Friday, September 22, 2023

एंकरों का बाॅयकाॅट,टी.आर.पी.को लगी वॉट

"क्या यह मान लिया जाए कि सन् 2014 के बाद से पत्रकारिता का चेहरा बदल गया है। उसे रतौंधी और दिनौधी हो गयी है। इसलिए इंडिया गठबंधन ने नफरती एंकरों की दुकान का बाॅयकाॅट करने फैसला किया है।इंडिया गठबंधन ने जिस मीडिया को गोदी मीडिया का नाम दे रखा है,क्या उसका अंत हो जाएगा। अगला लोकसभा का चुनाव गोदी मीडिया बनाम इंडिया मीडिया के बीच होगा।" - रमेश कुमार "रिपु" क्या पत्रकारिता के नए युग की शुरूआत होने वाली है। इसलिए इंडिया गठबंधन ने चौदह एंकरों का बाॅयकाॅट करने का फैसला किया है। इंडिया गठबधंधन के बैन करने से क्या देश की राजनीति की दिशा बदल जाएगी? या फिर इलेक्ट्रानिक मीडिया का स्वरूप। इंडिया गठबंधन ने जिस मीडिया को गोदी मीडिया का नाम दे रखा है,क्या उसका अंत हो जाएगा। अगला लोकसभा का चुनाव गोदी मीडिया बनाम इंडिया मीडिया के बीच होगा। ये सवाल नौ साल बाद उठ रहे हैं। जिन एंकरों के कार्यक्रमों में इंडिया गठबंधन ने अपने प्रवक्ताओं को नहीं जाने को कहा है,जाहिर सी बात है इससे न्यूज चैनलों की टीआरपी गिर जाएगी। इस समय जिन न्यूज एंकरों के शो को बाॅयकाॅट किया गया है वो एंकर भारी नाराज हैं। जैसा कि न्यूज एंकर रुबिका लियाकत ने इंडिया गठबंधन के बहिष्कार की लिस्ट में अपना नाम पर होने पर लिखा है, इसे बैन करना नहीं,डरना कहते हैं। बहिष्कार की वजह.. सवाल यह है कि दिल्ली में शरद पवार के घर पर हुई बैठक के बाद चौदह टी.वी.एंकरो की सूची क्यों बनी जिनके कार्यक्रम में इंडिया गठबंधन के नेताओ के नहीं जाने की बात कही गयी। इंडिया गठबंधन ने चौदह एंकरो का बाॅयकाॅट क्यों किया। जबकि मीडिया की ताकत से हर कोई परिचित है। ऐसा पहली बार हुआ है, जब एक राजनीतिक संगठन ने मीडिया के बाॅयकाॅट का फैसला किया है। एक कहावत है, किसी की राजनीति को मार देना है तो उसका नाम ही न लो। तो क्या यह मान लिया जाए कि टी.वी. शो में जब इंडिया गठबंधन का कोई प्रवक्ता नहीं होगा तो बीजेपी की चर्चा नहीं होगी। कोई सियासी बहस नहीं होगा। नतीजा शाम को जो सियासी बहस का बाजार टी.वी. में दिखता है वो बंद हो जाएगा। यानी चुनाव तक विपक्ष टी.वी.पर नहीं आएगा। इंडिया गठबंधन का ऐसा फैसला लेने के पीछे वजह साफ है। टी.वी डिबेट शो में एंकर बीजेपी प्रवक्ताओं को ज्यादा समय देते हैं। और पूरा समय मोदी सरकार की तारीफ करते हैं। हैरानी वाली बात है कि एंकर स्वयं बीजेपी का प्रवक्ता बन जाते हैं। सवाल कुछ होता है और बीजेपी प्रवक्ता जवाब कुछ देते हैं,लेकिन एंकर उन्हीं का पक्ष लेते है। चित्रा त्रिपाठी,अंजना ओम कश्यप और रूबिया लियाकत अक्सर ऐसा ही करती है। टी.वी.में सार्थक बहस की बजाए सम्प्रदायिक तनाव वाली बातें होती है। जैसा कि कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने कहा, हर शाम पाँच बचे कुछ चैनलों पर नफरत का बाजार सज जाता है। पिछले नौ साल से यही चल रहा है। अलग-अलग पार्टियों के कुछ प्रवक्ता इन बाजारों में जाते हैं। कुछ एक्सपर्ट जाते हैं। कुछ विश्लेषक जाते हैं। लेकिन सच तो ये है कि, हम सब वहां उस नफरत बाजार में ग्राहक के तौर पर जाते हैं। पत्रकारिता बदल गयी.. क्या यह मान लिया जाए कि सन् 2014 के बाद से पत्रकारिता का चेहरा बदल गया है। उसे रतौंधी और दिनौधी हो गयी है। इसलिए इंडिया गठबंधन ने नफरती एंकरों की दुकान का बाॅयकाॅट करने फैसला किया है। गौरतलब है कि 11 मार्च को सुधीर चौधरी के डीएनए प्रोग्राम में एक जिहाद चार्ट दिखाया गया था। जिसमें उन्होंने जिहाद के अलग-.