Monday, January 18, 2021

नक्सलवाद के पंजे में छग की गर्दन

      












नक्सलियों ने छत्तीसगढ़ को गृहराज्य बना लिया है। बस्तर का अबूझमाड़ जंगल माओवादियों की राजधानी है। राज्य के 14 जिले नक्सल प्रभावित हैं,जबकि नक्सलियों की आवाजाही 18 जिलों में है। देश के तमाम नक्सली संगठन बस्तर के दंडकारण्य जोन को ही फालो करते हैं। माओवादी छत्तीसगढ़ को दंडकारण्य राज्य बनाने जन युद्ध कर रहे हैं,वहीं मुख्यमंत्री भूपेश बघेल कहते हैं,नक्सली जब तक हथियार नहीं छोड़ेंगे, उनसे बात नहीं करेंगे। सवाल यह है कि और कितने गणतंत्र के बाद छत्तीसगढ़ नक्सलवाद के पंजे से मुक्त होगा।
0 रमेश कुमार ‘‘रिपु’’
                ‘‘नक्सली संगठन आतंरिक सुरक्षा के लिए खतरनाक हैं।’’ पूर्व प्रधान मंत्री डाॅ मनमोहन सिंह ने माओवादियों की हिंसक घटनाओं के आधार पर यह कहा था। 2010 में दंतेवाड़ा में नक्सलियों ने घात लगाकर 76 जवानों की एक ही दिन में हत्या कर दी थी। इतने जवान एक दिन में कभी भी किसी युद्ध में शहीद नहीं हुए। बावजूद इसके मुख्यमंत्री भूपेश बघेल कहते हैं,‘‘नक्सली संविधान पर विश्वास करें और हथियार छोड़े तभी बात होगी।’’जाहिर सी बात है कि नक्सली हथियार नहीं छोड़ेंगे। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल शायद भूल गये हैं कि उनकी पार्टी के कांग्रेस नेता राजबब्बर ने चुनाव के पहले कांग्रेस भवन में 4 नवम्बर 2018 को कहा था,‘‘नक्सली क्रांतिकारी हैं। वे क्रांति करने निकले हैं। उन्हें कोई रोके नहीं।’’
क्या यह मान लिया जाए कि राजब्बर नक्सलियों का हौसला आफजाई करने आए थे। ताकि नक्सली, कांग्रेसी समर्थक हो जाएं? और बस्तर की सभी 12 सीटें कांग्रेस की झोली में आ जाए। ऐसा ही हुआ। स्व. महेन्द्र कर्मा की पत्नी और काग्रेस विधायक देवती कर्मा कहती हैं,‘‘नक्सलवाद को कोई भी पार्टी खत्म नहीं कर सकती। नक्सलवाद पहले भी था,आज है, और कल भी रहेगा। वे सवाल करती हैं कि झीरम कांड में कांग्रेस के कई बड़े नेताओं की नक्सलियों ने हत्या कर दी थी। झीरम कांड में कांग्रेस का वोट प्रतिशत बढ़ा, लेकिन सरकार बीजेपी की ही क्यों बनी?
देवती कर्मा और राजबब्बर की बातों से सवाल यह है कि,क्या नक्सलियों ने बीजेपी के खिलाफ वोट कराया? डाॅ रमन सिंह कहते थे, यदि हमारी पार्टी की सरकार बनी तो 2022 तक नक्सलवाद खत्म कर देंगे।’’तो क्या यह मान लिया जाए कि नक्सली डर गए थे। और वे राजबब्बर की बातों से खुश होकर मन से कांग्रेसी हो गए हैं। इसलिए राज्य में अब उपद्रव नहीं कर रहे हैं।
क्यों बढ़ गया नक्सलवाद
भूपेश सरकार दावा कर रही है कि राज्य में 45 फीसदी नक्सली वारदात में कमी आई है। जबकि बीजेपी की राज्य सभा सदस्य सरोज पांडेय कहती हैं,राज्य सरकार ने नक्सलियों के आगे घुटने टेक दिये हैं। जिसके दुष्परिणाम हम सभी को आने वाले समय मे भुगतने होंगे।’’वर्ष 2020 में 38 नक्सली मारे गये और 28 जवान शहीद हुए हैं। 2018-20 के दौरान पुलिस ने 216 नक्सलियों को मार गिराया वहीं 966 नक्सली सरेंडर किये। जाहिर सी बात है कि ऐसा आगे भी होता रहेगा। कांग्रेस के मीडिया प्रभारी शैलेष त्रिवेदी कहते हैं,‘‘डाॅ रमन सिंह ने माओवादियों के आगे घुटने टेकने का काम किया। तभी तो दक्षिण बस्तर के 3 ब्लाकों तक सीमित माओवाद, भाजपा सरकार के 15 साल के कार्यकाल में 14 जिलों तक फैला। भाजपा नेता रामविचार नेताम ने माओवादियों को 4 लाख रूपये चंदा देकर रसीद भी दी थी। सन् 2004 की विधानसभा की कार्यवाही में इस बात पर चर्चा भी हुयी थी। कांग्रेस ने जाँच की मांँग की जिसे अस्वीकृत कर रामविचार नेताम द्वारा माओवादियों को चंदा देने की मामले को रमन सरकार ने दबाया। छत्तीसगढ़ में नक्सली हिंसा में बढ़ोत्तरी के लिये भाजपा की गलत नीतियां  जिम्मेदार थीं।’’
एक सच यह भी
राजनीतिक सच अपनी जगह है। लेकिन एक सच्चाई यह है कि नक्सलियों ने छत्तीसगढ़ को गृहराज्य बना लिया है। बस्तर का अबूझमाड़ जंगल माओवादियों की राजधानी है। दंडकारण्य केन्द्रीय लड़ाई के लिए सेंटर है। राज्य के 14 जिले नक्सल प्रभावित हैं,जबकि नक्सलियों की आवाजाही 18 जिलों में है। देश के तमाम नक्सली संगठन बस्तर के दंडकारण्य जोन को ही फालो करते हैं। नक्सलियों के अंतरराष्ट्रीय संबंध हैं। अर्बन नक्सली उनकी मदद करते हैं। माओवादी छत्तीसगढ़ को दंडकारण्य राज्य बनानो जन युद्ध कर रहे हैं। बीस साल का छत्तीसगढ़ पूछता है,लाल सलाम का आतंक, कितने चुनाव के बाद खत्म होगा?
माओवादियों का विदेशी संबंध
आन्ध्र प्रदेश के नक्सली लीडर कोसा, कामरेड अतायु और गणेश का नक्सलवाद, बस्तर के अबूझमाड़ से लेकर देश के दस राज्यों में चार दशक से लाल लावा छितरा रहा है। केन्द्र सरकार की तरह विदेश कूटनीति के लिए नक्सली अंतरराष्ट्रीय समर्थन हासिल करने के लिए 21 सितंबर 2004 से दूसरे देशों के नक्सली संगठनों से लगातार बैठकें कर रहे हैं। सन् 2006 में माओवादियों के लीडर जर्मनी की कम्युनिष्ट पार्टी एमएलजीडी और नार्वे की एकेपी के नेताओं से मिलकर बैठकें की। इस बैठक का मकसद था, आधुनिक हथियार के साथ ही समर्थन जुटाना था। आधुनिक हथियार के जरिये, वो अब सीधे लड़ाई लड़ने लगे हैं। जैसा कि 3 मई 2018 को सुरक्षाबलों और माओवादियों के बीच हुई मुठभेड़ के बाद जर्मन हेक्लर और कोच एच.के जी .3 राइफल बरामद हुई। झारखं डमें चीनी रायफल मिली। जाहिर सी बात है कि नक्सली संगठन सरकार को अपनी ताकत की ताकीद कराने विदेशी हथियार बाहर से लाते हैं। 2010 में हुए दंतेवाड़ा का नरंसहार, से लेकर मार्च 2020 तक हुए नक्सली हमले इस बात का प्रमाण है कि अब बस्तर का लाल गलियारा केन्द्रीय लड़ाई में अपने आप को कमजोर नहीं मानता।
अफीम की खेती करते हैं
