Saturday, September 11, 2021

राजेन्द्र की सियासत का बी प्लान



🍙रीवा में बीजेपी ओबीसी प्रत्याशी देगी
🍙जनार्दन सेमरिया से चुनाव लड़ेंगे
🍙राजेन्द्र की टिकट फंस गई

रीवा। राजेन्द्र शुक्ला अभी से अपनी सियासत के बी प्लान को अंजाम देने में जुट गये हैं। बीजेपी चूंकि ओबीसी को तरजीह देने की सियासत में लगी है। ऐसी स्थिति में राजेन्द्र जानते हैं, अगली दफा रीवा विधान सभा से उन्हें टिकट नहीं मिलेगी। वोटर की संख्या के अनुसार रीवा में अगले विधान सभा चुनाव तक ओबीसी यानी मुस्लिम वोटरों की संख्या 27 हजार हो जाएगी। जाहिर है कि रीवा से मुस्लिम दावेदार खड़े होंगे। पटेल उम्मीदवार अभी से तैयारी कर रहे हैं। राजेन्द्र लोकसभा चुनाव लड़ने की चर्चा गत माह संघ के एक पदाधिकारी से की है।(जो कि मेरे मित्र हैं)। वे चाहते हैं कि सेमरिया विधान सभा से जनार्दन चुनाव लड़ें।

राजेन्द्र शुक्ला इस समय अपनी सुरक्षित सीट के लिए गुणा भाग करने में लगे हैं। गत माह वे सघ के एक पदाधिकारी से मिले। उन्हें अपनी सियासत का बी प्लान बताया। उनके अनुसार जनार्दन मिश्रा को सेमरिया विधान सभा से चुनाव लड़ा दिया जाए। यदि जीत गये तो ठीक। हारने पर उनका लोकसभा का दावा कट जायेगा। जो व्यक्ति विधान सभा चुनाव नहीं जीत सका, वो लोकसभा चुनाव कैसे जीत सकता है!

🍙अजय अभी से तैयारी में
रीवा में बीजेपी अध्यक्ष अजय सिंह पटेल हैं। जो कि राजेन्द्र की पसंद के नहीं है। राजेन्द्र अपनी पूरी ताकत लगा दिये थे, कि अजय सिंह पटेल बीजेपी के जिला अध्यक्ष न  बनें। वे जानते हैं अजय उनकी सियासत की राह में कंटक हैं। वे रीवा विधान सभा चुनाव लड़ने की अपनी गोटी अभी से बिछाने लगे हैं। विधान सभा नहीं तो लोकसभा की टिकट चाहिए ही। ऐसे में राजेन्द्र और जनार्दन दोनों की राह में अजय सबसे बड़े कंटक हैं। जर्नादन को हटाने सिंधियों ने राजेन्द्र को सलाह दी है। समदड़िया इस बार उनके चुनाव का सारा मैनेेजमेंट देखेगा। जनार्दन अपनी सीट कैसे बचायेंगे,उनकी सियासत भी नहीं जानती। वैसे जनार्दन अभी तक राजेन्द्र को बड़ा महत्व देते आये हैं। लेकिन राजेन्द्र कभी भी उन्हें तरजीह नहीं दिये। यानी अगले चुनाव तक राजेन्द्र और जनार्दन में 63 नहीं 36 का सियासी रिश्ता बन जायेगा।

🍙बस कुछ दिन और..
रीवा विधान सभा पर सबकी नजर है। बीजेपी के कई विधायक और नेता राजेन्द्र की राजनीति को  खत्म करने का जाल बुनने लगे हैं। नरोत्तम मिश्रा वैसे भी राजेन्द्र को पसंद नहीं करते। वे उनकी राजनीति को खत्म करने के लिए ही गिरीश गौतम को विधान सभा अध्यक्ष बनाने में अपनी हर कोशिश को अंजाम दिया। जब तक शिवराज हैं, तभी तक राजेन्द्र बिना मंत्री के मंत्री की भूमिका का शो चला रहे हैं। वैसे शिवराज का हटना सौ फीसदी तय है।

🍙प्रदीप कंटक बनेंगे राजेन्द्र के
सबसे बड़ा सवाल यह है कि राजेन्द्र रीवा छोड़ेंगे या फिर कोई दूसरा विधान सभा तलाशेंगे। मऊगंज के अलावा उनके पास कोई विकल्प नहीं है। प्रदीप सिंह पटेल के बीजेपी छोड़ने की ज्यादा संभावना है। सूत्रों कहना है कि वे बीएसपी से लोकसभा चुनाव लड़ेंगे। बीजेपी में आने के बाद उन्हें कुछ भी नहीं मिला,जिसकी उन्हें अपेक्षा थी। जिले में उन्हें एक ट्रांसफार्मर के लिए धरना देना और अनशन करने के बाद भी उनकी नहीं सुनी जाने से वो नाराज है। उनके समर्थक कहते हैं, कि इसके पीछे राजेन्द्र का हाथ है। लोकसभा यदि राजेन्द्र चुनाव लड़ते हैं तो उन्हें शिकस्त देने प्रदीप बीएसपी से चुनाव लड़ेगे। वैसे भी प्रदीप इसके पहले बीएसपी के संभागीय संगठन मंत्री रह चुके हैं।
बहरहाल राजेन्द्र की सियासत का प्लान बी सामने आ जाने से एक नई सियासी रणनीति भी बनने लगी है। शेष अगली बार। 
@रमेश कुमार "रिपु"