अलग रूप बताए थे। हालाँकि इस शो के बाद सोशल मीडिया समेत कई जगहों पर इस कारण उन पर इस्लामिक कट्टरपंथियों और सेकुलरों ने निशाना साधा और उनके खिलाफ कार्रवाई की माँग की थी। उनके खिलाफ कर्नाटक में गंभीर धाराओं में मामला दर्ज हुआ। हाईकोर्ट ने कहा कि, पहली नजर में सुधीर के खिलाफ मामला बनता है। जांच में सही पाया गया तो कार्रवाई होगी। नया लोकतंत्र गढ़ा जा रहा.. मीडिया यदि फेक न्यूज के जरिए सत्ता पक्ष की छवि खराब करने की कोशिश करेगा तो उसे लोकतंत्र का निष्पक्ष पाया नहीं माना जा सकता। और यदि मीडिया किसी एक पार्टी के लिए काम करने लगेगा तो बात साफ है कि, वह किसी एक पार्टी को खत्म करने की सुपाड़ी ले रखा है। पूंजी का ऐसा खेल देश में पहली बार देखा जा रहा है। सवाल यह है कि चौदह एंकर ही क्यों,और क्यों नहीं? इंडिया गठबंधन का मानना है कि ये एंकर लोकतंत्र को खत्म करने का काम कर रहे हैं। इससे इंकार नहीं है कि, तमाम चैनलों के भीतर कारपोरेट का पैसा लगा हुआ है। सरकारी विज्ञापनों के लिए वो सरकार का पक्षधर हो गए हैं। एनडीडी टी.वी. अडानी का है और नेटवर्क 18 मुकेश अंबानी का। जाहिर सी बात है कि विपक्ष को मीडिया खत्म करने की जो रणनीति बनाई उसके जाल में फंसने से बचने इंडिया गठबंधन ने चुनाव से पहले एंकर के जरिए टी.वी.चैनल का बाॅयकाॅट किया है। वैसे चैनल के अपने दर्शक हैं। चैनल की अपनी साख है। स्वायता है। उसकी टी.आर.पी.है। उस पर नकेल कैसे लगाया जा सकता है। सत्ता के समानांतर एक लकीर खींचने के लिए इंडिया गठबंधन ने एंकरों के बाॅयकाॅट का फैसला किया। क्यों कि विपक्ष की बात चैनलों के जरिए जनता तक आ नहीं रही थी। इंडिया गठबंधन जनता को यह बताना चाहता है कि, एंकर सत्ता पक्ष के लिए लोकतंत्र गढ़ रहे है। चैनल यह मानते हैं कि वह केन्द्र सरकार के साथ रहेंगे तो उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई नहीं होगी। घपले- घोटाले सामने नहीं आएगा। चैनल वालों का अपना बिजेनेस माॅडल बदल गया है। 2014 के बाद सरकार ने मीडिया पर चार गुना पैसा खर्च करने लगी। इडिया टीवी 638 करोड़,न्यूज सेंशन 177 करोड़ रुपए,टीवी18, 7808 करोड़ रुपए एनडीटीवी का सालाना 140 करोड़ रुपए आय है। अब सरकार ने जिन राज्यों में गैर बीजेपी की सरकार है, वहां इन चैनलों के विज्ञापन में कटौती करने का फैसला किया है। हो सकता है, आने वाले समय में इंडिया गठबंधन और एंकरो की सूची जारी करे। बीजेपी का कहना है कि, इंडिया गठबंधन एक नया लोकतंत्र गढ़ रहा है पत्रकारिकता के मूल्यों का हनन.. आरोप है कि इन एंकरो के कार्यक्रम में केवल एंकर ही नहीं, कुछ ऐसे लोग बुलाए जाते हैं जो आरएसएस और बीजेपी का समर्थन करते हैं। विपक्ष की खिलाफत करते हैं। ये सिर्फ राजनीतिक पक्षपात की बात नहीं है, ये पत्रकारिता के मूल्यों के उल्लंघन की भी बात है। मीडिया जगत में यह माना जाता है कि, सन् 2014 के बाद पत्रकारिता के मूल्य बदल गए। किसी भी टी.वी एंकर ने अमितशाह, नरेन्द्र मोदी,योगी आदित्यनाथ या फिर राजनाथ से महंगाई,बेरोजगारी,देश की अर्थ व्यवस्था,अच्छे दिन कब आएंगे, मणिपुर और अदानी मुद्दे पर कोई सवाल नहीं किया। सुप्रिया श्रीनेत कहती हैं,सरकार के इशारों पर चलने वाले न्यूजरूम जो पीएमओ के चपरासी के वॉट्सऐप पर चलते हैं,उनके लिए मेरे मन में कोई सम्मान नहीं वो चरण चुंबन का काम करते हैं। इसलिए चरण चुंबक कहलाएंगे। इंडिया गठबंधन के इस फैसले पर बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कहा, न्यूज एंकरों की इस तरह लिस्ट जारी करना नाजियों के काम करने का तरीका है,जिसमें ये तय किया जाता है कि किसको निशाना बनाना है। अब भी इन पार्टियों के अंदर इमरजेंसी के समय की मानसिकता बनी हुई है।" शीर्ष अदालत ने कहा.. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की कार्य शैली कटघरे में है, तभी तो प्रधान न्यायाधीश डी.आई.चन्द्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि, पक्षपातपूर्ण रिपोर्टिग से लोगों को संदेह होता है कि आरोपी ने ही अपराध किया है। पीठ ने कहा कि मीडिया की रिपोर्टिग की आरोपी की नीजता का उल्लघंन कर सकती हैं। सुप्रीम कोर्ट ने गृह मंत्रालय से पुलिस के मीडिया ब्रीफिंग को लेकर गाइडलाइंस बनाने के लिए कहा है। जाहिर सी बात है कि शीर्ष अदालत भी मानती है कि,कहीं न कहीं मीडिया भी एक नया लोकतंत्र गढ़ है। जो देशहित में नहीं है।