नक्सली संगठन शोषित,गरीब,आदिवासी और भूमिहीन किसानों के हक की लड़ाई की बात राजनीतिक दलों की तरह करते हैं। जबकि नक्सली संगठन का लेवी और उगाही करना एक मात्र लक्ष्य है। बस्तर में जितने भी उद्योग हैं,उनसे नक्सली पैसा लेते हैं। नौ सितंबर 2011 में बैलाडीला खदानों से लौह अयस्क ले रही बहुराष्ट्रीय कंपनी एस्सार अपनी सुरक्षा के लिए 15 लाख रूपये एक स्थानीय ठेकेदार बी.के. लाला को दो नक्सल समर्थकों को देते हुए पुलिस ने रंगे हाथों पकड़ा था। पुलिस का मानना है कि माओवादी छत्तीसगढ़ से एक हजार करोड़ रूपये से अधिक की राशि हर बरस उगाह कर आंध्र पहुंचाते हैं। नोटबंदी और कोरोना काल में उनकी उगाही का धंधा मंदा पड़ा है। दंतेवाड़ा के तत्कालीन आइ.जी एस.आर.पी. कल्लूरी ने 2010 में बीजापुर में नक्सलियों की अफीम की खेती पकड़ी थी। कल्लूरी कहते हैं, गांँजा और अफीम की खेती से भी नक्सली खासा धन जमा कर लेते हैं। खुफिया रिपोर्टों से खुलासा हुआ है कि नक्सल प्रभावित पाँंच राज्यों में नक्सली 1443 हेक्टेयर जमीन पर अफीम की खेती करते हैं। लेवी का आधा से अधिक हिस्सा मिलिट्री कमांड को जाता है। उससे हथियार खरीदे जाते हैं। सुरक्षा बलों का कहना है कि सन् 2007 में नक्सलियों ने 17.5 करोड़ रुपए खर्च कर एके.47 और राकेट लांचर खरीदे थे। इसी तरह दिसंबर 2008 में 200 ए.के.47 राइफलें खरीदीं। जाहिर सी बात है कि नक्सलियों के पास सुरक्षा बलों से लड़ने के सारे आधुनिक हथियार हैं। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल कहते हैं,छत्तीसगढ़ में ना ही ए. के. 47 बनती है और ना ही गोली के कारखाने हैं। अवैध हथियार कहाँ से और कैसे आते हैं, गृहमंत्रालय को पता करना चाहिए।’’
दण्डकारण्य राज्य की तैयारी
दंतेवाड़ा एस.पी अभिषेक पल्लव कहते हैं, बस्तर के नक्सलियों के संबंध चीन और नेपाल से हैं। वो वहांँ के नक्सली संगठन से मिलते हैं।’’दरअसल माओवादी दूर की सोच रखते हैं। वे जानते हैं कि दंडकारण्य राज्य या देश बनाने के लिए हमें विदेशी कूटनीतिक का सहारा लेना पड़ेगा। इसके लिए वे सन् 1996 में वर्कर्स पार्टी आॅफ बेल्जियम द्वारा आयोजित अंतरराष्ट्रीय परिसंवाद में हिस्सा लिए। इस परिसंवाद में 40 देशों के करीब 60 संगठनों ने हिस्सा लिया था। उस समय पीडब्लयूजी से जुड़े माओवादियों ने फिलीपीन्स के सीपीसी,जर्मनी के एमएलपीडी,पेरू के जीसीबी,तुर्की के टीकेपी,नार्वे के एकेपी के अतिरिक्त अन्य कई साम्यवादी संगठलों से संपर्क किया था। पिछले 20 वर्षो से नेपाली माओवादियों के साथ बैठकें कर रहे हैं। दंडकारण्य राज्य बनाने की तैयारी नक्सली जोर शोर से कर रहे हैं। उनकी मंशा है, पहले अपने प्रभाव वाले राज्यों में दण्डकाराण्य प्रदेश बनाने की। केन्द्र सरकार ने एमपी और छत्तीसगढ़ को पांँच-पाँच बटालियन दी है,नक्सलियों से लड़ने के लिए। आशंका है कि नक्सली गुरिल्ला युद्ध तेज कर सकते हैं। ओड़िसा में नक्सलियों की बैठक में तय किया गया है कि तमिलनाडु,कर्नाटक,गुजरात से लेकर केरल,नेपाल और बंगाल तक स्वतंत्र गलियारा बनाना। अपनी ताकत बढ़ाना। सामाजिक,जनजाति पृष्ठभूमि के लोगों को जोड़ना। वैसे भी नक्सली संगठनों ने अपना विस्तार उत्तर बिहार,पंजाब, हिमाचल, गुजरात प्रदेश तक कर चुके हैं। मध्यप्रदेश में बालाघाट से आगे बढ़ने की योजना है। इन दिनों दो सौ से ज्यादा नक्सली बालाघाट में हैं। कलकत्ता की बैठक में नेपाल से आन्ध्र तक रेड जोन बनाने का फैसला हो चुका है। यानी नक्सली आन्ध्र में एक बार फिर पैठ बनाना चाहते हैं।
संगठन में बौद्धिक महिलाएं
बस्तर में एक सैकड़ा स्थानीय गुरिल्ला दस्ता है। 70 सैन्य दल बेहद खतरनाक हैं। जिन्हें हर तरीके का प्रशिक्षण दिया गया है। नक्सली महिला दस्ते में पढ़ी लिखी महिलाओं की संख्या अधिक है। कू्ररता में ये पुरूषों से बीस हैं। झीरम कांड हो और ताड़मेटला कांड, इसका प्रमाण है। जहानाबाद जेल ब्रेक कांड करने में बस्तर की महिला नक्सलियों का हाथ था। गुरिल्ला सदस्यों की मुखिया सुजाता है,जो कि स्नातक है। पार्टी के पोलित ब्यूरो की सदस्य एम. कोटेश्वर राव की पत्नी है। बस्तर में करीब चार हजार महिलाएं गुरिल्ला की सदस्य हैं। पुलिस चैकियों की तरह अलग अलग इलाके में दलम सक्रिय हैं। दलम सैन्य कार्रवाई करते हैं। जबकि संघम जन अदालत लगाने और माओवादी एजेंडा को प्रचारित करने का काम करते हैं। इसके अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में जमीनी झगड़े,पारिवारिक विवाद,जातीय संघर्ष के अलावा वैवाहिक मुद्दों का भी निपटारा करने लगे हैं। इसके पीछे अपनी छवि को राबिन हुड की तरह पेश करना है। बस्तर में एक सैकड़ा के करीब इनामी नक्सली हैं। जिनमें एक से 20 लाख रूपये तक की इनामी महिला नक्सली भी हैं। पुलिस ने इनामी नक्सलियों के बड़े बड़े पोस्टर लगा रखे हैं। सूचित करने वालों को इनाम देने की घोषणा कर रखी है। बस्तर के बीजापुर में 17 स्कूल कई बरसों से बंद है। नक्सली इन स्कूलों में नक्सलवाद का पाठ पढ़ाते हैं।
तो छग नेपाल बन जाएगा
कभी किसी ने सोचा भी नहीं रहा होगा कि 40 हजार किलोमीटर में फैला अबूझमाढ़ माओवादियों का दण्डकारण्य बन जाएगा। सन् 1979 में सीतारमैया ने छह सदस्यों के एक दल को दंडकारण्य भेजा था। वो यहां 1990 तक रहे और दंडकारण्य को नक्सलियों को आधार क्षेत्र बनाया। सीतारमैया नक्सलियों के जत्थे को दंडकारण्य इसलिए भेजा था, ताकि ठीक से परख कर बताएं कि तेलंगाना में वारदात करने के बाद बस्तर का यह क्षेत्र आश्रय के लिए ठीक है कि नहीं। झारखंड का बूढ़ा पहाड़ जो छत्तीसगढ़,झारखंड ओर उत्तर प्रदेश की सीमाओं को छूता है। नक्सली तीनों राज्यों में आने जाने का जरिया इसी बूढ़ा पहाड़ को बना रखें है। अबूझमाढ़ नक्सलियों का मजबूत ठिकाना है और झारखंड के नक्सलियों के लिए बूढ़ा पहाड़ सुरक्षात्मक ठिकाना है। पुलिस चाहकर भी ना अबूझमाड़ में घुस पाती है और न ही बूढ़ा पहाड़ में हमला बोल सकती। बहरहाल आज माओवादियों ने छत्तीसगढ़ और झारखंड को अपना गृह राज्य बना लिया है। यह माना जा रहा है कि यदि कांग्रेस सरकार 2023 तक नक्सलवाद खत्म नहीं कर सकी, तो छत्तीसगढ़ को दूसरा नेपाल बनने से रोक पाना मुश्किल हो जाएगा।
 

