, दोनों अपराध है। स्व. इंदिरा गांधी ने देश में इमरजेंसी लगा कर मीडिया को अपने नियंत्रण में लिया था। इमरजेंसी से देश में अराजकता का माहौल था। जिसे आज भी लोग नहीं भूले हैं। पत्रकारिता पर इमरजेंसी लगी हुई थी। सरकार के खिलाफ या फिर सरकार की बुराई रत्ती भर अखबार में छापना प्रतिबंधित था। यही काम भूपेश सरकार कर रही है।
राजतंत्रवाला है यह दिमाग
रायपुर के वरिष्ठ पत्रकार गिरीश पंकज कहते हैं,‘‘ फेक न्यूज हर हालत में रुकनी चाहिए। लेकिन इसके लिए नियम प्रेस काउंसिल या फिर मीडिया का कोई बड़ा संगठन बनाए। एडिटर गिल्ड या पत्रकार संघ बनाए। लेकिन जब राज्य सरकार कोई कमेटी बनाएगी, तो वह पूर्वाग्रह से ग्रस्त ही रहेगी। वह निष्पक्ष नहीं हो सकती। सवाल यह है कि कोई सरकार कैसे तय करेगी कि यह फेक न्यूज है। सरकार के काले कारनामों पर कोई खबर आएगी, तो सरकार कह सकती है यह तो फेक है। दरअसल समय,समय पर कुछ सरकारें ऐसी हरकतें करती रही हैं, जिससे उनके चरित्र पर संदेह होने लगता है। बातें तो लोकतंत्र की कही जाती है लेकिन अंदर.ही,अंदर एक राजतंत्रवाला दिमाग काम करता रहता है। यह एक खतरनाक स्थिति है’’।
गौरतलब है कि चालीस साल पहले बिहार प्रेस बिल लाया गया था। तब उसका देशभर के पत्रकार संगठनों ने पुरजोर विरोध किया था। रायपुर में भी आंदोलन किया गया था। वैसे वर्तमान राज्य सरकार भी मीडिया के दमन का एक रास्ता बना रही है, तो इसका भी पुरजोर विरोध यहां के पत्रकार करने की बात करते है। देखना है कि मॉनिटरिंग कमेटी किस तरह से काम करती है। वैसे नक्सल जिलों में लगभग हर पत्रकार के खिलाफ मुकदमा दर्ज है।
सरकार की चेतावनी
छत्तीसगढ़ शासन की राज्य स्तरीय मॉनिटरिंग सेल की बैठक पुलिस महानिरीक्षक आनंद छाबड़ा की अध्यक्षता में 5 मार्च को हुई। इसमें सदस्य के रूप में पुलिस अधीक्षक आरिफ शेख, जिला शासकीय अधिवक्ता के.के शुक्ला, पत्रकार रश्मि, अभिषेक मिश्रा तथा आवेश तिवारी और संयुक्त सचिव जनसम्पर्क  उमेश मिश्र उपस्थित थे। मॉनिटरिंग सेल का कहना है, एनआरसी,हाल में ही आयकर के छापे और कोल घोटाले से जुड़ी खबरें झूठी थी। सोशल मीडिया के साथ प्रिंट मीडिया को ऐसी खबरों के प्रकाशन, प्रसारण, अग्रेषण से बचने के लिए चेतावनी जारी की गई है। इसकी जद में व्हाट्सएप समूह के एडमिन, मीडिया हाउस के संचालक और सम्पादक आयेंगे। आवश्यकतानुसार माॅनीटरिंग सेल आपराधिक प्रकरण भी दर्ज करेगा।
एक पत्रकार ने कहा, छत्तीसगढ़ सरकार को सत्य खबरों पर भी वैधानिक कार्रवाई नहीं किये जाने की गारंटी देने का वादा करना होगा। वर्ना लोकतंत्र और चैथे स्तंभ की स्वतंत्रता बरकार रखने में जुटे पत्रकारों का गला घोंटने में सत्ताधारी दल और सरकार कोई कसर बाकि नहीं छोड़ेगी’’।
यह अघोषित सेंसरशिप है
भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष विक्रम उसेंडी ने कहा, प्रदेश सरकार अब फेक न्यूज की मॉनीटरिंग के बहाने अपने हितों पर चोट पहुंचाने वाली हर सूचना व सामग्रियों को फेक न्यूज या अफवाह बताकर संपादकों.संचालकों के खिलाफ कार्रवाई करेगी। दरअसल सरकार अघोषित सेंसरशिप लादकर अलोकतांत्रिक आचरण प्रस्तुत करने पर आमादा हैं। आयकर छापों में मिले दस्तावेजों और सम्पत्तियों की जांच चल रही है, ऐसे में सरकार किस आधार पर दावा कर रही है कि आयकर छापों में कुछ नहीं मिला है।   आयकर विभाग ने 150 करोड़ की नाजायज संपत्ति मिलने की बात कहकर भूपेश सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया है। सरकार नहीं चाहती कि अब दोबारा ऐसा हो’’।
प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भी जनता की आवाज को दबाने की कोशिश की थी। आज तक उसके कारण कांग्रेस का इतिहास कलंकित है। लगता है बिहार प्रेस बिल की तरह इसके भी विरोध के लिए पत्रकारों को सड़कों पर उतरना पड़ेगा।
    






Tuesday, March 10, 2020

ईमानदारी के खलनायक

                     
      
भ्रष्टाचार के लिए जनता राजनेताओं को दोषी करार देती है। पर सही मायने में बेेईमान अफसर हैं। अफरशाही में बढ़ता भ्रष्टाचार ये साबित करता है कि लोकायुक्त की कार्रवाई और हाई कोर्ट की फटकार के बाद भी इन्हें डर नहीं लगता। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने 12 घोटालेबाज अफसरों के विरूद्ध केस दर्ज करने का आदेश देकर बता दिया कि इनकी बेईमानी की वजह से जनहितकारी नीतियां प्रभावित होती हैं।