सियासी हेंगर में लटका नारी शक्ति एक्ट

"मोदी सरकार नारी शक्ति वंदन विधयेक तैयारी करके लाती तो बीजेपी के लिए चुनावी मास्टर स्ट्रोक होता। अब यह विधेयक 2029 तक टल गया। जातिय जनगणना और परिसीमन बगैर महिला आरक्षण बिल केवल चुनावी जुमला है। वहीं रोहणी आयोग की रिपोर्ट से स्पष्ट है कि देश में सैकड़ों जातियों को आरक्षण का लाभ नहीं मिल रहा।"
रमेश कुमार रिपु .प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी सियासत के बाजीगर है। उन्हें पता है, सियासी बाजार में हलचल के लिए क्या करना चाहिए। और उन्होने वही किया। एक नया मुद्दा उछाल कर देश भर का ध्यान अपनी ओर खींचा। मुद्दे पर विपक्ष किस तरह हमला करेगा और मुद्दा कितने घंटे जिंदा रहेगा,इसकी चिंता नहीं करते। हैरानी वाला सवाल यह है,कि जब देश में जनगणना ही नहीं हुई है,फिर सरकार कैसे कल्याणकारी योजना बना लेती है। इतना ही नहीं, सरकार इसका आकलन कैसे कर लेती है, कि इतने लोगों को योजना का लाभ मिल रहा है। यह एक यक्ष प्रश्न है। प्रश्न तो यह भी है कि मोदी सरकार ने बिना जनगणना,परिसीमन के महिला आरक्षण बिल लोकसभा में पेश कैसे कर दिया। क्या नई संसद भवन में एक सियासी इतिहास की पटकथा रचने के लिए ऐसा किया। जबकि सरकार के पास किस जाति की कितनी महिलाएं हैं,उसका डाटा नहीं है। मोदी ने नारी शक्ति वंदन विधेयक में ओबीसी का जिक्र नहीं किया। जबकि ओबीसी बीजेपी से नाराज है। बीजेपी को सन् 2014 के चुनाव में उच्च पिछड़ी जाति 30 फीसदी और 2019 में 41 फीसदी वोट की थी। निम्न पिछड़ी जाति 2014 में 42 फीसदी और 219 में 48 फीसदी वोट की थी। वहीं अन्य पिछड़ी जाति बीजेपी के साथ 2014 में 34 फीसदी और 2019 में 44 फीसदी वोट की। जाहिर है मोदी ने ओबीसी को नजर अंदाज कर बहुत बड़ी गलती की। और इंडिया गठबंधन ने इसकी वकालत कर सत्ता पक्ष को चोट दे दी। संसद में 85 सांसद ओबीसी हैं। दो दलित कैबिनेट मंत्री हैं। ग्यारह महिला मंत्री हैं। अति पिछड़ी जाति के 19 मंत्री हैं। ओबीसी के पांच कैबिनेट और 29 मंत्री हैं। हर राज्यों में वोट शेयरिंग से पता चलाता है, कि जिधर सत्ता रही ओबीसी उधर गए। ▪️सियासी भूगोल बदला.. देश की गंभीर समस्याओं से विपक्ष और देशवासियों का ध्यान भटकाने के लिए मोदी सरकर ने महिला आरक्षण बिल का झुनझुना लाई है। यह जानते हुए भी कि महिला आरक्षण बिल के रास्ते में परिसीमन और डेलिमिटेशन के रोड़े हैं। यह काम 2024 के आम चुनाव तक संभव नहीं है। एस.सी,एसटी और ओबीसी का कोटा कितना दिया जाए यह भी बगैर जातिय गणना के संभव नहीं है। हर दस साल बाद सियासी भूगोल बदल जाता है। मोदी सरकार नारी शक्ति वंदन विधेयक तैयारी करके लाती तो बीजेपी के लिए चुनावी मास्टर स्ट्रोक होता। अब यह विधेयक 2029 तक टल गया। जातिय जनगणना और परिसीमन बगैर महिला आरक्षण बिल केवल चुनावी जुमला है। वहीं रोहणी आयोग की रिपोर्ट से स्पष्ट है कि देश में सैकड़ों जातियों को आरक्षण का लाभ नहीं मिल रहा। ▪️बीजेपी ने लटकाया बिल.. सन् 2014 और 2019 में बीजेपी ने अपने घोषणापत्रों में महिलाओं को 33 आरक्षण देने का वादा किया था। लेकिन उसे लटकाए रखा। महिला आरक्षण बिल मोदी सरकार ने इसलिए लाया ताकि उसे चुनावी औजार बना सकें। लेकिन विपक्ष ने उसे भोथरा कर दिया। सदन में इससे पहले भी चार दफा महिला आरक्षण बिल लाया गया था। और उसकी भू्रण हत्या हो गयी। वर्ष 2010 में महिला आरक्षण विधेयक राज्यसभा से पास हुआ लेकिन, बात आगे नहीं बढ़ी। उससे पहले विधेयक को 1998,1999, 2002 और 2003 में संसद से पारित कराने के प्रयास हुए थे। 12 सितंबर 1996 को एच.डी देवगौड़ा की सरकार ने 81वें संविधान संशोधन विधेयक के रूप में ससंद में महिला आरक्षण विधेयक को पेश किया था। उस समय यूनाइटेड फ्रंट की सरकार थी,जो 13 पार्टियों का गठबंधन था। लेकिन सरकार में शामिल जनता दल और अन्य कुछेक पार्टियों के नेता महिला आरक्षण के पक्ष में नहीं थे। सियासत में महिलाओं की हिस्सेदारी कैसे बढ़े सदन में और सदन के बाहर बातें होती रही है। लेकिन राजनीति दलों में इच्छा शक्ति की कमी हमेशा देखी गयी। इससे इंकार भी नहीं किया जा सकता, कि सियासी मर्द इसके पक्षधर नहीं हैं,कि राजनीति में महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़े। जैसा कि मुलायम सिंह यादव ने कहा था,कि महिलाओं की संख्या सदन में बढ़ जाने पर उन्हें देखकर पुरुष सीटी मारेंगे। सोच बदले तो देश बदले। जाहिर सी बात है,केवल बिल पास हो जाना ही महत्वपूर्ण नहीं है। व्यावारिकि रूप लेता भी दिखना चाहिए। सिफारिशें भी की गयी, कि लोकसभा और विधान सभाओं में महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटें आरक्षित कर दी जाएं। इसे लेकर रूप रेखा भी बनी। संसद में उसे कानूनी दर्जा भी दिलाने की कोशिश होती रही हैं। लेकिन अलग- अलग सियासी दलों के विचारो में भिन्नता के चलते बिल मुकम्मल नहीं हो सका। पिछले सत्ताइश सालों से यह विधेयक अधर में था। सन् 2029 के आम चुनाव में यह बिल लागू हुआ तोे सदन में 82 की जगह 181 महिला सांसद दिखेंगी। नारी शक्ति वंदन विधेयक को केवल 15 सालों तक ही लागू रखने का प्रस्ताव है। इसके बाद राजनीति में महिलाओं की भागेदारी सशक्त रहने पर इस कानून की शायद जरूर न पड़े। ▪️विधेयक का विरोध क्यों.. महिला आरक्षण बिल पर केवल सामाजवादी और वामपंथी दलों ने खिलाफत की। उनका कहना था कि पिछड़े तबके की महिलाओं के संदर्भ में इस बिल में कोई स्पष्ट रूप रेखा तय नहीं की गयी है। देवगौड़ा के समय की बात हो या फिर राजीव गांधी के समय भी ऐसा ही था। और अब मोदी सरकार के समय भी इस बिल को लेकर यही सवाल उठा है। नारी शक्ति वंदन विधेयक में भी तैतीस फीसदी आरक्षण की बात की गयी है,लेकिन अलग- अलग जाति की महिलाओं का कोटा कितना होगा लोकसभा और विधान सभा के चुनाव में यह नहीं बताया गया है। आरक्षित सीटों से बाहर भी महिलाएं चुनाव लड़ती आई हैं,उसे कायम रखा गया है। विधयेक में अन्य पिछड़ी जातियों का कोटा निर्धारित नहीं होने से इसका विरोध हो रहा है। मोदी जानते थे,ऐसा होगा। सरकार की मंशा नारी शक्ति विधयेक को केवल उछालना था। इसीलिए उसने जनगणना 2022 में नहीं कराया और न ही परिसीमन। ▪️सोशल इंजीनियरिंग.. नारी शक्ति वंदन विधेयक के जरिए विपक्ष सोशल इंजीनियरिंग की राजनीति करना चाहता है। वहीं सदन में स्मृति इरानी कहती हैं, कि संविधान के मुताबिक धर्म के आधार पर आरक्षण नहीं दिया जा सकता। विपक्ष भ्रमित करने का प्रयास कर रहा है। अब विपक्ष महिला आरक्षण की लड़ाई ओबीसी कोटे तक ले आया है। प्रथम दृष्टया ये बिल आरक्षण देने की नीयत से नहीं लाया गया है। जैसा कि बसपा सुप्रीमों कहती हैं,कि महिला आरक्षण बिल तुरंत लागू नहीं किया जा सकता। यह बिल सन् 2029 से पहले तभी संभव है,जब एससी,एसटी और ओबीसी बड़ा दिल दिखाएं। वो 2024 के चुनाव में आरक्षण मिलने की वकालत न करें। यदि ऐसा हुआ तो फिर इसकी कोई गारंटी नहीं है, कि अगली सरकार तैंतीस फीसदी आरक्षण पर पुर्नविचार करे। चूंकि देश में ओबीसी जाति के वोटर बहुत हैं। इसलिए हर सियासी दल चाहता है कि ओबीसी को आरक्षण मिले। ▪️सियासी हेंगर में नारी शक्ति.. सवाल यह है कि नारी शक्ति वंदन विधेयक कैसे लागू होगा? संसद के दोनों सदनों में पास कराना होगा। आधे राज्यों की विधान सभा में पास हो। रोहणी आयोग की रिपोर्ट कहती है,38 जातियों का दूसरे पर एक चौथायी कब्जा है। सिर्फ 10 फीसदी जातियों को आरक्षण का लाभ दस फीसदी मिला हुआ है। 983 जातियों को आरक्षण का कोई लाभ नहीं मिला। 994 जातियों को महज 2.68 फीसदी आरक्षण मिला है। देश की 506 ऐसी जातियां है, जिन्हें करीब 22 फीसदी लाभ मिला। सियासी नजरिए से महिला आरक्षण से महिला सशक्तिकरण होगा, इसकी कल्पना बेमानी है। महिलाएं खुश हो सकती हैं,कि नए बिल से उन्हें समानता का अधिकार मिलेगा। जबकि अभी सियासी हेंगर में नारी शक्ति बिल लटका हुआ है।