Monday, January 4, 2021

धान के कटोरे में उबाल

   
'' किसान कृषि सुधारों से नाराज होकर राज्य में प्रदर्शन कर रहे हैं। वहीं बीजेपी को किसान महापंचायत स्थल की मिली अनुमति को रद्द किये जाने से  गुस्से में है। बीजेपी का मानना है कि किसानों को इन कानूनों में जो आपत्तियां दिख रही थी,बातचीज के बाद केन्द्र सरकार ने दूर करने की बात कही है। ऐसे में आंदोलन का कोई औचित्य नहीं है।  ''


0 रमेश कुमार ‘‘रिपु’’
छत्तीसगढ़ में केन्द्र की कृषि नीति पर अपनी अपनी स्टाइल में सियासत किये जाने से धान के कटोरे में  उबाल आ रहा है। केन्द्र के कृषि नीति में सुधारों से नाराज होकर राज्य के किसान प्रदर्शन कर रहे हैं। वहीं जिला कवर्धा में बीजेपी को किसान महापंचायत स्थल की मिली अनुमति को अचानक जिला प्रशासन ने रद्द कर देने पर पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डॉ रमन सिंह नाराज हो गए। जाहिर सी बात है कि बीजेपी प्रदेश में आगामी चुनाव को लेकर प्लान के तहत काम करना शुरू कर दिया है। बीजेपी के सूत्रों का कहना है कि पश्चिम बंगाल के चुनाव के बाद नरेन्द्र मोदी और अमित शाह छत्तीसगढ़ पर फोकस करेंगे। इसलिए कि चुनाव की फंडिग भी कांग्रेस को इसी राज्य से होती है। मध्यप्रदेश में चुनावी फंडिग की राशि को लेकर कमलनाथ,दिग्विजय सिंह सहित कई नेता फंस गए हंै। वही फंदा भूपेश सरकार पर पड़ने का अंदेशा है। डाॅ रमन सिंह को छत्तीगसढ़ की कांग्रेस सरकार को घेरने की खुली छूट दी गई है। साथ ही उनके नेतृत्व में एक कमेटी बनाई गई है। जिसमें राज्य सभा सदस्य सरोज पांडे, प्रदेश अध्यक्ष विष्णुदेव साय, नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक के अलावा राज्य के अन्य नेताओं को शामिल किया गया है। प्रदेश प्रभारी पुरेन्दश्वरी अगले साल तक क्या रणनीति बनायेंगी, अभी कुछ तय नहीं है। जिस तरह अजीत जोगी से सत्ता छीना गया था, वही रणनीति भूपेश सरकार के खिलाफ बनाने की योजना है। बहरहाल धान खरीदी के बहाने राज्य में ठनाठनी है।  
 लेकिन बीजेपी में गुटबाजी भी कम नहीं है। अभी तक दुर्ग शहर और ग्रामीण में अध्यक्ष की नियुक्ति नहीं हो पाई है।
किसान राजनीति गरमाई
प्रदेश के किसानों को बीजेपी किसान महापंचायत के जरिये समझाने में लगी है कि केन्द्र की कृषि नीति हित में है,वहीं कांग्रेस सहित अन्य राजनीतिक दल बिल के विरोध में प्रदर्शन कर रहे हैं। पूर्व मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह ने युगवार्ता से किसान आंदोलन को राजनीतिक साजिश बताया। किसानों को भ्रम में डालकर कुछ लोग आंदोलन चला रहे हैं। किसानों को इन कानूनों में जो आपत्तियां दिख रही थीं,बातचीत के बाद केंद्र सरकार ने दूर करने की बात कही है। ऐसे में आंदोलन का कोई औचित्य नहीं है। वहीं नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक ने कहा जिस कृषि बिल को लेकर यहांँ के किसानों को डराया जा रहा है,वह अभी छत्तीसगढ़ में लागू नहीं है। सवाल यह है कि पूरे छत्तीसगढ़ में किसान आत्महत्या क्यों कर रहे हैं?’’जाहिर सी बात है कि किसान आंदोलन के जरिये प्रदेश में राजनीतिक दलों के बीच सियासी तकरार के साथ एक दूसरे को घेरने की राजनीति हो रही है। किसान आंदोलन किस बिन्दु पर जाकर खत्म होगा,कोई तय नहीं है।  
किसान अर्बन इलाके के नहीं
पाठ्य पुस्तक निगम के अध्यक्ष शैलेश नितिन त्रिवेदी ने बृजमोहन अग्रवाल के बयान पर नाराजगी जाहिर करते हुए कहा, किसानों को अर्बन नक्सली कहने वाले खेती की इतनी समझ भी नहीं रखते हैं कि किसान अर्बन इलाकों में नहीं, गांवों में रहते हैं। राजीव गांधी न्याय योजना के तहत भूपेश सरकार धान खरीदी पर प्रति क्विंटल 2500 रुपए का भुगतान करती है। यह केंद्र की ओर से तय धान के समर्थन मूल्य 1868 और 1888 रुपए प्रति क्विंटल से ज्यादा है। किसान भाजपा के किसान विरोधी चाल चरित्र और चेहरा को पहचानते हैं। भाजपा की सरकार ने भी 7 साल में किसानों से किए वादे को पूरा नहीं किया बल्कि, किसान विरोधी तीन काले कानून लाकर किसानों को गुलामी की ओर ढकेलने की साजिश की है। आंदोलनकारी किसानों के समर्थन में छत्तीसगढ़ के किसानों का रायपुर के बूढ़ातालाब स्थित धरना स्थल पर क्रमिक अनशन जारी है। बहरहाल केन्द्र सरकार को चुनौती देने के लिए किसानों के साथ पूरा विपक्ष आकर लामबंद है। धान के कटोरे में असंतोष खदबदा रहा है।
किसानों की परेशानी  
एक तरफ कांग्रेस किसान नीति का विरोध कर रही है। वहीं भूपेश सरकार किसानों की समस्याओं पर ध्यान नहीं दे रही है। डायल 112 में केवल 36 घंटे में 408 शिकायत दर्ज हुई। सीएम भूपेश बघेल ने डायल112 पर किसानों की आने वाली शिकायतों को 24 घंटे में निदान करने के निर्देश दिए हैं। गिरदावरी या रकबे में कमी से लेकर किसी भी तरह की शिकायत का हल न्यूनतम समय पर वरिष्ठ अधिकारी निकालें और मॉनिटरिंग करने कहा गया है,ताकि किसी तरह की लापरवाही न हो सके। लेकिन निवारण की गति बहुत धीमी है।
रकबा ही कर दिया कम
अभनपुर सिवनी के किसान रितु कुमार ने शिकायत दर्ज करायी कि उन्होंने 25 हेक्टेयर में खेती की है,लेकिन मंडी में सिर्फ 19 हेक्टेयर खेती के हिसाब से धान की खरीदी की जा रही है। उनका रकबा कम कर देने से अपना बकाया धान कैस और कहां बेचें समस्या खड़ी हो गई है।  
खाते में नहीं बेच पा रहे धान
संकरी के किसान महेश कुमार ने अपनी शिकायत में कहा है कि मै अपने खाते में धान नहीं बेच पा रहा हॅू। मंडी में मौजूद अफसरों और स्टाफ ने मेरा धान खरीदने से ही मना कर दिया है। मेरा पूरा धान मंडी में ही रखा हुआ है।
जमीन नहीं की गई ऑनलाइन
धरसींवा के सोंदरा मंडी से एक किसान ने शिकायत दर्ज करायी है कि उनकी पथरीडीह में डेढ़ एकड़ जमीन है। लेकिन रिकार्ड में ही दर्ज नहीं किया गया है। इस वजह से उनकी जमीन का रिकार्ड ऑनलाइन नहीं दिखा रहा। इस वजह से उनके धान की खरीदी नहीं की जा रही है।
हर शिकायत का निदान करने के निर्देश
सीएम भूपेश बघेल ने डायल.112 पर जो भी शिकायतें आ रही हैं उसका 24 घंटे में निदान करने के निर्देश दिए हैं। इसके लिए ऐसी व्यवस्था बनाई गई हैए जिससे संबंधित व्यक्ति तक शिकायत पहुुुंचे और तत्काल उस दिक्कत को दूर किया जा सके। किसान 112 पर अपनी शिकायत बताएंगेए उनका कॉल स्टेट कंट्रोल रूम में भी कनेक्ट होगा। इस तरह गिरदावरी या रकबे में कमी से लेकर अन्य तरह की कोई भी शिकायत हो तो उसका न्यूनतम समय पर हल निकाला जा सकेगा। वरिष्ठ अधिकारियों को इसकी मॉनिटरिंग करने कहा गया हैए जिससे किसी तरह की लापरवाही न हो सके।
 









Friday, December 18, 2020

अपनी मर्जी का वजीरे आला

     