 

हाथ से नहीं फिसली सत्ता’’






सियासत की जमीं पर आशंकाओं की उड़ती धूल के बैठते ही एक बात साफ हो गई, कि पाँच राज्यों के चुनाव होने तक भूपेश बघेल के हाथ में ही सत्ता की कमान रहेगी। वे राजनीति में अर्द्धविराम साबित नहीं होंगे।
0 रमेश तिवारी ‘रिपु’
छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सियासी टेबल पर ढाई साल बीतते ही ‘‘पंजा’’ लड़ाने की सियासत अचानक तेज हो गई। जून में मुख्यमंत्री बदलने की हवा चली। लेकिन परिवर्तन की हवा में तब्दील नहीं हुई। फिर अगस्त-सितम्बर में टी.एस सिंह देव ने परिवर्तन की बात कहकर कांगे्रस में खलबली मचा दिये। दस जनपथ इसके लिए तैयार नहीं हुआ। और इसी के साथ मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की सत्ताई सियासत अल्पविराम साबित नहीं हुई। यह अलग बात है कि उनके हाथ से सत्ता की डोर खींचने की सियासत रायपुर से दिल्ली तक दौड़ धूप करने वालों की भारी भद्द हुई।
टी.एस सिंह देव के सलाहकार उन्हें यह बात नहीं समझा सके, कि राजनीति में कोई भी वायदा वक्त के साथ बदल जाता है। राजनीति कोई बीजगणित का सवाल नहीं है, कि सूत्र से हल होता है। छत्तीसगढ़ कांग्रेस की राजनीति राजस्थान और पंजाब के सांचे में नहीं ढलेगी। इसकी वजह यह है, कि भूपेश बघेल के साथ 70 में 52 विधायक हैं। टी.एस सिंह देव अब ज्योतिरादित्य सिंधिया की भूमिका चाहकर भी नहीं निभा सकते। यह बात भूपेश के समर्थन में दिल्ली जाने वाले विधायकों की संख्या बल ने स्पष्ट कर दिया। छत्तीसगढ़ प्रभारी पी.एल पुनिया की पहली पसंद पहले से भूपेश बघेल रहे हैं। दस जनपथ भी छत्तीसगढ़ की राजनीति पर कोई फैसला लेने से पहले पीएल पुनिया की राय को नजर अंदाज नहीं कर सका। ढाई साल की सत्ताई राजनीति में भूपेश बघेल ने संगठन से लेकर दस जनपथ और मीडिया के बीच अपनी ऐसी छाप बना ली कि उस फ्रेम में दूसरा कोई फिट होता दस जनपथ को भी नहीं दिखा।
पाँंच अन्य राज्यों में गोवा,मणिपुर,पंजाब,यूपी और उत्तराखंड होने वाले चुनाव से पहले छत्तीसगढ़ की राजनीतिक नेतृत्च को दस जनपथ के बदल देने से विपक्ष को मुद्दा मिल जाता और  चुनावी औजार भी। चूंकि केन्द्र सरकार इस समय ओबीसी की राजनीति को हवा दिये हुए है। भूपेश बघेल ओबीसी नेता हैं। जाहिर सी बात है कि दस जनपथ ओबीसी नेता भूपेश बघेल के हाथ से सत्ता का हस्तांतरण सवर्ण के हाथ में करने की भूल नहीं करेगा। वैसे भी संगठन में निगम मंडल में सारे लोग भूपेश के समर्थक हैं। ऐसे में बाबा ये सोच कैसे लिए कि दस जनपथ और विधायक उन्हें मुख्यमंत्री बनाने की वकालत करेंगे!