Friday, September 8, 2023

एम.पी में बीजेपी का ढोल फट रहा

एम.पी में बीजेपी का ढोल फट रहा कांग्रेस के सर्वे में बीजेपी 85 सीटो में सिमटी रमेश कुमार ‘रिपु’
मध्यप्रदेश में बीजेपी का ढोल फट रहा है। यह कांग्रेस का सर्वे बता रहा है। कांग्रेस ने तीन टीमों से सर्वे कराया। दक्षिण भारत,यूपी और मध्यप्रदेश की टीम के जरिए। सर्वे बता रहे हैं कि लाड़ली बहना की वजह से बीजेपी के खाते में पांच फीसदी वोटों में इजाफा हुआ है। इस वजह से बीजेपी की सीट बढ़कर 80 से 85 तक हो गयी है। अभी चुनाव होने में दो माह का वक्त है। बीजेपी कितना कवर करती है मोदी भी नहीं जानते। कांग्रेस के सर्वे को सच मान लिया जाए तो बीजेपी के ढोल फटने की वजह कई है। मुख्यमंत्री शिवराज सिह चैहान इतना परेशान कभी किसी सी चुनाव में नहीं हुए। जितना इस बार के विधान सभा चुनाव को लेकर है। उसकी वजह कई हैं। बीजेपी एंटी इन्कम्बैसी के दौर से गुजर रही है। यह एंटी इन्कम्बैसी की वजह मोदी हैं। महंगाई,बेरोजगारी और झूठे वायदे के लिए केद्र सरकार जिम्मेदार है। वहीं प्रदेश में भ्रष्टाचार के लिए शिवराज सिंह। प्रदेश में 18 साल के कार्यकाल में शिवराज के समय 230 घोटाले हुए हैं। शिवराज पहले मुख्यमंत्री है,जिनके खिलाफ मोदी ने व्यापम घोटाले के लिए सीबीआई जांच का आदेश दिया। शिवराज घोंषणा का रिकार्ड बना दिये हैं। अपने कार्यकाल में अब तक तीस हजार से अधिक घोंषणाएं कर चुके हैं। विपक्ष उन्हें घोंषणावीर कहता है। मोदी को चुनावी दूल्हा बनने परहेज आर एस एस पहले ही कह चुका है कि मोदी चुनावी चेहरा इस बार नहीं हैं। संघ मानता है कि न तो मोदी चेहरा काम आ रहा है और न ही हिन्दुत्व कार्ड। हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक चुनाव हारने के बाद मोदी बैकफुट में आ गए हैं। मोदी ही जब बीजेपी हैं। मोदी हैं तो संघ है। जैसा प्रचारित किया जा रहा है तो फिर दो राज्यों की हार की भी जिम्मेदारी मोदी को लेनी चाहिए। मोदी इसके लिए तैयार नहीं है। वे चुनावी दूल्हा बनना नहीं चाहते। और शिवराज चुनावी घोड़ी से उतरना चाहते हैं। इस बार जनदर्शन यात्रा में शिवराज को पार्टी ने प्रमोट नहीं किया है। इसीलिए चित्रकूट में जेपी नड्डा ने जनदर्शन आर्शीवाद यात्रा को हरी झंडी दिखाई। सीधी कांड से आदिवासियों को साधने के लिए ऐसा किया गया है। विंध्य क्षेत्र की 30 सीटों में 23 सीटें ऐसी है जहां ब्राम्हणों की आबादी 30 फीसदी से ज्यादा है। सीधी पेशाब कांड में प्रवेश शुक्ला के घर बुलडोजर चला देने से ब्राम्हण समाज बीजेपी के खिलाफ हो गया है। सन् 2018 के चुनाव में बीजेपी आदिवासी बाहुल इलाके के 84 सीटों में 34 ही जीत पाई थी। जबकि 2013 के चुनाव में 59 सीट जीती थी। अब आदिवासियों का विश्वास जीतने में बीजेपी लगी है। मध्यप्रदेश देश में पहले नम्बर पर है जहां आदिवासियो ंके खिलाफ 2627 मामले दर्ज हुए हैं। दलितों के मामले में तीसरे स्थान पर है,7214 मामले दर्ज हुए हैं। रेप मामले में दूसरे स्थान पर है,कुल 2947 मामले दर्ज हुए हैं। यह स्थिति 2022 की है। एनसीआर की रिपेार्ट के मुताबिक 2021 में 17008 बच्चे क्राइम के शिकार हुए थे। शिवराज विरूद्ध बीजेपी सन् 2014 में पी.एम.की दौड़ में शिवराज और डाॅ रमन सिंह थे। मोदी और अमितशाह की जोड़ी ने दोनों को किनारे कर दिया। छत्तीसगढ़ में रमन कुछ नहीं कर पाए। सिंधिया के चलते मध्यप्रदेश में बीजेपी ने सरकार बना ली। मुख्यमंत्री शिवराज बन गए लेकिन इनके चारो ओर इनके विरोधी खड़े हो गए। यह सब मोदी की रणनीति के तहत हुआ। वी.डी शर्मा,नरोत्तम मिश्रा,ज्योतिरादित्य सिंधिया,और कैलाश विजयवर्गीय। ये सभी मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं। कैलाश विजयवर्गीय ने तो खुलकर कह दिया था कि मुझे मुख्यमंत्री बनाया जाए। वी.डी शर्मा मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं, सोशल मीडिया में खबरे खूब वायरल हुई थी। जाहिर सी बात है कि बीजेपी में जबरदस्त की गुंटबंदी है। शिवराज की अमितशाह से जम नहीं रही है। आत्मविश्वास डगमगाया है। और प्रदेश में भ्रष्टाचार चरम पर है। अमितशाह हावी हैं इस बार भारी एंटी इन्कमबैसी की वजह से बीजेपी हाईकमान भी मान कर चल रहा है कि मध्यप्रदेश में भगवा छतरी तनने में दुविधा है। वहीं अमितशाह का दावा है कि जनआर्शीवाद यात्रा जब समाप्त होगी, तब बीेजेपी 150 सीट जीतेगी। जबकि बीजेपी अपने अच्छे दिनों में भी इतनी सीट नहीं जीती थी। हो सकता है कि बीजेपी के कई प्रत्याशी पांच-सात सौ वाटों से जीतें। कलेक्टर कुछ भी कर सकते हैं। इसी आशंका को देखते हुए दिग्विजय सिंह ने मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी अनुपम राजन को एक पत्र देकर कहा कि जहां भी हार जीत का फैसला एक हजार वोटो के अंदर हो वहां पुर्न मतगणना कराया जाए। प्रदेश के मुख्य सचिव इकबाल बैस दो बार सेवा वृद्धि ले चुके हैं। उनके नेतृत्व में निष्पक्ष चुनाव की उम्मीद कम है। इसलिए उनकी सेवाएं खत्म की जाए। बीजेपी में भगदड़ बीजेपी के नेता और विधायक कांग्रेस में जा रहे हैं। भाजपा के 31 बडे नेता अब तक कांग्रेस में जा चुके हैं। इसमें से 25 फीसदी सिंधिया गुट के हैं। वीरेन्द्र रघुवंशी,भ्ंावर सिंह शेखावत,गिरिजाशंकर,माखन सिंह सोलंकी,राधेलाल बघेल,दीपक जोशी पूर्व मुख्यमंत्री कैलाश जोशी के पुत्र हैं,देशराज सिंह,हेमंत लहरिया,कमल पटेल के राइट हैंड दीपक सारण,धु्रव प्रताप सिंह,अवधेश नायक,रोशनी यादव,समंदर पटेल,बैजनाथ सिंह यादव,रघुराज धाकड़, राकेश गुप्ता, गगन दीक्षित,यदुराज सिंह यादव आदि लोगों ने बीजेपी छोड़ दी। वजह बताते हैं,पार्टी अपने मूल सिद्धतों को भूल गयी। भ्रष्टाचार और गुटबाजी हावी है। भाजपा तानाशाही की सरकार चलाती है। सिंधिया समर्थकों का दबदबा बढ़ गया है। चुनाव नजदीक आते ही ज्यादातर बीजेपी के नेता पार्टी छोड़ रहे है। जाहिर सी बात है कि कांग्रेस के सर्वे पर बीजेपी नेता भी भरोसा कर रहे हैं कि शिवराज अब खत्म होने जा रहा है।

Wednesday, July 19, 2023

पुष्पराज तुरुप कितना कारगर...