मुख्यमंत्री बतौर भूपेश बघेल ने अपने दो साल के कार्यकाल में नवा छत्तीसगढ़ गढ़ने ढेर सारी योजनाओं की घोंषणा की। अपनी मर्जी की राजनीति भी खूब की ।इन दिनों टी.एस सिंह देव और और मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के बीच बढ़ती खटास की की खबर सूर्खियांें में है। अचानक भूपेश बघेल ने इस्तीफा दे दूंगा कहकर उन बातों को हवा दे दियां कि पार्टी उन्हें अर्द्धविराम करने की तैयारी में है। चर्चा है कि पश्चिम बंगाल के चुनाव के बाद प्रदेश को नया मुख्यमंत्री मिल सकता है।  
0 रमेश कुमार ‘‘रिपु’’
                बतौर तीसरे मुख्यमंत्री 17 दिसम्बर 2018 को भूपेश बघेल ने जब कुर्सी संभाली, तो लोगों की जुबान पर एक सवाल तब भी था और आज भी है। टी.एस सिंहदेव ने मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ दी या फिर दोनों के बीच कोई सियासी समझौता हुआ है? सवाल को तवज्जो नहीं मिली। समय के साथ भूपेश बघेल प्रदेश कांग्रेस में और पार्टी हाईकमान मे अपनी पकड़ बनाते चले गये। वक्त के साथ भूपेश को यह एहसास होने लगा कि उनके राजनीतिक रास्ते में आगे चलकर टी.एस सिंहदेव कंटक बन सकते हैं,तो उनके मीडिया सलाहकारों ने सत्ता के दो धु्रव बना दिये। एक टी.एस सिंह देव और दूसरा भूपेश बघेल।
बेचैन करने वाली बात
कभी भूपेश बघेल और टी.एस सिंह देव प्रदेश में जय और वीरू की जोड़ी के नाम से प्रसिद्ध थे,लेकिन उसमें गांठ पर गांठ पड़ती गई। टी.एस सिंह देव से मुख्यमंत्री भूपेश बघेल धीरे धीरे दूरियांँ बनाने लगे और उनके अधिकारों में कटोती करने लगे। उन्हें सरकारी प्रवक्ता से हटा दिया। उनकी छवि धूमिल करने उनको सूचित किये बगैर स्वास्थ्य विभाग की भूपेश बघेल ने बैठक की। उनकी हर फाइलों पर नजर रखी जाने लगी। अब वे दूसरे नम्बर के मंत्री की हैसियत से बाहर हैं। उनकी जगह कृषि मंत्री रविन्द्र चैबे और वन मंत्री मोहम्मद अकबर ने ले ली। कांग्रेस के सीनियर लीडर की छवि को धूमिल करने की सारी कोशिशों के बीच टी एस सिंह देव मौन की राजनीति का रास्ता चुना। अपना ध्यान अपने विभाग पर फोकस किया। प्रदेश में ही हीं देश में नम्बर एक पर पंचायत और सांख्यिकी विभाग रहा। मनरेगा,पी.एम सड़क योजना,जीएसटी वसूली में छत्तीसगढ़ सबसे आगे रहा। कोरोना काल में हर जिले में सस्ती जांच की व्यवस्था की।
शिलान्यास की राजनीति
भूपेश बघेल प्रदेश में अपनी छवि को निखारने दूसरे साल ताबड़तोड़ लाखों करोड़ों रूपये की योजनाओं का, शिलान्यास की राजनीति को अहमियत दी। वहीं आयकर विभाग का छापा उनके निज सचिव के यहाँ पड़ने पर बड़ी भद्ध भी हुई। इस बीच टी एस सिंह देव और मुख्यमंत्री बघेल के बीच बढ़ती दूरियों से कांग्रेस की प्याली में टकराहट का ज्वार भी देखा गया। किसानो के खाते में साल के अंत तक राशि नहीं आने पर एक चैनल को इस्तीफा देने की बात कहकर सीधे सीधे उन्होंने सरकार को घेरा। कांग्रेस के घोषणा पत्र को पूरा नहीं किये जाने को लेकर भी स्वास्थ्य एवं पंचायत मंत्री टीएस सिंह देव ने सरकार पर ऊगली उठाने लगे तो मुख्यमंत्री ने उनके पर कतरना शुरू किया। जाहिर सी बात है कि दो साल तक मुख्यमंत्री ने अपनी छवि राष्ट्रीय नेता बनाने में लगाई,वहीं दूसरी ओर कांग्रेस को अपने हाथ में लेने के सारे जतन भी किये। प्रदेश प्रभारी पी एल पुनिया कहते हैं,‘‘ भूपेश सरकार का दो साल का कार्यकाल लाजवाब रहा। प्रदेश की जनता की आकांक्षाओं के अनुकूल,सरकार खरी उतरी।’’
बेचैन करने वाली बात
राजनीतिक हल्कों में यह चर्चा है कि भूपेश बघेल को प्रदेश कांग्रेस में अर्द्धविराम करने की तैयारी हाई कमान ने कर ली है। टी.एस सिंह देव और भूपेश के बीच ढाई-ढाई साल मुख्यमंत्री बने रहने का सियासी समझौता हुआ है। जाहिर सी बात है यदि छत्तीसगढ़ में यह फार्मूला लागू हुआ, तो राजस्थान में भी यही होगा। संसदीय सचिव विकास उपाध्याय कहते हैं,भूपेश बघेल कांग्रेस और प्रदेश में अपनी राजनीतिक बेल की जड़ें इतनी गहरी कर लिये हैं कि उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटाने के लिए हाई कमान के पास कोई वजह नहीं है।’’वहीं स्वास्थ्य पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री टीएस सिंहदेव ने कहा मुख्यमंत्री का कार्यकाल आलाकमान की इच्छा पर निर्भर करता है। मुख्यमंत्री दो दिन के भी हुए हैं और 15 साल के भी। यह सब आलाकमान तय करता है। पिछले दिनों कांग्रेस की महासचिव प्रियंका गांधी के साथ भूपेश की विशेष मुलाकात,चर्चा में थी। यह कयास लगाया गया कि उन्हें केन्द्र की राजनीति के लिए राष्ट्रीय महासचिव बनाया जा रहा है। गौरतलब है कि भूपेश बघेल केन्द्र सरकार पर लगातार हमला करते आए हैं। इससे वो सुर्खियों में हैं। केन्द्र की लगभग हर योजना पर मीन मेख निकाली। कृषि नीति को भी अपने राज्य में लागू नहीं करने, अलग से कानून बनाने कैबिनेट की बैठक की।
केन्द्र कर रहा है भेदभाव
मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने अपनी सरकार के दो वर्षों के कार्यकाल पर कहा कि देश का जीडीपी सिकुड़ गया है, जो कि बेहद चिंतनीय है। लेकिन छत्तीसगढ़ में मंदी का असर नहीं है। छत्तीसगढ़ एक मॉडल है। हम कोशिश कर रहे हैं कि छत्तीसगढ़ के जो उत्पाद हैं, उनके विक्रय की व्यवस्था की जा सके। बीजापुर, बिलासपुर, सूरजपुर जैसे तमाम क्षेत्रों में विकास कार्य हुए हैं। केंद्र सरकार हमें पैसे नहीं दे रही है। जीएसटी का 4000 करोड़ से अधिक की राशि हमें मिलनी थी। केंद्र सरकार भेदभाव कर रही है। सभी के हाथ में रोजगार हो यह कोशिश राज्य सरकार की है। मनरेगा में बेहतर कार्य हुआ है। वाटर रिचार्जिंग जैसे क्षेत्र में बेहतर कार्य किए जा रहे हैं। इस बार 2305 खरीदी केन्द्र बनाए गए हैं। इस बार सरकार ने 90 लाख मीट्रिक टन खरीदी का लक्ष्य रखा है। किसानों को पांच बार टोकन दिए जाएंगे। प्रदेश में 2017-18 में 56.85 लाख टन धान की खरीदी हुई थी। अब यह आंकड़ा 83.94 लाख टन तक पहुंच गया है। इस बार धान का रकबा 27 लाख 59 हजार 385 हेक्टेयर से अधिक है। किसानों की संख्या 12 लाख 6 हजार से बढ़कर 18 लाख 38 हजार हो गई है।
मोहन मरकाम हुए खफा
प्रदेश कांग्रेस की राजनीति में भले भूपेश बघेल अपनी पकड़ा बनाए हुए हैं लेकिन, मुख्यमंत्री बदले जाने की चर्चा के चलते प्रदेश अध्यक्ष मोहन मरकाम भी अपने सुर बदल दिये हैं। निगम मंडल की नियुक्ति में उनके अपने समर्थकों का नाम नही होने से मरकाम बैठक से नाराज होकर चले गए। यह माना जा रहा था कि मोहन मरकाम भूपेश के रबड़ स्टाम्प हैं। कांग्रेस में 30 आदिवासी विधायक हैं,जो कि मरकाम के साथ हैं। भूपेश बघेल ने परिस्थिति को देखकर कहा कि संगठन और पार्टी की रायशुमारी के बाद निगम मंडल में नियुक्ति की जाएगी।
सत्ता विभाजन फार्मूला साफ करें
चर्चा है कि हाईकमान के सामने हुए मौखिक समझौते के तहत पहले ढाई साल भूपेश बघेल मुख्यमंत्री रहेंगे,इसके बाद के ढाई साल टी.एस सिंहदेव। इन चर्चाओं पर नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक ने कहा, ‘‘कांग्रेस हाईकमान सत्ता विभाजन के इस फार्मूले को स्पष्ट करे। और बताए प्रदेश का अगला मुख्यमंत्री कौन रहेगा।’’
किसान अन्याय योजना
प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष विष्णुदेव साय ने राजीव गांधी किसान न्याय योजना को अन्याय योजना बताते हुए कहा, किसानों को आधे अधूरे भुगतान पर चिंता जताते हुए प्रेदश के वरिष्ठ मंत्री टीएस सिंह देव को उनकी चुनौती याद दिलायी है। स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंह देव ने कहा था किसानों को अंतर की राशि नहीं मिलेगी तो वे इस्तीफा दे देंगे। एक माह विलंब से धान खरीदी हो रही है। किसानों को गत वर्ष का बकाया अब तक नहीं मिला। मुख्यमंत्री बताएं क्या नयी खरीदी से पूर्व किसानों का पुराना भुगतान हो जाएगा। केंद्र सरकार ने नए कृषि कानूनों में किसानों को 72 घंटों के भीतर उनकी खरीदी गई उपज के एकमुश्त भुगतान का प्रावधान कर दिया है और ऐसा न होने पर यह आपराधिक कृत्य माना जाएगा।  
सफल रहे
भूपेश बघेल तेदूपत्ता का बोनस ढाई हजार से बढ़ाकर चार हजार रूपये किये।
 धान के समर्थन मूल्य की राशि ढाई हजार रूपये की। गोधन न्याय योजना के तहत दो रूपये किलो गोबर खरीद रही है सरकार।
नरूवा,गरूवा, घुरूवा और बाड़ी योजना से ग्राम सुराज का अलख जगाया। बिजली बिल में आधी छूट। मोर जमीन,मोर मकान, मुख्यमंत्री मितान योजना,पौनी पसारी योजना,हमर गांव,हमर योजना के तहत ग्राम पंचायत,जनपद पंचायत,जिला पंचायत को अच्छा काम करने पर पुरस्कृत करना।
 धरसा विकास योजना,पढ़ाई तंहर दुआर,पढ़ाई तुहर मोहल्ला,पचास रूपये में कोविड की जांच की सुविधा मुहैया की।
भूपेश चूके
किसानों को गत वर्ष का बकाया अब तक नहीं मिला।
सरकार बनते ही पूर्ण शराबबंदी का वायदा।
बेरोजगारों को चार हजार रूपये मासिक बेरोजगारी भत्ता नहीं दिया। अपराध पर नियंत्रण नहीं।
नक्सलवाद के खात्मे के लिए अब तक नीति नहीं बनी। कांग्रेस के घोषणा पत्र के वायदे अधूरे हैं।
धान कीएमएसपी ढाई हजार रूपये चार किश्तों में देकर सरकार बिचैलियों को लाभ पहुंचाना चाहती है। प्रदेश को कर्जदार बना दिया।
 
 

धान खरीदी पर टकराव

     










भूपेश सरकार ने केन्द्र सरकार से धान खरीदी का कोटा 24 लाख मीट्रिक टन से बढ़ाकर 32 लाख मीट्रिक टन करने पत्र लिखा। लेकिन केन्द्र सरकार ने खरीदी पर ही रोक लगा दी। इस बार 90 लाख मीट्रिक टन धान खरीदी का लक्ष्य है। राज्य में लगभग 38 लाख मीट्रिक टन धान की खपत है। इससे ऊपर खरीदी जाने वाली लगभग 49 लाख मीट्रिक टन धान का सरकार क्या करेगी। इसे लेकर चिंता बढ़ गई है।