ढाई साल में भूपेश बघेल ने न केवल राज्य में काम किये बल्कि कांग्रेस के संगठन और निगम मंडल पर अपने लोगों को बिठाकर अपनी ताकत बढ़ाई। बाबा बीच- बीच में सरकार पर चोट करने वाले बयान देकर भूपेश बघेल को परेशान करने की कोशिश किए। उसके बदले में उन्हें राजनीतिक नुकसान भी उठाना पड़ा। जिसकी सत्ता होती है,उसके आईने में पत्थर फेकने वालों को आईने की खरोच तो मिलेगी ही। बाबा काग्रेस के वरिष्ठ नेता हैं लेकिन, ढाई साल की सत्ता में वो विधायकों को अपना नहीं बना सके।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि अब बाबा क्या करेंगे? उनकी राजनीति का स्वास्थ्य ठीक रहेगा कि नहीं? मुख्य मंत्री क्या उन्हें और बाएं करेंगे? बाबा कब तक चुप रहेंगे? क्या पांच राज्यों के चुनाव के बाद बाबा फिर दस जनपथ की दौड़ लगायेंगे? हर राजनीतिक व्यक्ति की महत्वाकांक्षा होती है। बाबा भी अपने नाम के साथ मुख्यमंत्री नाम की चाह रखते हैं। हो सकता है कि पांच राज्यों के चुनाव के बाद बाबा को राष्ट्रीय महासचिव या फिर किसी राज्य का प्रभारी बना दिया जाये। बहरहाल,भूपेश की सत्ताई राजनीति की शाम नहीं हुई।



 

 

Tuesday, August 31, 2021

भूपेश की सत्ताई राजनीति की शाम नहीं हुई..



रायपुर। सत्ताई सियासत में भूपेश बघेल अल्पविराम साबित नहीं हुए। लेकिन उनके हाथ से सत्ता की डोर खींचने की सियासत रायपुर से दिल्ली तक दौड़ धूप करने वालों की भारी भद्द हुई। राजनीति में कोई भी वायदा वक्त के साथ बदलता रहता। राजनीति कोई बीजगणित का सवाल नहीं है, कि सूत्र से हल होता है। छत्तीसगढ़ कांग्रेस की राजनीति राजस्थान और पंजाब के सांचे में नहीं ढलेगी। इसकी वजह यह है, कि भूपेश बघेल के साथ 70 में 52 विधायक हैं। टी.एस सिंह देव अब ज्योतिरादित्य सिंधिया की भूमिका चाहकर भी, नहीं निभा सकते। यह बात भूपेश के समर्थन में दिल्ली जाने वाले विधायकों की संख्या बल ने स्पष्ट कर दिया। छत्तीसगढ़ प्रभारी पीएल पुनिया की पहली पसंद पहले से भूपेश बघेल रहे हैं। दस जनपथ भी छत्तीसगढ़ की राजनीति पर कोई फैसला लेने से पहले पीएल पुनिया की राय को नजर अंदाज नहीं कर सकता। ढाई साल की सत्ताई राजनीति में भूपेश बघेल ने संगठन से लेकर दस जनपथ और मीडिया के बीच अपनी ऐसी छाप बना ली, कि उस फ्रेम में दूसरा कोई फिट होता ,दस जनपथ को भी नहीं दिखा।

पांच अन्य राज्यों में गोवा,मणिपुर,पंजाब,यूपी और उत्तराखंड होने वाले चुनाव से पहले छत्तीसगढ़ की राजनीतिक नेतृत्च को दस जनपथ के बदल देने से विपक्ष को मुद्दा मिल जाता और  चुनावी औजार भी। चूंकि केन्द्र सरकार इस समय ओबीसी की राजनीति को हवा दिये हुए है। भूपेश बघेल ओबीसी नेता हैं। जाहिर सी बात है कि दस जनपथ ओबीसी नेता भूपेश बघेल के  हाथ से सत्ता का हस्तांतरण सवर्ण के हाथ में करने की भूल नहीं करेगा। वैसे भी संगठन में,निगम मंडल में सारे लोग भूपेश के समर्थक हैं। ऐसे में बाबा ये सोच कैसे लिए, कि दस जनपथ और विधायक उन्हें मुख्यमंत्री बनाने की वकालत करेंगे!

ढाई साल में भूपेश बघेल ने न केवल राज्य में काम किये बल्कि कांग्रेस के संगठन और निगम मंडल पर अपने लोगों को बिठाकर अपनी ताकत बढ़ाई। बाबा बीच- बीच में सरकार पर चोट करने वाले बयान देकर भूपेश बघेल को परेशान करने की कोशिश किए। उसके बदले में उन्हें राजनीतिक नुकसान भी उठाना पड़ा। जिसकी सत्ता होती है,उसके आईने में पत्थर फेकने वालों को आईने की खरोच तो मिलेगी ही।बाबा काग्रेस के वरिष्ठ नेता हैं, लेकिन ढाई साल की सत्ता में वो विधायकों को अपना नहीं बना सके।