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0 रमेश कुमार 'रिपु" रियासत नहीं रही। मगर,बघेली जनता के लिए अब भी पुष्पराज सिंह महाराज हैं। वैसे लोकतंत्र में जनता ही महाराज है।वहीं रंग बदलती सियासत के दौर में भी सुर्खियों में रहने की सियासत करने में पुष्पराज सिंह माहिर हैं। कांग्रेस में थे तब भी और नहीं थे,तब भी। पुष्पराज सिंह एक बार फिर भाजपा में आ गए हैँ । कांग्रेस के कईयों को लगता है कि वे सेमरिया या फिर गुढ़ विधान सभा से चुनाव लडेंगें। जबकि ऐसा नहीं है। बीजेपी ने बहुत सोच समझ कर पुष्पराज सिंह को प्रोडेक्ट कर रही है। पुष्पराज सिंह पर इस बार जिम्मा है बीजेपी को आठों विधान सभा की सीट दिलाना। बीजेपी उनका पूरा राजनीतिक फायदा उठाना चाहती है। बीजेपी के लिए और उनके लिए भी, यह एक सुनहरा मौका है। सुनहरी कामयाबी का जिम्मा. सन् 2023 के विधान सभा चुनाव में पुष्पराज सिंह के सक्रिय होने से चुनाव बेहद रोचक हो जाएगा। वहीं बीजेपी एंटीइन्कम्बैसी से गुजर रही है। रीवा की आठों विधान सभा के लिए पुष्पराज सिंह पर बीजेपी दांव खेलने जा रही है। सवाल यह है कि बीजेपी को बढ़त मिलेगी या फिर भगवा छतरी कम जगह ही तन पाएगी। बीजेपी के लिए पुष्पराज सिंह कितना तुरुप कारगर होगें,इस पर आकलन कांग्रेस में होने लगा हैं। बीजेपी की रणनीति के मुताबिक पुष्पराज सिंह आठों विधान सभा में बीजेपी के लिए वोट मांगेंगे। सीटों के संभावित नुकसान को यदि पुष्पराज सिंह कम करने में कामयाब हो गए,तो लोकसभा की टिकट उनकी तय है। विधान सभा चुनाव के परिणाम ही बताएंगे कि पुष्पराज सिंह कितने कामयाब सियासी खिलाड़ी हैं। रीवा जिला महाराजमय होता है या फिर कमलनाथमय,यह हर कोई देखना चाहता है। कैसा और कहां होगा असर.. रिमही जनता आज भी पुष्पराज सिंह को महाराज कहती है। ग्रामीण क्षेत्रों में उनकी पकड़, सियासी उम्मीद से ज्यादा है। पुष्पराज सिंह को न तो नागेन्द्र सिंह,न ही राजेन्द्र शुक्ला और न ही जनार्दन मिश्रा नकार सकते हैं। शिवराज सिंह चौहान को भी पता है कि रीवा में कोई कार्ड चल सकता है तो वो है पुष्पराज सिंह। उनके खुलकर बीजेपी के लिए वोट मांगने से भगवा राजनीति का तापमान बढ सकता है। उनकी हाजिर जवाबी,सभी जाति के वोटरों से सीधा जुड़ाव, और कांग्रेस का हर नेता उनके कद की इज्जत करता है। चूंकि कांग्रेस में मंत्री रहे हैं,कांग्रेस की राजनीति की है। ऐसे में कांग्रेस के पाले से अल्पसंख्यक ओबीसी,एससी,एसटी वोटर को खींचना होगा। अल्पसंख्यक वोटर रीवा में करीब 25 हजार है। इन वोटरों के बीच उनका आकर्षण है। युवाओं और महिलाओं के बीच उनकी अपनी लोकप्रियता है। पुष्पराज का गणराज्य.. पुष्पराज को बीजेपी विधान सभा चुनाव नहीं लड़ाएगी। ऐसे में उनका विरोध किसी भी विधान सभा में नहीं होगा। पुष्पराज सिंह को रीवा जिले की जनता के लिए नया एजेंडा तय करना होगा। साथ ही विराट सोच के साथ, सियासी पिच पर उतरना होगा। सवाल यह है कि जिला ग्रामीण कांग्रेस अध्यक्ष राजेन्द्र शर्मा और शहर कांग्रेस अध्यक्ष लखनलाल खंडेलवाला क्या पुष्पराज सिंह के किसी बयान का विरोध करेंगे? क्यों कि दोनों का इनसे साहब सलाम का सियासी रिश्ता बरसों से है। राजेन्द्र शर्मा क्या श्रीयुत श्रीनिवास तिवारी की भूमिका में पुष्पराज के सामने आ सकेंगे? राजेन्द्र शुक्ला को घेरने के लिए कांग्रेस के पास बहुत सारी बातें हैं। लेकिन पुष्पराज सिंह के खिलाफ बोलने के लिए कुछ भी नहीं है। बीजेपी का हो या फिर कांग्रेस का अथवा बसपा का कोई भी नेता महाराज के बायें चलने की सियासत कम से कम सामने से करने की हिम्मत नहीं करता। क्या इतने भर से पुष्पराज सिंह भगवा छतरी रीवा की आठों विधान सभा में तान लेंगे? ंइजीनियर राजेन्द्र शर्मा कहते हैं,कांग्रेस चार सीट सीधे -सीधे जीत रही है। लेकिन जनता में बदलाव का जो जोश देखने को मिल रहा है उससे कह सकते हैं कि आठों सीट कांग्रेस के हाथ में होगी। गौरतलब है सुन्दर लाल तिवारी ने 2018 के चुनाव में कहा था,कि हम सात सीट जीतेंगे। अमहिया काग्रेस ने जो राजनीति 2018 में की थी,यदि वही की, तो पुष्पराज सिंह का सियासी कद 2023 के चुनाव में बढ़कर मोदी और अमितशाह के साथ खड़े होने की हो जाएगी। दो ठाकुर आमने- सामने होंगे.. विंध्य में कुंवर अर्जुन सिंह को जो सम्मान मिलता था,उनके चलते अजय सिंह राहुल को भी मिलता है। पुष्पराज सिंह बीजेपी के लिए ठाकुरों से वोट मांगेगे और अजय सिंह राहुल कांग्रेस के लिए। ठाकुर राजनीति का टकराव सिर्फ रीवा ही नहीं, पूरे रीवा संभाग की सीटों पर असर डालेगी। अजय सिंह राहुल मोदी और शिवराज के वादे और भ्रष्टाचार का लेखा- जोखा रखेंगे तो पुष्पराज सिंह मोदी के कामकाज की बातें करेंगे। लाड़ली बहना और संविदा कर्मियों के अलावा शिवराज सरकार की योजनाओं की बातें करेंगे, मोदी को ईमानदार और मेहनती होने की बात करेंगे। लेकिन पुष्पराज सिंह को इसका भी जवाब देना होगा कि अल्पसंख्यक बीजेपी के दौर में अपने आप को डरा महसूस क्यों कर रहा है? मैराथन मैन.. सवाल यह है कि पुष्पराज सिंह मैराथन मैन बन पाएंगे या फिर भगवा तिलक और गमछा लेकर घूमते रह जाएंगे। जिले की राजनीति से पुष्पराज सिंह पन्द्रह सालों से कटे हुए हैं। नया वोटर उन्हें पहचानता भी नहीं। युवा लड़के और लड़कियों के बीच उनका अपना कोई जनाधार नहीं है। वो प्रियंका,राहुल गांधी और मोदी को जानता है। उनके पास ऐसा क्या है, जो नयी सदी के युवाओं को रिझा सकें। उन्हें मना सकें कि बीजेपी को वोट देना ही हितकर है। नई नस्ल की वोट की फसल को काटने के लिए रीवा जिले के लिए क्या अलग से घोषणा पत्र लेकर उनके पास पहुंचेंगे। जबकि कई कांग्रेसी पुष्पराज सिंह को किचन सियासी कहते हैं। पुष्पराज सिंह महाराज छवि से बाहर कितना निकल पाएंगे,शायद वो खुद भी नहीं जानते। उनके साथ कई ऐसे विवाद भी हैं। जिन्हें बीजेपी ने कभी खोला था चुनाव में। वही विवाद कांग्रेस ने खोला तो पुष्पराज सिंह के लिए संकट खड़ा हो जाएगा। बहरहाल पुष्पराज सिंह अपनी सियासत की नई पारी एक बार फिर से बीजेपी में खेलने जा रहे हैं। सच तो यह है कि बीजेपी के लिए और उनके लिए भी, यह एक मौका है।