 0 रमेश कुमार ‘‘रिपु’’
             धान का कटोरा कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ में धान खरीदी पर टकराव की आंधी के चलते प्रदेश की राजनीति के केन्द्र में किसान आ गए हैं। भूपेश सरकार की मंशा है सीधे केन्द्र सरकार को कटघरे में खड़ा करना। वह प्रदेश के किसानों का ध्यान अपनी ओर खींचने और उनकी नजरो में शुभ ंिचतक बनने के लिए यह बताने में लगे हैं कि उनकी सरकार ढाई हजार रूपये प्रति क्विंटल धान समर्थन मूल्य पर खरीदना चाहती है,लेकिन केन्द्र सरकार खरीदने से मना कर रही है। प्रदेश में करीब 80 प्रतिशत आबादी कृषि से जुड़ी है। और 43 प्रतिशत कृषि भूमि में धान की फसल  होती है। धान का रकबा 27 लाख 59 हजार 385 हेक्टेयर है। सन् 2018-19 80 लाख 40 हजार टन धान का उत्पादन हुआ था। 16 लाख पंजीकृत किसानों ने सोसायटी के माध्यम से अपना धान बेचा था। इस बार 19 लाख किसानों ने पंजीयन कराया है। 
भूपेश बघेल ने 2500 रुपये क्विंटल धान खरीदी को लेकर केन्द्र सरकार को तीन दफा पत्र लिखा।     केंद्रीय मंत्री से मिलकर राशि की मांग की किन्तु केंद्र ने कोई सकारात्मक जवाब नहीं दिया। इसके बावजूद छत्तीसगढ़ की भूपेश बघेल सरकार ने 2500 रुपये क्विंटल धान खरीदा। इस बार भी छत्तीसगढ़ की सरकार 2305 धान खरीदी केन्द्रों के माध्यम से 90 लाख मीट्रिक टन धान खरीदने जा रही है। केंद्र और राज्य के बीच किसानों के समर्थन मूल्य को लेकर अक्सर राजनीति होती रही है।
इंदिरा गांधी कृषि महाविद्यालय की एम.सी की छात्रा पल्लवी तिवारी कहती हैं,‘‘प्रदेश़ के किसानों को अपनी आर्थिक दशा सुधारनी है तो उन्हें अन्य लाभकारी फसलों की तरफ भी जाना होगा। मध्यप्रदेश की तरह सोयाबीन, सूरजमुखी, कपास आदि फसलें लेनी चाहिए। लेकिन सरकार फसल चक्र परिवर्तन करने का रिस्क नहीं लेना चाहती। सरकार किसानों को खुश रखने के लिए कर्ज लेकर बोनस देती है। यानी समर्थन मूल्य से अधिक पर धान खरीद सकती है किंतु उन्हें अन्य लाभकारी फसलों की खेती के लिए प्रोत्साहित नहीं करती।’’  
सी.एम.ने लिखा पत्र
सीएम भूपेश बघेल ने कहा,‘‘केंद्रीय खाद्य मंत्री पीयूष गोयल को पत्र लिखकर सेंट्रल पूल में एफसीआई के लिए 26 लाख टन उसना और 14 लाख टन अरवा चावल लेने की मांग की है। साथ ही 2020-21 में समर्थन मूल्य की खरीदे जा रहे धान की समय पर मिलिंग कराने कहा है। सीएम बघेल ने लिखा है कि एफसीआई द्वारा 2016-17 और उससे पहले उसना के अलावा अरवा चावल भी लिया जाता था। इसलिए एफसीआई द्वारा छत्तीसगढ़ की जरूरत से ज्यादा चावल उसना के साथ अरवा के रूप में भी लेना चाहिए।
कृषि मंत्री रविन्द्र चैबे ने कहा, डीसीपी योजना अंतर्गत लिए जाने वाले सभी धान का समय पर निराकरण किया जा सके। धान के रखरखाव में कोई क्षति न हो। राज्य में स्थापित 400 उसना राइस मिलों की मिलिंग क्षमता 5.68 लाख टन प्रतिमाह और 1504 अरवा मिलों की अरवा मिलिंग क्षमता 18.83 लाख टन प्रतिमाह है। इसे ध्यान में रखते हुए खरीफ वर्ष 2020-21 में एफसीआई में 26 लाख टन उसना चावल व 14 लाख टन अरवा चावल उपार्जन की अनुमति दी जाए।
गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ में खरीफ विपणन वर्ष 2020- 21 में समर्थन मूल्य पर लिए जाने वाले धान की कस्टम मिलिंग के बाद 60 लाख टन चावल लेने की कार्ययोजना का अनुमोदन केन्द्र सरकार ने किया है। इसमें एफसीआई में सेंट्रल पूल के अंतर्गत अनुमानित सरप्लस 40 लाख टन चावल उपार्जित किया जाएगा और शेष 20 लाख टन चावल राज्य में पीडीएस की आवश्यकता हेतु छत्तीसगढ़ स्टेट सिविल सप्लाइज कॉर्पोरेशन लिमिटेड में उपार्जित किया जाएगा।   
केंद्र सरकार ने कहा
वहीं धान खरीदी शुरू होने से पहले ही केन्द्र ने चिट्ठी लिखकर कहा है कि यदि राज्य सरकार इसी तरह किसानों को बोनस देगी तो वो धान नहीं खरीदेगी। इस पत्र ने सरकार की चिंता बढ़ा दी है क्योंकि राज्य में लगभग 38 लाख मीट्रिक टन धान की खपत होती है। इससे ऊपर खरीदी जाने वाली लगभग 49 लाख मीट्रिक टन धान का सरकार क्या करेगी। इसे लेकर चिंता बढ़ गई है। इससे अरवा और उसना मिलाककर लगभग 34 लाख मीट्रिक टन चावल बनेगा। अब अगर केन्द्र सरकार इसे नहीं लेगी तो फिर इस चावल का वह क्या करेगी। ये एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है।
राजनीति जोरों पर
धान खरीदी मामले पर कांग्रेस प्रवक्ता सुशील आनंद शुक्ला कहते हैं, केन्द्र सरकार धमका रही है, पत्र भेजकर कह रही है कि अगर बोनस दिया तो चावल नहीं खरीदेंगे। यह रवैया किसान विरोधी है। हमारी सरकार 2500 रुपए क्विंटल ही धान खरीदगी। वहीं बीजेपी सांसद सुनील सोनी का कहना है कि क्या कांग्रेस सरकार ने केंद्र से पूछकर अपना घोषणा पत्र तैयार किया था। केंद्र सरकार के पास केवल छत्तीसगढ़ नहीं बल्कि, और भी राज्यों की जिम्मेदारी है। नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक कहते हैं, सरकार को अपने घोषणा पत्र के मुताबिक धान खरीदने का इंतजाम करना चाहिए। बोनस देने का वायदा किया था, जिसे लागू करंे। अपनी जिम्मेदारी से बचने के लिए कांग्रेस सरकार केंद्र पर भेदभाव करने के आरोप लगा रही है।
धान बेचने वाले किसान बढ़े
साल 2018-19 में 15.71 लाख किसानों से 80.38 लाख मीट्रिक टन और साल 2019-20 में 18.38 लाख किसानों से 83.94 लाख मीट्रिक टन धान की बिक्री की थी। राज्य में दो सालों में पंजीकृत किसानों की तुलना में धान बेचने वाले किसानों में बढ़ोतरी हुई है। साल 2017-18 में 76.47 फीसदी किसानों ने धान बेचा था। वहीं 2018-19 में यह आंकड़ा 92.61 प्रतिशत और 2019-20 में 94.02 प्रतिशत पर पहुंचा था। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद वर्ष 2000 में पहली बार सरकार ने समर्थन मूल्य पर लगभग 4.63 लाख मीट्रिक धान खरीदा था। जबकि साल 2014 आते तक यह आंकड़ा लगभग 80 लाख मीट्रिक टन हो गया था। 2013 में हुए चुनाव में भाजपा ने अपने घोषणा.पत्र में 21 सौ रुपए प्रति क्विंटल की दर से धान खरीदी का वादा किया था।
आत्महत्या कर लिया किसान
कोंडागांव जिले के बड़ेराजपुर तहसील के मारंगपुरी निवासी किसान धनीराम ने फांसी लगा ली। उसके पास 6.70 एकड़ जमीन थी। इस हिसाब से 100 क्विंटल धान बेचने की तैयारी में था। पर सरकारी रिकॉर्ड में जमीन का रकबा घट जाने से केवल 11 क्विंटल धान बेचने का ही टोकन कटा। उस पर कोऑपरेटिव बैंक का 61932 रुपए कर्ज भी था। ग्रामीण किसान की आत्महत्या के पीछे मात्र 11 क्विंटल धान बेचने के टोकन को मुख्य कारण बता रहे हैं। धनीराम ने 2.713 हेक्टेयर भूमि पर धान बोया था लेकिन त्रुटिवश 0.320 हेक्टेयर में धान की प्रविष्ठि हो गई थी। इसके लिए पटवारी को निलंबित कर दिया गया है और तहसीलदार को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है।     
कांग्रेस दिल्ली में करेगी आंदोलन
केन्द्र ने दो टूक कह दिया है कि यदि भूपेश सरकार किसानों को बोनस देगी तो चावल नहीं खरीदेंगे। केन्द्र के इस निर्णय के बाद राज्य सरकार के सामने धान खरीदी को लेकर संकट पैदा हो गया। इस फैसले से नाराज कांग्रेस नेताओं ने केंद्र के खिलाफ दिल्ली में आंदोलन की रणनीति तैयार कर ली है। केन्द्र व राज्य संबंधों में किसान हित को लेकर टकराहट का सिलसिला पुराना है। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद केन्द्र में एनडीए की सरकार थी, तब अजीत जोगी ने पूरे मंत्रिमंडल के सहयोगियों के साथ 7 रेसकोर्स रोड पर धरना,प्रदर्शन किया था। इस बार भी छत्तीसगढ़ की सरकार 2305 धान खरीदी केन्द्रों के माध्यम से 90 लाख मीट्रिक टन धान खरीदने जा रही है। वहीं केन्द्र सरकार मात्र 8 प्रतिशत फसल ही समर्थन मूल्य पर खरीदती है।
धान का कटोरा कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ में चावल की 23 हजार से ज्यादा किस्में हैं। प्रदेश के कृषि विवि में इन किस्मों का जर्मप्लाज्म सुरक्षित रखा है। छत्तीसगढ़ में लगभग दर्जनभर ऐसी किस्में हैं जिनकी फसल ली जा रही है। इनमें मुख्य रूप से आईआर.54, आईआर.36, इंदिरा सोना, पूर्णिमा, समलेश्वरी, दंतेश्वरी नरेंद्र धान.97, एमटीयू.1010 शताब्दी और सहभागी धान प्रमुख हैं। इनमें लगभग सभी मोटे धान की श्रेणी में आते हैं।
पहले दिन यानी एक दिसम्बर को 30 हजार 446 किसानों ने धान बेचा। किसानों से 98 हजार 968 मीट्रिक धान खरीदी की गई है। बहरहाल चालू विपणन वर्ष में किसानों की संख्या और धान के रकबे में बढ़ोत्तरी को देखते हुए इस साल समर्थन मूल्य पर बीते वर्ष की तुलना में अधिक खरीदी का अनुमान है। वहीं अन्य राज्यों से दलाल प्रदेश में धान मंगा कर खपाने की जुगत में लगे हैं। मध्यप्रदेश और झारखंड से की कई गाड़ियां धान से लदी पकड़ी गई हैं।
 
 