सबसे बड़ा सवाल यह है, कि अब बाबा क्या करेंगे? उनकी राजनीति का स्वास्थ्य ठीक रहेगा कि नहीं? मुख्य मंत्री क्या उन्हें और बाएं करेंगे? बाबा कब तक चुप रहेंगे? क्या पांच राज्यों के चुनाव के बाद बाबा फिर दस जनपथ की दौड़ लगायेंगे? हर राजनीतिक व्यक्ति की महत्वाकांक्षा होती है। बाबा भी अपने नाम के साथ मुख्यमंत्री नाम की चाह रखते हैं। लेकिन एक बात साफ है, कि ढाई साल का फार्मूला अब लागू नहीं हुआ, तो बाद में इसके लागू होने की संभावना कम ही बनती है। बहरहाल,भूपेश की सत्ताई राजनीति की शाम नहीं हुई।
@रमेश कुमार "रिपु"


‘बहेलिए’ के पंजे में आधी दुनिया



कथाकार अंकिता जैन रूढ़ नैतिकता की दीवार गिराने की कोशिश की है कहानी संग्रह बहेलिए के जरिए । ‘बहेलिए’ संग्रह में नौ कहानियांँ है। कहानी में समाज के वो बहेलिए हैं,जिनसे औरत के वजूद पर चोट पहुंँचती है। ये बहेलिए सिर्फ पुरुष ही नहीं,समाज की पुरानी मान्यताएं, परंपराएं,परिवार की महिलाएँं आदि हैं। ऐसे बहेलियों की चंगुल से बचने या फिर कैद से निकलने स्त्रियां चौकाने वाली राह चुनती हैं। वहीं हर कहानी सामाजिक परिवेश की दहलीज पर एक निशान छोड़ते हुए स्त्री की सोच को भी टटोलती है।

संग्रह की कुछ कहानियों से सवाल उठता है,कि आधी दुनिया की बौद्धिक और समझदार महिलाएंँ जानते हुए भी उस रास्ते पर क्यों चलती हैं,जिसकी कोई मंजिल नहीं है। लेखिका की स्त्रियांँ जानते हुए भी ऐसे प्रेम में पड़ती हैं,जो कभी मुकम्मल नहीं हो सकता। यानी गैर वाजिब है। स्त्री विमर्श का यह आधुनिक स्वरूप नैतिकता से परे है। क्यों कि ‘मजहब’ और ‘रैना बीती जाए’ की स्त्रियांँ एक विवादित प्रेम पथ को अंगीकार करती हैं।‘मजहब’ कहानी की नायिका मनोज चौरसिया की बेटी जूली घर में विरोध के बावजूद मुस्लिम लड़के के प्यार में पड़कर उसके बच्चे की माँं बन जाती है। रूढ़ नैतिकता के खिलाफ जाकर जूली बच्चे को जन्म देने का फैसला करती है। दूसरे शहर में अपनी पहचान छिपाकर नर्स की नौकरी करती है। मगर मजहबी दंगे में जूली की बेटी गंभीर रूप से घायल हो जाती है। हिन्दू-मुस्लिम की लड़ाई जूली का पीछा नहीं छोड़ते। उसकी बेटी दंगे में गंभीर रूप से घायल हो जाती है। और वह अपनी बेटी को बचाने आॅपरेशन थियेटर में चली जाती है। सवाल यह है कि जातीय वैमनस्यता के बहेलिए सिर्फ स्त्री के लिए ही क्यों?

अंकिताजैन की स्त्रियांँ क्या रूढ़ नैतिकता की विरोधी हैं, इसलिए घर,समाज के मूल्यों के खिलाफ चलती है अपनी नई रेखा खींचने के लिए? जैसा कि ‘रैना बीती जाए’ कहानी में मीरा अपने बाॅय फ्रेंड आकाश से सम्पूर्ण समर्पण चाहती है। लीव इन रिलेशन शिप में रहते हुए उसके माँ बनने पर आकाश अपनी परेशानी बताकर शादी से इंकार कर देता है। बिन ब्याही माँ मीरा दूसरे शहर में अपने प्रेम को,अपनी माता-पिता की लाज रखते हुए विधवा,अनाथ और ससुराल वालों की परित्यकता मां बताकर नौकरी कर लेती है। एक दिन बेटा मां से अपने पिता के बारे में पूछता है। वह पिता के प्यार से उसे वंचित नहीं रखने का फैसला करती है। दरअसल दाम्पत्य संबंध आपसी समझ और आत्मीयता पर आधारित होना चाहिए। मूड के हिसाब से जो प्रेमी समर्पण और देह का इस्तेमाल करता हो, उससे समय रहते अलग हो जाना ही स्त्रियों के लिए ठीक है।