शिवराज ने जनता भरोसा खो दिए हैंः राहुल

सर्वे में बीजेपी पच्चपन सीट पा रही है रीवा। पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह राहुल ने कहा कि दस बारह साल पहले शिवराज सिहं चौहान जो कहते थे तो उनकी बातों पर जनता भरोसा करती थी। लेकिन अब वो जनता का भरोसा खो दिए हैं। यही वजह कि बीजेपी के हर सर्वे में उसकी सीट कम होते जा रही है। लाड़ली बहना योजना का लाभ मिलने की बजाए, बीजेपी को नुकसान हो गया है। वीकेन न्यूज से एक चर्चा के दौरान मध्यप्रदेश के पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह
ने यह बात कही। उन्होनें कहा कि जनवरी में बीजेपी ने आंतरिक सर्वे कराया था। जिसमें उसे सौ सीट मिल रही थी। इसके बाद मई के सर्वे में उसे 65 सीट मिल रही थी। लगातर सीट घटने पर शिवराज सिंह ने सोचा कि महिलाओं को किसी बहाने अपनी ओर खींचा जाए तो शायद एंटीइन्कम्बैसी कम हो जाए। वो लाड़ली बहना योजना ले आए। उसके बाद के सर्वे में बीजेपी की दस सीट और कम हो गयी है। ऐसा लगता है कि सदन में इस बार बीजेपी मजबूत विपक्ष की हैसियत में भी नहीं रहेगी। ▪️राहुल की टीम सर्वे कर रही.. एक सवाल के जवाब में उन्होने ने कहा कि पूरे प्रदेश में राहुल गांधी की टीम सर्वे कर रही है। जो उम्मीदवार उनके सर्वे में जीत रहा है, उसे टिकट दिया जाएगा। यह कोई मायने नहीं रखता कि जिला कांग्रेस अध्यक्ष या फिर शहर कांग्रेस अध्यक्ष ने पैनल में किसी का नाम दिया है या नहीं। ▪️अल्पसंख्यक को टिकट मिलेगा.. दिग्विजय सिंह का कहना है कि अल्पसंख्यक नेताओं को टिकट कांग्रेस नहीं देगी। उन्हें टिकट देने से बीजेपी चुनाव जीत जाती है, सवाल पर उन्होंने कहा कि मुझे नहीं पता दिग्विजय सिंह यह बात किस संदर्भ में कही। लेकिन मेरा मानना है अल्पसंख्यक नेताओं को भी टिकट दी जाएगी। ▪️पुष्पराज चैथे नम्बर पर.. पुष्पराज सिंह सपा से लोकसभा से चुनाव लड़े थे, तो 85 हजार वोट पाए थे। इस बार कांग्रेस से बीजेपी में आ गए हैं। हर विधान सभा में महाराज होने के नाते दस से पन्द्रह हजार उनके वोट है। यह वोट बीजेपी में चले गए तो कांग्रेस को नुकसान हो सकता है, सवाल पर अजय सिंह राहुल ने कहा कि राजनीति की हवा हमेशा एक सी नहीं होती। पुष्पराज सिंह उस समय चौथे नम्बर पर थे। इस बार भी वो चौथे नम्बर पर ही रहेंगे। ▪️आदिवासी बीजेपी से खफा.. आदिवासी वोटर को लुभाने बीजेपी जी जान से जुटी है। आदिवासी वोटर को लुभाने अमितशाह शहडोल संभाग का दौरा कर चुके हैं। शिवराज भी इस बार अधिक से अधिक सीट जीतना चाहते हैं। क्या इसलिए राहुल गांधी ब्योहारी आ रहे हैं? आदिवासी वोटर बीजेपी के हाथ से छिटक गया है। इसी से समझ सकते हैं कि बीजेपी 2018 के चुनाव में आदिवासी की 47 सीट में 31 सीट कांग्रेसी जीती। बीजेपी को सिर्फ 16 सीट मिली। 2003 के चुनाव में सोनिया गांधी व्यौहारी आई थीं। इस बार शिवराज कुछ भी कर लें आदिवासी सीट वो महाकौशल,और विंध्य में भी कम ही पाएंगे। आदिवासी वोटर उनसे बेहद नाराज है। ▪️बीजेपी को बीजेपी हाराएगी.. एक समय कहा जाता था कि कांग्रेस ही कांग्रेस को हराती थी है। इस बार भी यह कहावत क्या जिंदा रहेगी। नेता प्रतिपक्ष ने हंसते हुए कहा इस बार जनता कहेगी कि भाजपा ही भाजपा को हराती है। इस बार विंध्य क्षेत्र में जिस तरह जनता शिवराज सरकार से नाराज है उससे यही लगता है कि 20-22 सीट कांग्रेस को मिलेगी। वी केन न्यूज के नेशनल हेड रमेश कुमार द्धारा सर्वे में बीजेपी पच्चपन सीट पा रही है रीवा। पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह राहुल ने कहा कि दस बारह साल पहले शिवराज सिहं चौहान जो कहते थे तो उनकी बातों पर जनता भरोसा करती थी। लेकिन अब वो जनता का भरोसा खो दिए हैं। यही वजह कि बीजेपी के हर सर्वे में उसकी सीट कम होते जा रही है। लाड़ली बहना योजना का लाभ मिलने की बजाए, बीजेपी को नुकसान हो गया है। वीकेन न्यूज से एक चर्चा के दौरान मध्यप्रदेश के पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह राहुल ने यह बात कही। उन्होनें कहा कि जनवरी में बीजेपी ने आंतरिक सर्वे कराया था। जिसमें उसे सौ सीट मिल रही थी। इसके बाद मई के सर्वे में उसे 65 सीट मिल रही थी। लगातर सीट घटने पर शिवराज सिंह ने सोचा कि महिलाओं को किसी बहाने अपनी ओर खींचा जाए तो शायद एंटीइन्कम्बैसी कम हो जाए। वो लाड़ली बहना योजना ले आए। उसके बाद के सर्वे में बीजेपी की दस सीट और कम हो गयी है। ऐसा लगता है कि सदन में इस बार बीजेपी मजबूत विपक्ष की हैसियत में भी नहीं रहेगी। ▪️राहुल की टीम सर्वे कर रही.. एक सवाल के जवाब में उन्होने ने कहा कि पूरे प्रदेश में राहुल गांधी की टीम सर्वे कर रही है। जो उम्मीदवार उनके सर्वे में जीत रहा है, उसे टिकट दिया जाएगा। यह कोई मायने नहीं रखता कि जिला कांग्रेस अध्यक्ष या फिर शहर कांग्रेस अध्यक्ष ने पैनल में किसी का नाम दिया है या नहीं। ▪️अल्पसंख्यक को टिकट मिलेगा.. दिग्विजय सिंह का कहना है कि अल्पसंख्यक नेताओं को टिकट कांग्रेस नहीं देगी। उन्हें टिकट देने से बीजेपी चुनाव जीत जाती है, सवाल पर उन्होंने कहा कि मुझे नहीं पता दिग्विजय सिंह यह बात किस संदर्भ में कही। लेकिन मेरा मानना है अल्पसंख्यक नेताओं को भी टिकट दी जाएगी। ▪️पुष्पराज चैथे नम्बर पर.. पुष्पराज सिंह सपा से लोकसभा से चुनाव लड़े थे, तो 85 हजार वोट पाए थे। इस बार कांग्रेस से बीजेपी में आ गए हैं। हर विधान सभा में महाराज होने के नाते दस से पन्द्रह हजार उनके वोट है। यह वोट बीजेपी में चले गए तो कांग्रेस को नुकसान हो सकता है, सवाल पर अजय सिंह राहुल ने कहा कि राजनीति की हवा हमेशा एक सी नहीं होती। पुष्पराज सिंह उस समय चौथे नम्बर पर थे। इस बार भी वो चौथे नम्बर पर ही रहेंगे। ▪️आदिवासी बीजेपी से खफा.. आदिवासी वोटर को लुभाने बीजेपी जी जान से जुटी है। आदिवासी वोटर को लुभाने अमितशाह शहडोल संभाग का दौरा कर चुके हैं। शिवराज भी इस बार अधिक से अधिक सीट जीतना चाहते हैं। क्या इसलिए राहुल गांधी ब्योहारी आ रहे हैं? आदिवासी वोटर बीजेपी के हाथ से छिटक गया है। इसी से समझ सकते हैं कि बीजेपी 2018 के चुनाव में आदिवासी की 47 सीट में 31 सीट कांग्रेसी जीती। बीजेपी को सिर्फ 16 सीट मिली। 2003 के चुनाव में सोनिया गांधी व्यौहारी आई थीं। इस बार शिवराज कुछ भी कर लें आदिवासी सीट वो महाकौशल,और विंध्य में भी कम ही पाएंगे। आदिवासी वोटर उनसे बेहद नाराज है। ▪️बीजेपी को बीजेपी हाराएगी.. एक समय कहा जाता था कि कांग्रेस ही कांग्रेस को हराती थी है। इस बार भी यह कहावत क्या जिंदा रहेगी। नेता प्रतिपक्ष ने हंसते हुए कहा इस बार जनता कहेगी कि भाजपा ही भाजपा को हराती है। इस बार विंध्य क्षेत्र में जिस तरह जनता शिवराज सरकार से नाराज है उससे यही लगता है कि 20-22 सीट कांग्रेस को मिलेगी।