0 रमेश कुमार ‘‘रिपु‘‘
            छत्तीसगढ़ में आईएएस अफसरों ने बिहार के चारा घोटाले के लिए अपनाये गये नुस्खे से आगे निकल गये। अफसरों ने दिव्यांगों का इलाज कागजों पर दिखाकर एक हजार करोड़ रूपये पर हाथ फेर दिया। यह सब हुआ डाॅ रमन सिंह के कार्यकाल में। जाहिर सी बात है कि पूर्व मुख्मंत्री डाॅ रमन सिंह के कार्यकाल में नौकराशाह उन्हें अंधेरे में रखते थे। राज्य के 6 आईएएस समेत 12 अफसरों की बेईमानी पर्दे में ही रहती यदि रायपुर के कुंदन सिंह ठाकुर की ओर से अधिवक्ता देवर्षि ठाकुर हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर न करते।
राज्य के 6 आईएएस अफसर आलोक शुक्ला, विवेक ढांड, एम.के राउत, सुनील कुजूर, बीएल अग्रवाल और पी.पी सोती समेत सतीश पांडेय, राजेश तिवारी, अशोक तिवारी, हरमन खलखो, एम.एल पांडेय और पंकज वर्मा ने फर्जी संस्थान स्टेट रिसोर्स सेंटर एसआरसी राज्य स्रोत निःशक्त जन संस्थान के नाम पर करोड़ों रुपए का घोटाला किया है। 30 जनवरी को जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस पीपी साहू की डिवीजन बेंच ने 2018 में दायर की गई जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सीबीआई को 7 दिनों के भीतर एफआईआर दर्ज करने के आदेश दिए थे। छत्तीसगढ़ के रिटायर्ड आईएएस अफसर  एम.के राउत और विवेक ढांढ की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने एनजीओ घोटाले के मामले में सीबीआइ जांच पर रोक लगा दी है।
भाजपा राज में घोटाला
एक हजार करोड़ का घोटाला सन् 2008 से 2018 के दौरान भाजपा राज में हुआ है। चैकाने वाली बात यह है कि पूर्व मुख्य सचिवों में विवेक ढांड अभी रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी रेरा के अभी  अध्यक्ष हैं। जो संवैधानिक पद है। दूसरे पूर्व मुख्य सचिव सुनील कुजूर राज्य सहकारी निर्वाचन आयोग के कमिश्नर हैं। मुख्य सूचना आयुक्त एम.के. राउत का नाम भी फर्जीवाड़ा करने वालों में है। एम. के. राउत का कहना है कि वे कभी समाज कल्याण विभाग में नहीं थे। विवेक ढांड और राउत को रमन सरकार ने संवैधानिक पदों पर बिठाया था। वहीं सुनील कुजूर को मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने मुख्य सचिव और फिर निर्वाचन आयोग का कमिश्नर बनाया। स्कूल शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव डॉ आलोक शुक्ला का नाम भी घोटाला करने वालों में है। बहुचर्चित नान नागरिक आपूर्ति निगम घोटाले में वे करीब तीन साल तक निलंबित थे। उन्हें कांग्रेस की भूपेश बघेल सरकार ने बहाल किया है। जबकि नान घोटाले की लड़ाई भूपेश सड़क से सदन तक की,आलोक शुक्ला को बार्खास्त करने के लिए।
अपना कल्याण किया
छत्तीसगढ़ में बाबूलाल अग्रवाल पहले आईएएस अफसर हैं, जो केंद्रीय कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग में 250 करोड़ रुपये के घोटाले के आरोप में बर्खास्त किये जा चुके हैं। जेल भी जा चुके हैं। प्रदेश गठन के पहले इस कांड में शामिल पी.पी श्रोती सन् 2000 में भोपाल से आए थे। सेवानिवृति के बाद भी सेवावृद्धि लेते रहे हैं। पंचायत और समाज कल्याण विभाग के संचालक के पद पर बरसों तक जमे रहे।     राज्य योजना मंडल के सदस्य भी रहे। समाज कल्याण विभाग के अपर संचालक एम.एल. पांडेय पहले भी भ्रष्टाचार के मामले में फंस चुके हैं। कुछ साल पहले एंटी करप्शन ब्यूरो ने उनके घर छापा मारा था। छापे में अग्रोहा सोसायटी में करीब 5 हजार वर्गफुट में आलीशान बंगला। दस हजार वर्गफुट में दो मंजिला आलीशान भवन। जिसमें स्कूल चल रहा है। 25 एकड़ जमीन पाटन में। मुंबई, पुणे में करोड़ों का निवेश। 28 बैंक खाते में एक करोड़ से अधिक राशि। कई जमीन खरीदी के प्रमाण मिले हैं। पूछताछ के दौरान एसीबी को 10 विदेश दौरों का पता चला। घर से डाॅलर भी मिले। 25 से अधिक बैंक खाते। विभिन्न फर्मो में 50 लाख से अधिक का निवेश। समाज कल्याण विभाग के अपर संचालक एमएल पांडे पर 9 साल पहले 90 लाख का घोटाला करने का आरोप लगा था। उनके खिलाफ तत्कालीन सचिव एम.के राउत ने एफआईआर करने की सिफारिश की थी। लेकिन इसे दबा दिया गया। इतना ही नहीं उन्हें पद से हटाने के बजाय मनपसंद पोस्टिंग भी दी गई। दिव्यांगों के नाम का पैसा डकारने वालों में समाज कल्याण विभाग के संयुक्त संचालक राजेश तिवारी अशोक तिवारी, हरमन खलखो, पंकज वर्मा और सतीश पांडेय के भी नाम हैं।
ऐसे किया महाघोटाला
अधिकारियों ने फर्जी संस्थान स्टेट रिसोर्स सेंटर (एसआरसी) के नाम पर घोटाला किया है। एसआरसी का कार्यालय माना रायपुर में बताया गया, जो समाज कल्याण विभाग के अंतर्गत आता है। एसआरसी ने बैंक ऑफ इंडिया के एकाउंट और एसबीआइ मोतीबाग के तीन एकाउंट से संस्थान में कार्यरत अलग.अलग लोगों के नाम पर फर्जी आधार कार्ड से खाते खुलवाकर रुपये निकाले गए। कोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि ऐसी कोई संस्था राज्य में है ही नहीं। सिर्फ कागजों में संस्था का गठन किया गया था। राज्य को संस्था के माध्यम से 1000 करोड़ का वित्तीय नुकसान उठाना पड़ा। पूर्व मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह सीबीआइ जांच से सभी बातों के खुलासे की मांग कर रहे हैं। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल घोटाले के लिए डॉ रमन सिंह और केंद्रीय राज्यमंत्री रेणुका सिंह को जवाब देह बता रहे हैं।
फर्जी बिल पास
भारत सरकार ने दिव्यांग बच्चों के सर्वेक्षण के लिए एक करोड़ की रकम आवंटित की थी। लेकिन अफसरों ने इस रकम को कागजों में चंद जिलों को वितरित करने की खानापूर्ति की। शेष रकम से गैर.आवश्यक वस्तुओं की खरीदी के फर्जी बिल संलग्न कर एक करोड़ रूपये पर हाथ फेर दिया। सर्वेक्षण भी नहीं किया। दरसअल ज्यादातर जिलों में सर्वेक्षण की रकम वितरित ही नहीं की गई। राशि पर हाथ मारने के लिए समाज कल्याण विभाग के अधिकारियों ने अपने चहेते अधिकारियों की पदस्थापना वाले जिले को एक से अधिक बार राशि आवंटित किया। ताकि सर्वेक्षण व्यय कागजों में दर्शाया जा सके। इसमें रायपुर के व्यापक इंटरप्राइजेस और सिक्यूर्ड सर्विसेस अमलीडीह के लाखों के बिल संलग्न किये गए। इन बिलों में ना तो ऑर्डर नंबर है और ना ही जीएसटी विवरण। अफसरों ने विज्ञापन के लिए होर्डिंग्स पर लाखों खर्च बताया लेकिन, होर्डिग्स किस स्थान पर है और किस विषय को लेकर लगाई गई, इसका कोई विवरण नहीं है। अफसरों ने लाखों की सरकारी रकम राज्य संसाधन एवं पुनर्वास केंद्र को देना बताया, लेकिन व्यय बिल लगाया सिक्योरिटी सर्विस का। राज्य संसाधन एवं पुनर्वास केंद्र माना को जारी 18 लाख रुपए के बिल सिक्योर्ड सर्विसेस अमलीडीह और सिक्योरिटी कंपनी के दर्शाये गए। इसके अलावा श्री साई इंटरप्राइजेस भनपुरी से कम्प्यूटर टेबल, सोफा, राउंड टेबल समेत अन्य मेसर्स रॉय किराना एंड जनरल स्टोर माना से राशन, होटल विनायक इंटरनेशनल में लंच, डिनर और रुम बुकिंग, ओम साई मोबाइल्स एंड कम्प्यूटर से लैपटॉप, डेस्कटॉप समेत अन्य उपकरणों की खरीदी के केवल बिल हैं, सामान नहीं है। सभी बिल पास भी हो गया।
यह संगठित अपराध हैः हाई कोर्ट
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान राज्य के मुख्य सचिव अजय सिंह ने अपना शपथ.पत्र दिया था। इसमें उन्होंने 150.200 करोड़ की गलतियां सामने आने की बात कही थी। हाईकोर्ट ने कहा कि जिसे राज्य के मुख्य सचिव गलतियां और त्रुटि बता रहे हैं, वह एक संगठित और सुनियोजित अपराध है।  फर्जीवाड़े में उलझे कुछ ओहदेदारों की नियुक्ति भले रमन सिंह ने की हो लेकिन, ज्यादातर अफसर अब भूपेश बघेल के आदमी बन गये हैं। यह मामला पहले सिंगल बेंच के पास था फिर गंभीरता को देखकर दो जजों की बेंच को भेजा गया। कहा जा रहा है कि कोर्ट संज्ञान नहीं लेती तो इतना बड़ा घोटाला उजागर ही नहीं होता। 
रेणुका सिंह का भी नाम
फर्जीवाड़े में केंद्रीय जनजाति विकास राज्यमंत्री रेणुका सिंह भी लपेटे में आ गई हैं। जब यह फर्जीवाड़ा हुआ, तब वह कुछ समय के लिए राज्य की समाज कल्याण मंत्री थीं। रेणुका सिंह का कहना है कि उन पर गलत आरोप लगाया गया है,लेकिन पूछताछ की गई तो पूरा सहयोग करेंगी।
डेढ़ लाख की रिश्वत लेते पकड़े गये
भ्रष्टाचार की बेल छत्तीसगढ़ से लेकर मध्यप्रदेश तक फैली है। दोनों राज्यों में कांग्रेस की सरकार है,लेकिन बेईमान अफसरों के पौ बारह हैं। योजना आर्थिक एवं सांख्यिकी विभाग रीवा संभाग के संयुक्त संचालक राजेंद्र कुमार झारिया को लोकायुक्त पुलिस ने डेढ़ लाख रुपए की रिश्वत लेते रंगे हाथों गिरफ्तार किया है। इसके बाद लोकायुक्त की एक टीम ने झारिया के भोपाल स्थिति निवास पर छापा मारा है। छापे में लोकायुक्त पुलिस को 36 लाख रुपए नगद, लगभग पौने दो किलो चांदी और सोना मिला है। झारिया कस्टम हाउसिंग कालोनी नयापुरा कोलार के रहने वाले है। संतोष कुमार द्विवेदी ठेकेदार ने लोकायुक्त पुलिस से शिकायत की थी कि झारिया विधायक निधि से स्वीकृत कार्य में प्रशासनिक अनुमति दिलाने के एवज में 3 प्रतिशत राशि की मांग कर रहे हैं। विधायक निधि से ग्रामीण क्षेत्र में पानी का टैंकर व 10 गांवों में यात्री प्रतीक्षालय बनवाने के लिए 71,22500 रुपए की धनराशि जारी की गई है। 
जाहिर सी बात है कि बेईमान अफसरों की वजह से जन हितकारी योजनाएं और नीतियों का सही तरीके से क्रियान्वयन नहीं होता। अदालत को भी ऐसे लोगों के खिलाफ सख्त कदम उठाये जाना चाहिए।
      

आयकर के छापे से बवाल

     
मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के दस से ज्यादा करीबियों के ठिकाने पर आयकर छापे से बवाल मच गया।  भाजपा और कांग्रेस आमने सामने टकराव की मुद्रा में आ गये। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने राज्यपाल को ज्ञापन देकर आयकर छापे को राजनीतिक रंग दे दिया। छापे से तिलमिलाई सरकार आयकर की कार्रवाई को सरकार को अस्थिर करने की साजिश बताया।