प्रायश्चित और कन्यादान’दोनों भावनात्मक कहानी है। प्रायश्चित’ में एक बिगड़ैल पिता अपनी पत्नी की मौत के बाद बेटी के लिए बदल जाता है। क्यों कि, उसकी पत्नी चाहती थी,कि उसकी बेटी खूब पढ़ लिख कर अपने पैरों पर खड़ी हो। जबकि पत्नी की मौत के पहले तक पिता बेटी की उपेक्षा करता आया था। इंटर में बेटी के टाॅप करने पर उसे उसके स्टाॅफ में जो सम्मान मिला,उस एक पल की खुशी ने उसे बदल दिया। यानी जो पिता अपनी बेटी और पत्नी के सपनों का बहेलिया था,वह ग्लानी के सागर में डूब कर अच्छा पिता बन जाता है। घर वालों के समक्ष कहता है,उसकी बेटी जहां तक पढ़ेगी उसे पढ़ाएगा,अभी शादी नहीं करेगा।

कन्यादान कहानी में परिस्थिति वश मजदूर तेली जाति का बुजुर्ग पिता अपनी जवान बेटी की शादी अधेड़ विदुर ब्राम्हण भोला से नहीं करना चाहता। दुविधा में रहता है,कैसे अपनी बेटी को सारी बात बताए। बेटी उनकी परेशानी का सच उगलवा लेती है। लाचार पिता को खुशी देने बेटी अपनी बोली लगा आती है। वहीं एक पागल की मौत’ आज की घिनौनी राजनीति के सच का आईना है। ‘बंद खिड़कियां‘ गहरे जीवन के अनुभव की कहानी है। पढ़ी लिखी बहू पुरानी मान्यताओं को ढोने वाली सास के बंधन को विवेक से तोड़ती है। बहरहाल अकिता जैन की स्त्रियों में जीवन जीने की भरपूर चाह है। हर कहानी सामाजिक परिवेश की दहलीज पर एक सवालिया निशान छोड़ते हुए स्त्री की सोच को भी टटोलती है।
लेखक - अंकिता जैन
प्रकाशक - राजपाल
कीमत - 176 रुपए
@रमेश कुमार "रिपु"

स्त्री विमर्श की तीसरी आँख.


चन्द्रकांता जी की संकलित कहानियां में ,नूराबाई और गीताश्री की बलम कलकत्ता में औरत की बेबसी,सामाजिक चिंता,उसके मन के तहखाने के अंधेरे और उसकी दर्द की तहरीर कैसी है,देख रहा था। इन दोनों लेखिकाओं की स्त्री विमर्श की नब्ज को टटोलने पर उम्र और समय की धड़कन में भारी अंतर है। चन्द्रकांता जी की यह कहानी 2000 के पहले की जान पड़ती है और गीताश्री की बलम कलकत्ता साल दो साल पहले की। कहानी की भाषा चन्द्रकांता जी की ज्यादा सधी और पठनीय है। वहीं गीताश्री की कहानी की भाषा, आम बोलचाल की है। इनकी कहानी में पत्रकारिता की भाषा का पुट झलकता है।
इन दो लेखिकाओं की कहानी में एक आम औरत है। गरीब है। दूसरों के घरों में झाडू- पोंछा करती है। दोनों कहानी की नायिका की एक बेटी है। आदमी शराबी है। चन्द्रकांता जी की कहानी की नायिका अपनी बेटी को गंदी करने पर अपने देवर की हत्या कर देती है। गीताश्री की कहानी की नायिका भी अपने पति की पीड़ा सहती है,मगर वो नये जमाने की गरीब है। फिर भी नूराबाई और उसमें बहुत अंतर नहीं है। चूंकि नये जमाने की गरीब महिला है, इसलिए उसमें अपना भला किसमें है,उस पथ को चुनने की समझ है। अपने शराबी पति को छोड़ कर अपनी बेटी के होेने वाले पति के साथ कलकत्ता चले जाना बेहतर समझती है।
सवाल यह है,कि अजादी के बाद पढ़ी- लिखी फर्राटेदार अंग्रेेजी बोलने वाली लेखिकाओं ने महिलाओं को कहानी में इतना कमजोर क्यों बताती आ रही हैं? प्रेम चंद के दौर की महिलायें कब की मर गई हैं। हर गरीब महिला का पति शराबी ही क्यों है? वो दूसरों के यहां झाड़ू -पोछा करेगी,और उसका पति शराब पीने के लिए अपनी पत्नी का पैसा छीन लेगा। उस पर बुरी नजर कईयों की रहेगी। क्या ऐसी ही कहानियों से स्त्री विमर्श का पक्ष मजबूत होगा?
ऐसी कहानियाँ क्यों नहीं लिखती,जैसा मंच पर लेखिकायें बोलती हैं। झाडू- पोछा करने वाली गरीब महिला को अपने जैसा क्यों नहीं बताती। शराबी पति को छोड़ क्यों नहीं देती। एक तरफ पितृसत्ता को गरियाती हैं। लेकिन अपनी कहानी की नायिकाओं की सोच नहीं बदलती? सोच बदलें, तो देश बदले। आधी दुनिया का ढांचा बदले। ऐसा लगता है, कि गरीबी की बेबसी पर लिखने से ज्यादा प्रशंसा मिलती है। वहीं सरकार मानती है, कि गरीबी अब वैसी नहीं है,जैसे प्रेमचंद के जमाने में थी।
आखिर कब तक कहानियों में गरीब महिला की बेबेसी,को ओर उसे दोयम दर्जे का दिखाया जायेगा! यह चलन बंद होना चाहिए। सलीम-जावेद की कहानियों में एक मुस्लिम पात्र जरूर होगा। वह बहुत ही इनायत मन का होगा। ब्राम्हण और बनिया कमीने होंगे। जबकि वास्तविक जीवन में इसके विपरीत है।
अखबार की खबरें बताती हैं, कि गरीब महिला जिससे इश्क करती है,उसका पति शराबी और निकम्मा होने पर वह किसी और से प्यार करके उसके साथ भाग जाती है या फिर अपने पति को प्रेमी के साथ मिलकर रास्ते से हटा देती है। इश्क के रंगों के साथ गरीबी का भी रंग बदला है। महिलायें रूढ़ नैतिकता की दीवार गिराने में अब आगे-आगे हैं। लक्ष्मण रेखा को पार करके अपनी एक अलग पहचान बनाना चाहती हैं। गीताश्री के जैसी कहानियांँ स्त्री को पुरुष के साथ खड़ा होने से रोकती हैं। स्त्री-पुरुष के दाम्पत्य जीवन की आकांक्षाओं के विपरीत तस्वीर बनाती हैं, ऐसी कहानियां। गरीबी में भी स्त्री और पुरुष के बीच प्रेम का सम्पूर्ण प्रतिदान एक दूसरे के प्रति होना ही स्त्री विमर्श की सार्थकता है। स्त्री जाति की पूरी अस्मिता के बारे में नई लेखिकाओं को सोचना चाहिए। स्त्री विमर्श की तीसरी आँख