Monday, June 12, 2023

पटरी पर मौत रोकने की सबसे बड़ी चुनौती

"बुलेट ट्रेन का सपना दिखाने वाली सरकार के सामने चुनौती है पटरी पर मौत रोकना। अब तक सिर्फ साठ ट्रेनों में ही कवच सिस्टम है। उद्योगपतियों का ग्यारह लाख करोड़ रुपए कर्ज माफ कर देने वाली सरकार कवच सिस्टम के लिए चौतीस हजार करोड़ रुपए खर्च कर दे तो देश में बालासोर जैसी दुर्घटना की पुनरावृति नहीं होगी। जबकि दो लाख करोड़ रुपए से ज्यादा उद्योगपति लेकर देश से भाग गए।" 0 रमेश कुमार ‘रिपु’ दो जून को ओड़िसा में जिस ट्रैक पर रेल हादसे में 278 लोगों की जानें गयी अब उसी ट्रैक पर फिर से रेलगाड़ियां चलनी शुरू हो गयी। प्रधान मंत्री ने कहा कि गुनहगार बख्शे नहीं जाएंगे। वहीं रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा कि ओडिशा ट्रिपल ट्रेन हादसा इलेक्ट्रॉनिक इंटरलॉकिंग और सिग्नल सिस्टम की समस्या की वजह से हुआ है। शाम को कहा रेलवे बोर्ड ने रेल हादसे की सीबीआई जांच की सिफारिश की है। रेलवे बोर्ड की सदस्य जया वर्मा सिन्हा ने कहा कि साजिश की संभावना से इनकार नहीं किया गया है। जब सब पता है तो फिर सीबीआई जांच क्यों? जाहिर सी बात है लोगों का ध्यान बांटने के लिए ऐसा किया गया है ताकि इस्तीफे की बात न उठे। सवाल यह है कि देश के प्रधान मंत्री वंदेमातरम ट्रेन को हरी झंडी दिखाते आए हैं। देश में करीब पन्द्रह वंदेमातरम ट्रेन अलग-अलग रूट पर चल रही हैं। इस ट्रेन का किराया अन्य ट्रेनो की तुलना में पाँच गुना ज्यादा है। यात्री सफर इस उम्मीद से करता है कि वह सुरक्षित अपने घर पहुंच जाएगा। लेकिन बालासोर की रेल दुर्घटना ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। सरकार की गलती से अथवा अनदेखी से रेल दुर्घटना होने पर क्यों ने सरकार को कटघरे पर खड़ा किया जाए। इसलिए भी कि प्रधान मंत्री सारे मंत्रालय के जवाबदारी लेते हैं तो फिर रेल दुर्घटना की क्यों नहीं? इस हादसे की जिम्मेदारी कौन लेगा? अब न अटल जी का और न ही नेहरू का दौर है। कैग की रिपोर्ट की अनदेखी - मोदी सरकार यदि कैग की रिपोर्ट को अमल में लाती तो बालासोर हादसा होता नहीं। रेल्वे बजट में 2023-24 के लिए ढाई लाख करोड़ रुपए का प्रावधान है। लेकिन इस हादसे ने सबका ध्यान रेल मंत्री अश्विनी के 2022 के उस बयान की ओर खींचा है,जिसमें उन्होंने कहा था, रेल कवच एक ऑटोमैटिक ट्रेन प्रोटेक्शन सिस्टम है। इसे ट्रेन कोलिजन अवॉइडेंस सिस्टम कहते हैं। इंजन और पटरियों में लगे इस डिवाइस की मदद से रेल दुर्घटनाएं रोकी जा सकती है। कोरोमंडल एक्सप्रेस और बेंगलुरु-हावड़ा सुपरफास्ट ट्रेनों के इंजन में कवच लगा होता तो इस हादसे को टाला जा सकता था। देश में करीब एक लाख पन्द्रह हजार किलोमीटर रेल पटरियांँ है। प्रति किलोमीटर कवच सिस्टम पर तीस लाख रुपए खर्चा आएगा। यानी देश में कवच सिस्टम पर चौतीस हजार करोड़ रुपए का खर्चा आएगा। लोगों की जिन्दगी के नजरिये से देखा जाए तो यह बहुत बड़ी राशि नहीं है। बुलेट ट्रेन का सपना दिखाने वाली सरकार के सामने चुनौती है पटरी पर मौत रोकना। अब तक सिर्फ साठ ट्रेनों में ही कवच सिस्टम है। उद्योगपतियों का ग्यारह लाख करोड़ रुपए कर्ज माफ कर देने वाली सरकार कवच सिस्टम के लिए चौतीस हजार करोड़ रुपए खर्च कर दे तो देश में बालासोर जैसी दुर्घटना की पुनरावृति नहीं होगी। जबकि दो लाख करोड़ रुपए से ज्यादा उद्योगपति लेकर देश से भाग गए। कोंकण रेलवे के इंजीनियरों ने रेल हादसे रोकने के लिए रक्षा कवच विकसित किया था। सन् 2011 में मनमोहन सरकार के समय लगाने की शुरूआत हो गयी थी। इसे हर रेल नेटवर्क पर लगाने की योजना है। लेकिन काम की गति कछुवा गति जैसी है। सरकार ने अनदेखी की - दिसंबर 2022 में कैग ने अपनी रिपोर्ट में रेलवे की व्यवस्था में खामियों की ओर सरकार का ध्यान खींचा था। अप्रैल 2017 से मार्च 2021 के बीच चार सालों में 16 जोनल रेलवे में 1129 डिरेलमेंट की घटनाएं हुईं। यानी हर साल लगभग 282 डिरेलमेंट हुए। इसमें करीब 3296 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ था। जाहिर है कि ट्रैक का निरीक्षण नहीं होने से डिरेलमेंट होगा। रिपोर्ट कहती है 422 डिरेलमेंट इंजीनियरिंग विभाग की लापरवाही से हुए। 171 मामलों में ट्रैक के मैंटिनेंस में कमी डिरेलमेंट की वजह रही। वहीं मैकेनिकल डिपार्टमेंट की लापरवाही से 182 डिरेलमेंट हुए। 156 मामलों में निर्धारित ट्रैक पैरामीटर के नियमों का पालन नहीं होने से डिरेलमेंट हुआ। 154 डिरेलमेंट में लोको पायलट की खराब ड्राइविंग और ओवर स्पीडिंग मुख्य वजहें रहीं। 37 फीसदी मामलों में कोच में खराबी और पहियों का गलत निर्माण से डिरेलमेंट हुआ। करीब चार सौ मामलों में खराब डिब्बों और खराब पहिए दुर्घटना की वजह बने हैं। सरकार के रेल बजट में पुराने डिब्बे और पहिए के मेंटिनेस का जिक्र सिर्फ संसद के पटल पर होता है। यानी जमीनी हकीकत कुछ और है। 275 डिरेलमेंट ऑपरेटिंग डिपार्टमेंट की लापरवाही के चलते हुए। दरअसल रेलवे विभाग की ओर से ट्रैक मेनटेनेंस धीरे- धीरे कम होता गया। जांच होने से क्या - बलासोर रेल दुर्घटना की जांच सीबाआई के करने से क्या होगा? 278 लोगों की जान वापस आने से रही। दरअसल जनता का गुस्सा कम करने के लिए सरकार रेल हादसे की जांच के आदेश देती है। कुछ दिनों बाद लोग भूल जाते है। फाइल बंद हो जाती है। जैसा कि सन 2016 में कानपुर में रेल दुर्घटना में 150 लोगों की मौत पर प्रधान मंत्री ने साजिश की आशंका के चलते एनआई को जांच करने आदेश दिया था । दो साल बाद एनआईए ने फाइल बंद कर दी। चार्जशीट दायर करने से इंकार कर दिया। सरकार को लगता है मुआवजा दे देने से लोगों को न्याय मिल जाता है। लोग संतुष्ट हो जाते हैं। जबकि सरकार मरने वाले परिवार की तकलीफ के बारे में कुछ भी नहीं सोचती। कई बार ऐसा भी होता है कि परिजन को उनका अपना शव नहीं मिलता। ऐसी स्थिति में उन्हें न क्लेम मिलता है और न ही नौकरी मिलती है। दो हजार करोड़ की कटौती - बहुत लोगों को यह भी नहीं पता कि रेल मंत्री रहे नीतीश कुमार ने खराब पट्टिरियों के लिए विशेष सुरक्षा फंड बनाया था। बड़े पैमाने पर पुरानी और जर्जर पटरियों की जगह नई पटरियां लगाने का काम किया गया। लेकिन मोदी सरकार ने 2018 में इस पर किए गए 9607 करोड़ रुपये के खर्च में दो साल बाद दो हजार करोड़ रुपये की कटौती कर दी। यानी राष्ट्रीय रेल संरक्षा कोष में 79 प्रतिशत फंडिंग कम की गई। रेल पटरी नवीकरण कार्यों की राशि में भारी गिरावट भी रेल दुर्घटना की भी वजह है। कईयों ने इस्तीफा दिया- राजनीति में अब नैतिकता खत्म हो गयी है। लाल बहादुर शास्त्री 1958 में रेल मंत्री थे। आन्ध्र प्रदेश के महबूबनगर में एक रेल हादसा में 112 लोगों की मौत हो गयी थी। उन्होंने इस्तीफा पी.एम नेहरू को दे दिया था। उनका इस्तीफा नेहरू नहीं स्वीकारे। इसके बाद तमिलनाडु के अरियालुर में 144 लोगों की मौत पर नेहरू को लालबहादुर शास्त्री ने अपना इस्तीफा भेज दिया था। नीतीश कुमार ने भी 1990 में असम में गैसल ट्रेन दुर्घटना की जवाबदारी लेते हुए इस्तीफा दे दिया था। तब 290 लोगों की मौत हुई थी। ममता बनर्जी ने सन् 2000 में दो ट्रेन की दुर्घटना में इस्तीफा दे दिया था। अटल जी ने उनका इस्तीफा नहीं स्वीकारे थे। एनडीए सरकार में रेल मंत्री रहे सुरेश प्रभु ने 2017 में दो रेल हादसे पर इस्तीफा दे दिया था। पीएम मोदी ने नहीं स्वीकारा।