0 रमेश कुमार ’’रिपु‘‘
              छत्तीसगढ़ में केन्द्रीय आयकर की टीम ने मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के करीबियों के यहां छापे डालकर सरकार की चूलें हिला दी। सरकार इस छापे से घबरा गई। और आनन फानन में राज्यपाल अनसुइया उइके को ज्ञापन देकर इसे रोकने की मांग कर बैठी। मीडिया से मुख्यमंत्री ने कहा,‘‘यह छापा प्रदेश सरकार को अस्थिर करने की साजिश है। ज्ञापन में आरोप लगाया कि राज्य सरकार चूंकि पूर्व सरकार के भ्रष्टाचार पर कार्रवाई कर रही है, इसलिए केन्द्र सरकार इसका बदला ले रही है‘‘। चैकाने वाली बात है कि बहुमत वाली सरकार आयकर के छापे से अस्थिर कैसे हो जायेगी? आयकर विभाग ने मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के करीबियों के यहां छापा डाला तो राजधानी रायपुर से लेकर दिल्ली तक हलचल मच गई। यह छापा बिहार में चुनाव से पहले डाला गया है। राजनीतिक हल्कों में चर्चा है कि झारखंड चुनाव की फंडिग छत्तीसगढ़ सरकार ने की थी। बिहार चुनाव की भी फंडिंग का दायित्व छत्तीसगढ़ सरकार को दिया गया है। संभवतःइस छापे के चलते सरकार की रणनीति फेल हो गई। इस छापे ने सबसे अधिक मीडिया का ध्यान मुख्यमंत्री की उप सचिव सौम्या चैरसिया के निवास में पड़े छापे ने खींचा। इसकी वजह यह है कि वो छापे के दो दिन बाद मीडिया के सामने मुखातिब होते हुए कहा,‘‘ मै दो दिन तक आॅफिस में थी। मुझे मीडिया से पता चला कि मेरे यहां आयकर का छापा पड़ा है’’। जबकि उनके ड्राइवर पन्नालाल ने 29 फरवरी को मीडिया को बताया कि छापों से पहले फाइलों से भरे चार,पांच बैग लेकर वह सी.एम हाउस गया था। इन फाइलों में क्या था, उसे नहीं मालूम’’।  
सौम्या के यहां क्या मिला              
सौम्या चैरसिया के ठिकानों पर जांच में आयकर विभाग को प्रापर्टी और लेन देन के दस्तावेज,दर्जनों रजिस्ट्री के पेपर मिले हैं। ज्वेलरी मिली हैं, जिनका मूल्यांकन किया गया। सौम्या के सभी लाॅकरों को सील करने और बैंक खातों के लेनदेन पर रोक लगा दी गई है। आय से अधिक राशि खर्च करने, बैंकों में रकम जमा करने और निवेश का खुलासा हुआ है। आयकर अधिकारी पिछले छह वर्षो के पुराने रिकार्ड की जांच कर रहे हैं। सौम्या की मां और ड्राइवर पन्नालाल से तीन फरवरी को 5 अफसरों की टीम ने दोबारा पूछताछ की। सौम्या के घर से मिले लैपटॉप, पैनड्राइव को भी सीज किया गया है। ये सारी जानकारियां आयकर के दिल्ली मुख्यालय को भेजी गई हैं। दूसरी ओर रायपुर, बिलासपुर, जगदलपुर के 32 ठिकानों में 5 दिनों की छापेमारी में मिले दस्तावेजी सबूतों के आधार पर अधिकारी जांच आगे बढ़ाने में लगे हैं।
हवाला के प्रमाण मिले
आयकर के इस छापे से 15 माह पुरानी भूपेश बघेल की सरकार आयकर के चक्रव्यूह में फंसती नजर आ रही है। आयकर टीम ने 27 फरवरी से लेकर 2 मार्च तक प्रदेश में कई ठिकानों पर छापा मारा। इनकम टैक्स कमिश्नर व मीडिया प्रवक्ता सुरभि अहलूवालिया ने बताया कि जांच के दौरान 150 करोड़ रूपये नकद मिले। साक्ष्य मिले हैं कि शराब और माइनिंग का पैसा नियमित रूप से अफसरों को जा रहा था। इसके अलावा नोटबंदी के दौरान भारी नगदी जमा करने की भी जानकारी मिली है। शेल कंपनियों में निवेश की भी सूचनाएं हैं। जब्त किए गए दस्तावेजों और इलेक्ट्रॉनिक डेटा से पता चला कि अफसरों के साथ कई लोगों को नियमित भुगतान किया जा रहा था। हवाला कारोबार के भी प्रमाण मिले हैं।
इनके यहां पड़ा आइटी का छापा
विवेक ढांड- छत्तीसगढ़ के विवेक ढांड पहले पूर्व मुख्यसचिव हैं। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद स्व. रत्नेश सालोमन के जरिये प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री अजीत जोगी को साधने वाले विवेक ढांड ने प्रदेश में सत्ता परिवर्तन होने के बाद डॉ रमन सिंह के कार्यकाल में मुख्य सचिव रहे हैं। इस समय रेरा के चेयरमेन है। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को इन्होंने पढ़ाया भी है।
सौम्या चैरसिया - मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की उप सचिव हैं। 2008 बैच की अफसर हैं। दिसंबर 2018 से मुख्यमंत्री की उपसचिव हैं। आइटी के छापे से सुर्खियों में आई।
एजाज ढेबर - छत्तीसगढ़ में कभी अजीत जोगी के बेहद करीबी तथा बाद में उनसे अलग होकर हाल ही में राजधानी रायपुर के महापौर बने एजाज ढेबर तथा उनके भाई अनवर ढेबर के ढेबर स्टील, ढेबर सिटी, रियल स्टेट वेलिंगटन होटल सहित कुछ रेस्टोरेंट में भी केंद्रीय आयकर विभाग की टीम ने छापा मारा है। हाल ही में उन्हें मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की पसंद पर महापौर बनाया गया है। ढेबर परिवार को कांग्रेस का आर्थिक मददगार माना जाता है। इनके भाई अनवर ढेबर के यहां भी आइटी ने छापा मारा है।
अरूणपति त्रिपाठी- इंडियन टेलीकाॅम सर्विस के अधिकारी है। आबकारी विभाग में ओएसडी हैं। केन्द्र से प्रतिनियुक्ति पर आए हैं।
अनिल टूटेजा- आईएएस अनिल टुटेजा तथा उनकी पत्नी मीनाक्षी टुटेजा जो कि ब्यूटीशियन संस्थान की संचालक है,के ठिकानों पर भी आयकर की टीम ने छापा मारा है। नान घोटाला में नाम आने के बाद अनिल टुटेजा को रमन सरकार ने बिना कामकाज के मंत्रालय में अटैच कर रखा था। उन्हें हाल ही में अदालत के स्थगन के बाद उद्योग विभाग के संयुक्त सचिव के पद पर नियुक्ति दी गई है।
गुरूचरण सिंह होरा - रायपुर विकास प्राधिकरण में इंजीनियर थे। इन्होंने 2013 में नौकरी छोड़ कर होटल का कारोबार शुरू किया। जमीन की कारोबारी में भी हाथ अजमाया। इस समय एक होटल और सिटी केबल न्यूज चैनल के मालिक हैं।
अनमोलक सिंह भाटिया -प्रमुख रूप से शराब के कारोबारी है। इन्हें कांग्रेस का करीबी कहा जाता है। डाॅ रमन सिंह के समय ये नेपथ्य में थे।
डाॅ ए. फरिश्ता - डाॅ फरिश्ता के यहां भी आयकर का छापा पड़ा। यहां आय से अधिक संपत्ति मिलने की जानकारी है। इसके अलावा चार्टड एकाउंटेंट कमलेश जैन, संजय संचेती सहित 22 अन्य लोगों के यहां आइटी के छापे पड़े।
मुख्यमंत्री ने बताया
आयकर छापे में विभाग के अधिकारियों को क्या क्या मिला जारी प्रेस नोट को झूठा करार देते हुए    मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कहा,‘‘आयकर विभाग को भाजपा से जुड़े गुरूचरण सिंह होरा के आफिस से 50 लाख और घर पर 51 लाख कैश मिला। रेरा चेयरमैन विवेक ढांड के यहां तीन लाख और अनिल टुटेजा के पास से 13 लाख रुपए मिले। हमारे कार्यकर्ता अफरोज के यहां भी आयकर टीम को उसके घर पर मात्र 18 सौ रुपए मिला। महापौर एजाज ढेबर के के पास मात्र तीन हजार कैश मिला। उनकी मां के पास जरूर चार लाख रुपये मिले। वो भी वे नाती,पोतों को देने के लिए पैसे जमा करती हैं’’।
एक छापा कई बातें
मुख्यमंत्री भूपेश बघेल 28 फरवरी को बोले कि सरकार को अस्थिर करने की यह साजिश है।आइटी के छापे को संघीय ढांचा के खिलाफ कार्रवाई बताया। सवाल यह है कि आयकर टीम के छापे का विरोध कांग्रेसियों ने सड़कों पर उतर कर स्थानीय आयकर विभाग के आॅफिस में जाकर क्यों किया। जब कुछ नहीं था, तो फिर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने सरकार को अस्थिर करने की बात क्यों कही? जाहिर सी बात है कि प्रदेश में सीबीआइ को पहले ही सरकार प्रतिबंधित कर चुकी है। आयकर को प्रतिबंधित करना भूल गई। बिहार चुनाव की फंडिग की उनकी रणनीति फेल हो गई है। सौम्या के ड्राइवर पन्नालाल की बातें और मिले दस्तावेज की जांच से संभावना है कि कुछ सनसनीखेज तथ्यों का खुलासा होगा।
हमले का मौका मिला
प्रदेश की 15 माह पुरानी सरकार पर भाजपा को हमला करने का मौका मिल गया। राज्य सभा सदस्य रामविचार नेताम ने कहा कि अफसरों के यहां आइटी के छापे सेे मुख्यमंत्री बदहवास क्यों हो गये हैं। क्या मुख्यमंत्री विधायकों की जगह अफसरों की मदद से सरकार चला रहे हैं’’। वहीं दिल्ली में कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने कहा, केन्द्रीय एजेंसियां इतनी निष्पक्ष है तो अभिषेक सिंह की जांच क्यों नहीं करती। उनका नाम पनामा पेपर्स में आया था’’। इस पर डाॅ रमन सिंह ने कहा कि पनामा का मामला पांच साल पहले ही रफा दफा हो चुका है। सुप्रीम कोर्ट में पूरी कार्रवाई हुई है। स्पष्ट रूप से कहा गया है कि इसमें कोई लेने देन नहीं हुआ है। आरोप लगाने से कुछ नहीं होता। कांग्रेस हर स्तर पर इस मामले में जा चुकी है। प्रदेश सरकार के पास 68 विधायक हैं। आयकर के छापे से सरकार कैसे अस्थिर हो सकती है। सीआरपीएफ लेकर आइटी  छापा ने मारा। पुलिस और सीआरपीएफ में कोई अंतर नहीं है’’।
छापे पर वि.स. में हंगामा
भाजपा के शासन में भी आयकर छापा पड़ा था। आय से अधिक संपत्ति रखने के मामले में आइएएस बाबूलाल अग्रवाल भी फंसे थे। सरकार के बहुत करीबी कहे जाने वाले शराब कारोबारी पप्पू भाटिया के यहां भी आयकर छापा पड़ा था,जिसे तत्कालीन विपक्ष ने मुद्दा बनाया था। लेकिन रमन सरकार ने इसकी खिलाफत नहीं की थी। लोकसभा चुनाव से पहले कमलनाथ के सलाहकार आर के मिगलानी और उनके रिश्ते दारों के यहां आयकर छापे पड़े थे। तब भी केन्द्र और राज्य सरकार पर उंगली नहीं उठी थी। लेकिन छत्तीसगढ़ विधानसभा में दो फरवरी को आइटी के छापे पर जमकर हंगामा हुआ। विपक्षी विधायकों ने सरकार पर छापे में बाधा डालने का आरोप लगाते हुए स्थगन पर चर्चा की मांग की। भाजपा विधायक ननकीराम कंवर ने शासकीय कार्य में बाधा डालने वाले सभी मंत्रियों के खिलाफ केस किए जाने की मांग की। शून्यकाल में भाजपा विधायक शिवरतन शर्मा ने छापों के संबंध में स्थगन पर चर्चा कराने की मांग करते हुए कहा कि सरकार द्वारा छापों को रोकने की कोशिश की गई है। पुलिस ने आयकर अफसरों की 20 से ज्यादा गाड़ियों को जब्त की। जोगी कांग्रेस विधायक धर्मजीत सिंह ने कहा कि पहले भी सीआरपीएफ की मौजूदगी में कार्रवाई हुई है। किसी अफसर के यहां छापा पड़ने से सरकार कैसे अस्थिर हो सकती है। कैबिनेट रोक दिया गया। सीएम दिल्ली चले गए, कांग्रेस सड़क पर उतर गई। सरकार को प्रतिक्रया देने से पहले प्रतीक्षा करनी चाहिए थी। 
बहरहाल आइटी छापे को प्रदेश सरकार को अस्थिर करने की साजिश करार देना सार्थक राजनीति  नहीं है। ऐसी बातों से केन्द्र और राज्य सरकार के बीच टकराव की स्थिति निर्मित होती है,जो प्रदेश की जनता और विकास के लिए हितकर नहीं है। दोनों सरकारों को इससे बचना चाहिए’’।

Wednesday, January 22, 2020

लाभ की खेती पर सवाल

 
  
कृषि अर्थ व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं। क्यों कि प्रदेश में तीन लाख किसानों ने कृषि से मुख मोड़ लिया है। प्रदेश के डेढ़ लाख किसानों को उनके धान के समर्थन मूल्य का भुगतान अब तक नहीं हुआ है। दूसरी ओर केन्द्र सरकार का लक्ष्य है 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का। वहीं कमलनाथ सरकार ने बोनस दिया, तो केन्द्र सरकार 14 सौ करोड़ का गेहूं नहीं लेगी। सवाल यह है कि लाभ की खेती के लिए किसान कब तक  जुझें।