से आधी दुनिया को देखने का आगाज कब होगा..!
@रमेश कुमार "रिपु"

 

नैतिकता की सघंनता.


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भावुकता और नैतिकता से गुजरती गिरीश पंकज की कहानियांँ को पढ़ना गहन अनुभूति से गुजरने जैसा है। कहानी संग्रह ‘काॅल गर्ल की बेटी’ पाठक के अंतर्मन को झकझोर देती है। इस किताब का नाम ‘काॅल गर्ल की बेटी’ होने से आम पाठक के मन में किताब को लेकर कई संदेह हो सकते हैं। लेकिन ‘काॅल गर्ल की बैटी‘ में एक माॅ के संघर्ष की कथा है। 'काॅल गर्ल'न केवल अपना सपना पूरा करती है बल्कि, अपनी बेटी को ऊॅचे मुकाम तक पहुँचाती है। कहानी बताती है, कि इच्छा शक्ति से बड़ी, कोई दूसरी ताकत नहीं होती।

सग्रह में 25 कहानियाॅं है। सभी कहानियों में नैतिकता, इंसानियत, अपनत्व, सांस्कृतिक मूल्य और मर्यादा का संदेश है। जो आदमी को इंसान बनाने का मार्ग प्रशस्त करते हैं। कहानियों की भाषा घुमावदार नहीं है। हर कहानी अपनी बात सहज और सीधे तरीके से कहती है। इन कहानियों में 21 वीं सदी के छल,प्रपंच और अपने स्वार्थ के लिए नैतिक मूल्यों को दरकिनार करने की भयावहता का अक्स कई परतों में देखने को मिलता है। नये दौर में आज की पीढ़ी की मनोवृति पर चोट करते हुए और समाज में नैतिकता की क्षीण होती भूमिका पर कई कहानियों में रोष देखा गया है। ‘ज्ञान का पिटारा’ से पता चलता है, कि नेताओं के कथनी और करनी में कितना अंतर होता है। समाज में सांस्कृतिक पतन के लिए यही दोषी हैं। बच्चों को शिक्षा प्रद फिल्म बनाने की बात संस्कृति विभाग करता है। मगर रिश्वत के वह किसी को बजट नहीं देता।

‘स्वप्न भंग’ व्यंग्य शैली में है। सियासी व्यक्ति को कुर्सी मिलने पर सेवाराम से मिठाई लाल बनने की कथा है। यह लोकतंत्रीय व्यवस्था पर कटाक्ष है। ‘मै यही रहूॅंगा’ एक भावनात्मक कहानी है। खुदगर्ज बेटों की कभी बुराई पिता नहीं करते। वहीं बड़ा पैकेज पाने वाले बेटे कभी पलट कर नहीं देखते, कि उनके माता-पिता किस हाल में हैं। बुजुर्ग अभिभावकों के मन की पीड़ा और उनके भाव को कहानी में चित्रित किया गया है।