लोन वर्राटू,फर्जी कांसेप्ट

   
बस्तर का दंतेवाड़ा और सुकमा जिला को पुलिस ने इनामी नक्सलियों का केन्द्र बना दिया है। जबकि दंतेवाड़ा की डेढ़ सौ पंचायतों में केवल बीस पंचायतें ही रेड जोन में है। भरमार बंदूक के साथ सरेंडर करने वाले नक्सली को भी पुलिस लाखों का इनामी बना देती है। नक्सली सभी वर्दी में होते में हैं। लेकिन दंतेवाडा में पांच सौ नक्सलियों के सरेंडर का लक्ष्य पूरा करने बनियान पहने ग्रामीणों को भी पुलिस नक्सली बता रही है। नक्सलवाद के इतिहास में लोन वर्राटू को फर्जी परिकल्पना कहा जा रहा है।


0 रमेश कुमार ‘‘रिपु’’
                   भूपेश सरकार ने नक्सलियों के आगे घुटने टेक दी है। नक्सलवाद पर इस सरकार ने राजनीति की है। जिसके दुष्परिणाम हम सभी को आने वाले समय मे भुगतने होंगे। राज्य सभा सदस्य सरोज पांडे के इस बयान के बाद देखा जा रहा है कि सरकार ने नक्सलियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए अपने घुटने सीधे क्या किये, बस्तर पुलिस ने दंतेवाड़ा जिला को इनामी नक्सलियों का ठिकाना बना दिया। इस जिले में डेढ़ सौ पंचायतें हैं। जिसमें केवल बीस पंचायतें ही रेड जोन में हैं। करीब 30 पंचायतें ग्रे एरिया कहलाती हैं। जहां सुरक्षाबल और माओवादी, दोनों ग्रामीणों के सम्पर्क में रहते हैं। बची हुई 100 पंचायतें ग्रीन क्षेत्र हैं, जहां राज्य पुलिस और प्रशासन का पूर्ण अधिकार है। लेकिन देखा जा रहा है कि बस्तर पुलिस ने इनामी नक्सलियों के सरेंडर की झड़ी लगा दी है। दंतेवाड़ा पुलिस को साल के अंत तक पांँच सौ नक्सलियों के सरेंडर का लक्ष्य दिया गया है। दंतेवाड़ा एस.पी अभिषेक पल्लव कहते हैं, हमने 1600 ग्रामीणों के नक्सली बनने की पहचान कर ली   है। इनमें करीब 200 सशस्त्र लड़ाके हैं। नक्सली बनने ग्रामीणों को लोन वर्राटू के जरिये सरेंडर करने की मुहिम को अंजाम दिया जा रहा है। लोन वर्राटू अभियान के तहत अब तक 56 ईनामी 208 नक्सलियों ने सरेंडर किया है।’’
इनामी नक्सली बनाने की कहानी
अपने ढाई साल के कार्यकाल में कल्लूरी नक्सलियों के आत्म समर्पण का रिकार्ड बनाए, लेकिन सरकार की समिति ने पाया कि केन्द्रीय गृहमंत्रालय के तय मानको के अनुसार केवल तीन फीसदी ही आत्मसमर्पण सही थे,बाकी सब फर्जी थे। नक्सलियों के सरेंडर की संख्या बढ़ाने की प्रक्रिया एक बार फिर देखी जा रही है।  इसलिए कि भरमार बंदूक जिसके पास है, वो एक लाख का इनामी नक्सली कैसे हो सकता है। भरमार बंदूक से चिड़िया तक नहीं मरती। दंतेवाड़ा एस.पी डॉ अभिषेक पल्लव ने बताया कि भांसी झिरका के जंगल मे सर्चिंग पर निकले जवानों के सामने भरमार के साथ माओवादी राजेन्द्र तेलाम जो कि डीएकेएमएस अध्यक्ष था ने सरेंडर किया। रेलवे संपति को नुकसान पहुंचाने, माओवादी विचारधारा का प्रचार करन,े नक्सलियों को राशन पहुंचान,े सहित अन्य काम करता था। इनामी नक्सली बनाने की कहानी बड़ी आसानी से पुलिस गढ़ने लगी है। जगदलपुर के पत्रकारों का कहना हैं, बस्तर आई जी. पी. सुन्दराज दूसरा कल्लूरी बनना चाहते हैं। यही वजह है कि लोन वर्राटू के फर्जी परिकल्पना की आड़ में भारी संख्या में ग्रामीणों को नक्सली बताकर सरेंडर कराने की मुहिम शुरू किया गया है।
कैसे कैसे इनामी नक्सली
तीन लाख का इनामी नक्सली सोमडू जो कि राइफल के साथ सरेंडर किया। पुलिस उसे दरभा डिविजन दलम सुरक्षा का प्लाटून सेक्शन डिप्टी कमांडर बता रही है। जबकि वह नक्सली नेता मंगतू के कहने पर बड़ेगुडरा के सुरेश से आठ लाख रूपये लेकर रायपुर आया था। एक अनजान व्यक्ति ने उसे एके 47 का कारतूस,वर्दी और स्टेशनरी दिया। सामान लेकर वह दंतेवाड़ा आ गया। मंगतू ने उसे रायपुर से सामान लाने को कहा था। मौका पाकर वह पुलिस के समक्ष सरेंडर कर दिया। सोमडू वेट्टी का कहना है वह ए.के.47 लेकर कुछ दिनों तक डिवीजन मेंबर चैतू विनोद देवा, जगदीश, जयलाल आदि की सुरक्षा में लगा रहा और मौका लगते ही समर्पण कर दिया। इसके अलावा एटेपाल निवासी व छोटेगुडरा पंचायत जनमिलिशिया सदस्य बामन उर्फ डेंगा यादव, नहाड़ी ककाड़ी पंचायत जनमिलिशिया सदस्य देवा मड़कम, डुवालीकरका चेतना नाट्य मंडली सदस्य लक्ष्मण और स्कूलपारा निवासी चेतना नाट्य मंडली सदस्य कुमारी मड़कम बोज्जो ने आत्मसमर्पण किया। पुलिस के अनुसार ये सभी सड़क काटने आईईडी प्लांट करने नक्सलियों की मीटिंग के लिए ग्रामीणों को बुलाने का काम करते थे।
गृह मंत्री की शिकायत
गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू कहते हैं केन्द्र सरकार छत्तीसग के साथ दोहरा बरताव करती है। नक्सलवाद की गंभीर समस्या छत्तीसगढ़ में है, बावजूद इसके पुलिस आधुनिकीकरण बजट में कटोती कर दी है।   2013-14 में प्रदेश का पुलिस आधुनिकीकरण बजट 56 करोड़ रुपए था, जो 2020-21 में 20 करोड़ रह गया है। वित्तीय वर्ष 2019-20 में भी हमने 20 करोड़ का प्रस्ताव दिया था,लेकिन राज्य को मिले मात्र 9.7 करोड़ रुपए। वहीं बिहार को 27.6 करोड़, ओडिशा को 15.6 करोड़ रूपये, उत्तर प्रदेश को 63.19 और महाराष्ट्र को 47 करोड़ रुपए दिए गए।  
गृह वापसी की अपील
बस्तर पुलिस लोन वर्राटू के जरिये हर जिले में गृह वापसी के तहत आत्म समर्पण की अपील कर रही है। नक्सल विरोधी अभियान का नेतृत्व कर रहे बस्तर रेंज के आईजी सुंदरराज पी ने कहते हैं लोन वर्राटू कार्यक्रम सरकार और पुलिस की एक विशेष अभियान है। जिसके तहत गुमराह होकर नक्सली बने ग्रामीण अपने घरों को वापस आएं और सरकार की मदद से नई जिंदगी शुरू कर सकें। लोन वर्राटू के तहत सरेंडर करने की नीति में यह नहीं है कि आत्मसमर्पित माओवादी रोजगार के लिए पुलिस में ही भर्ती हो,जैसा की पहले था। अब उनके लिए इच्छानुसार रोजगार की सुविधा दी जा रही है,बैंक लोन की व्यवस्था भी अन्य विभागों से मिलकर की गई है। लोन वर्राटू के शुरुआती परिणाम काफी पॉजिटिव हैं।’’दंतेवाड़ा एस.पी अभिषेक पल्लव कहते हैं,दंतेवाड़ा पहला जिला है,जहां 35-40 नक्सल प्रभावित जिलों में सर्वे कर नक्सलियों की पहचान की गई है। इस अभियान के तहत सरेंडर करने वाले नक्सलियों को पहले की तरह 10 हजार रुपए त्वरित राहत के रूप में दिया जाता है इसके बाद उनके रोजगार की व्यवस्था स्व सहायता समूह बनाकर की जाएगी।’’
फर्जी परिकल्पना
जानकारों का कहना है कि पुलिस चर्चा में बने रहने के लिए नक्सलवाद के खिलाफ फर्जी परिकल्पना लेकर आए दिन कोई न कोई अभियान शुरू करती है। लोन वर्राटू के जरिए नक्सलियों के नाम के पाम्पलेटस ग्राम पंचायतों में,सरकारी भवनों में और ग्रामीणों के घरों के बाहर की दीवारों में उनसे वापसी की अपील करते हुए चस्पा किये जा रहा हैं। इनामी नक्सलियों के फ्लेक्स लगाए गए हैं। इसके साथ ही सुरक्षा बलों की टीमें गांव में जाकर ग्रामीणों से भी आग्रह कर रहीं हैं कि, वे अपने साथियों को माओवाद की राह छोड़ मुख्य धारा से जुड़ने के लिए प्रेरित करें।
अभियान पारदर्शी और शांतिपूर्ण
बस्तर आई जी सुन्दरराज कहते हैं लोन वर्राटू अभियान पारदर्शी अभियान है। नक्सलियों के परिजनों के घरों में पाम्पलेट्स लगाकर उनसे पावती ली जाती है, ताकि इनामी नक्सलियों के खिलाफ कार्रवाई करने पर ग्रामीण विरोध न करें। अक्सर पुलिस पर नक्सलियों की आड़ में आम ग्रामीणों को मारने और अत्याचार के साथ बर्बरता का अरोप लगता है। ग्रामीणों को पहले से बता दिया जाता है कि, उनके यहां कौन कौन नक्सली हैं।‘‘ यह माना जा रहा है कि लोन वर्राटू को पायलट प्रोजेक्ट की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। यदि सफलता मिली तो इसे माओवादी प्रभावित अन्य जिलों मंे भी लागू किया जाएगा।  
सुर्खियों का मायाजाल
सुर्खियों में रहने के लिए पुलिस कभी गोंडवी भाषा में पोस्टर पाम्पलेट लगा कर ग्रमीणों से नक्सली बने लोगों को सरेंडर की अपील करती है। इस बार लोन वर्राटू का नाम दिया है। इसे सलवा जुड़ूम से अलग प्रचारित किया जा रहा है। सलवा जुड़ूम नक्सलियो के खिलाफ एक सशस्त्र लड़ाई थी। उसमें कोई योजना नहीं थी। नक्सलियों की विचारधारा को प्रसारित करने वाले उनके फ्रंटल संगठनों को कमजोर करने का कोई तोड़ नहीं था। जबकि लोन वर्राटू के तहत माओवादी विचारधारा को प्रोपोगेट करने वाले उनके फ्रंटल घटकों के खिलाफ कार्रवाई की जाती है। सरेंडर पॉलिसी के तहत नक्सलियों के लिए दी जाने वाली सुविधाओं की जानकारी ग्रामीणों को दी जाती है।
पुलिस का लोन वार्राटू अभियान में केवल निचले पायदान के नक्सलियों को ही सरेंडर करने की अपील की जा रही है। जबकि नक्सली लीडरों के लिए अभियान में कुछ भी नहीं है। जाहिर सी बात है कि आगे चलकर यह अभियान भी सफलता के झंडे नहीं गाढ़ सकता है। जब तक नक्सलियों के बड़े लीडरों को मुख्य धारा में शामिल करने की कोई योजना नहीं बनती लोन वार्राटू भी फर्जी परिकल्पना ही साबिता होगा। पुलिस अपनी पीठ थपथपाने के लिए पाँच सौ नक्सलियों ने सरेंडर किया,इसका रिकार्ड बना लेगी। पुलिस को कायदे से यह पता करने चाहिए कि ग्र्रामीण नक्सली बन क्यों रहे हैं। उसका समाधन क्या है। नक्सली लीडर सरेंडर कैसे करें,नक्सली छत्तीसगढ़ को गृह जिला क्यों बना रखें हैं।
 