 0 रमेश कुमार ‘‘रिपु‘‘
                   लगातार पांच बार कृषि कर्मण अवार्ड जीतने के बाद भी मध्यप्रदेश के किसानों की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है। उनकी स्थिति मजदूरों से भी बदतर है। केन्द्र सरकार के अनुसार प्रदेश के किसानों की औसत आय 6210 रूपये महीना है। जाहिर सी बात है कि किसानों की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है। जबकि 2014 में प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य तय किया है। सरकारी आंकड़े के मुताबिक इसमें अभी तक मात्र 500 रूपये की बढ़ोतरी हुई है। यह राशि किसानों को प्रधानमंत्री सम्मान निधि के रूप में मिलती है। जाहिर सी बात है कि लोकलुभावन नारे से कृषि व्यवस्था मे सुधार संभव नहीं है। तत्काल सुधार की जरूरत है।
ए.के.एस यूनिर्वसिटी सतना की कृषि विज्ञान की छात्रा पल्लवी तिवारी कहती हैं,‘‘देश में लाभ की खेती के लिए पिछले कुछ सालों से किसान जूझ रहे हैं। लेकिन कृषि क्षेत्र में तत्काल सुधार की दिशा में कोई कदम नहीं उठाये जाने की वजह से 15 सालों में करीब तीन लाख किसानों ने खेती करना बंद कर दिया है। लगातार प्राकृतिक आपदा की वजह से फसल सूख गई या फिर अति बारिश में चैपट हो गई। इस वजह से किसान खेती से मुख मोड़ने लगा है। लघु किसान के पास कोई विकल्प नहीं होने की वजह से वो अब भी किसी तरह खेती कर रहा है,लेकिन बड़े किसान कोई और धंधा अपना लिये हैं। एस.एस स्वामीनाथम की अध्यक्षता वाले राष्ट्रीय किसान आयोग ने किसानों की स्थिति में सुधार के लिए कई नीतियां बनाई है और सुधार के लिए अपनी सिफारिशें भी की है। लेकिन उनकी सिफारिशें अभी तक लागू नहीं की गई है। कृषि नीतियां अभी भी केवल लोकलुभावन ही है। किसान लगातार कमजोर होते जा रहे हैं। राज्य सरकार उन्हें बोनस देना चाहती है,लेकिन केन्द्र सरकार बोनस दिये जाने पर गेहूं और धान लेने से मना कर रही है। कृषि अर्थव्यवस्था की ओर यदि ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले समय में अन्न के साथ बाजार और श्रम, दोनों पर संकट खड़ा हो सकता है‘‘।
सियासी मोहरा बने किसान
किसानी को लाभ का व्यवसाय बनाने के लिए सिर्फ किसान ही नहीं, बल्कि सरकार और कृषि से जुड़े लोग भी लगातार प्रयास कर रहे हैं। लेकिन जिस तरह से किसानों के धान और गेहूं के समर्थन मूल्य को लेकर राजनीति चल रही है, इससे सबसे ज्यादा प्रभावित किसान ही हो रहा है। किसान राजनीतिक मोहरा बनकर रह गया है। कांग्रेस सत्ता में आने के एक साल बाद भी 55 लाख किसानों को गेहंू का बोनस नहीं दे पाई। वहीं नये वित्तीय सत्र में सरकार को दूसरे रबी सीजन का भी बोनस देना पड़ेगा। कांगे्रस ने समर्थन मूल्य देने का वचन घोषणा पत्र में लिखा था। फरवरी में 160 रूपये बोनस देने की घोंषणा की थी। दो साल पहले केन्द्र सरकार ने गेहूं पर बोनस देने से इंकार कर दिया था। केन्द्र के इंकार के बाद राज्य सरकार ने अपने मद से बोनस राज्य में बांटा था। कई जिलों से किसानों की सूचियां अभी आई नहीं है। कृषि विभाग ने 1450 करोड़ रूपये बांटने का प्रस्ताव बनाया है,लेकिन अभी 900 करोड़ रूपये ही बांटने का निर्णय लिया है। वित्त मंत्री तरूण भनोत कहते हैं,‘‘ पिछली सरकार खजाना खाली करके गई है। केन्द्र सरकार भी आर्थिक मदद नहीं कर रही है। राज्य सरकार अपने स्तर पर बोनस देने की व्यवस्था करेगी’’।
सरकार की मंशा ठीक नहीं
पूर्व खनिज मंत्री एवं विधायक राजेन्द्र शुक्ला कहते हैं,‘‘प्रदेश सरकार दिग्विजय सिंह के शासन के समय की तरह कुव्यवस्था का शिकार हो गई है। प्रदेश सरकार ने किसानों को गेहूं और धान का बोनस देना बंद कर दिया है। गेहूं का 265 रूपये और धान का 200 रूपये। शिवराज सरकार के समय बोनस के  जरिये किसानों से गेहूं और धान खरीदा गया था, ताकि किसानों को कुछ लाभ हो सके। बिजली और खाद में भी उन्हें सब्सिडी दी जाती थी। लेकिन कांग्रेस सरकार की मंशा ठीक नहीं है। समर्थन मूल्य की राशि देने की स्थिति में नहीं है और बोनस देने की भी इच्छा शक्ति नहीं है। किसान लाभ की खेती के लिए न जूझे इसके लिए जरूरी है कि उन्हें जीरो ब्याज पर ऋण दिया जाये। समर्थन मूल्य के साथ प्रोत्साहन राशि भी दें, ताकि खेती से वो मुख न मोड़ें’’।
डेढ़ लाख किसानों का भुगतान रूका
प्रदेश में किसानों से दस लाख टन समर्थन मूल्य पर धान खरीदा गया है। किसानों को समर्थन मूल्य पर 1790 करोड़ रूपये दिया जाना है लेकिन, अभी तक केवल 94 करोड़ रूपये ही दिये गये हैं। यानी करीब डेढ़ लाख किसानों के 1686 करोड़ रूपये का भुगतान अभी नहीं हुआ है। ऐसे मे बाजार से खाद और किसानी से जुड़ी अन्य समान खरीदने में किसानांे के समक्ष आर्थिक दिक्कत है। खरीदी केन्द्रों में धान की ढुलाई अभी तक नहीं हुई है। मंडी से खरीदे गये धान जब गोदाम पहुेंचेंगे,उसके बाद किसानों को खरीदी पर्ची मिलेगी। इसके बाद ही उनके खाते में राशि आयेगी।
टकराव की स्थिति
केन्द्र सरकार ने किसानों की कई योजनाओं की राशि में कटौती कर दी है। इस वजह से राज्य सरकार और केन्द्र सरकार के बीच टकराव की स्थिति निर्मित हो गई है। कांग्रेस के वचन पत्र में किसानों को गेहूं का बोनस देना शामिल है। लेकिन केन्द्र सरकार ने दो टूक कह दिया है कि, यदि बोनस देंगे, तो गेहूं और धान नहीं लिया जायेगा। यानी 1400 करोड़ रूपये का गेहूं केन्द्र सरकार नहीं लेगी। सरकार के बोनस देने पर उस पर 2800 करोड़ रूपये का आर्थिक बोझ पड़ेगा। कृषि मंत्री सचिन यादव कहते हैं,‘‘ केन्द्र सरकार पक्षपात का रवैया अपना रखी है। किसानों के साथ अन्याय कर रही है,ऐसे में किसानों के लिए खेती लाभा का धंधा साबित नहीं हो सकती। प्रदेश में बारिश से करीब 58 लाख हेक्टेयर की फसल बर्बाद हुई। राज्य सरकार ने केन्द्र से 6700 करोड़ रूपये आपदा राहत की राशि मांगी लेकिन, केन्द्र सरकार ने मात्र एक हजार करोड़ रूपये ही दिये हैं। ऐसे में किसानो को उचित मुआवजा देने में दिक्कतें आ रही है। बावजूद इसके कांग्रेस सरकार किसानो के साथ अन्याय नहीं होने देगी।
भावांतर योजना का भंवर
प्रदेश के किसान बार बार राज्य सरकार पर दबाव डाल रहे हैं कि भावांतर योजना की राशि उन्हें दें। लेकिन केन्द्र सरकार इस योजना की एक हजार करोड़ रूपये अभी तक दी नहीं है। गौरतलब है कि शिवराज सरकार के समय भावांतर योजना मे ंकिसानों के नुकसान पर अतिरिक्त राशि केन्द्र सरकार ने दिया था। लेकिन पिछले एक साल से किसानों के भावांतर योजना का पैसा अटका पड़ा है। केन्द्र सरकार ने इस योजना में पैसा देने से मना कर दिया है। जबकि शिवराज सिंह चैहान कह रहे हैं यदि प्रदेश सरकार ने किसानों को भावांतर योजना का पैसा नहीं दिया तो ठीक नहीं होगा। पार्टी सड़कों से विधान सभा तक प्रदर्शन करेगी। दरअसल 2018 में चुनाव हुए, तो प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बन गई। लेकिन उससे पहले शिावराज सरकार भावांतर योजना की पूरी राशि नहीं बांटी थी। बकाया के लिए कृषि मंत्रालय को पत्र सरकार ने लिखा, पर वो मिलने से रहा। जाहिर सी बात है कि भावांतर योजना की राशि किसानों को मिलने से रही।
केन्द्र बाधा डाल रहाः राजमणि
राज्य सभा सदस्य राजमणि पटेल कहते हैं,‘‘ केन्द्र सरकार किसान विरोधी सरकार है। ऐसा मै इसलिए कह रहा हूं कि, वो नहीं चाहती है कि प्रदेश सरकार बोनस देकर किसानों से धान और गेहूं खरीदे।     केन्द्र सरकार नहीं चाहती कि प्रदेश का किसान खेती करे। प्राकृतिक आपदा पर हुए नुकसान पर मांगी गई राशि में भी भारी कटौती कर दी गई। केन्द्र सरकार की भूमिका प्रोत्साहन देने की नहीं है। वो हर योजनाओं में बाधा डालने का काम कर रही है। केन्द्र सरकार प्रदेश का पैसा देने में भेद भाव कर रही है। भावांतर योजना के एक हजार करोड़ रूपये अभी तक नहीं दिये हैं। पी.एम फसल बीमा की राशि भी अभी बकाया है। प्रदेश सरकार ने किसानों का ऋण माफ कर उन्हें खेती से जोड़ने की दिशा में कदम बढ़ाया है। ताकि किसान खेती न छोड़ें। कांग्रेस को खाली खजाना मिला है। इसे मोदी को समझना चाहिए।
पंाच लाख किसान बीमा से वंचित
प्रदेश के किसानों का हर स्तर पर खेती लाभ का धंधा साबित नहीं हो रही है। प्रधान मंत्री फसल  बीमा योजना के तहत 2018 में 35 लाख किसानों की फसल का बीमा हुआ था। लेकिन 2019 में केन्द्र सरकार ने बीमा की समय सीमा 15 अगस्त से घटाकर 31 जुलाई कर दी। इससे करीब पांच लाख किसान अपनी फसल का बीमा नहीं करा सके। फसल बीमा की प्रीमियम में राशि कम होने की वजह से क्लेम भी कम ही मिले। बारिश की वजह से प्रदेश के किसानों की फसल चैपट होने से बीमा की राशि आठ हजार रूपये प्रति हेक्टेयर का नुकसान हुआ। प्रदेश में करीब 58 लाख हेक्टेयर की फसल चैपट हुई। चैकाने वाली बात यह है कि क्लेम की राशि भी हर जिले में अलग अलग है। मसलन हरदा जिले में 2018 में 3500 रूपये प्रति हेक्टेयर था जो 2019 में घटा कर 26250 रूपये कर दिया गया। जाहिर सी बात है कि किसानों को प्रति हेक्टेयर 8750 रूपये प्रति हेक्टेयर कम मिला। इसी तरह अलीराजपुर में 8750, अनूपपुर में 4200,बालाघाट में 3500 रूपये,बड़वानी में 10000,बैतूल में 8150 रूपये और भोपाल में 8250 रूपये,बुरहानपुर में 10000 रूपये और आगरा-मालवा में प्रति हेक्टेयर 12000 रूपये का नुकसान किसानों को हुआ।
बोनस राशि में कटौती
प्रदेश में समर्थन मूल्य पर गेहूं की खरीदी सरकारी केंद्रों पर की जा रही है। लेकिन गेहूं खरीदी पर प्रति क्विंटल मिलने वाले बोनस के 160 रुपये की राशि बिल में नहीं जोड़े जाने से किसान नाराज हैं। इसलिए सरकारी खरीदी केंद्रों के बजाय मंडी और खुले बाजार में गेहूं ज्यादा बिक रहा है। गत वर्ष गेहूं का समर्थन मूल्य 1735 रुपए प्रति क्विंटल था। इस पर तत्कालीन राज्य सरकार ने 265 रुपए प्रति क्विंटल बोनस दिया था। इन दोनों राशियों को जोड़कर किसानों को 2000 प्रति क्विंटल की दर से एक साथ भुगतान किया गया था। इससे किसान खुश थे। लेकिन इस वर्ष गेहूं का समर्थन मूल्य 1840 रूपये प्रति क्विंटल तय किया गया है। लेकिन नई सरकार ने गेहूं पर बोनस की राशि 160 रुपये प्रति क्विंटल देने की घोषणा की,जो पिछले साल से 105 रुपए कम है। सीहौर जिले के 40 हजार 9 किसानों ने 4 लाख 1 हजार 714 मीट्रिक टन गेहूं समर्थन मूल्य पर बेचा था। जिले की 155 सोसायटियों पर गेहूं बेचने वाले इन किसानों को करीब 64 करोड़ 27 लाख 42 हजार 400 रुपए बोनस अभी तक नहीं मिला है।  
प्रदेश सरकार ने किसानों का ऋण माफ करके उनकी चहेती तो बनी, लेकिन बोनस और समर्थन मूल्य पर उनके गल्ले की कीमत नहीं मिलने से वे नाराज हैं। जाहिर सी बात है कि खेती लाभ का धंधा बने इसकी चुनौती कमलनाथ सरकार के समक्ष है।









    


 