Wednesday, May 17, 2023

हिन्दुत्व की चुनावी लड़ाई बीजेपी के काम नहीं आई

कर्नाटक में हिन्दुत्व की चुनावी लड़ाई मोदी के काम नहीं आई। इसी के साथ बीजेपी के लिए दक्षिण का प्रवेश द्वार बंद हो गया। इसी साल तीन राज्यों में होने वाले चुनाव से बेहिसाब बेचैनी बीजेपी के लिए बढ़ गयी। मोदी और अमितशाह को चुनाव के बड़े रणनीतिकार बताया जाता था लेकिन ंपजाब हिमाचल प्रदेश के बाद कर्नाटक में हार से स्पष्ट है कि मोदी का सियासी बाजार में रेट गिर गया है । 0 रमेश कुमार ‘रिपु’ लोकतंत्र में हर बार चुनाव में एक ही कार्ड काम नहीं करता। बीजेपी को लगता है कि हिन्दुत्व कार्ड उसके जीत के लिए ट्रंप कार्ड है। कर्नाटक चुनाव में मोदी ने बजरंगदल को बजरंग बली से जोड़कर चुनाव को हिन्दुत्व का रंग देने पूरी ताकत लगा दी। प्रदेश भर में बीजेपी हनुमान चालीसा पढ़ने लगी। मोदी ने पच्चीस किलोमीटर का रोड शो भी किया। लेकिन चुनाव परिणाम यही बताता है कि मोदी और अमित शाह का सियासी बाजार में रेट गिर गया है। मोदी की छवि के दम पर बीजेपी अब ढाई घर नहीं चल सकती। पजाब हिमाचल प्रदेश हारने के बाद कर्नाटक जिसे दक्षिण का सियासी द्वार कहा जाता है, वो बीजेपी के लिए बंद हो गया है। बीजेपी का पश्चिम बंगाल से भी बदतर प्रदर्शन था कर्नाटक में। पश्विम बंगाल में अस्सी सीट और कर्नाटक में 64 सीट पाकर कमजोर विपक्ष की भूमिका में बीजेपी रहेगी। यह कह सकते हैं कि मोदी के नारे की हवा अब निकलने लगी है। कांग्रेस मुक्त भारत की। छह माह बाद तेलंगाना में चुनाव होना है। वहां बीजेपी वैसे ही कमजोर है। क्या यह मान लिया जाए कि मोदी की लीडरशिप कर्नाटक में नहीं चली। डबल इंजन सिर्फ दिल्ली में काम करता है। वो और उनकी सरकार कर्नाटक में फेल हो गए। इस बार बीजेपी अपने चुनावी बयान से मतदाताओं को ज्यादा नाराज किया। जैसा कि विजयनगर में मोदी ने कहा आज हनुमान जी की इस पवित्र भूमि को नमन करना मेरा बहुत बड़ा सौभाग्य है और दुर्भाग्य देखिए। मैं आज जब यहां हनुमान जी को नमन करने आया हूं उसी समय कांग्रेस पार्टी ने अपने मेनिफेस्टो में बजरंगबली को ताले में बंद करने का निर्णय लिया है। कांग्रेस पार्टी को प्रभु श्री राम से भी तकलीफ होती थी और अब जय बजरंगबली बोलने वालों से भी तकलीफ हो रही है। मोदी धार्मिक धु्रवीकरण करने की कोशिश की। उन्हें उम्मीद थी इससे भगवा छतरी तन जाएगी। भ्रष्टाचार - मोदी हर आम सभा में यही कहते रहे कि सारे भ्रष्टाचारी विपक्ष एक हो गए है। लेकिन वे अपने मुख्यमंत्री के भ्रष्टाचार की अनदेखी किए। बीजेपी की हार के कारणों में एक कारण यह भी था। कांग्रेस ने शुरुआत से ही भाजपा के खिलाफ 40 फीसदी कमीशन लेने वाली सरकार को प्रचारित किया। एस.ईश्वरप्पा को भ्रष्टाचार के मुद्दे पर मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था और बीजेपी के एक विधायक को जेल जाना पड़ा था। राज्य के ठेकेदार संघ ने इसकी शिकायत पी.एम मोदी से भी की थी। लेकिन शिकायत को उन्होंने तरजीह नहीं दी। चुनाव में काग्रेस ने इसे मुद्दा बनाकर बीजेपी के गले की फांस बना दिया। सियासी समीकरण - बीजेपी जिनके दम पर चुनाव जीतने का दम भर रही थी,उन्हें ही ठीक से नहंी जोड़ पाई। बीजेपी अपने कोर वोट बैंक लिंगायत समुदाय को अपने पास न रख सकी और न ही दलित आदिवासी ओबीसी और वोक्कालिंग समुदायों का भरोसा बन सकी। दूसरी ओर कांग्रेस मुसलमानों दलितों और ओबीसी के अलावा लिंगायत समुदाय के वोट बैंक में सेंध लगाने में सफल रही है। पुराना मौसूर वोक्कालिंगा का गढ़ है। यहां जेडीएस मजबूत है यही माना जा रहा था। क्यों कि पिछले दफा 58 सीटों में सबसे अधिक 24 सीट जेडीएस को,कांग्रेस को 18 और बीजेपी को 15 सीट मिली थी। इस बार पासा बदल गया। बोम्मई सरकार ने चुनाव से पहले मुसलमानों के लिए चार फीसदी कोटा समाप्त कर दिया था। जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने आगामी सरकार तक यथावत बनाए रखने का आदेश दिया। जाहिर है मुसलमानों ने बीजेपी को नकार दिया। धु्रवीकरण काम नहीं आया - कर्नाटक में एक साल से बीजेपी नेता हलाला हिजाब से लेकर अजान तक का मुद्दा उठा रहे हैं। हिजाब टीपू सुल्तान कम्युनल वॉयलेंस और करप्शन. कर्नाटक का पूरा चुनाव इन्हीं मुद्दों के इर्द.गिर्द रहा। उडुपी जहां से हिजाब विवाद शुरू हुआ। मेलकोटे जहां टीपू सुल्तान के आदेश पर 800 ब्राह्मणों की हत्या का दावा किया जाता है। श्रीरंगपटना जहां की जामिया मस्जिद के बारे में दावा है कि इसे टीपू सुल्तान ने हनुमान मंदिर तोड़कर बनवाया था। रामनगर जिसे दक्षिण की अयोध्या कहा जाता है बीजेपी सरकार ने यहां भव्य राम मंदिर बनाने का वादा किया। इसके अलावा वोक्कालिंगा वोटरों को साधने के लिए मोदी ने बेंगलूरु के संस्थापक कैपेगौड़ा की एयरपोर्ट के सामने 108 फीट की प्रतिमा का लोकार्पण किया था। वोक्कालिंगा के धर्म गुरू निर्मलानंद स्वामी से अमितशाह की भेंट को बीजेपी सियासी फायदा से जोड़ ली। इस जाति का आरक्ष्ण दो फीसदी बढ़ा दिया गया है। बावजूद इसके धु्रवीकरण काम नहीं आया। दिग्गज नेताओं को किनारे किया - बीजेपी ने भले ही येदियुरप्पा की जगह बसवराज बोम्मई को मुख्यमंत्री बनाया हो लेकिन सी.एम की कुर्सी पर रहने के बावजूद बोम्मई का कोई खास प्रभाव नहीं पड़ा। जबकि कांग्रेस के पास डी.के शिवकुमार और सिद्धारमैया जैसे मजबूत चेहरे थे। बोम्मई को आगे खड़ा करना भाजपा को महंगा पड़ा। कर्नाटक में बीजेपी को खड़ा करने में अहम भूमिका निभाने वाले पूर्व मुख्यमंत्री बी.एस येदियुरप्पा को बीजपी ने साइड में कर दिया। चुनाव प्रचार की कमान वोक्कालिंगा के केन्द्रीय मंत्री शोभा करंदलाजे के पास थी। पूर्व मुख्यमंत्री जगदीश शेट्टार और पूर्व डिप्टी सीएम लक्ष्मण सावदी को भाजपा ने टिकट नहीं दिया। जबकि दोनों नेता कांग्रेस में शामिल हो गए और मैदान में उतर गए। येदियुरप्पा, शेट्टार, सावदी तीनों ही लिंगायत समुदाय के बड़े नेता माने जाते हैं। जिन्हें नजर अंदाज करना बीजेपी के हित में नहीं था। सत्ता विरोधी लहर - कांग्रेस सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार के सवाल पर बोम्मई सरकार को घेरी। चालीस फीसदी कमीशन की सरकार का स्लोगन देकर कांग्रेस ने बीजेपी के नाक में दम लगा दिया। भारत जोड़ो यात्रा में राहुल गांधी लंबे समय तक कर्नाटक में ही रहे। इसका प्रभाव जनता में काफी देखा गया है। कांग्रेस अघ्यक्ष मल्ल्किार्जुन खड़गे दलित वोटरों को लुभाने में लगे हैं। प्रदेश अध्यक्ष डी.के. शिवाकुमार खुद वोक्कालिंगा जाति से हैं और सिद्धरमैया पिछड़ी जाति कोरुबा से है। दोनों ने मतभेद भुलाकर कांग्रेस का प्रचार किया। राज्य में सत्ता विरोधी लहर चली जिसे बीजेपी नियंत्रित नहंी कर सकी। बहरहाल कर्नाटक में हिन्दुत्व की चुनावी लड़ाई मोदी के काम नहीं आई। इसी के साथ
लिए दक्षिण का प्रवेश द्वार बंद हो गया। इसी साल तीन राज्यों में होने वाले चुनाव से बेहिसाब बेचैनी बीजेपी के लिए बढ़ गयी। मोदी और अमितशाह को चुनाव के बड़े रणनीतिकार बताया जाता था लेकिन ंपजाब हिमाचल प्रदेश के बाद कर्नाटक में हार से स्पष्ट है कि मोदी का सियासी बाजार में रेट गिर गया है ।