 









सलीके से उठाए सवाल

          





समकालीन व्यंग्य के  एक  महत्वपूर्ण हस्ताक्षर  गिरीश पंकज अपने नए व्यंग्य संग्रह राजनीति का आईपीएल‘‘ के जरिये बड़े सलीके से सवाल उठाते हैं। उनके व्यंग्य के किरदार या फिर विषय समाज के अक्स हैं। इस  संग्रह में  छत्तीस व्यंग्य रचनाएं हैं। इनका हर व्यंग्य समाज के अंतर्विरोधों की बानगी है। यही वजह है कि वह सीधे दिमाग पर छा जाता है। कई सारे व्यंग्य कथानक शैली में होने की वजह सेए ऐसा लगता है कि कोई कहानी है। इनके व्यंग्य की खासियत यह है कि बोलचाल की भाषा में है। इसलिए पढ़ते वक्त पाठक को लगता है कि वो स्वयं एक किरदार है। यह लेखक की अपनी खूबी और शैली है। बोलचाल की भाषा में व्यंग्य के संस्कार हर आदमी में देखा गया है। और उसे पकड़ने की कला में माहिर हैंए गिरीश पंकज। जैसा कि संग्रह का पहला व्यंग्य ष्ष्कूकुर वाली माॅर्डन फेमिली। कुत्ते पालना आजकल फैशन है। स्टेटस सिंबल है। एक कुत्ते का नाम राॅकी दूसरे का डाॅगी। अपने को माॅर्डन बताने के लिए लोग अंग्रेजी प्रेमी होते जा रहे हैं। विदेशी नस्ल के कुत्तों को पालनेएघुमाने और उसके साथ घूमने वाली महिलाएं और माॅर्डन लड़कियों के चोचले पर लेखक ने करारा तंज कसा है। यह व्यंग्य सलीके से सवाल छोडता है कि कुकुर घुमाने के बहाने अंग प्रदर्शन करना ही क्या माॅर्डन होने की निशानी है। आधुनिकता के नाम पर पतन की बारीक रेखा तक भी व्यंग्यकार की दृष्टि जाती है।
उपवास का लजीज मीनूष् शीर्षक का व्यंग्य जनता के हितों के बहाने भूख हड़ताल पर बैठने वाले नेताओं का कच्चा चिट्ठा है। भूख हड़ताल पर बैठने वाले नेता अपनी भूख शांत करने के तरीके किस तरह निकाल लेते हैंए वह बताया गया है। यहांँ भी एक सवाल है किए जब नेताओं को अपनी भूख की चिंता पहले हैए तो वो भूख हड़ताल पर बैठने का नाटक क्यों करते हैं।बहुत बड्डे समाज सेवी रचना में व्यंग्यकार ने बताया कि समाज सेवा का नशा के नाम पर लोग क्या.क्या करते हैं। ऐसे समाज सेवी होते कौन हैं। शराब बेचने वाले सच्चे समाज सेवी, खुद को कहते हैं। और वो भी इन्हें सच्चे समाज सेवी बताते हैंए जिन्हें ये चंदा देते हैं। समाज में यत्र.तत्र. सर्वत्र फैले दोगले चरित्र को रेखांकित करती है यह रचना।
किताब का नाम राजनीति का आईपीएल है। जाहिर है कि ज्यादातर व्यंग्य रचना राजनीति से जुड़ी हुई हैं। राजनीतिक व्यक्तियों की छोटी.छोटी हरकतों को व्यंग्य रचना का विषय बनाया गया है। राजनीतिक जीवन में इतनी विसंगतियां पसरी हैं कि कोई भी व्यंग्यकार राजनीति पर व्यंग्य किए बगैर रह नहीं सकता। फिर चाहे परसाई हों या शरद जोशी। राजनीति पर व्यंग्य करने की एक लंबी परंपरा है, मगर त्रासदी यह है  कि सैकड़ों व्यंग्य लिखे जाने के बावजूद  राजनीति की दुम टेढ़ी की टेढ़ी है। हादसे में होने वाली मौत पर नेताओं के उदासीन या असंगत किस्म के बयानों  से, अकसर आम आदमी गुस्से से भर जाता है। उनकी हंँसी के क्या कहने‘‘ शीर्षक की रचना में सवाल है कि क्या नेताओं को आम आदमी की समस्याओं को हँस कर टालना चाहिए? राजनीति के मसखरे चरित्र पर यह व्यंग्य गंभीर विमर्श की गुंजाइश पैदा करता है।
स्वच्छता अभियान की आड़ में झाड़ू लगाना भी एक कला है। शीर्षक की रचना बताती है कि देश में नेता किस तरह झाड़ू लगा रहे हैं। यह एक ऐसा पाखंड है जो खुलेआम किया जा रहा है। यही कारण है कि जैसे.जैसे झाड़ू  लगती है वैसे.वैसे व गंदगी भी बढ़ती जाती है। फोटो खिंचाने के लिए झाड़ू लगाना और देश की अर्थव्यवस्था पर झाड़ू मारनाए वाकय में सबसे बड़ी कला है। सवाल यह है कि ऐसी कला आम आदमी कब सीखेगा। इस संग्रह में व्यंग्य के शीर्षक ही बता देते हैं कि वो किसकी बात करते हैं। व्यंग्य के शीर्षक ही पाठक को रचना पढ़ने पर बाध्य कर देते हैं। सभी व्यंग्य एक तरह से पाॅकेट.बम हैं, जो विसंगतियों को विस्फोट के साथ नष्ट करने की कोशिश करते हैं।
 जिस तरह क्रिकेट के आईपीएल में खिलाड़ी बिकते हैं,ठीक उसी तरह विधायक और सांसद की बोली आफ द रिकार्ड लगती है। लोकतंत्र का आईपीएल बरसो से चला आ रहा है। इसमें एक नेता कहता हैए हमें अभी कुछ वर्षो के लिए लीज पर लिया गया है। राजनीति में विधायकों को दूसरे दल के लोग लीज पर ही लेते हैं। यह रचना मध्यप्रदेश की राजनीति के पहले लिखी गई है। लेकिन इसे पढ़ने पर लगता है कि लेखक ने इसकी स्क्रिप्ट पहले ही लिख दी थी। सवाल यह है कि वोटर को खरीद कर नेता विधायक बनता है ऐसे में बाद में उसका बिकना क्या गलत है, लोकतंत्र के बाजार में बिकने वालों के अलग अलग रेट तय हैं। इसलिए राजनीति का आईपीएल कभी बंद नहीं होगा।
कुल मिलाकर इस संग्रह की तमाम  व्यंग्य रचनाएं अपने समय की अराजक घटनाओं का एक तरह से कोलाज ही है जिसे पढ़कर हम सत्य से वाकिफ तो होते हैं बेचैन भी होते हैं, मगर मूकदर्शक बनकर ही रह जाते हैं।  फिर भी व्यंग्य की सार्थकता यही है कि, वह पाठक को बेचैन तो करता है। यह बचैनी ही भविष्य के वैचारिक परिवर्तन का माध्यम बन सकती है।
▪ राजनीति का आईपीएल .- गिरीश पंकज
किताब गंज प्रकाशन, 195 रूपये
0 रमेश कुमार ‘‘रिपु’’
    
 

आस्तीन चढ़ाने की सियासत

       
केन्द्र की योजनाओं में खामियाँ बताकर प्रदेश में लागू नहीं करने के लिए भूपेश सरकार केन्द्र से भिड़ने के लिए हमेशा आस्तीन चढ़ाए रखने की सियासत को तरजीह देती आई है। जबकि केन्द्र सरकार टकराव के मूड में नहीं है। यही वजह है कि केन्द्र सरकार ने कई बार छत्तीसगढ़ सरकार को पुरस्कार से नवाजा भी।  