Thursday, December 26, 2019

सत्ता की चाबी की चुनौती

     
नगरीय निकाय चुनाव में बड़ी भयावह हार भाजपा की नहीं रही है। जैसा कि विधान सभा के चुनाव में थी। और कांग्रेस की जीत भी कोई बड़ी जीत नहीं है। प्रदेश के 47 निकायों में सत्ता की चाबी निर्दलियों के हाथों में है। भाजपा और कांग्रेस के समक्ष सत्ता की चाबी को अपने पास रखने की चुनौती है।








0 रमेश कुमार ‘‘रिपु‘‘
            राजधानी रायपुर के नगर निगम में कांग्रेस और भाजपा दोनों के समक्ष चुनौती थी अपनी अपनी पार्टी का मेयर बनाने की। चुनावी परिणाम ने दोनों ही बड़ी पार्टियों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। इसलिए कि दोनों पार्टियों को बहुमत नहीं मिला। जनता ने सत्ता की चाबी निर्दलीय पार्षदों के हाथ में दे दी है। जाहिर सी बता है कि निर्दलीय पार्षदों की अहमियत बढ़ गई है। वहीं प्रदेश की राजधानी रायपुर में सरकार होने के बाद भी,कांग्रेस बहुमत के आंकड़े से दो सीट पीछे है। 34 कांग्रेस,29 भाजपा और 7 निर्दलीय पार्षद जीते हैं। रायपुर के सांसद सुनील सोनी और पूर्व मुख्यमंत्री डाॅ रमन सिंह का दावा है कि भाजपा का ही मेयर बनेगा। यदि ऐसा हो जाता है तो भूपेश सरकार की बड़ी हार होगी। जिसकी उम्मीद कम है। इस चुनाव में विपक्ष के अपने तीखे आरोप भी हैं। धन,बल और सत्ता का दुरूप्रयोग कांग्रेस ने किया है। बगैर आरोप के राजनीति नहीं चलती। सबसे बड़ा सवाल यह है कि धान के मामले पर जिस तरह भाजपा शहर से गांव तक धरना और प्रदर्शन की,उसका लाभ उसे उतना नहीं मिला। लेकिन वह कांग्रेस का पीछ करना नहीं छोड़ी। 47निकायों में सत्ता की चाबी निर्दलीय पार्षदों के हाथ में होने से एक बात साफ है कि जनता अभी कांग्रेस की पूरी तरह हुई नहीं है। धमतरी में तीन बागी पार्षद के कांग्रेस में शामिल हो जाने से कांग्रेस की लाज बच गई।
निर्दलीय बने किंगमेकर
नगरीय निकाय का चुनाव विपक्ष और सत्ता पक्ष की सियासी ताकत का एक तरीके से मूल्यांकन किया है,कहना गलत नहीं होगा। पंजा थोड़ा ऊपर है,कमल से। लेकिन कई स्थानों में कांग्रेस और भाजपा दोनों बराबर है। बलौदाबाजार के नगर पंचायत में दोनों दलों को 7-7 सीटें मिली है। नगर पंचायत साजा में 6-6 सीटें। नगर पंचायत गंडई,सहसपुर लोहारा,पिपरिया,दोरनपाल,नई लेदरी,बिल्हा नगर पंचायत,नगर पालिका तखतपुर और कटघोरा में भी दोनों दलों को 7-7 सीटें मिली है। जािहर सी बात है कि किसी भी दल के साथ निर्दलीय चले गये, तो अध्यक्ष उस पार्टी का बनेगा। पेंड्रा में स्थिति बड़ी अजीब है। कांगे्रस और भाजपा 4-4 सीट जीते हैं। लेकिन छजका 4 सीट जीती है। 3 निर्दलीय पार्षद भी है। यानी यहां छजका किंगमेकर की भूमिका में है। खरौद में भी भाजपा और कांग्रेस 5-5 सीटें जीती हैं। जबकि 5 सीटों पर निर्दलियों का कब्जा है।
अपने अपने दावे
निकाय चुनाव में पंजा थोड़ा सा ऊपर है। जबकि प्रदेश में उसकी सत्ता है, तो उसका जैसा जोर होना चाहिए था,वैसा नहीं दिखा। जैसा कि प्रदेश भाजपा अध्यक्ष विक्रम उसेंडी कहते हैं,‘‘ एक साल में भूपेश अलोकप्रिय हो गये’’। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष मोहन मरकाम कहते हैं,‘‘ सभी दस नगर निगम में कांग्रेस के मेयर बनेंगे। जहां संख्या कम है, वहां निर्दलीय हमारे साथ हैं। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कहा,‘‘ हमारे नौजवानों ने भाजपा के सूरमाओं को पछाड़ दिया है। रायपुर में हम हैट्रिक करने जा रहे हैं। तीसरी बार यहां के निगम में कांग्रेस का कब्जा होगा। दुर्ग में पिछले 20 सालों से हम बाहर थे। सबसे बड़ी जीत दुर्ग में हमें मिली है। धमतरी में लगातार भाजपा जीतती रही थी। जहां इस बार कांग्रेस को सफलता मिली। कांग्रेस कार्यकर्ताओं की मेहनत सरकार के कामकाज पर जनता ने भरोसा जताया। राजनांदगांव एवं कवर्धा में कांग्रेस ने बाजी मारी। नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक के क्षेत्र में कांग्रेस को सफलता मिली। पिछली बार 6 नगर निगमों में कांग्रेस के महापौर जीते थे, लेकिन वहां पार्षदों की संख्या के हिसाब से बहुमत नहीं था। इस समय हर तरफ हमारा बहुमत है।
 वहीं दूसरी ओर पूर्व मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह ने बैलेट पेपर से हुए चुनाव को कांग्रेस की साजिश बताया है। उन्होंने आरोप लगाया कि बैलेट पेपर से चुनाव कराकर कांग्रेस सरकार अपनी साजिश में सफल रही। मतगणना अधिकारी और कर्मचारियों पर राज्य सरकार का दबाव था। उन्होंने दावा किया कि आधे से अधिक निकायों में भाजपा के महापौर और अध्यक्ष चुने जाएंगे।
कोरबा में कांग्रेस हैरान
कोरबा के चुनाव परिणाम से कांग्रेस हैरान है। कोरबा में भाजपा को बड़ी लीड मिली। इस चुनावी परिणाम में सबसे चैकाने वाली बात रही कि जिले के प्रभारी मंत्री और विधायकों को अपने अपने क्षेत्र में करारी मात मिली। भाजपा की महासचिव सरोज पांडे भी अपने क्षेत्र में भाजपा को नहीं जीता पाईं। वहीं रायपुर में मेयर के प्रबल दावेदार संजय श्रीवास्तव को करारी मात मिली। भाजपा के प्रफुल्ल माहेश्वरी और भाजपा के जिला अध्यक्ष राजेन्द्र पांडे भी चुनाव हार गये। रायपुर में कांग्रेस का महापौर निर्दलीय के भरोसे ही बनने के आसार है। प्रदेश में कांग्रेस के 1283 पार्षद जीते और भाजपा के 1131 पार्षद। 103 नगर पंचायत में 48 में कांग्रेस और 40 में भाजपा विजयी रही। दस जगह बराबरी और पांच निर्दलीय जीते। 38 नगर पालिका में 18कांग्र्रेस और 17 में भाजपा का कब्जा और 3 में निर्दलियों का दबदबा है। 10नगर निगम में से 7 पर कांग्रेस विजयी रही और 2 में भाजपा और कांग्रेस बराबरी पर। बीजापुर नगर पालिका में कांग्रेस ने एक तरफा कब्जा किया। 15 वार्डो में 12 पर कांग्रेस और तीन पर भाजपा ने जीत दर्ज की।
मेयर की दौड़ मेें
राजधानी में मेयर की दौड़ में तीन नाम हैं। एजाज ढेबर,प्रमोद दुबे वर्तमान में मेयर हैं और ज्ञानेश शर्मा। तीनों उम्मीदवारों में किसे मेयर बनाना है यह मुख्यमंत्री भूपेश बघेल पर निर्भर करेगा। लेकिन माना जा रहा है कि ज्ञानेश शर्मा इसके पहले कांग्रेस मीडिया के प्रमुख का दायित्व निभा चुके हैं। इसलिए वे मुख्यमंत्री के अति करीब हैं। लेकिन जाति कार्ड चला तो एजाज ढेबर का नाम पहले आ सकता है। चूंकि प्रमोद दुब पिछली दफा मेयर रह चुके हैं। इस बार वे 1500 वोटों से जीते हैं जबकि एजाज ढेबर सबसे अधिक वोटों से चुनाव जीते हैं। एजाज ढेबर पर सहमति दस जनपथ के कहने पर रही बन सकती है। लेकिन यह माना जा रहा है कि प्रमोद दुबे को मुख्यमंत्री दोबारा मेयर नहीं बनाना चाहेंगे। ज्ञानेश शर्मा मेयर नहीं बनाये गये तो सभापति बनाये जा सकते हैं।
बहरहाल निकाय चुनाव में भी डाॅ रमन सिंह कमल नहीं खिला सके। जाहिर सी बात है कि भाजपा को पूरे चार साल जनता के बीच जाकर कड़ी मेहनत और अपनी छाप बनाने की ज्यादा मशक्कत करने की जरूरत है। जिला पंचायत के चुनाव तीन स्तरों पर होना है। यह चुनाव भी मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और डाॅ रमन सिंह के बीच प्रतिष्ठा का रहेगा।
मंत्री और विधायकों के क्षेत्र में कांग्रेस को मिली मात  फोटो-
निकाय चुनाव के परिणाम से कांग्रेस के मंत्री और विधायकों के काम काज और परफारमेंस पर सवाल उठ रहे हैं। जिन्हें स्थानीय स्तर पर चुनाव जिताने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी, वे पैदल भी साबित नहीं हुए। जबकि अपने विधान सभा क्षेत्र में बड़े अंतर से चुनाव जीते थे। बेमेतरा जिले के साजा विधानसभा क्षेत्र के देवकर नगर पंचायत में भाजपा को स्पष्ट बहुमत मिल गया है। 15 वार्डों के नगर पंचायत में 8 सीटों पर भाजपा, 6 पर कांग्रेस और 1 सीट पर निर्दलीय प्रत्याशी को जीत मिली हैण् आपको बता दें यह विधानसभा सीट मंत्री रविन्द्र चैबे की है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष मोहन मरकाम कोंडागांव नगर पालिका के चुनाव में उनके हिस्से करारी हार आई। कुल 21 वार्ड में भाजपा को 13 जबकि कांग्रेस 9 सीटों पर जीत मिली है।
विधानसभा अभनपुर. विधायक धनेन्द्र साहू का निर्वाचन क्षेत्र है। यहां कुल 15 वार्ड में भाजपा को 10, निर्दलीय को 4 और कांग्रेस को सिर्फ 1 सीट पर जीत सकी।
विधायक चंद्रदेव राय विधानसभा बिलाईगढ़. से है। यहाँ भी कांग्रेस को करारी शिकस्त मिली है। कुल15 वार्ड में भाजपा को 7 निर्दलीय को 5 जबकि कांग्रेस को सिर्फ 3 सीट मिली है।
विधानसभा अहिवारा के विधायक रुद्र गुरु अपने निर्वाचन क्षेत्र में कांग्रेस को हारने से नहीं बचा सके।   कुल 15 वार्ड में भाजपा को 10 कांग्रेस को 4 और निर्दलीय को 1 सीट पर जीत मिली है
विधानसभा डौंडीलोहारा विधायक अनिला भेड़िया का निर्वाचन क्षेत्र है। यहाँ कुल 15 वार्ड में निर्दललियों को 7 भाजपा को 5 और कांग्रेस को महज 3 सीटों पर जीत मिली है।
विधानसभा बेमेतरा,आशीष छाबड़ा का निर्वाचन क्षेत्र है। यहाँ लगातार दूसरी बार कांग्रेस की करारी हार हुई। कुल 21 वार्ड में भाजपा को 12 कांग्रेस को 8 और निर्दलीय 1 सीट पर काबिज हुआ।
विधानसभा महासमुंद के विधायक विनोद चंद्राकर अपने निर्वाचन क्षेत्र में कांग्रेस को हारने से नहीं बचा सके। कुल 30 वार्ड में भाजपा को 14 कांग्रेस को 8ए जोगी कांग्रेस को 2 और निर्दलियों को 5 और आप को 1 सीट पर जीत मिली है।
खल्हारी.बागबहार विधानसभा के विधायक द्वारिकाधीश यादव के निर्वाचन क्षेत्र कांग्रेसे को 4 सीट मिली।  कुल 15 वार्ड में भाजपा को 6 निर्दलियों को 5 सीटों पर जीत मिली है।
विधानसभा सरायपाली. किस्मत लाल नंद का निर्वाचन क्षेत्र में कांग्रेस की सर्वाधिक बुरी गति हुई। कुल 15 वार्ड में भाजपा को 9 और कांग्रेस को 3 और निर्दलियों को 3 सीटों पर जीत मिली है।
विधानसभा बसना. विधायक देवेन्द्र बहादुर का निर्वाचन क्षेत्र है। यहाँ कुल 15 वार्ड में 7 में निर्दलियों को 5 में कांग्रेस को और 3 में भाजपा को जीत मिली है।
विधानसभा राजिम के विधायक अमितेष शुक्ल अपने निर्वाचन क्षेत्र में कांग्रेस को हार से नहीं बचा सके। कुल 15 वार्ड में भाजपा को 6 कांग्रेस को 3 जेसीसीजे 1 और निर्दलियों को 5 सीटों पर जीत मिली
विधानसभा दंतेवाड़ा. की विधायक देवती कर्मा के निर्वाचन क्षेत्र में कुल 15 वार्ड में भाजपा को 8 निर्दलियों को 4 और कांग्रेस को सिर्फ 3 सीटों पर जीत मिली है।
विधानसभा बस्तर. विधायक लखेश्वर बघेल का निर्वाचन क्षेत्र है। यहाँ से भी कांग्रेस को करारी हार का सामना पड़ा है। कुल 15 वार्डों में निर्दलियों ने 10 कांग्रेस ने 4 और भाजपा ने सिर्फ 1 सीट पर जीत मिली।
विधानसभा अंतगाढ़. विधायक अनूप नाग का निर्वाचन क्षेत्र है। यहाँ भी कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा है। कुल 15 वार्डों में भाजपा को 7 कांग्रेस को 5 और निर्दलियों को 3 सीटों पर जीत मिली है।
विधानसभा नगरी.सिहावा लक्ष्मी धु्रव का निर्वाचन क्षेत्र है। यहाँ भी कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा है। कुल 15 वार्डों में भाजपा ने 9 कांग्रेस ने 6 सीटों पर जीत दर्ज की।
विधानसभा जशपुर. विधायक विनय भगत का निर्वाचन क्षेत्र है। यहाँ कांग्रेस की सबसे बड़ी हार हुई है। कुल 20 वार्ड में भाजपा को 16, निर्दलियों को 3 और सिर्फ 1 सीट पर कांग्रेस को जीत मिली है।
विधानसभा पत्थलगाँव. विधायक रामपुकार सिंह का निर्वाचन क्षेत्र है। यहाँ भी कांग्रेस हार गई। कुल 15 वार्ड में 9 में भाजपा को, 5 में कांग्रेस को 1 में निर्दलीय को विजय मिली।
विधानसभा गुंडरदेही के विधायक कुँवर निषाद अपने निर्वाचन क्षेत्र कांग्रेस को नहीं जीता सके। 15 वार्ड में भाजपा को 8, कांग्रेस को 6 और निर्दलीय को 1 सीट पर जीत मिली।
 