गिरीश पंकज की कहानियांँ संवेदनाओं की भट्टी में तपी हुई हैं। इसीलिए विविध भावबोध हैं। ‘देवता’ कहानी में इंसानियत के लय और ताल की भावनाएं है। दोस्ती में खटास हमेशा पैसे से आती है। यदि दो लोगों में एक का मन साफ हो, तो किसी न किसी मोड़ पर सामने वाले का मन भी बदल जाता है।

बूढ़ों का गाँव’ संग्रह की यह कहानी मन को छू लेती है। गाँव को नजर लगती नहीं,बल्कि लगाने वाले आते हैं। विकास के सपने दिखाना और जमीन के बदले मुआवजा का लालच देकर रिश्ते में अलगाववाद का बीज हर गांँव में बोया जा रहा है। नई और पुरानी पीढ़ी के बीच कैसे तनाव की सड़कें बनती है, बताती है कहानी।

बेटी मेरा अभिमान है,कहना बड़ा सहज है। लेकिन टी.वी में रेप की घटनायें किसी भी मांँ की मनोदशा पर विपरीत असर डालते हैं। बेटी होने का डर, क्या होता है सिर्फ माॅ समझती है। एक माॅं क्यों नहीं चाहती बेटी, उसके डर को उकेरा गया है ‘नहीं चाहिए बेटी में’।
सेवा आश्रम’ में एक संदेश है। पढ़ाई-लिखाई का तभी महत्व है जब उसका सदुपयोग समाज की भलाई में किया जाये। एक कुष्ठ रोगी स्वयं ठीक होने के बाद अपने गाॅव में दूसरों के उपचार के लिए सेवाश्रम खोलता है।

‘नया बनवारी,सबला,बुराई का अंत,असली वारिस,कानून का कमाल,आजादी आदि कहानियाँ लोगों की भावनाओं को जाहिर करते हुए एक दूसरे से जोड़ती हैं। सभी कहानियों में अलग-अलग पृष्ठभूमि के पात्र हैं। गिरीश पंकज की कहानियों के केन्द्र में समाज में फैली विसंगतियों की वजह के साथ ही,उसके निदान की ओर इशारा भी करती हैं। कहानियों में मनुष्य की प्रवृतियों के हर पहलू पर चिंता जताई गई है। कहानियों के पात्र और उनकी परिस्थितियांँ सहज और सरल है,उनकी भीतरी जटिलताओं को उभारने का ईमानदार प्रयत्न किया गया है। यह कहानी संग्रह समाज में नकारात्मक सोच और विचार के वे लोग,जो नैतिकता और इंसानियत को नहीं मानते, उन्हें सचेत करती है, कि समाज के नैतिक मूल्यों की अनदेखी करेंगे तो उसका अंजाम विस्फोटक होगा। किताब में प्रूफ की गलतियांँ खटकती है। नैतिकता और सामाजिक मूल्यों को तरजीह देने वाले पाठकों को यह किताब पसन्द आएगी।
लेखक- गिरीश पंकज
प्रकाशक-इंडिया नेट बुक्स
कीमत -250 रुपये
@रमेश कुमार "रिपु"

एक उदास कहानी



बनारस कभी सोता नहीं। लेकिन, अक्टूबर जंक्शन में कथा का नायक सदा के लिए सो जाता है। नये जमाने में ‘गुनाहों का देवता’ की कथा कैसी होगी,उसकी कार्बन काॅपी है ‘‘अक्टूबर जंक्शन’’। लेकिन कथा में मुहब्बत की वो तासीर नहीं है,जो गुनाहों का देवता में है। कहीं भी मुहब्बत का दर्द नहीं छलकता। अलबता कामूकता के लिबास में लिपटे कई पन्ने हैं। पूरी कथा में लेखक ने न कथा के नायक के मन में और न ही नायिका के मन में, मुहब्बत का नर्म एहसास कराया। लेकिन 150 पेज की कथा में नायक की जिन्दगी के ऐसे पन्ने है,जो पाठक को बेचैन करते हैं। गुस्सा दिलाते है। उसका मन करता है कि दिव्य प्रकाश को फोन लगाकर बोले कि, कौन सी फिलासफी लिखी है। बहुत सारे पाठक इस किताब को अधा पढ़कर छोड़ भी सकते हैं। जो पढ़ लेंगे, वो दिव्य प्रकाश को बहुत अच्छा बोलने की गुस्ताखी नहीं करेंगे।

दिव्य प्रकाश स्वयं कहानी के अंत में स्वीकारते हैं कि, लेखक नहीं चाहता कि कुछ कहानियां पूरी हो। इसलिए कि कहानियां पूरी होने पर दिल दिमाग उंगलियों से हट जाती है। वे मानते हैं कि, अधूरी कहानियांँ होने से पाठक और लेखक की उंगलियाँं उसे बार बार छूती हैं। उदासियों के लिहाफ को कौन छूता है भाई? उदास कर देने वाली यह एक ऐसी किताब है जिसमें, 80 पेज पढ़ने के बाद पाठक यह समझता है कि, इस कहानी का अंत ऐसा कुछ होगा। लेकिन जबरिया कहानी को धर्मवीर भारती के गुनाहों का देवता की कार्बन काॅपी बना देने से हैरानी होती है।