0 रमेश कुमार ‘‘रिपु’’
               छत्तीसगढ़ में भारी बहुमत की कांग्रेस सरकार होने की वजह से केन्द्र की ज्यादातर योजनाएं और नीतियों की खिलाफत भूपेश सरकार करते आई है। ऐसा करने के पीछे एक मात्र मकसद सुर्खियो ंमें रहना और जनता को यह बताना कि केन्द्र की योजनाएं प्रदेशवासियों के हित में नहीं है। जबकि केन्द्र सरकार ने भूपेश सरकार को कई बार पुरस्कारों से नवाजा भी है। हमेशा आस्तीन चढ़ाने की सियासत करने वाले मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने केंद्र सरकार के नए कृषि श्रम और उपभोक्ता कानूनों को छत्तीसगढ़ में लागू करने से इंकार कर दिया है। केंद्रीय कानूनों को रोकने के लिए राज्य सरकार नया कानून बनाएगी। कृषि मंत्री रविंद्र चैबे की अध्यक्षता में 13 अक्टूबर को हुई मंत्रिमंडलीय की बैठक में फैसला लिया कि राज्य के हितों की रक्षा के लिए संविधान के दायरे में रहकर विधि सम्मत कानून बनाया जाएगा। इसके लिए विधान सभा का विशेष सत्र भी बुलाया गया। मुख्य मंत्री भूपेश बघेल ने कहा,केंद्र के कानून से पूंजीपति ही कृषि उपज के मूल्यों को नियंत्रित करेंगे।’’ 
समर्थन मूल्य पर किसानों से धान खरीदी मामले में भी भूपेश सरकार तनातनी में थी। वह प्रति क्विंटल धान 2500 रूपये में खरीदने की बात अपने घोंषणा पत्र में कांग्रेस कही थी। केन्द्र सरकार ने कहा 1865 रूपये की दर से धान लेगी। भूपेश सरकार ने राजीव गांधी किसान न्याय योजना के माध्यम से किसानों को अंतर राशि दी। अब तक किसानों के खाते में 4500 करोड़ रुपए अंतर की राशि पहुंच चुकी है।
बरदाने पर विवाद
धान खरीदी में बरदाने के मामले को लेकर केन्द और राज्य सरकार आमने सामने हैं। कृषि मंत्री रविन्द्र चैबे ने कहा,चालू खरीफ वर्ष में राज्य में 20 लाख से अधिक किसानों से प्रति एकड़ 15 किवंटल धान की खरीदी करने 4 लाख 75 हजार गठान बोरा की आवश्यकता है। जिसकी पूर्ति के लिए राज्य सरकार ने 3 लाख 50 हजार गठान जुट कमिश्नर कोलकाता से मांगे थे। शेष 1 लाख 25 हजार गठान पुराना बोरा मिलर्स एवं पीडीएस का उपयोग करने की योजना बनाई गई। लेकिन केन्द्र सरकार ने गठानों की संख्या में कटौती कर 1 लाख 43 हजार गठान बोरा देने का आदेश 9 अक्टूबर 2020 को जारी किया है। यह छत्तीसगढ़ के किसानों के साथ अन्याय है।’’
धान खरीदी मामले में भी प्रदेश सरकार के आरोप  छजका के प्रदेश अध्यक्ष अमित जोगी ने कहा,एक तरफ मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल जी बिहार जाकर धान की लुआई हो जाने की बात स्वीकार करते हैं। जबकि प्रदेश में एक दिसंबर से धान खरीदा जाएगा। केन्ंद्र सरकार केंद्र कितना और किन शर्तों में धान खरीदेगा, निर्धारित नहीं हुआ है। हफ्ते में दो बार में दो हजार करोड़ रूपये कर्ज लेने वाली सरकार के पास किसानों से धान खरीदने के लिए फूटी कौड़ी नहंी है। कांग्रेस सरकार को 15 नवम्बर से ही किसानों की धान खरीदी करनी चाहिए ताकि किसान दिवाला नहीं दिवाली माना सके।
प्रदेश भाजपा अध्यक्ष विष्णु देव साय ने कहा कि कृषि मंत्री झूठ बोल रहे हैं। कांग्रेस शासित पंजाब में बारदाने की कोई शिकायत नहीं है। वहां रिकार्ड खरीदी हो रही है। राज्य की राशन दुकानों से अब तक सवा दो करोड़ बारदाने वापस नहीं बुलाए गए हैं। राज्य सरकार नहीं चाहती कि किसानों का पूरा धान खरीदा जाए। इसलिए बहाना बना रही है।
कृषि नीति के खिलाफ प्रदर्शन
मोदी सरकार के कृषि विरोधी कानूनों के खिलाफ प्रदेश में छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के बैनर तले 25 से ज्यादा संगठन एकजुट होकर प्रदेश भर में केन्द्र की कृषिनीति को किसान विरोधी बताया।   छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के संयोजक आलोक शुक्ला और छत्तीसगढ़ किसान सभा के प्रदेश अध्यक्ष संजय पराते ने कहा, समर्थन मूल्य पर सरकार यदि धान नहीं खरीदेगी, तो कालांतर में गरीबों को एक और दो रुपये की दर से चावल,गेहूं नहीं मिलेगा। सार्वजनिक वितरण प्रणाली पंगु हो जाएगी। इन कानूनों का असर सहकारिता के क्षेत्र की बर्बादी के रूप में भी नजर आएगा।
नई कृषि नीति किसानों की फसल को मंडियों से बाहर समर्थन मूल्य से कम कीमत पर खरीदने  व्यापार करने वाली कंपनियों व्यापारियों और उनके दलालों को छूट देती है। किसानों को विवाद की स्थिति में कोर्ट जाने के अधिकार पर रोक लगाती है। किसान नेताओं ने कहा कि कॉर्पोरेट गुलामी की ओर धकेलने वाले इन कृषि विरोधी कानूनों के खिलाफ देश के किसान तब तक संघर्ष करेंगे, जब तक इन्हें बदला नहीं जाता।’’
पीएम आवास योजना में रूचि नहीं
छत्तीसगढ़ सरकार केन्द्र की प्रधान मंत्री आवास योजना में भी कोई रूचि नहीं दिखा रही है। यही वजह है कि केन्द्र सरकार ने प्रदेश को राशि मुहैया नहीं कराई। प्रदेश सरकार ने 2018-19 और 2019-20 में प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत अपने हिस्से की राशि नहीं दी है। यह राशि 1554 करोड़ रुपए है।   पूर्व मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह ने भूपेश बघेल को पत्र लिखकर कहा कि कांग्रेस सरकार आते ही प्रधानमंत्री आवास योजना को ग्रहण लग गया है। राज्य के हिस्से की राशि जल्द से जल्द प्रदेश सरकार जारी करे और बजट में इसका प्रावधान करें ताकि गरीबों को प्रधान मंत्री आवास मिल सके।
 जल मिशन योजना का टेंडर रद्द
केन्द्र सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों को शुद्ध जल मुहैया कराने जल मिशन योजना शुरू की। बस्तर इलाके में अब भी लोग लाल पानी पीने को विवश हैं। राजनांदगांव जिले के कई गांँवों में आर्सेनिक जल है। केंद्र सरकार की मंशा है कि जल जीवन मिशन योजना के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्र के हर तबके को पेयजल मिले। हर घर में नल लग सके। लेकिन भूपेश सरकार ने इसमें भ्रष्टाचार हो रहा है कहकर जल मिशन के टेंडर को रद्द कर दिया। 13 हजार करोड़ रूपये के जल मिशन के टेंडर को रद्द किये जाने पर पीएचई ने हाई कोर्ट में कैविएट लगाकर इसका दोबारा टेंडर करने की तैयारी कर ली है। आरपी मंडल सीएस और अध्यक्ष जांच कमेटी का कहना है कि राज्य सरकार ने ठेके रद्द कर दिए हैं और मुख्यमंत्री के निर्देश पर इनकी जांच चल रही है। उससे पहले ठेके नहीं हो सकते हैं। मामले की पूरी जानकारी ली जा रही है।
हिस्से की लड़ाई हैः रमन
भूपेश सरकार का आरोप है कि इस योजना के तहत करीब 6 हजार करोड़ रुपए का ठेका राज्य की बाहर की कंपनियों को मैदानी इलाकों में दिया गया और छत्तीसगढ़ के स्थानीय ठेकेदारों को बस्तर और नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में छोटे मोटे ठेके दिए गए हैं।  गौरतलब है कि रीटेंडर उस समय किया जा रहा है जब 7 हजार करोड़ रुपए के विवादित टेंडरों की जांच मुख्य सचिव की कमेटी जांच कर रही है। जांच के आदेश मुख्यमंत्री ने दिये हैं,बगैर रिपोर्ट आए टेंडर रद्द करना अनुचित है। पूर्व मुख्यमंत्री डाॅ रमन सिंह कहते हैं, केन्द्र सरकार से मिली राशि 7 हजार करोड़ रूपये की बंदरबांट में लगी प्रदेश सरकार में हर कोई अपने हिस्से के लिए लड़ रहा है। इस योजना से प्रदेश के युवाओं को रोजगार भी मिलता। प्रदेश के बाहर की लगभग 44 कंपनियों को काम दिया जाना, इस बात का प्रमाण है कि प्रदेश सरकार कमीशनखोरी और बाहरी लोगों को लाभ पहुँचाने की सौदेबाजी कर रही है। इस पूरे मामले में कहीं कोई पारदर्शिता नहीं बरती गई।  
बहरहाल जल मिशन में भ्रष्टाचार हुआ है या नहीं यह तो रिपोर्ट आने पर ही पता चलेगा। इस बीच केंद्र सरकार इस मामले में शिकायतों की जाँंच के लिए दिल्ली से उच्चस्तरीय टीम भेजने की चिट्ठी राज्य शासन को दी गई है। माना जा रहा है कि इस टेंडर में कुछ शर्तें ऐसी जोड़ी गई हैं,टेंडर में वही ठेकेदार या फर्म शामिल हो सकेंगी, जो इसके पहले 10 करोड़ रुपए तक का काम कर चुकी हों। इससे पहले जाँच रिपोर्ट क्या आती है,उस पर सबकी नजर है।