पानी में मौत








        
डेढ़ हजार की आबादी वाले छत्तीसगढ़ के रायपुर से दो सौ पैंतीस किलोमीटर दूर गरियाबंद जिले के देवभोग तहसील के सुपेबेड़ा गांव में पिछले पांच सालों से शहनाई नहीं बजी। क्यों कि इस गांव का पानी किडनी का दुश्मन है। सैकड़ों लोगों की जानें चली गई। पन्द्रह सालों तक बीजेपी की सरकार ने पीने का पानी मुहैया नहीं करा सकी और अब कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री को गांव वाले उनके किये वायदों को याद दिला रहे हैं।

0 रमेश कुमार ‘‘रिपु’’
                छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से दो सौ पैतीस किलोमीटर दूर गरियाबंद जिले के देवभोग तहसील के सुपेबेड़ा गांव में पानी में मौत बसती है। सुनकर हैरानी होती है। पानी में मौत कैसे बसती है? दरअसल आजादी के इतने बरसों के बाद भी न तो रमन की सरकार और न ही भूपेश की सरकार ने मीठा पानी उपलब्ध करा सकी। यहां के किसी भी बोर का पानी जीवन नहीं है। डेढ़ हजार आबादी वाले इस गांव के लोगों का कहना है कि करीब सवा सौ लोगों की मौत हो चुकी है। साढ़े तीन सौ लोगों के रक्त की रिपोर्ट पाॅजिटीव आने से राज्यपाल अनुसुइया उइके हैरत में हैं। उन्हें जब इसकी जानकारी दी तो उन्हांेने कहा,’’मै हतप्रभ हूं कि सवा सौ लोगों की पानी की वजह से किडनी फेल हो जाने से जानें जा चुकी है। खबर चैकानें वाली थी इसलिए वहां जाकर इस गांव के लोगों से मिली। सरकार सुपेबेड़ा गांव के प्रति काफी गंभीर है। वह यहां के मरीजों के लिए सब कुछ करने को तैयार है। इसके बाद भी मेरी जरूरत महसूस होती है तो उन्हें व्यक्तिगत मदद को तैयार हूं’’। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कहा,’’ राज्यपाल की चिंता वाजिब है। हम लोग भी चिंतित है। हम तो चाहते हैं कि उसके कारण का पता लगे।राज्यपाल सुपेबेड़ा की स्थिति देखने के बाद केन्द्र सरकार को भी कहें कि पता लगाये कि आखिर मौत की वजह क्या है’’?
सुपेबेड़ा पूरे छत्तीसगढ़ में मौत के गांव के नाम से जाना जाता है। यही वजह है कि किडनी की बीमारी के कारण एक दशक से हालात बेहद खराब हैं। पांच साल से यहां किसी भी घर में शहनाई नहीं बजी।   किडनी की बीमारी के डर से इस गांव में न कोई अपनी लड़की ब्याहना चाहता है और न ही यहां की लड़की को कोई बहू बनाकर अपने घर ले जाना चाहता है। हैरान करने वाली बात यह है कि किडनी की बीमारी की वजह से हर घर में एक महिला की मांग उजड़ चुकी है। खुशी छिन चुकी है। अपने परिवार के 17 सदस्य को किडनी की बीमारी से खो चुके त्रिलोचन सोनवानी ने बताया कि सरकार और स्वास्थ्य विभाग इसे राजनीतिक मुद्दा बनाकर वाहवाही लूटने में लगी है। चाहे पूर्व बीजेपी की सरकार हो या वर्तमान कांग्रेस की सरकार। त्रिलोचन सोनवानी पहले व्यक्ति हैं जो गांव के 12 व्यक्तियों को रायपुर के मैकाहारा अस्पताल में भर्ती करवाया। जिसमें सात लोगांे की मौत हो गई और पांच अपने गांव सुपेबेड़ा लौट आये। क्यों कि उन्हें मैकाहारा में दवाई खरीदने के लिए बाध्य किया जाता था और अस्पताल में खाना भी नहीं मिलता था।
मौत का गांव
सुपेबेड़ा आज मौत के गांव के नाम से जाना जाता है। यहां ऐसा कोई घर नहीं बचा जहां किडनी से मौत न हुई हो। महेन्द्र मिश्रा के पिता के पिता जलंधर मिश्रा की मौत किड़नी की बीमारी से  हो चुकी है। 65 वर्षीय दामोदर मसरा की डेढ़ साल पहले रक्त परीक्षण में 4.4 पाॅजिटिव पाया गया। इनके भाई चैवन सिंह पत्नी शैलेन्द्र दामोदर की मौत 2018 में हो चुकी है। जलंधर मसरा भी किडनी रोग से ग्रसित है। अंकुर राम आडिल किडनी की बीमारी से ग्रस्त है। इलाज कराने के चक्कर में उसकी आधी जमीन बिक गई। देव प्रकाश पुरैना किडनी रोग में अपने पिता मोहन लाल पुरैना को 2016 में खो चुके हैं। घर में विधवा मां और बहन है। रोजगार का कोई साधन नहीं है। सरकारी आंकड़े के मुताबिक अब तक 74 लोगों की मौत हो चुकी है। 
मशीनें हैं एक्सपर्ट नहीं 
डाॅ रमन सिंह के कार्यकाल में दो साल पहले डायलिसिस मशीन राजधानी से सुपेबेड़ा के लिए भेजा गया था लेकिन, मशीन चलाने के लिए एक्सपर्ट डॉक्टर नहीं होने की वजह से इसका फायदा किसी भी मरीज को नहीं मिला। जिन मरीजों को डायलिसिस की जरूरत है उन्हें राजधानी रायपुर के डीकेएस हॉस्पिटल और रामकृष्ण केयर भेजा जाता है। डाॅ रमन सिंह की सरकार ने इस गांव को इस समस्या से उबारने की दिशा में कोई ठोस पहल नहीं की। बल्कि अलेक्जेड्राइड की खदानें अपने करीबी उद्योगपतियों को देकर पानी में विषैलों तत्वों में इजाफा किया। किडनी पीड़ितों के इलाज के लिए जो भी व्यवस्था की बात की वो सारे बेबुनियादी है। स्वास्थ्य व्यवस्था के नाम पर जो डायलिसिस मशीन भेजी गई, वो आज तक चालू नहीं हुई। दो बोर कराये गये लेकिन, उसका भी पानी संक्रमित है।
निशाने पर थी रमन सरकार
तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल 18 जून 2018 में किडनी की बीमारी से प्रभावित गांव सुपेबेड़ा का दौरा किया था। उन्होंने पीड़ित परिवारों से मुलाकात की और गांव के हालातों का जायजा लिया। सुपेबेडा के हालातों के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा था,’’ रमन सिंह विकास यात्रा छोड़कर सुपेबेडा आये और जो दूषित पानी यहां के लोग सालों से पी रहे है उसे पीकर दिखायें। सरकार सिर्फ वादे करती है पर कुछ करती नहीं है। सरकार ने लोगों को वादा तो बहुत किया लेकिन एक भी वादे पूरे नहीं कर सकी। फिर चाहे वो नदी से शुद्ध पेयजल मुहैया कराने का दावा हो या फिर गांव में ही मरीजों को डायलसिस की सुविधा उपलब्ध कराना हो। सरकार अपने किसी भी वादे को पूरा नहीं कर पायी है’’।
भूपेश वायदा भूले
हैरान करने वाली बात यह है कि तात्कालीन पीसीसी अध्यक्ष भूपेश बघेल ने चुनाव के वक्त इस गांव का दौरा करने के बाद एक एक घर से कहा था,’’ प्रदेश मंे कांग्रेस की सरकार बनी तो हर पीड़ित घर को दस लाख रूपये कर अनुदान और प्रभावित परिवार के प्रत्येक युवा को रोजगार दिया जायेगा’’। प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बने दस माह हो गये लेकिन मुख्यमंत्री बनने के बाद भूपेश अपना वायदा भूल गये हैं।
सरकार हरकत में आई
राज्यपाल अनसुइया उइके के सुपेबेडा गांव के दौरे के बाद सरकार हरकत में आई। स्वास्थ्य एंव पंचायत मंत्री टीएस सिंह देव ने यहां आकर बड़ी बड़ी घोषणा कर गये हैं। उन्होंने ग्रामीणों से हाथ जोड़कर इलाज के लिए रायपुर चलने कहा। अपना मोबाइल नंबर दिया और बोले अब शिकायत का अवसर नहीं मिलेगा। सुपेबेड़ा समेत आसपास के प्रभावित गांव मिस्टीगुड़ा, सेंधगुड़ा, खमारगुड़ा, खोकसरा, रेवापाली,सागौनबाड़ी,किरलीगुड़ा,फूलीगुड़ा,मोटापारा आदि सभी गांव की जिम्मेदारी हमारी है। उन्होंने कहा कि पूर्व सरकार में हुई चूक की मौजूदा सरकार पुनरावृत्ति नहीं करेगी। तीन माह के अंदर गांव से तीन किलोमीटर दूर तेल नदी से पाइप लाइन के जरिये गांव में पानी पहुंच जायेगा। जल्द अस्पताल खुल जायेगा। इसके अलावा विधवा महिलाओं के लिए कुटीर उद्योग खुल जायेगा। साथ ही बेरोजगार युवाओं को कौशल प्रशिक्षण देकर रोजगार उपलब्ध कराया जायेगा’’। उन्होंने माना कि यहां उच्च स्तरीय शोध की आवश्यकता है, जिससे बीमारी के कारणों का पता लग सकेगा। उसके बाद ही इसका समाधान निकाला जा सकता है। सरकार की इस घोषणा का क्रियान्वयन कितना होता है यह वक्त बतायेगा। गांव के अंकुर राम आंडिल कहते हैं,’’ भूपेश बघेल ने गांवों वालों से जो वायदा कर गये थे,उसका क्या होगा’’।
क्रिएटिनिन लेबल 4 से ऊपर
डाॅ आशीष सिन्हा के नेतृत्व में डॉ चंद्रकांत दीवान, नेफ्रोलॉजिस्ट मनीष पटेल समेत पांच चिकित्सकों की टीम ने सुपेबेड़ा के रिमूवल प्लांट का पानी और खाद्य सामग्रियों के जांच में पाया कि पानी में कैडिमयम व क्रोमियम जैसे हैवी मेटल भारी मात्रा में है। वहीं 400 रक्त नमूने लिए गए जिसमें 256 किडनी की बीमारी से पॉजिटिव पाए गए हैं। हैरानी वाली बात यह है कि लिये गये ब्लड नमूने में ज्यादातर में क्रिएटिनिन लेबल 4 से ऊपर पाया गया है। किडनी में डेढ़ प्रतिशत क्रिएटिनिन का बढ़ना सामान्य माना ताता है। इससे अधिक क्रिएटिनिन का होना खतरनाक माना जाता है। लेकिन यहां के लोेगों को 23 पांइट तक क्रिएटिनिन पाया गया। यहां के पानी में फ्लोराइड,आर्सेनिक,क्रोमियम,केडिनियम,इसके अलवा एथेन और मिथेन जैसे रासायनिक तत्व अधिक मात्रा में पाये गये हैं।
हैंण्ड पंप का पानी जानलेवा
डाॅ आशीष सिन्हा किडनी रोग से ग्रसित मरीज 62 वर्षीय पूरनधर पुरैना ने बातें की तो उसने चैकाने वाला खुलासा किया। पुरैना ने बताया कि जब तक गांव वाले नदी व कुएं का पानी पी रहे थे, तब तक किसी को कोई बीमारी नहीं थी। लेकिन सरकारी हैंडपम्प से पानी पीना शुरु किया उसके बाद से ही यहां किडनी की बीमारी फैली। पानी में फ्लोराइड, आयरन, आर्सेनिक,क्रोमियम,केडिनियम,और दूसरे भारी तत्वों की अधिकता की वजह से लगभग सभी कि हड्डियां कमजोर हो गई हैं। दांत पीले और कई लोगों के कमर झुक गई है। कई लोग सीधे खड़े नहीं हो सकते। 2005 से 2018 तक किडनी बीमारी से मरने वाले परिजनों को संसदीय सचिव स्वेच्छानुदान से 20 हजार और मुख्यमंत्री से 50,50 हजार की सहायता राशि दी गई। 
ग्रामीण मिलेंगे सीएम से
सुपेबेड़ा गांव की पहचान केवल छत्तीसग ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर एक किडनी प्रभावित गांव के रूप में रही है। गांव में अब तक किडनी की बीमारी से तत्कालीन सरकार ने ग्रामीणों की हर संभव मदद का दावा किया,लेकिन ग्रामीणों को इसका कोई लाभ नहीं मिला। कांग्रेस की सरकार बनते ही सुपेबेड़ा के लोगों में एक बार फिर बेहतर जीवन की उम्मीद जगी। भूपेश बघेल को उनका वादा याद दिलाने के लिए ग्रामीणों का एक प्रतिनिधिमंडल जल्द ही उनसे मिलने की तैयारी में है। छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस के सुप्रीमो अजीत जोगी ने कहा,’’ जब तक सुपेबेड़ा के दर्द का इलाज नहीं हो जाता राज्योत्सव नहीं मनाया जाना चाहिए।
बहरहाल मौत का गांव सुपेबेड़ा’’को इस नाम से निजात पाने में कितने दिन लगेंगे गांव वाले भी नहीं जानते। भूपेश सरकार इस गांव को जीवनदान देने की दिशा में क्या, क्या करती है,पूरे प्रदेश की नजर है।
  