धर्मवीर भारती में सुधा और चंदर नहीं मिल पाते। सुधा मर जाती है। अक्टूबर जंक्शन में कथा का नायक सुदीप मर जाता है और चित्रा उसकी पत्नी बनते बनते रह जाती है। दोनों के बीच मुहब्बत की खुशबू नहीं है, मन की चाहत भी नहीं है। फकत देह का आकर्षण है। चूंकि कहानी नये जमाने की है, जाहिर सी बात है कि, कथा का नायक सुदीप और नायिक चित्रा पाठक दोनों को देह कीे मुहब्बत से इतराज नहीं है। क्यों कि, चित्रा नये जमाने की लड़की है। उसके भी शरीर की अपनी जरूरतें है,जो किसी के भी साथ सोकर पूरा कर लेती है। और सफलता की सीढ़ी पर चढ़ने के लिए सब कुछ करने में माहिर है। चित्रा तलाकशुदा है। चित्रा की मुलाकात बनारस में सुदीप से होती है। दोनों एक दूसरे से अपरिचित हैं। सुदीप पैसे वाला है। एक कंपनी में उसका अपना शेयर है। अखबारों के लिए लिखता भी है। आज कल के लड़के जैसे होते हैं,उससे जुदा नहीं है। सुदीप से मुलाकात के दौरान चित्रा बताती है कि वो एक कहानी की तलाश में है।

अक्टूबर जंक्शन को पढ़ने से यही लगता है कि, लेखक इसका नाम दिल्ली जंक्शन,बनारस घाट या फिर मुंबई जक्शन भी रख देते, तो कोई फर्क न पड़ता। इसमें हर बात एक साल बाद अक्टूबर में ही होती है। इस कहानी को पढ़ते पढ़ते यही लगता है कि, लेखक जिन जिन शहरों में गए, जिनसे मिले,उनसे बातें क्या हुई,उसे कहानी में उतार दिया हैं। लेखन में प्रवाह है। टूटन नहीं है। भाषा शैली कई जगह मोहक है। जिस तरह चित्रा कहानी तलाश रही है,उसी तरह पाठक भी पढ़ते वक्त तलाशेगा कि इस किताब की कहानी क्या है? इस किताब में खुली कामुकता और सौन्दर्य है।

नये जमाने के कथाकार अपने तरीके से अफसाने गढ़ते हैं। लेकिन ऐसा बहुत कम होता है कि, उनकी कथा नई हो। पुरानी बोतल में नई शराब की परिपाटी से आज के कई कथाकार निकलना ही नहीं चाहते। चोरी चोरी फिल्म और दिल है कि, मानता नहीं,दोनों की पटकथा एक सी है। सिर्फ फिल्मांकन नए तरीके से किया गया है। दिव्य प्रकाश दुबे की अक्टूबर जंक्शन की कथा डाॅ धर्म भारतीय की गुनाहों का देवता का बदला स्वरूप है। कहानी बनारस से शुरू होती है, और बनारस में ही खत्म हो जाती है।

चित्रा कहानी तलाश रही है बनारस में। सुदीप से मुलाकात होती है। मुलाकात दोस्ती में बदल जाती है। सुदीप से प्यार करती है भी, और नहीं भी। सुदीप उसे बताता है कि, उसकी एक गर्ल फ्रेंड है सुनयना। वो उसी से शादी करेगा। बावजूद इसके सुदीप और चित्रा दोनों दैहिक प्यार पति पत्नी की तरह करते हैं। सुदीप की चित्रा के प्रति दिलचस्पी क्यों है,लेखक यह कहीं भी नहीं बताया। फिर भी उसके लिए वो हवाई जहाज की टिकट बुक कराते रहता है। उसकी इच्छा होती है, उससे मिलने की या फिर चाहता है कि, वो उससे मिले, तो उसके लिए हवाई जहाज का टिकट बुक करा देता है। चित्रा आर्थिक रूप से कमजोर है, यह बताने के बाद भी सुदीप उसकी मदद नहीं करता। वो दूसरों के लिए घोस्ट राइटिंग करती है। सुदीप उससे साल दर साल पूछता है तुम्हारी किताब जब आए तो मुझे जरूर देना। जब उसकी किताब आती है,तब सुदीप दुनिया से जा चुका होता है।
@रमेश कुमार "रिपु"

अक्टूबर जंक्शन - दिव्य प्रकाश दुबे
प्रकाशक - हिन्द युग्म
कीमत - 125 रूपये