सवालों के घेरे में सरकार






सत्ता पाने के लिए काग्रेस ने जनता से जो वादे किये थे,वो सत्ताई भंवर में उलझ कर रह गये हैं। सरकार अपने वायदे पर उम्मीद से कम खरी उतरी। डाॅ रमन सिंह कांग्रेस सरकार के एक बरस को बुरे सपने जैसा करार देते हैं। वहीं अजीत जोगी कहते हैं नरवा, गुरवा और बाड़ी में ही उलझी रही सरकार। सवाल यह है कि भूपेश सरकार नवा छत्तीसगढ़ गढ़ने में कितने कदम चली। 

0 रमेश कुमार’’रिपु’’
                 ‘‘नवा छत्तीसगढ़ गढ़बों’’। भूपेश सरकार का यह नारा आज भी प्रदेश के हर जिले में विज्ञापन के रूप में चश्पा है। एक साल में भूपेश सरकार कितने घर चली, विपक्ष सरकार से पूछ रहा है। क्या एक साल में भूपेश का कद बढ़ा या फिर कांग्रेस का, अथवा सरकार का। वैसे देखा जाये तो प्रदेश सरकार ने अपने एक बरस सुर्खियों की राजनीति में ही गंवाये। एक साल की सरकार ने प्रदेश की जनता को क्या दिया। उसके घोषणा पत्र के कितने वायदे पूरे हुए। कांग्रेस के नवा छत्तीसगढ़ गढ़बों के नारे का सच, कितना सच है,इसका सही मूल्यांकन जनता और विपक्ष करता है। वैसे विपक्ष का एक सूत्रीय काम होता है सरकार की खामियां ढूंढना। बावजूद इसके देखा जाये तो भूपेश सरकार पूर्व सरकार के ज्यादातर मामले की जांच के लिए एसआइटी का गठन करते एक बरस बिता दिये। आठ एसआईटी गठित की गई। हाई कोर्ट ने सात एसआईटी को न केवल रद्द किया बल्कि, जांच पर भी रोक लगा दी। सरकार सत्ता में आने के लिए किसानों से ढाई हजार रूपये प्रति क्ंिवटल की दर से धान खरीदने का वायदा किया था। लेकिन अब वह प्रदेश की 2048 केन्द्रों में 1815 और 1835 रुपए की दर पर धान 15 फरवरी तक खरीदेगी। इस साल 54 नए खरीदी केन्द्र बनाए गए हैं। जबकि 48 मंडियों एवं 76 उपमंडियों के प्रांगण का उपयोग भी खरीदी के लिए किया जाएगा। इस साल प्रदेश के 19 लाख 56 हजार किसानों ने धान बेचने के लिए अपना पंजीयन कराया है। जो कि पिछले साल की तुलना में दो लाख 58 हजार ज्यादा है। सरकार द्वारा घोषित 25 सौ रुपए मंेे से अंतर की राशि किसानों को अलग से दी जायेगी। लेकिन कैसे दी जायेगी,यह सरकार ने अभी तक नहीं बताया। अलबत्ता प्रदेश सरकार द्वारा किसानों को अंतर की राशि देने के लिए पांच मंत्रियों की कमेटी बनाई है। जो तेलंगाना की रइत बंधु और ओडिशा की कादिया पॉलिसी का अध्ययन करेगी। कमेटी आगामी बजट सत्र के पहले सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपेगी। सीएम भूपेश कहते हैं कि, किसानों को हर हाल में 25 सौ रुपए प्रति क्विंटल की दर से भुगतान किया जाएगा। सरकार ने शीतकालीन सत्र के अनुपूरक बजट में 205 करोड़ रुपए का प्रावधान किया है। जाहिर सी बात है यदि अंतर की राशि प्रदेश सरकार अपनी जेब से देती है, तो उसे 600 करोड़ रूपये का नुकसान होगा। 
किसानों का गुस्सा सड़कों पर
प्रदेश में किसानों से सरकार 1815 और 1835 रुपए की दर पर धान खरीदने का आदेश जारी किया तो विपक्ष ने हंगामा किया। किसानों ने सड़कों पर प्रदर्शन किया। कवर्धा में धान खरीदी शुरू होने के दूसरे हफ्तें विवाद बढ़ा। कवर्धा के किसानों ने सरकार की खिलाफ़त की और कहा पूरा धान खरीदने का वायदा करने के बाद, तय सीमा में धान लिया जा रहा है। बचा हुआ धान सरकारी सख्ती की वजह से किसान किसी और को भी नहीं बेच सकते। जिले के झिरौनी केंद्र में किसानों ने मुख्यमंत्री का पूतला फूंका। किसानों का कहना है कि सॉफ्टवेयर को ऐसे सेट कर दिया गया है कि, वह एक सीमा तक ही धान खरीदी की एंट्री कर रहा है। जबकि सरकार और इसके अधिकारी पूरा धान लेने  की बात कह रहे हैं। प्रदेश के आधे से अधिक धान खरीदी केन्द्रों में किसानों ने बहिष्कार किया। बावजूद इसके सरकार ने इस साल 85 लाख मीट्रिक टन धान खरीदी का लक्ष्य रखा है।
बुरे सपने जैसी सरकारः रमन
पूर्व मुख्यमंत्री डाॅ रमन सिंह कहते हैं,‘‘ पूरा एक वर्ष छत्तीसगढ़ के लिए एक बुरे सपने जैसा रहा है। गेड़ी चढ़ने,भौरा चलाने और सोंटा मारने से विकास नहीं होता। दरअसल हाल ही में लोक संस्कृति के त्योहार हरेली और गौरा,गौरी पूजन में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने गेड़ी चलाई थी और सोंटा (चाबुक) भी खुद को मरवाया था। इस सरकार की जो सबसे खतरनाक बात रही, वह ये कि जिन वर्गों को बड़े सपने दिखा कर सत्ता में आई,सबसे ज्यादा उन्हें ही परेशान किया। 2500 रुपया प्रति क्ंिवटल कीमत धान की किसानों को देने से सदन में मुकर गए। धान खरीदी केन्द्रों में अराजकता की स्थिति है। सरकार केवल एक कमेटी का गठन करके धान खरीदी को लेकर अपनी जिम्मेदारी से बचना चाहती है। किसानों का कर्जा माफ करने में फर्जीवाड़ा किया गया। जिस किसान ने कर्जा लिया ही नहीं था, उसे ऋण माफी का प्रमाण पत्र थमा दिया गया। राष्ट्रीयकृत व व्यवसायिक बैंकों से कर्ज लेने वाले किसानों का एक रुपया भी माफ नहीं किया गया। 
निर्भया जैसी स्थिति हर जिले में
डाॅ रमन सिंह ने कहा,सत्ता में आयी सरकार केवल बदला और तबादले को ही बदलाव समझ बैठी है। पुलिसिंग का हाल तो ऐसा बेहाल है कि दुष्कर्म और हत्या आदि की घटनाएं रुक ही नहीं रही हैं। खुद सरकार द्वारा दी गयी जानकारी के अनुसार साल भर में 80 हजार से अधिक अपराध छत्तीसगढ़ में दर्ज किये गए हैं। जबकि अभी भी यह साल बचा हुआ है। केवल रायपुर में रेप,हत्या की 80 से अधिक जघन्य वारदात हो चुकी हैं। डॉ रमन ने कहा कि छत्तीसगढ़ में किसी भी जिले में महिलायें, बच्चियां सुरक्षित नहीं हैं। आये दिन हो रहे अनाचार, हत्याए व छेड़छाड़ की घटनाओं से छत्तीसगढ़ की पहचान अब अपराध गढ़ के रूप में होने लगी है। राज्य के रायपुर संभाग में ही 448 रेप व 664 अपहरण के मामले दर्ज किये गये हैं। बिलासपुर संभाग में 891 रेप व 1377 अपहरण के मामले दर्ज किये गये हैं। कुल 27 जिलों में 7 महिने के भीतर ही 35954 अपराध के मामले दर्ज हैं। हर कोने से निर्भया जैसी वारदातें सामने आ रही हैं। इसी विधानसभा में हमने अपने विधायक भीमा मंडावी जी को खोया है। उनकी नृशंस हत्या की एनआई जांच रोकने के लिए एड़ी,चोटी का जोर लगा दिया था। आखिर किस बात की परदेदारी है। क्या छिपाना चाहते हैं ये। अब हाई कोर्ट ने एनआईए जांच का रास्ता साफ किया है। जांच होने दीजिये पता चलेगा। यही कांग्रेस अध्यक्ष रहते हुए झीरम का सबूत अपनी जेब में होने की बात करते थे, कहाँ है साक्ष्य, अभी तक एजेंसियों को दिया क्यों नहीं।
दिल्ली के वकीलों को पैसा लुटाया
प्रदेश भाजपा अध्यक्ष विक्रम उसेंडी कहते हैं,‘‘ पुलिस और प्रशासनिक मशीनरी को केवल बदलापुर की राजनीति के लिए झोंक दिया गया। विधानसभा में सवाल पूछने पर चैंकाने वाली जानकारी सामने आयी कि केवल कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम को ही 60 लाख रूपये की फीस दे दी गई ताकि, झूठा मामला बना कर हमें फंसाया जा सके। ऐसे आरोपियों पर प्रदेश की गाढ़ी कमाई लुटाना कहां का न्याय है। इसके अलावा भी दिल्ली के कांग्रेसी वकीलों पर करोड़ों लुटाये गए। अधिकांश मामलों पर कोर्ट में सरकार को मुंह की खानी पड़ी। प्रदेश सरकार ने नेशनल हेराल्ड को दिया 50 लाख का विज्ञापन। जो जनहित में नहीं है।
सरकार के पास विजन नहीं: जोगी
देखा जाये तो विपक्ष का हर नेता भूपेश सरकार की खिलाफत कर रहा है। उन्होंने कोई ऐसा काम नहीं किया है जिसे विपक्ष कहे कि यह काम ठीक था। छजका के सुप्रीमों अजीत जोगी कहते हैं, 15 साल बाद कांग्रेस सत्ता में आई लेकिन, पूरा एक साल हताशा एवं निराशा से भरा रहा। सरकार के पास कोई विजन नहीं है। इस सरकार ने एक साल नरवा, घुरवा, और बाड़ी में ही गुम रही। युवाओं को रोजगार, किसानों को परेशानी, महंगाई पर नियंत्रण, स्वास्थ्य शिक्षा समेत हर क्षेत्र में सरकार कुछ नहीं कर पाई। सरकार कहती है बिजली बिल आधा कर दिया गया है। भरपूर बिजली दी जा रही है। लेकिन लो वोल्टेज की परेशानी के चलते बालोद जिले के डौंडी विकास खंड के ग्राम पंचायत मथेना में 40 किसानों की 140 एकड़ फसल सूख गई। पुलिस कर्मियों को मिलने वाले नक्सल भत्ते को बंद कर दिया गया। यह फैसला दुर्भाग्यपूर्ण है। 
खत्म हो जायेगा नक्सलवादः भूपेश
मुख्यमंत्री भूपेश बघेल कहते हैं समीक्षा के नजरिये से एक साल की अवधि कम है। प्रदेश की जनता के साथ छल नहीं किया। रमन सरकार 20 लाख हेक्टेयर सिंचाई क्षमता की बात करते रहे, जबकि हमारी क्षमता 11 लाख हेक्टेयर की है। ग्रामीणों को रोजगार दे रहे हैं। ई टेंडर बंद कर दिया गया है। नक्सल समस्या में 50 फीसदी की कमी आई है। पूरी उम्मीद है कि पांच साल में नक्सल समस्या खत्म हो जायेगा। प्रदेश की जनता को 450 करोड़ की बिजली बांटी। धान खरीदी के लिए 21 हजार करोड़ खर्च किया गया है। नरवा, घुरवा और बाड़ी योजना के लिए 4000 करोड़ का फंड दिया गया है। गोठान सरकारी योजना नहीं है। इसका संचालन गांव वालों को ही करना है। हरेली,तीजा और पोरा जो इस प्रदेश का त्योहार है। छुट्टियां घोषित की। मंत्रिमंडल के काम काज की समीक्षा पार्टी हाई कमान और बड़े नेता कर रहे हैं। यह प्रक्रिया चलती रहेगी। हमारी देनदारी 50 हजार करोड़ की है। किसानों का कर्जा माफी,धान खरीदी,मानक बोरा संग्रहण दर बढ़ाया है। इस वजह से  सभी सेक्टरों में उछाल आया है। आदिवासियों की जमीन छीनी जाती रही है। उनको 4200 एकड़ जमीन वापस करने का काम पहली बार हुआ। स्वच्छता दीदी योजना के तहत मानदेय बढ़कर छह हजार किया। जमीन की गाइड लाइन दर में 30 फीसदी की कमी की गई। छोटे भूखंडों की के क्रय विक्रय से रोक हटाया गया। 1250 करोड़ की लागत के 28694 नवीन आवास स्वीकृत किये गये।
सरकार के समक्ष चुनौतियां
इससे इंकार नहीं है कि प्रदेश सरकार को स्थायी रूप से नक्सल समस्या मिली है। सरकार के पास देनदारी अधिक है। घाटे से उबारना और आय बढ़ाना है। 7.18 फीसदी ब्याज दर पर सरकार ने 2 हजार करोड़ का कर्ज लिया। केन्द्र सरकार ने किसानों को बोनस देने से इंकार कर दिया है। लेकिन कांग्रेस के घोंषणा पत्र में ऐसे कई वायदे हैं, जो उसके लिए चुनौती है। हर साल 2500 रूपये क्विंटल किसानों से धान खरीदना। प्रदेश के 40 लाख बेरोजगारों को बेरोजगारी भत्ता देना या फिर उनके लिए रोजगार की व्यवस्था करना। दस लाख बेरोजगारों को ढाई हजार रूपये बेरोजगारी भत्ता देने की बात कही थी। नरवा,घुरवा और बाड़ी योजना को जमीनी धरातल पर सफल करना। कुपोषण दूर करना। शराब बंदी के लिए गठित कमेटी की रिपोर्ट को लागू करना।शराब बंदी का वादा करके सत्ता में आई कांग्रेस अब 1 साल बाद भी शराब बंदी को लेकर कोई भी फैसला नहीं ले पाई। बल्कि दो घंटे और शराब दुकानें खोलने की सीमा बढ़ा दी गई। वहीं शराब से आय का लक्ष्य बढ़ा कर 4700 हजार करोड़ किया गया है। पूरे प्रदेश में ओवर रेट पर शराब बिक रही है उसके करीब 5420 मामले दर्ज किये गये हैं। स्काई वाॅक को तोड़ने की बात कही थी,कमेटी भी गठित की गई। लेकिन हुआ कुछ नहीं। पुलिस भर्ती बल .की परीक्षाओं का परिणाम लंबे समय से रोक कर रखा गया है। 61 हजार नौजवानों का भविष्य अंधकार में है। दो वर्ष की सेवाओं के उपरांत शिक्षाकर्मियों को नियमित करने का वादा भी झूठा साबित हुआ। सरकारी नौकरियों पर एक साल की रोक लगा दी गई। सरकार ने वादा किया था कि महिला स्व सहायता समूहों का कर्जा माफ किया जायेगा। इस वक्त 1 लाख से भी ज्यादा महिला स्व सहायता समूहों का लगभग 1100 करोड़ रुपया कर्जा है। सरकार ने एक फूटी कौड़ी माफ नहीं की। विधवा महिलाओं को 1 हजार रुपए पेंशन देने का वादा था, वो भी पूरा नहीं किया गया। पीड्ल्यूडी विभाग के माध्यम से होने वाले बड़े विकास के कार्य आज प्रदेश भर में रुके हुए हैं। रेल कारिडोर का पैसा रोक कर प्रदेश के विकास को बाधित किया गया है। स्मार्ट सिटी के सभी प्रोजेक्ट रुके। उच्च न्यायालय ने सरकार के कई फैसले को निरस्त किया,मसलन, सहकारी संस्थाओं को भंग करने का मामला हो, आरक्षण बढ़ाने का विषय हो प्रमोशन में आरक्षण देने का मामला हो, अनुसूचित जाति आयोग व महिला आयोग की सदस्यों की नियुक्ति का मामला हो, पूर्व मुख्य सचिव अमन सिंह के खिलाफ एसआईटी गठित करने का मामला हो। पाटन और कवर्धा के 700 किसान अब भी कर्जदार। सहकारी बैंक के सीइओ ने नोटिस दिया है। सरकार के कर्ज माफी घोषणा पर यह प्रश्न चिन्ह है। गन्ना किसान खेत में आग लगा रहे हैं। बंपर पैदावार के बाद भी शक्कर कारखाने में पर्ची नहीं मिलने से किसान परेशान हैं। जनता को लाभ पहुचाने वाली 22 तरह की योजनाओं पर सरकार ने रोक लगा दी।
 सियासी प्रतिशोध में बिताः कौशिक
नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक ने कहा,कांग्रेस सरकार के एक साल का कार्यकाल राजनीतिक प्रतिशोध का रहा है। प्रदेश सरकार के काम की शुरुआत पूर्व मुख्यमंत्री डॉण् रमन सिंह के खिलाफ बदलापुर से शुरू हुई और डॉ रमन सिंह के खिलाफ फिर दुर्भावनापूर्ण कार्रवाई के साथ एक साल इस सरकार ने पूरा किया है। पूरे साल भर प्रदेश के मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता मनगढ़ंत और झूठे आरोप लगाकर भाजपा के पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा सरकार के चरित्र हनन में ही लगे रहे। 
बहरहाल भूपेश सरकार ने एक साल में ढाई घर भले नहीं चली विपक्ष की नजरों में लेकिन अपनी छाप प्रदेश की जनता के बीच छोड़ी। इससे इंकार नहीं कि कांग्रेस सरकार को अपने घोषणा पत्र के कई कामों को अभी करना बाकी है। यदि उसे पूरा नहीं की तो सरकार के प्रति जनता में नाराजगी बढ़ सकती है।